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शुक्रवार, 11 जून 2010

मौत

आज मैंने मौत को देखा!
अर्द्धविक्षिप्त अवस्था में हवस की शिकार
वो सड़क के किनारे पड़ी थी!
ठण्डक में ठिठुरते भिखारी के
फटे कपड़ों से वह झांक रही थी!
किसी के प्रेम की परिणति बनी
मासूम के साथ नदी में बह रही थी!
नई-नवेली दुल्हन को दहेज की खातिर
जलाने को तैयार थी!
साम्प्रदायिक दंगों की आग में
वह उन्मादियों का बयान थी!
चंद धातु के सिक्कों की खातिर
बिकाऊ ईमान थी!
आज मैंने मौत को देखा!

24 टिप्‍पणियां:

एक बेहद साधारण पाठक ने कहा…

बहुत गहरा चित्रण किया आपने .....

ये पढ़िए .
मौत के होते है कितने सारे रूप ...
करूप बनाती जीवन की धूप...
इस धुप से खुद को बचाएं...
चलो अध्यात्म का छाता लगायें ...

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

अत्यन्त संवेदनशील और भावपूर्ण कविता....बेहतरीन भाव..धन्यवाद जी

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) ने कहा…

बहुत संवेदनशील, भावपूर्ण और मार्मिक कविता.....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मौत के रूप में बहुत संवेदन बात कह दी है....सोचने पर मजबूर करती रचना

Udan Tashtari ने कहा…

मार्मिक/// संवेदनशील!

Jandunia ने कहा…

महत्वपूर्ण पोस्ट, साधुवाद

vandan gupta ने कहा…

उफ़्………बहुत ही गहन और मार्मिक चित्रण्।

Shekhar Kumawat ने कहा…

बहुत गहरा चित्रण किया आपने ..

S R Bharti ने कहा…

साम्प्रदायिक दंगों की आग में
वह उन्मादियों का बयान थी!
चंद धातु के सिक्कों की खातिर
बिकाऊ ईमान थी!
आज मैंने मौत को देखा!
महोदय , सच्ची अभिब्यक्ति

माधव( Madhav) ने कहा…

ऐ आसमान तेरे,
खुदा का नहीं है खौफ।
डरते हैं ऐ ज़मीन,
तेरे इन्सान से हम।

Mrityunjay Kumar Rai ने कहा…

ऐ आसमान तेरे,
खुदा का नहीं है खौफ।
डरते हैं ऐ ज़मीन,
तेरे इन्सान से हम।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

जिंदगी के ये रूप मौत के प्रयायवाची ही तो हैं ।
अच्छा है ।

हिंदी साहित्य संसार : Hindi Literature World ने कहा…

अदभुत...नि:शब्द !!

Bhanwar Singh ने कहा…

मार्मिक रचना...झकझोर दिया अंतर्मन को.

Dr. Brajesh Swaroop ने कहा…

बहुत सही लिखा आपने के.के. जी, मौत के ये रूप ही तो आज समाज को दहला रहे हैं.

Akshitaa (Pakhi) ने कहा…

बढ़िया है ये कविता पापा.

Akanksha Yadav ने कहा…

बेहद मार्मिक कविता. काश यह स्थिति हम बदल पाते..

Unknown ने कहा…

कृष्ण कुमार भाई, पढ़कर शांत हूँ..मौत के इतने रूप देखकर हैरान हूँ.

बेनामी ने कहा…

बहुत संवेदनशील, भावपूर्ण और मार्मिक कविता.

Shyama ने कहा…

साम्प्रदायिक दंगों की आग में
वह उन्मादियों का बयान थी!
च्ंाद धातु के सिक्कों की खातिर
बिकाऊ ईमान थी!
आज मैंने मौत को देखा!
...बहुत सुन्दर व संवेदनशील रचना..बधाई.

Amit Kumar Yadav ने कहा…

कविता के बहाने सच को उकेरती कविता...शानदार.

Ram Shiv Murti Yadav ने कहा…

कविता के माध्यम से समाज की भयावहता को दर्शाती मार्मिक कविता..बधाई.

KK Yadav ने कहा…

आप सभी लोगों को हमारी यह कविता पसंद आई, आपने इसे सराहा..आभार. अपना स्नेह यूँ ही बनाये रहें !!

शरद कुमार ने कहा…

मर्मस्पर्शी कविता...दुखद पर सच.