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शुक्रवार, 6 अगस्त 2021

प्रेमचंद की रचनाएं आज भी भारतीय समाज का आईना हैं - पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव

हिन्दी साहित्य के इतिहास में उपन्यास सम्राट के रूप में प्रसिद्ध मुंशी प्रेमचंद के पिता अजायब राय श्रीवास्तव लमही, वाराणसी में डाकमुंशी (क्लर्क) के रूप में कार्य करते थे। ऐसे में प्रेमचंद का डाक-परिवार से अटूट सम्बन्ध था। मुंशी प्रेमचंद को पढ़ते हुए पीढ़ियाँ बड़ी हो गईं। उनकी रचनाओं से बड़ी आत्मीयता महसूस होती है। ऐसा लगता है मानो इन रचनाओं के  पात्र हमारे आस-पास ही मौजूद हैं। प्रेमचंद जयंती (31 जुलाई) की पूर्व संध्या पर उक्त उद्गार चर्चित ब्लॉगर व साहित्यकार एवं वाराणसी  परिक्षेत्र  के पोस्टमास्टर जनरल  श्री कृष्ण कुमार यादव ने व्यक्त किये। 




पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि लमही, वाराणसी में जन्मे डाककर्मी के पुत्र मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य की नई इबारत  लिखी। आज भी तमाम साहित्यकार व शोधार्थी लमही में उनकी जन्मस्थली की यात्रा कर प्रेरणा पाते हैं। हिंदी कहानी तथा उपन्यास के क्षेत्र में 1918 से 1936  तक के कालखंड को 'प्रेमचंद युग' कहा जाता है। प्रेमचंद साहित्य की वैचारिक यात्रा आदर्श से यथार्थ की ओर उन्मुख है। वे सही अर्थों में एक प्रगतिशील लेखक थे। रहस्य-रोमांच की दुनिया से कथा-संसार को यथार्थवाद की ओर मोड़ने और स्थापित करने का श्रेय मुंशी प्रेमचंद को ही जाता है। मुंशी प्रेमचंद स्वाधीनता संग्राम के भी सबसे बड़े कथाकार हैं। गोदान, कर्मभूमि, निर्मला, शंखनाद, सेवा सदन, रंगभूमि व वरदान जैसे कई प्रसिद्ध उपन्यासों के रचयिता प्रेमचंद की कृतियों में वास्तव में पूर्ण हिन्दी और विस्तृत हिन्दुस्तान बसता है। आंचलिक पात्रों की व्यथा से लेकर अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवाद तक तथा मनुष्यता व संवेदना तक सभी विषयों पर निर्बाध कलम चलाने वाले प्रेमचंद जी की रचनाएं आज भी भारतीय समाज का आईना हैं। श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि, प्रेमचंद की स्मृति में भारतीय डाक विभाग की ओर से 30  जुलाई 1980 को उनकी जन्मशती के अवसर पर 30 पैसे मूल्य का एक डाक टिकट भी जारी किया जा चुका है।

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि, प्रेमचन्द के साहित्यिक और सामाजिक विमर्श आज भूमंडलीकरण के दौर में भी उतने ही प्रासंगिक हैं और उनकी रचनाओं के पात्र आज भी समाज में कहीं न कहीं जिन्दा हैं। उन्होंने साहित्य के सौंदर्य बोध को बदला और गांव, गरीब, किसान, मज़दूर, शोषित, दलित और स्त्रियों की मनोदशा को केंद्र में रखकर,अपनी रचनाओं के जरिए जनमानस में सामाजिक समस्याओं व कुरीतियों के प्रति चिंतन पैदा किया। हिंदी-उर्दू के महान कथाकार, उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य को सच्चाई के धरातल पर उतारा। प्रेमचन्द जब अपनी रचनाओं में समाज के उपेक्षित व शोषित वर्ग को प्रतिनिधित्व देते हैं तो निश्चिततः इस माध्यम से वे एक युद्ध लड़ते हैं और गहरी नींद सोये इस वर्ग को जगाने का उपक्रम करते हैं। श्री यादव ने कहा कि भारतीय समाज के जीवन और जीवन से जुड़े जीवन संघर्ष की कथा और व्यथा को अपनी लेखनी की अनवरत साधना से प्रवाहित होने वाली धारा के द्वारा उपन्यास और कहानियों के माध्यम से बयाँ करने वाले कलम के सिपाही प्रेमचन्द ने अपने को किसी वाद से जोड़ने की बजाय तत्कालीन समाज में व्याप्त ज्वलंत मुद्दों से जोड़ा। उनका साहित्य शाश्वत है और यथार्थ के करीब रहकर वह समय से होड़ लेती नजर आती हैं।














आज भी प्रासंगिक हैं प्रेमचन्द के साहित्यिक व सामाजिक विमर्श - पोस्टमास्टर जनरल  कृष्ण कुमार यादव 

डाककर्मी के पुत्र मुंशी प्रेमचंद ने दी  हिंदी साहित्य को नई ऊँचाइयाँ  : पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव


सोमवार, 25 जनवरी 2021

पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव ने बिरहा सम्राट पद्मश्री हीरालाल यादव के तैल चित्र व 'नागरी' पत्रिका का किया लोकार्पण

भारतीय संस्कृति में लोकचेतना का बहुत महत्त्व है और लोकगायक इसे सुरों में बाँधकर समाज के विविध पक्षों को सामने लाते हैं। लोकगीतों में बिरहा की अपनी एक समृद्ध परम्परा रही है, जिसे हीरालाल यादव ने नई उँचाइयाँ प्रदान कीं। हीरालाल की गायकी राष्ट्रीयता से ओतप्रोत होने के साथ-साथ सामाजिक बुराइयों से लड़ने की अपील भी करती थी। डिजिटल होते दौर में उनके बिरहा गायन को संरक्षित करके आने वाली पीढ़ियों हेतु भी जीवंत रखना जरुरी है। किसान फाउण्डेशन, उत्तर प्रदेश व नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में 24 जनवरी, 2021 को लोकगीत बिरहा के संवाहक पद्मश्री हीरालाल यादव की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में उक्त विचार वाराणसी परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल एवं चर्चित साहित्यकार श्री कृष्ण कुमार यादव ने व्यक्त किये। इस अवसर पर स्वर्गीय हीरालाल यादव के तैल चित्र एवं लोक साहित्य पर केंद्रित 'नागरी' पत्रिका का लोकार्पण भी किया गया।


पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि हीरालाल यादव ने बिरहा विधा न सिर्फ विशेष विधा के तौर पर पहचान दिलाई, बल्कि राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इसे लोकप्रिय बनाया। उन्हें इसके लिए संगीत नाटक अकादमी सम्मान, यश भारती, भिखारी ठाकुर सम्मान से लेकर पद्मश्री तक से नवाजा गया।   ऐसे में बनारस के तमाम स्थापित साहित्यकारों के चित्रों के बीच नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी में 'बिरहा सम्राट' के चित्र को शामिल किया जाना एक नई परम्परा को जन्म देगा।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार श्री हरिराम द्विवेदी (हरी भैया) ने कहा कि नागरी पत्रिका लोक विधा की कुंजी है, जिसमें लोक साहित्य एवं हीरालाल यादव का पूरा कृतित्व व व्यक्तित्व वर्णित है। साहित्य में ऐसी पत्रिकाओं की आवश्यकता है। बिरहा को राष्ट्रीय पटल पर स्थापित करने का श्रेय हीरालाल को जाता है। विशिष्ट अतिथि डाॅ. जितेन्द्र नाथ मिश्र ने कहा कि हीरालाल बिरहा के रसिया थे जिनकी मधुर आवाज ने समाज को झंकृत किया। बिरहा मात्र मनोरंजन का साधन नहीं  है बल्कि यह लोक रंजन की जीवनधार है। यह समाज में उत्साह, उमंग एवं सद्भाव पैदा करती है।

कविमंगल ने हीरालाल पर आधारित गीत से लोगों को भाव-विभोर कर दिया- “उड़ गया पंछी कहाॅं न जाने, करके पिजड़ा खाली, बिरहा की बगिया कर सूनी, हुआ अलविदा माली।” बिरहा गायक रामदेव के सुपुत्र शारदा ने भी गीत सुनाया।

नागरी प्रचारिणी सभा के सहायक मंत्री श्री सभाजीत शुक्ल ने कहा कि हीरालाल यादव का नागरी प्रचारिणी सभा से गहरा नाता था। सभा के माध्यम से वह संसद में बिरहा गायन किये, वे सुरीली आवाज के जादूगर व ग्राम्यांचल के चितेरे रहे।

अतिथियों का स्वागत कवि शंकरानन्द, धन्नूभगत एवं किशन जायसवाल ने किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. जयशंकर जय एवं धन्यवाद ज्ञापन बृजेश चन्द्र पाण्डेय ने किया। स्व. हीरालाल के सुपुत्र रामजी यादव, प्रोफेसर सर्वेशानन्द, प्रोफेसर दयानन्द यादव, डाक्टर राजेन्द्र, डाक्टर उमाशंकर यादव, इन्जीनियर अशोक यादव, डाक्टर दुर्गाप्रसाद श्रीवास्तव व चपाचप बनारसी ने विचार व्यक्त किया। इस अवसर पर नरोत्तम शिल्पी, सिद्धनाथ शर्मा, ज्ञान प्रकाश, सुनील यादव, चैधरी शोभनाथ, राम जनम शरण, हरिहर जख्मी, कविराज, लालजी बाबा जी सहित तमाम साहित्यकार व बुद्धिजीवी उपस्थित रहे।













नागरी प्रचारिणी सभा में लगेगा बिरहा सम्राट पद्मश्री हीरालाल यादव का भी चित्र, पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव ने किया लोकार्पण