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शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

दाम्पत्य जीवन का एक दशक


जीवन में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव। दाम्पत्य जीवन का एक दशक आज पूरा हुआ। यहाँ पाश्चात्य विचारक फ्रैंज स्कूबर्ट के शब्द याद आ रहे हैं, ’’जिसने सच्चा दोस्त पा लिया, वह सुखी है। लेकिन उससे भी सुखी वह है जिसने अपनी पत्नी में सच्चा मित्र पा लिया है।’’





दाम्पत्य जीवन का एक दशक : 28 नवम्बर, 2014 को हम अपने विवाह की दसवीं वर्षगाँठ सेलिब्रेट कर रहे हैं। पर अभी भी लगता है मानो कल की ही तो बात है। वाकई समय कितनी तेजी से बीतता है, पता ही नहीं चलता।

विभिन्न माध्यमों पर आप सभी की शुभकामनाओं और स्नेह के लिए आभार !!

बुधवार, 26 नवंबर 2014

भूटान में होगा अन्तर्राष्ट्रीय ब्लाॅगर सम्मेलन : जुटेंगे भारत, नेपाल, भूटान, आस्ट्रेलिया सहित तमाम देशों के साहित्यकार व दिग्गज ब्लाॅगर्स

हिन्दी सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया की अन्य देशों में भी तेजी से प्रतिष्ठित हो रही है। इसके प्रचार-प्रसार में फिल्मों और साहित्य के साथ-साथ न्यू मीडिया के रूप में ब्लागिंग ने भी महत्वपूर्ण स्थान निभाया है। ऐसे में ब्लाॅगिंग से जुड़े लोगों को एक मंच देने के उद्देश्य से लखनऊ से प्रकाशित ’परिकल्पना समय’ पत्रिका एवं ’परिकल्पना’ साहित्यिक संस्था द्वारा प्रतिवर्ष अन्तर्राष्ट्रीय ब्लाॅगर सम्मेलन का आयोजन किया जाता है। सम्मेलन का मूल उद्देश्य दक्षिण एशिया में ब्लॉग के विकास हेतु पृष्ठभूमि तैयार करना,हिंदी-संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना, भाषायी सौहार्द्रता एवं सांस्कृतिक अध्ययन-पर्यटन का अवसर उपलब्ध कराना आदि है। दिल्ली, लखनऊ, काठमांडू में आयोजन के बाद इस बार 15-18 जनवरी 2015 के दौरान भूटान में चतुर्थ अन्तर्राष्ट्रीय ब्लाॅगर सम्मेलन का आयोजन किया जायेगा। यहाँ अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉग सम्मलेन आयोजित करने के पीछे उद्देश्य है हिंदी संस्कृति को भूटानी संस्कृति के करीब लाना और हिंदी भाषा को यहाँ के वैश्विक वातावरण में प्रतिष्ठापित करना। उक्त बातें ’परिकल्पना समय’ के प्रधान संपादक तथा ’अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन’ के संयोजक रवीन्द्र प्रभात ने कही। 

श्री प्रभात ने बताया कि इस अवसर पर हिन्दी ब्लाॅग एवं साहित्य को समृद्ध करने वाले विभिन्न देशों-भारत, नेपाल, भूटान, आस्ट्रेलिया इत्यादि के लोगों को सम्मानित भी किया जायेगा। इसमें ’’परिकल्पना सार्क शिखर सम्मान’’ इलाहाबाद (उ.प्र.) के निदेशक डाक सेवाएं एवं चर्चित ब्लाॅगर श्री कृष्ण कुमार यादव को ब्लाॅग पर संस्मरणात्मक सृजन के लिए, रायपुर (छ.ग.) से श्री ललित शर्मा को पुरातत्व विषयक लेखन के लिए, तेलंगाना, हैदराबाद से श्रीमती सम्पत देवी मुरारका को यात्रा वृतांत के लिए एवं नेपाल के चर्चित साहित्यकार श्री कुमुद अधिकारी को साहित्यिक ब्लाॅग पत्रकारिता के लिए प्रदान किया जायेगा। इस सम्मान में 25,000 रूपये की धनराशि, सम्मान पत्र, प्रतीक चिन्ह, श्रीफल और अंगवस्त्र दिया जायेगा। 

इसी क्रम में सम्मेेलन में ’’परिकल्पना सार्क सम्मान’’ के लिए भूटान के श्री लिंगचेन दोरजी को उनकी चर्चित अंगे्रजी उपन्यासिक कृति ’होम संगरिला’ के लिए, ऑस्ट्रेलिया से सुश्री रेखा राजवंशी को पश्चिमी देशों में हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए, औरंगाबाद, महाराष्ट्र से सुश्री सुनीता प्रेम यादव को अन्य भाषाओं से हिन्दी में अनुवाद कर्म को बढ़ावा देने हेतु चयनित किया गया है। इस सम्मान के अन्तर्गत 5,000 रूपये की धनराशि, सम्मान पत्र, प्रतीक चिन्ह, श्रीफल और अंगवस्त्र दिया जायेगा। 

इस समारोह में दक्षिण एशिया के लगभग 50 ब्लॉगर्स को ’परिकल्पना सम्मान’ प्रदान किया जायेगा। इनमें असम के गुवाहाटी से श्री नीलेश माथुर, सिल्चर से श्रीमती शुभदा पाण्डेय, उ.प्र. के बाराबंकी से श्री रणधीर सिंह सुमन और डॉ विनय दास, लखनऊ से श्री राम बहादुर मिश्रा, राजस्थान के श्रीगंगानगर से श्री सुरजीत सिंह बरवाल, जयपुर से सुश्री सरस्वती माथुर,  छत्तीसगढ़ के रायपुर से श्री गगन शर्मा, नवी मुंबई से श्रीमती तारा सिंह और मुंबई से श्री आलोक भारद्वाज इत्यादि का नाम प्रमुख है।

 सम्मेलन के दौरान वैश्विक परिप्रेक्ष्य विशेषकर सार्क देशों में हिन्दी के पठन-पाठ्न, हिन्दी साहित्य के प्रचार-प्रसार, न्यू मीडिया के रूप में ब्लाॅगिंग के विभिन्न आयामों एवं बदलते दौर में सोशल मीडिया की भूमिका इत्यादि विषयों पर भी चर्चा होगी। अभी कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने अपनी भूटान यात्रा के दौरान भारत-भूटान के मध्य ऐतिहासिक व सांस्कृतिक संबंधों की चर्चा करते हुए परस्पर सद्भाव व सहयोग की बात कही थी। भूटान में आयोजित यह सम्मेलन भी निश्चितत: उसी कड़ी को आगे बढ़ाने का प्रयास करेगा। 

( फाइल फोटो : गत वर्ष नेपाल में हुए अन्तर्राष्ट्रीय ब्लाॅगर सम्मेलन के दृश्य)


रविवार, 23 नवंबर 2014

मासूम प्यार


साथ-आठ साल के लड़का-लड़की खेल रहे थे।

लड़की बोली -" चलो मैं छुप जाती हूँ। अगर तूने मुझे ढूंढ लिया तो हम बड़े होकर आपस में शादी करेंगे।"

लड़का बोला-"ठीक है पर अगर मैं नही ढूंढ पाया तो? "

लड़की बड़ी मासूमियत से बोली- "ओये पागल प्लीज़ ऐसे मत बोलो। मैं वहाँ उसी दरवाजे के पीछे ही छिपूंगी।

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

आप भी इस्तेमाल कीजिये 'क्राउड सोर्सिंग'

इंटरनेट की दुनिया ने बहुत सारे नए शब्द इज़ाद करा दिए हैं।  इनमें से एक है - ′क्राउड सोर्सिंग′. यह क्राउड और आउट सोर्सिंग से गढ़ा गया शब्द है, जिसका अर्थ होता है, लोगों (क्राउड) से विचार अथवा राय मांगना। यह काम आमतौर पर ऑनलाइन यानी इंटरनेट के माध्यम से होता है। आजकल अपने देश भारत में 
मोदी सरकार सहित कुछेक राज्य सरकारें भी नीतियां बनाने और सरकारी अभियानों में ′क्राउड सोर्सिंग′ का जमकर इस्तेमाल कर रही है। तमाम फिल्म स्टार से लेकर विज्ञापनों की दुनिया से जुड़े लोग एवं साहित्यकार और कॉरपोरेट जगत के लोग भी इसका यदा कदा इस्तेमाल करते रहते हैं। 

वर्ष 2005 में जेफ होवे और मार्क रॉबिन्सन ने अपनी पत्रिका वायर्ड में इस शब्द का पहली बार इस्तेमाल किया था, मगर इसके उदाहरण 18वीं सदी में भी मिलते हैं। मसलन, वर्ष 1714 में द लॉन्गिट्यूड प्राइज के लिए ब्रिटिश सरकार ने लोगों से राय मांगी थी।

 क्राउड सोर्सिंग के पीछे सोच यह है कि किसी एक व्यक्ति के बजाय कई लोगों से विचार, राय अथवा समाधान मांगने से श्रेष्ठ मशविरा सामने आता है। इसका एक उदाहरण विकिपीडिया भी है, जो चुनिंदा लेखकों अथवा संपादकों के बजाय अधिकाधिक लेखकों को खुद से जोड़े हुए है। इस कारण आज यह दुनिया का सबसे व्यापक विश्वकोश भी है। इसके समकक्ष दो अन्य शब्द भी हैं। पहला शब्द क्राउड फंडिंग है, जिसका अर्थ होता है, इंटरनेट के माध्यम से अधिकाधिक लोगों से पैसे जुटाना। और दूसरा, क्राउड टेस्टिंग, यानी सॉफ्टवेयर की गुणवत्ता जांच करने के लिए लोगों का इस्तेमाल करना।

बुधवार, 19 नवंबर 2014

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का दुर्लभ फोटो


झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का यह दुर्लभ फोटो वर्ष 1850 में कोलकाता में रहने वाले अंग्रेज फोटोग्राफर जॉनस्टोन एंड हॉटमैन ने खींचा था। इस फोटो को वर्ष  2009 में  भोपाल में आयोजित विश्व फोटोग्राफी प्रदर्शनी में भी प्रदर्शित किया गया था। यह चित्र अहमदाबाद के एक पुरातत्व महत्व की वस्तुओं के संग्रहकर्ता अमित अम्बालाल ने भेजा था। माना जाता है कि रानी लक्ष्मीबाई का यही एकमात्र फोटोग्राफ उपलब्ध है।  आज उनकी जयंती पर शत-शत नमन !!

जब भी झाँसी की रानी जिक्र आता है तो सुभद्राकुमारी चौहान जी द्वारा लिखित कविता जरूर जेहन में आती है। न जाने जाने कितनी बार पढ़ा होगा, पर हमेशा पढ़ने का मन करता है।  तो लीजिये, एक बार फिर पढ़ते/सुनते हैं

झाँसी की रानी - 

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़|

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में,

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?
जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


रविवार, 9 नवंबर 2014

डाक निदेशक एवं युवा साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव को मिलेगा ’दुष्यंत कुमार सम्मान’


प्रसिद्ध साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ’आगमन’ ने लोकप्रिय युवा लेखक व साहित्यकार एवं इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव को इस वर्ष के ’दुष्यंत कुमार सम्मान-2014’ के लिए चयनित किया है। उक्त सम्मान श्री यादव को 23 नवम्बर को नोएडा में आयोजित आगमन वार्षिक सम्मान समारोह में प्रदान किया जायेगा। उक्त जानकारी संस्था के संस्थापक श्री पवन जैन ने दी।







गौरतलब है कि सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लाॅगिंग के क्षेत्र में भी चर्चित श्री यादव की अब तक कुल 7 पुस्तकें 'अभिलाषा' (काव्य-संग्रह, 2005) 'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श' (निबंध-संग्रह, 2006 व 2007), India Post : 150 glorious years  (2006), 'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' (संपादित, 2007), ’जंगल में क्रिकेट’ (बाल-गीत संग्रह-2012) एवं ’16 आने 16 लोग’(निबंध-संग्रह, 2014) प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर: कृष्ण कुमार यादव‘‘ (सं0 डाॅ0 दुर्गाचरण मिश्र, 2009, आलोक प्रकाशन, इलाहाबाद) भी प्रकाशित हो चुकी  है। श्री यादव देश-विदेश से प्रकाशित तमाम पत्र पत्रिकाओं एवं इंटरनेट पर भी प्रमुखता से प्रकाशित होते रहते हैं।

 कृष्ण कुमार यादव को इससे पूर्व उ.प्र. के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव द्वारा ’’अवध सम्मान’’, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री केशरी नाथ त्रिपाठी द्वारा ’’साहित्य सम्मान’’, छत्तीसगढ़ के राज्यपाल श्री शेखर दत्त द्वारा ”विज्ञान परिषद शताब्दी सम्मान”, परिकल्पना समूह द्वारा ’’दशक के श्रेष्ठ हिन्दी ब्लाॅगर दम्पति’’ सम्मान, विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार द्वारा डाॅक्टरेट (विद्यावाचस्पति) की मानद उपाधि, भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’डाॅ0 अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘‘, साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ”हिंदी भाषा भूषण”, वैदिक क्रांति परिषद, देहरादून द्वारा ‘’श्रीमती सरस्वती सिंहजी सम्मान‘’, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ”महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान”, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान‘‘, भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ द्वारा ’’पं0 बाल कृष्ण पाण्डेय पत्रकारिता सम्मान’’, सहित विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु तमाम सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त हो चुकी हैं।   


('आगमन सम्मान चयन समिति' ''दुष्यंत कुमार सम्मान-2014" के लिए लोकप्रिय युवा लेखक, साहित्यकार एवं भारतीय डाक सेवा इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव का चयन करते हुए गौरवान्वित है। उक्त सम्मान उन्हें 23 नवम्बर को 'आगमन वार्षिक सम्मान समारोह' में प्रदान किया जायेगा। बधाई श्री यादव जी।  (आगमन के संस्थापक श्री पवन जैन द्वारा फेसबुक पर 16 अक्टूबर, 2014 को उद्घोषणा)

गुरुवार, 6 नवंबर 2014

टैगोर आज ही के दिन हुए थे साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित

विश्वविख्यात कवि व साहित्यकार रवीन्द्र नाथ टैगोर को आज ही के दिन (6 नवम्बर) 1913 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह पुरस्कार उन्हें 'गीतांजलि' के लिए दिया गया था। टैगोर साहित्य का नोबेल जीतने वाले पहले भारतीय थे। टैगोर को नोबेल मिलने के 100 वर्षों बाद भी किसी भारतीय साहित्यकार को साहित्य का नोबेल न मिलना अपने आप में उनकी प्रासंगिकता और कालजयी कृतित्व को दर्शाता है।  वे एकमात्र कवि हैं जिनकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं- भारत का राष्ट्र-गान जन गण मन और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान आमार सोनार बांग्ला।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर को नोबेल पुरस्कार मिलने के संबंध में ब्रिटिश समाचार पत्रों में उस दौर में मिश्रित प्रतिक्रिया हुई थी । इस संबंध में 'द टाइम्स' ने लिखा था कि 'स्वीडिश एकेडेमी' के इस अप्रत्याशित निर्णय पर कुछ समाचार पत्रों में आश्चर्य व्यक्त किया गया है' पर इस पत्र के स्टाकहोम स्थित संवाददाता ने अपने डिस्पेच में लिखा था कि स्वीडन के प्रमुख कवियों और लेखकों ने स्वीडिश कमेटी के सदस्यों की हैसियत से नोबेल कमेटी के इस निर्णय पर पूर्ण संतोष व्यक्त किया है। ब्रिटेन के कट्टर रुढ़िवादी कंजरवेटिव समाचार पत्र 'डेली टेलीग्राफ' ने उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलने की सूचना तक प्रकाशित करना उचित नहीं समझा जबकि उस दिन के अन्य सभी समाचार पत्रों में इस सूचना के साथ ही पुरस्कृत कृति 'गीतांजलि' के संबंध में वहाँ के समीक्षकों की सम्मति भी प्रकाशित हुई। इसी संबंध में ब्रिटेन के प्रतिष्ठित समाचार पत्र 'मेन्चेस्टर गार्डियन' ने लिखा था कि रवीन्द्रनाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिलने की सूचना पर कुछ लोगों को आश्चर्य अवश्य हुआ पर असंतोष नहीं। टैगोर एक प्रतिभाशाली कवि हैं। बाद में 'द केरसेण्ट मून' की समीक्षा करते हुए एक समाचार पत्र ने लिखा था कि इस बंगाली (यानी रवीन्द्रनाथ ठाकुर) का अंग्रेज़ी भाषा पर जैसा अधिकार है वैसा बहुत कम अंग्रेज़ों का होता है।

रविवार, 2 नवंबर 2014

एक पहल : अखिल भारतीय सेवाओं में चयनित नवोदय विद्यालय के विद्यार्थी


देश भर में नवोदय विद्यालय से हर साल हजारों विद्यार्थी 12वीं की परीक्षा पास कर  निकलते हैं। इनमें से कुछ आपस में संपर्क में रहते हैं, वहीँ कुछेक वक़्त के अँधेरे में गुम हो जाते हैं।  कई तो अर्थाभाव में उसके बाद अपनी शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते। कक्षा 6-12 तक मुफ़्त शिक्षा, हॉस्टल और अन्य तमाम सुविधाएँ नवोदयी विद्यार्थियों को दी जाती हैं, पर नवोदय विद्यालय समिति के पास इनका कोई डाटा-बेस नहीं है कि 12वीं  के बाद ये विद्यार्थी कहाँ जाते हैं और उनमें से कितनों ने विभिन्न क्षेत्रों में सफलताएँ प्राप्त कीं। फ़िलहाल, नवोदय विद्यालय समिति (लखनऊ संभाग) ने पिछले दो-तीन सालों से जवाहर नवोदय विद्यालय प्रवेश परीक्षा हेतु जारी किये जाने वाले विवरणिका सह आवेदन पत्र में आईएएस व एलाइड सेवाओं में उत्तर प्रदेश के नवोदय विद्यालयों से सफल होने वाले विद्यार्थियों की सूची प्रकाशित करने का सिलसिला आरम्भ किया है, ताकि अन्य विद्यार्थियों को भी प्रेरणा मिल सके !!

आशा की जानी चाहिए कि यह सिलसिला यूँ ही बढ़ता रहे और इसे पूरे भारत में लागू किया जा सके !!

शनिवार, 25 अक्टूबर 2014

अब आपका स्मार्टफोन बताएगा आपकी बीमारी

स्मार्टफोन अब वाकई स्मार्ट हो गया है। अमेरिका में शोधकर्ताओं ने एक ऐसा स्मार्टफोन विकसित किया है, जो किसी बायो सेंसर की तरह शरीर में विषाक्त पदार्थो का पता लगाएगा।

स्मार्टफोन में लगा कैमरा शरीर में मौजूद बैक्टीरिया, वायरस और दूसरे मॉलिक्यूल्स का पता लगा सकता है। यह तकनीक चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत ही सस्ती और आसान डायग्नोसिस प्रक्रिया उपलब्ध करा सकती है। स्मार्टफोन का ढांचा और इसमें इस्तेमाल की गई एप्लीकेशन बायो सेंसिटिव क्षमता वाली हैं, जिसे फोन के ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम [जीपीएस] से जोड़ दिया गया है। इससे बैक्टीरिया के फैलने का नक्शा मिल जाता है। बायो सेंसर के बीच एक फोटोनिक क्रिस्टल लगा है।

यह फोटोनिक क्रिस्टल एक तरह का शीशा है, जो प्रकाश की एक तरंगदै‌र्ध्य को अपने में से गुजरने देता है। जैसे ही प्रोटीन, कोशिका, बैक्टीरिया या डीएनए जैसे जैविक तत्व फोनेटिक क्रिस्टल से चिपकते हैं, तो इसमें से निकलने वाली छोटी तरंगदै‌र्ध्य लंबी हो जाती है। इस पूरे परीक्षण में कुछ मिनटों का समय लगेगा। यह अध्ययन पिछले साल 'लैब ऑन ए चिप' नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

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गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

मानव हृदय को आलोकित करने वाला पर्व है दीपावली

दीपावली सिर्फ घरों को जगमगाने वाला पर्व नहीं है बल्कि यह मानव हृदय को आलोकित करने वाला पर्व भी है। हमारी परम्परा एक तरफ दीपावली के दिन घरों को साफ-सुथरा कर गणेश-लक्ष्मी के रूप में सुख-समृद्धि का आह्वान करती है, वहीं रात के अंधियारे में आशाओं के दीप जगमगाते हैं तो निराशा के काले घने बादल स्वमेव छँटते जाते हैं। 

दीपावली जहाँ मन से विकार, कटुता, निराशा, अवसाद और अन्य नकारात्मक प्रवृत्तियों को बाहर निकालती है, वहीँ दीये की रोशनी तमाम कीट-पतंगों और गन्दगी को ख़त्म करती है। 

दीपावली एक सामाजिक त्यौहार है, इसके साथ कइयों की रोजी-रोटी जुडी हुई है। 'ज्योत से ज्योत जलाते चलो' की परम्परा में एक दीया हजारों दीयों को रोशन कर सकता है, पर झालर और बल्ब दूसरे झालरों और बल्बों को रोशन नहीं कर सकते। दीपावली सुख, स्वास्थ्य और सामाजिक सद्भाव का पर्व है। पर पटाखों के शोर-शराबे के बीच फैलता प्रदूषण और हानिकारक कीटों को आमंत्रित करती विदेशी झालरें और इन सब पर व्यय किये गए करोड़ों रूपये इस पवित्र त्यौहार के मूल भाव को ही ख़त्म करने पर तुले हैं। आतिशबाजी और पटाखों की आड़ में खर्च होने वाले करोड़ों रूपये किसी गरीब व्यक्ति को दो वक़्त की रोटी दे सकते हैं। विदेशी आतिशबाजी से दूर रहकर न केवल प्रदूषण से निजात पाया जा सकता है, बल्कि निज बंधुओं के जीवन में खुशियाँ भी भरी जा सकती है।

!! आप सभी को दीपावली पर्व पर सपरिवार शुभकामनाएँ !!


बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

मिट्टी के ही दीये जलाएँ, दीवाली पर अबकी बार


इस दीपावली पर जरा यह भी गौर कीजियेगा


कुम्हारन बैठी सड़क किनारे, लेकर दीये दो-चार।
जाने क्या होगा अबकी, करती मन में विचार।।

याद करके आँख भर आई, पिछला  दीवाली त्योहार।
बिक न पाया आधा समान, चढ गया सर पर उधार।।

सोच रही है अबकी बार, दूँगी सारे कर्ज उतार।
सजा रही है सारे दीये, करीने से बार बार।।

पास से गुजरते लोगों को, देखे कातर निहार।
बीत जाए न अबकी दीवाली, जैसा पिछली बार।।

नम्र निवेदन मित्रोंजनों से, करता हुँ मैँ मनुहार।
मिट्टी के ही दीये जलाएँ, दीवाली पर अबकी बार।।


आपकी सदाशयता किसी गरीब के घर में दीवाली ला  सकती है। 
आप सभी को दीपावली पर्व पर सपरिवार शुभकामनाएँ !!



मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने साहित्य में योगदान हेतु कृष्ण कुमार यादव को किया सम्मानित



पश्चिम बंगाल के राज्यपाल श्री केशरी नाथ त्रिपाठी ने साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव को सम्मानित किया। उक्त सम्मान श्री यादव को मिर्जापुर में आयोजित एक कार्यक्रम में 5 अक्टूबर, 2014 को प्रदान किया गया। राज्यपाल ने शाल ओढाकर  और सम्मान पत्र देकर श्री यादव को सम्मानित किया। गौरतलब है कि सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लाॅगिंग के क्षेत्र में भी चर्चित श्री यादव की अब तक कुल 7 पुस्तकें 'अभिलाषा' (काव्य-संग्रह, 2005) 'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श' (निबंध-संग्रह, 2006 व 2007), India Post : 150 glorious years  (2006), 'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' (संपादित, 2007), ’जंगल में क्रिकेट’ (बाल-गीत संग्रह-2012) एवं ’16 आने 16 लोग’(निबंध-संग्रह, 2014) प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर: कृष्ण कुमार यादव‘‘ (सं0 डाॅ0 दुर्गाचरण मिश्र, 2009, आलोक प्रकाशन, इलाहाबाद) भी प्रकाशित हो चुकी  है। श्री यादव देश-विदेश से प्रकाशित तमाम रिसर्च जनरल, पत्र पत्रिकाओं एवं इंटरनेट पर भी प्रमुखता से प्रकाशित होते रहते हैं।

श्री कृष्ण कुमार यादव को इससे पूर्व उ.प्र. के मुख्यमंत्री द्वारा ’’अवध सम्मान’’, परिकल्पना समूह द्वारा ’’दशक के श्रेष्ठ हिन्दी ब्लाॅगर दम्पति’’ सम्मान, विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार द्वारा डाॅक्टरेट (विद्यावाचस्पति) की मानद उपाधि, भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’डाॅ0 अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘‘, छत्तीसगढ़ के राज्यपाल द्वारा ”विज्ञान परिषद शताब्दी सम्मान”, साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ”हिंदी भाषा भूषण”, वैदिक क्रांति परिषद, देहरादून द्वारा ‘’श्रीमती सरस्वती सिंहजी सम्मान‘’, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ”महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान”, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान‘‘, भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ द्वारा ’’पं0 बाल कृष्ण पाण्डेय पत्रकारिता सम्मान’’, सहित विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु शताधिक सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त हो चुकी हैं।   

उक्त अवसर पर न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय, पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर  के कुलपति प्रो0 पीयूष रंजन अग्रवाल, इग्नू के प्रो चांसलर प्रो0  नागेश्वर राव, बनारस हिन्दू विश्विद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो0 पंजाब सिंह, भोजपुरी फिल्म अभिनेता कुणाल सिंह, पूर्व शिक्षा मंत्री सुरजीत सिंह डंग सहित तमाम साहित्यकार, शिक्षाविद, संस्कृतिकर्मी व अधिकारीगण मौजूद रहे।









शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

तेजाब के हमले में घायल एक लड़की के दिल से निकलीं कुछ पंक्तियाँ



चलो, फेंक दिया
सो फेंक दिया....
अब कसूर भी बता दो मेरा

तुम्हारा इजहार था
मेरा इन्कार था
बस इतनी सी बात पर
फूंक दिया तुमने
चेहरा मेरा....

गलती शायद मेरी थी
प्यार तुम्हारा देख न सकी
इतना पाक प्यार था
कि उसको मैं समझ ना सकी....

अब अपनी गलती मानती हूँ
क्या अब तुम ... अपनाओगे मुझको?
क्या अब अपना ... बनाओगे मुझको?

क्या अब ... सहलाओगे मेरे चहरे को?
जिन पर अब फफोले हैं
मेरी आंखों में आंखें डालकर देखोगे?
जो अब अन्दर धस चुकी हैं
जिनकी पलकें सारी जल चुकी हैं
चलाओगे अपनी उंगलियाँ मेरे गालों पर?
जिन पर पड़े छालों से अब पानी निकलता है

हाँ, शायद तुम कर लोगे....
तुम्हारा प्यार तो सच्चा है ना?

अच्छा! एक बात तो बताओ
ये ख्याल 'तेजाब' का कहाँ से आया?
क्या किसी ने तुम्हें बताया?
या जेहन में तुम्हारे खुद ही आया?
अब कैसा महसूस करते हो तुम मुझे जलाकर?
गौरान्वित..???
या पहले से ज्यादा
और भी मर्दाना...???

तुम्हें पता है
सिर्फ मेरा चेहरा जला है
जिस्म अभी पूरा बाकी है

एक सलाह दूँ!
एक तेजाब का तालाब बनवाओ
फिर इसमें मुझसे छलाँग लगवाओ
जब पूरी जल जाऊँगी मैं
फिर शायद तुम्हारा प्यार मुझमें
और गहरा और सच्चा होगा....

एक दुआ है....
अगले जन्म में
मैं तुम्हारी बेटी बनूँ
और मुझे तुम जैसा
आशिक फिर मिले
शायद तुम फिर समझ पाओगे
तुम्हारी इस हरकत से
मुझे और मेरे परिवार को
कितना दर्द सहना पड़ा है।
तुमने मेरा पूरा जीवन
बर्बाद कर दिया है।

https://www.facebook.com/krishnakumaryadav1977

मंगलवार, 30 सितंबर 2014

ये भी कुछ कहते हैं



टेम्पो या ट्रक इत्यादि के पीछे लिखे शब्द/वाक्य कई बार गौरतलब होते हैं। यूँ ही उन पर नजर पड़ती है और मुस्कुराकर रह जाते हैं। याद आता है बाबा नागार्जुन की एक रचना में अवतरित वह ट्रक ड्राइवर, जो अपनी बेटी की छोटी-छोटी चूड़ियाँ अपने ट्रक में हमेशा सामने टांगा रहता है, कितनी संवेदना उसमें छुपी हुई है। कई बार इन वाक्यों/शब्दों में हास्य बोध छुपा होता है, प्यार को लेकर कोई अहसास छुपा होता है और कुछेक बार तो इनमें जीवन का कोई सूत्र वाक्य छुपा होता है। कुछेक अपने वजूद का अहसास कराते हैं, कुछ अपने व्यक्तित्व का। जब भी इन्हें पढता या देखता हूँ तो सोचता हूँ कि आखिर यह पेंटर की कारस्तानी होती है या उस वाहन के ड्राइवर की। कॉलेज के दिनों में तो हमारे एक मित्र इन तमाम बातों को अपनी डायरी में लिखने का शौक भी रखते थे, पता नहीं कब और कहाँ सृजन हो जाये !!

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

हिन्दी के क्षेत्र में सम्मान का सैकड़ा


आज के दौर में प्रशासनिक सेवा में रहकर राजभाषा हिंदी के विकास के लिए चिंतन मनन करना अपने आप में एक उपलब्धि है। राजकीय सेवा के दायित्वों का निर्वहन और श्रेष्ठ कृतियों की सर्जना का यह मणिकांचन योग विरले ही मिलता है। समकालीन साहित्यकारों में उभरते चर्चित कवि, लेखक एवं चिंतक तथा जौनपुर जिले के बरसठी विकास खंड के सरावां गांँव निवासी और मौजूदा समय में डाक निदेशक इलाहाबाद परिक्षेत्र कृष्ण कुमार यादव इस विरले योग के ही प्रतीक हैं। श्री यादव को इसके लिए अब तक 102 बार सम्मान व मानद उपाधियाँ प्राप्त हो चुकी हैं। 

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक गणराज्य देश भारत के पास अपनी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। 14 सितंबर, 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला, पर आधुनिक दौर में हर व्यक्ति अंग्रेजी की ओर भाग रहा है। खासकर प्रोफेशनल और सरकारी नौकरियों में अंगे्रजी को महत्वपूर्ण अंग के रूप में लिया जा रहा है। ऐसे में श्री यादव लोगों को बताते हैं कि कक्षा छह से ही हिंदी के सहारे मंजिल पाने का सपना देखना शुरू किया। इस सपने को साकार कराने में उनके पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव का विशेष योगदान रहा है। जिसकी बदौलत उन्हें वर्ष 2001 में सिविल सेवा में सफलता मिली। इसके बाद तमाम पत्र-पत्रिकाओं में लेखन के साथ ही उन्होंने ब्लाॅगिंग के सहारे हिंदी के विकास के लिए कार्य करना शुरू किया। धीरे-धीरे उनकी जीवन संगिनी आंकाक्षा यादव और पुत्री अक्षिता (पाखी) भी लेखन ब्लाॅगिंग में सक्रिय हो गईं। परिणाम रहा कि तीन पीढि़यों संग हिन्दी के विकास में जुटे कृष्ण कुमार यादव को 102 बार हिंदी के विकास हेतु विभिन्न सम्मान व मानद उपाधियांँ प्राप्त हुई। 

दो बार मिला अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लाॅगर पुरस्कार

हिंदी के विकास में जुटे डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव  को उत्कृष्ट कार्य के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी सम्मानित कर चुके हैं।  उन्होंने 'अवध सम्मान’ से श्री यादव को नवाजा था। लखनऊ में आयोजित द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लाॅगर सम्मलेन में ’दशक के श्रेष्ठ हिन्दी ब्लाॅगर दंपती’ का सम्मान श्री यादव को प्रदान किया गया। इसके अलावा काठमांडू में हुए तृतीय अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लाॅगर सम्मेलन में नेपाल के संविधान सभा के अध्यक्ष नरसिंह केसी ने उन्हें  ’परिकल्पना साहित्य सम्मान’ दिया था।

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हिन्दी के क्षेत्र में सम्मान का सैकड़ा
तीन पीढि़यों संग हिन्दी के विकास में जुटे हैं डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव
102 बार मिल चुका है पुरस्कार और मानद उपाधियाँ
(साभार : दैनिक जागरण, जौनपुर-वाराणसी संस्करण, 15 सितंबर, 2014) 

शनिवार, 13 सितंबर 2014

'हिंदी' हमारे रोजमर्रा की भाषा है, सिर्फ 'दिवस' या 'पखवाड़ा' की नहीं


14 सितम्बर को 'हिंदी दिवस' के रूप में मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन संविधान सभा ने 1949 में हिंदी को राजभाषा के रूप में मान्यता दी थी। पूरा सितम्बर माह हिंदी दिवस से लेकर हिंदी सप्ताह, पखवाड़ा और हिंदी माह के रूप में मनाया जाता है। वस्तुत:  हिंदी हमारे रोजमर्रा की भाषा है और इसे सिर्फ दिवस या पखवाड़ा से जोड़कर देखने की जरूरत नहीं है।  संसार की उन्नत भाषाओं में हिंदी सबसे अधिक व्यवस्थित भाषा है और हिंदी लिखने के लिये प्रयुक्त देवनागरी लिपि अत्यंत वैज्ञानिक है। दुनिया में चीनी मंदारिन के बाद सर्वाधिक भाषा  हिंदी ही बोली जाती है।  हिन्दी को संस्कृत शब्द-संपदा एवं नवीन शब्द रचना सामर्थ्य विरासत में मिली है। यह देशी भाषाओं एवं अपनी बोलियों के साथ-साथ अन्य भाषाओं से भी शब्द लेने में संकोच नहीं करती। यही कारण है कि अंग्रेजी के मूल शब्द लगभग 10,000 हैं, जबकि हिन्दी के मूल शब्दों की संख्या ढाई लाख से भी अधिक है। ऐसे में हिंदी का महत्व सर्वविदित है। हिंदी को जितना नुकसान अन्य ने नहीं पहुँचाया है, उससे ज्यादा स्वयं हिंदी वालों ने पहुँचाया है।  जिस दिन हर हिंदी भाषी हिंदी से प्रेम करने लगेगा, उस दिन हिंदी खुद ही सिरमौर हो जाएगी !!

(चित्र : कानपुर में पदस्थ रहने के दौरान 'हिंदी पखवाड़ा' के दौरान सम्मान। साथ में पं. बद्री नारायण तिवारी, बाल-साहित्यकार डा. राष्ट्रबंधु, गीतकार श्री शतदल)

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

मास्टर जी की छड़ी

स्कूल के दिनों में मास्टर जी की छड़ी याद है न। आज का परिवेश भले ही बदल गया हो, पर हमारे दौर में मास्टर जी की छड़ी बड़ी अहमियत रखती थी। कभी इस छड़ी को लेकर एक कविता लिखी थी, जिसे आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूँ। संयोगवश कल 'शिक्षक दिवस' भी है -



बचपन में खींच दी थी
मास्टर जी ने हाथों में लकीर

बाँस की ताजी टहनियों से बनी
उस दुबली-पतली छड़ी का साया
चुप कराने के लिए काफी था
जब कभी पड़ती वो किसी के हाथों पर 
तो बन जाती लकीरें आड़ी-तिरछी

शाम को घर लौटते हुये
ढूँढ़ने की कोशिश करते 
उन लकीरों में अपना भविष्य

कुछ की लकीरें तो
रात भर में ही गायब हो जातीं 
कुछ की लकीरें
दे जातीं जिंदगी का एक अर्थ 
जो कि उस लकीर की कडि़याँ बना
रचते जिंदगी का एक फलसफाँ।

( यह चित्र जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर-आजमगढ़ में कक्षा 6 में पढाई के दौरान का है।  इसमें हम भी हैं, कोशिश करिये, शायद पहचान पाएँ) 

सोमवार, 18 अगस्त 2014

राधा का प्रेम, मुरली की मिठास


राधा का प्रेम, मुरली की मिठास.
माखन का स्वाद, गोपियों का रास.
इनसे मिलकर बनता है, जन्माष्टमी का दिन खास.

कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाइयाँ।

हमारा तो जन्म ही कृष्ण जन्माष्टमी के दिन हुआ था, अत: हमारे लिए तो यह दिन बेहद खास है।



-कृष्ण ही कृष्ण-
( वाट्सएप पर प्राप्त श्रीकृष्ण-काव्य भी आप सभी के साथ साभार शेयर कर रहा हूँ )

कृष्ण उठत कृष्ण चलत कृष्ण शाम भोर है, 
कृष्ण बुद्धि कृष्ण चित्त कृष्ण मन विभोर है।

कृष्ण रात्रि कृष्ण दिवस कृष्ण स्वप्न शयन है, 
कृष्ण काल कृष्ण कला कृष्ण मास अयन है।

कृष्ण शब्द कृष्ण अर्थ कृष्ण ही परमार्थ है, 
कृष्ण कर्म कृष्ण भाग्य कृष्णहि पुरुषार्थ है।

कृष्ण स्नेह कृष्ण राग कृष्णहि अनुराग है, 
कृष्ण कली कृष्ण कुसुम कृष्ण ही पराग है।

कृष्ण भोग कृष्ण त्याग कृष्ण तत्व ज्ञान है, 
कृष्ण भक्ति कृष्ण प्रेम कृष्णहि विज्ञान है।

कृष्ण स्वर्ग कृष्ण मोक्ष कृष्ण परम साध्य है,
कृष्ण जीव कृष्ण ब्रह्म कृष्णहि आराध्य है।

!!......जय श्री कृष्ण....!!

(चित्र में : बेटियों अक्षिता और अपूर्वा के साथ केक काटते कृष्ण कुमार यादव।  साथ में पिताश्री। )

रविवार, 10 अगस्त 2014

जीवन निरंतर चलने का नाम है ....


जन्मदिन सिर्फ सेलिब्रेशन तक नहीं होता।  जन्मदिन के बहाने पिछले एक साल के पन्ने पलटकर देखना भी होता है कि क्या कमियाँ रहीं, क्या उपलब्धियाँ रहीं।  क्या खोया, क्या पाया। इसके साथ ही अगले सालों के लिए दृढ निश्चय होकर फिर आगे बढ़ जाने का नाम भी है जन्मदिन। क्योंकि जीवन निरंतर चलने का नाम है और यह चलना सिर्फ पाँवों पर नहीं होता, बल्कि इसमें बहुत कुछ जुड़ता जाता है !! 
               (चित्र में : हमारे जीवन की पहली फोटो, जो कि बचपन में ली गई थी)





10 अगस्त को हमारा जन्मदिन है और रक्षाबंधन भी। इस शुभ दिन पर हमने खूब सारे पौधे लगाए। जब ये पौधे बड़े होकर लहलहाएंगे, उन पर फूल खिलेंगे, फल उगेंगे तो चिड़ियों की चहचहाहट के बीच प्रकृति भी हमें दिल से आशीष देगी !! 



शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव हुए पदोन्नत

इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव को भारत सरकार ने सेलेक्शन ग्रेड में पदोन्नत किया है। भारतीय डाक सेवा के 2001 बैच के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव वर्तमान में जूनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड में थे और अब उन्हें भारत सरकार ने पे बैंड-4 में नान फंक्शनल सेलेक्शन ग्रेड (वेतनमान-रू 37,400-67,000, ग्रेड पे-8700) में पदोन्नत किया है।  कृष्ण कुमार यादव सहित उनके बैच के सभी 9 अधिकारियों को यह पदोन्नति 1 जनवरी 2014 से दी गयी है। 

कृष्ण कुमार यादव भारतीय डाक सेवा के लोकप्रिय अधिकारियों में गिने जाते हैं। उन्होंने भारतीय डाक सेवाओं को आम जन में और ज्यादा उपयोगी बनाने के लिए सतत् प्रयास किए हैं। उनका विभिन्न विषयों पर साहित्य लेखन बहुत सशक्त है, जिसके लिए उनको कई प्रतिष्ठित सम्मान भी मिले हैं। उन्होंने अपने मूल कार्य क्षेत्र में भी हिंदी के उपयोग और विकास में बेहतर योगदान दिया है। कृष्ण कुमार यादव के पिताश्री श्रीराम शिवमूर्ति यादव भी हिंदी साहित्य के क्षेत्र में एक नाम हैं।  इनकी पत्नी श्रीमती आकांक्षा यादव जहाँ  हिंदी साहित्य, लेखन और ब्लागिंग में बखूबी सक्रिय हैं, वहीँ  इनकी पुत्री अक्षिता (पाखी) भी एक नवोदित ब्लागर है। कृष्ण कुमार यादव की कार्यप्रणाली में उच्चकोटि की रचनात्मकता और व्यवहार कुशलता देखने को मिलती है।

साभार : स्वतंत्र आवाज़ 




Director Postal Services of Allahabad Region Mr. Krishna Kumar Yadav, has been promoted by the Government of India in the Non-functional Selection Grade (NFSG) of the service in the pay band-4, Rs. 37,400-67,000/- with grade pay of  Rs. 8700/-. Mr. Yadav is an officer of Indian Postal Services, 2001 batch and all his 9 batchmates have been awarded this promotion w.e.f. 1st January, 2014.