''शब्द-सृजन की ओर'' पर 100 पोस्ट का सफ़र पूरा हो चुका है और यह 101वीं पोस्ट है. आप सभी ने समय-समय पर अपनी टिप्पणियों व सुझावों से प्रोत्साहित किया और राह दिखाई. यह आप सभी का स्नेह ही है, जो मुझे प्रशासनिक व्यस्तताओं के बीच भी ब्लॉग पर लिखने को तत्पर करता है. आने वाली पोस्टों में भी आप सभी का स्नेह यूँ ही बना रहेगा, ऐसा विश्वास है...धन्यवाद !!इस ब्लॉग पर आप रूबरू होंगे कृष्ण कुमार यादव की साहित्यिक रचनात्मकता और अन्य तमाम गतिविधियों से...
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गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010
ब्लागिंग का सफरनामा : 100 पोस्ट का सफ़र
''शब्द-सृजन की ओर'' पर 100 पोस्ट का सफ़र पूरा हो चुका है और यह 101वीं पोस्ट है. आप सभी ने समय-समय पर अपनी टिप्पणियों व सुझावों से प्रोत्साहित किया और राह दिखाई. यह आप सभी का स्नेह ही है, जो मुझे प्रशासनिक व्यस्तताओं के बीच भी ब्लॉग पर लिखने को तत्पर करता है. आने वाली पोस्टों में भी आप सभी का स्नेह यूँ ही बना रहेगा, ऐसा विश्वास है...धन्यवाद !!रविवार, 14 फ़रवरी 2010
प्रेम (वेलेंटाइन दिवस पर विशेष)
प्रेम एक भावना है
समर्पण है, त्याग है
प्रेम एक संयोग है
तो वियोग भी है
किसने जाना प्रेम का मर्म
दूषित कर दिया लोगों ने
प्रेम की पवित्र भावना को
कभी उसे वासना से जोड़ा
तो कभी सिर्फ उसे पाने से
भूल गये वे कि प्यार सिर्फ
पाना ही नहीं खोना भी है
कृष्ण तो भगवान थे
पर वे भी न पा सके राधा को
फिर भी हम पूजते हैं उन्हें
पतंगा बार-बार जलता है
दीये के पास जाकर
फिर भी वो जाता है
क्योंकि प्यार
मर-मिटना भी सिखाता !!
समर्पण है, त्याग है
प्रेम एक संयोग है
तो वियोग भी है
किसने जाना प्रेम का मर्म
दूषित कर दिया लोगों ने
प्रेम की पवित्र भावना को
कभी उसे वासना से जोड़ा
तो कभी सिर्फ उसे पाने से
भूल गये वे कि प्यार सिर्फ
पाना ही नहीं खोना भी है
कृष्ण तो भगवान थे
पर वे भी न पा सके राधा को
फिर भी हम पूजते हैं उन्हें
पतंगा बार-बार जलता है
दीये के पास जाकर
फिर भी वो जाता है
क्योंकि प्यार
मर-मिटना भी सिखाता !!
सोमवार, 1 फ़रवरी 2010
खिड़कियाँ
खोल देता हूँ खिड़कियों को
बाहर धूप खिल रही है
चारों तरफ हरी मखमल-सी घास
उन पर मोती जैसी ओस की बूँदें
चिड़ियों का कलरव शुरू हो गया
शरीर पर एक शाल डाल
बाहर चला आता हूँ
कुछ दूर तक टहलता हूँ
कितने दिनों बाद
इस सुबह को जी रहा हूँ
कितने एकाकी हो गये हैं हम
बस अपने ही कामों में लगे रहते हैं
शायद इसी तरह किसी दिन
मन की खिड़कियों को भी खोल सकूँ
और फिर देख सकूँ
कि बाहर कितनी धूप है !!
बाहर धूप खिल रही है
चारों तरफ हरी मखमल-सी घास
उन पर मोती जैसी ओस की बूँदें
चिड़ियों का कलरव शुरू हो गया
शरीर पर एक शाल डाल
बाहर चला आता हूँ
कुछ दूर तक टहलता हूँ
कितने दिनों बाद
इस सुबह को जी रहा हूँ
कितने एकाकी हो गये हैं हम
बस अपने ही कामों में लगे रहते हैं
शायद इसी तरह किसी दिन
मन की खिड़कियों को भी खोल सकूँ
और फिर देख सकूँ
कि बाहर कितनी धूप है !!
शुक्रवार, 29 जनवरी 2010
संवेदना की विदाई
मंगलवार, 26 जनवरी 2010
शुक्रवार, 22 जनवरी 2010
पोर्टब्लेयर से पहली पोस्ट..
प्रिय मित्रों,
अब समय है आपसे खुशखबरी शेयर करने का। प्रोन्नति पश्चात् मैंने आज 22 जनवरी, 2010 को अंडमान-निकोबार दीप समूह के निदेशक(डाक) का पदभार संभाल लिया है।
वाकई यह एक खूबसूरत जगह है, जहाँ आप प्रकृति के सान्निध्य का पूरा लाभ उठा सकते हैं। समुद्र की लहरें यहाँ जब
अठखेलियाँ करती हैं तो वो दृश्य देखते ही बनता है। प्रशासन के साथ-साथ हिंदी साहित्य में अभिरुचि रखने के कारण यहाँ मैं अपने साहित्य को भी समृद्ध कर सकूँगा।
पिछले साढ़े चार सालों से मैं कानपुर में विभिन्न पदों पर रहा, और यह एक उचित समय है जब मैं एकाकार जीवन की बजाय अंडमान-निकोबार की विविधता का सपरिवार आनंद उठाऊँ। इससे पूर्व सूरत, लखनऊ और कानपुर में मैंने विभिन्न पदों पर कार्य किया है, पर मुख्य-भूमि से दूर कार्य का यह पहला अनुभव है।
कोशिश करूँगा कि ब्लॉग के माध्यम से यहाँ के अनुभवों को आप सभी के साथ शेयर कर सकूँ. कभी पोर्टब्लेयर आयें तो अवश्य मिलें, ख़ुशी होगी !!
गुरुवार, 21 जनवरी 2010
अगर आप डाकिया होते
कानपुर में साहित्यकारों-बुद्धिजीवियों द्वारा 17 जनवरी, 2010 (रविवार) को आयोजित विदाई-समारोह के दौरान दैनिक जागरण अख़बार में "भाई साहब" स्तम्भ में कार्टून बनाने वाले अंकुश जी ने मेरा एक कार्टून बनाया और कार्यक्रम के दौरान भेंट किया. इसे आप भी देखें और आनंद उठायें. अंकुश जी का आभारी हूँ कि उन्होंने मेरा सुन्दर चित्र बनाकर भेंट किया !!
लेबल:
डाकिया डाक लाया,
संस्मरण,
सम्मान-उपलब्धि
मंगलवार, 19 जनवरी 2010
कानपुर से अंडमान के सफ़र की तैयारी
जब भी आप किसी जगह से स्थानांतरित/प्रोन्नति होते हैं, तो हमसफ़र साथी भी बड़े जोश के साथ विदाई देते हैं।
कुछ को गम होता है तो कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो खुश होते हैं कि चलो इससे छुट्टी मिली। यह मानवीय प्रवृत्ति का परिचायक है। सुख-दुःख, राग-द्वेष जीवन के अभिन्न अंग हैं।
व्यक्ति एक सफ़र पूरा कर नए के लिए तैयार होता है और साथ में ले जाता है खट्टी-मीठी यादें। वक़्त के साथ नए परिवेश में ढलकर कुछ दिनों तक वहां का हो जाता है, फिर अगले पड़ाव की तैयारी करने लगता है। सरकारी नौकरी का यह तो अभिन्न भाग है।
फ़िलहाल कानपुर में मेरे अधिकारी साथियों ने मुझे जो प्यार-स्नेह दिया, उसे विस्मृत नहीं कर सकता।
(यहाँ पर कार्यालय में आयोजित विदाई-समारोह (18 जनवरी, 2010) के कुछ दृश्य आप देख सकते हैं।)
सोमवार, 18 जनवरी 2010
कानपुर से भावभीनी विदाई !!
रविवार, 17 जनवरी 2010
अलविदा कानपुर !!
चर्चित कथाकार पद्मश्री गिरिराज किशोर जी का सान्निध्य मिला तो मानस संगम के संयोजक पंडित बद्री नारायण तिवारी जी से अपार स्नेह मिला. बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबंधु जी ने बाल-कविताओं की ओर उन्मुख किया तो मानवती आर्या जी ने भी काफी प्रोत्साहित किया. आचार्य सेवक वात्सयायन, सत्यकाम पाहरिया, दुर्गाचरण मिश्र, कमलेश द्विवेदी, आजाद कानपुरी, शतदल, श्याम सुन्दर निगम, शिवबाबू मिश्र, भालचंद्र सेठिया, सूर्य प्रसाद शुक्ल, हरीतिमा कुमार, प्रभा दीक्षित, दया दीक्षित, प्रमोद तिवारी, अनुराग, देवेन्द्र सफल, शिवशरण त्रिपाठी, विपिन गुप्ता, दयानंद सिंह 'अटल' ,विद्या भास्कर वाजपेयी, मो० गाजी, फिरोज अहमद, सतीश गुप्ता ....जैसे तमाम साहित्यजीवियों से समय-समय पर संबल मिलता रहा. उत्कर्ष अकादमी के निदेशक प्रदीप दीक्षित, देह्दानी दधीची अभियान के संयोजक मनोज सेंगर, सामर्थ्य की संयोजिका गीता सिंह, युवा क्रिकेटर विकास यादव, कवयित्री गीता सिंहचौहान, राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त प्राचार्या गीता मिश्र , पूर्व बार अध्यक्ष एस. पी. सिंह, पवन तिवारी, श्री राम तिवारी, PIB के एम. एस. यादव, PTI के ज़फर,दलित साहित्यकार के. नाथ ....इन तमाम लोगों से थोडा बाद में परिचय बना, पर प्रगाढ़ता में कोई कमी न रही।
यहीं रहकर ही कादम्बिनी पत्रिका के लिए मैंने आजाद हिंद फ़ौज की कमांडर व राष्ट्रपति का चुनाव लड़ चुकीं पद्मविभूषण कप्तान लक्ष्मी सहगल का साक्षात्कार भी लिया. विख्यात हिंदी उद्घोषक जसदे
व सिंह से एक कार्यक्रम में हुई मुलाकात व चर्चा अभी भी मेरे मानस पटल पर अंकित है. कानपुर में ही मेरी प्यारी बिटिया अक्षिता का जन्म हुआ, भला कैसे भूलूँगा. पत्नी आकांक्षा की नौकरी भी कानपुर से ही जुडी हुई है. अपने गुरु श्री इन्द्रपाल सिंह सेंगर जी से कानपुर में पुन: मुलाकात हुई. वो बिठूर की धरोहरें, ठग्गू के लड्डू, मोतीझील का सफ़र, रेव थ्री....भला कौन भुला पायेगा. ऐसी ही न जाने कितनी यादें कानपुर से जुडी हुई हैं.....पर हर सफ़र का इक अंत होता है, सो मैं भी अपने नए सफ़र के लिए तैयार हो रहा हूँ....अलविदा कानपुर !!
यहीं रहकर ही कादम्बिनी पत्रिका के लिए मैंने आजाद हिंद फ़ौज की कमांडर व राष्ट्रपति का चुनाव लड़ चुकीं पद्मविभूषण कप्तान लक्ष्मी सहगल का साक्षात्कार भी लिया. विख्यात हिंदी उद्घोषक जसदे
सोमवार, 11 जनवरी 2010
आदिमानव भी करते थे मेकअप
आधुनिक समय में मेकअप पर लोग काफी ध्यान देते हैं। माना जाता है कि मेकअप से खूबसूरती को और भी निखार मिलता है, पर आपको जानकर आश्चर्य होगा कि आज से करीब 50 हजार साल पहले भी लोग मेकअप करते थे। ब्रिटेन की ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जुओ जिल्हाओ के नेतृतव में हुई इस नई खोज से जुड़े वैज्ञानिकों का दावा है कि उन्हें इस बात के प्रमाण मिल चुके हैं कि हजारों साल पहले के निएंडरथल मानव अपने शरीर को पेंट से सजाते थे। नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस में प्रस्तुत इस टीम रिपोर्ट में बताया गया है कि निएंडरथल मानव के मेकअप डिब्बों के अवशेषों से इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि वे समुद्र में सीपियों से मेकअप करने का रंग निकालते थे। टीम का यह भी मानना है कि इस खोज के बाद यह पक्ष भी निराधार हो जाता है कि निएंथरडल मानव कम अक्ल के होते थे। यही नहीं इस टीम के सदस्यों ने कुछ समुद्री घोघों के कवच से मिले रंगों और उसके कणों की भी जाँच की है।प्रोफेसर जिल्हाओ का कहना है कि हालांकि अफ्रीका के कुछ हिस्सों में इस बात के प्रमाण पहले ही मिल चुके थे कि आदि मानव किस तरह से रंगों का उपयोग अपने शरीर पर करते थे। लेकिन इस तरह का प्रमाण पहली बार मिला है कि निएंथरडल मानव इसे अपने मेकअप में बखूबी उपयोग करते थे। वस्तुत: यह सिर्फ बॉडी पेंटिंग नहीं है बल्कि उससे आगे की चीज है। इस शोध से कई धारणाएं भी बदली हैं. वैज्ञानिकों को इस शोध के दौरान पीले और लाल रंग के अवशेष भी मिले हैं। इसको निएंथरडल आदि मानव मेकअप से पहले लगाए जाने वाले फाउंडेशन के रूप में प्रयोग करते थे। इस टीम का ये भी मत है कि संभवत: इस तरह के सीपों और घोघों का प्रयोग ज्वैलरीज के लिए भी होता था। ....तो इस शोध के बाद अब यह नहीं माना जाना चाहिए कि मेकअप और डेकोरेशन का उपयोग आधुनिक युग की देन है.
बुधवार, 6 जनवरी 2010
चिट्ठियाँ हों इन्द्रधनुषी
जयकृष्ण राय तुषार जी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत के पेशे के साथ-साथ गीत-ग़ज़ल लिखने में भी सिद्धहस्त हैं. इनकी रचनाएँ देश की तमाम चर्चित पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाती रहती हैं. मूलत: ग्रामीण परिवेश से ताल्लुक रखने वाले तुषार जी एक अच्छे एडवोकेट व साहित्यकार के साथ-साथ सहृदय व्यक्ति भी हैं. सीधे-सपाट शब्दों में अपनी भावनाओं को व्यक्त करने वाले वाले तुषार जी ने पिछले दिनों डाकिया पर लिखा एक गीत मुझे समर्पित करते हुए भेंट किया. इस खूबसूरत गीत को आपने ब्लॉग के माध्यम से आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूँ-
फोन पर
बातें न करनाफोन पर
चिट्ठियाँ लिखना।
हो गया
मुश्किल शहर में
डाकिया दिखना।
चिट्ठियों में
लिखे अक्षर
मुश्किलों में काम आते हैं,
हम कभी रखते
किताबों में इन्हें
कभी सीने से लगाते हैं,
चिट्ठियाँ होतीं
सुनहरे
वक्त का सपना।
इन चिट्ठियों
से भी महकते
फूल झरते हैं,
शब्द
होठों की तरह ही
बात करते हैं
यह हाल सबका
पूछतीं
हो गैर या अपना।
चिट्ठियाँ जब
फेंकता है डाकिया
चूड़ियों सी खनखनाती हैं,
तोड़ती हैं
कठिन सूनापन
स्वप्न आँखों में सजाती हैं,
याद करके
इन्हें रोना या
कभी हँसना।
वक्त पर
ये चिट्ठियाँ
हर रंग के चश्में लगाती हैं,
दिल मिले
तो ये समन्दर
सरहदों के पार जाती हैं,
चिट्ठियाँ हों
इन्द्रधनुषी
रंग भर इतना।
-जयकृष्ण राय तुषार,63 जी/7, बेली कालोनी, स्टेनली रोड, इलाहाबाद, मो0- 9415898913
शुक्रवार, 1 जनवरी 2010
नव वर्ष तुम्हारा स्वागत है
भारतीय संस्कृति में उत्सवों और त्यौहारों का आदि काल से ही महत्व रहा है। हर संस्कार को एक उत्सव का रूप देकर उसकी सामाजिक स्वीकार्यता को स्थापित करना भारतीय लोक संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता रही है। सामान्यतः त्यौहारों का सम्बन्ध किसी न किसी मिथक, धार्मिक मान्यताओं, परम्पराओं और ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा होता है। प्रसिद्ध दार्शनिक लाओत्से के अनुसार- ‘‘इसकी फिक्र मत करो कि रीति-रिवाज का क्या अर्थ है? रीति-रिवाज मजा देता है, बस काफी है। जिन्दगी को सरल और नैसर्गिक रहने दो, उस पर बड़ी व्याख्यायें मत थोपो।’’
दुनिया के भिन्न-भिन्न भागों में जनवरी माह का प्रथम दिवस नववर्ष के शुभारम्भ के रूप में मनाया जाता है। भारत में भी नववर्ष का शुभारम्भ वर्षा का संदेशा देते मेघ, सूर्य और चंद्र की चाल, पौराणिक गाथाओं और इन सबसे ऊपर खेतों में लहलहाती फसलों के पकने के आधार पर किया जाता है। इसे बदलते मौसमों का रंगमंच कहें या परम्पराओं का इन्द्रधनुष या फिर भाषाओं और परिधानों की रंग-बिरंगी माला, भारतीय संस्कृति ने दुनिया भर की विविधताओं को संजो रखा है। असम में नववर्ष बीहू के रूप में मनाया जाता है, केरल में पूरम विशु के रूप में, तमिलनाडु में पुत्थंाडु के रूप में, आन्ध्र प्रदेश में उगादी के रूप में, महाराष्ट्र में गुड़ीपड़वा के रूप में तो बांग्ला नववर्ष का शुभारंभ वैशाख की प्रथम तिथि से होता है। भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ लगभग सभी जगह नववर्ष मार्च या अप्रैल माह अर्थात चैत्र या बैसाख के महीनों में मनाये जाते हैं। वस्तुतः वर्षा ऋतु की समाप्ति पर जब मेघमालाओं की विदाई होती है और तालाब व नदियाँ जल से लबालब भर उठते हैं तब ग्रामीणों और किसानों में उम्मीद और उल्लास तरंगित हो उठता है। फिर सारा देश उत्सवों की फुलवारी पर नववर्ष की बाट देखता है।
मानव इतिहास की सबसे पुरानी पर्व परम्पराओं में से एक नववर्ष है। नववर्ष के आरम्भ का स्वागत करने की मानव प्रवृत्ति उस आनन्द की अनुभूति से जुड़ी हुई है जो बारिश की पहली फुहार के स्पर्श पर, प्रथम पल्लव के जन्म पर, नव प्रभात के स्वागतार्थ पक्षी के प्रथम गान पर या फिर हिम शैल से जन्मी नन्हीं जलधारा की संगीत तरंगों से प्रस्फुटित होती है। विभिन्न विश्व संस्कृतियाँ इसे अपनी-अपनी कैलेण्डर प्रणाली के अनुसार मनाती हैं। वस्तुतः मानवीय सभ्यता के आरम्भ से ही मनुष्य ऐसे क्षणों की खोज करता रहा है, जहाँ वह सभी दुख, कष्ट व जीवन के तनाव को भूल सके। इसी के तद्नुरूप क्षितिज पर उत्सवों और त्यौहारों की बहुरंगी झांकियाँ चलती रहती हैं।
इतिहास के गर्त में झांकें तो प्राचीन बेबिलोनियन लोग अनुमानतः 4000 वर्ष पूर्व से ही नववर्ष मनाते रहे हैं। यह एक रोचक तथ्य है कि प्राचीन रोमन कैलेण्डर में मात्र 10 माह होते थे और वर्ष का शुभारम्भ 1 मार्च से होता था। बहुत समय बाद 713 ई0पू0 के करीब इसमें जनवरी तथा फरवरी माह जोड़े गये। सर्वप्रथम 153 ई0पू0 में 1 जनवरी को वर्ष का शुभारम्भ माना गया एवं 45 ई0पू0 में जब जूलियन कैलेण्डर का शुभारम्भ हुआ, तो यह सिलसिला बरकरार रहा। 1 जनवरी को नववर्ष मनाने का चलन 1582 ई0 के ग्रेगोरियन कैलेंडर के आरम्भ के बाद ही बहुतायत में हुआ।दुनिया भर में प्रचलित ग्रेगोरियन कैलेंडर को पोप ग्रेगरी अष्टम ने 1582 में तैयार किया था। ग्रेगोरी ने इसमें लीप ईयर का प्रावधान भी किया था। इसाईयों का एक अन्य पंथ ईस्टर्न आर्थोडाॅक्स चर्च रोमन कैलेंडर को मानता है। इस कैलेंडर के अनुसार नया साल 14 जनवरी को मनाया जाता है। यही वजह है कि आर्थोडाक्स चर्च को मानने वाले देशों रूस, जार्जिया, यरूशलम और सर्बिया में नया साल 14 जनवरी को मनाया जाता है। इस्लाम के कैलेंडर को हिजरी साल कहते हैं। इसका नववर्ष मोहर्रम माह के पहले दिन होता है। हिजरी कैलेंडर के बारे में दिलचस्प बात यह है कि इसमें दिनों का संयोजन चंद्रमा की चाल के अनुसार नहीं होता। लिहाजा इसके महीने हर साल करीब 10 दिन पीछे खिसक जाते हैं। चीन का भी कैलेंडर चंद्र गणना पर आधारित है, इसके मुताबिक चीनियों का नया साल 21 जनवरी से 21 फरवरी के मध्य पड़ता है।
भारत में फिलहाल विक्रम संवत, शक संवत, बौद्ध और जैन संवत, तेलगु संवत प्रचलित हंै। इनमें हर एक का अपना नया साल होता है। देश में सर्वाधिक प्रचलित विक्रम और शक संवत है। विक्रम संवत को सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को पराजित करने की खुशी में 57 ईसा पूर्व शुरू किया था। विक्रम संवत चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है। इस दिन गुड़ी पड़वा और उगादी के रूप में भारत के विभिन्न हिस्सों में नववर्ष मनाया जाता है।
नववर्ष आज पूरे विश्व में एक समृद्धशाली पर्व का रूप अख्तियार कर चुका है। इस पर्व पर पूजा-अर्चना के अलावा उल्लास और उमंग से भरकर परिजनों व मित्रों से मुलाकात कर उन्हें बधाई देने की परम्परा दुनिया भर में है। अब हर मौके पर ग्रीटिंग कार्ड भेजने का चलन एक स्वस्थ परंपरा बन गयी है पर पहला ग्रीटिंग कार्ड भेजा था 1843 में हेनरी कोल ने। हेनरी कोल द्वारा उस समय भेजे गये 10,000 कार्ड में से अब महज 20 ही बचे हैं। आज तमाम संस्थायंे इस अवसर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित करती हैं और लोग दुगुने जोश के साथ नववर्ष में प्रवेश करते हैं। पर इस उल्लास के बीच ही यही समय होता है जब हम जीवन में कुछ अच्छा करने का संकल्प लें, सामाजिक बुराईयों को दूर करने हेतु दृढ़ संकल्प लें और मानवता की राह में कुछ अच्छे कदम और बढ़ायें।
रविवार, 27 दिसंबर 2009
घर-आफिस की चिंता अब रोबोट के जिम्मे
अभी तक हम रोबोट के किस्से सुना करते था, पर अब भारत में भी रोबोट अपने जलवे दिखने को तैयार है. यदि आप अपनी जिंदगी में बेहद व्यस्त आदमी हैं तोअब घर और ऑफिस की चिंता करने की जरूरत नहीं। सुरक्षा का जिम्मा संभालने के लिए रोबोट है न। स्पर्श और ध्वनि सेंसर युक्त रोबोट 'स्कार्पियो' दुश्मन की आहट पाते ही हमला करता है। यही नहीं, आम इंसान की तरह दौड़-दौड़कर काम निपटाने वाला हिमोनाइड भी तैयार है।
सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि यह रोबोट किसी वैज्ञानिक ने नहीं बल्कि डीबीएस कालेज, कानपुर की इलेक्ट्रानिक्स की बीएससी की छात्रा श्रुति अवस्थी और निधि अवस्थी ने तैयार किये हैं। वस्तुत: 'स्कार्पियो' माइक्रोप्रोसेसर वाला कंप्यूटर आधारित रोबोट है। तीन बैटरी वाले स्कार्पियो में टच व साउंड सेंसर लगे हैं। 25 सेंटीमीटर की रेंज वाले तैयार रोबोट की क्षमता कितनी भी बढ़ायी जा सकती है। यह रोबोट संपर्क में आते ही दो कदम पीछे हटकर हमला करता है। इसी प्रकार दो बैटरियों वाले दूसरे रोबोट हिमोनाइड में टच, साउंड सेंसर के साथ ही इंफ्रारेड सेंसर लगे हैं, जो इशारे पर काम करता है। यह विकलांगों के लिए सबसे ज्यादा मददगार है। दवा, पानी, सामान लाने जैसे काम इससे कराये जा सकते हैं।
रविवार, 20 दिसंबर 2009
दक्षिण कोरिया में एन-सियोल टॉवर से दृश्यावलोकन
N Seoul Tower, it is the best observatory space of Seoul, where your can appreciate all the panoramic scenery of Seoul with cutting edge media display with various culture. “N Seoul tower” a center of Seoul, a symbol of Seoul, and the highest place where you can see all the most beautiful scenery of Seoul was established as a Korea’s first total electric wave tower to sent TV and radio broadcasts in Seoul metropolitan area in 1969. N Seoul tower became a resting place of Seoul citizens and a sightseeing site for foreigners after it’s opening to the public in 1980.
शनिवार, 19 दिसंबर 2009
दक्षिण कोरिया में जियांगबाक पैलेस - सियोल की यात्रा
कोरिया प्रवास के दौरान 20 नवम्बर को हम लोग सियोल स्थित जियांगबाक पैलेस गए. इतिहास के गलियारों में जाकर किसी देश की सभ्यता-संस्कृति को समझना हो तो वहां के राजमहलों, किलों की सैर कीजिये. आपने प्रशिक्षण-काल में मैं जहाँ भी गया, वहाँ यही किया. राजस्थान और मध्यप्रदेश के अधिकतर जगहों की खाक छान मरी. ऐसे में एक लम्बे समय बाद किसी पैलेस को देखना सुखदायी था. जियांगबाक पैलेस न सिर्फ खूबसूरत है, बल्कि स्थापत्य कला का भी सुंदर दृश्य संजोता है.
रविवार, 13 दिसंबर 2009
जहाँ सफल पुत्रों के पिता को मिलता है सम्मान
यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि तमाम गतिविधियों से परे हर वर्ष एकेडमिक रिसर्च सोसाइटी एक ऐसे पिता को सम्मानित करती है, जिसका पुत्र के विकास में विशेष योगदान हो और उनके पुत्र का राष्ट्रीय / अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष योगदान हो. सोसाइटी का मानना है कि " जो पिता अपने पुत्र को राष्ट्र चिंतन में संलग्न करता है, वो पिता संसार का सबसे सफल व्यक्ति होता है." वर्ष 2007 में यह सम्मान शहीद मेजर सलमान के पिता श्री मुश्ताक अहमद खान, 2008 में उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मलेन के पूर्व अध्यक्ष और मानस संगम, कानपुर के संयोजक डा० बद्री नारायण तिवारी जी के पिता स्वर्गीय पंडित शेष नारायण तिवारी को प्रदान किया गया. वर्ष 2009 का सम्मान स्वर्गीय शिवनारायण कटियार जी को प्रदान किया गया, जिनके सुपुत्र डा० सर्वज्ञ सिंह कटियार जाने-माने वैज्ञानिक और शिक्षाविद हैं. कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति रहे डा० कटियार को पद्मश्री और पद्मविभूषण सम्मान प्राप्त हैं. वाकई इस तरह के कार्यक्रम समाज को न सिर्फ प्रेरणा देते हैं, बल्कि नई राह भी दिखाते हैं !!
शनिवार, 12 दिसंबर 2009
द. कोरिया में डाक सेवाएँ
कोरिया में 19 नवम्बर, 2009 को KEOTI से हम लोग राजधानी सियोल पहुंचे. वाकई यह एक भव्य, खूबसूरत और समृद्ध शहर है. यहाँ स्थित सियोल सेंट्रल पोस्ट ऑफिस को देखा तो दंग रह गया. पोस्ट टॉवर नाम से मशहूर इस पोस्ट ऑफिस में 7 बेसमेंट लेवल और 21 फ्लोर हैं. सभी सुविधाएँ पोस्ट टॉवर के अन्दर मौजूद हैं. 1884 में बना ये पोस्ट ऑफिस वर्तमान रूप में वर्ष 2007 में आया. डाकघरों का मॉडर्न लुक देखने का यह एक उम्दा नमूना था. अपने भारत में प्रोजेक्ट एरो के तहत डाकघरों में आमूल-चूल परिवर्तन और उनकी ब्रांडिंग की जा रही है, पर कोरिया इस मामले में हमसे काफी विकसित है.
लेबल:
डाकिया डाक लाया,
द. कोरिया यात्रा,
संस्मरण
द. कोरिया यात्रा से जुड़ी यादें
भारत सरकार द्वारा प्रायोजित Executive Development Program for India Post Managers के तहत भारतीय डाक सेवा के वर्ष 2001 और 2002 बैच के अधिकारियों को एक सप्ताह के प्रशिक्षण के लिए 15-21 नवम्बर, 2009 तक दक्षिण कोरिया भेजा गया. वहाँ पर Knowledge Economy Officials Training Institute (KEOTI) ने इस कार्यक्रम की मेजबानी की. हम लोग 15 नवम्बर की शाम KEOTI पहुंचे. जीरो से नीचे तापमान ....अगले दिन सुबह नींद खुली तो चारों तरफ बर्फ ही बर्फ थी। एक लम्बे समय बाद बर्फ देखना बड़ा सुकूनदायी लगा। कभी मसूरी में ट्रेनिंग के दौरान बर्फ गिरना देखा था और अब....!!
KEOTI के बाहर मित्रों के साथ। पार्श्व में KEOTI भवन दिख रहा है.
हाजिर हूँ जनाब !!
रविवार, 6 दिसंबर 2009
समाज के दमनात्मक संकेतों के विरुद्ध विद्रोह के प्रतीकः डाॅ0 अम्बेडकर (पुण्य-तिथि पर विशेष)
- बाल्यावस्था में कोई भी नाई आपके बाल काटने को तैयार नहीं था सो आप सहित सभी भाईयों का बाल माता जी ही काटा करती थीं।- बाल्यावस्था में आप जब पूर्व भुगतान करके अपने अग्रज के साथ बैलगाड़ी में बैठकर गोरेगाँव रेलवे स्टेशन जा रहे थे तो रास्ते में बातचीत द्वारा गाड़ीवान को आपकी अछूत जाति का पता चला तो वह अपवित्र होने के भय से गाड़ी से उतर गया और आपके अग्रज बैलगाड़ी चलाकर स्टेशन तक ले गए तथा गाड़ीवान पीछे-पीछे पैदल चलता रहा।
- हाईस्कूल में आपको द्वितीय भाषा के रूप में संस्कृत नहीं वरन् फारसी पढ़नी पड़ी, क्योंकि अछूत बच्चों को संस्कृत की शिक्षा देना पाप समझा जाता था।- अध्ययन-काल के दौरान जब शिक्षक के कहने पर आप ब्लैकबोर्ड पर लिखने के लिए बढ़े तो आपकी कक्षा के सभी बच्चे दौड़कर ब्लैकबोर्ड के पीछे रखे अपने टिफिन को लेकर बाहर भाग गए कि कहीं उनका भोजन अपवित्र न हो जाय।
- अध्ययन काल के दौरान प्यास लगने पर आपको नल छूने की मनाही थी। प्यास लगने पर आप अध्यापक से कहते और उनके आदेश पर चपरासी नल खोलता और तब कहीं आपको पानी पीने को मिलता।
- बड़ौदा राज्य में सेवा-काल के दौरान चपरासी आपके हाथ में पत्रावलियाँ और फाईल सीधे न देकर फेंक जाता था।
- महाराष्ट्र सरकार द्वारा दलितों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक दशा का अध्ययन करने हेतु गठित समिति के सदस्य रूप में दौरे के दौरान एक प्राथमिक पाठशाला के हेडमास्टर ने आपको परिसर में घुसने तक नहीं दिया और एक जगह तो तांगा चालक ने आपको तांगे पर बिठाने से इनकार कर दिया।
आधुनिक भारत के निर्माताओं में डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है पर स्वयं डाॅ0 अम्बेडकर को इस स्थिति तक पहुँचने के लिये तमाम सामाजिक कुरीतियों और भेदभाव का सामना करना पड़ा। डाॅ0 अम्बेडकर मात्र एक साधारण व्यक्ति नहीं थे वरन् दार्शनिक, चिंतक, विचारक, शिक्षक, सरकारी सेवक, समाज सुधारक, मानवाधिकारवादी, संविधानविद और राजनीतिज्ञ इन सभी रूपों में उन्होंने विभिन्न भूमिकाओं का निर्वाह किया। 14 अप्रैल, 1891 को इन्दौर के निकट महू कस्बे में अछूत जाति माने जाने वाले महार परिवार में जन्मे अम्बेडकर रामजी अम्बेडकर की 14वीं सन्तान थे। यह संयोग ही कहा जाएगा कि जिस वर्ष डाॅ0 अम्बेडकर का जन्म हुआ, उसी वर्ष महात्मा गाँधी वकालत पास कर लंदन से भारत वापस आए। डाॅ0 अम्बेडकर के पिता रामजी अम्बेडकर सैन्य पृष्ठभूमि के थे एवं विचारों से क्रान्तिकारी थे। उनके संघर्षस्वरूप सेना में महारों के प्रवेश पर लगी पाबन्दी को हटाकर सन् 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ‘महार बटालियन’ की स्थापना हुयी। 1891 में सेना से सेवानिवृत्ति पश्चात सन् 1894 में रामजी अम्बेडकर रत्नागिरी जिले में पी0 डब्लू0 डी0 विभाग में स्टोरकीपर के रूप में पुनः सेवा नियुक्त हुए, जहाँ से कालान्तर में उनका स्थानान्तरण सतारा हो गया।
यहीं सतारा के सरकारी स्कूल में अम्बेडकर की प्रारम्भिक शिक्षा सन् 1900 में आरम्भ हुई, जहाँ उनका नाम भीवा रामजी अम्बावाडेकर लिखवाया गया, पर शिक्षक द्वारा उच्चारण की दुरूहता ने अम्बावाडेकर को अम्बेडकर में तब्दील कर दिया। वस्तुतः रत्नागिरी जिले के खेड़ा तालुक में अम्बावाडे़ नामक गाँव में पैतृक स्थल होने के कारण आपके परिवार के नाम के साथ अम्बावाडेकर नाम जुड़ा था। सरकारी स्कूल में प्रवेश करते ही अम्बेडकर को जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा। मसलन अछूत होने के कारण कक्षा में प्रश्न पूछने की मनाही, अछूत बच्चों के सामूहिक रूप से बैठने और खेलने-कूदने पर प्रतिबन्ध, प्यास लगने पर स्वयं नल खोलकर पानी पीने की पाबन्दी इत्यादि। इन सबसे अम्बेडकर का मनोमस्तिष्क काफी आक्रोशित हुआ एवं उनके अन्तर्मन में बचपन से ही इन कुरीतियों का डटकर सामना करने की प्रवृत्ति जगी। 1904 में आपके पिताजी सेवानिवृति पश्चात बम्बई चले आए और अम्बेडकर का प्रवेश एलफिन्स्टन हाईस्कूल में करा दिया एवं अगले वर्ष 1905 में मात्र 14 वर्ष की उम्र में 9 वर्ष की अबोध कन्या रामाबाई के साथ इनका विवाह कर दिया। यद्यपि शहरी माहौल होने के कारण यहाँ पर जाति-पात की भावना उतनी कठोर नहीं थी पर फिर भी इससे पूर्णतया छुटकारा नहीं मिला। उपरोक्त वर्णित ब्लैकबोर्ड वाली घटना यहीं पर घटित हुई थी। पर इससे भी आप विचलित नहीं हुये और 1907 में प्रथम श्रेणी में हाईस्कूल परीक्षा उतीर्ण की। निश्चिततः एक अछूत विद्यार्थी की यह उपलब्धि काफी मायने रखती थी सो सत्यशोधक समाज ने अम्बेडकर को सम्मानित करने का फैसला किया और पुरस्कारस्वरूप बुद्ध के जीवन पर आधारित एक किताब भेंट की। यहीं से अम्बेडकर के मन में बौद्ध धर्म के प्रति खिंचाव पैदा होना आरम्भ हो गया।
अम्बेेडकर की प्रतिभा से प्रभावित होकर बड़ौदा के महाराजा शिवाजी राव ने उन्हें छात्रवृत्ति के रूप में 25 रूपये मासिक देना आरम्भ कर दिया। बी0 ए0 करने के पश्चात अम्बेडकर बड़ौदा राज्य में ही नौकरी करने लगे। इस बीच बड़ौदा के महाराजा द्वारा प्राप्त छात्रवृत्ति की सहायता से उन्होंने 1913 में अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा के लिए प्रवेश ले लिया। अध्ययन के दौरान ही अमेरिका में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे लाला लाजपत राय से भी आपकी मुलाकात हुयी एवम् इन दोनों महानुभावों में अक्सर समाज सुधार आन्दोलनों और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर चर्चा होती। इस बीच वर्ष 1916 में अम्बेडकर ने ‘ब्रिटिश भारत में प्रान्तीय वित्त का विकास’ विषय पर अपनी पी0 एच0 डी0 थीसिस प्रस्तुत की और उसी वर्ष ‘लन्दन स्कूल आॅफ इकानामिक्स’ में शिक्षा ग्रहण करने हेतु वे अमेरिका से लन्दन चले आए। इससे पहले कि वे अर्थशास्त्र में अपना अध्ययन पूरा करते उनकी छात्रवृत्ति समाप्त हो गई और मजबूरन उन्हें फिर से बड़ौदा के महाराज के यहाँ उनके मिलिट््री सेक्रेटरी के रूप में नौकरी शुरू करनी पड़ी। यहाँ भी जातिगत विषमता ने उनका पीछा न छोड़ा और अन्त तक वे एक पारसी होटल में किराये पर टिके रहे। अन्ततः जलालत झेलने की बजाय अपने पद से त्यागपत्र देकर वे पुनः बम्बई चले आए।
जब अम्बेडकर बम्बई आए तो वहाँ समाज सुधार के नाम पर दलित आन्दोलन तीव्रता पकड़ रहा था। 1917 में दलितों के दो सम्मेलन व पुनश्च मार्च 1918 में बडौदा के महाराज शिवाजीराव की अध्यक्षता में बम्बई में ‘अखिल भारतीय दलित सम्मेलन’ का आयोजन हुआ। इन सम्मेलनों में छुआछूत मिटाने और दलितों को उनका हक दिलाने हेतु लम्बे-चैड़े वादे किए गए पर अम्बेडकर को इनका नेतृत्व कर रहे द्विज नेताओं पर भरोसा नहीं था। वे अछूतों के लिये पृथक निर्वाचन के पक्ष में थे। बम्बई प्रवास के दौरान ही आजीविका खातिर आपने 1918 में ‘राजनैतिक अर्थशास्त्र’ के प्रोफेसर रूप में पुनः नौकरी आरम्भ कर दी। प्रतिभावान और मेधावी होने के चलते उनकी कक्षा लोकप्रिय तो अवश्य थी पर द्विज वर्ग के विद्यार्थी उन्हें उचित सम्मान नहीं देते थे एवम् अन्य साथी प्रोफेसर भी छुआछूत की भावना से देखते थे, सो पुनः आपने जलालत झेलने की बजाय त्यागपत्र देना बेहतर समझा। अब अम्बेडकर की अन्तरात्मा जाग चुकी थी पर वे हर अछूत की सोई हुई आत्मा को जगाना चाहते थे। ऐसे में दलित भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिये 1920 में ‘मूक नायक’ पत्रिका का सम्पादन आरम्भ किया। इससे पूर्व 1919 में साइमन कमीशन के सम्मुख आप दलित वर्ग के प्रतिनिधि रूप में भी गए थे जहाँ आपने दलितों के लिये जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधि सभाओं में सीटें आरक्षित करने और पृथक निर्वाचन के पक्ष में जोरदार तर्क दिए। उन्होंने स्पष्टतः कहा कि- ‘‘होमरूल केवल ब्राह्मणों का ही नहीं, महारों का भी जन्मसिद्ध अधिकार है। स्वशासन हो जाने पर भी सवर्णांे की गुलामी से यदि दलितों को मुक्ति नहीं मिली तो ऐसे होमरूल या स्वशासन का कोई अर्थ नहीं। होमरूल से पहले सामाजिक एकता कायम करने की जरूरत है।’’ डाॅ0 अम्बेडकर के तर्कांे को साइमन आयोग ने स्वीकारा और अंततः मुस्लिमों के लिये पृथक निर्वाचन के साथ-साथ दलितों के दो-दो प्रतिनिनिधियों को भी धारा सभाओं और केन्द्रीय सभा में मनोनीत करने की बात स्वीकार कर ली। निश्चिततः डाॅ0 अम्बेडकर की यह प्रथम राजनैतिक विजय थी। इस बीच कोल्हापुर में साहू महाराज की अध्यक्षता में आयोजित दलित सम्मेलन में भी अम्बेडकर ने भागीदारी की पर उनकी राय मेें ज्ञान और शक्ति के बिना दलित और अछूत कोई प्रगति नहीं कर सकते। सितम्बर 1920 में कोल्हापुर के महाराज साहूजी छत्रपति द्वारा प्राप्त आर्थिक सहायता से आपने पुनः लन्दन स्कूल आॅफ इकाॅनामिक्स में प्रवेश ले लिया और साथ-ही-साथ वकालत की पढ़ाई भी करने लगे। इस बीच अम्बेडकर ने विश्व के तीन प्रतिष्ठित अमरीकी, अंग्रेजी विश्वविद्यालयों से डिग्री प्राप्त की और एक साथ ही इतिहास, राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, कानून और संविधान के प्रख्यात विद्वान बन गए। कहा जाता है कि अम्बेडकर को अध्ययन में इतनी गहरी रूचि थी कि 1930 के गोलमेज सम्मेलन के दौरान वे 32 बक्से किताबें खरीदकर भारत आए। याद कीजिए राहुल सांकृत्यायन का तिब्बत से खच्चरों पर लादकर बौद्ध साहित्य का लाना।
डाॅ0 अम्बेडकर पर बुद्ध, कबीरदास और ज्योतिबाफुले की अमिट छाप पड़ी थी। बुद्ध से उन्होंने शारीरिक व मानसिक शान्ति का पाठ लिया, कबीर से भक्ति मार्ग तो ज्योतिबाफुले से अथक संघर्ष की प्रेरणा। यही नहीं अमेरिका और लन्दन में अध्ययन के दौरान वहाँ के समाज, परिवेश व संविधान का भी आपने गहन अध्ययन किया और उसे भारतीय परिवेश में उतारने की कल्पना की। अमेरिका के 14वंे संविधान संशोधन जिसके द्वारा काले नीग्रांे को स्वाधीनता के अधिकार प्राप्त हुए, से वे काफी प्रभावित थे और इसी प्रकार दलितों व अछूतों को भी भारत में अधिकार दिलाना चाहते थे। 20 मार्च 1927 को महाड़ में आपने दलितों का एक विशाल सम्मेलन बुलाया और उनकी अन्तरात्मा को झकझोरते हुए अपने पैरों पर खड़ा होने और स्वचेतना से स्वाभिमान व सम्मान पैदा करने की बात कही। उन्होंने दलितों का आह्यन किया कि वे सरकारी नौकरियों में बढ़-चढ़कर भाग लें वहीं दूसरी तरफ यह भी कहा कि- ‘‘अपना घर-बार त्यागो, जंगलों की तरफ भागो और जंगलों पर कब्जा कर उसे कृषि लायक बनाकर अपना अधिकार जमाओ।’’ अम्बेडकर के इस भाषण पश्चात सदियों से दमित दलित चेतना ने हुंकार भरी और वे सार्वजनिक स्थलों पर अपना अधिकार जताने निकल पड़े पर साम्प्रदायिक तत्वों को ये दलित चेतना अच्छी न लगी और उन्होंने वहाँ स्थित वीरेश्वर मंदिर पर अछूतों के कब्जे की बात फैला दी। नतीजन, इस घटना ने चिंगारी की भांति फैलकर पूरे महाराष्ट््र में उग्र रूप धारण कर लिया और लोगों ने पुलिस के सामने दलितों पर जमकर हमले किए और उनकी जमीन इत्यादि छीनने लगे। यहाँ तक कि स्वयं अम्बेडकर ने एक पुलिस स्टेशन में शरण ली। इस घटना के पश्चात अम्बेडकर ने कठोर रूप अख्तियार करते हुए सत्याग्रह की धमकी दी और दलितों से अपने अधिकारों की प्राप्ति हेतु मर मिटने की अपील की। अन्ततः मजबूर होकर महाराष्ट््र में दलितों के सार्वजनिक स्थलों पर प्रवेश में बाधा डालने वालों को दण्डित करने का कानून बना। इस आन्दोलन से रातोंरात डाॅ0 अम्बेडकर दलितों के सर्वमान्य नेता के रूप में उभरकर सामने आए।
डाॅ0 अम्बेडकर का स्पष्ट मानना था कि राजनैतिक स्वतंत्रता से पूर्व सामाजिक एवं आर्थिक समानता जरूरी है। महात्मा गाँधी और डाॅ0 अम्बेडकर दोनों ने ही जाति व्यवस्था की कुरीतियों को समाप्त करने की बात कही पर जहाँ डाॅ0 अम्बेडकर का मानना था कि सम्पूर्ण जाति व्यवस्था को समाप्त करके ही बुराइयों को दूर किया जा सकता है वहीं महात्मा गाँधी के मत में शरीर में एक घाव मात्र हो जाने से पूरे शरीर को नष्ट कर देना उचित नहीं अर्थात पूरी जाति व्यवस्था को खत्म करने की बजाय उसकी बुराईयों मात्र को खत्म करना उचित होता। डाॅ0 अम्बेडकर के मत में मनुस्मृति से पूर्व भी जाति प्रथा थी। मनुस्मृति ने तो मात्र इसे संहिताबद्ध किया और दलितों पर राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक दासता लाद दी। डाॅ0 अम्बेडकर चातुर्वर्ण व्यवस्था को संकीर्ण सिद्धान्त मानते थे जो कि विकृत रूप में सतहबद्ध गैरबराबरी का रूप है। उन्होंने शूद्रों को आर्यांे का ही अंग मानते हुए प्रतिपादित किया कि इण्डो-आर्यन समाज में ब्राह्मणों ने दण्डात्मक विधान द्वारा कुछ लोगों को शूद्र घोषित कर दिया और उन्हें घृणित सामाजिक जीवन जीने के लिए मजबूर कर दिया। नतीजन, शूद्र चातुर्वर्ण की अन्तिम जाति न रहकर नीची जातियाँ घोषित हो र्गइं। इसीलिए वे हिन्दू समाज के उत्थान हेतु दो तत्व आवश्यक मानते थे- प्रथम, समानता और द्वितीय, जातीयता का विनाश। इसी के अनुरूप उन्होंने प्रथम गोलमेज सम्मेलन में सुझाव दिया कि अछूतों को गैर जातीय हिन्दू अथवा प्रोटेस्टेण्ट हिन्दू के रूप में मान्यता दी जाय। उनका कहना था कि - ‘‘अछूत हिन्दुओं के तत्व नहीं हंै बल्कि भारत की राष्ट््रीय व्यवस्था में एक पृथक तत्व हैं जैसे मुसलमान।’’ डाॅ0 अम्बेडकर गाँधी जी के ‘हरिजन’ शब्द से नफरत करते थे क्योंकि दलितों की स्थिति सुधारे बिना धर्म की चाशनी में उन्हें ईश्वर के बन्दे कहकर मूल समस्याओं की ओर से ध्यान मोड़ने का गाँधी जी का यह नापाक नुस्खा उन्हें कभी नहीं भाया। उन्होंने गाँधी जी के इस कदम पर सवाल भी उठाया कि- ‘‘सिर्फ अछूत या शूद्र या अवर्ण ही हरिजन हुए, अन्य वर्णों के लोग हरिजन क्यों नहीं हुए? क्या अछूत हरिजन घोषित करने से अछूत नहीं रहेगा? क्या मैला नहीं उठायेगा? क्या झाडू़ नहीं लगाएगा? क्या अन्य वर्ण वाले उसे गले लगा लेंगे? क्या हिन्दू समाज उसे सवर्ण मान लेगा? क्या उसे सामाजिक समता का अधिकार मिल जायेगा? हरिजन तो सभी हैं, लेकिन गाँधी ने हरिजन को भी भंगी बना डाला। क्या किसी सवर्ण ने अछूतों को हरिजन माना? सभी ने भंगी, मेहतर माना। जिस प्रकार कोई राष्ट््र अपनी स्वाधीनता खोकर धन्यवाद नहीं दे सकता, कोई नारी अपना शील भंग होने पर धन्यवाद नहीं देती फिर अछूत कैसे केवल नाम के लिए हरिजन कहलाने पर गाँधी को धन्यवाद कर सकता है। यह सोचना फरेब है कि ओस की बूँदांे से किसी की प्यास बुझ सकती है।’’ अम्बेडकर का मानना था कि वर्ण व्यवस्था का सीधा दुष्प्रभाव भले ही दलितों व पिछड़ों मात्र पर दिखता है पर जब इसी सामाजिक विघटन के कारण देश गुलाम हुआ तो सवर्ण भी बिना प्रभावित हुए नहीं रह सके।
डाॅ0 अम्बेडकर अपनी योग्यता की बदौलत सन् 1942 में वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्य भी बने एवम् कालान्तर में संविधान सभा के सदस्य भी चुने गये। संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष रूप में आपने संविधान का पूरा खाका खींचा और उसमें समाज के दलितांे व पिछड़े वर्गांे की बेहतरी के लिए भी संवैधानिक प्रावधान सुनिश्चित किए। स्वतंत्रता पश्चात डाॅ0 अम्बेडकर भारत के प्रथम कानून मंत्री भी बने पर महिलाओं को सम्पति में बराबर का हिस्सा देने के लिये उनके द्वारा संसद में पेश किया गया ‘हिन्दू कोड बिल’ निरस्त हो जाने से वे काफी आहत हुए और 10 अक्टूबर 1951 को मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया। त्यागपत्र देते समय उन्हांेनेे कहा था कि- ‘‘भारत के प्रधानमंत्री द्वारा मुझे बुलाकर मंत्री पद देने की पेशकश और कानून मंत्री बनाने का निमन्त्रण आश्चर्यजनक था, क्योंकि मै तो विपक्ष में था। मुझे खुद ही संदेह था कि अब तक मैं जिनके विरोध में था, उनके साथ कैसे काम कर सकूगाँ? मुझे अपनी योग्यता के बारे में भी संदेह था कि क्या मैं अपने पूर्ववर्ती कानून मंत्रियों जैसा हूँ? फिर भी मैंने अपने संदेह को ताक पर रखकर प्रधानमंत्री के प्रस्ताव को इसलिए स्वीकार कर लिया कि देश के नवनिर्माण हेतु मुझमें जितनी भी क्षमता है उसके अनुरूप असहयोग करना चाहिए।’’ 1954 में राज्य सभा में अनुसूचित जाति व जनजाति आयुक्त की रिपोर्ट पर उन्होंने कहा था कि- ‘‘आप पुनः नमक के ऊपर टैक्स लगा दें। यह टैक्स बहुत मामूली था। उस समय जब इसे समाप्त किया गया तो इस मद से 10 करोड़ रूपये आते थे। अब यह 20 करोड़ पर पहुँच सकता है। चूँकि गाँधी जी के नेतृत्व में इस टैक्स के खिलाफ लड़ाई लड़ी गई थी इसलिए उनकी याद में इसे समाप्त किया गया। मैं उनकी दिल से इज्जत करता हूँ। इसलिए मेरा सुझाव है कि इस टैक्स को फिर से लगावें और उनकी याद में उसी पैसे से गाँधी ट््रस्ट फण्ड बनाकर दलितों के उद्धार और पुनर्वास पर इसे खर्च करें।’’ डाॅ0 अम्बेडकर दूरदृष्टा और विचारों से क्रांतिकारी थे तथा सभी धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन पश्चात वे बौद्ध धर्म की ओर उन्मुख हुए। एक ऐसा धर्म जो मानव को मानव के रूप में देखता था, किसी जाति के खाँचे में नहीं। एक ऐसा धर्म जो धम्म अर्थात नैतिक आधारों पर अवलम्बित था न कि किन्हीं पौराणिक मान्यताओं और अंधविश्वास पर। अम्बेडकर बौद्ध धर्म के ‘आत्मदीपोभव’ से काफी प्रभावित थे और दलितों व अछूतों की प्रगति के लिये इसे जरूरी समझते थे। 1935 में नासिक जिले के भेवले में आयोजित महार सम्मेलन में ही अम्बेडकर ने घोषणा कर दी थी कि- ‘‘आप लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि मैं धर्म परिवर्तन करने जा रहा हूँ। मैं हिन्दू धर्म में पैदा हुआ, क्योेंकि यह मेरे वश में नहीं था लेकिन मैं हिन्दू धर्म में मरना नहीं चाहता। इस धर्म से खराब दुनिया में कोई धर्म नहीं है इसलिए इसे त्याग दो। सभी धर्मों में लोग अच्छी तरह रहते हैं पर इस धर्म में अछूत समाज से बाहर हैं। स्वतंत्रता और समानता प्राप्त करने का एक रास्ता है धर्म परिवर्तन। यह सम्मेलन पूरे देश को बतायेगा कि महार जाति के लोग धर्म परिवर्तन के लिये तैयार हैं। महार को चाहिए कि हिन्दू त्यौहारों को मनाना बन्द करें, देवी देवताओं की पूजा बन्द करें, मंदिर में भी न जायें और जहाँ सम्मान न हो उस धर्म को सदा के लिए छोड़ दें।’’ अम्बेडकर की इस घोषणा पश्चात ईसाई मिशनरियों ने उन्हें अपनी ओर खींचने की भरपूर कोशिश की और इस्लाम अपनाने के लिये भी उनके पास प्रस्ताव आये। कहा जाता है कि हैदराबाद के निजाम ने तो इस्लाम धर्म अपनाने के लिये उन्हें ब्लैंक चेक तक भेजा था पर अम्बेडकर ने उसे वापस कर दिया। वस्तुतः अम्बेडकर एक ऐसा धर्म चाहते थे, जिसकी जड़ें भारत में हों। अन्ततः 24 मई 1956 को बुद्ध की 2500 वीं जयन्ती पर अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म में दीक्षा लेने की घोषणा कर दी और अक्टूबर 1956 में दशहरा के दिन नागपुर में हजारों शिष्यों के साथ उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया। उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने के पीछे भगवान बुद्ध के एक उपदेश का हवाला भी दिया- ‘‘हे भिक्षुओं! आप लोग कई देशों और जातियों से आये हुए हैं। आपके देश-प्रदेश में अनेक नदियाँ बहती हैं और उनका पृथक अस्तित्व दिखाई देता है। जब ये सागर में मिलती हंै, तब अपने पृथक अस्तित्व को खो बैठती हैं और समुद्र में समा जाती हैं। बौद्ध संघ भी समुद्र की ही भांति है। इस संघ में सभी एक हैं और सभी बराबर हैं। समुद्र में गंगा या यमुना के मिल जाने पर उसके पानी को अलग पहचानना कठिन है। इसी प्रकार आप लोगों के बौद्ध संघ में आने पर सभी एक हैं, सभी समान हैं।’’ बौद्ध धर्म ग्रहण करने के कुछ ही दिनांे पश्चात 6 दिसम्बर 1956 को डाॅ0 अम्बेडकर ने नश्वर शरीर को त्याग दिया पर ‘आत्मदीपोभव’ की तर्ज पर समाज के शोषित, दलित व अछूतों के लिये विचारों की एक पुंज छोड़ गए। उनके निधन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पं0 जवाहरलाल नेहरू ने लोकसभा में श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए कहा था कि- ‘‘डाॅ0 अम्बेडकर हमारे संविधान निर्माताओं में से एक थे। इस बात में कोई संदेह नहीं कि संविधान को बनाने में उन्होंने जितना कष्ट उठाया और ध्यान दिया उतना किसी अन्य ने नहीं दिया। वे हिन्दू समाज के सभी दमनात्मक संकेतों के विरूद्ध विद्रोह के प्रतीक थे। बहुत मामलों में उनके जबरदस्त दबाव बनाने तथा मजबूत विरोध खड़ा करने से हम मजबूरन उन चीजों के प्रति जागरूक और सावधान हो जाते थे तथा सदियों से दमित वर्ग की उन्नति के लिये तैयार हो जाते थे।’’
- कृष्ण कुमार यादव
शनिवार, 28 नवंबर 2009
कृष्ण की आकांक्षा : पाँच वर्षों का सुखद वैवाहिक सफर
28 नवम्बर का दिन हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है.
इस वर्ष इस तिथि को सबसे महत्वपूर्ण बात रही कि हमारी शादी के पाँच साल पूरे हो गए। 28 नवम्बर, 2004 (रविवार) को मैं और आकांक्षा जीवन के इस अनमोल पवित्र बंधन में बंधे थे. वक़्त कितनी तेजी से करवटें बदलता रहा, पता ही नहीं चला. सरकारी भाषा में कहें तो एक पंचवर्षीय योजना मानो पूरी हो गई. सुख-दुःख के बीच सफलता के तमाम आयाम हमने छुए. कभी जिंदगी सरपट दौड़ती तो कई बार ब्रेक लग जाता. पिछले साल का हादसा अभी भी नहीं भूलता. जब शादी की सालगिरह के अगले दिन ही मेरा एक एक्सिडेंट हुआ और बाएं हाथ का आपरेशन करना पड़ा. एक सप्ताह के लिए मैं हॉस्पिटल में भी रहा. इस बार भी शादी की सालगिरह पर हम साथ नहीं थे, मैं ट्रेनिंग के सिलसिले में बाहर था....पता नहीं यह कैसा संयोग है, पर पाँच साल के इस सफ़र में सालगिरह का दिन हमारे लिए बहुत अजीब रहा. दो बार ट्रेनिंग, एक बार बॉस के साथ एक मीटिंग में काफी रात हो जाना, एक बार सालगिरह के अगले दिन एक्सिडेंट....कुल मिला-जुलाकर अब तक एक ही सालगिरह हम लोग कायदे से उसी दिन सेलिब्रेट कर पाए हैं. हमेशा अपनी सालगिरह सेलिब्रेट करने के लिए हमें किसी अगली तिथि का चुनाव करना पड़ता है, पर वह दिन सिर्फ हमारा होता है. कई बार हम लोग मजाक में कहते भी हैं की विभाग वालों ने हमारी सालगिरह की तारीख नोट कर रखी है, कोई भी ट्रेनिंग और महत्वपूर्ण मीटिंग इसी दिन होगी।
ऐसा ही अजीब संयोग हमारी शादी के बारे में भी है. मैं जहाँ भी पोस्टिंग पर जाता, वहाँ आकांक्षा जी के भ्राता श्री लोगों की भी पोस्टिंग होती. जब मैं पोस्टल स्टाफ कालेज, गाज़ियाबाद में ट्रेनिंग कर रहा था तो इनके बड़े भ्राता श्री नोएडा में एक मल्टीनेशनल कंपनी में थे, पहली पोस्टिंग पर सूरत गया तो इनके भ्राता श्री गुजरात कैडर के IAS अधिकारी थे, वहां से ट्रांसफर होकर लखनऊ में असिस्टेंट पोस्टमास्टर जनरल बना तो इनके एक भ्राता श्री वहां पुलिस उपाधीक्षक थे.....फिर ये रिश्ता होने से कौन रोक सकता था. खैर हम लोगों की शादी 28 नवम्बर, 2004 को धूमधाम के साथ सारनाथ-बनारस में हुई, एक साथ भगवान शंकर जी और भगवान बुद्ध जी का आशीर्वाद मिला। कानपुर में पोस्टिंग के दौरान वर्ष प्यारी बिटिया अक्षिता का जन्म हुआ।
एक-दूसरे के साथ बिताये गए ये पाँच साल सिर्फ इसलिए नहीं महत्वपूर्ण हैं कि हमने पति-पत्नी का सम्बन्ध निभाया, बल्कि इसलिए भी कि हमने एक-दूसरे को समझा, सराहा और संबल दिया. अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि प्रशासनिक व्यस्तताओं के बीच कैसे समय निकल लेते हैं तो इसके पीछे आकांक्षा जी का ही हाथ है. यदि उन्होंने मेरी रचनात्मकता को सपोर्ट नहीं किया होता तो मैं आज एक अदद सिविल सर्वेंट मात्र होता, लेखक-कवि-साहित्यकार के तमगे मेरे साथ नहीं लगे रहते. यह हमारा सौभाग्य है कि हम दोनों साहित्य प्रेमी हैं और कई सामान रुचियों के कारण कई मुद्दों पर खुला संवाद भी कर लेते हैं।
शादी की सालगिरह पर तमाम मित्रजनों-सम्बन्धियों की शुभकामनायें तमाम माध्यमों से प्राप्त हुई...आप सभी का आभार. हिंदी ब्लॉगरों के जन्मदिन ब्लॉग पर भी इस दिन शुभकामनायें दी गईं, आभारी हैं हम दोनों। आप सभी का स्नेह बना रहे ....!!
लेबल:
आकांक्षा यादव,
वैवाहिक-वर्षगांठ,
संस्मरण
रविवार, 8 नवंबर 2009
माँस का लोथड़ा
खामोश व वीरान-सी आँखें
आसपास कुछ ढूँढती हैं
पर हाथ में आता है
सिर्फ माँस का लोथड़ा
किसी के लिए वह हिन्दू का है
किसी के लिए मुसलमां का
किसी ने उसे सांप्रदायिकता
का उन्माद बताया
किसी ने धर्मनिरपेक्षता
का राग अलापा
पर उस दुधमुंहे मासूम
का क्या दोष
माँ की छाती समझ
वह लोथड़े को भी मुँह
लगा लेता है
मुँह में दूध की बजाय
खून भर आता है
लाशों के बीच
खून से सना मुँह लिये
एक मासूम का चेहरा
वह इस देश का भविष्य है !!
आसपास कुछ ढूँढती हैं
पर हाथ में आता है
सिर्फ माँस का लोथड़ा
किसी के लिए वह हिन्दू का है
किसी के लिए मुसलमां का
किसी ने उसे सांप्रदायिकता
का उन्माद बताया
किसी ने धर्मनिरपेक्षता
का राग अलापा
पर उस दुधमुंहे मासूम
का क्या दोष
माँ की छाती समझ
वह लोथड़े को भी मुँह
लगा लेता है
मुँह में दूध की बजाय
खून भर आता है
लाशों के बीच
खून से सना मुँह लिये
एक मासूम का चेहरा
वह इस देश का भविष्य है !!
गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009
ईश्वर की खोज
मैं कई बार सोचता हूँ
ईश्वर कैसा होगा ?
कितनी ही तस्वीरों में
देखा है उसे
पर दिल को तसल्ली नहीं
मैं उससे मिलना चाहता हूँ
बचपन से ही देखा है मैंने
लोगों को पत्थर की मूर्तियों
और पीपलों को पूजते
लोगों की निगाहों से छुपकर
उन पत्थर की मूर्तियों को
उलट-पलट कर देखा
और उन्हें पुकारा भी
पर उसने नहीं सुना
लेकिन मुझे लगता है
जब-जब जरूरत हुई
किसी ने राह दिखायी मुझे
मैं उसे देख नहीं सकता
पर महसूस करता हूँ
शायद वह मेरे ही अंदर
कहीं बैठा है।
ईश्वर कैसा होगा ?
कितनी ही तस्वीरों में
देखा है उसे
पर दिल को तसल्ली नहीं
मैं उससे मिलना चाहता हूँ
बचपन से ही देखा है मैंने
लोगों को पत्थर की मूर्तियों
और पीपलों को पूजते
लोगों की निगाहों से छुपकर
उन पत्थर की मूर्तियों को
उलट-पलट कर देखा
और उन्हें पुकारा भी
पर उसने नहीं सुना
लेकिन मुझे लगता है
जब-जब जरूरत हुई
किसी ने राह दिखायी मुझे
मैं उसे देख नहीं सकता
पर महसूस करता हूँ
शायद वह मेरे ही अंदर
कहीं बैठा है।
शनिवार, 17 अक्टूबर 2009
विभिन्न रूप हैं दीपावली के
भारतीय उत्सवों को लोकरस और लोकानंद का मेल कहा गया है। भूमण्डलीकरण एवं उपभोक्तावाद के बढ़ते दायरों के बीच इस रस और आनंद में डूबा भारतीय जन-मानस आज भी न तो बड़े-बड़े माॅल और क्लबों में मनने वाले फेस्ट से चहकार भरता है और न ही किसी कम्पनी के सेल आॅफर को लेकर आन्तरिक उल्लास से भरता है। त्यौहार सामाजिक सदाशयता के परिचायक हैं न कि हैसियत दर्शाने के। त्यौहार हमें जीवन के राग-द्वेष से ऊपर उठाकर एक आदर्श समाज की स्थापना में मदद करते हैं।
दीपावली भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख त्यौहार है जिसका बेसब्री से इंतजार किया जाता है। दीपावली माने ष्दीपकों की पंक्तिष्। दीपावली पर्व के पीछे मान्यता है कि रावण- वध के बीस दिन पश्चात भगवान राम अनुज लक्ष्मण व पत्नी सीता के साथ चैदह वर्षों के वनवास पश्चात अयोध्या वापस लौटे थे। जिस दिन श्री राम अयोध्या लौटे, उस रात्रि कार्तिक मास की अमावस्या थी अर्थात आकाश में चाँद बिल्कुल नहीं दिखाई देता था। ऐसे माहौल में नगरवासियों ने भगवान राम के स्वागत मंे पूरी अयोध्या को दीपों के प्रकाश से जगमग करके मानो धरती पर ही सितारों को उतार दिया। तभी से दीपावली का त्यौहार मनाने की परम्परा चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आज भी दीपावली के दिन भगवान राम, लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ अपनी वनवास स्थली चित्रकूट मंे विचरण कर श्रद्धालुओं की मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं। यही कारण है कि दीपावली के दिन लाखों श्रद्धालु चित्रकूट मंे मंदाकिनी नदी में डुबकी लगाकर कामद्गिरि की परिक्रमा करते हैं और दीप दान करते हैं। दीपावली के संबंध में एक प्रसिद्ध मान्यतानुसार मूलतः यह यक्षों का उत्सव है। दीपावली की रात्रि को यक्ष अपने राजा कुबेर के साथ हास-विलास में बिताते व अपनी यक्षिणियों के साथ आमोद-प्रमोद करते। दीपावली पर रंग- बिरंगी आतिशबाजी, लजीज पकवान एवं मनोरंजन के जो विविध कार्यक्रम होते हैं, वे यक्षों की ही देन हैं।
सभ्यता के विकास के साथ यह त्यौहार मानवीय हो गया और धन के देवता कुबेर की बजाय धन की देवी लक्ष्मी की इस अवसर पर पूजा होने लगी, क्योंकि कुबेर जी की मान्यता सिर्फ यक्ष जातियों में थी पर लक्ष्मी जी की देव तथा मानव जातियों में। कई जगहों पर अभी भी दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा के साथ-साथ कुबेर की भी पूजा होती है। गणेश जी को दीपावली पूजा में मंचासीन करने में शैव-सम्प्रदाय का काफी योगदान है। ऋद्धि-सिद्धि के दाता के रूप में उन्होंने गणेश जी को प्रतिष्ठित किया। यदि तार्किक आधार पर देखें तो कुबेर जी मात्र धन के अधिपति हैं जबकि गणेश जी संपूर्ण ऋद्धि-सिद्धि के दाता माने जाते हैं। इसी प्रकार लक्ष्मी जी मात्र धन की स्वामिनी नहीं वरन् ऐश्वर्य एवं सुख-समृद्धि की भी स्वामिनी मानी जाती हैं। अतः कालांतर में लक्ष्मी-गणेश का संबध लक्ष्मी-कुबेर की बजाय अधिक निकट प्रतीत होने लगा। दीपावली के साथ लक्ष्मी पूजन के जुड़ने का कारण लक्ष्मी और विष्णु जी का इसी दिन विवाह सम्पन्न होना भी माना गया हैै। दीपावली से जुड़ी एक अन्य मान्यतानुसार राजा बालि ने देवताओं के साथ देवी लक्ष्मी को भी बन्दी बना लिया। देवी लक्ष्मी को मुक्त कराने भगवान विष्णु ने वामन का रूप धरा और देवी को मुक्त कराया। इस अवसर पर राजा बालि ने भगवान विष्णु से वरदान लिया था कि जो व्यक्ति धनतेरस, नरक-चतुर्दशी व अमावस्या को दीपक जलाएगा उस पर लक्ष्मी की कृपा होगी। तभी से इन तीनों पर्वांे पर दीपक जलाया जाता है और दीपावली के दिन ऐश्वर्य की देवी माँ लक्ष्मी एवं विवेक के देवता व विध्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा की जाती है। धनतेरस के दिन धन एवं ऐश्वर्य की देवी माँ लक्ष्मी की दीपक जलाकर पूजा की जाती है और प्रतीकात्मक रूप में लोग सोने-चांदी व बर्तन खरीदते हैं। धनतेरस के अगले दिन अर्थात कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी के रूप में मनाने की परंपरा है। पुराणों के अनुसार इसी दिन भगवान कृष्ण ने राक्षस नरकासुर का वध किया था। नरक चतुर्दशी पर घरों की धुलाई-सफाई करने के बाद दीपक जलाकर दरिद्रता की विदाई की जाती है। वस्तुतः इस दिन दस महाविद्या में से एक अलक्ष्मी (धूमावती) की जयंती होती है। अलक्ष्मी दरिद्रता की प्रतीक हैं, इसीलिए चतुर्दशी को उनकी विदाई कर अगले दिन अमावस्या को दस महाविद्या की देवी कमलासीन माँ लक्ष्मी (देवी कमला) की पूजा की जाती है। नरक चतुर्दशी को ‘छोटी दीपावली’ भी कहा जाता है। दीपावली के दिन लोग लईया, खील, गट्टा, लड्डू इत्यादि प्रसाद के लिए खरीदते हैं और शाम होते ही वंदनवार व रंगोली सजाकर लक्ष्मी-गणेश की पूजा करते हैं और फिर पूरे घर में दीप जलाकर माँ लक्ष्मी का आवाह्न करते हैं। व्यापारी वर्ग पारंपरिक रूप से दीपावली के दिन ही नई हिसाब-बही बनाता है और किसान अपने खेतों पर दीपक जलाकर अच्छी फसल होने की कामना करते हंै। इसके बाद खुशियों के पटाखों के बीच एक-दूसरे से मिलने और उपहार व मिठाईयों की सौगात देने का सिलसिला चलता है।
दीपावली का त्यौहार इस बात का प्रतीक है कि हम इन दीपों से निकलने वाली ज्योति से सिर्फ अपना घर ही रोशन न करें वरन् इस रोशनी में अपने हृदय को भी आलोकित करें और समाज को राह दिखाएं। दीपक सिर्फ दीपावली का ही प्रतीक नही वरन् भारतीय सभ्यता में इसके प्रकाश को इतना पवित्र माना गया है कि मांगलिक कार्यों से लेकर भगवान की आरती तक इसका प्रयोग अनिवार्य है। यहाँ तक कि परिवार में किसी की गंभीर अस्वस्थता अथवा मरणासन्न स्थिति होने पर दीपक बुझ जाने को अपशकुन भी माना जाता है। अगर हम इतिहास के गर्भ में झांककर देखें तो सिंधु घाटी सभ्यता की ख्ुादाई में पकी हुई मिट्टी के दीपक प्राप्त हुए हैं और मोहनज़ोदड़ो की खुदाई में प्राप्त भवनों में दीपकों को रखने हेतु ताख बनाए गए थे व मुख्य द्वार को प्रकाशित करने हेतु आलों की श्रृंखला थी। इसमें कोई शक नहीं कि दीपकों का आविर्भाव सभ्यता के साथ ही हो चुका था, पर दीपावली का जन-जीवन में पर्व रूप में आरम्भ श्री राम के अयोध्या आगमन से ही हुआ।
भारत के विभिन्न राज्यों में इस त्यौहार को विभिन्न रूपों मे मनाया जाता है। वनवास पश्चात श्री राम के अयोध्या आगमन को उनका दूसरा जन्म मान केरल में कुछ अदिवासी जातियां दीपावली को राम के जन्म-दिवस के रूप में मनाती हंै। गुजरात में नमक को साक्षात् लक्ष्मी का प्रतीक मान दीपावली के दिन नमक खरीदना व बेचना शुभ माना जाता है तो राजस्थान में दीपावली के दिन घर मंे एक कमरे को सजाकर व रेशम के गद्दे बिछाकर मेहमानों की तरह बिल्ली का स्वागत किया जाता है। बिल्ली के समक्ष खाने हेतु तमाम मिठाईयाँ व खीर इत्यादि रख दी जाती हंै। यदि इस दिन बिल्ली सारी खीर खा जाये तो इसे वर्ष भर के लिए शुभ व साक्षात् लक्ष्मी का आगमन माना जाता है। उत्तरांचल के थारू आदिवासी अपने मृत पूर्वजों के साथ दीपावली मनाते हैं तो हिमाचल प्रदेश में कुछ आदिवासी जातियां इस दिन यक्ष पूजा करती हैं। पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में दीपावली को काली पूजा के रूप में मनाया जाता है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस को आज ही के दिन माँ काली ने दर्शन दिए थे, अतः इस दिन बंगाली समाज में काली पूजा का विधान है। यहाँ पर यह तथ्य गौर करने लायक है कि दशहरा-दीपावली के दौरान पूर्वी भारत के क्षेत्रों में देवी के रौद्र रूपों को पूजा जाता है, वहीं उत्तरी व दक्षिण भारत में देवी के सौम्य रूपों अर्थात लक्ष्मी, सरस्वती व दुर्गा माँ की पूजा की जाती है।
ऐसा नहीं है कि दीपावली का सम्बन्ध सिर्फ हिन्दुओं से ही रहा है वरन् दीपावली के दिन ही भगवान महावीर के निर्वाण प्राप्ति के चलते जैन समाज दीपावली को निर्वाण दिवस के रूप में मनाता है तो सिक्खों के प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर की स्थापना एवं गुरू हरगोविंद सिंह की रिहाई दीपावली के दिन होने के कारण इसका महत्व सिक्खों के लिए भी बढ़ जाता है। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी वर्ष 1833 में दीपावली के दिन ही प्राण त्यागे थे। देश में ही नहीं अपितु विदेशों में भी दीपावली का त्यौहार बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। वर्ष 2005 में ब्रिटिश संसद में दीपावली-पर्व के उत्सव पर भारतीय नृत्य, संगीत, रंगोली, संस्कृत मंत्रों के उच्चारण व हिन्दू देवी-देवताओं की उपासना का आयोजन किया गया। ब्रिटेन के करीब सात लाख हिंदू इस पर्व को उत्साह से मनाते हैं। सन् 2004 में तो ब्रिटेन ने इस पर्व पर डाक-टिकट भी जारी किया था। अमेरिका के ह्मइट हाउस में भी दीपावली का त्यौहार औपचारिक रूप से आयोजित करने की मांग उठ रही है।
भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी धनदेवी लक्ष्मी के कई नाम और रूप मिलते हैं। धनतेरस को लक्ष्मी का समुद्र मंथन से प्राकट्य का दिन माना जाता है। भारतीय परम्परा उल्लू को लक्ष्मी जी का वाहन मानती है पर तमाम भारतीय ग्रन्थों में कुछ अन्य वाहनों का भी उल्लेख है। महालक्ष्मी स्त्रोत में गरूड़ तो अथर्ववेद के वैवर्त ने हाथी को लक्ष्मी जी का वाहन बताया गया है। प्राचीन यूनान की महालक्ष्मी एथेना का वाहन भी उल्लू है। लेकिन प्राचीन यूनान में धन सम्पदा की देवी के तौर पर ूपजी जाने वाली ‘हेरा‘ का वाहन मयूर है। तमाम देशों में लक्ष्मी पूजन के पुरातात्विक प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं। कम्बोडिया में मिली एक मूर्ति में शेषनाग पर आराम कर रहे विष्णुजी के पैर एक महिला दबा रही है, जो लक्ष्मी है। कम्बोडिया में ही लक्ष्मी की कांस्य प्रतिमा भी मिली है। प्राचानी यूनानी सिक्कों पर लक्ष्मी की आकृति उत्कीर्ण है। रोम के लम्पकश से प्राप्त एक चाँदी की थाली पर भी लक्ष्मी की आकृति है। इसी प्रकार श्रीलंका के पोलेरूमा में पुरातात्विक खनन के दौरान अन्य भारतीय देवी-देवताओं के साथ-साथ लक्ष्मी की मूर्ति प्राप्त हुई थी। नेपाल, थाईलैण्ड, जावा, सुमात्रा, मारीशस, गुयाना, दक्षिण अफ्रीका, जापान इत्यादि देशों में धन की देवी की पूजा की जाती है। यूनान में आइरीन, रोम में डिआ लुक्री, प्राचीन रोम में देवी फार्चूना, तो ग्रीक परम्परा में दमित्री को धन की देवी रूप में पूजा जाता है। जिस तरह भारतीय संस्कृति में लक्ष्मी-काली-सरस्वती का धार्मिक महत्व है, उसी प्रकार यूरोप में एथेना-मिनर्वा-एलोरा का महत्व है।
दीपवाली के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपक्ष को गोवर्धन पूजा की जाती है। इस पर्व पर गाय के गोबर से गोवर्धन की मानव आकृति बना उसके चारों तरफ गाय, बछडे़ और अन्य पशुओं के साथ बीच में भगवान कृष्ण की आकृति बनाई जाती है। इसी दिन छप्पन प्रकार की सब्जियों द्वारा निर्मित अन्नकूट एवं दही-बेसन की कढ़ी द्वारा गोवर्धन का पूजन एवं भोग लगाया जाता है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले भारत में यह पर्व हमें पशुओं मुख्यतः गाय, पहाड़, पेड़-पौधों, ऊर्जा के रूप में गोबर व अन्न की महत्ता बताता हैै। गाय को देवी लक्ष्मी का प्रतीक मानकर लक्ष्मी पूजा के बाद गौ-पूजा की भी अपने देश में परम्परा रही है। पौराणिक मान्यतानुसार द्वापर काल में अपने बाल्य काल में श्री कृष्ण ने नन्दबाबा, यशोदा मैया व अन्य ब्रजवासियों को बादलों के स्वामी इन्द्र की पूजा करते हुए देखा ताकि इंद्र देवता वर्षा करें और उनकी फसलें लहलहायें व वे सुख-समृद्धि की ओर अग्रसर हों। श्रीकृष्ण ने ग्रामवासियों को समझाया कि वर्षा का जल हमें गोवर्धन पर्वत से प्राप्त होता है न कि इंद्र की कृपा से। इससे सहमत होकर ग्रामवासियों ने गोवर्धन पर्वत की पूजा आरम्भ कर दी। श्रीकृष्ण ब्रजवासियांे को इस बात का विश्वास दिलाने के लिए कि गोवर्धन जी उनकी पूजा से प्रसन्न हैं, पर्वत के अंदर प्रवेश कर गए व सारी समाग्रियों को ग्रहण कर लिया और अपने दूसरे स्वरूप मंे ब्रजवासियों के साथ खडे़ होकर कहा-देखो! गोवर्धन देवता प्रसन्न होकर भोग लगा रहे हैं, अतः उन्हें और सामाग्री लाकर चढ़ाएं। इंद्र को जब अपनी पूजा बंद होने की बात पता चली तो उन्हांेने अपने संवर्तक मेघों को आदेश दिया कि वे ब्रज को पूरा डुबो दें। भारी वर्षा से घबराकर जब ब्रजवासी श्रीकृष्ण के पास पहुँचे तो उन्होंनेे उनके दुखों का निवारण करने हेतु अपनी तर्जनी पर पूरे गोवर्धन पर्वत को ही उठा लिया। पूरे सात दिनों तक वर्षा होती रही पर ब्रजवासी गोवर्धन पर्वत के नीचे सुरक्षित पडे़ रहे। सुदर्शन चक्र ने संवर्तक मेघों के जल को सुखा दिया। अंततः पराजित होकर इंद्र श्रीकृष्ण के पास आए और क्षमा मांगी। उस समय सुरभि गाय ने श्रीकृष्ण का दुग्धाभिषेक किया और इस अवसर पर छप्पन भोग का भी आयोजन किया गया। तब से भारतीय संस्कृति में गोवर्धन पूजा और अन्नकूट की परम्परा चली आ रही है।
कोस-कोस पर बदले भाषा, कोस-कोस पर बदले बानी-वाले भारतीय समाज में एक ही त्यौहार को मनाने के अन्दाज में स्थान परिवर्तन के साथ कुछ न कुछ परिवर्तन दिख ही जाता है। वक्त के साथ दीपावली का स्वरूप भी बदला है। पारम्परिक सरसों के तेल की दीपमालायें न सिर्फ प्रकाश व उल्लास का प्रतीक होती हैं बल्कि उनकी टिमटिमाती रोशनी के मोह में घरों के आसपास के तमाम कीट-पतंगे भी मर जाते हैं, जिससे बीमारियों पर अंकुश लगता है। इसके अलावा देशी घी और सरसों के तेल के दीपकों का जलाया जाना वातावरण के लिए वैसे ही उत्तम है जैसे जड़ी-बूटियां युक्त हवन सामग्री से किया गया हवन। पर वर्तमान में जिस प्रकार बल्बों और झालरों का प्रचलन बढ़ रहा है, वह दीपावली के परम्परागत स्वरूप के ठीक उलटा है। एक ओर कोई व्यक्ति बीमार है तो दूसरी ओर अन्य लोग बिना उसके स्वास्थ्य की परवाह किए लाउडस्पीकर बजाए जा रहे हैं, एक व्यक्ति समाज में अपनी हैसियत दिखाने हेतु हजारों रुपये के पटाखे फोड़ रहा है तो दूसरी ओर न जाने कितने लोग सिर्फ एक समय का खाना खाकर पूरा दिन बिता देते हैं। एक अनुमानानुसार हर साल दीपावली की रात पूरे देश में करीब तीन हजार करोड़ रूपये के पटाखे जला दिए जाते हैं और करोड़ांे रूपये जुए में लुटा दिए जाते हैं। क्या हमारी अंतश्चेतना यह नहीं कहती कि करोड़ों रुपये के पटाखे छोड़ने के बजाय भूखे-नंगे लोगों हेतु कुछ प्रबन्ध किए जायें? क्या पटाखे फोड़कर व जोर से लाउडस्पीकर बजाकर हम पर्यावरण को प्रदूषित नहीं कर रहे हैं? त्यौहार के नाम पर सब छूट है के बहाने अपने को शराब के नशे में डुबोकर मारपीट व अभद्रता करना कहाँ तक जायज है? निश्चिततः इन सभी प्रश्नों का जवाब अगर समय रहते नहीं दिया गया तो अगली पीढ़ियाँ शायद त्यौहारों की वास्तविक परिभाषा ही भूल जायें।
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