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शनिवार, 23 अप्रैल 2016

विश्व-पुस्तक दिवस के बहाने चर्चा

आज विश्व-पुस्तक दिवस है. पुस्तकें पढने-लिखने का हमारा शौक विद्यार्थी जीवन से लेकर अभी तक बरकरार है. वैसे भी जितना पढ़िए, कम ही लगता है. न जाने कितना कुछ लिखा जा रहा है, इस दुनिया में. शब्द वहीं हैं, बस थोड़े से परिवर्तन से मायने बदल जाते हैं...विश्व पुस्तक-दिवस पर आप सभी को बधाइयाँ ..पुस्तकें पढने की अच्छी आदत बरकरार रखिये !!

इस दौरान हमने भी कुछेक पुस्तकें रचीं, और कुछेक पुस्तक और पत्रिकाएं हमारे व्यक्तित्व  कृतित्व पर भी .....उन पर भी एक नजर-



पुस्तक का नाम - अभिलाषा (काव्य-संग्रह) 
कवि - कृष्ण कुमार यादव 
प्रकाशक-शैवाल प्रकाशन,दाऊदपुर, गोरखपुर
प्रकाशन वर्ष -2005, पृष्ठ- 144, मूल्य- 160 रुपये
ISBN -81-89533-02-9 



पुस्तक का नाम - अभिव्यक्तियों के बहाने (निबंध-संग्रह) 
लेखक और निबन्धकार  - कृष्ण कुमार यादव 
प्रकाशक-शैवाल प्रकाशन,दाऊदपुर, गोरखपुर
प्रकाशन वर्ष -2006,  मूल्य- 150 रुपये



Name of Book- India Post : 150 Glorious Years
(Chronological documentation of Postal Services, specially in India)
Author : Krishna Kumar Yadav
Publisher : Nagrik Uttar Pradesh, Lucknow
First Edition-2006, Price- Rs. 250/-, Pages-146





पुस्तक का नाम - अनुभूतियाँ और विमर्श  (निबंध-संग्रह) 
लेखक और निबन्धकार  - कृष्ण कुमार यादव 
 प्रकाशक: नागरिक उत्तर प्रदेश, प्लाट नं0 2, नन्दगाँव रिजार्टस्, तिवारीगंज, फैजाबाद रोड, लखनऊ-226019 
प्रकाशन वर्ष : 2007,  मूल्य: 250/, पृष्ठ : 152 



पुस्तक का नाम :  क्रान्ति-यज्ञ (1857-1947 की गाथा)
सम्पादकद्वय :  कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव
प्रकाशक :  मानस संगम, प्रयाग नारायण शिवाला, कानपुर (उ.प्र.)
प्रकाशन वर्ष : 2007, पृष्ठ संख्या : 124, मूल्य : रू0 125



बाल पुस्तक का नाम : जंगल में क्रिकेट (बाल गीत संग्रह)
रचनाकार : कृष्ण कुमार यादव
प्रकाशक : उद्योग नगर प्रकाशन, 695, न्यू कोट गाँव, जी0टी0रोड, गाजियाबाद (उ0प्र0)
 प्रकाशन वर्ष: 2012, मूल्य: रु. 35/-, पृष्ठ: 36
ISBN- 978-93-80455-24-2



पुस्तक – 16 आने 16 लोग
लेखक – कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर -342001
प्रथम संस्करण :2014, पृष्ठ – 120 मूल्य – रू0 250/-
प्रकाशक – हिन्द युग्म, 1, जिया सराय, हौज खास, नई दिल्ली-110016




पुस्तक : बढ़ते चरण शिखर की ओर - कृष्ण कुमार यादव 
सम्पादकः दुर्गाचरण मिश्र, 
प्रकाशकः उमेश प्रकाशन, 100, लूकरगंज, इलाहाबाद
पृष्ठः 148,  मूल्यः रू0 150,  प्रथम संस्करणः 2009  

बढ़ते चरण शिखर की ओर: एक विहंगावलोकन

पत्रिका : बाल साहित्य समीक्षा 
विशेषांक   : प्रशासन और साहित्य के नाविक : कृष्ण कुमार यादव (सितंबर, 2007 अंक)
सम्पादक : डॉ. कृष्ण चन्द्र तिवारी "राष्ट्रबंधु''
पता : 109/309, रामकृष्ण नगर, कानपुर (उ.प्र)-208012 
वर्ष -30 , अंक -11,  सितंबर 2007, पृष्ठ -30, मूल्य -15 /-  



पत्रिका : गुफ्तगू (हिन्दुस्तानी साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका)
परिशिष्ट  : कृष्ण कुमार यादव (जनवरी-मार्च 2008 अंक)
सम्पादक : मो. इम्तियाज़ गाजी 
पता : 123 ए/1, हरवारा, धूमनगंज, इलाहाबाद-211011
वर्ष -5, अंक -17, पूर्णांक -21 , मार्च 2008, पृष्ठ -80, मूल्य -10/-  

नवीन सरोकारों को सहेजे गुफ्तगू का कृष्ण कुमार यादव पर जारी अंक 

रविवार, 20 अप्रैल 2014

Solah Aane Solah Log : A selective chronicle of Who’s Who in Indian literature



"Solah Aane Solah Log by Krishna Kumar Yadav is a selective chronicle of Who’s Who in Indian literature (Hindi & regional). Selective because it resorts to a limited list of 16 luminaries in Hindi Sahitya and thus conceiving upon the title – Solah Aane Solah Log (Solah Aana among Hindi dialect means complete, cent percent or unquestionable being). What sets apart this book from others in the category is that ..."

                               

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मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

अख़बारों में भी छाया '16 आने 16 लोग'


विश्व पुस्तक मेले में निदेशक Krishna Kumar Yadav की किताब का हुआ विमोचन।
(साभार : अमृत प्रभात, 24 फरवरी 2014)
 


'16 आने 16 लोग' का हुआ विमोचन।
(साभार : दैनिक जागरण, 24 फरवरी 2014)
 



समकालीन सरोकारों से जोड़ती है किताब : निश्चल 
16 आने 16 लोग' पुस्तक का विमोचन।
(साभार : डेली न्यूज एक्टिविस्ट, 24 फरवरी 2014)



'16 आने 16 लोग' का विमोचन।
(साभार : युनाइटेड भारत, 24 फरवरी 2014)

सराही गई किताब '16 आने 16 लोग'
(साभार : पायनियर, 24 फरवरी 2014)
 



विश्व पुस्तक मेले में लोकार्पित हुई Krishna Kumar Yadav की पुस्तक।
(साभार : स्वतंत्र चेतना , 24 फरवरी 2014)
 


सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली में लोकार्पित हुई कृष्ण कुमार यादव की पुस्तक ’16 आने 16 लोग’


इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं एवं लेखक व साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव की किताब ’’16 आने 16 लोग’’ का विमोचन नई दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेला में किया गया। किताब का विमोचन करते हुए वरिष्ठ आलोचक एवं कवि ओम निश्चल ने कहा कि साहित्य की संवेदना और प्रशासनिक दायित्व का जीवंत मिश्रण कृष्ण कुमार यादव की लेखनी में बखूबी मिलता है। इस किताब में साहित्य-कला और संस्कृति के क्षेत्र की 16 महान विभूतियों के पुनर्पाठ के बहाने श्री यादव ने उन्हें समकालीन सरोकारों के साथ व्याख्यायित किया है, जो इस किताब को महत्वपूर्ण बनाती है। 

महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय विश्विद्यालय, वर्धा से पधारे बहुवचन के संपादक अशोक मिश्र ने कहा कि इस संग्रह में शामिल सभी लेखक अपने समय के सशक्त स्तम्भ रहे हैं और समय-समय पर कृष्ण कुमार ने विभिन्न स्तम्भों में इन विभूतियों पर प्रकाशित अपने आलेखों को जिस तरह एक पुस्तक में गूँथा है, वह इस पुस्तक को शोधार्थियों के लिए भी महत्वपूर्ण बनाती है। 

वरिष्ठ लेखिका पुष्पिता अवस्थी ने इस बात को उद्धृत किया कि किताब में अमृता प्रीतम और कुर्रतुल ऐन हैदर जैसी लेखिकाओं केे बहाने महिला साहित्यकारों के अवदान को शामिल करके उन मुद्दों को भी उठाया गया है जो आज नारी विमर्श की पडताल करते हैं। 

नेशनल बुक ट्रस्ट में संपादक लालित्य ललित ने कहा कि पुनर्पाठ की परम्परा में पुस्तक में शामिल साहित्यकारों के साथ संवेदनात्मक सहजता व अनुभवीय आत्मीयता जोडते हुए कृष्ण कुमार ने उनका सटीक विश्लेषण किया है। 

इस अवसर पर कृष्ण कुमार यादव ने अपनी सृजनधर्मिता के आयामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने किताब के बारे मेें बताया कि इसमें रवीन्द्रनाथ टैगोर, नागार्जुन, निराला, प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन, गणेश शंकर विद्यार्थी, अज्ञेय, कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी, अहमद फराज, कैफी आजमी, अमृता प्रीतम और कुर्रतुल ऐन हैदर जैसी अमर शख्सियतों के अलावा वर्तमान समय में सक्रिय अब्दुल रहमान राही, कुंवर नारायण, गोपालदास नीरज के अवदानों की भी चर्चा की गयी है। 

इस अवसर पर चर्चित कवि मदन कश्यप, दूसरी परम्परा के संपादक सुशील सिद्धार्थ इत्यादि ने भी विचार व्यक्त किए।  कार्यक्रम का संयोजन हिन्द युग्म के शैलेश भारतवासी द्वारा किया गया।








बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली में 'हिंद युग्म' के स्टॉल पर कृष्ण कुमार यादव यादव की पुस्तक ’16 आने 16 लोग’


प्रगति मैदान, नई दिल्ली में चल  रहे विश्व पुस्तक मेला (15-23 फरवरी) में इलाहाबादियों की भी उपस्थिति दिखेगी। इस दौरान यहाँ से जुड़े लोगों की भी तमाम पुस्तकें जारी/लोकार्पित की जायेंगी। इनमें इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव की पुस्तक ''16 आने 16 लोग'' भी शामिल है। हिन्द युग्म प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में उन्होंने विभिन्न कालखंड के 16 चिंतकों, साहित्यकारों, लेखकों को समकालीन सरोकारों  से जोड़ते हुए उनकी रचनाधर्मिता के फलक को विस्तृत किया है। श्री कृष्ण कुमार यादव ने इस सम्बन्ध में बताया कि यह उनकी 7वीं पुस्तक/कृति होगी। इस पुस्तक में रवीन्द्रनाथ टैगोर, नागार्जुन, निराला, प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन, गणेश शंकर विद्यार्थी, अज्ञेय, कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी, अहमद फराज, कैफी आजमी जैसी अमर शख्सियतों के अलावा वर्तमान समय में सक्रिय अब्दुल रहमान राही, कुंवर नारायण, गोपालदास नीरज के अवदानों की भी चर्चा की गयी है। इसके अलावा इस पुस्तक में अमृता प्रीतम और कर्रतुल ऐन हैदर जैसी लेखिकाओं के व्यक्तित्व और कृतित्व के बहाने आज के स्त्री-विमर्श को जानने-समझने का भी गंभीर प्रयत्न है।

गौरतलब है कि सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लागिंग के क्षेत्र में भी चर्चित श्री यादव की अब तक कुल 6 पुस्तकें 'अभिलाषा' (काव्य-संग्रह, 2005) 'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श'  (निबंध-संग्रह, 2006 व 2007), 'India Post : 150 Glorious Years'(2006),'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' व जंगल में क्रिकेट (बाल-गीत संग्रह,2012) प्रकाशित हो चुकी हैं। विभिन्न सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा शताधिक सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त कृष्ण कुमार यादव के व्यक्तित्व-कृतित्व पर 'बाल साहित्य समीक्षा'(सं. डा. राष्ट्रबंधु, कानपुर, सितम्बर 2007) और 'गुफ्तगू' (सं. मो. इम्तियाज़ गाज़ी, इलाहाबाद, मार्च 2008 द्वारा विशेषांक जारी किया जा चुका है। उनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक 'बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव'  (सं0 डा0 दुर्गाचरण मिश्र, 2009, आलोक प्रकाशन, इलाहाबाद) भी प्रकाशित हो चुकी  है। श्री यादव देश-विदेश से प्रकाशित तमाम रिसर्च जनरल, पत्र पत्रिकाओं एवं इंटरनेट पर भी प्रमुखता से प्रकाशित होते रहते हैं।

विश्व पुस्तक मेले में लोकार्पित होगी कृष्ण कुमार यादव Krishna Kumar Yadav की पुस्तक। 
(साभार : पायनियर, 15 फरवरी 2014) 

दिल्ली के पुस्तक मेले में कृष्ण कुमार यादव Krishna Kumar Yadav की पुस्तक भी शामिल।
(साभार : पंजाब केसरी, 16 फरवरी 2014)
 


Krishna Kumar Yadav's '16 Aane 16 Log' to be released at World Book Fair, New Delhi. (Courtesy : Hindustan Times, 15 February 2014) 

विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली में 'हिंद युग्म' के स्टॉल पर हमारी  पुस्तक ’’16 आने 16 लोग’’ विक्रय और प्रदर्शन के लिए उपलब्ध है। एकबार अवश्य पधारें ।

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

'जंगल में क्रिकेट’ : बाल साहित्य सर्जना का स्तुत्य प्रयास

भारतीय डाक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी तथा बहुविधा लेखक कृष्ण कुमार यादव का अद्यतन प्रकाशित बालगीत संग्रह है ’जंगल में क्रिकेट।’ सुमुद्रण, आकर्षक आवरण, चित्रात्मकता से संबंलित एवं बालमनोविज्ञानाधारित काव्याभिव्यक्ति वाली यह कृति उद्योग नगर प्रकाशन, गाजियाबाद की प्रस्तुति है। इसकी तीस छान्दस रचनायें अल्पवयी पाठकों का जितना मनोरंजन करती हैं, उतना ही उन्हें विविध मानवीय मूल्यों से समृद्ध भी करती हैं।
 
इस बाल-कृति की चिडि़या रानी, रिमझिम-रिमझिम, गुलाब, तितली रानी, धूप, मोर, पेड़ घनेरे, चन्दामामा, सयानी बिल्ली, बन्दर गया दुकान व डाल्फिन प्रभृति रचनायें बच्चों में प्रकृति व पर्यावरण के प्रति रुचि जागृत करती हैं। ये बच्चों के लिए संसूचनात्मक भी हैं। उदाहरणार्थ ’गुलाब’ रचना के माध्यम से उन्हें पता चलता है कि काँंटों के बीच खिले होने के बावजूद कई रंग के इस फूल में नायाब खुशबू होने के कारण यह फूलों का राजा माना जाता है। काँटांे पर खिले होने के बावजूद भँवरे और तितलियाँ इसकी खूबसूरती के दीवाने होते हैं।
 
गुंजन करते इस पर भौंरे,
तितली भी इतराए।
कांटों के संग खिला गुलाब,
मंद-मंद मुस्काए। (गुलाब, पृ.सं. 17)
 
’तितली रानी’ रचना पाठकों को संदेश देती है कि किसी को भी अपने उत्तमता पर आत्ममुग्ध न होकर सबके साथ मिलजुलकर रहना चाहिए। देखिये कतिपय पंक्तियाँ-
 
जब हम आते पास तुम्हारे,
दूर भाग क्यों जाती हो ?
नन्हे-नन्हे पाँवों पर तुम,
इतना क्यूँ इतराती हो ?
आओ संग चलें बगिया में,
बनकर के हमजोली।
सभी दोस्तों के संग खेलें,
हम भी आँखमिचोली। (तितली रानी पृ.सं. 17)
 
इन पंक्तियों में सुकवि ने सब प्रकार के प्राणियों में पारस्परिक सौमनस्य तथा आत्मीयता व परिवारीयता की प्रवृत्ति को रेखांकित किया है।
 
’धूप’ के माध्यम से कविवर कृष्ण कुमारजी ने सीख दी है कि धूप सभी प्राणियों के लिए कष्टकारी तो होती है तो भी यह सर्वोपयोगी है, इसलिए उससे महसूस होने वाली तिक्ति तो छायादार पेड़ों के सहारे कम कर सकते हंै।
 
नन्हे-मुन्ने सब बच्चों को,
देखो बहुत सताती धूप।
पेड़ों की जब छाया मिलती,
तब गायब हो जाती धूप। (धूप, पृ.सं. 20)
 
यूँ सुकवि का संकेत है कि हमें वृक्षारोपण के प्रति उदासीन नहीं होना चाहिए। ’पेड़ घनेरे’ की रचना के माध्यम से सुकवि ने मानव जाति के प्रति पेड़ांे की उदारता को उल्लेख करते हुए सुझाव देते हैं कि हम सभी वृक्षों की रक्षा-सुरक्षा एवं उनके संवर्धन का संकल्प भी लें जिससे कि वह सतत् रूप से शस्य-श्यामला बनी रहें। देखिये संदर्भित रचना का समापनांश-
 
पेड़ कहीं न कटने पाएँ,
संकल्पों के हाथ उठाएँ।
भांति-भांति के पेड़ लगाकर,
मरूभूमि को सरस बनाएँ। (’पेड़ घनेरे’ पृ.सं. 25)
 
पृ. 29 की रचना ’जंगल में क्रिकेट’ जिसे कृति संज्ञा भी मिली है, के अंतर्गत जिराफ, भालू, चीता, शेर, घोड़े, हाथी और बंदरिया को ’ट्वेन्टी-ट्वेन्टी’ क्रिकेट के माध्यम से पारस्परित सौमनस्य के सूत्र में पिरोया गया है, सांकेतिक संदेश भी देती है यह कि शक्ति और आकार की दृष्टि से कोई बड़ा नहीं होता, बड़प्पन की कसौटी तो पशु हो या मानव, उनमें पारस्परिक सौमनस्य समता एवं सर्वस्वीकारता के भाव होते हैं, अतः हमें अनिवार्यतः संस्कारों से समृद्ध अपनी पंरपरागत जीवन शैली को आसृष्टिजीवी बनाये रखने के लिए संकल्पित बनना होगा।
 
जंगल में भी शुरू हुआ,
ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट मैच।
दर्शक बने सभी जानवर
देखें, कौन करेगा कैच ? (जंगल में क्रिकेट पृ.सं. 29)

तीस बाल गीतो से सुसज्जित इस कृति में अनेकों भाव है, बच्चों से सीधा संवाद है। आकर्षक आवरण पृष्ठ एवं हर रचना के अनुसार चित्रों का सुन्दर चित्रण इसे बाल मन के और करीब लाता है। मुझे विश्वास है कि यह कृति बच्चों और प्रौढ़ों के द्वारा समान रुचि से पढ़ी जायेगी।
 
 
कृति: जंगल में क्रिकेट

कवि: कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएं, इलाहाबाद परिक्षेत्र, इलाहाबाद (उ0प्र0)-211001

प्रकाशन वर्ष: 2012

मूल्य: रु. 35/-पृष्ठ: 36

प्रकाशक : उद्योग नगर प्रकाशन, 695, न्यू कोट गाँव, जी0टी0रोड, गाजियाबाद (उ0प्र0)
 
समीक्षक: डॉ. कौशलेन्द्र पाण्डेय, 130, मारुतीपुरम्, लखनऊ मो0: 09236227999


( साभार : रचनाकार)

शनिवार, 5 मई 2012

पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह ने किया कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रहों का विमोचन

युगल दंपत्ति एवं चर्चित साहित्यकार व ब्लागर कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रह 'जंगल में क्रिकेट' एवं 'चाँद पर पानी' का विमोचन पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह और डा. रत्नाकर पाण्डेय (पूर्व सांसद) ने राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास एवं भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद्, नई दिल्ली द्वारा गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में 27 अप्रैल, 2012 को किया. उद्योग नगर प्रकाशन, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित इन दोनों बाल-गीत संग्रहों में कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के 30 -30 बाल-गीत संगृहीत हैं.
इस अवसर पर दोनों संग्रहों का विमोचन करते हुए अपने उद्बोधन में पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह ने युगल दम्पति की हिंदी साहित्य के प्रति समर्पण की सराहना की. उन्होंने कहा कि बाल-साहित्य बच्चों में स्वस्थ संस्कार रोपता है, अत: इसे बढ़ावा दिए जाने क़ी जरुरत है. पूर्व सांसद डा. रत्नाकर पाण्डेय ने युवा पीढ़ी में साहित्य के प्रति बढती अरुचि पर चिंता जताते हुए कहा कि, यह प्रसन्नता का विषय है कि भारतीय डाक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी होते हुए भी श्री यादव अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं और यह बात उनकी कविताओं में भी झलकती है. युगल दम्पति के बाल-गीत संग्रह क़ी प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें आज का बचपन है और बीते कल का भी और यही बात इन संग्रह को महत्वपूर्ण बनाती है.
कार्यक्रम में राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास के संयोजक डा. उमाशंकर मिश्र ने कहा कि यदि युगल दंपत्ति आज यहाँ उपस्थित रहते तो कार्यक्रम कि रौनक और भी बढ़ जाती. गौरतलब है कि अपनी पूर्व व्यस्तताओं के चलते यादव दंपत्ति इस कार्यक्रम में शरीक न हो सके. आभार ज्ञापन उद्योग नगर प्रकाशन के विकास मिश्र द्वारा किया गया. इस कार्यक्रम में तमाम साहित्यकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार इत्यादि उपस्थित थे.

- रत्नेश कुमार मौर्या, संयोजक- 'शब्द-साहित्य', इलाहाबाद.


शनिवार, 27 जून 2009

अनूभूतियाँ और विमर्श: विविध सरोकारों के रंगचित्र

हिन्दी साहित्य के विद्वानों ने निबन्ध विधा को गद्य का सर्वोकृष्ट स्वरूप माना है। आचार्य पं0 रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में-’’यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है तो निबन्ध गद्य की कसौटी है।’’ वस्तुतः निबन्ध गद्य का अत्यन्त सशक्त रूपविधान है। डाॅ0 जे0 डब्ल्यू0 मेरियट और फ्रांसीसी समालोचक सान्तवे यह स्वीकार करते हैं कि- ’’निबन्ध-रचना एक कठिन कार्य है और ऐसी अवस्था में किसी भी विषय पर निबन्ध लिखने के लिए उस विषय का पूर्ण पण्डित होना चाहिए।’’ इससे स्पष्ट है कि सफल और श्रेष्ठ निबन्ध लिखना अतन्य दुष्कर कार्य है। हर्ष की बात है कि भारतेन्दु युग से अब तक अनेक साहित्यकारों ने इस दिशा में सराहनीय कार्य किया है। भारतीय डाक सेवा के अधिकारी एवं कवि व चिन्तक कृष्ण कुमार यादव का प्रस्तुत निबन्ध संग्रह अनूभूतियाँं और विमर्श’ इस दिशा में किया गया, एक अच्छा प्रयास माना जाएगा, जिसमें लेखक की जिज्ञासु प्रवृत्ति, समसामयिक संदर्भों को समझने की चेष्टा, ऐतिहासिक संदर्भों के यथोचित प्रयोग, अपनी सभ्यता एवं संस्कृति के प्रति अनुराग एवं तथ्यों को सही ढंग से प्रयुक्त कर उनका विश्लेषणात्मक विवेचन करने की रुचि के दर्शन होते हैं। प्रशासनिक सेवा में रहकर चिन्तन मनन करना एवं साहित्यिक लेखन करना अपने आप में एक विशिष्ट उपलब्धि है। राजकीय सेवा के दायित्वों का निर्वहन और श्रेष्ठ कृतियों की सर्जना का यह मणि-कंाचन योग विरल है। कृष्ण कुमार यादव के निबन्धों में उनका बहुआयामी चिन्तन मुखर हुआ है।

संग्रह के निबन्धों को स्वयं लेखक ने तीन खण्डों में विभक्त करते हुए लिखा है कि प्रस्तुत निबन्ध-संग्रह के लेखों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है- व्यक्तित्व विशेष पर आधारित लेख, संस्कृति के प्रतिमानों पर आधारित लेख एवम् समसामयिक मुद्दों पर आधारित लेख। प्रेमचन्द, राहुल सांकृत्यायन, मनोहर श्याम जोशी, अमृता प्रीतम और डा0 अम्बेडकर पर लिखे लेख जहाँ इनके व्यक्तिगत जीवन पर प्रकाश डालते हुए भारतीय समाज को इनके अवदानों से अवगत कराते हैं, वहीं नारी शक्ति का उत्कर्ष, इतिहास के आयाम, भारतीय परिप्रेक्ष्य में धर्मनिरपेक्षता, भारतीय संस्कृति और त्यौहारों के रंग, भूमण्डलीकरण के दौर में हिन्दी जैसे लेख भारतीय संस्कृति के विभिन्न प्रतिमानों को ग्राह्य करते नजर आते हैं। अन्य लेखों को समसामयिक संदर्भों में रखा जा सकता है। मेरी दृष्टि में संग्रह के प्रथम खण्ड के लेख श्रद्धा भाव, द्वितीय खण्ड के लेख समीक्षक भाव तथा व तृतीय खण्ड के लेख प्रशिक्षक-भावना से प्रेरित होकर लिखे गये हैं। इसलिए ये निबन्ध जहाँ एक ओर लेखक की अध्ययनशीलता और उसकी विश्लेषाणात्मक दृष्टि को रेखांकित करते हैं वहीं दूसरी ओर उसके समीक्षक स्वरूप की भी झांकी प्रस्तुत करते हैं।
’प्रेमचन्द के सामाजिक व साहित्यक विमर्श’ निबन्ध में लेखक की यह दृष्टि कि यह एक रोचक तथ्य है कि प्रेमचन्द जिस दौर के थे वह दौर खुलकर स्वतंत्रता-आन्दोलन में भाग लेने का था पर उनकी कलम समाज की आन्तरिक विसंगतियों और बुराईयों पर ही ज्यादा चली जिसे कि आधुनिक साहित्य में दलित विमर्श, नारी-विमर्श इत्यादि के रूप में देखा जा सकता है, सर्वथा उचित कही जाएगी। हिन्दू और मुसलमान की एकता विषयक प्रेमचन्द के विचारों को आज भी परखा जा सकता है। उन्होंने लिखा है-’हिन्दू और मुसलमान न कभी दूध और चीनी थे, न होंगे और न ही होने चाहिए। दोनों की पृथक-पृथक सूरतें बनी रहनी चाहिए और बनी रहेंगी।’ लेखक की यह अवधारणा कि प्रेमचन्द के लेखों में दक्षिण पंथी-मध्यमार्गी-वामपंथी सभी धारायें फूटकर सामने आती हैं, एक कटु सत्य है। लेख प्रभावपूर्ण है।
यायावरी वृत्ति के सबल सम्पोषक राहुल सांकृत्यायन की बहुमूल्य कृति ’भागो नहीं दुनिया को बदलो’ की तर्ज पर ही लेखक ने अपने द्वितीय निबन्ध का शीर्षक रखा है। उनके रचना-संसार का उल्लेख करते हुए लेखक ने स्पष्ट किया है कि ’छत्तीस भाषाओं के ज्ञाता राहुल जी ने लगभग सभी प्रमुख विधाओं में साहित्य सृजन किया है, जिसमें अधिकांश हिन्दी भाषा में लिखा गया है।’ राहुल जी के समग्र जीवन का मूल्यांकन करते हुए निबन्धकार ने बहुत सही टिप्पणी करते हुए लिखा है-’वे एक ऐसे घुमक्कड़ थे जो सच्चे ज्ञान की तलाश में था और जब भी सच को दबाने की कोशिश की गई तो वह बागी हो गया।’ उनका सम्पूर्ण जीवन अन्तर्विरोधों से भरा पड़ा है। लेख में अनेक अनकहे तथ्यों को उद्घाटित करने का अच्छा प्रयास किया गया है।

’खो गया किस्सागोई’ निबन्ध में लेखक ने मनोहर श्याम जोशी के सम्बन्ध में लिखा है-’जोशी जी ने अमृतलाल नागर से भाषा और किस्सागोई सीखी है। इसी प्रकार भगवतीचरण वर्मा से तुर्शी तो यशपाल से नजरिया सीखा है। उनके लेखन की विशिष्टताओं को सूक्ष्म रूप में दो शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है-’साधारण चरित्रों का अद्भुतिकरण और अद्भुत चरित्रों का सामान्य विश्लेषण उनकी विशेषता रही है। लेखक ने अमृता प्रीतम के आत्मकथ्यात्मक उपन्यास ’रसीदी टिकट’ से प्रभावित हो कर उसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भावविभोर होकर ‘गुम हो गया रसीदी टिकट’ लेख में किया है। देश के बँटवारे के दर्द को अमृता जी के शब्दों में इस प्रकार व्यक्त किया गया है- ’’पुराने इतिहास के भीषण अत्याचारी काण्ड हम लोगों ने भले ही पढ़े हुए थे, पर फिर भी हमारे देश के बँटवारे के समय जो कुछ हुआ, किसी की कल्पना में भी उस जैसा खूनी काण्ड नहीं आ सकता। मैंने लाशें देखी थीं, लाशों जैसे लोग देखे थे।’’ अमृताजी के जीवन की व्याख्या करते हुए लेखक ने एक वाक्य में उनका वास्तविक चित्र उभारने का सराहनीय प्रयास किया है। लेखक के शब्दों में-’एक ही साथ मानवतावादी, अस्तित्ववादी, स्त्रीवादी और आधुनिकतावादी थीं।’ ‘दलितों के मसीहा: डा0 अम्बेडकर’ इस खण्ड का अन्तिम लेख है। इसमें लेखक ने यह दर्शाने का प्रयास किया है कि लगभग सौ वर्ष पूर्व समाज में अस्पृश्यता आदि की जो पीड़ दलितों को झेलनी पड़ती थी वह बालक अम्बेडकर को भी झेलनी पड़ी थी। कालान्तर में डा0 अम्बेडकर एक योग्य पुरुष बने और अपनी योग्यता के बल पर संविधान निर्माण में अपनी अहम् भूमिका का निर्वहन किया। लेख अम्बेडकर जी के जीवन पर अच्छा प्रकाश डालता है। डा0 अम्बेडकर के अन्तर्विरोधों पर चर्चा के साथ-साथ वर्तमान राजनैतिक-सामाजिक परिवेश में जिस प्रकार उन्हें भुनाया जा रहा है, उस पर भी चर्चा करके इस लेख को और भी आयाम दिये जा सकते थे।

निबन्ध-संग्रह के द्वितीय खण्ड के ’नारी शक्ति के उत्कर्ष’ लेख में लेखक ने जहाँ एक ओर नारी की महिमा-गरिमा प्रतिपादित की है वहीं दूसरी ओर नारी की कमियों की ओर भी संकेत किया है। महाकवि तुलसीदास की एक अद्र्धाली का उल्लेख करते हुए लेखक ने ‘ताड़ना’ शब्द की जो व्याख्या की है वह उचित नहीं प्रतीत होती। ताड़ना शब्द का वास्तविक अर्थ ग्रहण करते हुए इसकी व्याख्या उचित होगी। फिर संत कवि तुलसीदास ही क्यों, महाकवि संत प्रवर कबीरदास तथा सूरदास ने नारी के सम्बन्ध में बहुत सी कटु उक्तियों का प्रयोग किया है क्योंकि नारी को साधना पथ पर बाधक माना गया है। इतिहास के आयाम लेख में लेखक ने इतिहासकारों की भूलों तथा इतिहास को देखने की उनकी दृष्टि की विस्तार से चर्चा की है। इतिहास की कमियों को उदाहरणों द्वारा अच्छे ढंग से दर्शाया गया है।

‘भारतीय परिप्रेक्ष्य में धर्मनिरपेक्षता’ विषयक लेख में पाश्चात्य और भारतीय विद्वानों द्वारा की गयी व्याख्याओं का अंकन करते हुए लेखक ने दोनों का अन्तर सुस्पष्ट करते हुए ठीक ही लिखा है कि जहाँ पाश्चात्य धर्मनिरपेक्षता धर्म और आध्यात्मिक परम्परा की अवहेलना करती है, वहीं भारतीय समाज प्राचीन आध्यात्मिक परम्परा को स्वीकार करते हुए सभी धर्मों के प्रति सहनशील होना तथा उन सबका समान रूप से आदर करना ही धर्मनिरपेक्षता मानता है। लेख पाठक के लिए चिंतन के कई बिन्दु छोड़ जाता है। यही लेखक की उपलब्धि है।

भारतीय संस्कृति त्यौहारों एवं उत्सवों की संस्कृति है। उल्लास, उमंग, आशा, हर्ष इस संस्कृति का मूलाधार है। भारतीय संस्कृति की विशिष्टता यह है कि इसमें शोक का कोई त्यौहार नहीं होता है। लेखक ने दार्शनिक लाओत्से के शब्दों को दोहराते हुए लिखा है- ‘’इसकी फिक्र मत करो कि रीति-रिवाज का क्या अर्थ है? रीति-रिवाज मजा देता है बस काफी है। जिन्दगी को सरल और नैसर्गिक रहने दो, उस पर बड़ी व्याख्याएँ मत थोपो।’’ सम्पूर्ण लेख में मिथक, धार्मिक मान्यताओं, परम्पराओं और ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़े अनेक त्यौहारों, उत्सवों की विस्तार से सार्थक चर्चा की गयी है तथापि पोंगल आदि दक्षिणांचल और उत्तरांचल के त्यौहारों को जोड़कर इसे और भी रोचक बनाया जा सकता था। द्वितीय खण्ड का अन्तिम लेख है-’भूमण्डलीकरण के दौर में हिन्दी’ लेखक का यह विचार समीचीन प्रतीत होता है कि भूमण्डलीकरण, उदारीकरण, उन्नत प्रौद्योगिकी एवं सूचना-तकनीेक के बढ़ते इस युग में सबसे बड़ा खतरा भाषा, साहित्य और संस्कृति के लिए पैदा हुआ है। आज अंग्रेजी हिन्दी की प्रतिद्वन्दी बन गई है। लेखक का इस बिन्दु पर क्षुब्ध होना उचित है कि राजभाषा का दर्जा प्राप्त होने पर भी हिन्दी आज राजभाषा नहीं बन सकी। वस्तुतः विदेश में हिन्दी अपने बलबूते पर बढ़ रही है, किन्तु अपने देश में वह उपेक्षा का शिकार हो रही है। यह स्थिति चिन्ताजनक है।

निबन्ध-संग्रह के तृतीय खण्ड में लेखक ने जिन समसामयिक सरोकारों से जुड़े निबन्धों को संजोया है, वे हैं- युवा भटकाव की स्थिति क्यों, भूमण्डलीकरण के दौर में तेजी से बढ़ते भारतीय कदम, ब्राण्ड इमेज की महत्ता, इण्टरनेट का बढ़ता प्रभाव तथा कोचिंग संस्थाओं का फैलता मायाजाल। ये सभी निबन्ध समसामयिक सन्दर्भों से जुड़े होने के कारण प्रतियोगी परीक्षाओं और विशेषकर सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होंगे। सभी लेख पाठकों का ज्ञानवर्द्धन करते हैं।
कृति में संकलित निबन्ध जहाँ एक ओर लेेखक की अध्ययनशीलता, अनुभूति की गहराई, सूक्ष्म निरीक्षण की शक्ति का परिचय कराते हैं, वहीं दूसरी ओर उसकी वर्णन-शैली की प्रभावोत्पादकता को भी परिलक्षित करते हैं। अभिव्यक्ति को प्रभावपूर्ण बनाने में लेखक का अंग्रेजी-मोह भी मुखर हो उठता है। भावों को गुम्फित करते समय निबन्धकार के व्यक्तित्व का गाम्भीर्य कहीं-कहीं साथ छोड़ देता है। अधिकांश निबन्ध व्यास शैली में लिखे गये हैं। फलतः कोई-कोई निबन्ध अधिक विस्तार पा गया है। मेरी दृष्टि में मूल विषय की गरिमा बनाये रखना इन निबन्धों की विशिष्टता है, जो लेखक के उज्जवल भविष्य की ओर संकेत करती है।

पुस्तक : अनुभूतियाँ और विमर्श (निबन्ध संग्रह)/ लेखकः कृष्ण कुमार यादव/ मूल्य: 250/- /प्रकाशन वर्ष : 2007 / प्रकाशक: नागरिक उत्तर प्रदेश, प्लाट नं0 2, नन्दगाँव रिजार्टस्, तिवारीगंज, फैजाबाद रोड, लखनऊ-226019 / समीक्षक: उमाशंकर शुक्ल ’उमेश’, साहित्य सदन, फूलपुर, इलाहाबाद
(इस संग्रह की एक समीक्षा "रचनाकार" पर भी देखें)

शुक्रवार, 26 जून 2009

व्यक्ति, समाज, साहित्य और राजनीति के अन्तर्सम्बंधों की पड़ताल करता निबंध संग्रह

‘‘अभिव्यक्तियों के बहाने‘‘ कृष्ण कुमार यादव का प्रथम निबंध संग्रह है। भारतीय डाक सेवा के अधिकारी रूप में पदस्थ श्री यादव अपनी व्यस्तताओं के बीच भी सामाजिक-साहित्यिक सरोकारों से कटे नहीं हैं बल्कि उन्हें आत्मसात् करते हुए पन्नों पर उभारने में भी माहिर हैं। सुकरात ने ऐसे लोगों के लिए ही लिखा था कि-‘‘सर्वगुणसम्पन्न और सच्चे अर्थों में शिक्षित वही लोग माने जायेंगे जो सफलता मिलने पर बिगड़ते नहीं, जो अपनी असलियत से मुँह नहीं मोड़ते; साथ ही बुद्धिमान और धीर-गम्भीर व्यक्ति की तरह दृढ़ता से जमीन पर पैर जमाये रखते हैं।‘‘ साहित्य में उसी दृष्टि को संपन्न माना जाता है, जो अपने समय की सभी प्रवृत्तियों को अपने साहित्य में स्थान दे और उनके साथ समुचित न्याय करे। कृष्ण कुमार चूँकि अभी युवा हैं, अतः उनकी सोच में नवीनता एवं ताजगी है।

समालोच्य निबंध संग्रह में कुल 10 लेख/निबंध प्रस्तुत किये गये हैं। भारतीय जीवन, समाज, साहित्य और राजनीति के अंतर्सूयों से आबद्ध इन लेखों में तेजी से बदलते समय और समाज की धड़कन को महसूस किया जा सकता है। संग्रह का प्रथम लेख ‘‘बदलते दौर में साहित्य की भूमिका‘‘ समकालीन परिवेश में साहित्य और इसमें आए बदलाव को बखूबी रेखांकित करता है। नारी-विमर्श, दलित-विमर्श, बाल-विमर्श जैसे तमाम तत्वों को सहेजते इस लेख की पंक्तियाँ गौरतलब हैं- ‘‘रचनाकार को संवेदना के उच्च स्तर को जीवंत रखते हुए समकालीन समाज के विभिन्न अंतर्विरोधों को अपने आप से जोड़कर देखना चाहिए एवं अपने सत्य व समाज के सत्य को मानवीय संवेदना की गहराई से भी जोड़ने का प्रयास करना चाहिये।’’ इसी प्रकार ‘‘बाल-साहित्य: दशा और दिशा‘‘ में लेखक ने बच्चों की मनोवैज्ञानिक समस्याओं और उनकी मनोभावनाओं को भी बाल साहित्य में उभारने पर जोर दिया है।
आज लोकतंत्र मात्र एक शासन-प्रणाली नहीं वरन् वैचारिक स्वतंत्रता का पर्याय बन गया है। कृष्ण कुमार यादव की नजर इस पर भी गई है। ‘‘लोकतंत्र के आयाम‘‘ लेख में भारतीय लोकतंत्र के गतिशील यथार्थ की सच्ची तस्वीर देखी जा सकती है। किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित हुए बिना भारतीय समाज के पूरे ताने-बाने को समझने की वैज्ञानिक दृष्टि इस लेख को महत्वपूर्ण बना देती है। सत्य-असत्य, सभ्यता के आरम्भ से ही धर्म एवं दर्शन के केद्र-बिंदु बने हुये हैं। महात्मा गाँधी, जिन्हें सत्य का सबसे बड़ा व्यवहारवादी उपासक माना जाता है ने सत्य को ईश्वर का पर्यायवाची कहा। भारत सरकार के राजकीय चिन्ह अशोक-चक्र के नीचे लिखा ‘सत्यमेव जयते’ शासन एवं प्रशासन की शुचिता का प्रतीक है। यह हर भारतीय को अहसास दिलाता है कि सत्य हमारे लिये एक तथ्य नहीं वरन् हमारी संस्कृति का सार है। इस भावना को सहेजता लेख ‘‘सत्यमेव जयते‘‘ बड़ा प्रभावी लेख है। एक अन्य लेख में लेखक ने प्रयाग के महात्मय का वर्णन करते हुए इलाहाबाद के राजनैतिक-सामाजिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक योगदान को रेखांकित किया है। इसमें इतिहास और स्मृति एक दूसरे के साथ-साथ चलते हुए नजर आते हैं।
सृष्टि का चक्र चलाने वाली, एक उन्नत समाज बनाने वाली, शक्ति, ममता, साहस, सौर्य, ज्ञान, दया का पुंज है नारी। एक तरफ वह यशोदा है, तो दूसरी तरफ चण्डी भी। आज महिलायें समुद्र की गहराई और आसमान की ऊँचाई नाप रही हैं। ‘‘रूढ़ियों की जकड़बन्द तोड़ती नारियाँ‘‘ ऐसी नारियों का जिक्र करती है जो फेमिनिस्ट के रूप में किन्हीं नारी आन्दोलनों से नहीं जुड़ी हैं। कर्मकाण्डों में पुरूषों को पीछे छोड़कर पुरोहिती करने वाली, माता-पिता के अंतिम संस्कार से लेकर तर्पण और पितरों के श्राद्ध तक करने वाले ऐसे तमाम कार्य जिसे महिलाओं के लिए सर्वथा निषिद्ध माना जाता रहा है, आज महिलायें खुद कर रही हैं। आजादी के दौर में भी कुछ महापुरूषों ने इन रूढ़िगत मान्यताओं के विरूद्ध आवाज उठाई थी पर अब महिलायें सिर्फ आवाज ही नहीं उठा रही हैं वरन् इन रूढ़िगत मान्यताओं को पीछे ढकेलकर नये मानदण्ड भी स्थापित कर रही हैं। इसी क्रम में ‘‘लिंग समता: एक विश्लेषण‘‘ नामक लेख पुरूष व महिलाओं के बीच जैविक विभेद को स्वीकार करते हुए सामंजस्य स्थापित करने और तद्नुसार सभ्यता के विकास हेतु कार्य करने की बात करता है।
कोई भी लेखक या साहित्यकार अपने समय की घटनाओं और उथल-पुथल के माहौल से प्रेरित होकर साहित्य की रचना करता है। कृष्ण कुमार भारतीय संस्कृति, उसके जीवन मूल्यों और माटी की गंध को रोम-रोम में महसूस करते हैं। आज हमारी लोक-संस्कृति व विरासत पर चैतरफा दबाव है और बाजारवाद के कारण वह संकट में है। ऐसे में लेखक भारतीय संस्कृति और उसकी विरासत का पहरूआ बनकर सामने आता है। अपने लेख ‘‘शाश्वत है भारतीय संस्कृति और इसकी विरासत‘‘ में कृष्ण कुमार जब लिखते हैं- ‘‘वस्तुतः हम भारतीय अपनी परम्परा, संस्कृति, ज्ञान और यहाँ तक कि महान विभूतियों को तब तक खास तवज्जो नहीं देते जब तक विदेशों में उसे न स्वीकार किया जाये। यही कारण है कि आज यूरोपीय राष्ट्रों और अमेरिका में योग, आयुर्वेद, शाकाहार, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, होम्योपैथी और सिद्धा जैसे उपचार लोकप्रियता पा रहे हैं जबकि हम उन्हें बिसरा चुके हैं‘‘, तो उनसे असहमति जताना बड़ा कठिन हो जाता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम‘ का पाठ पढ़ाने वाली भारतीय संस्कृति सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव की हिमायती रही हैं। आज जातिवाद, सम्प्रदायवाद की आड़ में जब इस पर हमले हो रहे हैं तो युवा लेखक की लेखनी इससे अछूती नहीं रहती। बचपन से ही एक दूसरे के धर्मग्रंथों और धर्मस्थानों के प्रति आदर का भाव पैदा करके अगली पीढ़ियों को इस विसंगति से दूर रखने की सलाह देने वाले लेख ‘‘साम्प्रदायिकता बनाम सामाजिक सद्भाव‘‘ में समाहित उदाहरण इसे समसामयिक बनाते हैं।
आज की नई पीढ़ी महात्मा गाँधी को एक सन्त के रूप में नहीं बल्कि व्यवहारिक आदर्शवादी के रूप में प्रस्तुत कर रही है। महात्मा गाँधी पर प्रस्तुत लेख ‘‘समग्र विश्वधारा में व्याप्त हैं महात्मा गाँधी‘‘ उनके जीवन-प्रसंगों पर रोचक रूप में प्रकाश डालते हुए समकालीन परिवेश में उनके विचारों की प्रासंगिकता को पुनः सिद्ध करता है। वस्तुतः गाँधी जी दुनिया के एकमात्र लोकप्रिय व्यक्ति थे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वयं को लेकर अभिनव प्रयोग किए और आज भी सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, आर्थिक मुद्दों पर उनकी नैतिक सोच व धर्म-सम्प्रदाय पर उनके विचार प्रासंगिक हंै।
साहित्य रचना केवल एक कला ही नहीं है बल्कि उसके सामाजिक दायित्व का दायरा भी काफी बड़ा होता है। यही कारण है कि साहित्य हमारे जाने-पहचाने संसार के समानांतर एक दूसरे संसार की रचना करता है और हमारे समय में हस्तक्षेप भी करता है। ऐसे में व्यक्ति, समाज, साहित्य और राजनीति के अन्तर्सम्बधों की संश्लिष्टता को पहचान कर उसे मौजूदा दौर के परिपे्रक्ष्य में जाँचना-परखना कोई मामूली चुनौती नहीं। कृष्ण कुमार यादव मूकदृष्टा बनकर चीजों को देखने की बजाय भाषा की स्वाभाविक सहजता के साथ इन चुनौतियों का सामना करते हैं, जिसका प्रतिरूप उनका यह प्रथम निबंध-संग्रह है। कृष्ण कुमार यादव की यह पुस्तक पढ़कर जीवंतता एवं ताजगी का अहसास होता है।

पुस्तक: अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह)/ लेखकः कृष्ण कुमार यादव/ मूल्य: 150/- प्रकाशक: शैवाल प्रकाशन, दाऊदपुर, गोरखपुर / प्रकाशन वर्ष : 2006 / समीक्षक: गोवर्धन यादव, 103- कावेरी नगर, छिंदवाड़ा (म0प्र0)-४८०००१

(साभार : सृजनगाथा, नवम्बर 2008)