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शुक्रवार, 26 जून 2009

व्यक्ति, समाज, साहित्य और राजनीति के अन्तर्सम्बंधों की पड़ताल करता निबंध संग्रह

‘‘अभिव्यक्तियों के बहाने‘‘ कृष्ण कुमार यादव का प्रथम निबंध संग्रह है। भारतीय डाक सेवा के अधिकारी रूप में पदस्थ श्री यादव अपनी व्यस्तताओं के बीच भी सामाजिक-साहित्यिक सरोकारों से कटे नहीं हैं बल्कि उन्हें आत्मसात् करते हुए पन्नों पर उभारने में भी माहिर हैं। सुकरात ने ऐसे लोगों के लिए ही लिखा था कि-‘‘सर्वगुणसम्पन्न और सच्चे अर्थों में शिक्षित वही लोग माने जायेंगे जो सफलता मिलने पर बिगड़ते नहीं, जो अपनी असलियत से मुँह नहीं मोड़ते; साथ ही बुद्धिमान और धीर-गम्भीर व्यक्ति की तरह दृढ़ता से जमीन पर पैर जमाये रखते हैं।‘‘ साहित्य में उसी दृष्टि को संपन्न माना जाता है, जो अपने समय की सभी प्रवृत्तियों को अपने साहित्य में स्थान दे और उनके साथ समुचित न्याय करे। कृष्ण कुमार चूँकि अभी युवा हैं, अतः उनकी सोच में नवीनता एवं ताजगी है।

समालोच्य निबंध संग्रह में कुल 10 लेख/निबंध प्रस्तुत किये गये हैं। भारतीय जीवन, समाज, साहित्य और राजनीति के अंतर्सूयों से आबद्ध इन लेखों में तेजी से बदलते समय और समाज की धड़कन को महसूस किया जा सकता है। संग्रह का प्रथम लेख ‘‘बदलते दौर में साहित्य की भूमिका‘‘ समकालीन परिवेश में साहित्य और इसमें आए बदलाव को बखूबी रेखांकित करता है। नारी-विमर्श, दलित-विमर्श, बाल-विमर्श जैसे तमाम तत्वों को सहेजते इस लेख की पंक्तियाँ गौरतलब हैं- ‘‘रचनाकार को संवेदना के उच्च स्तर को जीवंत रखते हुए समकालीन समाज के विभिन्न अंतर्विरोधों को अपने आप से जोड़कर देखना चाहिए एवं अपने सत्य व समाज के सत्य को मानवीय संवेदना की गहराई से भी जोड़ने का प्रयास करना चाहिये।’’ इसी प्रकार ‘‘बाल-साहित्य: दशा और दिशा‘‘ में लेखक ने बच्चों की मनोवैज्ञानिक समस्याओं और उनकी मनोभावनाओं को भी बाल साहित्य में उभारने पर जोर दिया है।
आज लोकतंत्र मात्र एक शासन-प्रणाली नहीं वरन् वैचारिक स्वतंत्रता का पर्याय बन गया है। कृष्ण कुमार यादव की नजर इस पर भी गई है। ‘‘लोकतंत्र के आयाम‘‘ लेख में भारतीय लोकतंत्र के गतिशील यथार्थ की सच्ची तस्वीर देखी जा सकती है। किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित हुए बिना भारतीय समाज के पूरे ताने-बाने को समझने की वैज्ञानिक दृष्टि इस लेख को महत्वपूर्ण बना देती है। सत्य-असत्य, सभ्यता के आरम्भ से ही धर्म एवं दर्शन के केद्र-बिंदु बने हुये हैं। महात्मा गाँधी, जिन्हें सत्य का सबसे बड़ा व्यवहारवादी उपासक माना जाता है ने सत्य को ईश्वर का पर्यायवाची कहा। भारत सरकार के राजकीय चिन्ह अशोक-चक्र के नीचे लिखा ‘सत्यमेव जयते’ शासन एवं प्रशासन की शुचिता का प्रतीक है। यह हर भारतीय को अहसास दिलाता है कि सत्य हमारे लिये एक तथ्य नहीं वरन् हमारी संस्कृति का सार है। इस भावना को सहेजता लेख ‘‘सत्यमेव जयते‘‘ बड़ा प्रभावी लेख है। एक अन्य लेख में लेखक ने प्रयाग के महात्मय का वर्णन करते हुए इलाहाबाद के राजनैतिक-सामाजिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक योगदान को रेखांकित किया है। इसमें इतिहास और स्मृति एक दूसरे के साथ-साथ चलते हुए नजर आते हैं।
सृष्टि का चक्र चलाने वाली, एक उन्नत समाज बनाने वाली, शक्ति, ममता, साहस, सौर्य, ज्ञान, दया का पुंज है नारी। एक तरफ वह यशोदा है, तो दूसरी तरफ चण्डी भी। आज महिलायें समुद्र की गहराई और आसमान की ऊँचाई नाप रही हैं। ‘‘रूढ़ियों की जकड़बन्द तोड़ती नारियाँ‘‘ ऐसी नारियों का जिक्र करती है जो फेमिनिस्ट के रूप में किन्हीं नारी आन्दोलनों से नहीं जुड़ी हैं। कर्मकाण्डों में पुरूषों को पीछे छोड़कर पुरोहिती करने वाली, माता-पिता के अंतिम संस्कार से लेकर तर्पण और पितरों के श्राद्ध तक करने वाले ऐसे तमाम कार्य जिसे महिलाओं के लिए सर्वथा निषिद्ध माना जाता रहा है, आज महिलायें खुद कर रही हैं। आजादी के दौर में भी कुछ महापुरूषों ने इन रूढ़िगत मान्यताओं के विरूद्ध आवाज उठाई थी पर अब महिलायें सिर्फ आवाज ही नहीं उठा रही हैं वरन् इन रूढ़िगत मान्यताओं को पीछे ढकेलकर नये मानदण्ड भी स्थापित कर रही हैं। इसी क्रम में ‘‘लिंग समता: एक विश्लेषण‘‘ नामक लेख पुरूष व महिलाओं के बीच जैविक विभेद को स्वीकार करते हुए सामंजस्य स्थापित करने और तद्नुसार सभ्यता के विकास हेतु कार्य करने की बात करता है।
कोई भी लेखक या साहित्यकार अपने समय की घटनाओं और उथल-पुथल के माहौल से प्रेरित होकर साहित्य की रचना करता है। कृष्ण कुमार भारतीय संस्कृति, उसके जीवन मूल्यों और माटी की गंध को रोम-रोम में महसूस करते हैं। आज हमारी लोक-संस्कृति व विरासत पर चैतरफा दबाव है और बाजारवाद के कारण वह संकट में है। ऐसे में लेखक भारतीय संस्कृति और उसकी विरासत का पहरूआ बनकर सामने आता है। अपने लेख ‘‘शाश्वत है भारतीय संस्कृति और इसकी विरासत‘‘ में कृष्ण कुमार जब लिखते हैं- ‘‘वस्तुतः हम भारतीय अपनी परम्परा, संस्कृति, ज्ञान और यहाँ तक कि महान विभूतियों को तब तक खास तवज्जो नहीं देते जब तक विदेशों में उसे न स्वीकार किया जाये। यही कारण है कि आज यूरोपीय राष्ट्रों और अमेरिका में योग, आयुर्वेद, शाकाहार, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, होम्योपैथी और सिद्धा जैसे उपचार लोकप्रियता पा रहे हैं जबकि हम उन्हें बिसरा चुके हैं‘‘, तो उनसे असहमति जताना बड़ा कठिन हो जाता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम‘ का पाठ पढ़ाने वाली भारतीय संस्कृति सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव की हिमायती रही हैं। आज जातिवाद, सम्प्रदायवाद की आड़ में जब इस पर हमले हो रहे हैं तो युवा लेखक की लेखनी इससे अछूती नहीं रहती। बचपन से ही एक दूसरे के धर्मग्रंथों और धर्मस्थानों के प्रति आदर का भाव पैदा करके अगली पीढ़ियों को इस विसंगति से दूर रखने की सलाह देने वाले लेख ‘‘साम्प्रदायिकता बनाम सामाजिक सद्भाव‘‘ में समाहित उदाहरण इसे समसामयिक बनाते हैं।
आज की नई पीढ़ी महात्मा गाँधी को एक सन्त के रूप में नहीं बल्कि व्यवहारिक आदर्शवादी के रूप में प्रस्तुत कर रही है। महात्मा गाँधी पर प्रस्तुत लेख ‘‘समग्र विश्वधारा में व्याप्त हैं महात्मा गाँधी‘‘ उनके जीवन-प्रसंगों पर रोचक रूप में प्रकाश डालते हुए समकालीन परिवेश में उनके विचारों की प्रासंगिकता को पुनः सिद्ध करता है। वस्तुतः गाँधी जी दुनिया के एकमात्र लोकप्रिय व्यक्ति थे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वयं को लेकर अभिनव प्रयोग किए और आज भी सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, आर्थिक मुद्दों पर उनकी नैतिक सोच व धर्म-सम्प्रदाय पर उनके विचार प्रासंगिक हंै।
साहित्य रचना केवल एक कला ही नहीं है बल्कि उसके सामाजिक दायित्व का दायरा भी काफी बड़ा होता है। यही कारण है कि साहित्य हमारे जाने-पहचाने संसार के समानांतर एक दूसरे संसार की रचना करता है और हमारे समय में हस्तक्षेप भी करता है। ऐसे में व्यक्ति, समाज, साहित्य और राजनीति के अन्तर्सम्बधों की संश्लिष्टता को पहचान कर उसे मौजूदा दौर के परिपे्रक्ष्य में जाँचना-परखना कोई मामूली चुनौती नहीं। कृष्ण कुमार यादव मूकदृष्टा बनकर चीजों को देखने की बजाय भाषा की स्वाभाविक सहजता के साथ इन चुनौतियों का सामना करते हैं, जिसका प्रतिरूप उनका यह प्रथम निबंध-संग्रह है। कृष्ण कुमार यादव की यह पुस्तक पढ़कर जीवंतता एवं ताजगी का अहसास होता है।

पुस्तक: अभिव्यक्तियों के बहाने (निबन्ध संग्रह)/ लेखकः कृष्ण कुमार यादव/ मूल्य: 150/- प्रकाशक: शैवाल प्रकाशन, दाऊदपुर, गोरखपुर / प्रकाशन वर्ष : 2006 / समीक्षक: गोवर्धन यादव, 103- कावेरी नगर, छिंदवाड़ा (म0प्र0)-४८०००१

(साभार : सृजनगाथा, नवम्बर 2008)

बुधवार, 24 जून 2009

अभिलाषा: जागरूक संवेदना की कविताएं

मनुष्य को अपने व्यक्तिगत सम्बन्धों के साथ ही जीवन के विविध क्षेत्रों से प्राप्त हो रही अनुभूतियों का आत्मीकरण तथा उनका उपयुक्त शब्दों में भाव तथा चिन्तन के स्तर पर अभिव्यक्तीकरण ही वर्तमान कविता का आधार है। जगत के नाना रूपों और व्यापारों में जब मनीषी को नैसर्गिक सौन्दर्य के दर्शन होते हंै तथा जब मनोकांक्षाओं के साथ रागात्मक सम्बन्ध स्थापित करने में एकात्मकता का अनुभव होता है, तभी यह सामंजस्य सजीवता के साथ समकालीन सृजन का साक्षी बन पाता है। युवा कवि एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव ने अपने प्रथम काव्य संग्रह ‘‘अभिलाषा’’ में अपने बहुरूपात्मक सृजन में प्रकृति के अपार क्षेत्रों में विस्तारित आलम्बनों को विषयवस्तु के रूप में प्राप्त करके ह्नदय और मस्तिष्क की रसात्मकता से कविता के अनेक रूप बिम्बों में संजोने का प्रयास किया है। मुक्त छन्द के इस कविता संग्रह में कुल 88 कविताएं संकलित हैं।

कृष्ण कुमार ने अपने इस संग्रह में विषय-विशेष की कविताओं को अलग-अलग खंडों में रखा है। यथा-माँ, प्रेयसी, नारी, ईश्वर, बचपन, एकाकीपन, दतर, प्रकृति, मूल्य एवं विसंगतियाँ, सम्बन्ध, समकालीन और विविध। इन विषयों को उठाकर कवि ने समग्रता का प्रमाण देने के साथ-साथ कालखंड को भी प्रस्तुत करने का व्यापक प्रयास किया है। बकौल गोपालदास नीरज कृष्ण कुमार व्यक्तिनिष्ठ नहीं समाजनिष्ठ कवि हैं जो वर्तमान परिवेश की विदू्रपताओं, विसंगतियों, षडयन्त्रों और पाखंडों का बड़ी मार्मिकता के साथ उद्घाटन करते हैं।अभिलाषा का संज्ञक संकलन संस्कारवान कवि का इन्हीं विशेषताओं से युक्त कवि कर्म है, जिसमें व्यक्तिगत सम्बन्धों, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक समस्याओं और विषमताओं तथा जीवन मूल्यों के साथ हो रहे पीढ़ियों के अतीत और वर्तमान के टकरावों और प्रकृति के साथ पर्यावरणीय विक्षोभों का खुलकर भावात्मक अर्थ शब्दों में अनुगुंजित हुआ है। परा और अपरा जीवन दर्शन, विश्व बोध तथा विद्वान बोध से उपजी अनुभूतियों, बाल विमर्श, स्त्री विमर्श एवं जड़ व्यवस्था व प्रशासनिक रवैये ने भी कवि को अनेक रूपों में उद्वेलित किया है। इन उद्वेलनों में जीवन सौन्दर्य के सार्थक और सजीव चित्र शब्दों में अर्थ पा सके हैं।

कृष्ण कुमार यादव ने अपने संकलन में कविता को पारिभाषित किया है- कविता है वेदना की अभिव्यक्ति/कविता है एक विचार/कविता है प्रकृति की सहचरीे/कविता है क्रान्ति की नजीर/कविता है शोषितों की आवाज/कविता है रसिकों का साज/कविता है सृष्टि और प्रलय का निर्माण/कविता है मोक्ष और निर्वाण/कभी यथार्थ, तो कभी कल्पना के आगोश में/कविता इस ब्रह्माण्ड से भी आगे है। निश्चिततः ये पंक्तियाँ कवि की तमाम कविताओं की भाव-भूमि का खुलासा करने में नितांत सक्षम हैं। ‘अभिलाषा’ का प्रथम खंड माँ को समर्पित है। माँ के ममत्व भरे भाव की स्नेहिल अभिव्यक्ति पर कवि ने कुल पाँच कवितायें लिखी हैं, जिसमें ममता की अनुभूति का पवित्र भाव-वात्सल्य, प्यार और दुलार के विविध रूपों में कथन की मर्मस्पर्शी भंगिमा के साथ कथ्य को सीधे-सीधे पाठक तक संप्रेषित करने का प्रयत्न किया है। कवि की जीवन स्मृतियों में माँ अनेक रूपों में प्रकट होती है- कभी पत्र में उत्कीर्ण होकर, तो कभी यादों के झरोखौं से झांकती हुई बचपन से आज तक की उपलब्धियों के बीच एक सफल पुत्र को आशीर्वाद देती हुई। किसी निराश्रिता, अभाव ग्रस्त, क्षुधित माँ और सन्तति की काया को भी कवि की लेखनी का स्पर्श मिला है, जहाँ मजबूरी में छिपी निरीहता को भूखी कामुक निगाहों के स्वार्थी संसार के बीच अर्धानावृत्त आँचल से दूध पिलाती मानवी को अमानवीय नजरों का सामना करना पड़ रहा है। कवि की ष्माँष् के प्रति भावनायंे अभ्यर्थना और अभ्यर्चना बनकर कविता का शाश्वत शब्द सौन्दर्य बन जाती हंै। इन पंक्तियों को देखें- मेरा प्यारा सा बच्चा/गोद में भर लेती है बच्चे को/चेहरे पर नजर न लगे/माथे पर काजल का टीका लगाती है/कोई बुरी आत्मा न छू सके/बाँहों में ताबीज बांध देती है। कवि की माँ को समर्पित एक अन्य रचना की पंक्तियाँ हैं -जो बच्चे अच्छे काम करते हैं/उनके सपनों में परी आती/और देकर चली जाती चाकलेट/मुझे क्या पता था/वो परी कोई और नहीं/माँ ही थी।
अपनी वय के अनुसार बच्चा ज्यों-ज्यों बड़ा होता जाता है वह नारी और प्रेयसी के विभिन्न रुपों को महसूस करता है, यहाँ तक कि प्रकृति भी उसे प्रेयसी लगती है। कवि ने बड़ी ही सहजता और खूबसूरती के साथ भावों को अभिव्यक्त करते हुए अपने प्रकृति प्रेमी होने का प्रमाण दिया है। कवि ने प्रेम व प्रेयसी पर कुल दस कविताएं लिखी हैं-सद्यःस्नात सी लगती हैं/हर रोज सूरज की किरणें/आगोश में भर शरीर को/दिखाती हैं अपनी अल्हड़ता के जलवे/और मजबूर कर देती हैं/अंगड़ाईयाँ लेने के लिए/मानो सज धज कर/तैयार बैठी हों/अपना कौमार्यपन लुटाने के लिए। कवि की कलम सती प्रथा जैसी कुरीति पर चली है तो नारी अधिकारों की माँग के बहाने स्त्री विमर्श को भी उसने छुआ है। ‘बेटी के कर्तव्य’ कविता की इन पंक्तियों पर गौर करें- पर यह क्या/बेटी तो कर्तव्यों के साथ/अपने अधिकार भी पूछ बैठी/पर माँ उसे कैसे समझाये/उसने तो इस शब्द का/अर्थ ही नहीं जाना था/पति ने जो कह दिया/उसे पूरा करना ही/अपना जीवन समझ बैठी/फिर कैसे समझाये उसे/अधिकारों का अर्थ।

कृष्ण कुमार यादव की कविताओं में परा और अपरा जीवन दर्शन की भी चर्चा की गई है। ईश्वर की कल्पना मनुष्य को जब मिली होगी, उसे आशा का आस्थावन विश्वास भी मिला होगा। कवि का मानना है कि धर्म-सम्प्रदाय के नाम पर घरौदों का निर्माण न तो उस अनन्त की आराधना है, और न ही इनमें उसका निवास है। कवि ने ईश्वर के लिए लिखा हैै-मैं किसी मंदिर-मस्जिद गुरूद्वारे में नहीं/मैं किसी कर्मकाण्ड और चढ़ावे का भूखा नहीं/नहीं चाहिए मुझे तुम्हारा ये सब कुछ/मैं सत्य में हूँ, सौन्दर्य में हँू, कर्तव्य में हँू /परोपकार में हूँ, अहिंसा में हूँ, हर जीव में हूँ/अपने अन्दर झांको, मैं तुममें भी हूँ/फिर क्यों लड़ते हो तुम/बाहर कहीं ढँूढते हुए मुझे। कवि ईश्वर की खोज करता है अनेक प्रतीकों में, अनेक आस्थाओं में और अपने अन्दर भी। वह भिखमंगों के ईश्वर को भी देखता है और भक्तों को भिखमंगा होते भी देखता है, बच्चों के भगवान से मिलता है और स्वर्ग-नरक की कल्पनाओं से डरते-डराते मन के अंधेरों में भटकते इन्सानों की भावनाओं में भी खोजता है।

बाल विमर्श कवि की कुछ कविताओं का प्रमुख तत्व है, जिनमें बच्चों के दर्द को मार्मिकता के साथ उभारा गया है। जूतों में पालिश करता बच्चा, दंगों में मृत माँ के स्तनों को मुँह में लगाये बच्चा, क्लोन, दुधमुँहा बच्चा और धर्म के खांचों में बंटते बच्चों पर लिखी कविताएं कवि की बाल मनोविज्ञान पर गहरी पकड़ की परिचायक हैं-खामोश व वीरान सी आंखें/आस-पास कुछ ढूढ़ती हैं/पर हाथ मंे आता है/सिर्फ मांँस का लोथड़ा/माँ की छाती समझ/वह लोथड़े को भी मुंह/लगा लेता है/मुँह में दूध की बजाय/खून भर आता है/लाशों के बीच/खून से सना मुँह लिए/एक मासूम का चेहरा/वह इस देश का भविष्य है।

कवि की रचनाओं का फलक अत्यन्त व्यापक है। वर्तमान समय की ग्राम्य और नगर जीवन स्थितियों में पनप रही आपा-धापी का टिक-टिक-टिक शीर्षक से कार्यालयी दिनचर्या, अधिकारी और कर्मचारी की जीवन दशायें, फाइलें, सुविधा शुल्क तथा फर्ज अदायगी शीर्षकों में निजी अनुभव और दैनिक क्रियाकलापों का स्वानुभूत प्रस्तुत किया गया है। नैतिकता और जीवन मूल्य कवि के संस्कारों में रचे बसे लगते हैं। उसे अंगुलिमाल के रूप में अत्याचारी व अनाचारी का दुश्चरित्र-चित्र भी याद आता और बुद्ध तथा गाँधी का जगत में आदर्श निष्पादन तथा क्षमा, दया, सहानुभूति का मानव धर्म को अनुप्राणित करता चारित्रिक आदर्श भी नहीं भूलता। वर्तमान समय में मनुष्य की सद्वृत्तियों को छल, दंभ, द्वेष, पाखण्ड और झूठ ने कितना ढक लिया है, यह किसी से छिपा नहीं है। इन मानव मूल्यों के अवमूल्यन को कवि ने शब्दों में कविता का रूप दिया है। कवि शहरी परिवेश के वावजूद गाँव एवं उससे जुड़ी स्मृतियों को विस्मृत नही करना चाहता। गाँव, गाँव की गलियाँ, पेड़, किसान, खेत, मेड़, मिट्टी, बादल, गौरैया, तितलियाँ, संगी-साथी इत्यादि कवि की कविताओं में सहज ही उभर आते हैं - खो जाता हूँ उस सोंधी मिट्टी में /वही गलियाँ, वही नीम, वही माँ, वही प्यार/शायद दूर कहीं कोई पुकारता है मुझे। यद्यपि ग्राम्य जीवन से सम्बन्धित अनेकों कविताएं पूर्ववर्ती कवियों द्वारा लिखी गयी हैं मगर यहाँ पर साम्राज्यवादी ताकतों से टक्कर लेती एक ग्रामीण महिला की सोच को कवि की चैंकाने वाली पंक्तियाँ माना जा सकता है-गाँव की एक अनपढ़ महिला/ने मुझसे पूछा/सुना है, अमरीका ने/आटा चक्की का पेटेंट/करा लिया है/ऐसा कैसे हो सकता है/यह तो हमारे पुरखों की अमानत है।

कृष्ण कुमार यादव ने अभिलाषा में कविता को वस्तुमत्ता तथा समग्रता के बोध से साधारण को भी असाधारण के अहसास से यथार्थ दृष्टि प्रदान की है, जो प्रगतिशीलता चेतना की आधुनिकता बोध से युक्त चित्तवृत्ति का प्रतिबिम्ब है। इसमें कवि मन भी है ओर जन मन भी। मनुष्य इस संसार में सामाजिकता की सीमाओं में अकेला नहीं रहता। उसके साथ समाज रहता है, अतः अपने सम्पर्कों से मिली अनुभूति का आभ्यन्तरीकरण करते हुए कवि ने अपनी भावना की संवेदनात्मकता को विवेकजन्य पहचान भी प्रदान की है। मन के सुुकुमार भावों के स्पन्दन, कविता की किलकारियों के रूप में स्वतः ही गूंज उठे हैं। कहीं कोई कृत्रिमता नहीं, कहीं कोई मलाल नहीं और न ही दायित्व-बोध और कवि कर्म में पांडित्य प्रदर्शन का कोई भाव परिलक्षित होता है। अभिलाषा संग्रह की कविताएं वाकई एक नए पथ का निर्माण करती हैं, जहाँ अत्यधिक उपमानों, भौतिकता, व दुरूहता की बजाय स्वाभाविकता, समाजनिष्ठा एवं जागरुक संवेदना है, जो कि कविता की लय बचाने हेतु जरूरी है। कविता समकालीन लेखन और सृजन के समसामयिक बोध की परिणति है सो ‘‘अभिलाषा’’ की रचनाएँ भी इस तथ्य से अछूती नहीं हंै।

वैश्विक जीवन दृष्टि, आधुनिकता बोध तथा सामाजिक सन्दर्भों को विविधता के अनेक स्तरों पर समेटे प्रस्तुत संकलन के अध्ययन से आभासित होता है कि कवि को विपुल साहित्यिक ऊर्जा सम्पन्न कवि ह्नदय प्राप्त है, जिससे वह हिन्दी भाषा के वांगमय को स्मृति प्रदान करेंगे।निश्चितत: कृष्ण कुमार यादव का यह पहला काव्य संग्रह पठनीय एवं संग्रहणीय है।
समालोच्य कृति- अभिलाषा (काव्य संग्रह)/कवि- कृष्ण कुमार यादव/प्रकाशक- शैवाल प्रकाशन, दाऊदपुर, गोरखपुर पृष्ठ- 144, मूल्य- 160 रुपये/ प्रकाशन वर्ष- 2005/समीक्षक-गोवर्धन यादव 103, कावेरी नगर, छिंदवाड़ा (म0प्र0)-480001

(साभार: कथाबिम्ब, त्रैमासिक पत्रिका, मुम्बई, अप्रैल-जून 2006)

मंगलवार, 23 जून 2009

अमर उजाला में 'शब्द सृजन की ओर' ब्लॉग की चर्चा

''शब्द सृजन की ओर'' पर 19 जून 2009 को प्रस्तुत पोस्ट "समोसा हुआ 1000 साल का" को प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक पत्र 'अमर उजाला' ने 23 जून 2009 को अपने सम्पादकीय पृष्ठ पर 'ब्लॉग कोना' में स्थान दिया! ... आभार!!

सोमवार, 22 जून 2009

भारतीय साहित्य में कानपुर के योगदान पर गोष्ठी

कानपुर सिर्फ एक नगर का नाम नहीं है, बल्कि सभ्यता-संस्कृति-साहित्य की लम्बी परम्परा का नाम है। इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए होरी एवं यूएसएम पत्रिका के तत्वाधान में मर्चेंट चेम्बर्स सभागार, कानपुर में 21 जून, 2009 को ‘‘भारतीय साहित्य में कानपुर क्षेत्र का योगदान‘‘ विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। गौरतलब है कि आदि कवि बाल्मीकि द्वारा बिठूर में रचित रामायण, कवि भूषण, बीरबल से लेकर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रताप नारायण मिश्र, गया प्रसाद शुक्ल ‘स्नेही’, जगदम्बा प्रसाद ‘हितैषी’, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, हसरत मोहानी, गणेश शंकर विद्यार्थी, श्याम लाल गुप्त ‘पार्षद‘, भगवती चरण वर्मा की गौरवशाली विद्वत परम्परा यहीं की देन है। साहित्य के तमाम दिग्गजों ने विभिन्न क्षेत्रों से आकर कानपुर को अपनी कर्मभूमि बनाया तो यहाँ के तमाम साहित्यकार-पत्रकार देश भर में घूम-घूम कर अलख जगाते रहे।


मुख्य वक्ता के रूप में चर्चित कथाकार पद्मश्री गिरिराज किशोर ने कानपुर में साहित्य एवं पत्रकारिता की परम्परा पर विस्तृत प्रकाश डाला एवं युवा पीढ़ी को इनसे जोड़ने की अपील की। उन्होंने कानपुर के साहित्यिक इतिहास को उद्धृत करते हुए कहा कि यह शहर बालकृष्ण शर्मा नवीन, सनेही जी, गणेश शंकर विद्यार्थी एवं पार्षद जी जैसी विभूतियों का है पर हमारी नई पीढ़ी इनके कार्यों को आगे बढ़ाने में सफल नहीं रही। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद, लखनऊ, बनारस जैसे शहरों की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाली कालजयी रचनाएं भला कौन नहीं जानता होगा, पर कानपुर दुर्भाग्यशाली ही रहा। मूर्धन्य साहित्यकारों और पत्रकारों के शहर का होने के बाद भी अब तक कानपुर (कम्पू) पर कालजयी रचना प्रकाशित नहीं हुई। मुख्य अतिथि एवं कबीर शांति मिशन के संस्थापक राकेश कुमार मित्तल, आई0ए0एस0 ने साहित्य की प्रत्येक विधा में कानपुर के योगदान को सराहा और जीवन मूल्यों की स्थापना में साहित्य के अप्रतिम योगदान की चर्चा की। अध्यक्षता कर रहे राष्ट्रभाषा प्रचार समिति- उत्तर प्रदेश के संयोजक व मानस संगम के संयोजक पं0 बद्री नारायण तिवारी ने कानपुर की गौरवशाली परम्परा को दोहराते हुए कहा कि नगर के साहित्य ने वैश्विक पहचान बनाई है। जरूरत इसके प्रचार-प्रसार की है। उन्होंने इस कड़ी में नगर में मानस संगम द्वारा स्थापित शहीद उपवन की भी चर्चा की, जिसके माध्यम से क्रान्तिकारियों एवं क्रान्तिकारी रचनाओं को संजोया गया है।

संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए चर्चित युवा साहित्यकार एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि साहित्य की यात्रा वहीं से आरम्भ होती है, जहाँ से संस्कृति की यात्रा और कानपुर आदिकाल से ही साहित्य एवं संस्कृति का प्रणेता रहा है। कानपुर में क्रान्तिकारी साहित्य को उद्धृत करते हुए श्री यादव ने कहा कि व्यवस्था बदलाव के लिए सियासी नारे की जरूरत नहीं होती, सियासी नारे तो हर साल बदल जाते हैं। जरूरत इन्सान की सोच बदलने की है और साहित्य यह सोच बदलने की काबिलियत रखता है। आकाशवाणी दिल्ली के निदेशक लक्ष्मीशंकर बाजपेई ने कानपुर के रचनाकारों की रचनाओं को विलुप्त होने से बचाने की बात कही तो कवयित्री व लेखिका डा0 प्रभा दीक्षित ने कानपुर के साहित्य में महिला लेखन एवं नारी विमर्श को आगे बढ़ाया। प्राचार्य एवं लेखक डा0 यतीन्द्र तिवारी ने साहित्य में कानपुर के ऐतिहासिक योगदान व डा0 सुरेश अवस्थी ने वर्तमान परिदृश्य पर चर्चा की। सूचना विभाग के उपनिदेशक अशोक बनर्जी ने साहित्य के साथ-साथ नौटंकी के क्षेत्र में कानपुर की विशिष्टता को उभारा तो अरूण प्रकाश अग्निहोत्री ने पुस्तक मेला की भूमिका रेखांकित की। डाॅ0 राष्ट्रबन्धु ने बाल साहित्य के क्षेत्र में कानपुर के अवदान की चर्चा करते हुए कहा कि हर रचनाकार मन से बाल साहित्यकार भी होता है। होरी पत्रिका के संपादक राज कुमार सचान ‘होरी‘ ने पूरी तरह कविता पर केन्द्रित पत्रिका के प्रकाशन के औचित्य व आज की आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि होरी में काव्य की सभी विधाओं और हिन्दी-उर्दू रचनाओं को एक साथ प्रकाशित कर भाषायी एकता को मजबूत बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

इस अवसर पर ‘कैरियर मानीटर‘ पाक्षिक समाचार पत्र के प्रवेशांक का लोकार्पण भी किया गया। होरी और यूएसएम पत्रिका पर परिचर्चा में डा0 गायत्री सिंह इत्यादि ने समीक्षात्मक टिप्पणियाँ की। मानस संगम व उत्कर्ष अकादमी द्वारा उमाशंकर मिश्र एवं राज कुमार सचान ‘होरी‘ का अभिनन्दन किया गया तो घाटमपुर पुखरांया नागरिक परिषद ने ‘होरी‘ को कवि कुलभूषण उपाधि दी। डा0 नारायणी शुक्ला ने सरस्वती गान द्वारा कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई तो 6 सगी अनवरी बहनों ने वन्देमातरम् एवं राष्ट्रगान द्वारा कार्यक्रम में ओज भरा। यूएसएम पत्रिका के संपादक उमाशंकर मिश्र ने इस अवसर पर कानपुर पर एक विशेषांक निकालने की घोषणा की, जिसे नगर के साहित्यकारों-बुद्धिजीवियों द्वारा सराहा गया। मानस संगम, उत्कर्ष अकादमी एवं डा0 महमूद रहमानी के सौजन्य से आयोजित इस कार्यक्रम के अन्त में कानपुर के साहित्य को अपनी गरिमामयी साधना से गौरवान्वित करने हेतु साहित्यकारों-कलाकारों को सम्मानित किया गया। तात्याराव टोपे के वंशज विनायक राव टोपे का भी सम्मान किया गया। कार्यक्रम का संचालन उत्कर्ष अकादमी के निदेशक डा0 प्रदीप दीक्षित ने किया। इस अवसर पर दुर्गा चरण मिश्र, सत्यकाम पहारिया, मनोज सेंगर, अनिल दीक्षित, हिन्दुस्तान अकेला, कमल मुसद्दी, एस0पी0 सिंह, मुकुल नारायण तिवारी, पवन तिवारी, श्रीराम तिवारी, अभिनव नारायण तिवारी, गीता सिंह सहित तमाम साहित्यकार, पत्रकार, बुद्विजीवी एवं नागरिक जन उपस्थित रहे।

शुक्रवार, 19 जून 2009

समोसा हुआ 1000 साल का !!

समोसा भला किसे नहीं प्रिय होगा। समोसे का नाम आते ही दिल खुश हो जाता है और मुँह में पानी आ जाता है। विदेशियों के समक्ष भी भारतीय स्नैक्स की बात हो, तो समोसे के जिक्र के बिना बात अधूरी ही लगती है। यही कारण है कि जिस तरह भारतीयों में विदेशों से आए पिज्जा और बर्गर का क्रेज है, उसी प्रकार भारतीय समोसा भी विदेशों में फास्ट फूड के रूप में काफी प्रसिद्ध है। ऐसा कोई विरला ही दुर्भाग्यशाली व्यक्ति होगा जिसने समोसे का स्वाद न लिया हो। यहाँ तक कि फिल्मों और राजनीति में भी समोसे को लेकर तमाम जुमले हैं। लालू प्रसाद यादव को लेकर प्रचलित जुमला मशहूर है कि- ‘‘जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेगा बिहार में लालू।‘‘ फिल्मों और राजनीति से परे तमाम साहित्यिक-सांस्कृतिक गोष्ठियां, सरकारी आयोजन एवं कोई भी कार्यक्रम समोसे के बिना अधूरा है। ऐसे में इस स्टड डीप फ्राई समोसे का स्वाद छोटे-बड़े सभी लोगों की जुबां पर है, तो हैरान होने की जरूरत नहीं।

समोसे के बारे में सबसे रोचक तथ्य यह है कि इन महाशय की उम्र एक हजार साल हो चुकी है, पर अपने जवां अन्दाज से सभी को ललचाये रहते हैं। माना जाता है कि सर्वप्रथम दसवीं शताब्दी में मध्य एशिया में समोसा एक व्यंजन के रूप में सामने आया था। 13-14वीं शताब्दी में व्यापारियों के माध्यम से समोसा भारत पहुँचा। महान कवि अमीर खुसरो (1253-1325) ने एक जगह जिक्र किया है कि दिल्ली सल्तनत में उस दौरान स्टड मीट वाला घी में डीप फ्राई समोसा शाही परिवार के सदस्यों व अमीरों का प्रिय व्यंजन था। 14वीं शताब्दी में भारत यात्रा पर आये इब्नबतूता ने मो0 बिन तुगलक के दरबार का वृतांत देते हुए लिखा कि दरबार में भोजन के दौरान मसालेदार मीट, मंूगफली और बादाम स्टफ करके तैयार किया गया लजीज समोसा परोसा गया, जिसे लोगों ने बड़े चाव से खाया। यही नहीं 16वीं शताब्दी के मुगलकालीन दस्तावेज आईने अकबरी में भी समोसे का जिक्र बकायदा मिलता है।

समोसे का यह सफर बड़ा निराला रहा है। समोसे की उम्र भले ही बढ़ती गई पर पिछले एक हजार साल में उसकी तिकोनी आकृति में जरा भी परिवर्तन नहीं हुआ। आज समोसा भले ही शाकाहारी-मांसाहारी दोनों रूप में उपलब्ध है पर आलू के समोसों का कोई सानी नहीं है और यही सबसे ज्यादा पसंद भी किया जाता है। इसके बाद पनीर एवं मेवे वाले समोसे पसंद किये जाते हैं। अब तो मीठे समोसे भी बाजार में उपलब्ध हैं। समोसे का असली मजा तो उसे डीप फ्राई करने में है, पर पाश्चात्य देशों में जहाँ लोग कम तला-भुना पसंद करते हैं, वहां लोग इसे बेक करके खाना पसंद करते हैं। भारत विभिन्नताओं का देश है, सो हर प्रांत में समोसे के साथ वहाँ की खूबियाँ भी जुड़ती जाती हैं। उ0प्र0 व बिहार में आलू के समोसे खूब चलते हैं तो गोवा में मांसाहारी समोसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। पंजाबी समोसा खूब चटपटा होता है तो चाइनीज क्यूजीन पसंद करने वालों के लिए नूडल्स स्टड समोसे भी उपलब्ध हैं। बच्चों और बूढ़ों दोनों में समोसे के प्रति दीवानगी को भुनाने के लिए तमाम बहुराष्ट्रीय कम्पनियां इसे फ्रोजेन फूड के रूप में भी बाजार में प्रस्तुत कर रही हैं।
तो आइये समोसा जी की 1000 वीं वर्षगाँठ मनाई जाय और ढेर सारे समोसे खाये जायें !!

शुक्रवार, 5 जून 2009

आपके पर्यावरण को आपकी जरूरत है

धरती पर पर्यावरण को समृद्ध बनाने, पर्यावरण संरक्षण एवं पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को मानवीय रूप प्रदान करने हेतु हर वर्ष 5 जून को ‘‘विश्व पर्यावरण दिवस‘‘ के रूप में मनाया जाता है। विभिन्न देशों के बीच पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर पारस्परिक सहयोग को बढ़ावा देना इसके प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है। इस दिवस की शुरूआत संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा के द्वारा वर्ष 1972 में स्टाकहोम में मानव पर्यावरण पर आयोजित कान्फ्रेंस में की गई थी। विश्व भर में इस दिन सतत् विकास की प्रक्रिया में आम लोगों को शामिल करने के मद्देनजर विश्व पर्यावरण दिवस पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य विश्व समुदाय का ध्यान पर्यावरण और उससे जुड़ी राजनीति की ओर आकृष्ट करना होता है। 1972 में ही संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का भी आरम्भ किया गया। गौरतलब है कि यह पहला ऐसा मौका था, जब विश्व पर्यावरण और उससे जुड़ी राजनीति,आर्थिक और सामाजिक समस्याओं पर इतने बड़े मंच पर चर्चा हुई थी। विश्व पर्यावरण दिवस पर विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से इस बात पर खास जोर दिया जाता है कि पर्यावरण और उससे जुड़े मुद्दों के प्रति आम धारणा बदलने में समुदाय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा प्रतिवर्ष विभिन्न थीमों पर विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष यह आयोजन मैक्सिको द्वारा किया जा रहा है और थीम है- ‘‘आपके पर्यावरण को आपकी जरूरत है, जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए एक जुट हो।‘‘ निश्चिततः भारत समेत पूरे विश्व को इस दिवस को एक पवित्र अभियान से जोड़ते हुए न सिर्फ वृक्षारोपण की तरफ अग्रसर होना चाहिए बल्कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की दिशा में भी प्रभावी कदम उठाने होंगे। तो आइये हम संकल्प लें कि इस दिन हम एक वृक्ष अवश्य लगायेंगे, न सिर्फ लगायेंगे बल्कि इसके फलने-फूलने की जिम्मेदारियों का भी निर्वाह करेंगे।

गुरुवार, 4 जून 2009

ई-पार्क

बचपन में पढ़ते थे
ई फॉर एलीफैण्ट
अभी भी ई अक्षर देख
भारी-भरकम हाथी का शरीर
सामने घूम जाता है
पर अब तो ई
हर सवाल का जवाब बन गया है
ई-मेल, ई-शॉप, ई-गवर्नेंस
हर जगह ई का कमाल
एक दिन अखबार में पढ़ा
शहर में ई-पार्क की स्थापना
यानी प्रकृति भी ई के दायरे में
पहुँच ही गया एक दिन
ई-पार्क का नजारा लेने
कम्प्यूटर-स्क्रीन पर बैठे सज्जन ने
माउस क्लिक किया और
स्क्रीन पर तरह-तरह के देशी-विदेशी
पेड़-पौधे और फूल लहराने लगे
बैकग्राउण्ड में किसी फिल्म का संगीत
बज रहा था और
नीचे एक कंपनी का विज्ञापन
लहरा रहा था
अमुक कोड नंबर के फूल की खरीद हेतु
अमुक नम्बर डायल करें
वैलेण्टाइन डे के लिए
फूलों की खरीद पर
आकर्षक गिटों का नजारा भी था
पता ही नहीं चला
कब एक घंटा गुजर गया
ई-पार्क का मजा ले
ज्यों ही चलने को हुआ
उन जनाब ने एक कम्प्यूटराइज्ड रसीद
हाथ में थमा दी
आखिर मैंने पूछ ही लिया
भाई! न तो पार्क में मैने
परिवार के सदस्यों के साथ दौड़ लगायी
न ही अपने टॉमी कुत्ते को घुमाया
और न ही मेरी पत्नी ने पूजा की खातिर
कोई फूल या पत्ती तोड़ी
फिर काहे की रसीद ?
वो हँसते हुये बोला
साहब! यही तो ई-पार्क का कमाल है
न दौड़ने का झंझट
न कुत्ता सभालने का झंझट
और न ही पार्क के चौकीदार द्वारा
फूल पत्तियाँ तोड़ते हुए पकड़े जाने पर
सफाई देने का झंझट
यहाँ तो आप अच्छे-अच्छे
मनभावन फूलों व पेड़-पौधें का नजारा लीजिये
और आँखों को ताजगी देते हुये
आराम से घर लौट जाईये !!

बुधवार, 27 मई 2009

नेहरु चाचा आओ ना (पुण्य-तिथि पर)


नेहरु चाचा आओ ना
दुनिया को समझाओ ना
बच्चे कितने प्यारे होते
कोई उन्हे सताये ना

नेहरु चाचा आओ ना
मधु मुस्कान दिखाओ ना
तुम गुलाब की खुशबू हो
बचपन को महकाओ ना

नेहरु चाचा आओ ना
उजियारा फैलाओ ना
देशभक्त हों, पढें लिखें
ऐसा पाठ पढाओ ना

नेहरु चाचा आओ ना !!

शनिवार, 23 मई 2009

अमेरिका से आरम्भ होकर आज विश्वभर में गूंजेगा मानस पाठ

भारत प्राचीन काल से ही ‘वसुधैव कुटुंबकम‘ का परिपालक रहा है। भारत की पवित्र भूमि पर मानवीय अवतार लेकर तमाम देवी-देवताओं ने भी यहीं से इसकी अलख जगाई। रामचरित मानस की महिमा से भला कौन अपरिचित होगा। भारत ही नहीं बल्कि विश्व के कोने-कोने में तुलसीदास रचित रामचरितमानस को बड़ी श्रद्धा के साथ पढ़ा व देखा जाता है। अब इसी रामचरितमानस के वैश्विक अखंड पाठ का आगाज 23 मई 2009 को डालास, अमेरिका में वहां के समयानुसार अपरान्ह 2 बजे किया जा रहा है। वस्तुतः इसके अन्तर्गत दुनिया में प्रचलित सभी टाइमजोनों में हिंदी जानने वाले प्रवासी भारतीयों को एक चक्र में जोड़कर मानस विश्व परिक्रमा की योजना बनाई गई है, जिसमें कांफ्रेंसिंग के माध्यम से एक देश के भारतीयों को दूसरे देश और दूसरे को तीसरे फिर क्रमशः जोड़ कर यह अखंड पाठ पूरा किया जायेगा। इस वैश्विक अखंड मानस पाठ में टाइम जोन के मुताबिक दो-दो घंटे में विभिन्न देश एक दूसरे से जुड़ते जायेंगे। डालास से आरम्भ होकर दो घंटे बाद अमेरिका के ही कैलीफोर्निया में मानस प्रेमी पाठ से जुड़ जायेंगे। जिस समय कैलीफोर्निया में दो घंटे पूरे हो रहे होंगे फीजी के हवाई शहर में सुबह के 11 बजे होंगे। फीजी के लोग कैलीफोर्निया से जुड़ कर आगे का पाठ शुरू करेंगे। दो घंटे बाद जब आस्ट्रेलिया में प्रातः के 11 बजेंगे, वहां के लोग फीजी से जुड़ कर अखंड पाठ को आगे बढ़ाएंगे। इसी क्रम में सिंगापुर, भारत, माॅरीशस, अफ्रीका (नाइजीरिया), यूके (लंदन) जुड़ते जायेंगे। यहां से जब 24 मई को फिर से मानस पाठ अमेरिका के डालास में वापस लौटेगा तब वहां प्रातः 10 बज रहे होंगे। यहां दो घंटे पाठ चलेगा और इस तरह पूरी हो जायेगी रामचरित मानस के अखण्ड पाठ की अनोखी विश्व परिक्रमा।

भारत के तीन शहर भी इस अनूठे मानस पाठ विश्व परिक्रमा से जोड़े गये हंै। सिंगापुर से पहले 24 मई को वाराणसी प्रातः 10ः30 बजे जुड़ेगा। डेढ़ घंटे बाद अर्थात 12 बजे दोपहर को दिल्ली में शुरू होगा। यहां चार घंटे पाठ चलेगा। सांय 4 बजे मुंबई जुड़ जायेगा जहां दो घंटे पाठ चलेगा। मुंबई से जुड़ कर नाइजीरिया के प्रवासी भारतीय वहां के समयानुसार सांय 3 बजे पाठ शुरू कर देंगे।

इस पवित्र अभियान के पीछे डालास में साटवेयर कंपनी ‘मिगमैक्स‘ चला रहे भारतीय मूल के प्रबंधन गुरू डा0 नंदलाल सिंह एवं उनके साथी शैलेश मिश्र महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने कांफ्रेंसिंग का एक ऐसा विशेष साफ्टवेयर तैयार किया है, जिससे एक देश के लोग जहां से पाठ खत्म कर रहे होंगे दूसरे देश के लोग उसके पहले से ही उनके साथ पाठ शुरू कर देंगे। इस प्रकार जब दो देशों के लोग पाठ करने के लिए जुड़ रहे होंगे उस संधिकाल में कम से कम दस मिनट तक दोनों देशों में संयुक्त पाठ चल रहा होगा। बतौर डा0 नंदलाल सिंह- ‘‘ रामचरितमानस के वैश्विक अखंड पाठ का अपने आप में यह प्रथम अभिनव प्रयास है जिससे संपूर्ण विश्व में मानस पाठ के माध्यम से वैश्विक सांस्कृतिक एकता मजबूत होगी और भारतीय संस्कृति व हिंदी का भी प्रचार होगा।‘

मंगलवार, 12 मई 2009

भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा द्वारा कृष्ण कुमार यादव को 'श्री प्यारे मोहन स्मृति सम्मान'

भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा युवा साहित्यकार एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव को बाल साहित्य में उनके उत्कृष्ट योगदान के मद्देनजर ‘‘श्री प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘ से सम्मानित किया गया। इस सम्मान के तहत श्री यादव को भारतीय बाल कल्याण संस्थान के अध्यक्ष श्री रामनाथ महेन्द्र ने स्मृति चिन्ह, अंगवस्त्रम्, प्रशस्ति पत्र एवं नकद राशि देकर विभूषित किया। गौरतलब है कि श्री यादव को यह सम्मान रामपुर में आयोजित 44वें बाल साहित्यकार सम्मान समारोह में दिया जाना था, पर अस्वस्थता के चलते श्री यादव वहाँ सम्मान लेने नहीं पहुँच सके थे।


इसी क्रम में कानपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में यह सम्मान श्री यादव को प्रदान किया गया। उक्त अवसर पर भारतीय बाल कल्याण संस्थान के अध्यक्ष श्री रामनाथ महेन्द्र, उपाध्यक्ष श्री शम्भूनाथ टण्डन, महामंत्री श्री हरिभाऊ खाण्डेकर, प्रसिद्व बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु सहित तमाम साहित्यकार उपस्थित रहे।

(रिपोर्ट: डा0 राष्ट्रबन्धु, सम्पादक-बाल साहित्य समीक्षा, 109/309, रामकृष्ण नगर,कानपुर)

रविवार, 10 मई 2009

'मानस संगम' और 'उत्कर्ष अकादमी' द्वारा कृष्ण कुमार यादव का 'क्रांति-दिवस' पर सम्मान

क्रांति-दिवस 9 मई, के अवसर पर कृष्ण कुमार यादव का प्रतिष्ठित संस्था "मानस संगम" और "उत्कर्ष अकादमी" द्वारा सम्मान किया गया। पिछले वर्ष 9 मई के दिन ही कृष्ण कुमार यादव द्वारा संपादित पुस्तक "क्रांति यज्ञ: 1857-1947 की गाथा" का भारत सरकार के गृह राज्य मंत्री श्री श्री प्रकाश जायसवाल और संचार राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा कानपुर में एक भव्य समारोह में विमोचन किया गया था. इस अवसर पर 7 सगी अनवरी बहनों ने सद्भाव की मिसाल पेश करते हुए वन्दे-मातरम गीत प्रस्तुत किया और तत्पश्चात "मानस संगम" के संयोजक डा. बद्री नारायण तिवारी और उत्कर्ष अकादमी के निदेशक डा. प्रदीप दीक्षित के सान्निध्य में कृष्ण कुमार यादव को अंगवस्त्रम, स्मृति-चिह्न और नारियल के साथ "मानस संगम" द्वारा ही प्रकाशित पुस्तक "क्रांति-यज्ञ" की प्रति विमोचन के एक वर्ष पूरे होने पर भेंट की गई.

( रिपोर्ट: सुरेन्द्र प्रताप सिंह, पूर्व अध्यक्ष-बार एसोसिअशन कानपुर, महामंत्री-मानस संगम)

"बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव" का विमोचन

लेखन क्षेत्र में दिनों-ब-दिन चुनौतियाँ बढ़ती जा रही हैं और इन चुनौतियों के बीच ही लेखक का व्यक्तित्व उभर कर सामने आता है। प्रशासनिक पद पर रहकर साहित्य साधना निश्चित ही दुरूह कार्य है पर इस दुरूह कार्य को भी सफलता पूर्वक कर दिखाया है भारतीय डाक सेवा के युवा प्रशासनिक अधिकारी कृष्ण कुमार यादव ने। श्री यादव की इस बात के लिए विशेष सराहना की जानी चाहिए कि जहाँ पद्य की तुलना में गद्य लिखना कहीं अधिक मुश्किल कार्य है, वहीं अब तक एक काव्य, दो निबंध-संग्रह और क्रांतियज्ञ जैसी पुस्तकें लिखकर श्री यादव अपनी सशक्त रचनाधिर्मिता का परिचय दे चुके हैं। उनका लेखन पाठकों के मन को छू जाता है और यही एक लेखक की वास्तविक सफलता होती है। उक्त उदगार सुविख्यात साहित्यकार पद्मश्री अलंकृत गिरिराज किशोर जी ने युवा प्रशासक एवं साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव के व्यक्तित्व-कृतित्व पर उमेश प्रकाशन, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित एवं पं0 दुर्गा चरण मिश्र द्वारा सम्पादित ''बढ़ते चरण शिखर की ओर: कृष्ण कुमार यादव'' नामक पुस्तक के 9 मई 2009 को ब्रह्मानन्द डिग्री कालेज, कानपुर के प्रेक्षागार में आयोजित लोकार्पण समारोह को बतौर मुख्य अतिथि सम्बोधित करते हुए व्यक्त किये। श्री किशोर ने कहा कि अल्पायु में ही श्री कुष्ण कुमार यादव ने उच्च प्रशासनिक पद की तमाम व्यस्तताओं के बीच जिस तरह साहित्य की ऊँचाइयों को भी स्पर्श किया है वह समाज और विशेषकर युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। ऐसे युवा व्यक्तित्व पर इतनी कम उम्र में पुस्तक का प्रकाशन स्वागत योग्य है।

समारोह की अध्यक्षता अध्यक्षता कर रहे राष्ट्रभाषा प्रचार समिति उ0प्र0 के संयोजक एवं मानस संगम के प्रणेता डा0 बद्री नारायण तिवारी ने अपने सम्बोधन में कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को सराहा और कहा कि ‘क्लब कल्चर‘ एवं अपसंस्कृति के इस दौर में जब अधिसंख्य प्रशासनिक अधिकारी बिना प्रभावित हुए नहीं रह पाते तो ऐसे में हिन्दी-साहित्य के प्रति अटूट निष्ठा व समर्पण शुभ एवं स्वागत योग्य है। उन्होंने कहा कि यह साहित्य जगत का सौभाग्य है कि उसे श्री यादव के रूप में एक और हीरा मिल गया है। उसे सहेज कर रखना औेर आगे बढ़ाना हमारी सबकी जिम्मेदारी है। डा0 तिवारी ने कहा कि जो लोग अच्छा कार्य कर रहे हैं उन्हें आगे बढ़ाना ही होगा यह चापसूसी नहीं बल्कि हम सबका दायित्व है।
समारोह में उपस्थिति लब्धप्रतिष्ठित विद्धतजनों ने कृष्ण कुमार यादव के कृतित्व के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। डा0 सूर्य प्रसाद शुक्ल ने कहा कि श्री यादव भाव, विचार और संवेदना के कवि हैं। उनके भाव बोध में विभिन्न तन्तु परस्पर इस प्रकार संगुम्फित हैं कि इन्सानी जज्बातों की, जिन्दगी के सत्यों की पहचान हर पंक्ति-पंक्ति और शब्द-शब्द में अर्थ से भरी हुई अनुभूति की अभिव्यक्ति से अनुप्राणित हो उठी है। वरिष्ठ साहित्यकार डा0 यतीन्द्र तिवारी ने कहा कि आज के संक्रमणशील समाज में जब बाजार हमें नियमित कर रहा हो और वैश्विक बाजार हावी हो रहा हो ऐसे में कृष्ण कुमार जी की कहानियाँ प्रेम, संवेदना, मर्यादा का अहसास करा कर अपनी सांस्कृतिक चेतना के निकट ला देती है। अपने सम्बोधन में डा0 राम कृष्ण शर्मा ने कहा कि श्री यादव की सेवा आत्मज्ञापन के लिए नहीं बल्कि जन-जन के आत्मस्वरूप के सत्यापन के लिए है। इसी क्रम में भारतीय बाल कल्याण संस्थान के अध्यक्ष श्री रामनाथ महेन्द्र ने श्री यादव को बाल साहित्य का चितेरा बताया। प्रसिद्व बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु ने इस बात पर प्रसन्नता जाहिर की कि श्री यादव ने साहित्य के आदिस्रोत और प्राथमिक महत्व के बाल साहित्य के प्रति लेखन निष्ठा दिखाई है। उन्होंने कहा कि अब से 20-25 साल पहले पुस्तक पूर्ण कर लेना ही बड़ी बात होती थी तब विमोचन या लोकार्पण जैसे समारोह यदा-कदा ही होते थे, आज श्री यादव की पुस्तक का लोकार्पण समारोह इस बात का प्रतीक है कि टीवी व इण्टरनेट के युग में भी हिन्दी साहित्य को एक बार फिर से सम्मान और समाज की स्वीकार्यता मिल रही है। गाजीपुर से पधारे समाजसेवी श्री राजेन्द्र प्रसाद ने कहा कि कृष्ण कुमार यादव में जो असीम उत्साह, ऊर्जा, सक्रियता और आकर्षक व्यक्तित्व का चुम्बकत्व गुण है उसे देखकर मन उल्लसित हो उठता है। इतनी कम उम्र में उन्होंने जितनी बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की हैं वो माँ सरस्वती एवं माँ शारदा की कृपा का ही प्रतिफल हैं। बी0एन0डी0 कालेज के प्राचार्य डा0 विवेक द्विवेदी ने श्री यादव के कृतित्व को अनुकरणीय बताते हुए युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत माना। पूर्व उपसूचना निदेशक शम्भू नाथ टण्डन ने एक युवा प्रशासक और साहित्यकार पर जारी इस पुस्तक में व्यक्त विचारों के प्रसार की बात कही। इस अवसर पर संस्कृत के उद्भट विद्वान पं0 पीयूष ने श्री यादव को उनकी साहित्यिक सफलता पर बधाई व आर्शीवचन देते हुए कहा कि जब किसी कृतिकार की कृति को विद्वानों का आशीर्वाद मिल जाए स्वीकृत मिल जाए तो समझो वो निःसंदेह सफल कृतिकार है। आज श्री यादव उसी कोटि में आ खड़ हुये हैं। समारोह के अन्त में अपने कृतित्व पर जारी पुस्तक व लब्ध प्रतिष्ठित महानुभावों के आशीर्वचनों से अभिभूत कृष्ण कुमार यादव ने आज के दिन को अपने जीवन का स्वर्णिम दिन बताया। उन्होंने कहा कि साहित्य साधक की भूमिका इसलिए भी बढ़ जाती है कि संगीत, नृत्य, शिल्प, चित्रकला, स्थापत्य इत्यादि रचनात्मक व्यापारों का संयोजन भी साहित्य में उसे करना होता है। उन्होने कहा कि पद तो जीवन में आते जाते हैं, मनुष्य का व्यक्तित्व ही उसकी विराटता का परिचायक है।

समारोह के दौरान कृष्ण कुमार यादव की साहित्यिक सेवाओं का सम्मान करते हुए विभिन्न संस्थाओं द्वारा उनका अभिनंदन एवं सम्मान किया गया। इन संस्थाओं में भारतीय बाल कल्याण संस्थान, मानस संगम, साहित्य संगम, उत्कर्ष अकादमी, मानस मण्डल, वीरांगना, मेधाश्रम, सेवा स्तम्भ, पं0 प्रताप नारायण मिश्र स्मारक समिति एवं एकेडमिक रिसर्च सोसाइटी प्रमुख हैं।

समारोह का शुभारम्भ मुख्य अतिथिगणों द्वारा माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन से हुआ। तत्पश्चात पुस्तक के सम्पादक श्री दुर्गा चरण मिश्र द्वारा सभी का स्वागत किया गया। इस अवसर पर कृष्ण कुमार यादव की कविता ‘माँ‘ को संगीत में ढालकर प्रवीण सिंह द्वारा अनुपम प्रस्तुति की गई तो 6 सगी अनवरी बहनों द्वारा प्रस्तुत ‘वन्दे मातरम्‘ ने सद्भाव की मिसाल पेश की। कार्यक्रम का संचालन उत्कर्ष अकादमी के निदेशक डा0 प्रदीप दीक्षित द्वारा किया गया। कार्यक्रम के अन्त में दुर्गा चरण मिश्र द्वारा उमेश प्रकाशन, इलाहाबाद की ओर से सभी को स्मृति चिन्ह भेंट किया गया। कार्यक्रम में श्रीमती आकांक्षा यादव, डा0 गीता चैहान, डा0 प्रेम कुमारी, डा0 हरीतिमा कुमार, सत्यकाम पहारिया, कमलेश द्विवेदी, आजाद कानपुरी, डा0 ओमेन्द्र कुमार, सुरेन्द्र प्रताप सिंह, अनिल खेतान, श्री एस0एस0 त्रिपाठी, सहित तमाम साहित्यकार, बुद्विजीवी, पत्रकारगण एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।


( रिपोर्ट: आलोक चतुर्वेदी, संपादक-साहित्य संगम, ,उमेश प्रकाशन, 100-लूकरगंज, इलाहाबाद)

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

रिश्तों का अर्थशास्त्र

रिश्तों के बदलते मायने
अब वे अहसास नहीं रहे
बन गये अहम् की पोटली
ठीक अर्थशास्त्र के नियमों की तरह
त्याग की बजाय माँग पर आधारित
हानि और लाभ पर आधारित
शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव
की तरह दरकते रिश्ते
ठीक वैसे ही
जैसे किसी उद्योगपति ने
बेच दी हो घाटे वाली कम्पनी
बिना समझे किसी के मर्म को
वैसे ही टूटते हैं रिश्ते
आज के समाज में
और अहसास पर
हावी होता जाता है अहम्।

बुधवार, 25 मार्च 2009

गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ का अद्भुत ‘प्रताप’ (पुण्य तिथि-२५ मार्च पर)

साहित्य की सदैव से समाज में प्रमुख भूमिका रही है। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान पत्र-पत्रिकाओं में विद्यमान क्रान्ति की ज्वाला क्रान्तिकारियों से कम प्रखर नहीं थी। इनमें प्रकाशित रचनायें जहाँ स्वतन्त्रता आन्दोलन को एक मजबूत आधार प्रदान करती थीं, वहीं लोगों में बखूबी जन जागरण का कार्य भी करती थीं। गणेश शंकर ‘विद्यार्थी‘ साहित्य और पत्रकारिता के ऐसे ही शीर्ष स्तम्भ थे, जिनके अखबार ‘प्रताप‘ ने स्वाधीनता आन्दोलन में प्रमुख भूमिका निभायी। प्रताप के जरिये न जाने कितने क्रान्तिकारी स्वाधीनता आन्दोलन से रूबरू हुए, वहीं समय-समय पर यह अखबार क्रान्तिकारियों हेतु सुरक्षा की ढाल भी बना।


गणेश शंकर ‘विद्यार्थी‘ का जन्म 26 अक्टूबर 1890 को अपने ननिहाल अतरसुइया, इलाहाबाद में हुआ था। उनके नाना सूरज प्रसाद श्रीवास्तव सहायक जेलर थे, अतः अनुशासन उन्हें विरासत में मिला। गणेश शंकर के नामकरण के पीछे भी एक रोचक वाकया है- उनकी नानी ने सपने में अपनी पुत्री गोमती देवी के हाथ गणेश जी की प्रतिमा दी थी, तभी से उन्होंने यह माना था कि यदि गोमती देवी का कोई पुत्र होगा तो उसका नामकरण गणेश शंकर किया जायेगा। मूलतः फतेहपुर जनपद के हथगाँव क्षेत्र के निवासी गणेश शंकर के पिता मुंशी जयनारायण श्रीवास्तव ग्वालियर राज्य में मुंगावली नामक स्थान पर अध्यापक थे। गणेश शंकर आरम्भ से ही किताबें पढ़ने के काफी शौकीन थे, इसी कारण मित्रगण उन्हें ‘विद्यार्थी‘ कहते थे। बाद में उन्होंने यह उपनाम अपने नाम के साथ लिखना आरम्भ कर दिया। विद्यार्थी जी की प्रारम्भिक शिक्षा पिता जी के स्कूल मुंगावली, जहाँ वे एंग्लो-वर्नाकुलर मिडिल स्कूल में अध्यापक थे, में हुई। विद्यार्थी जी उर्दू, फारसी एवं अंग्रेजी के अच्छे जानकार थे। 1904 में उन्होंने भलेसा से अंग्रेजी मिडिल की परीक्षा पास किया, जिसमें पहली बार हिंदी द्वितीय भाषा के रूप में मिली थी। तत्पश्चात पिताजी ने विद्यार्थी जी को पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी करने के लिए बड़े भाई शिवव्रत नारायण के पास कानपुर भेज दिया। कानपुर में आकर विद्यार्थी जी ने क्राइस्ट चर्च कालेज की प्रवेश परीक्षा दी पर भाई का तबादला मुंगावली हो जाने से आगे की पढ़ाई फिर वहीं हुई। वर्ष 1907 में विद्यार्थी जी आगे की पढ़ाई के लिए कायस्थ पाठशाला गये। इलाहाबाद प्रवास के दौरान विद्यार्थी जी की मुलाकात ‘कर्मयोगी‘ साप्ताहिक के सम्पादक सुन्दर लाल से हुई एवं इसी दौरान वे उर्दू पत्र ‘स्वराज्य‘ के संपर्क में भी आये। गौरतलब है कि अपनी क्रान्तिधर्मिता के चलते ‘स्वराज्य‘ पत्र के आठ सम्पादकों को सजा दी गई थी, जिनमें से तीन को कालापानी की सजा मुकर्रर हुई थी। सुन्दरलाल उस दौर के प्रतिष्ठित संपादकों में से थे। लोकमान्य तिलक को इलाहाबाद बुलाने के जुर्म में उन्हें कालेज से निष्कासित कर दिया गया था एवं इसी कारण उनकी पढ़ाई भी भंग हो गई थी। सुन्दरलाल के संपर्क में आकर विद्यार्थी जी ने ‘स्वराज्य‘ एवं ‘कर्मयोगी‘ के लिए लिखना आरम्भ किया। यहीं से पत्रकारिता एवं क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रति उनकी आस्था भी बढ़ती गई।


इलाहाबाद से गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ कानपुर आये एवं इसे अपनी कर्मस्थली बनाया। कानपुर में कलकत्ता से अरविंद घोष द्वारा सम्पादित ‘वन्देमातरम्‘ ने विद्यार्थी जी को आकृष्ट किया एवं इसी दौरान उनकी मुलाकात पं0 पृथ्वीनाथ मिडिल स्कूल के अध्यापक नारायण प्रसाद अरोड़ा से हुई। अरोड़ा जी की सिफारिश पर विद्यार्थी जी को उसी स्कूल में अध्यापक की नौकरी मिल गई। पर पत्रकारिता की ओर मन से प्रवृत्त विद्यार्थी जी का मन यहाँ भी नहीं लगा और नौकरी अन्ततः छोड़ दी। उस समय महावीर प्रसाद द्विवेदी कानपुर में ही रहकर ‘सरस्वती‘ का सम्पादन कर रहे थे। विद्यार्थी जी इस पत्र से भी सहयोगी रूप में जुड़े रहे। एक तरफ पराधीनता का दौर, उस पर से अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचार ने विद्यार्थी जी को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने पत्रकारिता को राजनैतिक चेतना को जोड़कर कार्य करना आरम्भ किया। इसी दौरान वे इलाहाबाद लौटकर वहाँ से प्रकाशित साप्ताहिक ‘अभ्युदय‘ के सहायक संपादक भी रहे। पर विद्यार्थी जी का मनोमस्तिष्क तो कानपुर में बस चुका था, अतः वे पुनः कानपुर लौट आये। कानपुर में विद्यार्थी जी ने 1913 से साप्ताहिक ‘प्रताप’ के माध्यम से न केवल क्रान्ति का नया प्राण फूँका बल्कि इसे एक ऐसा समाचार पत्र बना दिया जो सारी हिन्दी पत्रकारिता की आस्था और शक्ति का प्रतीक बन गया। प्रताप प्रेस में कम्पोजिंग के अक्षरों के खाने में नीचे बारूद रखा जाता था एवं उसके ऊपर टाइप के अक्षर। ब्लाक बनाने के स्थान पर नाना प्रकार के बम बनाने का सामान भी रहता था। पर तलाशी में कभी भी पुलिस को ये चीजें हाथ नहीं लगीं। विद्यार्थी जी को 1921-1931 तक पाँच बार जेल जाना पड़ा और यह प्रायः ‘प्रताप‘ में प्रकाशित किसी समाचार के कारण ही होता था। विद्यार्थी जी ने सदैव निर्भीक एवं निष्पक्ष पत्रकारिता की। उनके पास पैसा और समुचित संसाधन नहीं थे, पर एक ऐसी असीम ऊर्जा थी, जिसका संचरण स्वतंत्रता प्राप्ति के निमित्त होता था। ‘प्रताप‘ प्रेस के निकट तहखाने में ही एक पुस्तकालय भी बनाया गया, जिसमें सभी जब्तशुदा क्रान्तिकारी साहित्य एवं पत्र-पत्रिकाएं उपलब्ध थी। यह ‘प्रताप’ ही था जिसने दक्षिण अफ्रीका से विजयी होकर लौटे तथा भारत के लिये उस समय तक अनजान महात्मा गाँधी की महत्ता को समझा और चम्पारण-सत्याग्रह की नियमित रिपोर्टिंग कर राष्ट्र को गाँधी जी जैसे व्यक्तित्व से परिचित कराया। चैरी-चैरा तथा काकोरी काण्ड के दौरान भी विद्यार्थी जी ‘प्रताप’ के माध्यम से प्रतिनिधियों के बारे में नियमित लिखते रहे। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा रचित सुप्रसिद्ध देशभक्ति कविता ’पुष्प की अभिलाषा’ प्रताप अखबार में ही मई 1922 में प्रकाशित हुई। बालकृष्ण शर्मा नवीन, सोहन लाल द्विवेदी, सनेहीजी, प्रताप नारायण मिश्र इत्यादि ने प्रताप के माध्यम से अपनी देशभक्ति को मुखर आवाज दी।


विद्यार्थी जी एक पत्रकार के साथ-साथ क्रान्तिधर्मी भी थे। वे पहले ऐसे राष्ट्रीय नेता थे जिन्होंने काकोरी षडयंत्र केस के अभियुक्तों के मुकदमे की पैरवी करवायी और जेल में क्रान्तिकारियों का अनशन तुड़वाया। कानपुर को क्रान्तिकारी गतिविधियों का केन्द्र बनाने में विद्यार्थी जी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। सरदार भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, विजय कुमार सिन्हा, राजकुमार सिन्हा जैसे तमाम क्रान्तिकारी विद्यार्थी जी से प्रेरणा पाते रहे। वस्तुतः प्रताप प्रेस की बनावट ही कुछ ऐसी थी कि जिसमें छिपकर रहा जा सकता था तथा फिर सघन बस्ती में तलाशी होने पर एक मकान से दूसरे मकान की छत पर आसानी से जाया जा सकता था। बनारस षडयंत्र से भागे सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य प्रताप अखबार में उपसम्पादक थे। बाद में भट्टाचार्य और प्रताप अखबार से ही जुड़े पं0 राम दुलारे त्रिपाठी को काकोरी काण्ड में सजा मिली। भगत सिंह ने तो ‘प्रताप‘ अखबार में बलवन्त सिंह के छद्म नाम से लगभग ढाई वर्ष तक कार्य किया। सर्वप्रथम दरियागंज, दिल्ली में हुये दंगे का समाचार एकत्र करने के लिए भगत सिंह ने दिल्ली की यात्रा की और लौटकर ‘प्रताप’ के लिए सचिन दा के सहयोग से दो कालम का समाचार तैयार किया। चन्द्रशेखर आजाद से भगत सिंह की मुलाकात विद्यार्थी जी ने ही कानपुर में करायी थी, फिर तो शिव वर्मा सहित तमाम क्रान्तिकारी जुड़ते गये। यह विद्यार्थी जी ही थे कि जेल में भंेट करके क्रान्तिकारी राम प्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा छिपाकर लाये तथा उसे ‘प्रताप‘ प्रेस के माध्यम से प्रकाशित करवाया। जरूरत पड़ने पर विद्यार्थी जी ने राम प्रसाद बिस्मिल की माँ की मदद की और रोशन सिंह की कन्या का कन्यादान भी किया। यही नहीं अशफाकउल्ला खान की कब्र भी विद्यार्थी जी ने ही बनवाई।


विद्यार्थी जी का ‘प्रताप‘ तमाम महापुरूषों को भी आकृष्ट करता था। 1916 में लखनऊ कांग्रेस के बाद महात्मा गाँधी और लोकमान्य तिलक इक्के पर बैठकर प्रताप प्रेस आये एवं वहाँ दो दिन रहे। 1925 के कानपुर कांग्रेस अधिवेशन के दौरान विद्यार्थी जी स्वागत मंत्री रहे और जवाहर लाल नेहरू के साथ-साथ घोड़े पर चढ़कर अधिवेशन स्थल का भ्रमण करते थे। यह विद्यार्थी जी ही थे जिन्होंने श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद‘ को प्रताप प्रेस में रखा एवं उनके गान ‘राष्ट्र पताका नमो-नमो‘ को ‘झण्डा ऊँचा रहे हमारा‘ में तब्दील कर दिया। विद्यार्थी जी सिद्धांतप्रिय व्यक्ति थे। एक बार जब ग्वालियर नरेश ने उन्हें सम्मानित किया और कहा कि मुझे खुशी है कि आपके पिताजी मेरे अंतर्गत मुंगावली में कार्यरत रहे हैं, परन्तु आप मेरे बारे में अपने अखबार में लगातार विरोधी खबरें छाप रहे हैं। तो विद्यार्थी जी ने निडरता से कहा कि मैं आपका और पिताजी के आपसे सम्बन्धों का सम्मान करता हूँ, परन्तु इसके चलते अखबार के साथ अन्याय नहीं कर सकता। हाँ, यदि आप इन खबरों का प्रतिवाद लिखकर भेजेंगे तो अवश्य प्रकाशित करूँगा।


कालान्तर में विद्यार्थी जी गाँधीवादी विचारधारा से काफी प्रभावित हुए एवं यह उनकी लोकप्रियता का भी सबब बना। वे क्रान्तिकारियों एवं गाँधीवादी विचारधारा के अनुयायियों के लिए समान रूप से प्रिय थे। इस बीच अंग्रेजी हुकूमत ने 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया तो भारतीय जनमानस आगबबूला हो उठा। अंगे्रजी निर्दयता के विरूद्ध जनमानस सड़कों पर उतर आया। निडर एवं साहसी व्यक्तित्व के धनी तथा साम्प्रदायिकता विरोधी विद्यार्थी जी इस दौरान भड़के हिन्दू-मुस्लिम दंगों को शान्त कराने के लिए लोगों के बीच उतर पड़े। उधर विद्यार्थी जी के प्रताप से अंग्रेजी हुकूमत भी भयभीत थी। रायबरेली में मुंशीगंज गोली काण्ड के तहत ‘प्रताप‘ पर मानहानि का केस चल रहा था और अंग्रेज बार-बार यह संदेश दे रहे थे कि जब तक कानपुर में ‘प्रताप‘ जीवित है, तब तक प्रदेश में शान्ति स्थापना मुश्किल है। भड़की हिंसा को काबू करने के दौरान 25 मार्च 1931 को विद्यार्थी जी साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़ गए। उनका शव अस्पताल की लाशों के मध्य पड़ा मिला। वह इतना फूल गया था कि उसे पहचानना तक मुश्किल था। नम आँखों से 29 मार्च को विद्यार्थी जी का अन्तिम संस्कार कर दिया गया पर ‘प्रताप‘ के माध्यम से ‘विद्यार्थी‘ जी ने राजनैतिक आन्दोलन, क्रान्तिकारी चेतना, क्रान्तिधर्मी पत्रकारिता एवं साहित्य को जो ऊँचाईयाँ दीं, उसने उन्हें अमर कर दिया एवं इसकी आंच में ही अन्ततः स्वाधीनता की लौ प्रज्जवलित हुई।

शनिवार, 21 मार्च 2009

कानपुर से अटूट सम्बन्ध रहा बिस्मिल्लाह खाँ का (जन्मतिथि 21 मार्च पर विशेष)

शहनाई वादन को विवाह-मंडप, मंदिर और मंगल मौकों से इतर शास्त्रीय संगीत के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ (21 मार्च 1916-21 अगस्त 2006) का कानपुर से अटूट संबंध रहा। शहनाई के शहंशाह माने जाने वाले भारतरत्न बिस्मिल्लाह खाँ साहब का मानना था कि उनका गंगा से नजदीकी रिश्ता है और चूँकि कानपुर भी गंगा के तट पर है अतः यहाँ भी उन्हें वही खुशबू नजर आती है। पाँच वक्त के नमाजी खाँ साहब गंगा-यमुना तहजीब की जीती-जागती मिसाल थे। मंदिरों में रियाज कर अपने फन को मूर्त रूप देने वाले बिस्मिल्लाह खाँ धर्मनिरपेक्षता के साक्षात् उदाहरण थे। अपनी शहनाई से निकले ठुमरी और कजरी के अनमोल बोलांे से उन्होंने शहनाई को शांति और माधुर्य का माध्यम बना दिया। उनके लिए संगीत और खुदा की इबादत एक दूसरे के पर्यायवाची थे।

बिस्मिल्लाह खाँ ने कानपुर की जमीं पर कई बार अपनी शहनाई की रंगत दिखायी। पाँच दशक पूर्व खाँ साहब सर्वप्रथम कानपुर के लालाराम रतन गुप्ता के यहाँ एक वैवाहिक कार्यक्रम में शहनाई बजाने आए थे। ऐसे समय में जबकि बड़े घरानों के वैवाहिक कार्यक्रम ही चर्चित हो पाते थे, खाँ साहब की शहनाई ने इस कार्यक्रम को अपनी कला की बदौलत शोहरत दे दी और बारातियों से ज्यादा उनकी शहनाई की धुन सुनने वालों की भीड थी। सन् 1974 में श्री कृष्ण पहलवान समिति द्वारा मोती झील में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में खाँ साहब पुनः कानपुर पधारे और अपनी शमा छोड़ गए। इसके कुछ ही साल बाद कानपुर में नवरात्र की अष्टमी अवसर पर आयोजित संगीत संध्या में एक बार फिर से खाँ साहब ने अपनी शहनाई से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। करीब 27 वर्ष पूर्व लाजपत भवन में हिन्दी दैनिक ‘आज’ द्वारा आयोजित पावस कार्यक्रम में बिस्मिल्लाह खाँ ने शहनाई की जो धुनें छेड़ीं, उस पर श्रोताओं ने एक बार और की फरमाईशों द्वारा खाँ साहब को अपने असली रूप में आने को मजबूर कर दिया। फिर क्या था, खिलौना फिल्म के गाने ‘दिल का खिलौना हाय टूट गया’, जिसे उन्होंने ही संगीतबद्ध किया था के तराने खाँ साहब की शहनाई से मदमस्त होकर गुंज उठी। 1987 में एक बार पुनः खाँ साहब नाद ब्रह्मन संगीत संस्था के संचालक एम0 बर्द्धराजन के बुलावे पर कानपुर आये और भीमसेन जोशी के साथ ‘नाद ब्रह्मन’ कार्यक्रम का उद्घाटन किया। यहाँ उन्होंने राग ‘यमन कल्याण’ बजाकर सभी को भावाविभोर कर दिया। लगभग 17 वर्ष पूर्व बिस्मिल्लाह खाँ दुनिया के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान आई0आई0टी0 कानपुर में भी शहनाई वादन के लिए आए और अपनी वादन तकनीक व कला से यहाँ देश-विदेश से पधारे तमाम प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों व इंजीनियरों को अपनी सुर-साधना तकनीक का कायल बना दिया।

अंतिम बार बिस्मिल्लाह खाँ 1992 में कानपुर पधारे और इसी वर्ष आरम्भ ‘बिठूर महोत्सव‘ का आगाज अपने शहनाई वादन से किया। इसी कार्यक्रम के दौरान बी0 डी0 जोग के वायलिन के साथ उनकी शहनाई की अनुपम जुगलबंदी ने कानपुरवासियों को सम्मोहित कर दिया। उस दौरान अयोध्या में राम मंदिर व बाबरी मस्जिद का विवाद चरम पर था। ऐसे माहौल में खाँ साहब ने भावुक होते हुए कहा कि-‘‘अगर हिन्दू-मुसलमानों के बीच किसी समझौते से अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण हुआ तो वहाँ भी वह बैठ कर शहनाई बजाकर खुद को निहाल करेंगे।’’ उनके इस भावकुतापूर्ण व निश्छल शब्दों से गंगा तट का किनारा तालियों की गड़गड़हट से इस प्रकार गूंज उठा मानों एक साथ मंदिरों की घंटियाँ अपने आप ही बज उठी हों एवं पाश्र्व में नमाज के बोल उठ रहे हों। उस दिन बिस्मिल्लाह खाँ का फन पूरे शवाब पर था और एक बार फिर उन्होंने गंगा के बहाने कानपुर से अपना रिश्ता जाहिर किया। और कहा कि- ‘‘यदि उन्होंने यहाँ बिठूर में गंगा तट पर शहनाई नहीं बजायी होती तो उनकी संगीत की इबादत अधूरी रह जाती।‘‘

आज बिस्मिल्लाह खाँ हमारे बीच भौतिक रूप से नहीं रहे पर उनकी शहनाई की गूंज अभी भी हमारे जेहन में है। 14 अगस्त 1947 को मध्य रात्रि में भारत के नवप्रभात का स्वागत करते हुए खाँ साहब ने लाल किले की प्राचीर से शहनाई वादन किया था और उनकी दिली इच्छा अंतिम बार इंडिया गेट पर शहनाई बजाने की थी, पर आतंकवाद के चलते वह भी अधूरी रह गयी। उनकी महानता, विनम्रता व सदाशयता को इसी से समझा जा सकता है कि उन्होंने हमेशा यह प्रयास किया कि दिग्गजों के साथ-साथ वह उभरते कलाकारों के साथ भी बैठें। संसद में उभरती कलाकार डाॅ0 सोमाघोष के साथ जुगलबंदी पर उन्होंने कहा था कि-‘‘अगर मेरे साथ बैठने से कोई आगे बढ़ता है, तो मुझे खुशी होगी। मैं तो एक भिखारिन के साथ भी बैठने को तैयार हूँ बशर्ते कि उसमें कण्ठरस हो।’’

- कृष्ण कुमार यादव

मंगलवार, 10 मार्च 2009

भारतीय संस्कृति में होली के विभिन्न रंग

भारतीय संस्कृति में उत्सवों और त्यौहारों का आदि काल से ही महत्व रहा है। हर संस्कार को एक उत्सव का रूप देकर उसकी सामाजिक स्वीकार्यता को स्थापित करना भारतीय लोक संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता रही है। भारत में उत्सव व त्यौहारों का सम्बन्ध किसी जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र से न होकर समभाव से है और हर त्यौहार के पीछे एक ही भावना छिपी होती है- मानवीय गरिमा को समृद्ध करना। शायद यही कारण है कि एक समय किसी धर्म विशेष के त्यौहार माने जाने वाले पर्व आज सभी धर्मों के लोग आदर के साथ हँसी-खुशी मनाते हैं।

होली भारतीय समाज का एक प्रमुख त्यौहार है, जिसका लोग बेसब्री के साथ इंतजार करते हैं। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में होली मनाई जाती है। रबी की फसल की कटाई के बाद वसन्त पर्व में मादकता के अनुभवों के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व उत्साह और उल्लास का परिचायक है। अबीर-गुलाल व रंगों के बीच भांग की मस्ती में फगुआ गाते इस दिन क्या बूढे़ व क्या बच्चे, सब एक ही रंग में रंगे नजर आते हैं। नारद पुराण के अनुसार दैत्य राज हिरणकश्यप को यह घमंड था कि उससे सर्वश्रेष्ठ दुनिया में कोई नहीं, अतः लोगों को ईश्वर की पूजा करने की बजाय उसकी पूजा करनी चाहिए। पर उसका बेटा प्रहलाद जो कि विष्णु भक्त था, ने हिरणकश्यप की इच्छा के विरूद्ध ईश्वर की पूजा जारी रखी। हिरणकश्यप ने प्रहलाद को प्रताड़ित करने हेतु कभी उसे ऊंचे पहाड़ों से गिरवा दिया, कभी जंगली जानवरों से भरे वन में अकेला छोड़ दिया पर प्रहलाद की ईश्वरीय आस्था टस से मस न हुयी और हर बार वह ईश्वर की कृपा से सुरक्षित बच निकला। अंततः हिरणकश्यप ने अपनी बहन होलिका जिसके पास एक जादुई चुनरी थी, जिसे ओढ़ने के बाद अग्नि में भस्म न होने का वरदान प्राप्त था, की गोद में प्रहलाद को चिता में बिठा दिया ताकि प्रहलाद भस्म हो जाय। पर होनी को कुछ और ही मंजूर था, ईश्वरीय वरदान के गलत प्रयोग के चलते जादुई चुनरी ने उड़कर प्रहलाद को ढक लिया और होलिका जल कर राख हो गयी और प्रहलाद एक बार फिर ईश्वरीय कृपा से सकुशल बच निकला। दुष्ट होलिका की मृत्यु से प्रसन्न नगरवासियांे ने उसकी राख को उड़ा-उड़ा कर खुशी का इजहार किया। मान्यता है कि आधुनिक होलिकादहन और उसके बाद अबीर-गुलाल को उड़ाकर खेले जाने वाली होली इसी पौराणिक घटना का स्मृति प्रतीक है।

भविष्य पुराण में वर्णन आता है कि राजा रघु के राज्य में धुंधि नामक राक्षसी को भगवान शिव द्वारा वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु न ही देवताओं, न ही मनुष्यों, न ही हथियारों, न ही सर्दी-गर्मी-बरसात से होगी। इस वरदान के बाद उसकी दुष्टतायें बढ़ती गयीं और अंततः भगवान शिव ने ही उसे यह शाप दे दिया कि उसकी मृत्यु बालकों के उत्पात से होगी। धुंधि की दुष्टताओं से परेशान राजा रघु को उनके पुरोहित ने सुझाव दिया कि फाल्गुन मास की 15वीं तिथि को जब सर्दियों पश्चात गर्मियाँ आरम्भ होती हैं, बच्चे घरों से लकड़ियाँ व घास-फूस इत्यादि एकत्र कर ढेर बनायें और इसमें आग लगाकर खूब हल्ला-गुल्ला करें। बच्चों के ऐसा ही करने से भगवान शिव के शाप स्वरूप राक्षसी धुंधि ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। ऐसा माना जाता है कि होली का पंजाबी स्वरूप ‘धुलैंडी’ धुंधि की मृत्यु से ही जुड़ा हुआ है। आज भी इसी याद में होलिकादहन किया जाता है और लोग अपने हर बुरे कर्म इसमें भस्म कर देते हैं।

होली की रंगत बरसाने की लट्ठमार होली के बिना अधूरी ही कही जायेगी। कृष्ण-लीला भूमि होने के कारण फाल्गुन शुल्क नवमी को ब्रज में बरसाने की लट्ठमार होली का अपना अलग ही महत्व है। इस दिन नन्दगाँव के कृष्णसखा ‘हुरिहारे’ बरसाने में होली खेलने आते हैं, जहाँ राधा की सखियाँ लाठियों से उनका स्वागत करती हैं। सखागण मजबूत ढालों से अपने शरीर की रक्षा करते हैं एवं चोट लगने पर वहाँ ब्रजरज लगा लेते हैं। बरसाना की होली के दूसरे दिन फाल्गुन शुक्ल दशमी को सायंकाल ऐसी ही लट्ठमार होली नन्दगाँव में भी खेली जाती है। अन्तर मात्र इतना है कि इसमें नन्दगाँव की नारियाँ बरसाने के पुरूषों का लाठियों से सत्कार करती हैं। इसी प्रकार बनारस की होली का भी अपना अलग अन्दाज है। बनारस को भगवान शिव की नगरी कहा गया है। यहाँ होली को रंगभरी एकादशी के रूप में मनाते हैं और बाबा विश्वनाथ के विशिष्ट श्रृंगार के बीच भक्त भांग व बूटी का आन्नद लेते हैं।

होली को लेकर देश के विभिन्न अंचलों में तमाम मान्यतायें हैं और शायद यही विविधता में एकता की भारतीय संस्कृति का परिचायक भी है। उत्तर पूर्व भारत में होलिकादहन को भगवान कृष्ण द्वारा राक्षसी पूतना के वध दिवस से जोड़कर पूतना दहन के रूप में मनाया जाता है तो दक्षिण भारत में मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने कामदेव को तीसरा नेत्र खोल भस्म कर दिया था और उनकी राख को अपने शरीर पर मल कर नृत्य किया था। तत्पश्चात कामदेव की पत्नी रति के दुख से द्रवित होकर भगवान शिव ने कामदेव को पुनर्जीवित कर दिया, जिससे प्रसन्न हो देवताओं ने रंगों की वर्षा की। इसी कारण होली की पूर्व संध्या पर दक्षिण भारत र्में अिग्न प्रज्वलित कर उसमें गन्ना, आम की बौर और चन्दन डाला जाता है। यहाँ गन्ना कामदेव के धनुष, आम की बौर कामदेव के बाण, प्रज्वलित अग्नि शिव द्वारा कामदेव का दहन एवं चन्दन की आहुति कामदेव को आग से हुई जलन हेतु शांत करने का प्रतीक है। मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में अवस्थित धूंधड़का गाँव में होली तो बिना रंगों के खेली जाती है और होलिकादहन के दूसरे दिन ग्रामवासी अमल कंसूबा (अफीम का पानी) को प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं और सभी ग्रामीण मिलकर उन घरों में जाते हैं जहाँ बीते वर्ष में परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो चुकी होती है। उस परिवार को सांत्वना देने के साथ होली की खुशी में शामिल किया जाता है।

कानपुर में होली का अपना अलग ही इतिहास है। यहाँ अवस्थित जाजमऊ और उससे लगे बारह गाँवों में पाँच दिन बाद होली खेली जाती है। बताया जाता है कि कुतुबुद्दीन ऐबक की हुकुमत के दौरान ईरान के शहर जंजान के शहर काजी सिराजुद्दीन के शिष्यों के जाजमऊ पहुँचने पर तत्कालीन राजा ने उन्हें जाजमऊ छोड़ने का हुक्म दिया तो दोनो पक्षों में जंग आरम्भ हो गई। इसी जंग के बीच राजा जाज का किला पलट गया और किले के लोग मारे गये। संयोग से उस दिन होली थी पर इस दुखद घटना के चलते नगरवासियों ने निर्णय लिया कि वे पाँचवें दिन होली खेलेंगे, तभी से यहाँ होली के पाँचवें दिन पंचमी का मेला लगता है। इसी प्रकार वर्ष 1923 के दौरान होली मेले के आयोजन को लेकर कानपुर के हटिया में चन्द बुद्धिजीवियों व्यापारियों और साहित्यकारों (गुलाबचन्द्र सेठ, जागेश्वर त्रिवेदी, पं0 मंुशीराम शर्मा ‘सोम’, रघुबर दयाल, बाल कृष्ण शर्मा ‘नवीन’, श्याम लाल गुप्त ‘पार्षद’, बुद्धूलाल मेहरोत्रा और हामिद खाँ) की एक बैठक हो रही थी। तभी पुलिस ने इन आठों लोगों को हुकूमत के खिलाफ साजिश रचने के आरोप में गिरफतार करके सरसैया घाट स्थित जिला कारागार में बन्द कर दिया। इनकी गिरतारी का कानपुर की जनता ने भरपूर विरोध किया। आठ दिनों पश्चात् जब उन्हें रिहा किया गया, तो उस समय ‘अनुराधा-नक्षत्र’ लगा हुआ था। जैसे ही इनके रिहा होने की खबर लोगों तक पहुँची, लोग कारागार के फाटक पर पहुँच गये। उस दिन वहीं पर मारे खुशी के पवित्र गंगा जल में स्नान करके अबीर-गुलाल और रंगों की होली खेली। देखते ही देखते गंगा तट पर मेला सा लग गया। तभी से परम्परा है कि होली से अनुराधा नक्षत्र तक कानपुर में होली की मस्ती छायी रहती है और आठवें दिन प्रतिवर्ष गंगा तट पर गंगा मेले का आयोजन किया जाता है।

पग-पग पर बदले बोली, पग-पग पर बदले भेष, वाले भारतवर्ष में होली का त्यौहार धूम-धाम से विभिन्न रंगों में मनाया जाता है। भारतीय उत्सवों को लोकरस और लोकानंद का मेल कहा गया है। भूमण्डलीकरण और उपभोक्तावाद के बढ़ते दायरों के बीच इस रस और आनंद में डूबा भारतीय जन-मानस आज भी न तो बड़े-बड़े माॅल और क्लबों में मनने वाले फेस्ट से चहकार भरता है और न ही किसी कम्पनी के सेल आॅफर को लेकर आन्तरिक उल्लास से भरता है। होली पर्व के पीछे तमाम धार्मिक मान्यताएं, मिथक, परम्पराएं और ऐतिहासिक घटनाएं छुपी हुई हैंैं पर अंततः इस पर्व का उद््देश्य मानव-कल्याण ही है। लोकसंगीत, नृत्य, नाट्य, लोककथाओं, किस्से-कहानियों और यहाँ तक कि मुहावरों में भी होली के पीछे छिपे संस्कारों, मान्यताओं व दिलचस्प पहलुओं की झलक मिलती है। नए वó, नया श्रृंगार और लज़ीज़ पकवानों के बीच होली पर्व मनाने का एक मनोवैज्ञानिक कारण भी गिनाया जाता है कि यह पर्व के बहाने समाज एवं व्यक्तियों के अन्दर से कुप्रवृत्तियों एवं गन्दगी को बाहर निकालने का माध्यम है। होली पर खेले गए रंग गन्दगी के नहीं बल्कि इस विचार के प्रतीक हंै कि इन रंगोें के धुलने के साथ-साथ व्यक्ति अपने राग-द्वेष भी धुल दे। यही कारण है कि रंगों को धुलने के बाद लोग मस्ती में फगुआ गाते हंै और एक दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर भाईचारे का प्रदर्शन करते हैं। वर्तमान परिवेश में जरुरत है कि इस पवित्र त्यौहार पर आडम्बरता की बजाय इसके पीछे छुपे हुए संस्कारों और जीवन मूल्यों को अहमियत दी जाए तभी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र सभी का कल्याण सम्भव होगा।

शनिवार, 7 मार्च 2009

21वीं सदी में स्त्री समाज के बदलते सरोकार (अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर)

भारत में नारी को पूजनीय माना गया है। वैदिक काल से ही नारी विभिन्न रूपों में सम्मानजनक स्थिति प्राप्त करती आ रही है। नारी की सुकोमलता, सौंदर्य, लज्जा व स्नेहिल स्वभाव सदैव से इसके आभूषण रहे हैं पर दुर्भाग्यवश इन्हीं गुणों के कारण उसके साथ बार-बार छल भी हुआ है। समाज की सामन्तवादी सोच ने नारी की आन्तरिकता की उपेक्षा कर उसकी भौतिक काया एवं बाहरी रूप-रंग को ही आधार बनाया । आज जहाँ पुरूष की शुचिता उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के आधार पर मापी जाती है, वहीं नारी की शुचिता अंग विशेष के आधार पर मापी जाती है।

प्राचीन काल से ही जहाँ नारी को एक तरफ समाज में प्रतिष्ठा मिली, वहीं दूसरी तरफ वह बर्बरता का शिकार हुयी । तुलसीदास ने तो नारी को ताड़ना का अधिकारी बताकर पशु के समकक्ष खड़ा कर दिया- ‘‘ढोल, गँवार, शूद्र, पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी।’’ मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने पत्नी सीता के अग्निपरीक्षा में खरे उतरने के बाद भी एक धोबी के कहने पर धोखे से अपनी पत्नी को घर से निर्वासित कर दिया । सती-प्रथा की आड़ में तमाम नवयुवतियों को मृत पति के साथ चिता में जिन्दा भस्म कर दिया गया । तमाम राजाओं की हैवानियत तब तक पूरी नहीं होती थी जब तक वे पराजित राजाओं की रानियों को अपने हरम का हिस्सा नहीं बना लेते थे। जौहर-प्रथा इसी का नतीजा थी । यह सब तो बीते युग की बातें हैं, वर्तमान दौर में भी इस तरह की व्यथायें देखी और सुनी जा सकती हैं। बिहार से मुसहर जाति की एक सांसद को टी0 टी0 ने ट्रेन के वातानुकूलित कोच से परिचय देने के बावजूद इसलिये बाहर निकाल दिया क्योंकि वह वेश-भूषा से वातानुकूलित कोच में बैठने लायक नहीं लगती थीं। याद कीजिये दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों द्वारा गाँधी जी को टेªन के प्रथम श्रेणी डिब्बे से बाहर निकालने का दृश्य। राजस्थान में ‘साथिन’ नामक संस्था से जुड़ी भँवरी देवी ने जन-जागरूकता का बीड़ा उठाया तो हश्र्र बलात्कार के रूप में सामने आया। देवदासी प्रथा के नाम पर कुंवारी कन्या को भगवान के दरबार में सौंप देना और तत्पश्चात मन्दिर के पुरोहित द्वारा कन्या के साथ संभोग करना जैसी घटनायें भी कुछेक देशों में देखी जा सकती हैं। पंचायत संस्थाओं में निम्न वर्ग की महिलाओं को आरक्षण मिलने के साथ ही देश के कई क्षेत्रों में निर्वाचित सरपंचों के साथ बद्सलूकी की घटनायें अखबारों की सुर्खियाँ बनी । मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में हुआ ‘सती काण्ड’ अभी बहुत पुराना नहीं हुआ है । इक्कीसवीं सदी की ओर उन्मुख राष्ट्र की गर्वोक्ति घोषणाओं के साथ ही अखबारों में नित्य नाबालिगों के साथ दुष्कर्म की घटनायें छपती रहती हैं। मुम्बई की लोकल टेªन में एक वहशी द्वारा पाँच-छः यात्रियों के सामने एक बालिका से बलात्कार करना और उन यात्रियों का चुप-चाप तमाशा देखना क्या इंगित करता है ? सभ्य समाज का दर्जा पा चुकने के बाद भी घर की महिलाओं से बलात्कार कर बदला चुकाने का पाशविक अंदाज नहीं बदला है। विश्व के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र एवम् लोकतन्त्र व सभ्यता के स्वयंभू रक्षक अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भी अपने कार्यालय की एक अदना सी महिला कर्मचारी मोनिका लेविंस्की के साथ अंतरंग क्षणों का लोभ नहीं छोड़ सके। एक सभ्य समाज की ये असभ्य घटनायें हमें कहाँ लेे जा रही हैं ?

आधुनिक समाज संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहा है। आाधुनिकता के नाम पर सफलता हेतु शार्टकट रास्ते अपनाना, स्वतन्त्रता के नाम पर उन्मुक्तता का पक्ष- पोषण करना इसकी विशेषतायें बन चुकी हैं । ‘आई डोन्ट केयर’ की संस्कृति फलने-फूलने लगी है। शारीरिक वर्जनायें खत्म होती जा रही हैं । गली- मुहल्लों में तेजी से बढ़ता सौन्दर्य का बाजार, ब्यूटी-क्वीन प्रतियोगिताओं की भरमार, कुछ ही समय में सब कुछ पा लाने की महत्वाकांक्षा, विज्ञापन के नाम पर नारी माॅंडलों के शरीर का प्रदर्शन, फिल्मों और धारावाहिकों में रिश्तों के तेजी से टूटने का प्रचलन एवम् कम होते कपड़े किस आाधुनिकता व स्वतंत्रता के परिचायक हैं? क्या भारतीय संस्कृति अपनी मूल आस्थाओं को छोड़कर उस पाश्चात्य संस्कृति की तरफ उन्मुख हो रही है, जहाँ बात-बात में नारी स्वतन्त्रता के नाम पर छाती उधाड़ देना फैशन बन गया है?

इस संक्रमण काल के बीच 21वीं सदी के प्रारम्भिक वर्षो में एक ऐसा वर्ग उभरा जो अपनी मुक्ति शारीरिक वर्जनाओं को तोड़ने में नहीं अपितु खोखली सामाजिक-धार्मिक रूढ़ियों को तोड़ने में देखता है। इनकी शक्लो-सूरत ओर हैसियत पर मत जाईये। ये न तो फेमिनिस्ट के रूप में नारी आन्दोलनों से जुड़ी हैं और न पश्चिमी देशों की उन नारियों की तरह है जो स्वतंत्रता के नाम पर अपनी छाती उघाड़कर प्रदर्शन करती हैं। न ही इनके साथ किसी बड़े घराने या काॅरपोरेट जगत या राजनैतिक दल का नाम जुड़ा हुआ है और न ही ये कोई बड़े-बड़े दावे करती हैं। ये वो महिलायें हैं जो हमारे पास-पड़ोस की और हमारे बीच की हैं, जिनसे हम न जाने कितने बार रूबरू हुए होंगे पर हमंे उनकी खासियत का पता ही नहीं। एक लम्बे समय से धर्मशास्त्रों और रूढ़ियों के नाम पर इन्हें यही बताया जाता रहा कि फला काम तुम्हारे लिए वर्जित है और यदि तुम ऐसा करने का प्रयास करोगी तो तुम्हारे ऊपर अपशकुन व ईश्वरीय प्रकोप का खतरा मंडरायेगा। पर ये औरों से अलग हैं क्योंकि वर्जनाओं को तोड़कर एक अलग लीक बनाना ही इनकी खासियत है। पाश्चात्य सभ्यता के समर्थक कुछ लोगों को नारी स्वतंत्रता का रास्ता दैहिक वर्जनाओं को तोड़ने और उन्मुुक्तता में दिखा। नतीजन, गली-गली में कुकुरमुत्तों की तरह सौंदर्य प्रतियोगिताओं के आयोजन, माॅडल बनने की होड,़ फिल्मों में काम पाने हेतु सर्वस्व न्यौछावर कर देने वालों की बढती भीड़ .... पर समाज का यह वर्ग ऐसा है जो अभी भी सिर से पांव तक पूरे कपड़े पहने अपनी बौद्धिकता और जीवटता के दम पर समाज की रूढ़िगत वर्जनाओं को तोड़ने का साहस रखता है।

कर्मकाण्डों के लिये विख्यात बनारस की लड़कियों ने तमाम रूढ़िगत वर्जनाओं और परम्पराओं को बहुत पीछे धकेल कर कुछ नये मानदण्ड स्थापित किये हैं। कर्मकाण्ड का सबसे प्रमुख तत्व पुरोहिती है और पांडित्य में बनारस का कोई सानी नहीं। प्राचीन काल से ही यहाँ के पंडितों ने दुनिया भर में अपनी धाक जमाई है। प्राचीनकाल में जहाँ लोमशा एवं लोपामुद्रा आदि नारियों ने ऋग्वेद के अनेक सूक्तों की रचना करके और मैत्रेयी, गार्गी, शाश्वती, घोषा, अदिति इत्यादि विदुषियों ने अपने ज्ञान से तब के तत्वज्ञानी पुरूषों को कायल बना रखा था, उसी परम्परा मंे अब पुरूष पुरोहितों की परम्परा को बनारस की लड़कियों ने तोड़ दिया है। तुलसीपुर स्थित पाणिनी कन्या महाविद्यालय से शास्त्री की परीक्षा उतीर्ण कई लड़कियाँ अब लोगों के विवाह करवा रही हैं और यह जरूरी नहीं कि वे ब्राह्मण ही हों। महाविद्यालय की आचार्या नंदिता शास्त्री बड़े गर्व से बताती हैं कि विवाह कराने के लिये उनकी छात्राओं को बनारस ही नहीं वरन् दूर-दूर से लोग आमंत्रित कर रहे हैं। हैदराबाद में बसी यहाँ की पूर्व छात्रा मैत्रेयी को वैदिक रीति से विवाह कराने के लिए अमेरिका तक से आमंत्रण आ चुके हैं। जब इन छात्राओं ने आरम्भ में यह कार्य आरम्भ किया तो इनका विरोध करने के लिए परम्परागत पंडितांे ने वर व कन्या पक्ष को शास्त्रों से उद्धरण देकर काफी भड़काया पर अब वही पंडित इन लड़कियों का लोहा मानने लगे हैं। कारण- मंत्रों का शुद्ध उच्चारण, उसकी सम्यक व्याख्या और वैवाहिक संस्कार की सभी रस्मों का पालन करवाने में लड़कियाँ परम्परागत पंडितों से कहीं आगे हैं। आम तौर पर कम पढ़े-लिखे पंडित विवाहों में शुद्ध मंत्र का उच्चारण तक नहीं कर पाते। अब ये छात्रायंे विवाह ही नहीं शांति यज्ञ, गृह प्रवेश, मंुडन, नामकरण और यज्ञोपवीत भी करा रही हंै। ऐसा नहीं है कि यह क्रांतिकारी बदलाव सिर्फ बनारस तक ही सीमित है वरन् देश के अन्य भागों में भी इस बदलाव को महसूस किया जाने लगा है। औद्योगिक महानगर कानपुर में कानपुर विद्या मंदिर डिग्री काॅलेज की प्राचार्या डाॅ0 आशारानी राय वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच पुरोहिती का कार्य करती हैं। उन्होंने जब छात्राओं को सार्वजनिक रूप से वेद पाठ आरम्भ कराया तो व्यापक विरोध भी झेलना पड़ा। यहाँ तक कि एक शंकराचार्य ने इसे वेद विरूद्ध तक घोषित कर दिया। पर आशारानी ने हार नहीं मानी और नतीजन आज उनकी तमाम छात्रायें कर्मकाण्ड कराने लगी हैं। हरिद्वार में कनखल स्थिति माँ योग शक्ति धाम की अधिष्ठाता माँ योग शक्ति ने अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल की साध्वी माँ ज्योतिषानन्दन को जगद्गुरू शंकराचार्य के समकक्ष पार्वत्याचार्य की उपाधि से अलंकृत किया तो गुस्साये साधु सन्तों ने किसी महिला को यह उपाधि देने के विरोध में जमकर हंगामा किया।


सिर्फ घरेलू कर्मकाण्डों तक ही क्यों, माता-पिता के अंतिम संस्कार से लेकर तर्पण और पितरों के श्राद्ध तक करने का साहस भी इन लड़कियों ने किया है, जिसे महिलाओं के लिए सर्वथा निषिद्ध माना जाता रहा है। संयोग से इसकी शुरूआत भी कर्मकाण्डों के लिये विख्यात बनारस से ही हुई। इस दिशा में सुनीति गाडगिल ने अलख जगाई जिन्होंने विवाह, पूजा, यज्ञ आदि करवाने में ही भूमिका नहीं निभाई वरन् श्राद्ध कर्म भी करवाकर मिसाल कायम की। बनारस के ही पाण्डेयपुर क्षेत्र की निवासी तनू उर्फ वन्दना जायसवाल, मंडुवाडीह की लक्ष्मीणा देवी, नगर निगम के सफाईकर्मी रहे गोलगड्ढा निवासी मुन्ना की विधवा बीदा देवी और भेलूपुर की महिला चित्रकार और विदेश में कला की प्रोफेसर रहीं डाॅ0 अलका मुखर्जी ने परिवार में किसी अन्य पुरूष सदस्य के न रहने पर अपनी माँ, पिता और पति का अंतिम संस्कार धार्मिक क्रियाओं के बीच विधिवत सम्पन्न किया। वन्दना जायसवाल ने घंट इत्यादि बाँधकर नित्य घाट पर अपनी माँ का तर्पण भी किया। अब तो इस सामाजिक बदलाव की बयार का असर देश के अन्य भागों में भी दिखाई पड़ने लगा। तभी तो कानपुर की डाॅ0 आशारानी राय महिलाओं के लिए सर्वथा निषिद्ध श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार सम्पन्न कराने से नहीं हिचकतीं। अपने पिता और श्वसुर का अंतिम संस्कार भी स्वयं उन्होंने ही सम्पन्न किया। यही नहीं कुछेक समय पहले तक प्रयाग के रसूलाबाद घाट पर महाराजिन बुआ नामक महिला श्मशानघाट में वैदिक रीति से अंतिम संस्कार सम्पन्न कराती थीं। राजस्थान के भीलवाड़ा में एक 72 वर्षीया विधवा की मृत्यु पर उसकी सात बेटियों ने मिलकर अर्थी को कंधा दिया तथा अंतिम संस्कार के लिये चिता को मुखाग्नि दी और पिण्डदान किया। परिवार में बेटों के न होने पर लोगों ने बड़े दामाद से मुखाग्नि दिलवाने का प्रयास किया पर सातों बेटियों ने कहा कि- ‘‘उनकी माँ ने बेटा न पैदा होने पर बेटियों को ही बेटों की तरह पाला तथा किसी भी तरह की कमी नहीं होने दी।’’ हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले की दलित महिला प्रेमी देवी ने तो अपने पति की अर्थी को बेटों को कन्धा तक नहीं लगाने दिया और अर्थी को कंधा देने की जिद करने पर उन्हें धक्के मारकर घर से निकाल दिया। उसने कहा कि मेरे पति के जिन्दा होने पर इन बेटों ने कभी हमारी सेवा नहीं की और न ही रोजमर्रा के खर्च के लिये कोई इन्तजाम किया और ऐसे में पति का निर्देश था कि- ‘‘इन अवारा कलयुगी बेटों को मेरी अर्थी में कंधा न लगाने दिया जाये।’’ अंततः अर्थी को दोनों बहुओं व पड़ोस की दो अन्य औरतों ने कंधा दिया और मुखाग्नि उसके चार पोतों ने दी। इसी प्रकार गोरखपुर स्थित सहजनवां के दीनदयाल उपाध्याय महिला विद्यालय में स्नातक की विकलांग छात्रा बुधवन्त सिंह ने अपने पिता की अर्थी को अपने हाथों से सजाया और कंधा देने वालों के अभाव में ठेले पर रखकर श्मशान घाट ले जाकर विधिवत मुखाग्नि देकर अपना कर्तव्य निभाया। बाँदा में निर्मला गर्ग नामक महिला ने पुत्र के होते हुए भी अपने पति की चिता को आग दी तो शाँहजहापुर में पेशे से इंजीनियर शिप्रा नामक लड़की ने सगाई के अगले ही दिन दिवंगत हुए अपने पिता की अर्थी को न केवल मेंहदी रचे हाथों से कांधों पर धरा बल्कि उन्हें मुखाग्नि देकर रूढ़ियों को भी ललकारा। धार्मिक मान्यताओं पर विश्वास करें तो अंतिम संस्कार कोई भी सम्पन्न करा सकता है किन्तु अदृश्य की उत्पत्ति का अधिकार शास्त्रों में पुत्र और पौत्र के अलावा राजा व ब्राह्मण को ही होता है। भले ही धर्म के पुरोधा मानंे कि शवदाह के बाद का काम ब्राह्मण ही करेगा वरना आत्मा भटकेगी और अगले जन्म में शरीर का अंग-प्रत्यंग भी ठीक-ठाक नहीं होगा पर इन महिलाओं की मानें तो यह पुरूष प्रधान पितृसतात्मक समाज की सोच है जो सारे पुण्य अकेले ही लूटना चाहता है। हिमाचल प्रदेश की घटना समाज के सामने यह भी सवाल खड़ा करती है कि अपने माँ-बाप की देखरेख न करने वाले बेटों को धार्मिक मान्यताओं के नाम पर माँ-बाप की अर्थी में कंधा देने का क्या नैतिक अधिकार है? निश्चिततः उस निरक्षर दलित महिला ने इसी बहाने माँ-बाप के प्रति संतानों को दायित्व बोध का पाठ भी पढ़ाया।

याद कीजिये ‘बीबी हो तो ऐसी’ फिल्म में नायिका रेखा का घोड़ी पर सवार होकर दूल्हे के द्वार बारात ले जाना। इस फिल्मी कथानक को भी लड़कियों ने हकीकत में बदल दिया। संयोग से इसकी शुरूआत भी कर्मकाण्डों के लिये विख्यात बनारस से ही हुई यानी भोलेनाथ की नगरी में गंगा एक बार फिर उल्टी बही। इस सब के पीछे कश्यप फिल्म एण्ड टेलीविजन रिसर्च इन्स्टीट्यूट के निदेशक डा0 डी0एल0कश्यप की प्रमुख भूमिका रही, जिन्होंने अपने तीन बेटों और दो बेटियों के हाथ बनारस के घमहापुर गाँव में एक साथ एक ही मण्डप में पीले किये। अभी तक दहेजलोलुप दूल्हों को लड़कियों द्वारा विवाह मण्डप से बाहर निकालने या शराबी दूल्हे के साथ विवाह करने से इन्कार करने जैसे उदाहरण ही सामने आये हैं पर परम्पराओं को दरकिनार करते हुए डा0 कश्यप के तीनों बेटों से विवाह करने उनकी दुल्हनें घोड़ी पर सवार होकर मय बारात उनके दरवाजे आयीं जहाँ दूल्हे के पिता ने बहुओं की आगवानी की तथा उन्हें घोड़ी से उतारकर उनका पाँव पूजा। जबकि परम्परा है कि लड़की का पिता दूल्हे का पाँव पूजता है। प्रतीकात्मक द्वारपूजा के बाद दुल्हनों को मंच पर महाराजा कुर्सी पर बिठाया गया और फिर दूल्हे राजा मंच पर आये। लड़की वालों की ओर से निभाये जाने वाले सभी रस्मोरिवाज लड़कों के पिता ने पूरे किये। इस विवाह में न तो कोई मंत्र पढ़ा गया और न ही सात फेरों के साथ कसमें खायी गयीं, अपितु सिर्फ जयमाल व सिन्दूरदान हुआ। इसी प्रकार जयपुर में कानून की छात्रा रही दो जुड़वा बहनें अपनी शादी के अवसर पर निकाली जानेवाली ‘बिन्दौरी’ में घोड़ी पर सवार होकर निकलीं। उनका मानना था कि- ‘‘यह क्रांतिकारी कदम दर्शाता है कि हमारे समाज में लड़के-लड़कियों में कोई भेद-भाव नहीं है।’’ उ0प्र0 के जौनपुर में जब शादी पश्चात एक लम्बे समय तक पति अपनी विवाहिता को लेने नहीं पहुँचे तो कुछेक लड़कियाँ खुद ही बारात (गौना) लेकर पतियों के दरवाजे पहुँच गयीं। यही नहीं आधी आबादी की प्रतीक नारियों ने अब अनचाहे दूल्हों को दरवाजे से लौटाना भी आरम्भ कर दिया है। गाय की बछिया समझकर किसी के भी हाथ में पगहा पकड़ा देने वाले माता-पिता की पगड़ी की लाज की खातिर, सामाजिक संस्कारों के बोझ तले दबकर अपना भविष्य बर्बाद करने की बजाय तमाम लड़कियों ने दहेज लोभी, शराबी, उम्रदराज इत्यादि जैसे दूल्हों को निडरता से दरवाजे से लौटाने में संकोच नहीं किया।


सामान्यतः शादी योग्य लड़कियांे के लिये लड़के ढूँढ़ने का काम पुरूष वर्ग का माना जाता रहा है पर लखनऊ के अमीनाबाद में रहने वाली नीलम पाण्डे 1996 से इस कार्य को सहजता के साथ कर रही हैं और अब तक उन्होंने सैकड़ों शादियाँ करवाई हैं। नीलम बेबाक रूप में स्वीकारती हैं कि- ‘‘वर्तमान परिवेश में शादी को लेकर सबसे बड़ी समस्या यह है कि दस काबिल लड़कियों पर मुश्किल से एक लड़का ढूँढ़ने पर मिलता है।’’ शायद यही कारण है कि तमाम लड़कियों ने अब अयोग्य वरों को शादी के मण्डप से बाहर निकालना आरम्भ कर दिया है। दुल्हन के वेश में सजी-धजी बैठी ये लड़कियाँ किसी ऐसे व्यक्ति को जीवन साथी के रूप में नहीं चाहती, जो उनको व उनके परिवार को प्रतिष्ठाजनक स्थान न दे सके या दहेज की आड़ में धनलोलुपता का शिकार हो। अब तो कुछ ऐसे भी मामले सामने आ रहे हैं, जहाँ लड़की ने कलयुग में स्वयंवर रचा कर वर चुनने की आजादी ली हो। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के घुमका गाँव में 8 जुलाई 2008 को एक लड़की अन्नपूर्णा ने स्वयंवर द्वारा अपना पति चुना। 8वीं पास 22 वर्षीया अन्नपूर्णा द्वारा स्वयंवर रचा कर वर चुनने की योजना का शुरू में समाज में काफी विरोध हुआ लेकिन समाज की परवाह किए बिना वह अपने रास्ते चलती रही। आखिरकार समाज भी साथ हो गया। स्वयंवर के प्रचार के लिए बाकायदा इलाके में पोस्टर लगाए गए और पास-पड़ोस के गाँवों में डुग्गी और लाउडस्पीकर के जरिए भी लोगों को इसकी जानकारी दी गई थी। स्वयंवर में शामिल होने वाले युवाओं की अधिकतम उम्र 26 साल तय की गई थी। अन्नपूर्णा से विवाह के इच्छुक लोगों को उसके पाँच धार्मिक सवालों का जवाब देना था। हल्बा आदिवासी समुदाय के युवकों को ही इसमें शामिल होने की अनुमति थी। स्वयंवर में केवल तीन युवक ही शामिल हुए। इनमें मात्र 12वीं पास और पेशे से किसान घनाराम नामक व्यक्ति ने स्वयंवर में पूछे सभी पाँच सवालों के सही जवाब दिये और अन्नपूर्णा ने इस व्यक्ति को जीवन साथी के रूप में चुना।

वक्त के साथ पुरानी परम्परायें टूटती हैं और नयी परम्परायें स्थापित होती हैं। आंध्रप्रदेश का तिरूपति बालाजी मंदिर पूरे विश्व में विख्यात है और हर दिन यहाँ बेशुमार लोग भगवान बालाजी कोे अपने केश अर्पित करने आते हैं। इनमें अच्छी खासी तादाद महिलाओं की होती है और एक लम्बे समय से मंदिर में महिला मुण्डनकर्मियों को बिठाने की माँग उठती रही है। 31 मार्च 2005 को एक लम्बे संघर्ष बाद नाईनों को यहाँ नियुक्त करने का फैसला किया गया। इसके बाद तो इस निर्णय को भी धार्मिक आस्थाओं से जोड़कर देखा जाने लगा और तर्क दिया गया कि- ‘‘प्रतीकात्मक रूप से स्त्रियाँ देवी लक्ष्मी की प्रतिनिधि हैं इसलिए उन्हें मुण्डन कर्म नहीं करना चाहिए क्योंकि यह कृत्य उनकी दरिद्रता को दर्शाता है।’’ पर नाईनों ने हार नहीं मानी और तर्क दिया कि इस कार्य से उन्हें रोजगार मिलेगा और उनकी दरिद्रता व गरीबी दूर हो सकेगी। यही नहीं कर्म के आधार पर पुरूष नाईयों से अपने को कमतर नहीं आंकने वाली इन महिलाओं ने यह भी कहा कि उनसे बाल उतरवाने वाली महिलायें अपने को ज्यादा सहज महसूस कर सकेंगी। समाज की दरियाकनूसी परम्पराओं के चलते जहाँ अभी भी दलितों के घरों में पूजा-पाठ व धार्मिक अनुष्ठानों हेतु पंडित ढूँढ़े नही मिलते, वहाँ बरेली के भमोरा इलाके की आशा और ज्योति नामक दो बहनें तमाम दलित और मलिन बस्तियों में जाकर अनुष्ठान करती हैं और इस कार्य से मिलने वाले धन को गरीब लड़कियों की शादी, भण्डारा या किसी पीड़ित व्यक्ति की सेवा पर खर्च कर देती हैं।

राजस्थान सदैव से सामंती समाज माना जाता रहा है पर उस सामंती समाज की विधवाओं ने उन अमानवीय सामाजिक रूढ़ियों को दुत्कारने का साहस दिखाया है, जहाँ सती प्रथा जैसी बुराईयों के महिमामण्डन के जरिये विधवाओं से जीने का हक तक छीना जाता रहा है। यह वही राजस्थान है जहाँ 1987 में देवराला सती काण्ड के दौरान सती रूपकँवर के चबूतरे पर चूड़ियाँ और सिन्दूर चढ़ाने की स्त्रियों में होड़ सी मची थी। अब उसी राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में ‘एकल नारी शक्ति संगठन’ के नेतृत्व में वैधव्य जीवन जी रही हजारों स्त्रियों ने उन साज-श्रंृगारों का इस्तेमाल करना आरम्भ कर दिया है जो विधवा होते ही समाज उनसे छीन लेता है। हाथों में मंेहदी, कलाईयों में रंग-बिरंगी चूड़ियाँ, माथे पर बिंदिया और खूबसूरत परिधानों के साथ ये विधवायें मांगलिक कार्यों में भी बढ़-चढ़ कर अपनी सहभागिता दर्ज करा रही हैं।

मुस्लिम समुदाय में जहाँ काजी का काम पुरूष के बूते का ही माना जाता रहा है, एक नारी ने पुरूषों का वर्चस्व तोड़ दिया है। पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले के गाँव नंदीग्राम की काजी शबनम आरा बेगम इस देश की पहली महिला काजी हैं। शबनम के काजी बनने की कहानी भी कम रोचक नहीं। अपने काजी पिता की सातवीं बेटी शबनम ने पिता के लकवाग्रस्त हो जाने पर निकाह कराने में उनकी मदद करना आरम्भ किया। शरीयत का अच्छी तरह इल्म हो जाने पर पिता जी ने उसे नायब काजी बना दिया। सन् 2003 में पिता जी की मौत के बाद शबनम ने अपने पैरों पर खड़े होने हेतु काजी बनने का रास्ता चुना और संयोग से काजी के रूप में उनका पंजीयन भी हो गया। पर काजी बनने के बाद शबनम की असली दिक्कतें आरम्भ हुयीं। अंततः धमकियों और मुकदमों के बीच शबनम अपने को काजी पद के योग्य साबित करने में सफल हुयीं। इसी प्रकार लखनऊ में अगस्त 2008 में भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन की अध्यक्ष नाइश हसन और दिल्ली के इमरान का निकाह एक महिला काजी डाॅ0 सईदा हमीद ने पढ़ाया। गौरतलब है कि डाॅ0 सईदा हमीद योजना आयोग की सदस्य भी हैं।

21वीं सदी में जब महिलायें, पुरूषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं, ऐसे में सामाजिक व धार्मिक रूढ़ियों की आड़ में उन्हें गौण स्थान देना जागरूक महिलाओं के गले नीचे नहीं उतर रहा है। यही कारण है कि ऐसी रूढ़िगत मान्यताओं और परम्पराओं के विरूद्ध उन्हीं क्षेत्रों से सामाजिक बदलाव की बयार चली है, जिन्हें इन रूढ़िगत कर्मकाण्डों का गढ़ माना जाता रहा है। इस सामाजिक बदलाव का कारण जहाँ महिलाओं में आई जागरूकता है, जिसके चलते महिलायें अपने को दोयम नहीं मानतीं और कैरियर के साथ-साथ सामाजिक परम्पराओं के क्षेत्र में भी बराबरी का हक चाहती हैं। वर्षों से रस्मो-रिवाज के दरवाजों के पीछे शर्मायी -सकुचायी सी खड़ी महिलाओं की छवि अब सजग और आत्मविश्वासी व्यक्तित्व में तब्दील हो चुकी है। आधुनिक महिलायें इस तर्क को बेबाकी से खारिज करतीं हैं कि पुण्य कमाने के क्षेत्र में ईश्वर ने पुरूषों को ज्यादा अधिकार दिये हैं। ऐसे तर्कों को वे पुरूष प्रधान पितृसतात्मक समाज की सोच मात्र मानती है। उनके लिये सवाल अब परम्पराओं का ही नहीं वरन् उनके कसौटी पर खरे उतरने का भी है। मात्र किसी धार्मिक गं्रथ के उद्धरणों के आधार पर नारी शक्ति को दबाया नहीं जा सकता। अब ये महिलायें पूछने लगी हैं कि पुण्य के कामों के समय हाथ पर बाँधा जाने वाला कलावा लड़कों के दायें और लड़कियों के बायें हाथ पर क्यों बाँधा जाता है, क्यों नहीं दोनों के एक ही हाथ पर बाँध दिया जाता है? यदि पूजा-पाठ या पुण्य के कार्य कराने के लिए जनेऊ धारण करना शास्त्रों में जरूरी माना गया है तो पुरोहित का कार्य करने वाली महिला जनेऊ क्यों नहीं धारण कर सकती? योग्यता चाहे वह पुरूष की हो अथवा महिला की- बराबर ही कही जायेगी। जहाँ प्रकृति पुरूष-स्त्री को बिना किसी भेदभाव के बराबर धूप-छांव बाँटती हो, वहाँ धर्म या परम्परा की आड़ में अतार्किक आधार पर स्त्रियों को तमाम सुविधाओं से वंचित करने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। कोई महिला यदि किसी क्षेत्र में जाना चाहती है तो मात्र इसलिए कि वह एक महिला है, उसको उस क्षेत्र में जाने से नहीं रोका जा सकता। आखिर अपनी पसन्द का क्षेत्र चुनने का सभी को अधिकार है। यह निर्णय करने का समय आ चुका है कि अज्ञानी एवं अल्पज्ञानी पुरूषों के भरोसे धर्म की सनातन परम्परा और उसके आचार-विचार सुरक्षित रहेंगे या शिक्षित-प्रशिक्षित नारियों के हाथ में उसकी पताका महफूज रहेगी? प्रख्यात ज्योतिषी के0ए0दुबे पद्मेश जैसे विद्वान भी इन छात्राओं के कदम से उत्साहित दिखते हैं और इससे प्रेरित होकर अपना उत्तराधिकारी किसी नारी को ही बनाना चाहते हैं। फर्क मात्र इतना है कि आजादी के दौर में भी कुछ महापुरूषों ने इन रूढ़िगत सामाजिक मान्यताओं के विरूद्ध आवाज उठायी थी पर 21वीं सदी के इस दौर में महिलायें सिर्फ आवाज ही नहीं उठा रही हैं वरन् इन रूढ़िगत मान्यताओं को पीछे ढकेलकर नये मानदण्ड भी स्थापित कर रही हैं।

- कृष्ण कुमार यादव

हिन्दी कविता को नया मिजाज दिया अज्ञेय ने (जन्मतिथि ७ मार्च पर)

आधुनिक हिंदी साहित्य में अपनी बहुमुखी प्रतिभा विशेषकर कविता के जरिए विशिष्ट छाप छोड़ने वाले साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन अज्ञेय ने अपनी परिष्कृत संवेदना से आधुनिक समाज के विभिन्न पक्षों को समझने और उन्हें अभिव्यक्त करने का प्रयास किया। उत्तर छायावाद दौर में हिन्दी कविता के शीर्ष कवियों में रहे सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन ने न केवल हिन्दी कविता को नया मिजाज दिया बल्कि तार सप्तक और विभिन्न सप्तकों के जरिए तमाम नए कवियों को आगे लाने का काम किया। अज्ञेय नई कविता के पुरोधा थे। उन्होंने उत्तर छायावाद के बाद सर्वथा नई भाषा और बिंब दिए और हिंदी कविता के लिए नई जमीन तोड़ी। यद्यपि कुछ आलोचक अज्ञेय को छंद विरोधी कहते हैं, पर यह सही नहीं है। अज्ञेय ने चाहे कविता के छंद की लय हो या जीवन की लय हो, उसे हमेशा महत्व दिया। उनकी कविता का प्रभाव साहित्य में आज तक दिखाई पड़ता है। कविता के साथ-साथ उन्होंने उपन्यास, कहानी, निबंध, डायरी, यात्रा संस्मरण सहित अन्य विधाओं में नए प्रतिमान गढ़ने का प्रयास किया। हिंदी काव्य में जयशंकर प्रसाद के बाद प्रकृति और प्रेम के विभिन्न रूपों पर सबसे अधिक अज्ञेय ने ही लिखा है। उनकी कविता में प्रकृति और प्रेम विभिन्न रूपों में सामने आता है।अपनी कविताओं में अज्ञेय ने आधुनिक संवेदनाओं और महानगरीय बोध को भी प्रमुखता से स्थान दिया। उनकी कविता छायावाद के दौर से नितांत भिन्न होने के बावजूद हिंदी की तमाम विशिष्टताओं को संजोती है। अज्ञेय के प्रमुख काव्य संग्रहों में भग्नदूत, इत्यलम, हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, आंगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार शामिल हैं।

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में 7 मार्च 1911 को जन्मे अज्ञेय का गद्य के मामले में भी कोई जवाब नहीं था। उन्होंने ''शेखर एक जीवनी'' नामक विलक्षण उपन्यास लिखा, जो कि हिंदी साहित्य के बेहद चर्चित उपन्यासों में शामिल हैं। यह आत्मपरक रचना दरअसल व्यक्तित्व की खोज पर आधारित थी। इसके अलावा उन्होंने नदी के द्वीप और अपने अपने अजनबी उपन्यास भी लिखे। अरे यायावर रहेगा याद और एक बूंद सहसा उछली उनके यात्रा वृत्तांत हैं। उनके कई निबंध संग्रह भी हैं। अज्ञेय पत्रकारिता के क्षेत्र में भी काफी सक्रिय रहे। उन्होंने सैनिक, दिनमान, नवभारत टाइम्स सहित विभिन्न पत्र पत्रिकाओं का संपादन किया। दिनमान पत्रिका के संपादन से जुड़कर उसे हिन्दी पत्रकारिता का गौरव बना दिया। अज्ञेय कि निबंध शैली भी काफी विशिष्ट रही है। उनके सभी निबंध तर्कशुद्ध चिंतन पर आधारित होते हैं। इन निबंधों में वह समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर सूक्ष्म से सूक्ष्म चिंतन करते थे। अज्ञेय के यात्रा वृत्तांतों, डायरी तथा संस्मरणों में उनकी चिंतनशीलता की बखूबी झलक मिलती है। अज्ञेय ने तार सप्तक, दूसरा सप्तक और तीसरा सप्तक के जरिए हिन्दी साहित्य के कई प्रतिभावान कवियों की कृतियों का संचयन किया। उन्हें आंगन के पार द्वार के लिए साहित्य अकादमी और कितनी नावों में कितनी बार के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि जयशंकर प्रसाद के बाद अज्ञेय ही ऐसे कवि है जिनके साहित्य में काफी परिष्कृत संवेदना दिखाई देती है। उन्होंने साहित्य की शायद ही कोई ऐसी विधा हो जिस पर कलम न चलाई हो। अज्ञेय अपने निजी जीवन में भी प्रोयाग्धर्मी थे। एक यात्रा के दौरान उन्होंने छोटी सी नदी के जल में खड़े होकर काव्य पाठ किया था जबकि बाकी साहित्यकार नदी में उभरी एक चट्टान पर बैठे थे। इसी प्रकार उन्होंने अपने घर में एक पेड़ पर कुटिया बनाई थी। अज्ञेय ने आजादी के आंदोलन में भी क्रांतिकारी रूप में भाग लिया और जेल गए।

शनिवार, 21 फ़रवरी 2009

फक्कड़ कवि थे निराला (जन्म-तिथि पर पुण्य स्मरण)

निराला सम्भवत: हिन्दी के पहले व अन्तिम कवि हैं, जिनकी लोकप्रियता व फक्कड़पन को कोई दूसरा कवि छू तक नहीं पाया है। निराला से ज्यादा लोकप्रियता सिर्फ कबीर को मिली। यद्यपि अर्थाभाव के कारण निराला को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा पर न तो वे कभी झुके और न ही अपने उसूलों से समझौता किया। यही कारण है कि उन पर अराजक और आक्रामक होने तक के आरोप लगे, पर वे इन सबसे बेपरवाह अपने फक्कड़पन में मस्त रहे।
महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म बंगाल के मेदिनीपुर में 21 फरवरी 1897 को पं0 रामसहाय त्रिपाठी के पुत्र रूप में हुआ था। कालान्तर में आप इलाहाबाद के दारागंज की तंग गलियों में बस गये और वहीं पर अपने साहित्यिक जीवन के तीस-चालीस वर्ष बिताए। निराला जी गरीबों और शोषितों को प्रति काफी उदार व करुणामयी भावना रखते थे और दूसरों की सहायता के प्रति सदैव तत्पर रहते थे। चाहे वह अपनी पुस्तकों के बदले मिली रायल्टी का गरीबों में बाँटना हो, चाहे सम्मान रूप में मिली धनराशि व शाल जरूरतमंद वृद्धा को दे देना हो, चाहे इलाहाबाद में अध्ययनरत् विद्यार्थियों की जरूरत पड़ने पर सहायता करना हो अथवा एक बैलगाड़ी के एक सरकारी अधिकारी की कार से टकरा जाने पर अधिकारी द्वारा किसान को चाबुकों से पीटा जाने पर देखते ही देखते निराला द्वारा उक्त अधिकारी के हाथ से चाबुक छीनकर उसे ही पीटना हो। ये सभी घटनायें निराला जी के सम्वेदनशील व्यक्तित्व का उदाहरण कही जा सकती हैं।
जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पंत और महादेवी वर्मा के साथ छायावाद के सशक्त स्तम्भ रहे निराला ने 1920 के आस-पास कविता लिखना आरम्भ किया और 1961 तक अबाध गति से लिखते रहे। इसमें प्रथम चरण (1920-38) में उन्होंने ‘अनामिका’, ‘परिमल’ व ‘गीतिका’ की रचना की तो द्वितीय चरण (1939-49) में वे गीतों की ओर मुड़ते दिखाई देते हैं। ‘मतवाला’ पत्रिका में ‘वाणी’ शीर्षक से उनके कई गीत प्रकाशित हुए। गीतों की परम्परा में उन्होंने लम्बी कविताएँ लिखना आरम्भ किया तो 1934 में उनकी ‘तुलसीदास’ नामक प्रबंधात्मक कविता सामने आई। इसके बाद तो मित्र के प्रति, सरोज-स्मृति, प्रेयसी, राम की शक्ति-पूजा, सम्राट अष्टम एडवर्ड के प्रति, भिखारी, गुलाब, लिली, सखी की कहानियाँ, सुकुल की बीबी, बिल्लेसुर बकरिहा, जागो फिर एक बार और वनबेला जैसी उनकी अविस्मरणीय कृतियाँ सामने आयीं। निराला ने कलकत्ता पत्रिका, मतवाला, समन्वय इत्यादि पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। राम की शक्ति-पूजा, तुलसीदास और सरोज-स्मृति को निराला के काव्य शिल्प का श्रेष्ठतम उदाहरण माना जाता है। निराला की कविता सिर्फ एक मुकाम पर आकर ठहरने वाली नहीं थी, वरन् अपनी कविताओं में वे अन्त तक संशोधन करते रहते थे। तभी तो उन्होंने लिखा कि -
अभी न होगा मेरा अंत
अभी-अभी तो आया है, मेरे वन मृदुल वसन्त
अभी न होगा मेरा अन्त।

निराला की रचनाओं में अनेक प्रकार के भाव पाए जाते हैं। यद्यपि वे खड़ी बोली के कवि थे, पर ब्रजभाषा व अवधी में भी कविताएँ गढ़ लेते थे। उनकी रचनाओं में कहीं प्रेम की सघनता है, कहीं आध्यात्मिकता तो कहीं विपन्नों के प्रति सहानुभूति व सम्वेदना, कहीं देश-प्रेम का जज्बा तो कहीं सामाजिक रूढ़ियों का विरोध व कहीं प्रकृति के प्रति झलकता अनुराग। इलाहाबाद में पत्थर तोड़ती महिला पर लिखी उनकी कविता आज भी सामाजिक यथार्थ का एक आइना है। उनका जोर वक्तव्य पर नहीं वरन चित्रण पर था, सड़क के किनारे पत्थर तोड़ती महिला का रेखाकंन उनकी काव्य चेतना की सर्वोच्चता को दर्शाता है -
वह तोड़ती पत्थर
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर
कोई न छायादार पेड़
वह जिसके तले बैठी हुयी स्वीकार
याम तन, भर बंधा यौवन
नत नयन प्रिय कर्म-रत मन
गुरू हथौड़ा हाथ, करती बार-बार प्रहार
सामने तरू- मल्लिका अट्टालिका, प्राकार।

इसी प्रकार राह चलते भिखारी पर उन्होंने लिखा -
पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक
चल रहा लकुटिया टेक
मुट्ठी भर दाने को, भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता
दो टूक कलेजे के करता
पछताता पथ पर आता।
‘राम की शक्ति पूजा’ के माध्यम से निराला ने राम को समाज में एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया। वे लिखते हैं -
होगी जय, होगी जय
हे पुरुषोत्तम नवीन
कह महाशक्ति राम के बदन में हुईं लीन।
पदों में लिखी गयी ‘तुलसीदास’ निराला की सबसे बड़ी कविता है, जो कि 1934 में लिखी गयी और 1935 में सुधा के पाँच अंकों में किस्तवार प्रकाशित हुयी। इस प्रबन्ध काव्य में निराला ने पत्नी के युवा तन-मन के आकर्षण में मोहग्रस्त तुलसीदास के महाकवि बनने को बखूबी दिखाया है -
जागा, जागा संस्कार प्रबल
रे गया काम तत्क्षण वह जल
देखा वामा, वह न थी, अनल प्रतिमा वह
इस ओर ज्ञान, उस ओर ज्ञान
हो गया भस्म वह प्रथम भान
छूटा जग का जो रहा ध्यान।
निराला की रचनाधर्मिता में एकरसता का पुट नहीं है। वे कभी भी बँधकर नहीं लिख पाते थे और न ही यह उनकी फक्कड़ प्रकृति के अनुकूल था। निराला की ‘जूही की कली’ कविता आज भी लोगों के जेहन में बसी है। इस कविता में निराला ने अपनी अभिव्यक्ति को छंदों की सीमा से परे छन्दविहीन कविता की ओर प्रवाहित किया है -
विजन-वन वल्लरी पर
सोती थी सुहाग भरी स्नेह स्वप्न मग्न
अमल कोमिल तन तरूणी जूही की कली
दृग बंद किये, शिथिल पत्रांक में
वासन्ती निशा थी।

यही नहीं, निराला एक जगह स्थिर होकर कविता-पाठ भी नहीं करते थे। एक बार एक समारोह में आकाशवाणी को उनकी कविता का सीधा प्रसारण करना था, तो उनके चारों ओर माइक लगाए गए कि पता नहीं वे घूम-घूम कर किस कोने से कविता पढ़ें। निराला ने अपने समय के मशहूर रजनीसेन, चण्डीदास, गोविन्द दास, विवेकानन्द और रवीन्द्र नाथ टैगोर इत्यादि की बांग्ला कविताओं का अनुवाद भी किया, यद्यपि उन पर टैगोर की कविताओं के अनुवाद को अपना मौलिक कहकर प्रकाशित कराने के आरोप भी लगे। राजधानी दिल्ली को भी निराला ने अपनी कविताओं में अभिव्यक्ति दी -
यमुना की ध्वनि में है गूँजती सुहाग-गाथा
सुनता है अन्धकार खड़ा चुपचाप जहाँ
आज वह ‘फिरदौस’, सुनसान है पड़ा
शाही दीवान, आज स्तब्ध है हो रहा
दुपहर को, पार्श्व मेंउठता है झिल्ली रव
बोलते हैं स्यार रात यमुना-कछार मे
लीन हो गया है रव शाही अँगनाओं का
निस्तब्ध मीनार, मौन हैं मकबरे।
निराला की मौलिकता, प्रबल भावोद्वेग, लोकमानस के हृदय पटल पर छा जाने वाली जीवन्त व प्रभावी शैली, अद्भुत वाक्य विन्यास और उनमें अन्तर्निहित गूढ़ अर्थ उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करते हैं। वसन्त पंचमी और निराला का सम्बन्ध बड़ा अद्भुत रहा और इस दिन हर साहित्यकार उनके सान्निध्य की अपेक्षा रखता था। ऐसे ही किन्हीं क्षणों में निराला की काव्य रचना में यौवन का भावावेग दिखा -
रोक-टोक से कभी नहीं रूकती है
यौवन-मद की बाढ़ नदी की
किसे देख झुकती है
गरज-गरज वह क्या कहती है, कहने दो
अपनी इच्छा से प्रबल वेग से बहने दो।
यौवन के चरम में प्रेम के वियोगी स्वरूप को भी उन्होंने उकेरा -
छोटे से घर की लघु सीमा में
बंधे हैं क्षुद्र भाव
यह सच है प्रिय
प्रेम का पयोधि तो उमड़ता है
सदा ही नि:सीम भूमि पर।

निराला के काव्य में आध्यात्मिकता, दार्शनिकता, रहस्यवाद और जीवन के गूढ़ पक्षों की झलक मिलती है पर लोकमान्यता के आधार पर निराला ने विषयवस्तु में नये प्रतिमान स्थापित किये और समसामयिकता के पुट को भी खूब उभारा। अपनी पुत्री सरोज के असामायिक निधन और साहित्यकारों के एक गुट द्वारा अनवरत अनर्गल आलोचना किये जाने से निराला अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में मनोविक्षिप्त से हो गये थे। पुत्री के निधन पर शोक-सन्तप्त निराला ‘सरोज-स्मृति’ में लिखते हैं -
मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल
युग वर्ष बाद जब हुयी विकल
दुख ही जीवन की कथा रही
क्या कहूँ आज, जो नहीं कही।
15 अक्टूबर 1961 को अपनी यादें छोड़कर निराला इस लोक को अलविदा कह गये पर मिथक और यथार्थ के बीच अन्तर्विरोधों के बावजूद अपनी रचनात्मकता को यथार्थ की भावभूमि पर टिकाये रखने वाले निराला आज भी हमारे बीच जीवन्त हैं। मुक्ति की उत्कट आकांक्षा उनको सदैव बेचैन करती रही, तभी तो उन्होंने लिखा -
तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा
पत्थर की, निकलो फिर गंगा-जलधारा
गृह-गृह की पार्वती
पुन: सत्य-सुन्दर-शिव को सँवारती
उर-उर की बनो आरती
भ्रान्तों की निश्चल ध्रुवतारा
तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा।


-- कृष्ण कुमार यादव