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रविवार, 9 मई 2010

माँ के आँसू

आज मदर्स डे है. माँ हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं और माँ की वजह से हम आज इस दुनिया में हैं. दुनिया में माँ का एक ऐसा अनूठा रिश्ता है, जो सदैव दिल के करीब होता है. हर छोटी-बड़ी बात हम माँ से शेयर करते हैं. दुनिया के किसी भी कोने में रहें, माँ की लोरी, प्यार भरी डांट और चपत, माँ का प्यार, दुलार, स्नेह, अपनत्व व ममत्व, माँ के हाथ का बना हुआ खाना, किसी से झगडा करके माँ के आँचल में छुप कर अपने को महफूज़ समझना, बीमार होने पर रात भर माँ का जगकर गोदी में सर लिए बैठे रहना, हमारी हर छोटी से छोटी जिद को पूरी करना, हमारी सफलता के लिए देवी-देवताओं से मन्नतें मांगना ..ना जाने क्या-क्या कष्ट माँ हमारे लिए सहती है और एक दिन हम सफलता के पायदान पर चढ़ते हुए अपनी अलग ही जिदगी बसा लेते हैं. माँ की नजरों से दूर अपनी दुनिया में, फिर भी माँ रोज हमारी चिंता करती है. हम सोचते हैं कि हम बड़े हो चुके हैं, पर माँ की निगाह में तो हम बच्चे ही हैं. आज मदर्स डे पर ऐसा ही कुछ भाव लिए मेरी यह कविता –

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बचपन से ही देखता आ रहा हूँ माँ के आँसू

सुख में भी, दुख में भी

जिनकी कोई कीमत नहीं

मैं अपना जीवन अर्पित करके भी

इनका कर्ज नहीं चुका सकता।


हमेशा माँ की आँखों में आँसू आये

ऐसा नहीं कि मैं नहीं रोया

लेकिन मैंने दिल पर पत्थर रख लिया

सोचा, कल को सफल आदमी बनूँगा

माँ को सभी सुख-सुविधायें दूँगा

शायद तब उनकी आँखों में आँसू नहीं हो

पर यह मेरी भूल थी।


आज मैं सफल व्यक्ति हूँ

सारी सुख-सुविधायें जुटा सकता हूँ

पर एक माँ के लिए उसके क्या मायने ?

माँ को सिर्फ चाहिए अपना बेटा

जिसे वह छाती से लगा जी भर कर प्यार कर सके

पर जैसे-जैसे मैं ऊँचाईयों पर जाता हूँ

माँ का साथ दूर होता जाता है

शायद यही नियम है प्रकृति का।

शनिवार, 8 मई 2010

जनसत्ता में 'शब्द सृजन की ओर' ब्लॉग की चर्चा

''शब्द सृजन की ओर'' पर 22 अप्रैल, 2010 को प्रस्तुत पोस्ट प्रलय का इंतजार को प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक पत्र 'जनसत्ता' ने 8 मई 2010 को अपने सम्पादकीय पृष्ठ पर नियमित स्तम्भ 'समान्तर' में स्थान दिया ... आभार!!

(चित्र साभार : प्रिंट मीडिया पर ब्लॉगचर्चा)

गुरुवार, 6 मई 2010

67 लाख रुपये में बिका चंद्रमा को निहारने वाला कागज

इतिहास की धरोहरें आने वाली पीढ़ियों के लिए पथ-प्रदर्शक का कार्य करती हैं। हाल ही में चंद्रमा पर सबसे पहले पहुंचने वाला पन्ना जिस पर नील आर्मस्ट्रांग के हस्ताक्षर भी हैं, करीब डेढ़ लाख डालर (करीब 67 लाख रूपये) में नीलाम हुआ। इस पन्ने पर लिखा था- "एक शख्स का छोटा सा कदम, इंसानियत के लिए एक बड़ी छलांग।" यह पेज बोनहम्स नीलामी घर, न्यूयार्क में बेचा गया।
इस पन्ने पर लिखे शब्द नील आर्मस्ट्रांग ने तब कहे थे जब 20 जुलाई 1969 को अपोलो-11 में बैठकर उन्होंने चंद्रमा की यात्रा तय की थी और चंद्रमा पर पहला कदम रखने वाले शख्स का गौरव हासिल किया था। नील आर्मस्ट्रांग ने पेज पर अपने दस्तखत कर इसे अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के लोक सूचना कार्यालय के प्रमुख को दे दिया था। उन्होंने नासा के अधिकारी को यह पन्ना उस वक्त दिया था जब धरती पर लौटने पर जॉन्सन अंतरिक्ष केंद्र में उनका इलाज किया जा रहा था। वाकई वक़्त बिताने के साथ चीजें कितनी मूल्यवान हो जाती हैं, इसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है. आज विज्ञानं भले ही कितने आगे पहुँच गया हो पर धरोहरों को सुरक्षित रखने में ही सृष्टि की भलाई है !!


शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

पुस्तकों के प्रति आकर्षण जरुरी (विश्व पुस्तक दिवस पर)

पढना किसे अच्छा नहीं लगता। बचपन में स्कूल से आरंभ हुई पढाई जीवन के अंत तक चलती है. पर दुर्भाग्यवश आजकल पढ़ने की प्रवृत्ति लोगों में कम होती जा रही है. पुस्तकों से लोग दूर भाग रहे हैं. हर कुछ नेट पर ही खंगालना चाहते हैं. शोध बताते हैं कि इसके चलते लोगों की जिज्ञासु प्रवृत्ति और याद करने की क्षमता भी ख़त्म होती जा रही है. बच्चों के लिए तो यह विशेष समस्या है. पुस्तकें बच्चों में अध्ययन की प्रवृत्ति, जिज्ञासु प्रवृत्ति, सहेजकर रखने की प्रवृत्ति और संस्कार रोपित करती हैं. पुस्तकें न सिर्फ ज्ञान देती हैं, बल्कि कला-संस्कृति, लोकजीवन, सभ्यता के बारे में भी बताती हैं. नेट पर लगातार बैठने से लोगों की आँखों और मस्तिष्क पर भी बुरा असर पड़ रहा है. ऐसे में पुस्तकों के प्रति लोगों में आकर्षण पैदा करना जरुरी हो गया है. इसके अलावा तमाम बच्चे गरीबी के चलते भी पुस्तकें नहीं पढ़ पाते, इस ओर भी ध्यान देने की जरुरत है. 'सभी के लिए शिक्षा कानून' को इसी दिशा में देखा जा रहा है.


आज विश्व पुस्तक दिवस है. यूनेसको ने 1995 में इस दिन को मनाने का निर्णय लिया, कालांतर में यह हर देश में व्यापक होता गया. लोगों में पुस्तक प्रेम को जागृत करने के लिए मनाये जाने वाले इस दिवस पर जहाँ स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई की आदत डालने के लिए सस्ते दामों पर पुस्तकें बाँटने जैसे अभियान चलाये जा रहे हैं, वहीँ स्कूलों या फिर सार्वजनिक स्थलों पर प्रदर्शनियां लगाकर पुस्तक पढ़ने के प्रति लोगों को जागरूक किया जा रहा है. स्कूली बच्चों के अलावा उन लोगों को भी पढ़ाई के लिए जागरूक किया जाना जरुरी है जो किसी कारणवश अपनी पढ़ाई छोड़ चुके हैं। बच्चों के लिए विभिन्न जानकारियों व मनोरंजन से भरपूर पुस्तकों की प्रदर्शनी जैसे अभियान से उनमें पढ़ाई की संस्कृति विकसित की जा सकती है. पुस्तकालय इस सम्बन्ध में अहम् भूमिका निभा सकते हैं, बशर्ते उनका रख-रखाव सही ढंग से हो और स्तरीय पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं वहाँ उपलब्ध कराई जाएँ। वाकई आज पुस्तकों के प्रति ख़त्म हो रहे आकर्षण के प्रति गंभीर होकर सोचने और इस दिशा में सार्थक कदम उठाने की जरुरत है. विश्व पुस्तक दिवस पर अपना एक बाल-गीत भी प्रस्तुत कर रहा हूँ-




प्यारी पुस्तक, न्यारी पुस्तक

ज्ञानदायिनी प्यारी पुस्तक

कला-संस्कृति, लोकजीवन की

कहती है कहानी पुस्तक।


अच्छी-अच्छी बात बताती

संस्कारों का पाठ पढ़ाती

मान और सम्मान बड़ों का

सुन्दर सीख सिखाती पुस्तक।



सीधी-सच्ची राह दिखाती

ज्ञान पथ पर है ले जाती

कर्म और कर्तव्य हमारे

सदगुण हमें सिखाती पुस्तक।

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

प्रलय का इंतजार

आज की यह पोस्ट माँ पर, पर वो माँ जो हर किसी की है। जो सभी को बहुत कुछ देती है, पर कभी कुछ माँगती नहीं। पर हम इसी का नाजायज फायदा उठाते हैं और उसका ही शोषण करने लगते हैं। जी हाँ, यह हमारी धरती माँ है. हमें हर किसी के बारे में सोचने की फुर्सत है, पर धरती माँ की नहीं. यदि धरती ही ना रहे तो क्या होगा... कुछ नहीं। ना हम, ना आप और ना ये सृष्टि. पर इसके बावजूद हम नित उसी धरती माँ को अनावृत्त किये जा रहे हैं. जिन वृक्षों को उनका आभूषण माना जाता है, उनका खात्मा किये जा रहे हैं. विकास की इस अंधी दौड़ के पीछे धरती के संसाधनों का जमकर दोहन किये जा रहे हैं. हम जिसकी छाती पर बैठकर इस प्रगति व लम्बे-लम्बे विकास की बातें करते हैं, उसी छाती को रोज घायल किये जा रहे हैं. पृथ्वी, पर्यावरण, पेड़-पौधे हमारे लिए दिनचर्या नहीं अपितु पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनकर रह गए हैं. सौभाग्य से आज विश्व पृथ्वी दिवस है. लम्बे-लम्बे भाषण, दफ्ती पर स्लोगन लेकर चलते बच्चे, पौधारोपण के कुछ सरकारी कार्यक्रम....शायद कल के अख़बारों में पृथ्वी दिवस को लेकर यही कुछ दिखेगा और फिर हम भूल जायेंगे. हम कभी साँस लेना नहीं भूलते, पर स्वच्छ वायु के संवाहक वृक्षों को जरुर भूल गए हैं। यही कारण है की नित नई-नई बीमारियाँ जन्म ले रही हैं. इन बीमारियों पर हम लाखों खर्च कर डालते हैं, पर अपने परिवेश को स्वस्थ व स्वच्छ रखने के लिए पाई तक नहीं खर्च करते.


आज आफिस के लिए निकला तो बिटिया अक्षिता बता रही थी कि पापा आपको पता है आज विश्व पृथ्वी दिवस है। आज स्कूल में टीचर ने बताया कि हमें पेड़-पौधों की रक्षा करनी चाहिए। पहले तो पेड़ काटो नहीं और यदि काटना ही पड़े तो एक की जगह दो पेड़ लगाना चाहिए। पेड़-पौधे धरा के आभूषण हैं, उनसे ही पृथ्वी की शोभा बढती है. पहले जंगल होते थे तो खूब हरियाली होती, बारिश होती और सुन्दर लगता पर अब जल्दी बारिश भी नहीं होती, खूब गर्मी भी पड़ती है...लगता है भगवान जी नाराज हो गए हैं. इसलिए आज सभी लोग संकल्प लेंगें कि कभी भी किसी पेड़-पौधे को नुकसान नहीं पहुँचायेंगे, पर्यावरण की रक्षा करेंगे, अपने चारों तरफ खूब सारे पौधे लगायेंगे और उनकी नियमित देख-रेख भी करेंगे.


अक्षिता के नन्हें मुँह से कही गई ये बातें मुझे देर तक झकझोरती रहीं. आखिर हम बच्चों में धरती और पर्यावरण की सुरक्षा के संस्कार क्यों नहीं पैदा करते. मात्र स्लोगन लिखी तख्तियाँ पकड़ाने से धरा का उद्धार संभव नहीं है. इस ओर सभी को तन-माँ-धन से जुड़ना होगा. अन्यथा हम रोज उन अफवाहों से डरते रहेंगे कि पृथ्वी पर अब प्रलय आने वाली है. पता नहीं इस प्रलय के क्या मायने हैं, पर कभी ग्लोबल वार्मिंग, कभी सुनामी, कभी कैटरिना चक्रवात तो कभी बाढ़, सूखा, भूकंप, आगजनी और अकाल मौत की घटनाएँ ..क्या ये प्रलय नहीं है. गौर कीजिये इस बार तो चिलचिलाती ठण्ड के तुरंत बाद ही चिलचिलाती गर्मी आ गई, हेमंत, शिशिर, बसंत का कोई लक्षण ही नहीं दिखा..क्या ये प्रलय नहीं है. अभी भी वक़्त है, हम चेतें अन्यथा धरती माँ कब तक अनावृत्त होकर हमारे अनाचार सहती रहेंगीं. जिस प्रलय का इंतजार हम कर रहे हैं, वह इक दिन इतने चुपके से आयेगी कि हमें सोचने का मौका भी नहीं मिलेगा !!

धरती से मरूभूमि भगाएं (पृथ्वी दिवस पर प्रस्तुति)



सुन्दर-सुन्दर वृक्ष घनेरे

सबको सदा बुलाते

ले लो फल-फूल सुहाने

सब कुछ सदा लुटाते।


करते हैं जीवन का पोषण

नहीं करो तुम इनका शोषण

धरती पर होगी हरियाली

तो सारे जग की खुशहाली।


वृक्ष कहीं न कटने पाएं

संकल्पों के हाथ उठाएं

ढेर सारे पौधे लगाकर

धरती से मरूभूमि भगाएं।

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

संबंधों की दुनिया (कविता)

सम्बन्धों के मकड़जाल से
भरी हुई है दुनिया
एक सम्बन्ध से नाता टूटा
तो दूसरे सम्बन्ध जुड़ गये
हर दिन न जाने कितने ही
सम्बन्धों से जुड़ते हैं लोग
कोई औपचारिक
तो कोई अनौपचारिक
पर कई सम्बन्ध
ऐसे भी होते हैं
जो न चाहते हुये भी
जुड़ जाते हैं,
क्योंकि
उनका नाता कहीं
मन की गहराईयों से होता है
ये सम्बन्ध
साथ भले
ही न निभा सकें
पर चेतन या अवचेतन में
उनकी टीस सदा बनी रहती है।

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

विचारों का पुंज छोड़ गए डा0 अम्बेडकर ( अम्बेडकर जयंती पर )

आधुनिक भारत के निर्माताओं में डा0 भीमराव अम्बेडकर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है पर स्वयं डा0 अम्बेडकर को इस स्थिति तक पहुँचने के लिये तमाम सामाजिक कुरीतियों और भेदभाव का सामना करना पड़ा। डा0 अम्बेडकर मात्र एक साधारण व्यक्ति नहीं थे वरन् दार्शनिक, चिंतक, विचारक, शिक्षक, सरकारी सेवक, समाज सुधारक, मानवाधिकारवादी, संविधानविद और राजनीतिज्ञ इन सभी रूपों में उन्होंने विभिन्न भूमिकाओं का निर्वाह किया। 14 अप्रैल, 1891 को इन्दौर के निकट महू कस्बे में अछूत जाति माने जाने वाले महार परिवार में जन्मे अम्बेडकर रामजी अम्बेडकर की 14वीं सन्तान थे। यह संयोग ही कहा जाएगा कि जिस वर्ष डा0 अम्बेडकर का जन्म हुआ, उसी वर्ष महात्मा गाँधी वकालत पास कर लंदन से भारत वापस आए। डा0 अम्बेडकर के पिता रामजी अम्बेडकर सैन्य पृष्ठभूमि के थे एवं विचारों से क्रान्तिकारी थे। उनके संघर्षस्वरूप सेना में महारों के प्रवेश पर लगी पाबन्दी को हटाकर सन् 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ‘महार बटालियन’ की स्थापना हुयी।



डा0 अम्बेडकर पर बुद्ध, कबीरदास और ज्योतिबाफुले की अमिट छाप पड़ी थी। बुद्ध से उन्होंने शारीरिक व मानसिक शान्ति का पाठ लिया, कबीर से भक्ति मार्ग तो ज्योतिबाफुले से अथक संघर्ष की प्रेरणा। यही नहीं अमेरिका और लन्दन में अध्ययन के दौरान वहाँ के समाज, परिवेश व संविधान का भी आपने गहन अध्ययन किया और उसे भारतीय परिवेश में उतारने की कल्पना की। अमेरिका के 14वंे संविधान संशोधन जिसके द्वारा काले नीग्रों को स्वाधीनता के अधिकार प्राप्त हुए, से वे काफी प्रभावित थे और इसी प्रकार दलितों व अछूतों को भी भारत में अधिकार दिलाना चाहते थे। 20 मार्च 1927 को महाड़ में आपने दलितों का एक विशाल सम्मेलन बुलाया और उनकी अन्तरात्मा को झकझोरते हुए अपने पैरों पर खड़ा होने और स्वचेतना से स्वाभिमान व सम्मान पैदा करने की बात कही। उन्होंने दलितों का आह्यन किया कि वे सरकारी नौकरियों में बढ़-चढ़कर भाग लें वहीं दूसरी तरफ यह भी कहा कि- ‘‘अपना घर-बार त्यागो, जंगलों की तरफ भागो और जंगलों पर कब्जा कर उसे कृषि लायक बनाकर अपना अधिकार जमाओ।’’ इस आन्दोलन से रातोंरात डा0 अम्बेडकर दलितों के सर्वमान्य नेता के रूप में उभरकर सामने आए। डा0 अम्बेडकर का स्पष्ट मानना था कि राजनैतिक स्वतंत्रता से पूर्व सामाजिक एवं आर्थिक समानता जरूरी है। अम्बेडकर का मानना था कि वर्ण व्यवस्था का सीधा दुष्प्रभाव भले ही दलितों व पिछड़ों मात्र पर दिखता है पर जब इसी सामाजिक विघटन के कारण देश गुलाम हुआ तो सवर्ण भी बिना प्रभावित हुए नहीं रह सके।



डा0 अम्बेडकर अपनी योग्यता की बदौलत सन् 1942 में वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्य भी बने एवम् कालान्तर में संविधान सभा के सदस्य भी चुने गये। संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष रूप में आपने संविधान का पूरा खाका खींचा और उसमें समाज के दलितों व पिछड़े वर्गों की बेहतरी के लिए भी संवैधानिक प्रावधान सुनिश्चित किए। स्वतंत्रता पश्चात डा0 अम्बेडकर भारत के प्रथम कानून मंत्री भी बने पर महिलाओं को सम्पति में बराबर का हिस्सा देने के लिये उनके द्वारा संसद में पेश किया गया ‘हिन्दू कोड बिल’ निरस्त हो जाने से वे काफी आहत हुए और 10 अक्टूबर 1951 को मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया।



1935 में नासिक जिले के भेवले में आयोजित महार सम्मेलन में ही अम्बेडकर ने घोषणा कर दी थी कि- ‘‘आप लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि मैं धर्म परिवर्तन करने जा रहा हूँ। मैं हिन्दू धर्म में पैदा हुआ, क्योंकि यह मेरे वश में नहीं था लेकिन मैं हिन्दू धर्म में मरना नहीं चाहता। बौद्ध धर्म ग्रहण करने के कुछ ही दिनों पश्चात 6 दिसम्बर 1956 को डा0 अम्बेडकर ने नश्वर शरीर को त्याग दिया पर ‘आत्मदीपोभव’ की तर्ज पर समाज के शोषित, दलित व अछूतों के लिये विचारों की एक पुंज छोड़ गए।
आज डा0 अम्बेडकर को लेकर मत-विमत में राजनीति बहुतेरे करते हैं, पर उनके दिखाए रास्ते पर बहुत कम ही लोग चलते हैं. उन्होंने दलित-पिछड़ों के समन्वय का सपना देखा था, वह असमय कल-कवलित हो गया. जब तक इस धरती पर शोषण है, छूत-अछूत की भावना है, शोषक शक्तियों द्वारा दमितों का दोहन है..तब तक डा0 अम्बेडकर की प्रासंगिकता स्वमेव बनी रहेगी.

- कृष्ण कुमार यादव

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

अधूरे अहसास और टूटे सपने

जब छोटे थे तब बड़े होने की तमन्ना करते थे।

मगर अब पता चला कि अधूरे अहसास और टूटे सपने से अच्छा अधूरे होमवर्क और टूटे खिलौने थे !!

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

आतंकवाद : एक विश्वव्यापी समस्या

आतंकवाद समकालीन युग की सर्वाधिक ज्वलंत अन्तर्राष्ट्रीय समस्या है। कोई भी ऐसा देश नहीं है, जो इसकी पीड़ा से न गुजरा हो। भूमण्डलीकरण के दायरे के साथ ही आतंकवाद का भी दायरा बढ़ता गया और आज यह सुरसा के मुँह की तरह विभिन्न रूपों में फैल रहा है। इसमें लिंग आधारित आतंकवाद, अभिजातवादी आतंकवाद, दलित चेतनावादी आतंकवाद, क्षेत्रीय पृथकतावादी आतंकवाद, सांप्रदायिक आतंकवाद, जातीय आतंकवाद, जेहादी आतंकवाद, विस्तारवादी आतंकवाद से लेकर प्रायोजित आतंकवाद तक शामिल हैं। वस्तुतः आतंकवाद एक ऐसा सिद्धांत है जो भय या त्रास के माध्यम से अपने लक्ष्य की पूर्ति करने में विश्वास करता है।

तमाम विचारक आतंक को मानव की आदिम वृत्ति के रूप में देखते हैं। इस मत के अनुसार जंगलों में रहना, शिकार करना, हिंसक जंतुओं से लड़ना एवं बलपूर्वक अपने जीवनयापन की व्यवस्था करने में कहीं-न-कहीं आतंक परिलक्षित होता है। प्रख्यात नोबेल पुरस्कार विजेता जीव-शास्त्री काॅनराड लाॅरेन्स की मानें तो- ‘‘जीव की अधिकांश प्रजातियों के साथ ही मनुष्य में भी अपनी प्रजाति की दूसरी इकाई के प्रति स्वाभाविक आक्रामक आतंक वृत्ति होती है। एक सीमा पर पहुँचकर यह आक्रामक आतंक बिना किसी वाह्य उत्तेजना के सक्रिय हो सकता है।‘‘ आतंक की चर्चा हमारे पौराणिक ग्रन्थों में भी है। महाकवि तुलसीदास ने इसके विभिन्न रूपों की चर्चा की है-

बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा।।
मानहिं मात-पिता नहीं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।।
जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानहु निसिचर सब प्रानी।।

आज आतंकवाद एक संगठित उद्योग का रूप धारण कर चुका है। एक जगह से आतंक खत्म होता नजर आता है, तो दूसरी जगह यह तेजी से सर उठाने लगता है। कभी सम्भ्यताओं के संघर्ष के बहाने तो कभी धर्म की आड़ में रोज तमाम जीवन-लीलाओं का यह लोप कर रहा है। इसका शिकार शिशु से लेकर वृद्धजन तक हैं। आतंक फैलाने वाले लोग अपने आप को राष्ट्रवादी, क्रांतिकारी या निष्ठावान सैनिक कहलाना पसंद करते हैं। ‘इनसाइक्लोपीडिया आॅफ दि सोशल साइंसेज‘ के अनुसार-‘‘आतंकवाद वह पद है जिसका प्रयोग विधि अथवा विधि के पीछे सिद्धांत की व्याख्या के लिए किया जाता है और जिससे एक संगठित समूह या पार्टी अपने स्पष्ट लक्ष्यों की प्राप्ति मुख्य रूप से व्यवस्थित हिंसा के प्रयोग द्वारा करता है।‘‘

यहाँ पर स्पष्ट करना जरूरी है कि आतंकवाद और हिंसा पूर्ण रूप से एक ही नहीं हैं। आतंकवाद मात्र हिंसा नहीं है बल्कि यह आतंक से विवश करने की एक विधि है, जिससे लोगों को उन कार्यों को करने के लिए बाध्य किया जाता है जिसे वे मृत्यु, भय चोट या पीड़ा के बिना नहीं कर पाते। आतंकवाद में एक राजनीतिक उद्देश्य निहित होता है, जो उसे आपराधिक हिंसा से पृथक करता है। वस्तुतः आतंकवाद एक लघु व सीमित संगठन द्वारा संचालित होता है और इसको अपने निश्चित लम्बे प्रोग्राम और लक्ष्य से प्रेरणा मिलती है और उसी के लिए आतंक उत्पन्न किया जाता है। जबकि हिंसा के पीछे कोई संगठित कार्यक्रम व सुनियोजन नहीं होता है एवं इसमें बौद्धिकता का भी पूर्ण अभाव होता है। सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि वर्तमान में आतंकवाद एक राजनीतिक कार्य की सशक्त पद्धति के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर फैला रहा है। तमाम देश अन्य देशों में अपने हितों को साधने के लिए प्रायोजित आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे हैं, जिसे किसी भी रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता। यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी वैश्विक संस्था भी आतंकवाद के समूल उन्मूलन के लिए कड़े कदम नहीं उठा पाती है। मात्र घोषणा पत्र जारी करने, शांति-सैनिक भेजने से आतंक की समस्या खत्म नहीं होती बल्कि इसके लिए समुचित संसाधनों एवं राजनैतिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता है।

मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम एवं भगवान श्री कृष्ण का उदाहरण हमारे सामने है। श्री राम ने जहाँ अपने स्वभाव व मर्यादा के दम पर तमाम राक्षस-राक्षसियों का खात्मा किया, वहीं ‘रावण‘ रूपी आतंक को भी बानरों-रीछों की संगठित सेना द्वारा खत्म कर ‘राम राज्य‘ की स्थापना की। श्रीराम का बनवासी होना इस बात का प्रतीक था कि आतंक को खत्म करने के लिए राजसत्ता से ज्यादा प्रतिबद्धता जरूरी है, सैनिकों की बजाय उनकी एकता व सूझबूझ जरूरी है। श्रीराम का आतंकवाद के विरूद्ध अभियान सामूहिक उत्तरदायित्व व सामूहिक नेतृत्व का परिणाम है, जिसमें वे लोकनायक के रूप में उभरते हैं। श्री कृष्ण ने कौरवों की 18 अक्षौहिणी सेना को अपने नेतृत्व, कुशल मार्गदर्शन, एकता एवं सक्षम कूटनीति के चलते ही परास्त किया। रामायण और महाभारत के युद्ध इतिहास का एक नया अध्याय रचते हैं तो सिर्फ इस कारण कि उन्होंने आतातायियों के संगठित आतंक के विरूद्ध जनमानस को न सिर्फ एकत्र किया बल्कि मानवता को यह संदेश भी दिया कि ‘‘सत्य सदैव विजयी होता है।‘‘ कालांतर में महात्मा बुद्ध व महावीर जैन ने अहिंसा को धर्म से परे मानव जीवन की सद्वृत्तियों से जोड़ा। आधुनिक काल में महात्मा गाँधी ने अंग्रेजी राज रूपी आतंक को खत्म करने के लिए सत्याग्रह एवं अहिंसा का सहारा लिया। उन्होंने प्रतिपादित किया कि कोई भी आतंक एक लंबे समय तक नहीं रह सकता, बशर्ते उसके खात्मे के लिए किसी प्रायोजित आतंक का सहारा न लिया जाय। महात्मा गाँधी मानसिक आतंकवाद को ज्यादा बड़ी समस्या मानते थे न कि भौतिक आतंकवाद को। इसी कारण उन्होंने विचारों को खत्म करने की बजाय उसे बदलने पर जो दिया।

निश्चिततः आतंकवाद आज विश्वव्यापी समस्या है। भौतिक आतंकवाद की बजाय ‘मानसिक‘ एवं ‘प्रायोजित‘ आतंकवाद में इजाफा हुआ है। आतंकी गतिविधियों को प्रोत्साहन देने वाले देश यह भूल जाते हैं कि आतंक का कोई जाति, धर्म लिंग या राष्ट्र नहीं होता। अपनी क्षुधा शांत करने के लिए आतंकी अपने जन्मदाता को भी निगल सकता है। ऐसे में जरूरत आतंक के केंद्र बिन्दु पर चोट करने की है। श्री राम भी रावण को तभी खत्म कर पाए जब उन्होंने उसके नाभि स्थल पर बाण भेंदा। आज भी आतंकवाद के खात्मे के लिए इसी नीति को अपनाने की जरूरत है।

गुरुवार, 25 मार्च 2010

पाखी को जन्म-दिवस की बधाइयाँ !!

ये देखिये हमारी बिटिया अक्षिता (पाखी) को। पूरे अंडमान (Andaman & Nicobar Islands) के रंग में रंग गई हैं। हर रोज समुद्र का किनारा, पार्क, म्यूजियम, चिड़िया टापू, यहाँ का खूबसूरत परिवेश और जमकर मस्ती। इन्हें बस मौका मिलना चाहिए बीच पर जाने का, फिर क्या। इतना दौड़ेन्गी कि हम इनके पीछे ही दौड़ते रह जाएं. यही बच्चों का बाल-सुलभ संसार है. वे किसी सीमा को नहीं जानते और न ही कोई डर. बस अपनी अलबेली दुनिया में मस्त. हमारी जीवन-संगिनी आकांक्षा जी की एक बाल-कविता "लौट आओ बचपन" की पंक्तियाँ गौरतलब हैं-

बचपन मेरा कितना प्यारा
मम्मी-पापा का राजदुलारा
माँ की ममता, पापा का प्यार
याद आता है लाड़-दुलार।

बचपन मेरा लौट जो आए
जीवन में खुशहाली लाए
पढ़ाई से मिलेगी छुट्टी
बात नहीं कोई होगी झूठी।

अब बचपन मेरे लौट भी आओ
हंसो, खेलो और मौज मनाओ !!
जब भी पाखी को देखता हूँ तो अपना बचपन याद आने लगता है. वाकई बचपन के दिनों के क्या कहने. आज पाखी का जन्म-दिवस है, पूरे चार साल की हो गईं. इनका पिछला जन्म-दिवस कभी नहीं भूलूँगा, जब जबरदस्त बीमारी के बाद उसी दिन हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हुआ था. मानो खुशियाँ दुगुनी हो गई थीं. पाखी और उनकी मम्मी आकांक्षा बहुत खुश थीं उस दिन. खैर ये सब समय का चक्र है, जो अपनी चाल चलता रहता है. मुझे याद है जब पाखी का जन्म हुआ था तो मुझे सीनियर टाइम स्केल वेतनमान में प्रोन्नति मिली थी और इस बार पाखी के जन्म-दिन से लगभग कुछ ही दिनों पहले निदेशक के रूप में प्रोन्नति. लोग कहते हैं कन्या लक्ष्मी-स्वरूपा होती हैं, मेरे मामले में यह अक्षरक्ष: सही है।


आज 25 मार्च को पाखी का जन्म-दिवस है। इस दिन का हम बेसब्री से इंतजार करते हैं, और वो खुशनसीब दिन आज है. पाखी को जन्म-दिवस की ढेर सारी बधाई, आशीष और प्यार. वह यूँ ही हँसती-खिलखिलाती रहे और हमारे दामन में खुशियाँ भरती रहे !!

मंगलवार, 23 मार्च 2010

जरा याद करो कुर्बानी

आज 23 मार्च को राजगुरु, सुखदेव और शहीद-ए-आजम भगत सिंह की पुण्य तिथि है।ब्रितानिया हुकूमत ने जब शहीद-ए-आजम भगतसिंह को फाँसी के फँदे पर लटकाया तो पूरे देश में आजादी पाने की ख्वाहिश और भी भड़क गई। 23 मार्च 1931 की इस घटना की गूँज देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में सुनाई दी। तत्कालीन भारतीय नेताओं और देश विदेश के अखबारों ने गोरी हुकूमत के इस अन्यायपूर्ण फैसले के खिलाफ जबरदस्त प्रतिक्रिया व्यक्त की। गौरतलब है कि गोरी हुकूमत ने जन विद्रोह के डर से लाहौर षड्यंत्र (सैंडर्स हत्याकांड) में राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह को फाँसी के लिए निर्धारित तिथि 24 मार्च से एक दिन पहले यानी 23 मार्च को ही फाँसी पर चढ़ा दिया था। इस पर क्षोभ व्यक्त करते हुए चर्चित 'आनंद बाजार' पत्रिका ने लिखा- 'राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह की मौत से पूरे देश पर दुःख का काला साया छा गया है' तो 'पंजाब केसरी' ने लिखा 'जिस व्यक्ति ने वायसराय को इन नौजवानों को फाँसी पर लटकाने की सलाह दी वह देश का गद्दार और शैतान था।'

स्वयं भगत सिंह और उनके साथी इस क्रांति का अंत जानते थे, पर यह विश्वास अवश्य था कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा और देश आजाद होगा। ‘‘तुझे जिबह करने की खुशी और मुझे मरने का शौक है मेरी भी मर्जी वही जो मेरे सैयाद की है...’’ इन पंक्तियों का एक-एक लफ्ज उस महान देशभक्त भगत सिंह की वतन पर मर मिटने की ख्वाहिश जाहिर करता है, जिसने आजादी की राह में हँसते-हँसते फाँसी के फंदे को चूम लिया। आज भी इस शहादत पर लिखे अंग्रेजी अखबार 'द पीपुल' के शब्द गौरतलब हैं-'भगतसिंह एक किंवदंती बन गया है। देश के सबसे अच्छे पुष्प के चले जाने से हर कोई दुःखी है। हालाँकि भगतसिंह अब नहीं रहा लेकिन हर जगह क्रांति अमर रहे और भगतसिंह अमर रहे जैसे नारे अब भी सुनाई देते हैं।'

!!! आज शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की पुण्यतिथि पर कोटिश: नमन और श्रद्धांजलि !!!




शनिवार, 20 मार्च 2010

गौरैया कहाँ से आयेगी

आज दुनिया भर में 20 मार्च 2010 को पहली बार ''विश्व गौरैया दिवस'' मनाया जा मनाया जा रहा है बहुत पहले गौरैया के विलुप्त होने को लेकर एक कविता लिखी थी, आज ''विश्व गौरैया दिवस'' पर प्रस्तुत है-

चाय की चुस्कियों के बीच
सुबह का अखबार पढ़ रहा था
अचानक
नजरें ठिठक गईं
गौरैया शीघ्र ही विलुप्त पक्षियों में।

वही गौरैया,
जो हर आँगन में
घोंसला लगाया करती
जिसकी फुदक के साथ
हम बड़े हुये।

क्या हमारे बच्चे
इस प्यारी व नन्हीं-सी चिड़िया को
देखने से वंचित रह जायेंगे!
न जाने कितने ही सवाल
दिमाग में उमड़ने लगे।

बाहर देखा
कंक्रीटों का शहर नजर आया
पेड़ों का नामोनिशां तक नहीं
अब तो लोग घरों में
आँगन भी नहीं बनवाते
एक कमरे के फ्लैट में
चार प्राणी ठुंसे पड़े हैं।

प्रकृति को
निहारना तो दूर
हर कुछ इण्टरनेट पर ही
खंगालना चाहते हैं।
आखिर
इन सबके बीच
गौरैया कहाँ से आयेगी ?

मंगलवार, 16 मार्च 2010

दोस्ती करें...

आज भारतीय नव-वर्ष, नव-संवत्सर विक्रमी सम्वत 2067 का आरंभ हो रहा है। इस दिन से बहुत सारी घटनाएँ जुडी हुई हैं. इस रूप में आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण है. चैत्री नवरात्रारंभ भी आज से ही है. हर तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ. इन खुशियों के बीच, भाग-दौड़ की जिंदगी में कुछ पल अपने लिए भी निकालें औए इस पर विचार करें-



1 दोस्ती करें, फूलों से ताकि जीवन-बगिया महकती रहे।

2 दोस्ती करें, पक्षियों से ताकि जिन्दगी चहकती रहे।

3 दोस्ती करें, रंगों से ताकि दुनिया रंगीन हो जाए।

4 दोस्ती करें, कलम से ताकि सुन्दर वाक्यों का सृजन होता रहे।

5 दोस्ती करें, पुस्तकों से ताकि शब्द-संसार में वृद्धि होती रहे।

6 दोस्ती करें,ईश्वर से ताकि संकट की घड़ी में वह हमारे काम आए।

7 दोस्ती करें, अपने आप से ताकि जीवन में कोई विश्वासघात ना कर सके।

8 दोस्ती करें, अपने माता-पिता से क्योंकि दुनिया में उनसे बढ़कर कोई शुभचिंतक नहीं।


9 दोस्ती करें, अपने गुरु से ताकि उनका मार्गदर्शन आपको भटकने ना दें।

10 दोस्ती करें, अपने हुनर से ताकि आप आत्मनिर्भर बन सकें।


!! भारतीय नववर्ष विक्रमी सम्वत 2067 और चैत्री नवरात्रारंभ पर हार्दिक मंगलकामनाएं !!

रविवार, 14 मार्च 2010

सेलुलर जेल की गाथा

1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम ने अंग्रेजी सरकार को चैकन्ना कर दिया। व्यापार के बहाने भारत आये अंग्रेजों को भारतीय जनमानस द्वारा यह पहली कड़ी चुनौती थी जिसमें समाज के लगभग सभी वर्ग शामिल थे। जिस अंग्रेजी साम्राज्य के बारे में ब्रिटेन के मजदूर नेता अर्नेस्ट जोंस का दावा था कि-‘‘अंग्रेजी राज्य में सूरज कभी डूबता नहीं और खून कभी सूखता नहीं‘‘, उस दावे पर ग्रहण लगता नजर आया। अंग्रेजों को आभास हो चुका था कि उन्होंने युद्ध अपनी बहादुरी व रणकौशलता की वजह से नहीं बल्कि षडयंत्रों, जासूसों, गद्दारी और कुछेक भारतीय राजाओं के सहयोग से जीता था। अपनी इन कमजोरियों को छुपाने के लिए जहाँ अंग्रेजी इतिहासकारों ने 1857 के स्वाधीनता संग्राम को सैनिक गदर मात्र कहकर इसके प्रभाव को कम करने की कोशिश की, वहीं इस संग्राम को कुचलने के लिए भारतीयों को असहनीय व अस्मरणीय यातनायें दी गई। एक तरफ लोगों को फांसी दी गयी, पेड़ों पर समूहों में लटका कर मृत्यु दण्ड दिया गया व तोपों से बांधकर दागा गया वहीं जिन जीवित लोगों से अंग्रेजी सरकार को ज्यादा खतरा महसूस हुआ, उन्हें ऐसी जगह भेजा गया, जहाँ से जीवित वापस आने की बात तो दूर किसी अपने-पराये की खबर तक मिलने की कोई उम्मीद भी नहीं रख सकते थे और और यही काला पानी था। वो काला पानी जिसे आज सिर्फ महसूस किया जा सकता है कि दमन व यातना की प्रताड़ित परिस्थितियों के बीच किस प्रकार देश के तमाम नौजवानों ने अपनी जिन्दगी आजादी की आग में झांेक दी। अंग्रेजी हुकूमत ने काला पानी द्वारा इस आग को बुझाने की जबरदस्त कोशिश की पर वह तो चिंगारी से ज्वाला बनकर भड़क उठी। सेलुलर जेल, अण्डमान में कैद क्रांतिकारियों पर अंग्रेजों ने जमकर जुल्म ढाये पर जुल्म से निकली हर चीख ने भारत माँ की आजादी के इरादों को और बुलंद किया।

सेलुलर जेल के चलते ही अंडमान महत्वूपर्ण पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित हो चुका है। कहना अतिश्योक्ति न होगा कि अंडमान व सेलुलर जेल एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। यह एक अजीब इत्तफाक है कि अंडमान को भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई हेतु सबसे पहले चुना था पर बाद में इसे बदलकर रामेश्वरम (धनुषकोडि) कर दिया। उसके बाद से सभ्यता की हलचल अंडमान में नहीं दिखी। प्रकृति के आगोश में लिपटे इस खूबसूरत द्वीप के चारों तरफ विस्तृत समुद्री लहरों की अठखेलियाँ दीर्घ-काल तक लोगों की निगाहों से बची रहीं पर उनके इस अनछुएपन को न जाने किसकी नजर लग गयी कि ‘काला पानी‘ के रुप में कुख्यात हुई।

10 मार्च 2006 को अपना शताब्दी उत्सव मना चुका सेल्यूलर जेल आज आजादी के गवाह रूप में खड़ा है। अंग्रेजी सरकार को लगा था कि सुदूर निर्वासन व यातनाओं के बाद स्वाधीनता सेनानी स्वतः निष्क्रिय व खत्म हो जायेंगे पर यह निर्वासन व यातना भी सेनानियों की गतिविधियों को नहीं रोक पाया। वे तो पहले से ही जान हथेली पर लेकर निकले थे, फिर भय किस बात का। क्रान्तिकारियों का मनोबल तोड़ने और उनके उत्पीड़न हेतु सेल्यूलर जेल में तमाम रास्ते अख्तियार किये गये। स्वाधीनता सेनानियों और क्रातिकारियों को राजनैतिक बंदी मानने की बजाय उन्हें एक सामान्य कैदी माना गया। यही कारण था कि उन्हें लोहे के कोल्हू चलाने हेतु बैल की जगह जोता गया और प्रतिदिन 15 सेर तेल निकालने की सजा दी गयी। वीर सावरकर ने अपनी आत्मकथा में कालापानी के दिनों का वर्णन किया है, जिसे पढ़कर अहसास होता है कि आजादी के दीवाने गुलामी के दंश को खत्म करने हेतु किस हद तक यातनायें और कष्ट झेलते रहे। सेलुलर जेल की खिड़कियों से अभी भी जुल्म की दास्तां झलकती है। ऐसा लगता है मानो अभी फफक कर इसकी दीवालें रो पड़ेंगी।

सेल्यूलर जेल आजादी का एक ऐसा पवित्र तीर्थस्थल बन चुका है, जिसके बिना आजादी की हर इबारत अधूरी है। पर इस इतिहास को वर्तमान से जोड़ने की जरूरत है। सेलुलर जेल अपने अंदर जुल्मों की निशानी के साथ-साथ वीरता, अदम्य साहस, प्रतिरोध, बलिदान व त्याग की जिस गाथा को समेटे हुए है, उसे आज की युवा पीढ़ी के अंदर भी संचारित करने की आवश्यकता है। वाकई आज देश के हरेक व्यक्ति विशेषकर बच्चों को सेल्युलर जेल के दर्शन करने चाहिए ताकि आजादी की कीमत का अहसास उन्हें भी हो सके। देशभक्ति के जज्बे से भरे देशभक्तों ने सेल्युलर जेल की दीवारों पर अपने शब्द चित्र भी अंकित किये हैं। दूर-दूर से लोग इस पावन स्थल पर आजादी के दीवानों का स्मरण कर अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं व इतिहास के गर्त में झांककर उन पलों को महसूस करते हैं जिनकी बदौलत आज हम आजादी के माहौल में सांस ले रहे हैं। बदलते वक्त के साथ सेल्युलर जेल इतिहास की चीज भले ही बन गया हो पर क्रान्तिकारियों के संघर्ष, बलिदान एवं यातनाओं का साक्षी यह स्थल हमेशा याद दिलाता रहेगा कि स्वतंत्रता यूँ ही नहीं मिली है, बल्कि इसके पीछे क्रान्तिकारियों के संघर्ष, त्याग व बलिदान की गाथा है।
(आकाशवाणी पोर्टब्लेयर से 14 मार्च को प्रसारित)

मंगलवार, 9 मार्च 2010

सूचना के अधिकार के अधीन अफसरों की शिक्षा का ब्यौरा

सूचना का अधिकार दिनों-ब-दिन व्यापक होता जा रहा है। एक तरफ जहाँ लोग इसके माध्यम से शिक्षित हो रहे हैं, वहीँ यह समाज को जागरूक भी कर रहा है। हाल ही में मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला ने आरटीआई के तहत दायर एक आवेदन पर यह फैसला दिया कि कोई सरकारी कर्मचारी या अधिकारी कितना पढ़ा-लिखा है, इसका ब्यौरा सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत हासिल किया जा सकता है। यह मामला लोकसभा सचिवालय से जुड़ा था, जिसके एक अधिकारी संयुक्त निदेशक [सुरक्षा] आरडी शर्मा के शैक्षिक रिकार्ड के अलावा अन्य निजी जानकारियों की फोटोकापी जगदीश प्रसाद गौड़ ने मांगी थी। सचिवालय ने जानकारी देने से इन्कार कर दिया था, जिस पर श्री गौड़ ने सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाया।


सचिवालय ने आरटीआई अधिनियम की उन धाराओं का हवाला दिया, जिनके तहत निजी और सार्वजनिक हित से नहीं जुड़ी जानकारी देने की मनाही है। मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला ने कहा कि सूचना आधिकारिक रिकार्ड होता है। संबंधित व्यक्ति की मौखिक या लिखित सहमति लेकर उससे जुड़ी निजी सूचनाएं उजागर की जा सकती हैं।


वाकई सूचना के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत यह एक बेजोड़ फैसला है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए !!


सोमवार, 8 मार्च 2010

अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के 100 वर्ष

आज अंतरराष्ट्रीय नारी दिवस है। यह महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों के लिए भी उतना ही महत्त्व रखता है, अखिकरकर नारी न हो तो सृजन संभव भी नहीं. कहते हैं हर पुरुष की सफलता के पीछे नारी का हाथ होता है, उसका रूप चाहे जो भी हो. आज का दिन इसलिए भी खास है कि अंतरराष्ट्रीय नारी दिवस के 100 साल पूरे हो गए. आज के दिन को हर कोई संजोना चाहता है. भारत सरकार आज के दिन महिला-आरक्षण बिल को सदन के पटल पर पेश कर रही है, शायद यह सोचकर कि आज के दिन कोई विरोध न करे. खैर देखिये क्या होता है. महिला-दिवस पर अपनी जीवन साथी आकांक्षा जी के ब्लॉग शब्द-शिखर पर भी वैचारिक सामग्री पढ़ रहा था, बड़ा दिलचस्प लगा. वैसे भी इस समय मैं घर से दूर एक वर्कशॉप के लिए भारतीय प्रबंध संस्थान, शिलांग (मेघालय) में हूँ. सो आज के दिन आकांक्षा जी की इक पोस्ट साभार !!


महिला-दिवस सुनकर बड़ा अजीब लगता है। क्या हर दिन सिर्फ पुरुषों का है, महिलाओं का नहीं ? पर हर दिन कुछ कहता है, सो इस महिला दिवस के मानाने की भी अपनी कहानी है। कभी महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई से आरंभ हुआ यह दिवस बहुत दूर तक चला आया है, पर इक सवाल सदैव उठता है कि क्या महिलाएं आज हर क्षेत्र में बखूबी निर्णय ले रही हैं। मात्र कुर्सियों पर नारी को बिठाने से काम नहीं चलने वाला, उन्हें शक्ति व अधिकार चाहिए ताकि वे स्व-विवेक से निर्णय ले सकें. आज नारी राजनीति, प्रशासन, समाज, संगीत, खेल-कूद, फिल्म, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, अन्तरिक्ष सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठ प्रदर्शन कर रही है, यहाँ तक कि आज महिला आर्मी, एयर फोर्स, पुलिस, आईटी, इंजीनियरिंग, चिकित्सा जैसे क्षेत्र में नित नई नजीर स्थापित कर रही हैं। यही नहीं शमशान में जाकर आग देने से लेकर पुरोहिती जैसे क्षेत्रों में भी महिलाएं आगे आ रही हैं. रुढियों को धता बताकर महिलाएं हर क्षेत्र में परचम फैलाना चाहती हैं।

पर इन सबके बावजूद आज भी समाज में बेटी के पैदा होने पर नाक-भौंह सिकोड़ी जाती है, कुछ ही माता-पिता अब बेटे-बेटियों में कोई फर्क नहीं समझते हैं...आखिर क्यों ? क्या सिर्फ उसे यह अहसास करने के लिए कि वह नारी है. वही नारी जिसे अबला से लेकर ताड़ना का अधिकारी तक बताया गया है. सीता के सतीत्व को चुनौती दी गई, द्रौपदी की इज्जत को सरेआम तार-तार किया गया तो आधुनिक समाज में ऐसी घटनाएँ रोज घटित होती हैं. तो क्या बेटी के रूप में जन्म लेना ही अपराध है. मुझे लगता है कि जब तक समाज इस दोगले चरित्र से ऊपर नहीं उठेगा, तब तक नारी की स्वतंत्रता अधूरी है. सही मायने में महिला दिवस की सार्थकता तभी पूरी होगी जब महिलाओं को शारीरिक, मानसिक, वैचारिक रूप से संपूर्ण आज़ादी मिलेगी, जहाँ उन्हें कोई प्रताड़ित नहीं करेगा, जहाँ कन्या भ्रूण हत्या नहीं की जाएगी, जहाँ बलात्कार नहीं किया जाएगा, जहाँ दहेज के लोभ में नारी को सरेआम जिन्दा नहीं जलाया जाएगा, जहाँ उसे बेचा नहीं जाएगा। समाज के हर महत्वपूर्ण फैसलों में उनके नज़रिए को समझा जाएगा और क्रियान्वित भी किया जायेगा. समय गवाह है कि एक महिला के लोकसभा स्पीकर बनाने पर ही लोकसभा भवन में महिलाओं के लिए पृथक प्रसाधन कक्ष बन पाया. इससे बड़ा उदारहण क्या हो सकता है. जरुरत समाज में वह जज्बा पैदा करने का है जहाँ सिर उठा कर हर महिला अपने महिला होने पर गर्व करे, न कि पश्चाताप कि काश मैं लड़का के रूप में पैदा होती.



!!! अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के 100 वर्ष पूरे होने पर शुभकामनायें !!!

सोमवार, 1 मार्च 2010

होली : रंगों के साथ राग-द्वेष भी धोने का त्यौहार

पग-पग पर बदले बोली, पग-पग पर बदले भेष, वाले भारतवर्ष में होली का त्यौहार धूम-धाम से विभिन्न रंगों में मनाया जाता है। भारतीय उत्सवों को लोकरस और लोकानंद का मेल कहा गया है। भूमण्डलीकरण और उपभोक्तावाद के बढ़ते दायरों के बीच इस रस और आनंद में डूबा भारतीय जन-मानस आज भी न तो बड़े-बड़े मॉल और क्लबों में मनने वाले फेस्ट से चहकार भरता है और न ही किसी कम्पनी के सेल ऑफर को लेकर आन्तरिक उल्लास से भरता है। होली पर्व के पीछे तमाम धार्मिक मान्यताएं, मिथक, परम्पराएं और ऐतिहासिक घटनाएं छुपी हुइ हैं पर अंतत: इस पर्व का उद्देश्य मानव-कल्याण ही है। लोकसंगीत, नृत्य, नाट्य, लोककथाओं, किस्से-कहानियों और यहाँ तक कि मुहावरों में भी होली के पीछे छिपे संस्कारों, मान्यताओं व दिलचस्प पहलुओं की झलक मिलती है।

नए वस्त्र नया श्रृंगार और लजीज पकवानों के बीच होली पर्व मनाने का एक मनोवैज्ञानिक कारण भी गिनाया जाता है कि यह पर्व के बहाने समाज एवं व्यक्तियों के अन्दर से कुप्रवृत्तियों एवं गन्दगी को बाहर निकालने का माध्यम है। होली पर खेले गए रंग गन्दगी के नहीं बल्कि इस विचार के प्रतीक हैं कि इन रंगों के धुलने के साथ-साथ व्यक्ति अपने राग-द्वेष भी धो दे। यही कारण है कि रंगों को धुलने के बाद लोग मस्ती में फगुआ गाते हैं और एक दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर भाइचारे का प्रदर्षन करते हैं। वर्तमान परिवेश में जरुरत है कि इस पवित्र त्यौहार पर आडम्बर की बजाय इसके पीछे छुपे हुए संस्कारों और जीवन मूल्यों को अहमियत दी जाए तभी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र सभी का कल्याण सम्भव होगा।
!! होली-पर्व पर शुभकामनायें !!

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

विविधता में एकता की प्रतीक : होली

होली को लेकर देश के विभिन्न अंचलों में तमाम मान्यतायें हैं और शायद यही विविधता में एकता की भारतीय संस्कृति का परिचायक भी है। उत्तर पूर्व भारत में होलिका दहन को भगवान कृष्ण द्वारा राक्षसी पूतना के वध दिवस से जोड़कर पूतना दहन के रूप में मनाया जाता है तो दक्षिण भारत में मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने कामदेव को तीसरा नेत्र खोल भस्म कर दिया था और उनकी राख को अपने शरीर पर मल कर नृत्य किया था। तत्पश्चात कामदेव की पत्नी रति के दुख से द्रवित होकर भगवान शिव ने कामदेव को पुनर्जीवित कर दिया, जिससे प्रसन्न हो देवताओं ने रंगों की वर्षा की। इसी कारण होली की पूर्व संध्या पर दक्षिण भारत में अग्नि प्रज्जवलित कर उसमें गन्ना, आम की बौर और चन्दन डाला जाता है। यहाँ गन्ना कामदेव के धनुष, आम की बौर कामदेव के बाण, प्रज्वलित अग्नि शिव द्वारा कामदेव का दहन एवं चन्दन की आहुति कामदेव को आग से हुई जलन हेतु शांत करने का प्रतीक है।

मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में अवस्थित धूंधड़का गाँव में होली तो बिना रंगों के खेली जाती है और होलिकादहन के दूसरे दिन ग्रामवासी अमल कंसूबा (अफीम का पानी) को प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं और सभी ग्रामीण मिलकर उन घरों में जाते हैं जहाँ बीते वर्ष में परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो चुकी होती है। उस परिवार को सांत्वना देने के साथ होली की खुशी में शामिल किया जाता है।

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

यूँ आरंभ हुआ होलिका-दहन व होली

होली भारतीय समाज का एक प्रमुख त्यौहार है, जिसका लोग बेसब्री के साथ इंतजार करते हैं। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में होली मनाई जाती है। रबी की फसल की कटाई के बाद वसन्त पर्व में मादकता के अनुभवों के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व उत्साह और उल्लास का परिचायक है। अबीर-गुलाल व रंगों के बीच भांग की मस्ती में फगुआ गाते इस दिन क्या बूढे व क्या बच्चे, सब एक ही रंग में रंगे नजर आते हैं।

नारद पुराण के अनुसार दैत्यराज हिरण्यकश्यप को यह घमंड था कि उससे श्रेष्ठ दुनिया में कोई नहीं, अत: लोगों को ईश्वर की पूजा करने की बजाय उसकी पूजा करनी चाहिए। पर उसका बेटा प्रहलाद जो कि विष्णु भक्त था, ने हिरण्यकश्यप की इच्छा के विरूद्ध ईश्वर की पूजा जारी रखी। हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को प्रताड़ित करने हेतु कभी उसे ऊंचे पहाड़ों से गिरवा दिया, कभी जंगली जानवरों से भरे वन में अकेला छोड़ दिया पर प्रहलाद की ईश्वरीय आस्था टस से मस न हुयी और हर बार वह ईश्वर की कृपा से सुरक्षति बच निकला। अंतत: हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका जिसके पास एक चमत्कारी चुनरी थी, जिसे ओढ़ने के बाद अग्नि में भस्म न होने का वरदान प्राप्त था, की गोद में प्रहलाद को चिता में बिठा दिया ताकि प्रहलाद भस्म हो जाय। पर होनी को कुछ और ही मंजूर था, ईश्वरीय वरदान के गलत प्रयोग के चलते चुनरी ने उड़कर प्रहलाद को ढक लिया और होलिका जल कर राख हो गयी और प्रहलाद एक बार फिर ईश्वरीय कृपा से सकुशल बच निकला। दुष्ट होलिका की मृत्यु से प्रसन्न नगरवासियों ने उसकी राख को उड़ा-उड़ा कर खुशी का इजहार किया। मान्यता है कि आधुनिक होलिका दहन और उसके बाद अबीर-गुलाल को उड़ाकर खेले जाने वाली होली इसी पौराणिक घटना का स्मृति प्रतीक है।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

लौट रही है ईस्ट इण्डिया कंपनी

ईस्ट इण्डिया कंपनी के नाम से भला कौन अपरिचित होगा। इसी कंपनी के माध्यम से अंग्रेजों ने भारत को गुलामी के बंधन में जकड़ा था. तब किसी ने नहीं सोचा था कि व्यापार के बहाने भारत आई ईस्ट इण्डिया कंपनी एक दिन ब्रिटिश सरकार की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने का भी जरिया बनेगी, पर अंतत: यही हुआ. व्यापार करने वाले कब भारत में अपनी सरकार बना बैठे, पता ही नहीं चला.

वक़्त बड़ा बलवान होता है, सो ईस्ट इण्डिया कंपनी को अब से पाँच साल पहले एक भारतीय उद्यमी संजीव मेहता ने खरीद लिया. स्वयं संजीव मेहता के लिए वाकई यह एक रोचक अनुभव रहा कि जिस कंपनी ने कभी हमारे ऊपर राज किया था उस पर राज करना एक तरह से इतिहास का वो पन्ना ही खरीद लेने जैसा था. फ़िलहाल संजीव मेहता इस कंपनी को अभयदान देने के मूड में हैं और शीघ्र ही 1.5 करोड़ पौंड के निवेश के साथ-साथ लन्दन में इसका पहला स्टोर खोलने जा रहे हैं. वाकई यह उस ब्रिटिश-हूकुमत की नाक तले ही होगा, जिसने इसी कंपनी की आड में कभी भारत पर राज किया था. सिर्फ लन्दन ही नहीं, इसी साल संजीव मेहता भारत में भी इस कंपनी के बैनर तले चीजें बेचने की सोच रहे हैं. बस आशा की जानी चाहिए की जिस ईस्ट इण्डिया कंपनी ने कभी व्यापार के बहाने हमारी अस्मिता को रौंदा था, ऐसा कुछ यह नए रूप वाली ईस्ट इण्डिया कंपनी नहीं करेगी !!

ब्लागिंग का सफरनामा : 100 पोस्ट का सफ़र

''शब्द-सृजन की ओर'' पर 100 पोस्ट का सफ़र पूरा हो चुका है और यह 101वीं पोस्ट है. आप सभी ने समय-समय पर अपनी टिप्पणियों व सुझावों से प्रोत्साहित किया और राह दिखाई. यह आप सभी का स्नेह ही है, जो मुझे प्रशासनिक व्यस्तताओं के बीच भी ब्लॉग पर लिखने को तत्पर करता है. आने वाली पोस्टों में भी आप सभी का स्नेह यूँ ही बना रहेगा, ऐसा विश्वास है...धन्यवाद !!

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

प्रेम (वेलेंटाइन दिवस पर विशेष)

प्रेम एक भावना है
समर्पण है, त्याग है
प्रेम एक संयोग है
तो वियोग भी है
किसने जाना प्रेम का मर्म
दूषित कर दिया लोगों ने
प्रेम की पवित्र भावना को
कभी उसे वासना से जोड़ा
तो कभी सिर्फ उसे पाने से
भूल गये वे कि प्यार सिर्फ
पाना ही नहीं खोना भी है
कृष्ण तो भगवान थे
पर वे भी न पा सके राधा को
फिर भी हम पूजते हैं उन्हें
पतंगा बार-बार जलता है
दीये के पास जाकर
फिर भी वो जाता है
क्योंकि प्यार
मर-मिटना भी सिखाता !!

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

खिड़कियाँ

खोल देता हूँ खिड़कियों को
बाहर धूप खिल रही है
चारों तरफ हरी मखमल-सी घास
उन पर मोती जैसी ओस की बूँदें
चिड़ियों का कलरव शुरू हो गया
शरीर पर एक शाल डाल
बाहर चला आता हूँ
कुछ दूर तक टहलता हूँ
कितने दिनों बाद
इस सुबह को जी रहा हूँ
कितने एकाकी हो गये हैं हम
बस अपने ही कामों में लगे रहते हैं
शायद इसी तरह किसी दिन
मन की खिड़कियों को भी खोल सकूँ
और फिर देख सकूँ
कि बाहर कितनी धूप है !!