समर्थक / Followers

शनिवार, 25 मई 2013

बुद्ध और अंगुलिमाल






ठहरो!
तुम आगे नहीं जा सकते
फिर भी बुद्ध आगे बढ़ते रहे
अविचलित मुस्कुराते हुए
चेहरे पर तेज के साथ

अंगुलिमाल अवाक्
मानो किसी ने सारी हिंसा
उसके अन्दर से खींच ली हो
कदम अपने आप उठने लगे
और बुद्ध के चरणों में सिर रख दिया

उसने जान लिया कि
शारीरिक शक्ति से महत्वपूर्ण
आत्मिक शक्ति है
आत्मा को जीतना ही
परमात्मा को जीतना है।

(चित्र में : सारनाथ में कृष्ण कुमार यादव)

*****************************************************************
आज बुद्ध पूर्णिमा है। जिस महात्मा बुद्ध ने तमाम कर्मकांडों के विरुद्ध आवाज़ उठाई, उसे हमने मूर्तियों, पूजा और कर्मकांडों के बीच उलझा दिया। दुर्भाग्य यही है कि जब कोई अच्छा कार्य करता है तो हम उसे मानव की बजाय भगवान बना देते हैं और इसी के साथ उसके विचारों की बजाय आडम्बर को ज्यादा महत्त्व देने लगते हैं। बुद्ध का मध्यम मार्ग मुझे बहुत भाता है, न तो अतिवादिता और न ही निम्नता। आज जीवन को अच्छे से जीने का यही माध्यम मार्ग भी उत्तम है !!

 (जीवन संगिनी आकांक्षा जी के फेस बुक टाइम लाइन से  )

रविवार, 12 मई 2013

माँ के आँसू



आज मदर्स डे है. माँ हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं और माँ की वजह से हम आज इस दुनिया में हैं. दुनिया में माँ का एक ऐसा अनूठा रिश्ता है, जो सदैव दिल के करीब होता है. हर छोटी-बड़ी बात हम माँ से शेयर करते हैं. दुनिया के किसी भी कोने में रहें, माँ की लोरी, प्यार भरी डांट और चपत, माँ का प्यार, दुलार, स्नेह, अपनत्व व ममत्व, माँ के हाथ का बना हुआ खाना, किसी से झगडा करके माँ के आँचल में छुप कर अपने को महफूज़ समझना, बीमार होने पर रात भर माँ का जगकर गोदी में सर लिए बैठे रहना, हमारी हर छोटी से छोटी जिद को पूरी करना, हमारी सफलता के लिए देवी-देवताओं से मन्नतें मांगना ..ना जाने क्या-क्या कष्ट माँ हमारे लिए सहती है और एक दिन हम सफलता के पायदान पर चढ़ते हुए अपनी अलग ही जिदगी बसा लेते हैं. माँ की नजरों से दूर अपनी दुनिया में, फिर भी माँ रोज हमारी चिंता करती है. हम सोचते हैं कि हम बड़े हो चुके हैं, पर माँ की निगाह में तो हम बच्चे ही हैं. आज मदर्स डे पर ऐसा ही कुछ भाव लिए मेरी यह कविता –


बचपन से ही देखता आ रहा हूँ माँ के आँसू

सुख में भी, दुख में भी

जिनकी कोई कीमत नहीं

मैं अपना जीवन अर्पित करके भी

इनका कर्ज नहीं चुका सकता।


हमेशा माँ की आँखों में आँसू आये

ऐसा नहीं कि मैं नहीं रोया

लेकिन मैंने दिल पर पत्थर रख लिया

सोचा, कल को सफल आदमी बनूँगा

माँ को सभी सुख-सुविधायें दूँगा

शायद तब उनकी आँखों में आँसू नहीं हो

पर यह मेरी भूल थी।


आज मैं सफल व्यक्ति हूँ

सारी सुख-सुविधायें जुटा सकता हूँ

पर एक माँ के लिए उसके क्या मायने ?


माँ को सिर्फ चाहिए अपना बेटा

जिसे वह छाती से लगा जी भर कर प्यार कर सके

पर जैसे-जैसे मैं ऊँचाईयों पर जाता हूँ

माँ का साथ दूर होता जाता है

शायद यही नियम है प्रकृति का।

शुक्रवार, 10 मई 2013

10 मई 1857 : जब हुआ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का आगाज़


आज 10 मई है। इस दिन का भारतीय इतिहास में एक विशिष्ट स्थान है। 1857 में भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम इसी दिन आरंभ हुआ था. 1857 वह वर्ष है, जब भारतीय वीरों ने अपने शौर्य की कलम को रक्त में डुबो कर काल की शिला पर अंकित किया था और ब्रिटिश साम्राज्य को कड़ी चुनौती देकर उसकी जडे़ं हिला दी थीं। 1857 का वर्ष वैसे भी उथल-पुथल वाला रहा है। इसी वर्ष कैलिफोर्निया के तेजोन नामक स्थान पर 7.9 स्केल का भूकम्प आया था तो टोकियो में आये भूकम्प में लगभग एक लाख लोग और इटली के नेपल्स में आये 6.9 स्केल के भूकम्प में लगभग 11,000 लोग मारे गये थे। 1857 की क्रान्ति इसलिये और भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि ठीक सौ साल पहले सन् 1757 में प्लासी के युद्ध में विजय प्राप्त कर राबर्ट क्लाइव ने अंग्रेजी राज की भारत में नींव डाली थी। विभिन्न इतिहासकारों और विचारकांे ने इसकी अपने-अपने दृष्टिकोण से व्याख्यायें की हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और महान चिन्तक पं0 जवाहरलाल नेहरू ने लिखा कि- ‘‘यह केवल एक विद्रोह नहीं था, यद्यपि इसका विस्फोट सैनिक विद्रोह के रूप में हुआ था, क्योंकि यह विद्रोह शीघ्र ही जन विद्रोह के रूप में परिणित हो गया था।’’ बेंजमिन डिजरायली ने ब्रिटिश संसद में इसे ‘‘राष्ट्रीय विद्रोह’’ बताया। प्रखर विचारक बी0डी0सावरकर व पट्टाभि सीतारमैया ने इसे ”भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम”, जान विलियम ने ”सिपाहियों का वेतन सुविधा वाला मामूली संघर्ष“ व जान ब्रूस नार्टन ने ‘‘जन-विद्रोह’’ कहा। माक्र्सवादी विचारक डा0 राम विलास शर्मा ने इसे संसार की प्रथम साम्राज्य विरोधी व सामन्त विरोधी क्रान्ति बताते हुए 20वीं सदी की जनवादी क्रान्तियों की लम्बी श्रृंखला की प्रथम महत्वपूर्ण कड़ी बताया। प्रख्यात अन्तर्राष्ट्रीय राजनैतिक विचारक मैजिनी तो भारत के इस प्रथम स्वाधीनता संग्राम को अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखते थे और उनके अनुसार इसका असर तत्कालीन इटली, हंगरी व पोलैंड की सत्ताओं पर भी पड़ेगा और वहाँ की नीतियाँ भी बदलेंगी।


1857 की क्रान्ति को लेकर तमाम विश्लेषण किये गये हैं। इसके पीछे राजनैतिक-सामाजिक-धार्मिक-आर्थिक सभी तत्व कार्य कर रहे थे, पर इसका सबसे सशक्त पक्ष यह रहा कि राजा-प्रजा, हिन्दू-मुसलमान, जमींदार-किसान, पुरूष-महिला सभी एकजुट होकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े। 1857 की क्रान्ति को मात्र सैनिक विद्रोह मानने वाले इस तथ्य की अवहेलना करते हैं कि कई ऐसे भी स्थान थे, जहाँ सैनिक छावनियाँ न होने पर भी ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध क्रान्ति हुयी। इसी प्रकार वे यह भूल जाते है कि वास्तव में ये सिपाही सैनिक वर्दी में किसान थे और किसी भी व्यक्ति के अधिकारों के हनन का सीधा तात्पर्य था कि किसी-न-किसी सैनिक के अधिकारों का हनन, क्योंकि हर सैनिक या तो किसी का पिता, बेटा, भाई या अन्य रिश्तेदार है। यह एक तथ्य है कि अंगे्रजी हुकूमत द्वारा लागू नये भू-राजस्व कानून के खिलाफ अकेले सैनिकों की ओर से 15,000 अर्जियाँ दायर की गयी थीं। डाॅ0 लक्ष्मीमल्ल सिंघवी के शब्दों में- ‘‘सन् 1857 की क्रान्ति को चाहे सामन्ती सैलाब या सैनिक गदर कहकर खारिज करने का प्रयास किया गया हो, पर वास्तव में वह जनमत का राजनीतिक-सांस्कृतिक विद्रोह था। भारत का जनमानस उसमें जुड़ा था, लोक साहित्य और लोक चेतना उस क्रान्ति के आवेग से अछूती नहीं थी। स्वाभाविक है कि क्रान्ति सफल न हो तो इसे ‘विप्लव’ या ‘विद्रोह’ ही कहा जाता है।’’ यह क्रान्ति कोई यकायक घटित घटना नहीं थी, वरन् इसके मूल में विगत कई सालों की घटनायें थीं, जो कम्पनी के शासनकाल में घटित होती रहीं। एक ओर भारत की परम्परा, रीतिरिवाज और संस्कृति के विपरीत अंग्रेजी सत्ता एवं संस्कृति सुदृढ हो रही थी तो दूसरी ओर भारतीय राजाओं के साथ अन्यायपूर्ण कार्रवाई, अंग्रेजों की हड़पनीति, भारतीय जनमानस की भावनाओं का दमन एवं विभेदपूर्ण व उपेक्षापूर्ण व्यवहार से राजाओं, सैनिकों व जनमानस में विद्रोह के अंकुर फूट रहे थे।


इसमें कोई शक नहीं कि 1757 से 1856 के मध्य देश के विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न वर्गों द्वारा कई विद्रोह किये गये। यद्यपि अंग्रेजी सेना बार-बार इन विद्रोहों को कुचलती रही पर उसके बावजूद इन विद्रोहों का पुनः सर उठाकर खड़ा हो जाना भारतीय जनमानस की जीवटता का ही परिचायक कहा जायेगा। 1857 के विद्रोह को इसी पृष्ठभूमि में देखे जाने की जरूरत है। अंग्रेज इतिहासकार फॅारेस्ट ने एक जगह सचेत भी किया है कि- ‘‘1857 की क्रान्ति हमें इस बात की याद दिलाती है कि हमारा साम्राज्य एक ऐसे पतले छिलके के ऊपर कायम है, जिसके किसी भी समय सामाजिक परिवर्तनों और धार्मिक क्रान्तियों की प्रचण्ड ज्वालाओं द्वारा टुकडे़-टुकडे़ हो जाने की सम्भावना है।’’ अंग्रेजी हुकूमत को भी 1757 से 1856 तक चले घटनाक्रमों से यह आभास हो गया था कि वे अब अजेय नहीं रहे। तभी तो लार्ड केनिंग ने फरवरी 1856 में गर्वनर जनरल का कार्यभार ग्रहण करने से पूर्व कहा था कि - ‘‘मैं चाहता हूँ कि मेरा कार्यकाल शान्तिपूर्ण हो। मैं नहीं भूल सकता कि भारत के गगन में, जो अभी शान्त है, कभी भी छोटा सा बादल, चाहे वह एक हाथ जितना ही क्यों न हो, निरन्तर विस्तृत होकर फट सकता है, जो हम सबको तबाह कर सकता है।’’ लार्ड केनिंग की इस स्वीकारोक्ति में ही 1857 की क्रान्ति के बीज छुपे हुये थे।

1857 की क्रान्ति की सफलता-असफलता के अपने-अपने तर्क हैं पर यह भारत की आजादी का पहला ऐसा संघर्ष था, जिसे अंग्रेज समर्थक सैनिक विद्रोह अथवा असफल विद्रोह साबित करने पर तुले थे, परन्तु सही मायनों में यह पराधीनता की बेड़ियों से मुक्ति पाने का राष्ट्रीय फलक पर हुआ प्रथम महत्वपूर्ण संघर्ष था। अमरीकी विद्वान प्रो0 जी0 एफ0 हचिन्स के शब्दों में-‘‘1857 की क्रान्ति को अंग्रेजों ने केवल सैनिक विद्रोह ही कहा क्योंकि वे इस घटना के राजद्रोह पक्ष पर ही बल देना चाहते थे और कहना चाहते थे कि यह विद्रोह अंग्रेजी सेना के केवल भारतीय सैनिकों तक ही सीमित था। परन्तु आधुनिक शोध पत्रों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह आरम्भ से सैनिक विद्रोह के ही रूप में हुआ, परन्तु शीघ्र ही इसमें लोकप्रिय विद्रोह का रूप धारण कर लिया।’’ वस्तुतः इस क्रान्ति को भारत में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध पहली प्रत्यक्ष चुनौती के रूप में देखा जा सकता है। यह आन्दोलन भले ही भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति न दिला पाया हो, लेकिन लोगों में आजादी का जज्बा जरूर पैदा कर गया। 1857 की इस क्रान्ति को कुछ इतिहासकारों ने महास्वप्न की शोकान्तिका कहा है, पर इस गर्वीले उपक्रम के फलस्वरूप ही भारत का नायाब मोती ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों से निकल गया और जल्द ही कम्पनी भंग हो गयी। 1857 के संग्राम की विशेषता यह भी है कि इससे उठे शंखनाद के बाद जंगे-आजादी 90 साल तक अनवरत चलती रही और अंतत: 15 अगस्त, 1947 को हम आजाद हुए !!

बुधवार, 8 मई 2013

दौड़ रही थी तितलियों के पीछे...




आज मैंने उसको देखा
वह दौड़ रही थी
तितलियों के पीछे

जूही, गेंदा, गुलाब
और जाने
कितने-कितने फूलों के पास

तितलियाँ भी छेड़ती थीं उसे
हाथ में आकर भी छूट जातीं

पर एक तितली को
शायद अच्छा लगा
वह उसके हाथ ही गई

उसकी खुशी का ठिकाना रहा
उसे लेकर वह वहीं
फूलों के बीच लेट गई
अपनी अल्हड़ धड़कनों पर
काबू पाने के लिए

तभी हवा का तेज झोंका आया
और उसके सीने पर रखे
दुपट्टे को उड़ा ले गया

ऐसा लगा
मानों तितलियों का झुंड
फूलों का रस पीकर उड़ा जा रहा हो।

शुक्रवार, 3 मई 2013

जब हिंदी फिल्मों की पहली नायिका बना एक वेटर


आज हम भले ही हिंदी फिल्मों को देखकर रोमांचित होते हैं, पर इसका यह सफ़र इतना आसान नहीं था। आज से ठीक सौ साल पहले 3 मई 1913 को देश में पहली स्वदेश निर्मित फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' रिलीज हुई थी। दादा साहब फाल्के द्वारा निर्मित  चालीस मिनट की इस फिल्म में आज यह सोचना भी अटपटा लगता है कि नायिका का रोल एक वेटर ने किया था। 

दरअसल 1912 में पटकथा लेखन के बाद दादा साहब फालके को तमाम कलाकार तो मिल गए, मगर महारानी तारामती का रोल करने के लिए कोई महिला तैयार नहीं हुई। हारकर दादा वेश्याओं के बाजार में उनके कोठे पर गए और उनसे तारामती रोल के लिए निवेदन किया। वेश्याओं ने दादा को टका-सा जवाब दिया कि उनका पेशा, फिल्म में काम करने वाली बाई से ज्यादा बेहतर है। फिल्म में काम करना घटिया बात है। दादा निराश तथा हताश होकर लौट रहे थे। रास्ते में सड़क किनारे एक ढाबे में रुके और चाय का ऑर्डर दिया। जो वेटर चाय का गिलास लेकर आया, दादा ने देखा कि उसकी अंगुलियां बड़ी नाजुक हैं और चालढाल में थोड़ा जनानापन है। दादा ने उससे पूछा- यहां कितनी तनख्वाह मिलती है? उसने जवाब दिया कि 5 रुपए महीना। दादा ने फिर कहा कि यदि तुम्हें 5 रुपए रोजाना मिले तो काम करोगे? उत्सुकता से वेटर ने तेजी से पूछा- क्या काम करना होगा? दादा ने सारी बात समझाई। इस तरह भारत की पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र की नायिका कोई महिला न होकर एक पुरुष थी। उसका नाम था अण्णा सालुंके। 

 नायिका की खोज पूरी होने के बाद सन् 1912 की बरसात के बाद बंबई के दादर इलाके में राजा हरिश्चंद्र की शूटिंग आरंभ हुई। राजा हरिश्चन्द्र की भूमिका निभाई दत्तात्रेय दामोदर दाबके ने और एनी प्रमुख कलाकार थे- भालचंद्र फाल्के, साने, तेलांग, शिंदे और औंधकर इत्यादि। सूरज की रोशनी में शूटिंग होती। शाम को पूरी यूनिट का खाना बनता। रात को किचन को डार्करूम में बदल दिया जाता। दादा और काकी सरस्वती देवी मिलकर फिल्म की डेवलपिंग-‍प्रिंटिंग का काम करते। 21 अप्रैल 1913 को बंबई के ओलिम्पिया सिनेमा में राजा हरिश्चंद्र का प्रथम प्रदर्शन मेहमानों के लिए किया गया। राजा हरिश्चंद्र लगातार 13 दिन चली, जो उस समय का रिकॉर्ड था।

यहाँ यह भी उल्लेख करना जरुरी है कि 'राजा हरिश्चंद्र' के बाद दादा साहेब फालके ने नासिक में 1913 में कथा फिल्म 'मोहिनी-भस्मासुर' का निर्माण किया। इस फिल्म के लिए रंगमंच पर काम करने वाली अभिनेत्री कमलाबाई गोखले दादा साहब को मिल गईं। कमलाबाई को हिन्दी फिल्मों की प्रथम महिला नायिका माना जाता है। 

हिंदी फिल्मों के पितामह धुंडीराज गोविंद फालके यानी दादा साहेब फाल्के ने पहली हिंदी फिल्म का निर्माण यूँ ही नहीं कर लिया, बल्कि इसके लिए उन्हें काफी पापड़ भी बेलने पड़े।  30 अप्रैल 1870 को नासिक के पास त्र्यम्बकेश्वर गांव के ब्राह्मण परिवार में जन्मे फाल्के ने बचपन में घर पर ही उत्तीर्ण होने पर बंबई के कला संस्थान जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में प्रवेश लिया। वहां उन्होंने छात्रवृत्ति मिलने पर एक कैमरा भी खरीद लिया। फिर क्या था, कैमरे के साथ-साथ फाल्के साहेब का मन भी रोमांचित होने लगा और अन्तत: उस दौर के नायक लोकमान्यबाल गंगाधर तिलक के विचारों से प्रभावित दादा फालके ने सरकारी नौकरी छोड़ दी। भागीदारी में प्रिंटिंग प्रेस का संचालन किया। 
 दादा साहेब फाल्के के जीवन में क्रन्तिकारी परिवर्तन तब आया जब सन् 1911 में क्रिसमस में बंबई के एक तम्बू सिनेमा में उन्होंने 'लाइफ ऑफ क्राइस्ट' नामक फिल्म देखी। वे फिल्म‍ देखकर घर लौटे और सारी रात बेचैन रहे। दूसरे दिन अपनी पत्नी सरस्वती काकी के साथ वही फिल्म दोबारा देखी। लगातार अलग-अलग नजरिए से उन्होंने 10 दिन फिल्म देखकर मन में निश्चय किया कि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन पर फिल्म बनाना चाहिए। यह बात अपनी पत्नी, रिश्तेदार तथा मित्रों को बताई। सबने फिल्म निर्माण की व्यावहारिक कठिनाइयां सामने रखीं। उभरकर सुझाव आया कि कृष्ण के जीवन में विस्तार तथा उतार-चढ़ाव अधिक हैं इसलिए किसी सरल कथानक पर फिल्म बनाना चाहिए। अंत में राजा हरिश्चंद्र का कथानक सबको पसंद आया।
दादा साहब के व्यापारी मित्र नाडकर्णी ने बाजार दर पर रुपए उधार देने की पेशकश की। चूँकि उस जमाने में भारत में फिल्म निर्माण के विषय में नहीं के बराबर ही जानकारी थी इसलिये इंगलैंड में रहकर फिल्म निर्माण की कला सीखी।1 फरवरी 1912 को दादा साहब लंदन के लिए पानी के जहाज से रवाना हुए। वहां उनका कोई परिचित नहीं था। केवल 'बायस्कोप' पत्रिका के संपादक को इसलिए जानते थे कि उसकी पत्रिका नियमित मंगाकर पढ़ते थे। दादा फालके 'बायस्कोप' के संपादक कैबोर्ग से मिले। वह भला आदमी था। वह उन्हें स्टुडियो तथा सिनेमा उपकरण एवं केमिकल्स की दु‍कानों पर ले गया और फिल्म निर्माण का सारा सामान खरीदवा दिया। 1 अप्रैल 1912 को दादा बंबई लौट आए और फिर आरंभ हुआ हिंदी सिनेमा की पहली फिल्म के निर्माण का।

फिल्म निर्माण कला सीख कर वापस भारत आने पर दादा साहेब फाल्के ने "राजा हरिश्चन्द्र" फिल्म बनाना शुरू किया। किन्तु उस जमाने में फिल्म बनाना आसान नहीं था क्योंकि लोग फिल्मों को अंग्रेजों का जादू-टोना समझते थे। फिल्म के लिये कलाकार मिलना मुश्किल होता था। किसी प्रकार से पुरुष कलाकार तो मिल जाते थे किन्तु महिला कलाकार मिल ही नहीं पाते थे क्योंकि महिलाओं का नाटक, नौटंकी, फिल्मों आदि में काम करना वर्जित माना जाता था। पुरुष कलाकारों को ही महिलाओं के वस्त्र पहनकर महिला-चरित्रों को निभाना पड़ता था। "राजा हरिश्चन्द्र" के निर्माण के दौरान दादा साहेब फाल्के के समक्ष अनेक बाधाएँ आईं किन्तु उन्होंने अडिग रहकर अपनी फिल्म बनाने में सफलता प्राप्त कर ही लिया और फिल्म 3 मई 1913 को प्रदर्शित हो गई।
प्रदर्शित होने पर "राजा हरिश्चन्द्र" ने इतनी अधिक लोकप्रियता प्राप्त की कि मुंबई (उन दिनों बंबई) के गिरगाँव स्थित कोरोनेशन सिनेमा के सामने सड़कों पर लोगों की विशाल भीड़ इकट्ठी हो जाया करती थी। यह फिल्म उस जमाने में जनता के मनोरंजन का केंद्र बिंदु बनी। परदे पर चलती फिरती आकृतियों को देखकर दर्शक भौचक थे. इस फिल्म की इतनी अधिक मांग बढ़ी कि ग्रामीण क्षेत्रों में इसके प्रदर्शन के लिये दादा साहेब फाल्के को फिल्म के और भी कई प्रिंट बनाने पड़े। फिल्म ने जबरदस्त सफलता प्राप्त की और दादा साहेब फाल्के एक फिल्म निर्माता के रूप में स्थापित हो गये और भारतीय फिल्म उद्योग के लिये एक रास्ता खुल गया। आज भारत सरकार के द्वारा फ़िल्म निर्माण में क्षेत्र में उत्कृष्ठ योगदानकर्ता को ’दादा साहब फालके’ सम्मान द्वारा नवाजा जाता है जो कि इस क्षेत्र का सर्वोच्च सम्मान है।


फ़िलहाल भारत में बनी यह पहली मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ अब डीवीडी फॉरमैट में भी  उपलब्ध है। पुणे स्थित भारतीय राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार (एनएफएआई)  ने इस फिल्म को डीवीडी फॉरमैट में प्रस्तुत किया है.
हिंदी फिल्मों की शताब्दी पर दादा साहेब फाल्के के साथ उन सभी का पुनीत स्मरण, जिन्होंने हिंदी सिनेमा को देश और  भाषा की सीमा से परे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक पहचान दिलाई। 



सोमवार, 29 अप्रैल 2013

'विज्ञान परिषद प्रयाग शताब्दी सम्मान' से कृष्ण कुमार यादव भी सम्मानित



राष्ट्रभाषा हिन्दी के माध्यम से विज्ञान लोकप्रियकरण के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिये विज्ञान के प्रति समर्पित संस्था 'विज्ञान परिषद प्रयाग' ने अपने शताब्दी वर्ष में विभिन्न विभूतियों को  'विज्ञान परिषद प्रयाग शताब्दी सम्मान' से विभूषित किया। 

प्रशासन के साथ-साथ लेखन और ब्लागिंग में अनवरत सक्रिय एवं सम्प्रति इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवायें  कृष्ण कुमार यादव को भी इस अवसर पर  'विज्ञान परिषद प्रयाग शताब्दी सम्मान' से सम्मानित किया गया। 

उक्त सम्मान 27 अप्रैल 2013 को इलाहाबाद में  विज्ञान परिषद प्रयाग के सभागार  में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में छत्तीसगढ़ के राजपाल महामहिम श्री शेखर दत्त द्वारा प्रदान किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता  डा0 वीरेन्द्र पाल सिंह, अध्यक्ष विश्व कृषि वानिकी केन्द्र (दक्षिण एशिया), नई दिल्ली ने की। 


इस अवसर पर हिंदी में विज्ञान लेखन करने और इसे प्रोत्साहित करने हेतु देश के बारह विश्वविद्यालयों के कुलपति, विभिन्न प्रमुख संस्थानों/विभागों के आठ निदेशकों, दस डाक्टर्स एवं बीस शिक्षाविद, साहित्यकार व ब्लागर्स को सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर विज्ञान परिषद् के सभापति दीनानाथ मिश्र, संस्था के प्रधानमंत्री शिवगोपाल  मिश्र, के . के . भूटानी सहित तमाम विश्वविद्यालयों के कुलपति, विभिन्न प्रमुख संस्थानों/विभागों के निदेशक, अधिकारीगण,  चिकित्सक, शिक्षाविद, साहित्यकार, लेखक, पत्रकार, ब्लागर्स, शोधार्थी इत्यादि उपस्थित थे। 

(साभार प्रस्तुति : )

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

'चिट्ठा' के दस साल का सफ़र

न्यू मीडिया के रूप में तेजी से उभरी हिन्दी ब्लागिंग के एक दशक पूरा होने पर प्रिंट मीडिया ने भी इसे हाथों-हाथ लिया। इलाहाबाद के तमाम पत्रकारों ने अन्य ब्लागर्स के साथ हम लोगों  से भी संपर्क किया और इस विधा के बारे में अपनी जानकारी में इजाफा करते हुए हिंदी ब्लागिंग के दस साल पूरे होने पर व्यापक और बेहतर कवरेज भी दी। इनमें आकांक्षा जी के  'शब्द-शिखर' के अलावा मेरे  'शब्द-सृजन की ओर' व 'डाकिया डाक लाया', अक्षिता के 'पाखी की दुनिया' के साथ-साथ हिंदी में ब्लागिंग कर रहे सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, गौरव कृष्णा बंसल इत्यादि की भी चर्चा की गई है। सबसे रोचक तो यह रहा कि हिन्दी मीडिया के साथ-साथ इस अवसर को अंग्रेजी-मीडिया ने भी भरपूर स्थान दिया। टाइम्स आफ इण्डिया, हिंदुस्तान टाइम्स  जैसे प्रतिष्ठित अंग्रेजी समाचार पत्रों के अलावा नार्दर्न इण्डिया पत्रिका ने भी इस पर बखूबी कलम चलाई। आप भी इन रिपोर्ताज को यहाँ पढ़ सकते हैं- 












At the completion of 10 years since its inception, Hindi blogging has come a long way. Even in a city like Allahabad there are individuals who are not just expressing their views and more on blog space, but even bringing home awards for their skills. One such accolade has been brought to the city by Krishna Kumar Yadav and his wife Akanksha Yadav, who won the 'Best Blogging Couple of the Decade' award for their blogs in Hindi since 2003 when Unicode made it possible to write blogs in our national language. Credit of pioneering Hindi blogs goes to a person named Alok, who first posted his blog titled 'Nau Do Gyarah'. He is the one who used the word 'Chittha' for a blog for the first time. Today it has evolved as a strong platform for dialogue, information exchange, self expression and communication. Allahabad has always enjoyed the pride of being a seat of literature, education, culture and art and the city's bloggers have lived up to that reputation. 

Krishna Kumar Yadav, who was awarded with 'Awadh Samman' for 'Excellence in New Media and Blogging' in November 2013 by Chief Minister Akhilesh Yadav. 

Posted as director Postal Services of Allahabad region, Yadav told TOI that he runs two blogs named 'Shabd Srijan ki Ore' and 'Daakiya Daak Laaya'. 'Shabd Srijan ki Ore' (http://kkyadav.blogspot.com) , started on June 13, 2008 is alive with contemporary issues, beautiful and soul-stirring poems, informational and well researched articles, whereas his other blog 'Daakiya Daak Laaya' (http://dakbabu.blogspot.com) contains rich history of Postal Services, information about great personas related with service and information about amazing world of postage stamps. His wife Akanksha Yadav is his partner in blogging. Through her blog 'Shabd Shikhar' (http://shabdshikhar.blogspot.com), she writes about woman and child issues, and social concerns. She is an eminent blogger and women empowerment is the basic theme of her writing. 

The couple began blogging in 2003 and within five years through their 10 blogs, motivated several others to start blogs of their own. The couple was awarded 'The Best Couple Blogger of the Decade' award at an International Hindi Blogging Conference organised in Lucknow on August 27, 2012. Blogs of this couple have readers not only in India but abroad as well. While Krishna Kumar Yadav's blogs 'Daakiya Daak Laya' has been viewed in 104 countries and 'Shabd Srijan Ki Ore' in 78 countries, Akanksha Yadav's blog 'Shabd Shikhar' has been viewed in 81 countries. 

Akanksha Yadav says, "Blogging emerged as a 'new media' and has opened a new prospect for women's aspirations. In her blog, she presents data to illustrate that today there are more than 50,000 blogs out of which about one-fourth are operated by women. These women are not only discussing socio-political and economic issues but also creating literature in their own style. 

The Youngest blogger in Hindi, a girl named Akshita is also from Allahabad. She is the first blogger to have received State Award for blogging and has received National Children's Award from Government of India in 2011. Her blog 'Pakhi Ki Duniya' (http://pakhi-akshita.blogspot.com) is amazing and is viewed/read in about 105 countries and contains more than 320 posts.   (Courtesy : Times of India, 22 April 2013)





शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

'चिट्ठियों से चिट्ठे तक' का सफ़र जनसत्ता में




शब्द सृजन की ओर' पर 31 मार्च , 2013 को प्रकाशित पोस्ट 'चिट्ठियों से चिट्ठा तक' को प्रतिष्ठित हिन्दी अख़बार जनसत्ता ने 19 अप्रैल , 2013 को अपने नियमित स्तंभ 'समांतर' के तहत 'चिट्ठियों से चिट्ठे तक' शीर्षक से प्रकाशित किया है...आभार ! इस आलेख को पढने के लिए क्लिक करें - 'चिट्ठियों से चिट्ठा तक'

इससे पहले 'शब्द सृजन की ओर' पर प्रकाशित ब्लॉग की पोस्टों की चर्चा जनसत्ता के साथ-साथ  दैनिक जागरण, अमर उजाला, LN स्टार, नभ छोर, जनवाणी, इत्यादि में हो चुकी है. मेरे दूसरे ब्लॉग 'डाकिया डाक लाया'  और इसकी प्रविष्टियों की चर्चा दैनिक हिंदुस्तान, जनसत्ता, राष्ट्रीय सहारा, राजस्थान पत्रिका, उदंती, LN STAR पत्र-पत्रिकाओं में हो चुकी है.इस प्रोत्साहन के लिए आप सभी का आभार !!


रविवार, 31 मार्च 2013

चिट्ठियों से चिट्ठा तक...


चिट्ठियाँ लिखना और पढना किसे नहीं भाता। शब्दों के विस्तार के साथ बहुत सी अनकही भावनाएं मानो इन चिट्ठियों में सिमटती जाती थीं। पहले लोग चिट्ठियाँ लिखते थे, अब चिटठा (ब्लॉग) लिखने लगे हैं। चिटठा के साथ भी अन-सेंसर्ड सुविधा प्राप्त है। शब्दों और भावनाओं का कोई ओर-छोर नहीं। चिटठा लिखना और टिप्पणियाना चिट्ठियों की ही देन है। आज भी पत्र-पत्रिकाओं में पाठकों की चिट्ठियां प्रमुखता से छापी जाती हैं। अब तो चिट्ठे भी पत्र-पत्रिकाओं में ससम्मान स्थान पा रहे हैं।
 
जब संचार के अन्य साधन न थे, तो चिट्ठियाँ ही संवाद का एकमात्र माध्यम था। ये चिट्ठियाँ सिर्फ व्यक्तिगत नहीं होतीं, बल्कि उनमें हमारा परिवेश, सरोकार और संवेदनाएं भी शामिल होती हैं। ठीक यही बात चिट्ठों (ब्लॉग) पर भी लागू होती हैं। हर चिटठा कुछ-न-कुछ कह्ता लिखता नजर आता है। इन चिट्ठों में अपने गाँव-जंवार की बात होती है, जहाँ तक मुख्य मीडिया नहीं पहुँच पाता तो तमाम ऐसी जानकारियाँ भी होती हैं जो हम एक-दूसरे से साझा करना चाहते हैं। चिट्ठियों की भी तो यही अदा थी। पं0 जवाहर लाल नेहरू अपनी पुत्री इन्दिरा गाँधी को जेल से भी चिट्ठियाँ लिखते रहे। ये चिट्ठियाँ सिर्फ पिता-पुत्री के रिश्तों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें तात्कालिक राजनैतिक एवं सामाजिक परिवेश का भी सुन्दर चित्रण है। इन्दिरा गाँधी के व्यक्तित्व को गढ़ने में इन चिट्ठियों का बहुत बड़ा हाथ रहा है। आज ये किताब के रूप में प्रकाशित होकर ऐतिहासिक दस्तावेज बन चुके हैं। इन्दिरा गाँधी ने इस परम्परा को जीवित रखा एवं दून में अध्ययनरत अपने बेटे राजीव गाँधी को घर की छोटी-छोटी चीजों और तात्कालिक राजनैतिक-सामाजिक परिस्थितियों के बारे में लिखती रहीं। एक चिट्ठी में तो वे राजीव गाँधी को रीवा के महाराज से मिले सौगातों के बारे में भी बताती हैं।
चिट्ठी और चिट्ठा इन दोनों के बारे में प्रमुख समानता है कि इनका काम मात्र सूचना देना ही नहीं बल्कि इनमें एक अपनापन, संग्रहणीयता, लेखन कला, संवेदना एवं समाज को जानने का भाव भी छुपा होता है। चिट्ठी और चिट्ठा दोनों की खूबसूरती दूसरे द्वारा पढ़े जाने में है। यह सही है कि संचार क्रान्ति ने चिठ्ठियों की संस्कृति को खत्म करने का प्रयास किया है और पूरी दुनिया को बहुत करीब ला दिया है। पर इसका एक पहलू यह भी है कि इसने दिलों की दूरियाँ इतनी बढ़ा दी हैं कि बिल्कुल पास में रहने वाले अपने इष्ट मित्रों और रिश्तेदारों की भी लोग खोज-खबर नहीं रखते। ऐसे में लोगों के अंदर संवेदनाओं को बचा पाना कठिन हो गया है।
हाल ही में एक रिपोर्ट पर जाकर निगाह अटकी कि, जज़्बातों को अल्फाज़ देती, कागज़ के कुछ पन्नों में सिमटी चिट्ठी और चिट्ठी लिखने की कला मानो ख़त्म सी होती जा रही है.ब्रिटेन में चैरिटी वर्ल्ड विज़न द्वारा हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाले करीब 50 फ़ीसदी बच्चे ठीक से नहीं जानते कि चिट्ठी कैसे लिखी जाती है. सात से लेकर 14 साल के बच्चों से पूछा गया कि क्या उन्होंने पिछले एक साल में चिट्ठियाँ लिखने की कोशिश की है तो चार में से एक बच्चे का जवाब था, नहीं. जबकि पिछले एक हफ़्ते में इनमें से 50 फ़ीसदी से ज़्यादा बच्चों ने ईमेल किया है या सोशल नेटवर्किंग साइट पर संदेश भेजे हैं. अध्ययन से पता चलता है कि बहुत से बच्चे न तो चिट्ठियाँ लिखते हैं, न ही उन्हें किसी की चिट्ठी मिलती है. आँकड़ों के मुताबिक पाँच में एक बच्चे को कभी किसी ने चिट्ठी नहीं लिखी.करीब 45 फ़ीसदी बच्चों ने कहा कि या तो उन्हें चिट्ठी लिखनी बिल्कुल नहीं आती या वे पक्के तौर पर नहीं कह सकते. ये सर्वेक्षण ब्रिटेन के 1188 बच्चों में किया गया.
 
वाकई यह स्थिति सोचनीय है। बच्चों की शिक्षा से जुड़े मामले की विशेषज्ञ सू पामर कहती हैं, "जब आप ख़ुद कलम से कुछ लिखते हैं तो इसके ज़रिए लिखने वाला ये दर्शाता है कि वे उस रिश्ते को अपना वक़्त दे रहा है. तभी तो हम पुरानी चिट्ठियों को संभाल कर रखते हैं."
 
आर. के. नारायण की एक कहानी है - पोस्टमैन। उसमें एक डाकिया किसी की मृत्यु के बारे में आई एक चिट्ठी लंबे समय तक अपने पास रोके रखता है क्योंकि गांव में एक लड़की की शादी की तैयारियां चल रही हैं। चिट्ठियों से हमारे समाज के भावनात्मक संबंध ने उसे हमारे साहित्य और सिनेमा में बखूबी स्थान दिया है। लेकिन भावनाओं के विलोपन के साथ-साथ अब वास्तविक जीवन से धीरे-धीरे चिट्ठियाँ लुप्त हो रही है। कभी डाकिया की राह ताकते रहने वाला समाज आज अपने प्रियजनों का हाल जानने के लिए मोबाईल फोन के एस.एम्.एस., ई - मेल के इनबॉक्स और फेसबुक पर क्लिक कर रहा है।
 
'इंस्टेंट' के इस दौर में रिश्ते-नाते, सम्बन्ध, भावनाएं सब कुछ 'इंस्टेंट' हो गए हैं। जिस तरह से फेसबुक की इंस्टेंट बातों ने हिन्दी ब्लागिंग को अधर में छोड़ दिया, ठीक वैसे ही चिट्ठियाँ भी अधर में चली गईं। कट-पेस्ट, लाइक, शेयर, के इस दौर में भला किसे फुर्सत है लम्बी चिट्ठियों या चिट्ठों को पढने की। भला हो उन कुछेक लोगों का, जिन्होंने इन विधाओं को जिन्दा रखा है। चिट्ठियाँ गईं तो चिट्ठे आ गए। ये चिट्ठे भी चिट्ठियों की तरह करामाती हैं। डूबो तो डूबते ही जाओ, भागो तो भागते ही जाओ।
      
हाई-टेक होते इस दौर में कलम का स्थान की-बोर्ड ने ले लिया है। शब्दों के भावार्थ बदलने लगे हैं, उनमें शुद्धता नहीं बल्कि चलताऊपन आ गया है। पर जब यही बात रिश्तों-संवेदनाओं पर लागू होती है तो असहजता महसूस होती है। चिट्ठियाँ लिखना कम हुआ तो लिफाफा देख मजमून भांपने वाली पूरी जमात का अस्तित्व खतरे में है। मोबाइल फोन और कम्प्यूटर से कुछ भांपा नहीं जा सकता।
चिट्ठियों से चिट्ठों तक के इस सफ़र में बहुत कुछ बदला है, आगे भी बदलेगा। पर इन सबके बीच यह बेहद जरुरी है कि संवेदनाएं अपना रूप न परिवर्तित करें। जब परंपरागत मीडिया पेड न्यूज और टीआरपी की आड़ में सब कुछ सही ठहराने लगता है तो वहां न्यू-मीडिया की जरुरत होती है। कभी चिट्ठियों ने इस भूमिका का निर्वाह किया था, आज चिट्ठा (ब्लॉग) इस भूमिका का निर्वाह कर रहा है। ख़त्म होना तो हर किसी की नियति है, पर अपने दौर में परिवेश को कोई भी व्यक्ति या विधा कितना प्रभावित कर पाई, यह महत्वपूर्ण है।
 
सौभाग्यवश अप्रैल-2013 में हिंदी ब्लागिंग अपने एक दशक पूरा कर रहा है, ऐसे में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि इसने राजनीति-समाज-साहित्य-संस्कृति से लेकर विभिन्न विमर्शों और आंदोलनों को कहाँ तक प्रभावित किया.....!!
 

बुधवार, 20 मार्च 2013

गौरैया नाराज है !

 
चाय की चुस्कियों के बीच
सुबह का अखबार पढ़ रहा था
अचानक
नजरें ठिठक गईं
गौरैया शीघ्र ही विलुप्त पक्षियों में।
 
वही गौरैया,
जो हर आँगन में
घोंसला लगाया करती
जिसकी फुदक के साथ
हम बड़े हुये।
 
क्या हमारे बच्चे
इस प्यारी व नन्हीं-सी चिड़िया को
देखने से वंचित रह जायेंगे!
न जाने कितने ही सवाल
दिमाग में उमड़ने लगे।
 
बाहर देखा
कंक्रीटों का शहर नजर आया
पेड़ों का नामोनिशां तक नहीं
अब तो लोग घरों में
आँगन भी नहीं बनवाते
एक कमरे के फ्लैट में
चार प्राणी ठुंसे पड़े हैं।
 
प्रकृति को
निहारना तो दूर
हर कुछ इण्टरनेट पर ही
खंगालना चाहते हैं।

 
आखिर
 
इन सबके बीच
गौरैया कहाँ से आयेगी
 
शायद गौरैया नाराज है !
 
- कृष्ण कुमार यादव-
 
(''विश्व गौरैया दिवस'' 20 मार्च पर खास प्रस्तुति)

गुरुवार, 7 मार्च 2013

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर : कृष्ण कुमार यादव के हाइकु

 
जाग उठी है
आज शिक्षित नारी
हक लेने को।
 
अबला नहीं
संवेदना की स्रोत
जानिए इसे।
 
रिश्तों की डोर
सहेजती ये नारी
रुप विभिन्न।
 
नारी की शक्ति
पहचानिए इसे
दुर्गा-भवानी।
 
हर क्षेत्र में
रचे नया संसार
आज की नारी।
 
बाधाएँ तोड़
आसमां के सितारे
छू रही नारी।
 
नारी सशक्त
समाज बने सुखी
समृद्ध राष्ट्र।
-कृष्ण कुमार यादव-

मंगलवार, 5 मार्च 2013

वीर-रस के कवि श्याम नारायण पाण्डेय पर विशेष डाक आवरण जारी



द्वितीय मण्डल स्तरीय आजमगढ़ डाक टिकट प्रदर्शनी आजमपेक्स-2013’ का समापन वेस्ली इंटर कॉलेज आजमगढ़ में आयोजित भव्य समारोह में 3 मार्च को किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में इलाहाबाद व गोरखपुर परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ श्री कृष्ण कुमार यादव ने दूसरे दिन के कार्यक्रम का उदघाटन किया। श्री यादव ने इस अवसर पर वीर रस के कवि श्याम नारायण पाण्डेय (वर्ष 1907 में ग्राम डुमराव, जिला- आजमगढ़, संप्रति मऊ जनपद में जन्म।) पर विशेष डाक आवरण एवं विरूपण का विमोचन किया। आवरण जारी करने के साथ साथ मुख्य अतिथि श्री यादव ने रिमोट द्वारा इस विशेष आवरण के ब्लो-अप का भी अनावरण किया।

वीर-रस के कवि श्याम नारायण पाण्डेय (1907 - 1991) पर जारी विशेष आवरण व विरूपण का विमोचन करते हुए निदेशक डाक सेवाएँ श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि श्याम नारायण पाण्डेय वीर रस के सुविख्यात हिन्दी कवि थे। आप केवल कवि ही नहीं अपितु अपनी ओजस्वी वाणी में वीर रस के अनन्यतम प्रस्तोता भी थे । देश-प्रेम और अपने संस्कृति के प्रति अनुराग ही श्याम नारायण पाण्डेय जी को वीर रस के प्रति आकर्षित करता था। तभी तो उन्होने हल्दीघाटीजौहर जैसे उत्कृष्ट महाकाव्य रचे, जिनमें हल्दीघाटी (काव्य) सर्वाधिक लोकप्रिय और जौहर(काव्य) विशेष चर्चित हुए। हल्दीघाटी में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के जीवन और जौहर में चित्तौड की रानी पद्मिनी के आख्यान हैं। हल्दीघाटी के नाम से विख्यात राजस्थान की इस ऐतिहासिक वीर भूमि के लोकप्रिय नाम पर लिखे गये हल्दीघाटी महाकाव्य पर आपको उस समय का सर्वश्रेष्ठ सम्मान देव पुरस्कार प्राप्त हुआ था। श्री यादव ने कहा कि उन्होने आजीवन निश्चल भाव से साहित्य सृजन किया ।

अपने उदबोधन में निदेशक डाक सेवाएँ श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि आजमगढ़ की धरती सदैव से ही साहित्यिक-सांस्कृतिक रूप से उर्वर रही है। यह धरा महान विभूतियों की जन्मस्थली-कर्मस्थली रही है, जिन्होने आजमगढ़ का नाम दुनियाभर में फैलाया। ऐसी विभूतियों की स्मृतियों को सहेज कर रखना एवं युवा पीढ़ी को उनके बारे में बताना हमारा कर्तव्य है। डाक विभाग ऐसी विभूतियों पर समय-समय पर डाक टिकट व विशेष आवरण (लिफाफा) जारी कर समाज एवं राष्ट्र के प्रति अपने सामाजिक दायित्यों का निर्वहन करता है। श्री यादव ने कहा कि आजमगढ़ की विरासत, स्थापत्य, विभूतियों एवं यहाँ से जुड़े अन्य पहलुओं पर डाक-टिकट एवं विशेष आवरण जारी किए जाने को प्रस्ताव यदि प्राप्त होते हैं तो उन्हे बेहद खुशी होगी।

प्रवर डाक अधीक्षक श्री वाई एन द्विवेदी ने कहा कि एक लंबे अंतराल पश्चात आजमगढ़ में इस प्रकार का आयोजन कर बेहद खुशी हो रही है और जिस तरह से यंहा के लोगों ने प्रदर्शनी को हाथों हाथ लिया है, वह हमारे लिए उत्साहजनक है। इस अवसर पर डा0 शारदा सिंह, पूर्व प्राचार्य, डा0 डी पी, पूर्व प्राचार्य ने भी अपने उद्गार व्यक्त किए।