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गुरुवार, 12 सितंबर 2019

हिंदी को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में लखनऊ की संस्था परिकल्पना का अहम स्थान-डाक निदेशक केके यादव

हिंदी को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में लखनऊ की संस्था परिकल्पना का अहम स्थान है।  विश्व के 11 देशों में  ‘‘ब्लॉगोत्सव‘‘ और ‘‘अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी उत्सव‘‘ का आयोजन कर चुकी यह संस्था हिन्दी भाषा को अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप देने की दिशा में बड़ा काम कर रही है। उक्त उद्गार चर्चित ब्लॉगर व साहित्यकार एवं लखनऊ मुख्यालय परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ श्री कृष्ण कुमार यादव ने परिकल्पना संस्था के 13 वें वार्षिक महासभा में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किये।  
इस अवसर पर परिकल्पना की अध्यक्ष माला चौबे और महासचिव डॉ. रवींद्र प्रभात के तत्वाधान में  देश के विभिन्न हिस्सों से पधारे ब्लॉगर्स, साहित्यकार और बुद्धिजीवियों को सम्मानित भी किया गया। परिकल्पना की नयी कार्यकारिणी के गठन के साथ  नए उत्तरदायित्व ग्रहण करने वाले सदस्यों को पद और गोपनियता की शपथ भी दिलाई गयी। 


साथ ही परिकल्पना के जानकीपुरम, लखनऊ स्थित नए परिसर का लोकार्पण भी डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने किया।
डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि, वैश्वीकरण और डिजिटल इण्डिया के इस दौर में हिंदी की अहमियत समग्र विश्व समझ रहा है, ऐसे में हिन्दी की विविधता, सौन्दर्य, डिजिटल और अंतराष्ट्रीय स्वरुप को परिकल्पना ने जिस तरह से आगे बढ़ाया है, उसने नए प्रतिमान आयाम स्थापित किये हैं। यह संस्था हिन्दी भाषा को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा हेतु विगत कई वर्षों से संघर्षरत है।
सभाध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार डॉ मिथिलेश दीक्षित ने कहा कि ‘‘परिकल्पना जिन पवित्र उद्देश्यों को लेकर काम कर रही है वह बहुत बड़ा काम है। परिकल्पना की सदस्य होने के नाते यदि मैं कहूँ कि परिकल्पना मुझमें बसती है और मैं परिकल्पना में तो शायद कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।‘‘ विशिष्ट अतिथि महाराष्ट्र विश्वविद्यालय, जलगांव के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ सुनील कुलकर्णी ने कहा कि  राष्ट्रभाषा के प्रचार को राष्ट्रीयता का मुख्य अंग मानते हुए परिकल्पना सही मायनों में हिन्दी के उत्थान की दिशा में अनुकरणीय भूमिका निभा रही है। अवधी के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. राम बहादुर मिश्र ने कहा कि ‘‘जहां हिन्दी है, वहीं परिकल्पना है और जहां परिकल्पना है वहीं हिन्दी है। परिकल्पना संस्था नहीं एक वैश्विक परिवार है जो वसुधैव कुटुंबकम की भावना को चरितार्थ करती है।‘‘

परिकल्पना की अध्यक्ष माला चौबे ने कहा कि यह संस्था हिन्दी भाषा और साहित्य की तकनीकी प्रगति को समर्पित है। यह संस्था एक वैश्विक परिवार है जिससे जुड़कर आप अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकते हैं और राष्ट्र निर्माण में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित कर सकते हैं। परिकल्पना समय के प्रधान संपादक डॉ रवीन्द्र प्रभात ने बताया  कि भारतीय भाषाओं के विकास व उनके वैश्विक प्रारूप को समृद्ध बनाने के लिए प्रतिबद्ध संस्था के रूप में परिकल्पना संस्था ने पिछला अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी उत्सव  मई 2019 में भारतीय महावाणिज्य दूतावास वियतनाम के सहयोग से वियतनाम की आर्थिक राजधानी हो ची मिनह में आयोजित किया था।
 कार्यक्रम में  डॉ रवीन्द्र प्रभात, माला चौबे, डॉ सुनील कुलकर्णी, डॉ मिथिलेश दीक्षित, डॉ ओंकार नाथ द्विवेदी, कुसुम वर्मा, डॉ राम बहादुर मिश्र सहित तमाम ब्लॉगर्स, साहित्यकार और बुद्धिजीवी शामिल हुए।   
परिकल्पना संस्था की नयी कार्यकारिणी में डॉ मिथिलेश दीक्षित को मानद अध्यक्ष, डॉ मीनाक्षी सक्सेना को उपाध्यक्ष (महिला प्रकोष्ठ), सत्या सिंह को उपाध्यक्ष (सामाजिक गतिविधियां), डॉ सुषमा सिंह को उपाध्यक्ष (वैश्विक प्रसार), रणधीर सिंह सुमन को उपाध्यक्ष (मीडिया सह विधिक प्रभारी), शचिंद्रनाथ मिश्र को उपाध्यक्ष (युवा प्रकोष्ठ), शीला पाण्डेय को सचिव (कार्यक्रम संयोजन), राजीव प्रकाश को सचिव (सेंट्रल उत्तर प्रदेश प्रभारी),  डॉ अमोल रॉय को सचिव (बिहार प्रभारी),  गगन शर्मा को सचिव (दिल्ली प्रभारी), डॉ अरुण कुमार शास्त्री को सचिव (पश्चिमी उत्तर प्रदेश प्रभारी), नीता जोशी को सचिव (महिला प्रकोष्ठ), कनक लता गुप्ता को सचिव (सामाजिक गतिविधियां),  कुसुम वर्मा को सचिव (सांस्कृतिक गतिविधियां), डॉ उदय प्रताप सिंह को सचिव (मीडिया प्रभारी), आकांक्षा यादव को सह सचिव (महिला प्रकोष्ठ) और आभा प्रकाश को सह सचिव  (सांस्कृतिक गतिविधियां) का दायित्व प्रदान किया गया। इसके अलावा  नकुल दुबे, कृष्ण कुमार यादव, डॉ सुनील कुलकर्णी, डॉ राम बहादुर मिश्र, डॉ चम्पा श्रीवास्तव तथा डॉ प्रभा गुप्ता को संस्था का संरक्षक और  शिव सागर शर्मा, डॉ ओंकारनाथ द्विवेदी, डॉ ओम प्रकाश शुक्ल अमिय, डॉ अनीता श्रीवास्तव और डॉ बाल कृष्ण पाण्डेय को मार्गदर्शक मण्डल में शामिल किया गया।




लखनऊ की संस्था परिकल्पना का 13वाँ वार्षिक महासभा संपन्न, 11 देशों में करा चुकी है अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी उत्सव

परिकल्पना संस्था के तत्वाधान में साहित्यकार व ब्लॉगर्स का हुआ सम्मान 


सोमवार, 12 अगस्त 2019

उ.प्र. के उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने डाक निदेशक व साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव को किया सम्मानित

लखनऊ मुख्यालय परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ एवं चर्चित साहित्यकार व ब्लॉगर श्री कृष्ण कुमार यादव को प्रशासनिक एवं सामाजिक क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिये उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने विधायी एवं न्याय मन्त्री श्री बृजेश पाठक की अध्यक्षता में आयोजित एक कार्यक्रम में "भोजपुरी गौरव" सम्मान से विभूषित किया। यह सम्मान अखिल भारतीय भोजपुरी समाज द्वारा विश्वेशरैया प्रेक्षागृह, लखनऊ में आयोजित एक भव्य समारोह में यह सम्मान प्रदान किया गया। भोजपुरी समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रभुनाथ राय और महासचिव मनोज सिंह ने इस अवसर पर भोजपुरी को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल कर इसका दायरा बढाने की अपील की।
अखिल भारतीय भोजपुरी समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री प्रभुनाथ राय ने बताया कि विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाली विभूतियों को इस अवसर पर "भोजपुरी रत्न" और "भोजपुरी गौरव" सम्मान से अलंकृत किया गया। अखिल भारतीय भोजपुरी समाज द्वारा आयोजित भोजपुरी महोत्सव-2019 के मुख्य अतिथि डॉ दिनेश शर्मा उप मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश, विशिष्ट अतिथि श्री  बृजेश पाठक, विधि एवं न्याय मंत्री उत्तर प्रदेश, श्री आशुतोष टंडन, चिकित्सा शिक्षा एवं प्राविधिक शिक्षा मंत्री उत्तर प्रदेश, श्री महेंद्र सिंह, ग्राम्य विकास मंत्री उत्तर प्रदेश, श्रीमती अनुपमा जयसवाल, बेसिक शिक्षा एवं बाल पुष्टाहार मंत्री उत्तर प्रदेश, श्रीमती संयुक्ता भाटिया, महापौर लखनऊ को भोजपुरी रत्न सम्मान से अलंकृत किया गया।
इसी क्रम में डॉ रजनीश दुबे (IAS) प्रमुख सचिव उत्तर प्रदेश शासन, श्री राजन शुक्ला (IAS) प्रमुख सचिव उत्तर प्रदेश शासन, श्री जितेंद्र कुमार (IAS) प्रमुख सचिव उत्तर प्रदेश शासन, श्री कृष्ण कुमार यादव (IPS) निदेशक डाक सेवाएं, लखनऊ मुख्यालय परिक्षेत्र, डॉ अमित अग्रवाल, अधीक्षक एसजीपीजीआई लखनऊ, डॉ भुवन चंद्र तिवारी, अधीक्षक डॉ राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान लखनऊ, डॉक्टर निर्मेश भल्ला, डॉ एसके श्रीवास्तव, श्री बाबा हरदेव सिंह, पूर्व अध्यक्ष उत्तर प्रदेश पीसीएस संघ, डॉ एन डी पाठक, निदेशक भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान लखनऊ, श्री आनंद मणि त्रिपाठी, अध्यक्ष अवध बार एसोसिएशन, श्री कुलदीप पति त्रिपाठी, अपर महाधिवक्ता भारत सरकार को "भोजपुरी गौरव सम्मान" से अलंकृत किया गया।

कार्यक्रम का कुशल आयोजन श्री प्रभुनाथ राय राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिल भारतीय भोजपुरी समाज एवं समाज के पदाधिकारी श्री मनोज सिंह, श्री राम रतन यादव, श्री संजय सिंह, श्री पीएन तिवारी,श्री हनुमान यादव,श्री अमरीश राय,श्री विजय यादव,श्री अभिषेक राय,श्री सीके प्रसाद, डॉ देवराज सिंह, सुनील सिंह, अंबिका,श्रीमती सुनीता राय, श्री वेद प्रकाश राय, इंजीनियर महेंद्र श्रीवास्तव आदि के नेतृत्व में किया गया । कार्यक्रम का  संचालन श्री रामविलास सिंह यादव  के द्वारा किया गया। सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत धोबिया नृत्य,फरि नृत्य, कजरी,भोजपुरी कविता पाठ आदि मनमोहक कार्यक्रम कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किया गया ।
(साभार)







शनिवार, 22 सितंबर 2018

थोड़ा स्मार्ट बनें तो लन्दन की तरह हों गोमती के किनारे और हजरतगंज

अपने लखनऊ ने काफी प्रगति की है। यहाँ की तहजीब और नफासत की बात ही निराली है। लखनवी अंदाज की बात भी खूब होती है। परंतु कुछ बातों पर ध्यान दिया जाये तो वाकई इसे और भी खूबसूरत, स्मार्ट सिटी और सिटीजन फ्रेंडली बनाया जा सकता है। मैंने अभी तक दुनिया के 8 देशों की यात्रा की है।  हर जगह की अपनी विशेषतायें हैं। अभी कुछेक साल पहले मैनेजमेंट डेवलपमेंट प्रोग्राम की ट्रेनिंग के सिलसिले में लंदन जाना हुआ। ये  वाकई एक खूबसूरत व सुनियोजित शहर है । देखकर लगा कि काश, लखनऊ के लोगों में भी अपने शहर के प्रति यह सोच होती। इसे खूबसूरत बनाने में आम जन की भी उतनी भी प्रभावी भूमिका है, जितनी सरकार की। लखनऊ में ट्रैफिक की समस्या विकराल है, हर कोई बस अपनी परवाह करता है और प्रशासन को कोसता है। एक जिम्मेदार नागरिक के नाते ट्रैफिक की समझ  की बात ही नहीं होती।

वहीं लंदन में ट्रैफिक मैनेजमेंट से लेकर स्वच्छता तक, सामान्य नागरिक के व्यवहार से लेकर प्रशासन की तत्परता तक में स्मार्टनेस दिखाई देती है। हम अपने शहर को तो स्मार्ट सिटी के रूप में  देखना चाहते हैं, पर खुद स्मार्ट नहीं होना चाहते।  लंदन में टेम्स नदी के तटों को जिस तरह से साफ रखकर पर्यटकों के अनुकूल यानी टूरिज्म  फ्रेंडली बनाया गया है, उसी आधर पर गोमती नदी को विकसित किया जा सकता है। लंदन में पर्यटकों को घुमाने के लिये डबल डेकर बसें, गाईड पर्याप्त संख्या में मौजूद हैं।  लखनऊ में भी इसे लागू किया जा सकता है। 

लखनऊ में पर्यटन की अपार संभावनाएं
लखनऊ में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। टयूब ट्रेन लंदन के पब्लिक ट्रांसपोर्ट की रीढ है, लखनऊ में भी मेट्रो को उसी तर्ज पर विकसित किया जा सकता है। लखनऊ में कचरा निस्तारण एक बड़ी समस्या है।  लोग अपने घरों का कचरा बाहर फेंककर स्वछ्ता की इतिश्री समझ लेते हैं।  हमें इस सोच को बदलना होगा। लंदन की सडकों और गलियों में आप बेफिक्र होकर घूम सकते हैं, पर गंजिंग के लिये मशहूर हज़रतगंज में तो शाम को तिल रखने भी जगह नहीं दिखती। यहाँ व्यवस्थित विकास करने की जरूरत है।  ब्रिटेन की  कैम्ब्रिज व ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी मशहूर है।  काश, लखनऊ के हमारे शैक्षणिक संस्थान उनसे कुछ सीख पाते। इन जगहों को इतना आकर्षक बनाया जाए कि बाहर से आने वाले यात्री इसे देखने के लिए आएं।  लखनऊ विश्विद्यालय की इमारत काफी पुरानी है, इसे भी विकसित किया जा सकता है।  डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्विद्यालय (एकेटीयू) का नया परिसर भी काफी आकर्षक बना है। 

बढ़ते अपराध पर रोकथाम जरुरी 
राजधानी होने के बावजूद लखनऊ में अपराध काम नहीं हो रहे हैं।  अपराध की रोकथाम से लेकर महिलाओं के प्रति सोच तक में हम पिछड़े  हुए हैं। 1090 की पहल सराहनीय है, लेकिन इसे और प्रभावी बनाना होगा। अभी भी शाम को बाजार में निकलने वाली महिलाओं को घूरने वालों पर कार्रवाई अपेक्षित है। अंग्रेजों की पुलिसिंग दुनिया में उत्कृष्ट मानी जाती है, उससे सीखने की जरुरत है। इस तरह की सख़्त पुलिसिंग हमें स्मार्ट शहर के रूप में आगे बढ़ाने में मदद करेगी। 

-कृष्ण कुमार यादव
निदेशक डाक सेवाएँ 
लखनऊ (मुख्यालय) परिक्षेत्र, उत्तर प्रदेश

(प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक पत्र "अमर उजाला" के लखनऊ संस्करण में "लखनवी परदेस में' के तहत 17 सितंबर, 2018 को प्रकाशित)













बुधवार, 29 अगस्त 2018

डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने उत्कृष्ट कार्य करने वाली लखनऊ की विभूतियों को किया सम्मानित

संस्कार और संवेदना मानव समाज की रीढ़ हैं। सामाजिक व्यवस्था के सुचारु संचालन हेतु युवा पीढ़ी में इनका संचरण जरुरी है। सोशल मीडिया के इस दौर में जहाँ हर कोई अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए भी कट-पेस्ट का सहारा ले रहा है, वहाँ संस्कारों को बचाकर रखना जरुरी हो गया है।  उक्त उद्गार चर्चित लेखक एवं लखनऊ (मुख्यालय) परिक्षेत्र, उत्तर प्रदेश  के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने संस्कार भारती, गोमती इकाई, लखनऊ के नटराजन पूजन एवं कला गुरु सम्मान कार्यक्रम में अध्यक्षीय उद्बोधन के रूप में व्यक्त किये। 


डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि युवा पीढ़ी में रचनात्मक प्रवृत्ति को विकसित करना होगा। साहित्य, कला, संगीत जैसी विधाएँ किसी भी देश की सभ्यता और संस्कृति को समुन्नत बनाती हैं। संस्कारों को सहेजने के लिए नैतिक मूल्यों की स्थापना पर भी जोर देना होगा।   



इस अवसर पर निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने साहित्य, कला, संगीत व नाट्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाली विभूतियों को सम्मानित भी किया। साहित्य हेतु वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. कौशलेन्द्र पांडेय, चित्रकला हेतु अमर नाथ गौड़, नाट्य के क्षेत्र में ललित सिंह पोखरिया तथा संगीत के लिए भातखण्डे संगीत विद्यापीठ की रजिस्ट्रार सुश्री मीरा माथुर को कला गुरु सम्मान से सम्मानित किया गया। 


 रानी लक्ष्मीबाई मेमोरियल स्कूल, इंदिरानगर, लखनऊ के ऑडिटोरियम  में आयोजित इस कार्यक्रम का शुभारम्भ  निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव और संस्थापक सेंट जोजफ विद्यालय समूह श्रीमती पुष्पलता अग्रवाल ने दीप प्रज्वलन करके किया। विषय प्रवर्तन वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. किशोरी शरण शर्मा ने किया।  समवेत गणेश वंदना, ध्येय गीत गायन के बाद मा. सारा, निखिल, अनादि, नारायन सिंह, आर्यन आदि ने देशभक्तिपरक रचनाएँ  प्रस्तुत करके लोगों की सराहना प्राप्त की।  
चर्चित गायिका संगीता श्रीवास्तव, सरोज खुल्बे, राखी अग्रवाल व् ममता त्रिपाठी ने सुबोध दुबे के निर्देशन में खूबसूरत गीतों की प्रस्तुति कर शमां बाँधा। कार्यक्रम का संचालन इकाई के अध्यक्ष ई. अखिलेश्वर नाथ पांडेय व  आभार गौरीशंकर वैश्य 'विनम्र' ने किया। इस अवसर पर राज्य ललित कला एकेडमी के उपाध्यक्ष सीताराम कश्यप, शारदा पांडेय,  दुर्गेश्वर राय, रीता अग्रवाल, नीरा माथुर इत्यादि  मौजूद रहे।



संस्कार व संवेदना मानव समाज की रीढ़ हैं - डाक निदेशक केके यादव 

डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव  ने उत्कृष्ट कार्य करने वाली लखनऊ की विभूतियों को किया सम्मानित 

संस्कार भारती, गोमती शाखा, लखनऊ  द्वारा कला गुरु सम्मान का आयोजन 

रविवार, 1 जुलाई 2018

स्मृतियों में इलाहाबाद.... -कृष्ण कुमार यादव

जिंदगी के प्रवाह में कुछेक शहरों का आपकी जिंदगी में अहम स्थान होता है, मेरे लिए यह शहर इलाहाबाद है। एक ऐसा शहर जो कभी विद्यार्थियों के लिए अध्ययन का स्वर्ग था। कक्षा 12 पास करते-करते लोगों के मन की उड़ान अपनी कैरियर की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अनायास ही इलाहाबाद की तरफ उन्मुख हो जाती थी, सो हमारे साथ भी ऐसा हुआ। वर्ष 1994 में जब ग्रेजुएशन हेतु हमने इलाहाबाद में कदम रखा तो ममफोर्डगंज हमारी शरण स्थली बनी। यह पॉश इलाका तभी से हमारी आँखों में बस गया और वर्ष 2001 में आई.ए.एस. परीक्षा में सफल होने के बाद जब हमने इलाहाबाद छोड़ा, तब तक फौव्वारे चौराहे के पास ही किराये के कमरे में अकेले रहे। मुझे यह भी सौभाग्य प्राप्त हुआ कि जिस शहर में कभी एक विद्यार्थी के रूप में रहकर अपना कैरियर बनाया, उसी शहर में एक अधिकारी के रूप में निदेशक (डाक सेवाएँ), इलाहाबाद परिक्षेत्र के पद पर फरवरी 2012 से मार्च 2015 तक तीन वर्षों तक कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ। वाकई यह अपने आप में एक सुखद अनुभव था।

इलाहाबाद शुरू से ही एक प्रगतिशील शहर रहा है। यहाँ की बोली की मिठास व तेवर इसे अन्य शहरों से अलग करते हैं। नेहरू व गाँधी परिवार की विरासत सहेजे आनद भवन से लेकर क्रांतिकारी आजाद की दास्ताँ सुनाते अल्फ्रेड पार्क की राहों पर न जाने कितनी चहलकदमी की होगी। यहाँ इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला। 

1887 में स्थापित ’पूरब का ऑक्सफोर्ड‘ कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अपनी अलग ही ऐतिहासिकता है।  इस संस्थान से शिक्षा प्राप्त कर देश-दुनिया को नई ऊँचाईयाँ प्रदान करने वालों की एक लम्बी सूची है। राजनीति से लेकर न्यायपालिका, प्रशासन तक ही नहीं बल्कि शिक्षा, साहित्य, कला व संस्कृति के क्षेत्र में भी। कभी इस विश्वविद्यालय को सिविल सर्विसेज की फैक्ट्री कहा जाता था। आज भी एक वाकया याद आता है। त्रिपाठी चौराहे पर स्थित बनारसी चाय की दुकान पर एक बार दोस्तों के साथ चाय पी रहा था कि एक कार आकर रुकी। कार से एक अधेड़ सज्जन उतरे और एक छात्र का नाम लेकर पूछा कि वह कहाँ मिलेगा ? हम लोगों ने कहा कि उसका कोई पता तो होगा। इस पर वे तुनककर बोले, अरे भाई ! वह इस बार आई. ए. एस. की परीक्षा में सफल हुआ है और तुम लोग उसे नहीं जानते। हम लोगों ने हँसते हुए जवाब दिया कि अंकल जी ! यहाँ तो हर साल आई.ए.एस. और पी.सी.एस. की नई फसल लहलहाती है, भला बिना पते व परिचय के कहाँ से ढूँढ पाएंगे। बात ही बात में पता चला की उन्होंने अपने शहर में अख़बार में पढ़ा कि उनके जिले से किसी छात्र का आई.ए.एस. में सलेक्शन हुआ है और फिर शादी के प्रयोजन से उससे मिलने सीधे इलाहाबाद ही आ गए। 


इलाहाबाद एक अत्यन्त पवित्र नगर है, जिसकी पवित्रता गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम के कारण है। वेद से लेकर पुराण तक और कवियों से लेकर लोकसाहित्य के रचनाकारों तक ने इस संगम की महिमा का गान किया है। विद्यार्थी जीवन में न जाने कितनी बार संगम गए होंगे। सुबह के समय समानांतर चलते जल-पक्षियों के साथ बोटिंग का आनंद और फिर किले के अंदर इतिहास के पन्नों से गुजरते हुए अक्षयवट का दर्शन एक रोमांच पैदा करता। कुम्भ के दौरान तो मानो यह लघु भारत बन जाता है। यहाँ गंगा मईया से लेकर लेटे हुए हनुमान जी के दर्शन कर बस यही माँगते थे कि जल्दी से कैरियर की गाड़ी अपने मुकाम पर पहुँचे।    
साहित्य, कला, संस्कृति की त्रिवेणी इलाहाबाद में प्राचीन काल से ही प्रवाहित है। इन विधाओं में यहाँ की विभूतियों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान कायम की है। इलाहाबाद में अध्ययन के दौरान ही साहित्य के प्रति समझ भी अच्छी तरह से विकसित हुई और लिखने-पढ़ने का शौक भी खूब जमा। रात भर में किसी कहानी या नॉवेल की पुस्तक को पढ़कर ख़त्म करने का जूनून रहता था। यहीं रहते हुए विभिन्न अख़बारों में "पाठकों के पत्र" कॉलम में  राजनीतिक, सामाजिक व सामयिक विषयों पर खूब लिखा, तब तो सोचा भी नहीं था कि एक दिन सिविल सर्विसेज की परीक्षा में यह लिखना बेहद काम आएगा। यहीं से पढ़ने-लिखने का जो शौक लगा तो फिर साहित्य जीवन का अभिन्न अंग ही बन गया। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं के अलावा अब तक विभिन्न विधाओं में मेरी सात पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं।  साहित्य के क्षेत्र में इलाहाबाद की अहमियत इसी से समझी जा सकती है कि यहाँ से अब तक पाँच लोगों को ज्ञानपीठ सम्मान से विभूषित किया जा चुका है।  इनमें  सुमित्रानंदन पंत, रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी, महादेवी वर्मा, नरेश मेहता और अमरकांत का नाम शामिल है।
मैं कहीं भी रहूँ, पर इलाहाबाद मेरे अंदर सदैव जीवंत रहेगा। इस पर जितना भी लिखा जाये, कम ही होगा। यहीं रहते हुए फ़िल्में देखने की जो आदत लगी, वह आज तक नहीं छूटी। यह संयोग ही है कि इलाहाबाद हिंदी फिल्मों में भी खूब दिख रहा है, फिर चाहे वह पिछले दिनों रिलीज हुई 'शादी में जरूर आना' में हो  या  'पद्मावत' में अलाउद्दीन खिलजी के  कड़ा नगर और रेस-3 में हंडिया नगर की चर्चा है। इलाहाबाद का स्वाद भी खूब है। नेतराम की कचौड़ियों से लेकर लोकनाथ के समोसों की खुशबू अभी भी जेहन में है। इलाहाबादी अमरुद के तो क्या कहने ! शायर अकबर इलाहाबादी ने खूब कहा है-

’’ कुछ इलाहाबाद में सामां नहीं बहबूद के
 धरा क्या है सिवा अकबर-ओ-अमरूद के।‘‘


फरवरी 2012 में इलाहाबाद में निदेशक डाक सेवाएं रूप में एक अधिकारी होकर आया जरूर, पर अपने अंदर के विद्यार्थी को सदैव जिन्दा रखा।  विद्यार्थी के रूप में जिन समस्याओं से हम यहाँ रूबरू हुए थे, सदैव कोशिश  यही रही कि उनमें सुधार हों।  जब इलाहाबाद की सड़कों और गलियों से गुजरता तो विद्यार्थी जीवन की स्मृतियाँ चलचित्र की भाँति पटल पर अंकित होती रहतीं।  पत्नी आकांक्षा के साथ दोनों बेटियों अक्षिता और अपूर्वा भी उस जगह को देखकर रोमांचित होतीं, जहाँ से  सफलता की चढ़ाईयां चढ़ते हुए मैं  जीवन में इस मुकाम पर पहुँचा था। इलाहाबाद से पहले मैं अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में निदेशक  पदस्थ था, जहाँ समुद्र के बीच छोटे-छोटे द्वीपों का अपना रोमांच था तो इलाहाबाद के बाद राजस्थान पश्चिमी राजस्थान, जोधपुर में निदेशक के पद पर कार्यरत हूँ, जिसे मरुस्थली कहा जाता है। समुद्र से  संगम और फिर रेतीला मरुस्थल...... शायद मनुष्य की ज़िंदगी का सच भी इन्हीं के बीच छिपा हुआ है, जहाँ जीवन में ऐसे ही भिन्न-भिन्न रंग देखने को मिलते हैं। 

- कृष्ण कुमार यादव 
निदेशक डाक सेवाएं
राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर -342001