आज फ्रैंडशिप-डे है, सो आज का दिन दोस्तों के नाम. इसी बहाने कुछ पुराने दोस्तों को फोन करके देखा जाय कि वे कहाँ हैं. जिंदगी की इस भागमभाग में दोस्ती के पैमाने भी बदल गए और उनके मायने भी. कई बार याद आते हैं स्कूल के वो दिन जब दोस्ती निभाने की बड़ी-बड़ी कसमें खाते थे, पर आज वो दोस्त कहाँ हैं पता ही नहीं. आर्कुट, फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स ने वर्चुअल दोस्तों की एक अच्छी-खासी फ़ौज खड़ी कर दी है, पर प्रोफाइल पर हाय-हेलो के अलावा शायद ही इसका कोई महत्त्व हो. यद्यपि इन सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स ने उन तमाम दोस्तों से जोड़ने में मदद अवश्य की है जो इधर-उधर बिखरे हुए हैं. खैर, अच्छी दोस्ती का कोई विकल्प नहीं और अच्छे दोस्त जीवन में बहुत कम मिलते हैं...सो, आज का दिन ऐसे ही दोस्तों के नाम !!इस ब्लॉग पर आप रूबरू होंगे कृष्ण कुमार यादव की साहित्यिक रचनात्मकता और अन्य तमाम गतिविधियों से...
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रविवार, 1 अगस्त 2010
आज का दिन दोस्तों के नाम...
आज फ्रैंडशिप-डे है, सो आज का दिन दोस्तों के नाम. इसी बहाने कुछ पुराने दोस्तों को फोन करके देखा जाय कि वे कहाँ हैं. जिंदगी की इस भागमभाग में दोस्ती के पैमाने भी बदल गए और उनके मायने भी. कई बार याद आते हैं स्कूल के वो दिन जब दोस्ती निभाने की बड़ी-बड़ी कसमें खाते थे, पर आज वो दोस्त कहाँ हैं पता ही नहीं. आर्कुट, फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स ने वर्चुअल दोस्तों की एक अच्छी-खासी फ़ौज खड़ी कर दी है, पर प्रोफाइल पर हाय-हेलो के अलावा शायद ही इसका कोई महत्त्व हो. यद्यपि इन सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स ने उन तमाम दोस्तों से जोड़ने में मदद अवश्य की है जो इधर-उधर बिखरे हुए हैं. खैर, अच्छी दोस्ती का कोई विकल्प नहीं और अच्छे दोस्त जीवन में बहुत कम मिलते हैं...सो, आज का दिन ऐसे ही दोस्तों के नाम !!शनिवार, 31 जुलाई 2010
साहित्य से इतर भी प्रासंगिक हैं प्रेमचन्द के विचार
प्रेमचन्द सिर्फ साहित्यिक प्राणी ही नहीं थे बल्कि उनकी कलम सामाजिक विमर्श और तत्कालीन समस्याओं पर भी चली। प्रेमचन्द ने 19वीं सदी के अन्तिम दशक से लेकर 20वीं सदी के लगभग तीसरे दषक तक, भारत में फेैली हुई तमाम सामाजिक समस्याओं पर लेखनी चलायी। देश की स्वतन्त्रता के प्रति उनमें अगाध प्रेम था। चैरी-चैरा काण्ड के ठीक चार दिन बाद 16 फरवरी 1921 को पे्रमचन्द ने भी सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया । इसी प्रकार 11 अगस्त 1908 को जब 15 वर्षीय क्रान्तिकारी खुदीराम बोस को अंग्रेज सरकार ने निर्ममता से फांसी पर लटका दिया तो प्रेमचन्द के अन्दर का देशप्रेम हिलोरें मारने लगा और वे खुदीराम बोस की एक तस्वीर बाजार से खरीदकर अपने घर लाये और कमरे की दीवार पर टांग दिया। खुदीराम बोस को फांसी दिये जाने से एक वर्ष पूर्व ही उन्होंने ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’ नामक अपनी प्रथम कहानी लिखी थी, जिसके अनुसार- ‘खून की वह आखिरी बूँद जो देश की आजादी के लिये गिरे, वही दुनिया का सबसे अनमोल रतन है।’प्रेमचन्द ने जिस दौर में सक्रिय रूप से लिखना शुरू किया, वह छायावाद का दौर था। निराला, पंत, प्रसाद और महादेवी जैसे रचनाकार उस समय चरम पर थे पर प्रेमचन्द ने अपने को किसी वाद से जोड़ने की बजाय तत्कालीन समाज में व्याप्त छुआछूत, साम्प्रदायिकता, हिन्दू- मुस्लिम एकता, दलितों के प्रति सामाजिक समरसता जैसे ज्वलंत मुद्दों से जोड़ा। एक लेखक से परे भी उनकी चिन्तायें थीं और उनकी रचनाओं में इसकी मुखर अभिव्यक्ति हुई है। उनकी कहानियों और उपन्यासों के पात्र सामाजिक व्यवस्थाओं से जूझते हंै और अपनी नियति के साथ-साथ भविष्य की इबारत भी गढ़ते हैं। नियति में उन्हें यातना, दरिद्रता व नाउम्मीदी भले ही मिलती हो पर अंततः वे हार नहीं मानते हंै और संघर्षों की जीजिवषा के बीच भविष्य की नींव रखते हैं। अपने वैयक्तिक जीवन के संघर्षों से प्रेमचन्द ने जाना था कि संघर्ष का रास्ता बेहद पथरीला है और मात्र संवेदनाओं व हृदय परिवर्तन से इसे नहीं पार किया जा सकता। यही कारण था कि प्रेमचन्द ऊपर से जितने उद्विग्न थे, अन्दर से उतने ही विचलित। वस्तुतः प्रेमचन्द एक ऐसे राष्ट््र-राज्य की कल्पना करते थे जिसमें किसी भी तरह का भेदभाव न हो- न वर्ण का, न जाति का, न रंग का और न धर्म का। प्रेमचन्द का सपना हर तरह की विषमता, सामाजिक कुरीतियों और साम्प्रदायिक-वैमनस्य से परे एक ऐसे राष्ट््र का निर्माण था जिसमें समता सर्वोपरि हो। प्रेमचन्द इस तथ्य को भली-भाँति जानते थे कि भारतीय समाज में विद्यमान पृथकता ही उपनिवेशवाद की जड़ रहा है। अंग्रेजों ने इस पृथकता व विषमता की खाई को और भी गहरा करने का प्रयास किया और भारत को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक व सांस्कृतिक सभी मोर्चों पर क्षति पहुँचायी। यही कारण है कि सन् 1933 में जब संयुक्त प्रान्त के गर्वनर मालकम हेली ने कहा कि- ‘‘ जहाँ तक भारत की मनोवृत्ति का हमंे परिचय है, यह कहना युक्तिसंगत है कि वह आज से 50 वर्ष बाद भी अपने लिये कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बना पाएगा, जो स्पष्ट रूप से बहुमत के लिये जवाबदेह हो।’’ प्रेमचन्द ने इसका कड़ा प्रतिवाद किया और लिखा कि- ‘‘जिनका सारा जीवन ही भारत की राष्ट््रीय आकांक्षाओं का दमन करते गुजरा है, उनका यह कथन उचित नहीं प्रतीत होता।’’
प्रेमचन्द ने छुआछूत की समस्या को दूर करना, सामाजिक समता के लिए महत्वपूर्ण बताया। परम्परागत वर्णाश्रम व्यवस्था के सम्बन्ध में उन्होंने लिखा कि- भारतीय राष्ट््र का आदर्श मानव शरीर है जिसके मुख, हाथ, पेट और पाँव- ये चार अंग हैं। इनमें से किसी भी अंग के अभाव या विच्छेदन से देह का अस्तित्व निर्जीव हो जाएगा। वे प्रश्न उठाते हैं कि यदि वर्णाश्रम व्यवस्था के पाँव माने जाने वाले शूद्रों का सामाजिक व्यवस्था से विच्छेदन कर दिया जाय तो इसकी क्या गति होगी? इसी आधार पर वे समाज में किसी भी प्रकार के छुआछूत का सख्त विरोध करते हैं। अपने एक लेख में वे लिखते हैं- ‘‘क्या अब भी हम अपने बड़प्पन का, अपनी कुलीनता का ढिंढोरा पीटते फिरेंगे। यह ऊँच-नीच, छोटे-बड़े का भेद हिन्दू जीवन के रोम-रोम में व्याप्त हो गया है। हम यह किसी तरह नहीं भूल सकते कि हम शर्मा हैं या वर्मा, सिन्हा हैं या चैधरी, दूबे हैं या तिवारी, चैबे हैं या पाण्डे, दीक्षित हैं या उपाध्याय। हम आदमी पीछे हैं, चैबे या तिवारी पहले और यह प्रथा कुछ इतनी भ्रष्ट हो गई है कि आज जो निरक्षर भट्टाचार्य है, वह भी अपने को चतुर्वेदी या त्रिवेदी लिखने में जरा भी संकोच नहीं करता।’’ प्रेमचन्द ने 1932 में महात्मा गाँधी द्वारा मैकडोनाल्ड अवार्ड द्वारा प्रस्तावित पृथक निर्वाचन के विरोध में किये गए आमरण अनशन का समर्थन किया और गाँधी जी के इन विचारों का भी समर्थन किया कि शेष हिन्दू समाज के लिये निर्वाचन की चाहे जितनी कड़ी शर्तंे लगा दी जायें पर दलितांे के लिये शिक्षा और जायदाद की कोई शर्त न रखी जाये और हरेक दलित को निर्वाचन का अधिकार हो। वस्तुतः प्रेमचन्द दलितांे को समाज का एक अभिन्न हिस्सा मानते थे, इसलिये वे उनकी पृथक पहचान के लिए सहमत नहीं थे। यही कारण था कि उन्होंने नागपुर में हरिजनों के लिये स्थापित पृथक छात्रावास व्यवस्था की भी आलोचना की। दलितों के सम्बन्ध में प्रेमचन्द द्वारा दिये गये उद्गारों से उन्हें ब्राह्मण विरोधी भी कहा गया पर प्रेमचन्द इसकी परवाह किये बिना हिन्दू समाज में व्याप्त विषमता की लगातार आलोचना करते रहे। उन्होंने दलितों के लिये काशी विश्वनाथ मंदिर के पट नहीं खोलने पर कहा कि- ‘‘विश्वनाथ किसी एक जाति या सम्प्रदाय के देवता नहीं हंै, वह तो प्राणी मात्र के नाथ हैं। उनपर सबका हक बराबर-बराबर का है।’’ शास्त्रों की आड़ में दलितों के मंदिर प्रवेश को पाप ठहराने वालों को जवाब देते हुए प्रेमचन्द ने ऐसे लोगों की विद्या-बुद्धि व विवेक पर सवाल उठाया और कहा कि- ‘‘विद्या अगर व्यक्ति को उदार बनाती है, सत्य व न्याय के ज्ञान को जगाती है और इंसानियत पैदा करती है तो वह विद्या है और यदि वह स्वार्थपरता व अभिमान को बढ़ावा देती है, तो वह अविद्या से भी बदतर है।’’ वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थकों द्वारा हिन्दू मंदिरों की दलितों से रक्षा करने के सन्दर्भ में वायसराय को सम्बोधित ज्ञापन की तीखी आलोचना करते हुए प्रेमचन्द ने वर्णाश्रम व्यवस्था समर्थकों पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए लिखा कि- ‘‘राष्ट््र की वर्तमान अधोगति हेतु ऐसे ही लोग जिम्मेदार हैं। दक्षिणा में अछूतों द्वारा दिए गये पैसे लेने में इन्हें कोई पाप नहीं दिखता पर किसी अछूत के मंदिर में प्रवेश मात्र से ही इनके देवता अपवित्र हो जाते हैं। यदि इनके देवता ऐसे निर्बल हैं कि दूसरों के स्पर्श से ही अपवित्र हो जाते हैं, तो उन्हें देवता कहना ही मिथ्या है। देवता तो वह है, जिसके सम्मुख जाते ही चांडाल भी पवित्र हो जाये।’’ प्रेमचन्द धर्म का उद्देश्य मानव मात्र की समता मानते थे एवं किसी भी प्रकार के विभेद को राष्ट््र के लिये अहितकर मानते थे। प्रेमचन्द का स्पष्ट मानना था कि- ‘‘हरिजनों की समस्यायें मंदिर प्रवेश मात्र से नहीं हल होने वाली। उनके विकास में धार्मिक बाधाओं से कहीं कठोर आर्थिक बाधायें है।’’
प्रेमचन्द ने साम्प्रदायिकता पर भी कलम चलायी। प्रेमचन्द ने स्पष्ट रूप से कहा कि हिन्दू-मुसलमान की आपसी शिकायतें मसलन- ‘‘मुसलमानों को यह शिकायत है कि हिन्दू उनसे परहेज करते हैं, अछूत समझते हैं, उनके हाथ का पानी नहीं पीना चाहते तो हिन्दुओं को शिकायत है कि मुसलमानों ने उनके मंदिर तोडे़, उनके तीर्थ स्थलों को लूटा, हिन्दू राजाओं की लड़कियाँ अपने महल में डालीं’’, जायज हो सकतीं हैं पर इस आधार पर साम्प्रदायिकता को उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने हिन्दू -मुसलिम एकता को ही स्वराज का दर्जा दिया पर दोनों सम्प्रदायों की विशिष्टताओं के साथ। उन्होने एक दूसरे के धर्म का परस्पर आदर करने पर जोर दिया और कहा कि- ‘‘हिन्दू और मुसलमान न कभी दूध और चीनी थे, न हांेगे और न होने चाहिये। दोनों की पृथक-पृथक सूरतें बनी रहनी चाहिये और बनी रहेंगी।’’ 1931 में मैकडोनाल्ड अवार्ड द्वारा दलितों के लिये पृथक निर्वाचन की व्यवस्था किये जाने पर मुसलमानों में भी पृथक और संयुक्त निर्वाचन पर बहस छिड़ी पर 19 अक्टूबर 1932 को लखनऊ में सम्पन्न हुए मुस्लिम सर्वधर्म सम्मेलन में पृथक निर्वाचन की अवधारणा को अस्वीकार कर दिया गया। इस पर टिप्पणी करते हुए प्रेमचन्द ने कहा कि राष्ट््रीयता ने पूना में प्रथम विजय पायी मगर लखनऊ में उसने जो विजय प्राप्त की है, उसने तो साम्प्रदायिकता को जैसे सुरंग में बारूद लगाकर उड़ा दिया हो।
प्रेमचन्द के राष्ट््र-राज्य में दलितों के साथ स्त्रियाँ और किसान समान भाव से मौजूद हैं, जिनके विकास के बिना भारत के विकास के कल्पना भी बेमानी है। स्त्रियों के साथ समाज में हो रहे दोयम व्यवहार का प्रेमचन्द ने कड़ा विरोध किया और अपनी रचनाओं में उसे स्वतंत्र व्यक्तित्व का दर्जा देते हुये, विकास की धुरी बनाया। इसी प्रकार प्रेमचन्द ने कृषक समुदाय को भारत की प्राणवायु बताया। कर्ज में डूबे किसान, उन पर ढाये जाते जुल्म, उनकी बद से बद्तर होती गरीबी, व्यवस्थागत विक्षोभ और किसानों की समस्याओं को किसी भी साहित्यकार ने उस रूप में नहीं उठाया, जिस प्रकार प्रेमचन्द ने उठाया। प्रेमचन्द का पूरा साहित्य ही दलित, स्त्री और किसान की लड़ाई का साहित्य है जिसमें समता, न्याय और सामाजिक परिवर्तन की घोषणा है। यहाँ धर्म, संस्कृति, रीति-रिवाज, जाति, वर्ण, ऊँच-नीच के लिये कोई जगह नहीं है, जगह है तो सिर्फ मानवता की- जिसके बिना जीवित रहना ही अकारथ है।
प्रेमचन्द एक ऐसे राष्ट््र -राज्य का सपना देखते थे जो समतावादी समाज पर आधारित हो। यहाँ तक कि जब काशी में उन्होंने सरस्वती प्रेस खोला तो कर्मचारियों को रोज कुछ न कुछ देना ही पड़ता पर उतनी आय नहीं होने से सबकी माँग रोज पूरी नहीं हो पाती थी। ऐसे में प्रेमचन्द सबके सामने रोज शाम को आमदनी का हिसाब रख देते और कहते-‘‘इतने पैसों में तुम्हीं लोग अपने और मेरे लिये ब्योंत कर दो, मुझे पान-तम्बाकू और इक्का-भाड़ा-भर देकर बाकी आपस में बाँट लो।’’ वस्तुतः प्रेमचन्द के चिन्तन और व्यवहार में समरसता और साहचर्य महत्वपूर्ण है, केन्द्र-बिन्दु बनना नहीं। यही कारण है कि ऐसे लोग जो आन्दोलनों का केन्द्र-बिन्दु बनकर स्वंय के लिये कुर्सी हथियाना चाहते हैं, प्रेमचन्द उन्हें बाधा नजर आते हैं। उनके उपन्यास ‘रंगभूमि’ की प्रतियाँ जलाने वाले वर्गीय संरचनाओं की जटिलता और यंत्रणादायी व्यवस्था के स्तर को नहीं समझना चाहते, सिर्फ निश्चित फाॅर्मूलों में निबद्ध दलित आत्मकथाओं व घृणित प्रतिक्रियाओं पर आधारित रचनाओं को ही दलित लेखन समझते हैं तो इसमें प्रेमचन्द का क्या दोष? प्रेमचन्द ने राष्ट््रीयता को पारिभाषित करते हुए लिखा कि- ‘‘हम जिस राष्ट््रीयता की परिकल्पना कर रहे हैं, उसमें जन्मगत वर्ण व्यवस्था की गंध तक नहीं होगी। वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न हरिजन, न क्षत्रिय, न कायस्थ। उसमें सभी भारतवासी हांेगे, सभी ब्राह्मण होंगे या सभी हरिजन होंगे।’’ प्रेमचन्द की समतावादी व्यवस्था में दलित बेहतरी के हकदार हैं, किसी के दयाभावी न्याय के नहीं। प्रेमचन्द ने अपनी कहानियों के पात्रों के बारे में एक बार कहा था कि- ‘‘हमारी कहानियों में आपको पदाधिकारी, महाजन, वकील और पुजारी गरीबों का खून चूसते हुए दिखेंगे और गरीब किसान, मजदूर, अछूत और दरिद्र उनके आघात सहकर भी अपने धर्म और मनुष्यता को हाथ से न जाने देंगे, क्योंकि हमने उन्हीं में सबसे ज्यादा सच्चाई और सेवा भाव पाया है।’’
प्रेमचन्द ने 19वीं सदी के अन्तिम दशक से लेकर 20वीं सदी के लगभग तीसरे दशक तक, भारत में फेैली हुई तमाम सामाजिक समस्याओं पर लेखनी चलायी। चाहे वह किसानों-मजदूरों एवं जमींदारों की समस्या हो, चाहे छुआछूत अथवा नारी-मुक्ति का सवाल हो, चाहे नमक का दरोगा के माध्यम से समाज में फैले इंस्पेक्टर-राज का जिक्र हो, कोई भी अध्याय उनकी निगाहों से बच नहीं सका। प्रेमचन्द ने हिन्दी कथा साहित्य को एक नया मोड़ दिया, जहाँ पहले साहित्य मायावी भूल-भुलैयों में पड़ा स्वप्नलोक और विलासिता की सैर कर रहा था, ऐसे में प्रेमचन्द ने कथा साहित्य में जनमानस की पीड़ा को उभारा। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो0 विपिन चन्द्र ने एक बार टिप्पणी की थी-‘‘यदि कभी बीसवीं शताब्दी में आजादी के पूर्व किसानों की हालत के बारे में इतिहास लिखा जाएगा तो इतिहासकार का प्राथमिक स्त्र्रोत होगा प्रेमचंद का ‘गोदान’, क्योंकि इतिहास कभी भी अपने समय के साहित्य को ओझल नहीं करता।’’ गोदान मात्र किसान की संघर्ष गाथा नहीं है वरन् इसमें स्त्री की बहुरूपात्मक स्थिति को दर्शाते हुए उसकी संघर्ष गाथा को भी चित्रित किया गया है। गोदान में अभिव्यक्त गोबर व झुनिया के बीच अवैध प्रेम और विवाह, सिलिया चमाइन और मातादीन पण्डित का प्रेम-प्रसंग जहाँ परम्परा में सेंध लगाते हैं और स्त्री को मुक्त करते हैं वहीं मेहता से प्रेम करते वाली मालती मलिन बस्तियों में मुफ्त दवा बाँट कर सामाजिक कार्यकत्रीे के रूप में नजर आती है तो क्लब - संस्कृति के बहाने वह जीवन का द्वैत भी जीती है। मेहता और मालती का प्रेम एक प्रकार से लिव - इन - रिलेशनशिप का उदाहरण है। ‘गोदान’ ने प्रेमचन्द को हिन्दी साहित्य में वही स्थान दिया जो रूसी साहित्य में ‘मदर’ लिखकर मैक्सिम गोर्की को मिला। ‘सेवा सदन’ में एक वेश्या के बहाने प्रेमचन्द्र ने धर्म के नाम पर चलने वाले अनाथालयों एवं पाखण्डों का भण्डाफोड़ किया है। ‘कर्मभूमि’ में मुन्नी द्वारा बलात्कारी सिपाही की हत्या स्त्री-मुक्ति के संघर्ष का अनूठा साक्ष्य है। यही कारण है कि पे्रमचन्द को हर शख्स अपने करीब पाता है और अलग-अलग रूप में उनकी व्याख्या करता है । असहयोग आन्दोलन के कारण गाँधी जी से प्रभावित होकर सरकारी नौकरी से इस्तीफा देने के कारण किसी ने उन्हें गाँधीवादी कहा तो अपनी रचनाओं में वर्ग-संघर्ष को प्रमुखता से उभारने के कारण उन्हंे साम्यवादी अथवा वामपंथी कहा गया तो समाज में छुआछूत व दलितों की स्थिति पर लेखनी चलाने के कारण उन्हें दलित समर्थक कहा गया और नारी-मुक्ति को प्रश्रय देने के कारण उन्हंे नारी-समर्थक कहा गया।
साहित्य से इतर सामाजिक विमर्शों पर प्रेमचन्द के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं और उनकी रचनाओं के पात्र आज भी समाज में कहीं न कहीं जिन्दा हैं। प्रेमचन्द जब अपनी रचनाओं में समाज के उपेक्षित व शोषित वर्ग को प्रतिनिधित्व देेते हैं तो निश्चिततः इस माध्यम से वे एक युद्ध लड़ते हैं और गहरी नींद सोये इस वर्ग को जगाने का उपक्रम करते हैं। राष्ट््र आज भी उन्हीं समस्याओं से जूझ रहा है जिन्हें प्रेमचन्द ने काफी पहले रेखांकित कर दिया था, चाहे वह जातिवाद या साम्प्रदायिकता का जहर हो, चाहे कर्ज की गिरफ्त में आकर आत्महत्या करता किसान हो, चाहे नारी की पीड़ा हो, चाहे शोषण और सामाजिक भेद-भाव हो। इन बुराईयों के आज भी मौजूद होने का एक कारण यह है कि राजनैतिक सत्तालोलुपता के समानान्तर हर तरह के सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक आन्दोलन की दिशा नेतृत्वकर्ताओं को केन्द्र-बिन्दु बनाकर लड़ी गयी जिससे मूल भावनाओं के विपरीत आन्दोलन गुटों में तब्दील हो गये एवं व्यापक व सक्रिय सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा कुछ लोगों की सत्तालोलुपता की भेंट चढ़ गयी।
शुक्रवार, 30 जुलाई 2010
खुशियों का दिन : जन्मदिन आकांक्षा का

(हम दोनों का यह चित्र बिटिया अक्षिता (पाखी) ने लिया है)
लेबल:
आकांक्षा यादव,
जन्मदिन,
My Family
मंगलवार, 27 जुलाई 2010
सावन आया झूम के....
सावन मास की अपनी महत्ता है। सावन आज 27 जुलाई से आरंभ हो गया और 24 अगस्त तक रहेगा। सावन मास को श्रावण भी कहा जाता है। यह महीना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दौरान भक्ति, आराधना तथा प्रकृति के कई रंग देखने को मिलते हैं। श्रावण मास त्रिदेव और पंच देवों में प्रधान भगवान शिव की भक्ति को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि इस मास में विधिपूर्वक शिव उपासना करने से मनचाहे फल की प्राप्ति होती है। पौराणिक मान्यता है कि देव-दानव द्वारा किए गए समुद्र मंथन से निकले हलाहल यानि जहर का असर देव-दानव सहित पूरा जगत सहन नहीं कर पाया। तब सभी ने भगवान शंकर से प्रार्थना की। भगवान शंकर ने पूरे जगत की रक्षा और कल्याण के लिए उस जहर को पीना स्वीकार किया। विष पीकर शंकर नीलकंठ कहलाए। मान्यता है कि भगवान शंकर ने विष पान से हुई दाह की शांति के लिए समुद्र मंथन से ही निकले चंद्रमा को अपने सिर पर धारण किया। यह भी धार्मिक मान्यता है कि इस विष के प्रभाव को शांत करने के लिए भगवान शंकर ने गंगा को अपनी जटाओं में स्थान दिया। इसी धारणा को आगे बढ़ाते हुए भगवान शंकराचार्य ने ज्योर्तिलिंग रामेश्वरम पर गंगा जल चढ़ाकर जगत को शिव के जलाभिषेक का महत्व बताया।शास्त्रों के अनुसार भगवान शंकर ने समुद्र मंथन से निकले विष का पान श्रावण मास में ही किया था। धार्मिक दृष्टि से यही कारण है कि इस मास में
शिव आराधना का विशेष महत्व है। यह काल शिव भक्ति का पुण्य काल माना जाता है। शिव भक्तों द्वारा पूरी श्रद्धा, भक्ति और आस्था के साथ भगवान शिव की पूजा-अर्चना, अभिषेक, जलाभिषेक, बिल्वपत्र सहित अनेक प्रकार से की जाती है। इस काल में शिव की उपासना भौतिक सुखों को देने वाली होती है। व्यावहारिक रुप से देखें तो भगवान शंकर द्वारा विष पीकर कंठ में रखना और उससे हुई दाह के शमन के लिए गंगा और चंद्रमा को अपनी जटाओं और सिर पर धारण करना इस बात का प्रतीक है कि मानव को अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए। खास तौर पर कटु वचन से बचना चाहिए, जो कंठ से ही बाहर आते हैं और व्यावहारिक जीवन पर बुरा प्रभाव डालते हैं। किंतु कटु वचन पर संयम तभी हो सकता है, जब व्यक्ति मन को काबू में रखने के साथ ही बुद्धि और ज्ञान का सदुपयोग करे। शंकर की जटाओं में विराजित गंगा ज्ञान की सूचक है और चंद्रमा मन और विवेक का। गंगा और चंद्रमा को भगवान शंकर ने उसी स्थान पर रखा है जहां मानव का भी विचार केन्द्र यानि मस्तिष्क होता है।
शिव आराधना का विशेष महत्व है। यह काल शिव भक्ति का पुण्य काल माना जाता है। शिव भक्तों द्वारा पूरी श्रद्धा, भक्ति और आस्था के साथ भगवान शिव की पूजा-अर्चना, अभिषेक, जलाभिषेक, बिल्वपत्र सहित अनेक प्रकार से की जाती है। इस काल में शिव की उपासना भौतिक सुखों को देने वाली होती है। व्यावहारिक रुप से देखें तो भगवान शंकर द्वारा विष पीकर कंठ में रखना और उससे हुई दाह के शमन के लिए गंगा और चंद्रमा को अपनी जटाओं और सिर पर धारण करना इस बात का प्रतीक है कि मानव को अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए। खास तौर पर कटु वचन से बचना चाहिए, जो कंठ से ही बाहर आते हैं और व्यावहारिक जीवन पर बुरा प्रभाव डालते हैं। किंतु कटु वचन पर संयम तभी हो सकता है, जब व्यक्ति मन को काबू में रखने के साथ ही बुद्धि और ज्ञान का सदुपयोग करे। शंकर की जटाओं में विराजित गंगा ज्ञान की सूचक है और चंद्रमा मन और विवेक का। गंगा और चंद्रमा को भगवान शंकर ने उसी स्थान पर रखा है जहां मानव का भी विचार केन्द्र यानि मस्तिष्क होता है।सावन मास के दौरान ही कई प्रमुख त्योहार जैसे- हरियाली अमावस्या, नागपंचमी तथा रक्षा बंधन आदि भी आते हैं। सावन में प्रकृति अपने पूरे शबाब पर होती है इसलिए यह भी कहा जाता कि यह महीना प्रकृति को समझने व उसके निकट जाने का है। सावन की रिमझिम बारिश और प्राकृतिक वातावरण बरबस में मन में उल्लास व उमंग भर देती है। सावन में ही महिलाएं कजरी-गायन कर खूब रंग बिखेरती हैं. सावन का महीना पूरी तरह से शिव तथा प्रकृति को समर्पित है. तो आप भी हर-हर महादेव के जयकारे के साथ गाइए- सावन आया झूम के !!
बुधवार, 21 जुलाई 2010
लघु कथा : माँ /तारा निगम
मांमाँमाँ माँ ने बच्चे को खाना दिया, और जल्दी-जल्दी काम में लग गयी, बच्चे से बोली- बेटा, जल्दी खाले, मुझे आफिस जाना है।
चीं चीं चीं की आवाज से बच्चे का ध्यान ट्यूबलाइट पर बैठी चिडिया पर गया, वो मुंह में दाना दबाये थी और घोंसले से बच्चे चोंच निकालकर चीं चीं चीं कर रहे थे, चिडिया ने मुंह का दाना बारी-बारी से बच्चों के मुंह में डाल दिया और फिर से दाना लेने उड गयी।
बच्चे ने मां को दिखाया, देखो मां, चिडिया कैसे प्यार से अपने बच्चों को दाना ला लाकर खिला रही है। काश! मैं भी चिडिया का बच्चा होता!
((तारा निगम जी की यह लघुकथा पिछले दिनों दैनिक जागरण में पढ़ी थी. पसंद आई, सो यहाँ पर भी प्रस्तुत कर रहा हूँ.)
शुक्रवार, 16 जुलाई 2010
रूपये का चेहरा अब बदला-बदला सा
आपने रूपये का चेहरा देखा. कितना अजीब लगता था कि दुनिया की इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था के पास अपने रूपये का कोई चिन्ह तक नहीं है. खैर अमेरिकी डालर, जापानी येन, ब्रिटिश पौंड स्टलि’ग और यूरोपीय संघ के यूरो की तरह अब भारतीय रुपये को भी अपना चिह्न मिल गया है. केबिनेट ने कल रुपये के चिन्ह को मंजूरी दे दी। यह चिह्न भारतीय रुपए को विभिन्न भाषाओं में एक ही तरह से पेश करने में भी सहायक होगा। इससे भारतीय रुपए की पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका और इंडोनेशिया जैसे देशों की मुद्राओं से अलग पहचान बनेगी, जहाँ रुपया या रुपइया चलता है. भारतीय रूपये के इस इस चिन्ह को ‘यूनीकोड मानक, आईएसओ-आईईसी 10646 और आईएस 13194’ में शामिल करने के बाद इसका इस्तेमाल भारत और भारत के बाहर किया जा सकेगा।गौरतलब है कि इसके लिए तीन हजार एंट्रीज आई थी, जिसमें पांच को चुना गया था। आईआईटी के पोस्ट ग्रेजुएट डी उदय कुमार द्वारा डिजाइन किये गये चिन्ह को पांच प्रविष्टियों में चुना गया। यह चिन्ह हिन्दी का अक्षर ‘र’ है, जिसमें एक समानान्तर लाइन और डाली गयी है। यह अंग्रेजी के अक्षर ‘आर’ से भी काफी मिलता जुलता है। इसकी खूबसूरती पर हर कोई दंग है. अभिनेत्री सोनम कपूर के शब्दों पर गौर करें-''यह बहुत खूबसूरत है, यह भविष्योन्मुखी और भारतीयता से भरा है, यह आधुनिक भारत की तरह लगता है।’'
रूपये के इस नए चिन्ह को व्यावहारिक रूप में इस्तेमाल करने के लिए काफी तकनिकी पहलुओं से भी गुजरना पड़ेगा. चिह्न की एनकोडिंग के बाद नैसकॉम रुपए को सॉफ्टवेअर में शामिल करने के लिए भारतीय सॉफ्टवेअर विकास कंपनियों से संपर्क साधेगा ताकि दुनिया भर में कंप्यूटर इस्तेमाल करने वाले लोग इसका आसानी से उपयोग कर सकें, भले ही यह चिह्न कीबोर्ड पर न बना हो। गौरतलब है कि यूरो का निशान भारत में इस्तेमाल होने वाले कीबोर्ड में नहीं है लेकिन उसका इस्तेमाल होता है। भारत में बनने वाले कीबोर्ड में इस चिह्न को शामिल करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी निर्माता एसोसिएशन चिह्न की अधिसूचना जारी होने के बाद इसे कीबोर्ड में शामिल करने की पहल भी करेगा।रूपये के इस चिहन के इस्तेमाल के लिए भले ही लोग प्रोत्साहित हो रहे हैं, पर रूपये के निशान को भारतीय मानकों में एन्कोड करने की प्रक्रिया में छह महीने लगेगा जबकि यूनीकोड और अन्य मानकों में ऐसा करने के लिए अभी डेढ से दो साल का वक्त लगेगा । चिह्न को भारतीय मानकों में शामिल करने के लिए भारतीय मानक ब्यूरो की मौजूदा सूची में भी संशोधन करना होगा। इंडियन स्क्रिप्ट कोड फॉर इन्फॉरमेशन इंटरचेंज के तहत रुपए का चिह्न शामिल करना होगा. आईएससीआईआई ही कंप्यूटर प्रोसेसिंग के लिए कीबोर्ड ले-आउट सहित भारतीय भाषाओं के विभिन्न कोड की व्याख्या करता है।फ़िलहाल इंतजार रहेगा इस चिन्ह को वास्तविक रूप में आँखों से देखने और महसूस करने का.
सोमवार, 12 जुलाई 2010
भगवान को पाती
आपने वो वाली कहानी तो सुनी ही होगी, जिसमें एक किसान पैसों के लिए भगवान को पत्र लिखता है और उसका विश्वास कायम रखने के लिए पोस्टमास्टर अपने स्टाफ से पैसे एकत्र कर उसे मनीआर्डर करता है. दुर्भाग्यवश, पूरे पैसे एकत्र नहीं हो पाते और अंतत: किसान डाकिये पर ही शक करता है कि उसने ही पैसे निकाल लिए होंगे, क्योंकि भगवान जी कम पैसे कैसे भेज सकते हैं।
सवाल आस्था से जुड़ा हुआ है. कहते हैं आस्था में बड़ी ताकत होती है. अपनी आस्था प्रदर्शित करने के हर किसी के अपने तरीके हैं. कुछ लोग शांति के साथ पूजा करते हैं, तो कुछ मंत्रोच्चार के साथ अथवा भजन गाकर। लेकिन उड़ीसा के खुर्दा जिले में एक मंदिर ऐसा भी है, जहाँ लोग ईश्वर को पत्र लिखकर अपनी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए आराधना करते हैं। भुवनेश्वर से 50 किलोमीटर दूर यह मंदिर हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे का भी प्रतीक है। गुंबद पर जहाँ अर्द्धचंद्राकार कृति है, वहीं चक्र भी बना हुआ है।
इस मंदिर में पत्र लिखने की परंपरा की शुरुआत कब हुई, इसकी जानकारी तो किसी को नहीं है, लेकिन ऐसी मान्यता है कि पत्र लिखकर आप कोई इच्छा व्यक्त करते हैं, तो आपकी मनोकामना पूरी होगी। आपकी जो भी मनोकामना हो उसे लिख डालें और फिर उसे मंदिर की दीवार पर लगा दें। 17 वीं शताब्दी के इस बोखारी बाबा के मंदिर में प्रतिदिन हजारों लोग पहुंचते हैं। इसे सत्य पीर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ हिन्दू और मुस्लिम दोनों संप्रदाय के लोग पहुंचते हैं।
इस मंदिर की खासियत यह है कि यहाँ का पुजारी मुसलमान है, लेकिन दूध, और केले से बने भोग को हिन्दू तैयार करते हैं। यहाँ के धांदू महापात्र बड़े गर्व से बताए हैं कि हमारा परिवार पीढ़ियों से मंदिर में फूल पहुंचाता रहा है और अब मैं भी उसी परंपरा का निर्वाह कर रहा हूँ. यह स्थल सांप्रदायिक सद्भाव की जीती-जागती मिसाल है। यहाँ मुस्लिम श्रद्धालु चादर चढ़ाते हैं तो हिन्दू श्रद्धालु पुष्प अर्पित करते हैं। मंदिर के पुजारी सतार खान बताते हैं कि इस मंदिर में विभिन्न धर्मों के लोग आतें हैं।वे यहाँ कागज के टुकड़े पर अपनी मनोकामना लिखते हैं और फिर उसे दीवार पर लगा देते हैं। जब उनकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है तो दोबारा आते हैं और बोखारी बाबा को चादर अथवा फूल चढ़ाते हैं। उन्होंने कहा कि जो श्रद्धालु यहाँ आने में असमर्थ होते हैं, वे यहाँ पत्र भेज देते हैं और हम उसे दीवार पर लगा देते हैं। वाकई हम 21 वीं सदी में विज्ञानं के बीच भले ही जी रहे हों, पर ईश्वरीय आस्था जस की तस कायम है. यही हमारी परम्परा है, आस्था है, संस्कृति है...!!
गुरुवार, 8 जुलाई 2010
पाश्चात्य नहीं खुद के अन्दर झांकें
भारतीय संस्कृति की एक अक्षुण परम्परा है. दुनिया के प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद, वेदों की एक लाख श्रुतियों, उपनिषदों के ज्ञान, महाभारत के राजनैतिक दर्शन, गीता की समग्रता, रामायण के रामराज्य, पौराणिक जीवन दर्शन एवं भागवत दर्शन से लेकर संस्कृति के तमाम अध्याय और योग जैसी विधाओं के जनक भारत की उसी संस्कृति को आज पाश्चात्य संस्कृति से खतरा बताया जा रहा है. जिस योग की महिमा आज पूरे दुनिया में गई जा रही है, वह भारत की ही देन है. योगासनों का सबसे पहले उल्लेख पतंजलि योग सूत्र में मिलता है जिसकी रचना करीब दो हजार साल पहले हुई थी। हम योग को भले ही भुला बैठे पर पश्चिमी देशों ने उसे लपक लिया. यहाँ तक कि अमेरिका में प्राचीन भारतीय विद्या योग के आसनों के करीब 150 पेटेंट, 2,000 ट्रेडमार्क और 150 काॅपीराइट करा लिए गए हैं। यही नहीं अमेरिकी और यूरोप के पेटेंट कार्यालयों में योगासनों पर पेटेंट कराने के 250 दावे अब भी लंबित हैं।वस्तुतः हम भारतीय अपनी परम्परा, संस्कृति, ज्ञान और यहाँ तक कि महान विभूतियों को तब तक खास तवज्जो नहीं देते जब तक विदेशों में उसे न स्वीकार किया जाये। यही कारण है कि आज यूरोपीय राष्ट्रों और अमेरिका में योग, आयुर्वेद, शाकाहार, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, होम्योपैथी और सिद्धा जैसे उपचार लोकप्रियता पा रहे हैं जबकि हम उन्हें बिसरा चुके हैं। हमें अपनी जड़ी-बूटियों, नीम, हल्दी और गोमूत्र का ख्याल तब आता है जब अमेरिका उन्हें पेटेंट करवा लेता है। योग को हमने उपेक्षित करके छोड़ दिया पर जब वही ‘योगा’ बनकर आया तो हम उसके दीवाने बने बैठे हैं। अब जब योरोप और अमेरिका में योगासनों का धड़धड़ पेटेंट कराया जा रहा है, तो भारत को अपनी धरोहर का ख्याल आया और इसके बाद आरम्भ हुआ योग की संस्कृत भाषा की शब्दावली को विभिन्न विदेशी भाषाओं में अनुवाद करने का ताकि हम जोर देकर कह सकें कि योग विदेशों का नहीं बल्कि हमारी संस्कृति का अंग है। अब डिपार्टमेन्ट आफ आयुर्वेद, योग और नैचुरोपैथी, यूनानी, सिद्ध तथा होम्योपैथी के साथ मिलकर मोरारजी देसाई नेशनल इंस्टीट्यिूट आफ योग एवं पुणे का केवल धाम मिलकर योग के विभिन्न आसनों और योगिक क्रियाओं के संस्कृत नामों का अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मनी सहित पाँच भाषाओं में अनुवाद कर रहे हैं। यही नहीं इससे सतर्क हुई भारत सरकार अब आसनों की वीडियोग्राफी करा रही है जिन्हें अमेरिकी और यूरोप के पेटेंट, कार्यालयों को मुहैया कराया जाएगा ताकि और नुकसान रोका जा सके. पारंपरिक ज्ञान डिजीटल लाइब्रेरी (TKDL) द्वारा 900 योगासनों की वीडियोग्राफी कर उन्हें डिजीटल रूप दिया जा रहा रहा है। इनमें दो हजार वर्ष पुराने पंतजलि योग सूत्र, भगवद् गीता, अष्टांग हृदय, हठ प्रदीपिका, घेरंड संहिता और सांद्र सत्कर्म जैसे प्राचीन ग्रंथों से संदर्भ लिए गए हैं।
गौरतलब है कि हाल ही में मानव संसाधन विकास पर संसद की एक स्थायी समिति ने भी स्कूलों में योग शिक्षा आरम्भ करने पर जोर दिया था. आँकड़ों पर गौर करें तो 2005-06 के एक अनुमान के मुताबिक पश्चिमी देशों में तब योग विद्या विद्या से जुड़ा कारोबार अरबों डालर का था। अमेरिका में करीब 1.65 करोड़ लोग योगाभ्यास करते हैं और वहाँ की जनता हर वर्ष योग पर लगभग तीन अरब डालर का खर्च करती है। इसी तरह विदेशों में दिनों-ब-दिन आयुर्वेदिक दवाओं की माँग बढ़ती जा रही है। मौजूदा समय में प्रतिवर्ष 3000 करोड़ रुपये की आयुर्वेदित दवाइयाँ और इससे सम्बन्धित उत्पादों का भारत द्वारा विदेशों को निर्यात किया जा रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन, स्पेन, रूस और आस्ट्रेलिया को किये जाने वाले निर्यात में औसतन 25 फीसदी की बढ़ोत्तरी हो रही है। पाश्चात्य संस्कृति में पले-बसे लोग भारत आकर संस्कार और मंत्रोच्चार के बीच विवाह के बन्धन में बँधना पसन्द कर रहे हैं और हमें अपने ही संस्कार दरियाकनूसी और बकवास लगते हैं। वर्ष 2007 में अमेरिका के तमाम प्रान्तों की विधानसभाओं का सत्र और अमेरिकी सीनेट का सत्र हिन्दू वैदिक मंत्रोच्चार की गूँज के साथ आरम्भ हुआ। यही नहीं अमेरिकी गिरजाघरों में भी ऋग्वेद के मंत्र और भगवद्गीता के श्लोक गूंजने लगे हैं. इन सबसे प्रभावित होकर अमेरिका के रूट्जर्स विश्वविद्यालय ने हिन्दू धर्म से सम्बन्धित छः पाठ्यक्रम आरम्भ करने का फैसला लिया , जिसमें वाचन परम्परा, हिन्दू संस्कार महोत्सव, हिन्दू प्रतीक, हिन्दू दर्शन एवं हिन्दुत्व तथा आधुनिकता जैसे पाठ्यक्रम शामिल हैं तथा नान क्रेडिट कोर्स में योग और ध्यान तथा हिन्दू शास्त्रीय और लोकनृत्य शामिल किये गए हैं. और-तो-और अमेरिका में ‘रामायण रिबोर्न’ श्रृंखला वाली कामिक्स ने बैटमैन, सुपरमैन और स्पाइडरमैन को पीछे छोड़कर धूम मचा रखी है। अमेरिका की वरजिन कामिक्स द्वारा गाथम कामिक्स के साथ मिलकर 30 हिस्सों वाली इस श्रृखंला के प्रकाशन में सिर्फ रामायण आधारित कामिक्स ही नहीं अपितु भारतीय पात्रों जैसे साधू और देवी तथा नागिन को लेकर बनी कामिक्स भी धूम मचा रही हैं। निश्चिततः कर्म, भाग्य और समय जैसी भारतीय अवधारणाओं ने फन्तासियों पर आधारित अमेरिकी कामिक्स बाजार में भूचाल पैदा कर दिया।
पश्चिमी विज्ञान भी अब यह स्वीकारने लगा है कि भारतीय जीवन प्रतीको में दम है. एक दौर में पश्चिमी देशों के लोग भारत को सपेरों व जादूगरों के देश के रूप में पहचानते थे। धर्म व अध्यात्म के रस में लिपटे प्रतीकों को वे उपहास की वस्तु समझते थे। पर अब चीजें बदल रही हैं. वे हमारे अध्यात्म की तरफ उन्मुख हो रहे हैं. हाल ही में अमेरिका के रिसर्च ऐंड एक्सपेरीमेंटल इंस्टीट्यूट आॅफ न्यूरो साइंसेज के वैज्ञानिकों ने ऊँ के उच्चारण से शरीर में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन किया और पाया कि इसके नियमित प्रयोग से अनेक असाध्य रोग दूर हो गए।......अब जरुरत है कि हम भी अपनी संस्कृति को समझें और पश्चिम कि तरफ मुँह करके देखने की बजाय खुद के अन्दर झांकें !!
सोमवार, 5 जुलाई 2010
भारत बंद की दुहाई

मुट्ठियाँ ताने चंद लोग
हवाओं में नारेबाजी करते
बड़े-बड़े बैनर और दफ्तियाँ संभाले
पल भर में
पूरा भारत बंद कर देते हैं
वे दुहाई देते हैं
जनता के हितों की
आश्वासन देते हैं
एक सुखद भविष्य का
पर नहीं दिखता उन्हें
इस बंद में फंसे लोगों का हित
जिनका आज का भविष्य
शायद यही होगा कि
बच्चों की कक्षायें
छूट गयी होंगी
आॅफिस लेट पहुँचने वालों को
बाॅस की डाँट सुननी होगी
कोई मरीज अस्पताल न पहुँचने पर
दम तोड़ रहा होगा
या कोई बेरोजगार युवा
साक्षात्कार में शामिल न हो पाने पर
अपना सिर पीट रहा होगा !!
हवाओं में नारेबाजी करते
बड़े-बड़े बैनर और दफ्तियाँ संभाले
पल भर में
पूरा भारत बंद कर देते हैं
वे दुहाई देते हैं
जनता के हितों की
आश्वासन देते हैं
एक सुखद भविष्य का
पर नहीं दिखता उन्हें
इस बंद में फंसे लोगों का हित
जिनका आज का भविष्य
शायद यही होगा कि
बच्चों की कक्षायें
छूट गयी होंगी
आॅफिस लेट पहुँचने वालों को
बाॅस की डाँट सुननी होगी
कोई मरीज अस्पताल न पहुँचने पर
दम तोड़ रहा होगा
या कोई बेरोजगार युवा
साक्षात्कार में शामिल न हो पाने पर
अपना सिर पीट रहा होगा !!
(आज भारत-बंद की घोषणा की गई है. पर क्या वाकई इसका कोई अर्थ है. इस कविता के माध्यम से महसूस कीजिये उन लोगों का दर्द जो आज इसके शिकार होने जा रहे हैं )
सोमवार, 28 जून 2010
अंडमान के मड-वोल्केनो (कीचड़ वाले ज्वालामुखी)
विश्व में अधिकतर पंक ज्वालामुखी काला सागर व कैस्पियन सागर के तटों पर मिलते हैं। इनमें वेनेजुएला, ताइवान, इंडानेशिया, रोमानिया और अजरबैजान के बाकू शहर प्रसिद्ध हैं। अब तक कुल खोजे गए 700 पंक ज्वालामुखी में से 300 पूर्वोतर अजरबैजान व कैस्पियन सागर में हैं। सबसे विशाल पंक ज्वालामुखी कैस्पियन सागर क्षेत्र में पाया गया है, जो कि लगभग एक कि0मी0 चैड़ा व उंचाई सैकड़ा मी0 में है। समुद्र के अंदर से तरल पदार्थ बाहर निकलने का पंक ज्वालामुखी एक प्रमुख स्रोत है। जहाँ सामान्य ज्वालामुखी में भूपटल को फोड़कर पिघले पत्थर, राख, वाष्प व लावा निकलते है, वहीं पंक ज्वालामुखी से कीचड़, गैस व पत्थर निकलते हैं। उत्सर्जन के दौरान निकला कीचड़ गर्म नहीं अपितु ठण्डा होता है। 
बंगाल की खाड़ी में स्थित भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के बाराटांग द्वीप में जारवा क्रीक गाँव में 18 फरवरी 2003 की सांय 7:45 बजे सर्वप्रथम पंक ज्वालामुखी का उद्भव हुआ। जबरदस्त विस्फोट के साथ उत्पन्न इस प्रक्रिया में थोड़ा कंपन भी महसूस हुआ। इससे पूर्व 1983 में इसी जगह दरार पड़ गई थी। अंतिम बार यह 26 दिसम्बर 2004 को जबरदस्त विस्फोट व कंपन के साथ उत्सर्जित हुआ था।
फिलहाल अंडमान में इस तरह के 11 पंक ज्वालामुखी पाए गए हैं, जिनमें से 08 बाराटांग व मध्य अंडमान में एवं 03 डिगलीपुर (उत्तरी अंडमान) में अवस्थित हैं। ये पंक ज्वालामुखी 1000-1200 वर्ग मी0 के क्षेत्र में विस्तृत हैं और लगभग 30 मी0 व्यास व 2 मी0 उंचे अर्धवृत्ताकार टिब्बे का निर्माण करते हैं। इनके चलते विवर्तनिक रुप से अस्थायी भू-भागों का निर्माण होता है और कालांतर में ऐसी परिघटनाओं से ही नए द्वीपों का भी निर्माण होता है। ये मानव व मानवीय संपत्ति को नुकसान पहुंचा सकते हैं। फिलहाल ये पर्यटकों के लिए आर्कषण का केद्र-बिन्दु हैं।
(जनसत्ता में 13 जून, 2010 को प्रकाशित : इसे आप पाखी की दुनिया में भी पढ़ सकते हैं )
सोमवार, 21 जून 2010
सुबह का अख़बार
आज सुबह का अख़बार देखा
वही मार-काट, हत्या और बलात्कार
रोज पढ़ता हूँ इन घटनाओं को
बस पात्रों के नाम बदल जाते हैं
क्या हो गया है इस समाज को
ये घटनायें उसे उद्वेलित नहीं करतीं
सिर्फ ख़बर बनकर रह जाती हैं
कोई नहीं सोचता कि यह घटना
उसके साथ भी हो सकती है
और लोग उसे अख़बारों में पढ़कर
चाय की चुस्कियाँ ले रहे होंगे।
वही मार-काट, हत्या और बलात्कार
रोज पढ़ता हूँ इन घटनाओं को
बस पात्रों के नाम बदल जाते हैं
क्या हो गया है इस समाज को
ये घटनायें उसे उद्वेलित नहीं करतीं
सिर्फ ख़बर बनकर रह जाती हैं
कोई नहीं सोचता कि यह घटना
उसके साथ भी हो सकती है
और लोग उसे अख़बारों में पढ़कर
चाय की चुस्कियाँ ले रहे होंगे।
शुक्रवार, 18 जून 2010
रानी लक्ष्मीबाई का दुर्लभतम फोटोग्राफ

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का यह दुर्लभ फोटो 160 साल पहले अर्थात वर्ष 1850 में कोलकाता में रहने वाले अंग्रेज फोटोग्राफर जॉनस्टोन एंड हॉटमैन ने खींचा था। इस फोटो को पिछले वर्ष 19 अगस्त, 2009 को भोपाल में आयोजित विश्व फोटोग्राफी प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया गया था। यह चित्र अहमदाबाद के एक पुरातत्व महत्व की वस्तुओं के संग्रहकर्ता अमित अम्बालाल ने भेजा था। माना जाता है कि रानी लक्ष्मीबाई का यही एकमात्र फोटोग्राफ उपलब्ध है।
!! आज ही रानी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि भी है, पुनीत स्मरण !!
लेबल:
जानकारी,
नारी-सशक्तिकरण,
विशेष दिवस
मंगलवार, 15 जून 2010
मानवता के दुश्मन
रात का सन्नाटा
अचानक चीख पड़ती हैं मौतें
किसी ने हिन्दुओं को दोषी माना
तो किसी ने मुसलमां को
पर किसी ने नहीं सोचा कि
न तो ये हिंदू थे न मुसलमां
बस मानवता के दुश्मन थे।
अचानक चीख पड़ती हैं मौतें
किसी ने हिन्दुओं को दोषी माना
तो किसी ने मुसलमां को
पर किसी ने नहीं सोचा कि
न तो ये हिंदू थे न मुसलमां
बस मानवता के दुश्मन थे।
शुक्रवार, 11 जून 2010
मौत
आज मैंने मौत को देखा!
अर्द्धविक्षिप्त अवस्था में हवस की शिकार
वो सड़क के किनारे पड़ी थी!
ठण्डक में ठिठुरते भिखारी के
फटे कपड़ों से वह झांक रही थी!
किसी के प्रेम की परिणति बनी
मासूम के साथ नदी में बह रही थी!
नई-नवेली दुल्हन को दहेज की खातिर
जलाने को तैयार थी!
साम्प्रदायिक दंगों की आग में
वह उन्मादियों का बयान थी!
चंद धातु के सिक्कों की खातिर
बिकाऊ ईमान थी!
आज मैंने मौत को देखा!
अर्द्धविक्षिप्त अवस्था में हवस की शिकार
वो सड़क के किनारे पड़ी थी!
ठण्डक में ठिठुरते भिखारी के
फटे कपड़ों से वह झांक रही थी!
किसी के प्रेम की परिणति बनी
मासूम के साथ नदी में बह रही थी!
नई-नवेली दुल्हन को दहेज की खातिर
जलाने को तैयार थी!
साम्प्रदायिक दंगों की आग में
वह उन्मादियों का बयान थी!
चंद धातु के सिक्कों की खातिर
बिकाऊ ईमान थी!
आज मैंने मौत को देखा!
सोमवार, 7 जून 2010
ये इन्सान
यह कैसा देश है
जहाँ लोग लड़ते हैं मजहब की आड़ में
नफरत के लिए
पर नहीं लड़ता कोई मोहब्बत की खातिर।
दूसरों के घरों को जलाकर
आग तापने वाले भी हैं
पर किसी को खुद के जलते
घर को देखने की फुर्सत नहीं।
एक वो भी हैं जो खुद को जलाकर
दूसरों को रोशनी देते हैं
पर नफरत है उन्हें उस रोशनी से भी
कहीं इस रोशनी में उनका चेहरा न दिख जाये।
फिर भी वे अपने को इंसान कहते हैं
पर उन्हें इंसानियत का पैमाना ही नहीं पता
डरते हैं वे अपने अंदर के इंसान को देखने से
कहीं यह उनको ही न जला दे।
जहाँ लोग लड़ते हैं मजहब की आड़ में
नफरत के लिए
पर नहीं लड़ता कोई मोहब्बत की खातिर।
दूसरों के घरों को जलाकर
आग तापने वाले भी हैं
पर किसी को खुद के जलते
घर को देखने की फुर्सत नहीं।
एक वो भी हैं जो खुद को जलाकर
दूसरों को रोशनी देते हैं
पर नफरत है उन्हें उस रोशनी से भी
कहीं इस रोशनी में उनका चेहरा न दिख जाये।
फिर भी वे अपने को इंसान कहते हैं
पर उन्हें इंसानियत का पैमाना ही नहीं पता
डरते हैं वे अपने अंदर के इंसान को देखने से
कहीं यह उनको ही न जला दे।
शनिवार, 5 जून 2010
पाठ्यक्रमों से परे पर्यावरण को रोज के व्यवहार से जोड़ने की जरुरत
सौभाग्य से आज विश्व पर्यावरण दिवस है। लम्बे-लम्बे भाषण, दफ्ती पर स्लोगन लेकर चलते बच्चे, पौधारोपण के कुछ सरकारी कार्यक्रम....शायद कल के अख़बारों में पर्यावरण दिवस को लेकर यही कुछ दिखेगा और फिर हम भूल जायेंगे. हम कभी साँस लेना नहीं भूलते, पर स्वच्छ वायु के संवाहक वृक्षों को जरुर भूल गए हैं। यही कारण है की नित नई-नई बीमारियाँ जन्म ले रही हैं. इन बीमारियों पर हम लाखों खर्च कर डालते हैं, पर अपने पर्यावरण को स्वस्थ व स्वच्छ रखने के लिए पाई तक नहीं खर्च करते.
एक दिन मेरी बिटिया अक्षिता बता रही थी कि पापा, आज स्कूल में टीचर ने बताया कि हमें अपने पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए। पहले तो पेड़ काटो नहीं और यदि काटना ही पड़े तो एक की जगह दो पेड़ लगाना चाहिए। पेड़-पौधे धरा के आभूषण हैं, उनसे ही पृथ्वी की शोभा बढती है और पर्यावरण स्वच्छ रहता है। पहले जंगल होते थे तो खूब हरियाली होती, बारिश होती और सुन्दर लगता पर अब जल्दी बारिश भी नहीं होती, खूब गर्मी भी पड़ती है...लगता है भगवान जी नाराज हो गए हैं. इसलिए आज सभी लोग संकल्प लेंगें कि कभी भी किसी पेड़-पौधे को नुकसान नहीं पहुँचायेंगे, पर्यावरण की रक्षा करेंगे, अपने चारों तरफ खूब सारे पौधे लगायेंगे और उनकी नियमित देख-रेख भी करेंगे. अक्षिता के नन्हें मुँह से कही गई ये बातें मुझे देर तक झकझोरती रहीं। आखिर हम बच्चों में प्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा के संस्कार क्यों नहीं पैदा करते. मात्र स्लोगन लिखी तख्तियाँ पकड़ाने से पर्यावरण का उद्धार संभव नहीं है. इस ओर सभी को तन-मन-धन से जुड़ना होगा. अन्यथा हम रोज उन अफवाहों से डरते रहेंगे कि पृथ्वी पर अब प्रलय आने वाली है. पता नहीं इस प्रलय के क्या मायने हैं, पर कभी ग्लोबल वार्मिंग, कभी सुनामी, कभी कैटरीना व आईला चक्रवात तो कभी बाढ़, सूखा, भूकंप, आगजनी और अकाल मौत की घटनाएँ ॥क्या ये प्रलय नहीं है? गौर कीजिये इस बार तो चिलचिलाती ठण्ड के तुरंत बाद ही चिलचिलाती गर्मी आ गई, हेमंत, शिशिर, बसंत का कोई लक्षण ही नहीं दिखा..क्या ये प्रलय नहीं है. अभी भी वक़्त है, हम चेतें अन्यथा प्रकृति कब तक अनावृत्त होकर हमारे अनाचार सहती रहेंगीं. जिस प्रलय का इंतजार हम कर रहे हैं, वह इक दिन इतने चुपके से आयेगी कि हमें सोचने का मौका भी नहीं मिलेगा.
ऐसे में जरुरत हें कि हम खुद ही चेतें और प्रकृति व पर्यावरण के संरक्षण को मात्र पाठ्यक्रमों व कार्यक्रमों की बजाय अपने दैनिंदिन व्यवहार का हिस्सा बनायें. आज पर्यावरण के प्रति लोगों को सचेत करने के लिए सामूहिक जनभागीदारी द्वारा भी तमाम कदम उठाये जा रहे हैं. मसलन, फूलों को तोड़कर उपहार में बुके देने की बजाय गमले में लगे पौधे भेंट किये जाएँ. स्कूल में बच्चों को पुरस्कार के रूप में पौधे देकर, उनके अन्दर बचपन से ही पर्यावरण संरक्षण का बोध कराया जा सकता है. जीवन के यादगार दिनों मसलन- जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगाँठ या अन्य किसी शुभ कार्य की स्मृतियों को सहेजने के लिए पौधे लगायें और उनका पोषण करें. री-सायकलिंग द्वारा पानी की बर्बादी रोकें और टॉयलेट इत्यादि में इनका उपयोग करें. पानी और बिजली का अपव्यय रोकें. फ्लश का इस्तेमाल कम से कम करें. शानो-शौकत में बिजली की खपत को स्वत: रोकें. सूखे वृक्षों को भी तभी काटा जाय, जब उनकी जगह कम से कम दो नए पौधे लगाने का प्रण लिया जाय. अपनी वंशावली को सुरक्षित रखने हेतु ऐसे बगीचे तैयार किये जा सकते हैं, जहाँ हर पीढ़ी द्वारा लगाये गए पौधे मौजूद हों. यह मजेदार भी होगा और पर्यावरण को सुरक्षित रखने की दिशा में एक नेक कदम भी. हमारे पूर्वजों ने यूँ ही नहीं कहा है कि- 'एक वृक्ष - दस पुत्र सामान.'
लेबल:
जागरूकता,
जानकारी,
प्रकृति और पर्यावरण,
लेख,
विशेष दिवस,
सन्देश
गुरुवार, 3 जून 2010
शनिवार, 29 मई 2010
अंडमान-निकोबार में रवीद्रनाथ टैगोर 150वीं जयंती समारोह का शुभारम्भ
महान कवि रवीद्रनाथ टैगोर की 150 वीं जयंती पर अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर में पिछले दिनों वर्ष भर चलने वाले भव्य समारोह का आगाज़ हुआ। अंडमान पीपुल थिएटर एसोसिएशन, आप्टा द्वारा आयोजित इस कवि गुरू नमन का उद्घाटन एम्फी थिएटर के खुले रंगमंच पर अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के डाक निदेशक एवं साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव द्वारा किया गया।
मुख्य अतिथि के रूप में कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि रवीद्रनाथ टैगोर जैसा व्यक्तित्व किसी समाज या किसी देश की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता, ऐसे व्यक्तित्व समूची मानवता के थाती होते हैं। रवीद्रनाथ टैगोर न सिर्फ़ कवि, साहित्यकार, संगीतकार, चित्रकार इत्यादि थे बल्कि वे मानवतावाद के अग्रणी पोषक भी थे। एक जमींदार घराने से होते हुए भी उन्होंने ग्रामीण किसानों के लिए कार्य किया। वह पहले कवि थे, जिन्होंने प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होकर भारत को पहला नोबेल तो दिलवाया ही, पराधीन भारत के आहत स्वाभिमान को एक बार फिर सिर उठाने का अवसर दिया। श्री यादव ने बताया कि मात्र सात साल की उम्र में लिखना आरम्भ करने वाले रवीद्रनाथ टैगोर ने 1920 में भावनगर, गुजरात में आयोजित छठे गुजराती साहित्य परिषद में गाँधी जी के आग्रह पर बतौर अध्यक्ष अपना पहला भाषण हिन्दी में दिया।
वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के सदस्य श्री गोविन्द राजू ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। उन्होंने सभी भाषा-भाषियों से अनुरोध किया कि वे भी टैगोर के 150 वीं जयंती कार्यक्रम को मनाएँ। द्वीपों के जाने-माने बंगला साहित्य के रचनाकार और वाक-प्रतिमा के संपादक इस अवसर पर विशिष्ट सम्माननीय अतिथि थे। उन्होंने कवि गुरू रवीद्रनाथ टैगोर के संक्षिप्त जीवन दर्शन का परिचय दिया। साथ ही उनकी कुछ चुनिंदा रचनाओं का बोध कराया। 
वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के सदस्य श्री गोविन्द राजू ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। उन्होंने सभी भाषा-भाषियों से अनुरोध किया कि वे भी टैगोर के 150 वीं जयंती कार्यक्रम को मनाएँ। द्वीपों के जाने-माने बंगला साहित्य के रचनाकार और वाक-प्रतिमा के संपादक इस अवसर पर विशिष्ट सम्माननीय अतिथि थे। उन्होंने कवि गुरू रवीद्रनाथ टैगोर के संक्षिप्त जीवन दर्शन का परिचय दिया। साथ ही उनकी कुछ चुनिंदा रचनाओं का बोध कराया। कार्यक्रम में रवीन्द्र संगीत, कहानी, कविता, गीतांजलि पर श्री प्रकाश की पेंटिंग तथा रक्त कोरणी ; लाल कनेर नाटक के अंश प्रस्तुत किए गए। इसे आप्टा के निदेशक नरेश चन्द्र लाल ने प्रस्तुत की। श्री निमोय चन्द्र बनर्जी ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
(रिपोर्ट : नरेश चन्द्र लाल)
(इस समाचार को आप सृजनगाथा, साहित्यशिल्पी, स्वतंत्र आवाज़ , युग मानस पर भी देख सकते हैं )
(रिपोर्ट : नरेश चन्द्र लाल)
(इस समाचार को आप सृजनगाथा, साहित्यशिल्पी, स्वतंत्र आवाज़ , युग मानस पर भी देख सकते हैं )
शुक्रवार, 28 मई 2010
टैगोर का शांति निकेतन विश्व धरोहर बनने की ओर
ऐसे में टैगोर की 150वीं जयंती के अवसर पर शन्ति निकेतन की महत्ता और प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है. यही कारण है की गुरुदेव की इस पवन कर्मस्थली को यूनेस्को विश्व धरोहर क़ी सूची में शामिल कराने हेतु भारत सरकार ने पहल आरंभ कर दी है. यदि यह अनुपम पहल कामयाब होती है तो शांति निकेतन को भारत क़ी 30वीं विश्व धरोहर होने का गौरव प्राप्त हो सकेगा और टैगोर जी को उनकी 150 वीं जयंती पर इससे सुन्दर और सार्थक स्मरण क्या हो सकता है !!
मंगलवार, 25 मई 2010
कितने सुंदर हैं गुब्बारे
सरस पायस पर प्रकाशित मेरी बाल कविता कितने सुंदर हैं गुब्बारे का लुत्फ़ आप भी उठाइए। रावेन्द्रकुमार रवि जी ने इसमें कुछेक परिवर्तन कर इसे और भी रोचक बना दिया है... आभार !!

गुब्बारों की दुनिया होती,
कितनी-प्यारी और निराली।
हँस देते रोनेवाले भी,
खिल जाती चेहरे पर लाली।
हम सब दौड़ें इनके पीछे,
कसकर पकड़े इन्हें हाथ में।
सीना ताने घूम रहे हैं,
हम सब इनको लिए साथ में।

लाल-बैंगनी-हरे-गुलाबी,
रंग-बिरंगे हैं ये प्यारे।
एक नहीं हैं इतने सारे,
कितने सुंदर हैं गुब्बारे।
रंग-बिरंगे हैं ये प्यारे।
एक नहीं हैं इतने सारे,
कितने सुंदर हैं गुब्बारे।
गुब्बारों की दुनिया होती,
कितनी-प्यारी और निराली।
हँस देते रोनेवाले भी,
खिल जाती चेहरे पर लाली।
हम सब दौड़ें इनके पीछे,
कसकर पकड़े इन्हें हाथ में।
सीना ताने घूम रहे हैं,
हम सब इनको लिए साथ में।
सोमवार, 24 मई 2010
लाल गुलाबों का सत्याग्रह-डे
सल्लू मियाँ हमारे लिए सिर्फ दर्जी ही नहीं वरन् अच्छे मित्र भी हैं। उम्र कोई पचपन साल पर बातें ऐसी चुटीली कि जवान भी शर्मा जायें। सल्लू मियाँ की सबसे बड़ी खासियत ‘गाँधी टोपियों‘ को सिलने की है। वे बेसब्री से चुनावी रैलियों और गाँधी जयन्ती का इन्तजार करते कि कब उनको गाँधी टोपियों का आर्डर मिले और वे अपने सिर पर से लोगों के कर्ज का बोझ उतार सकें। पर ईधर नई पीढ़ी में गाँधी टोपी के प्रति बढ़ती उदासीनता ने उनके माथे पर सलवटें ला दी थीं। इस उम्र में नौकरी भी नहीं मिल सकती थी और न ही इतना पैसा था कि कोई नया व्यवसाय शुरू किया जा सके। इसी बीच मुझे ट्रेनिंग के लिए एक महीने बाहर जाना पड़ा। ट्रेनिंग से लौटकर जब बाजार घूमने गया तो सल्लू मियाँ की टेलरिंग की दुकान गायब थी और उसकी जगह गुलाब के फूलों की एक चमचमाती दुकान खड़ी थी। तभी अचानक उस दुकान के अन्दर से सल्लू मियाँ निकले तो मैं अवाक्् उनको देखते रह गया। लकालक सफेद कुर्ता - पायजामा और गाँधी टोपी पहने सल्लू मियाँ पहचान में ही नहीं आ रहे थे। मेरी तरफ नजर पड़ते ही वे दोनों बाँहें फैलाए दौड़े और मुझे खींचते हुए अन्दर ले गए। अभी मैं दुकान का पूरा जायजा भी नहीं ले पाया था कि सल्लू मियाँ की तरह ही कपड़े पहने उनके छोटे पुत्र ने मेरे हाथ में गुलाब का एक फूल थमाते हुए कहा- वेलकम अंकल जी! हमारी नई दुकान में आपका स्वागत है। इससे पहले कि मैं कुछ बोलता, सल्लू मियाँ ने मुझे कुर्सी खींचते हुए बैठाया और अपने बेटे को दो बोतल कोल्ड ड्रिंक लाने को कहा। सल्लू मियाँ! ये सब मैं क्या देख रहा हूँ...... और आपकी वो दर्जी वाली दुकान। कुछ नहीं भाई साहब, सब वक्त का फेर है। हुआ यूँ कि पिछले दिनों मैं थिएटर में ‘‘लगे रहो मुन्ना भाई’’ फिल्म देखने गया और उसमें संजय दत्त की जो गाँधीगिरी देखी तो लगा कि अब गाँधी टोपी की बजाय लाल गुलाब का ही जमाना है। फिर क्या था, अपने घर के पीछे धूल-धूसरित हो रही बागवानी के शौक को फिर से जिन्दा किया और चारों तरफ गुलाबों की बगिया ही लगा दी एवं इस बीच बाजार से कुछ गुलाब के फूल खरीद कर ये दुकान सजा ली। अब तो लोग मुन्ना भाई स्टाइल में सत्याग्रह करते हैं और लोगों को गुलाब के फूल बाँटते हैं, गाँधी टोपी तो कोई पहनता ही नहीं। मेरा काम बस इतना है कि जब भी किसी धरने या विरोध की खबर पाता हूँ तो वहाँ पहुँच जाता हूँ और उन्हें समझाता हूँ कि अब धरना, पोस्टरबाजी व नारेबाजी पुरानी चीजें हो गई हैं। अब तो अपने विरोधी को या जन समस्याओं की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट करने हेतु गुलाब का फूल देकर प्रदर्शन किया जाता है, जिसको मीडिया भी बढा़-चढ़ाकर कवरेज देता है। बस उनके दिमाग में यह बात घुसते ही मेरा धंधा शुरू हो जाता है। अगर सौ गुलाब के फूल भी एक धरना या विरोध प्रदर्शन के दौरान बिके, तो कम से कम पाँच सौ रुपये का मुनाफा तो पक्का है। पर यह धंधा यहीं नहीं खत्म होता, प्रदर्शनकारियों के अलावा उसको भी पकड़ना होता है, जिसके विरुद्ध प्रदर्शन किया जा रहा हो। उसे समझाना पड़ता है कि ये फूल आखिर उसके किस काम के! आखिर वह उन्हें अगले दिन तो फेंक ही देगा। उस पर से सफाई का झंझट अलग से। बस फिर क्या है- ईधर प्रदर्शनकारियों ने उस अधिकारी को विरोधस्वरूप गुलाब के फूल दिये और कैमरे के फ्लैशों के बीच मीडिया ने उनकी फोटो उतारी, उसके कुछ देर बाद ही सारा तमाशा खत्म और फिर मैं उन फूलों को वहाँ से उठवा लेता हूँ। ये गुलाब फिर से मेरे दुकान की शोभा बढ़ाते हैं और शाम तक फिर कोई प्रदर्शनकारियों का झुंड इन्हें खरीदकर सत्याग्रह की राह पर विरोध करने निकल पड़ता है। यानी आम के आम और गुठलियों के दाम।
सल्लू मियाँ का सत्याग्रही लाल गुलाबों का व्यवसाय दिनों-ब-दिन बढता जा़ रहा है। अपने एक बेरोजगार बेटे को उन्होंने प्रदर्शनकारियों को सत्याग्रही गुलाबों के फूलों की आपूर्ति हेतु तो दूसरे बेरोजगार बेटे को प्रदर्शन पश्चात् अधिकारियों के यहाँ से सत्याग्रही गुलाबों के फूलों के इकट्ठा करने का कार्य सौंप दिया है और स्वयं अखबारों में रोज ‘‘आज के कार्यक्रम’’ पढ़कर देखते हैं कि किस संगठन द्वारा, किस अधिकारी के विरुद्ध व कहाँ पर प्रदर्शन होना है। अभी तक वेलेण्टाइन डे पर लाल गुलाब के फूलों की बिक्री सिर्फ एक दिन होती थी और कभी-कभी किसी उत्सव या पर्व पर। पर सल्लू मियाँ के लिए लाल गुलाब के फूलों के सत्याग्रह-डे ने चीजें काफी आसान कर दिया है। दोनों बेटों के स्वरोजगार ने उनके माथे की सलवटों व रोज की उधारी की मारा-मारी से मुक्त कर दिया है। कभी-कभी अखबारों व टी0वी0 पर भी उनका चेहरा दिख जाता है, यह बताते हुए कि शहर में कई सत्याग्रहों के चलते आज गुलाब के फूलों की दुगनी-चैगुनी बिक्री रही। अब वे गुलाब के फूलों की भारी खरीद पर गाँधीवादी साहित्य को प्रचारित करती किताबें फ्री में देने की योजना बना रहे हैं ताकि ये तथाकथित लाल गुलाब वाले सत्याग्रही घर जाकर गाँधी जी की अन्य विचारधाराओं को भी जान सकें।
(इसे वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में भी पढ़ सकते हैं)

गुरुवार, 20 मई 2010
सात जन्मों तक इनकमिंग फ्री
मोहन बाबू हमारे पड़ोसी ही नहीं अभिन्न मित्र भी हैं। कहने को तो वे सरकारी विभाग में क्लर्क हैं पर सामान्यता क्लर्क की जो इमेज होती है, उससे काफी अलग हैं.... एकदम ईमानदार टाइप के। कभी-कभी तो महीना खत्म होने से पहले ही उधारी की नौबत आ जाती। उनकी बीबी रोज ताना देती- श्क्या ईमानदारी का अचार डालोगे? अपनेे साथ के लोगों को देखो। हर किसी ने निजी मकान बनवा लिया है, गाड़ी खरीद ली है, बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ने जाते हैं और तो और उनकी बीबियाँ कितने शानो-शौकत से रहती हंै और एक तुम हो जो साड़ियाँ खरीदने के नाम पर ही तुनक जाते हो। मुझे तो याद भी नहीं कि अन्तिम बार तुमने मुझे कब साड़ी खरीद कर दी थी। वो तो मैं अगर तुम्हारी जेब से रोज कुछ न कुछ गायब न करूँ तो रिश्तेदारी में भी जाना मुश्किल हो जाय. इधर मोहन बाबू की बीबी ने एक नई रट लगा रखी थी- मोबाइल फोन खरीदने की।हुआ यूँ कि पिछले दिनों मोहन बाबू की बीबी अपने मायके गयीं और वहाँ अपनी भाभी के हाथ में मोबाइल फोन देखा। जब तक उनके भैया के पास मोबाइल फोन था, तब तक तो ठीक था पर अब भाभी ही नहीं उनके बच्चों के पास भी मोबाइल फोन है। ऐसा नहीं कि उनके भैया किसी बहुत बड़े पद पर हैं, वरन् पी0 डब्ल्यू0 डी0 मंे एक मामूली क्लर्क हैं। भाभी के मुँह से भैया के रूतबे के किस्से उन्होंने खूब सुन रखे हैं कि कैसे अच्छे-अच्छे ठेकेदार और नेता उनके सामने पानी भरते हंै। जिस समय मोहन बाबू से उनकी शादी हुयी, उस समय तक भैया को नौकरी नहीं मिली थी, पर नौकरी मिलने के दस साल के अन्दर ही उनके ठाठ-बाट साहबों वाले हो गए। मोहल्ले में अपना रूतबा झाड़ने के लिए उन्होंने एक सेकेण्ड हैण्ड मारूति कार खरीद ली और गेट पर एक झबरे बालों वाला कुत्ता बाँध लिया, जो भाभी की नजर में साहब लोगों की विशिष्ट पहचान होती है। एक बार भाभी के मुँह से कुत्ते के लिए कुत्ता शब्द निकल गया तो भैया झल्ला उठे थे- श्जिन्दगी भर गँवार ही रह जाओगी। अरे! कुत्ता उसे कहते हैं जो सड़कों पर आवारा फिरते हैं। इसे तो टाॅमी कहते हैं।श् फिर क्या था, तब से झबरे बालों वाला कुत्ता टाॅमी हो गया। टाॅमी जितनी बार पड़ोसियों को देखकर भौंकता, भाभी उतनी बार अपने पति की साहबी पर गुमान करतीं।
मोहन बाबू भी दिल से चाहते हैं कि एक मोबाइल फोन उनके पास हो जाय तो काफी सुविधा होगी। लैण्डलाइन फोन में वैसे भी कई समस्यायें आती हैं, मसलन- महीने में दस दिन तो डेड ही पड़ा रहता, उस पर से फोन का बिल इतना आता कि मानो आस-पड़ोस के लोगांे का भी बिल उसमें जोड़ दिया गया हो। फिर फोन का बिल सही करवाने के लिए टेलीफोन-विभाग का चक्कर काटो। एक तो बिना रिश्वत दिए वे बिल ठीक नहीं करते और उस पर से उस दिन के लिए दफ्तर से छुट्टी लेनी पड़ती है।
जब मोहन बाबू ने अपनी बीबी से मोबाइल फोन लेने की चर्चा की तो मानो उनको मुँहमाँगी मुराद मिल गयी हो। एक लम्बे अर्से बाद उस दिन मोहन बाबू की बीबी ने खूब मन से खाना बनाया और प्यार भरे हाथों से उन्हें खिलाया। मोहन बाबू की बीबी उस रात को सपने में देख रही थीं कि उनके घर में भी मोबाइल फोन आ गया है और जैसे ही मोबाइल फोन की घण्टी बजी, उन्होंने पहले से तैयार आरती की थाली को उस पर घुमाया और फिर मोबाइल फोन को स्टाइल में कानों के पास लगाकर बोलीं-हलो! ऊधर से आवाज आयी-कौन बोल रही हैं?.... मैं मिसेज मोहन बोल रही हूँ, किससे बात करनी है आपको? जी, मुझे शर्मिला से बात करनी है.... कौन शर्मिला..... अच्छा तो आवाज बदलकर पूछ रही हो, कौन शर्मिला! मेरी प्यारी बीबी शर्मिला, आई लव यू ..... दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा, दूसरों की बीबी को आई लव यू बोलते हो। अभी पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराती हूँ....... साॅरी मैडम! लगता है रांग नम्बर लग गया। सपने के साथ ही मोहन बाबू की बीबी की नींद भी खुल गयी। वे प्रसन्न थीं कि सपने में मोबाइल फोन आया अर्थात घर में मोबाइल फोन आ जाएगा। रांग नम्बर तो आते रहते हैं, उनकी क्या चिन्ता करना।
सुबह होते ही मोहन बाबू को उनकी बीबी ने याद दिलाया कि आज मोबाइल फोन लाना है। आज नहीं, कल लाना है....... पर ऐसा क्यों.... अरे! आज तो मुझे टेलीफोन विभाग के दफ्तर जाकर इस लैण्डलाइन फोन को डिसकनेक्ट करवाने के लिए आवदेन देना होगा। पर मोबाइल का इस लैण्डलाइन फोन से क्या मतलब.... अरे तुम नहीं समझोगी? जब बिल भरना पड़ता तो पता चलता। मेरी अनुपस्थिति में घण्टों बैठकर तुम अपने मायके वालों के साथ गप्पें मारती हो, क्या मुझे नहीं पता है? अब ये लैण्डलाइन फोन कटवा कर मोबाइल फोन खरीदूँगा और उसे हमेशा अपने पास रखूँगा। ..... तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया है। लैण्डलाइन फोन कटवाकर मोबाइल फोन खरीदोगे तो लोग सोचेंगे कि मोबाइल फोन खरीदने की औकात नहीं है सो उसे कटवाकर मोबाइल फोन खरीदा है। और फिर मोबाइल फोन अगर तुम अपने पास रखोगे तो मैं अपने मायके वालों से बातें कैसे करूँगी!.... तो फिर अपने मायके वालों को ही बोल दो न कि तुम्हें एक मोबाइल फोन खरीदकर दे दें। हाँ... हाँ... जरूर बोल दूँगी। मेरे मायके में तो सभी के पास मोबाइल फोन हंै, यहाँ तक कि बच्चों के पास भी। पर तुम किस मर्ज की दवा हो...... इतना दहेज देकर मेरे पापा ने इसलिए तुमसे शादी नहीं की, कि शादी के बाद भी मंै उनके सामने हाथ फैलाऊँ। वो तो मेरी गलती थी जो फोटो में तुम्हारे घुँघराले बाल और मासूम चेहरा देखकर रीझ गयी, नहीं तो आज मैं किसी घर में रानी की तरह रह रही होती।
मोहन बाबू की बीबी जब गुस्सा होतीं तो वे शान्तिपूर्वक वहाँ से खिसक लेने में ही भलाई समझते और मुझसे अच्छा उनका मित्र कौन हो सकता है। सुबह-सुबह अपने दरवाजे पर मोहन बाबू को देखकर मैं पूछ उठा- श्अरे मोहन बाबू!सब ठीक तो है। कोई प्राॅब्लम तो नहीं है।श् प्राॅब्लम है, तभी तो आया हूँ आपके पास। अच्छा-अच्छा! पहले आप आराम से बैठकर गर्मा-गर्म चाय और पकौडो़ं का मजा लीजिए और उसके बाद मैं आपकी प्राॅब्लम हल करता हूँ। फिर मोहन बाबू ने चाय व पकौड़ों के साथ टेपरिकार्डर की तरह अपनी सारी प्राॅब्लम मेरे सामने रख दी। चूँंकि मैं मोहन बाबू की ईमानदारी से परिचित हूँ सो उनकी प्राॅब्लम अच्छी तरह समझता हूँ पर उनकी बीबी भी जमाने के हिसाब से गलत नहीं हैं।.... अचानक मेरी निगाह अखबार मे छपे एक विज्ञापन पर पड़ी- श्हमारे मोबाइल फोन खरीदिए और एक साल तक इनकमिंग फ्री पाईये।श् मैंने मोहन बाबू को विज्ञापन दिखाया तो वे काफी खुश हुए और हँसते हुए बोले- श्लगता है इन मोबाइल फोन वालों को मेरे जैसों का भी ख्याल है।श् मैंने उन्हें सलाह देते हुए कहा- श्मोहन बाबू मोबाइल फोन खरीदने के लिए कुछ दिन तक इन्तजार कर लीजिए तो कम्पटीशन में अन्य मोबाइल कम्पनियाँ सम्भवतः और भी आकर्षक प्लान के साथ आयें।श् खैर मोहन बाबू को मेरी बात जँची और अखबार का विज्ञापन वाला पेज उठाते हुए बोले- श्अगर बुरा न मानें तो, ये मैं अपने साथ लेते जाऊँ। आपकी भाभी को दिखाऊँगा तो शायद उसका गुस्सा कुछ ठण्डा हो जाय।
मोहन बाबू उस दिन के बाद से रोज सुबह ही सुबह मेरे दरवाजे पर आ टपकते हंै। चाय और पकौडों के साथ अखबार देखते हैं और ऐसे खुश होते हैं मानो भगवान ने उनकी सुन ली हो। पहले एक साल, दो साल, तीन साल, पाँच साल, और फिर आजीवन इनकमिंग फ्री वाले मोबाइल कम्पनियों के विज्ञापन आये पर मोहन बाबू मोबाइल खरीदने के लिए उस दिन का इन्तजार कर रहे हैं जब कोई कम्पनी अपना विज्ञापन देगी कि- श्हमारा मोबाइल फोन खरीदिए ओर अगली पीढ़ी तक इनकमिंग फ्री पाइये।श् पर अब मंै मोहन बाबू से परेशान हो गया हूँ क्योंकि वे हर सुबह मेरे घर आकर चाय व पकौडों का मजा लेते हैं और फिर विज्ञापन के बहाने पूरा का पूरा अखबार लेकर चले जाते हैं। मुझे तो डर लगता है कि कहीं अगली पीढ़ी तक इनकमिंग फ्री वाला विज्ञापन किसी मोबाइल कम्पनी ने दे भी दिया तो मोहन बाबू यह न कह उठें कि अब मैं मोबाइल फोन उसी दिन खरीदूँगा जब कोई कम्पनी अपना विज्ञापन देगी कि- श्हमारा मोबाइल फोन खरीदिए और अगले जन्म ही नहीं वरन् सात जन्मों तक इनकमिंग फ्री पाइये।
(इसे वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में भी पढ़ सकते हैं)
मंगलवार, 18 मई 2010
मेरी कहानी
कल ही एक मित्र का फोन आयासुना था दिल्ली की कई साहित्यिक पत्रिकाओं में
उसकी घुसपैठ है
सो आदतन बोल बैठा
उसकी घुसपैठ है
सो आदतन बोल बैठा
यार मेरी भी एक कहानी कहीं लगवा दे
वह हँस कर बोला
यह तो मेरे बायें हाथ का खेल है
मेरा दिल गदगद हुआ
ऐसे दोस्त को पाकर मैं धन्य हुआ
अगले ही दिन
अपनी एक नई कहानी
मित्र के पते पर भिजवा दी
और इंतजार करने लगा
उसके छपने का
दो-तीन माह बाद
सुबह ही सुबह
सुबह ही सुबह
मित्र का फोन आया
पाँच सौ रूपये का मनीआर्डर
मुझे भेजा जा रहा है
और अगले अंक में
मेरी रचना
छप कर आ रही है
रोज आॅफिस से आते ही
पहले पड़ोस की
पुस्तकों की दुकान पर जाता
और पत्रिका को न पाकर
झल्लाकर वापस चला आता
आखिर
वो शुभ दिन आ ही गया
पत्रिका के पृष्ठ संख्या पैंतीस पर
मेरी कहानी का शीर्षक जगमगा रहा था
तुरन्त उसकी दो प्रतियाँ खरिद
बगल में स्थित मिष्ठान-भंडार से
ताजा मोतीचूर का लड्डू
पैक कराया और
जल्दी से घर आकर
पत्नी को गले लगाया
प्रिये! ये देखो
तुम्हारे पति की कहानी छपी है
पत्नी ने उत्सुकतावश
पत्रिका के पन्ने फड़फड़ाये और
पृष्ठ संख्या पैंतीस पर ज्यों ही हाथ रखा
मैने उसके मुँह में लड्डू डाला
कि वह बोल उठी
पहले आपका नाम तो देख लूँ
कहीं दूसरे की कहानी को तो
अपनी नहीं बता रहे
हाँ.....हाँ.....क्यों नहीं प्रिये
पर यहाँ तो दांव ही उल्टा पड़ गया
कहानी तो मेरी थी
पर छपी किसी दूसरे के नाम से थी
अब अपने दोस्त की
घुसपैठ का माजरा
कुछ-कुछ समझ में आ रहा था
सामने पड़ा पाँच सौ रुपये का मनीआॅर्डर
और मोतीचूर का लड्डू
मुझे मुँह चिढ़ा रहा था !!
( इसे वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में भी पढ़िए)
शनिवार, 15 मई 2010
बारिश, पकौड़े और चाय...
खैर शाम को जब बारिश धीमी हुई तो बाहर का मौसम बड़ा सुहाना हो चुका था। गुलमोहर के लाल-लाल फूल अपने शवाब में दिख रहे थे तो पक्षी आसमां में कलाबाजियाँ दिखा रही थीं. बादल अभी भी उमड़-घुमड़ कर रहे थे. ऐसे में बाहर निकलकर हल्का-हल्का भीगना पूरे दिलोदिमाग को एक अजीब सी ख़ुशी प्रदान करता है. लगता है कितने दिनों बाद इस दिन को जी रहा हूँ. मौके की नजाकत, तब तक पकौड़ों और चाय की तलब महसूस हुई. कहते हैं ना बारिश का मजा पकौड़ों और चाय के बिना अधूरा ही होता है. पता नहीं कहाँ से ये परंपरा आरंभ हुई होगी, पर यह बारिश का मजा दुगुना कर देती है और बारिश इनका स्वाद दुगुना कर देते हैं. फ़िलहाल पत्नी आकांक्षा और बिटिया अक्षिता के साथ अंडमान की बारिश का लुत्फ़ भरपूर रूप में उठा रहा हूँ, इधर अख़बारों और न्यूज चैनल्स पर उधर की कड़ी धूप व गर्मी के भी समाचार देख रहा हूँ. दिल में बस यही ख्याल आता है-
सब प्रकृति की माया है !
कहीं धूप और कहीं छाया है !!
(चित्र में बिटिया अक्षिता)
सोमवार, 10 मई 2010
10 मई 1857 की याद में
आज 10 मई है। इस दिन का भारतीय इतिहास में एक विशिष्ट स्थान है। 1857 में भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम इसी दिन आरंभ हुआ था. 1857 वह वर्ष है, जब भारतीय वीरों ने अपने शौर्य की कलम को रक्त में डुबो कर काल की शिला पर अंकित किया था और ब्रिटिश साम्राज्य को कड़ी चुनौती देकर उसकी जडे़ं हिला दी थीं। 1857 का वर्ष वैसे भी उथल-पुथल वाला रहा है। इसी वर्ष कैलिफोर्निया के तेजोन नामक स्थान पर 7.9 स्केल का भूकम्प आया था तो टोकियो में आये भूकम्प में लगभग एक लाख लोग और इटली के नेपल्स में आये 6.9 स्केल के भूकम्प में लगभग 11,000 लोग मारे गये थे। 1857 की क्रान्ति इसलिये और भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि ठीक सौ साल पहले सन् 1757 में प्लासी के युद्ध में विजय प्राप्त कर राबर्ट क्लाइव ने अंग्रेजी राज की भारत में नींव डाली थी। विभिन्न इतिहासकारों और विचारकांे ने इसकी अपने-अपने दृष्टिकोण से व्याख्यायें की हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और महान चिन्तक पं0 जवाहरलाल नेहरू ने लिखा कि- ‘‘यह केवल एक विद्रोह नहीं था, यद्यपि इसका विस्फोट सैनिक विद्रोह के रूप में हुआ था, क्योंकि यह विद्रोह शीघ्र ही जन विद्रोह के रूप में परिणित हो गया था।’’ बेंजमिन डिजरायली ने ब्रिटिश संसद में इसे ‘‘राष्ट्रीय विद्रोह’’ बताया। प्रखर विचारक बी0डी0सावरकर व पट्टाभि सीतारमैया ने इसे ”भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम”, जाॅन विलियम ने ”सिपाहियों का वेतन सुविधा वाला मामूली संघर्ष“ व जाॅन ब्रूस नाॅर्टन ने ‘‘जन-विद्रोह’’ कहा। माक्र्सवादी विचारक डा0 राम विलास शर्मा ने इसे संसार की प्रथम साम्राज्य विरोधी व सामन्त विरोधी क्रान्ति बताते हुए 20वीं सदी की जनवादी क्रान्तियों की लम्बी श्रृंखला की प्रथम महत्वपूर्ण कड़ी बताया। प्रख्यात अन्तर्राष्ट्रीय राजनैतिक विचारक मैजिनी तो भारत के इस प्रथम स्वाधीनता संग्राम को अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखते थे और उनके अनुसार इसका असर तत्कालीन इटली, हंगरी व पोलैंड की सत्ताओं पर भी पड़ेगा और वहाँ की नीतियाँ भी बदलेंगी।1857 की क्रान्ति को लेकर तमाम विश्लेषण किये गये हैं। इसके पीछे राजनैतिक-सामाजिक-धार्मिक-आर्थिक सभी तत्व कार्य कर रहे थे, पर इसका सबसे सशक्त पक्ष यह रहा कि राजा-प्रजा, हिन्दू-मुसलमान, जमींदार-किसान, पुरूष-महिला सभी एकजुट होकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े। 1857 की क्रान्ति को मात्र सैनिक विद्रोह मानने वाले इस तथ्य की अवहेलना करते हैं कि कई ऐसे भी स्थान थे, जहाँ सैनिक छावनियाँ न होने पर भी ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध क्रान्ति हुयी। इसी प्रकार वे यह भूल जाते है कि वास्तव में ये सिपाही सैनिक वर्दी में किसान थे और किसी भी व्यक्ति के अधिकारों के हनन का सीधा तात्पर्य था कि किसी-न-किसी सैनिक के अधिकारों का हनन, क्योंकि हर सैनिक या तो किसी का पिता, बेटा, भाई या अन्य रिश्तेदार है। यह एक तथ्य है कि अंगे्रजी हुकूमत द्वारा लागू नये भू-राजस्व कानून के खिलाफ अकेले सैनिकों की ओर से 15,000 अर्जियाँ दायर की गयी थीं। डाॅ0 लक्ष्मीमल्ल सिंघवी के शब्दों में- ‘‘सन् 1857 की क्रान्ति को चाहे सामन्ती सैलाब या सैनिक गदर कहकर खारिज करने का प्रयास किया गया हो, पर वास्तव में वह जनमत का राजनीतिक-सांस्कृतिक विद्रोह था। भारत का जनमानस उसमें जुड़ा था, लोक साहित्य और लोक चेतना उस क्रान्ति के आवेग से अछूती नहीं थी। स्वाभाविक है कि क्रान्ति सफल न हो तो इसे ‘विप्लव’ या ‘विद्रोह’ ही कहा जाता है।’’ यह क्रान्ति कोई यकायक घटित घटना नहीं थी, वरन् इसके मूल में विगत कई सालों की घटनायें थीं, जो कम्पनी के शासनकाल में घटित होती रहीं। एक ओर भारत की परम्परा, रीतिरिवाज और संस्कृति के विपरीत अंग्रेजी सत्ता एवं संस्कृति सुदृढ हो रही थी तो दूसरी ओर भारतीय राजाओं के साथ अन्यायपूर्ण कार्रवाई, अंग्रेजों की हड़पनीति, भारतीय जनमानस की भावनाओं का दमन एवं विभेदपूर्ण व उपेक्षापूर्ण व्यवहार से राजाओं, सैनिकों व जनमानस में विद्रोह के अंकुर फूट रहे थे।
इसमें कोई शक नहीं कि 1757 से 1856 के मध्य देश के विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न वर्गों द्वारा कई विद्रोह किये गये। यद्यपि अंग्रेजी सेना बार-बार इन विद्रोहों को कुचलती रही पर उसके बावजूद इन विद्रोहों का पुनः सर उठाकर खड़ा हो जाना भारतीय जनमानस की जीवटता का ही परिचायक कहा जायेगा। 1857 के विद्रोह को इसी पृष्ठभूमि में देखे जाने की जरूरत है। अंग्रेज इतिहासकार फॅारेस्ट ने एक जगह सचेत भी किया है कि- ‘‘1857 की क्रान्ति हमें इस बात की याद दिलाती है कि हमारा साम्राज्य एक ऐसे पतले छिलके के ऊपर कायम है, जिसके किसी भी समय सामाजिक परिवर्तनों और धार्मिक क्रान्तियों की प्रचण्ड ज्वालाओं द्वारा टुकडे़-टुकडे़ हो जाने की सम्भावना है।’’ अंग्रेजी हुकूमत को भी 1757 से 1856 तक चले घटनाक्रमों से यह आभास हो गया था कि वे अब अजेय नहीं रहे। तभी तो लाॅर्ड केनिंग ने फरवरी 1856 में गर्वनर जनरल का कार्यभार ग्रहण करने से पूर्व कहा था कि - ‘‘मैं चाहता हूँ कि मेरा कार्यकाल शान्तिपूर्ण हो। मैं नहीं भूल सकता कि भारत के गगन में, जो अभी शान्त है, कभी भी छोटा सा बादल, चाहे वह एक हाथ जितना ही क्यों न हो, निरन्तर विस्तृत होकर फट सकता है, जो हम सबको तबाह कर सकता है।’’ लाॅर्ड केनिंग की इस स्वीकारोक्ति में ही 1857 की क्रान्ति के बीज छुपे हुये थे।
1857 की क्रान्ति की सफलता-असफलता के अपने-अपने तर्क हैं पर यह भारत की आजादी का पहला ऐसा संघर्ष था, जिसे अंग्रेज समर्थक सैनिक विद्रोह अथवा असफल विद्रोह साबित करने पर तुले थे, परन्तु सही मायनों में यह पराधीनता की बेड़ियों से मुक्ति पाने का राष्ट्रीय फलक पर हुआ प्रथम महत्वपूर्ण संघर्ष था। अमरीकी विद्वान प्रो0 जी0 एफ0 हचिन्स के शब्दों में-‘‘1857 की क्रान्ति को अंग्रेजों ने केवल सैनिक विद्रोह ही कहा क्योंकि वे इस घटना के राजद्रोह पक्ष पर ही बल देना चाहते थे और कहना चाहते थे कि यह विद्रोह अंग्रेजी सेना के केवल भारतीय सैनिकों तक ही सीमित था। परन्तु आधुनिक शोध पत्रों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह आरम्भ से सैनिक विद्रोह के ही रूप में हुआ, परन्तु शीघ्र ही इसमें लोकप्रिय विद्रोह का रूप धारण कर लिया।’’ वस्तुतः इस क्रान्ति को भारत में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध पहली प्रत्यक्ष चुनौती के रूप में देखा जा सकता है। यह आन्दोलन भले ही भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति न दिला पाया हो, लेकिन लोगों में आजादी का जज्बा जरूर पैदा कर गया। 1857 की इस क्रान्ति को कुछ इतिहासकारों ने महास्वप्न की शोकान्तिका कहा है, पर इस गर्वीले उपक्रम के फलस्वरूप ही भारत का नायाब मोती ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों से निकल गया और जल्द ही कम्पनी भंग हो गयी। 1857 के संग्राम की विशेषता यह भी है कि इससे उठे शंखनाद के बाद जंगे-आजादी 90 साल तक अनवरत चलती रही और अंतत: 15 अगस्त, 1947 को हम आजाद हुए !!
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