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शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

अहसास की संजीदगी बरकरार है पत्रों में

पत्रों की दुनिया बेहद निराली है। दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक यदि पत्र अबाध रूप से आ-जा रहे हैं, तो इसके पीछे ‘यूनिवर्सल पोस्टल‘ यूनियन का बहुत बड़ा योगदान है, जिसकी स्थापना 9 अक्टूबर 1874 को स्विटजरलैंड में हुई थी। यह 9 अक्टूबर पूरी दुनिया में ‘विश्व डाक दिवस‘ के रूप में मनाया जाता है। तब से लेकर आज तक डाक-सेवाओं में वैश्विक स्तर पर तमाम क्रांतिकारी परिवर्तन आए हैं और भारत भी इन परिवर्तनों से अछूता नहीं हैं। संचार क्रान्ति के नए साधनों- टेलीफोन, मोबाइल फोन, इण्टरनेट, फैक्स, वीडियो कान्फं्रेसिंग इत्यादि ने समग्र विश्व को एक ‘ग्लोबल विलेज‘ में परिवर्तित कर दिया। देखते ही देखते फोन नम्बर डायल किया और सामने से इच्छित व्यक्ति की आवाज आने लगी। ई-मेल या एस0एम0एस0 के द्वारा चंद सेकेंडों में अपनी बात दुनिया के किसी भी कोने में पहुँचा दी। वैश्विक स्तर पर पहली बार 1996 में संयुक्त राज्य अमेरिका में ई-मेल की कुल संख्या डाक सेवाओं द्वारा वितरित पत्रों की संख्या को पार कर गई और ऐसे में पत्रों की प्रासंगिकता पर भी प्रश्न चिन्ह लगने लगे।

सभ्यता के आरम्भ से ही मानव किसी न किसी रूप में पत्र लिखता रहा है। दुनिया का सबसे पुराना ज्ञात पत्र 2009 ईसा पूर्व का बेबीलोन के खण्डहरों से मिला था, जोकि वास्तव में एक प्रेम पत्र था और मिट्टी की पटरी पर लिखा गया था। कहा जाता है कि बेबीलोन की किसी युवती का प्रेमी अपनी भावनाओं को समेटकर उससे जब अपने दिल की बात कहने बेबीलोन तक पहुँचा तो वह युवती तब तक वहाँ से जा चुकी थी। वह प्रेमी युवक अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाया और उसने वहीं मिट्टी के फर्श पर खोदते हुए लिखा-‘‘मैं तुमसे मिलने आया था, तुम नहीं मिली।‘‘ यह छोटा सा संदेश विरह की जिस भावना से लिखा गया था, उसमें कितनी तड़प शामिल थी। इसका अंदाजा सिर्फ वह युवती ही लगा सकती थी जिसके लिये इसे लिख गया। भावनाओं से ओत-प्रोत यह पत्र 2009 ईसा पूर्व का है और इसी के साथ पत्रों की दुनिया नेे अपना एक ऐतिहासिक सफर पूरा कर लिया है।

जब संचार के अन्य साधन न थे, तो पत्र ही संवाद का एकमात्र माध्यम था। पत्रों का काम मात्र सूचना देना ही नहीं बल्कि इनमें एक अजीब रहस्य या गोपनीयता, संग्रहणीयता, लेखन कला एवं अतीत को जानने का भाव भी छुपा होता है। पत्रों की सबसे बडी विशेषता इनका आत्मीय पक्ष है। यदि पत्र किसी खास का हुआ तो उसे छुप-छुप कर पढ़ने में एवम् संजोकर रखने तथा मौका पाते ही पुराने पत्रों के माध्यम से अतीत में लौटकर विचरण करने का आनंद ही कुछ और है। यह सही है कि संचार क्रान्ति ने चिठ्ठियों की संस्कृति को खत्म करने का प्रयास किया है और पूरी दुनिया को बहुत करीब ला दिया है। पर इसका एक पहलू यह भी है कि इसने दिलों की दूरियाँ इतनी बढ़ा दी हैं कि बिल्कुल पास में रहने वाले अपने इष्ट मित्रों और रिश्तेदारों की भी लोग खोज-खबर नहीं रखते। ऐसे में युवा पीढ़ी के अंदर संवेदनाओं को बचा पाना कठिन हो गया है। तभी तो पत्रों की महत्ता को देखते हुए एन0सी0ई0आर0टी0 को पहल कर कक्षा आठ के पाठ्यक्रम में ‘‘चिट्ठियों की अनोखी दुनिया‘‘ नामक अध्याय को शामिल करना पड़ा।

पत्र लेखन सिर्फ संचार का माध्यम नहीं, बल्कि एक सशक्त विधा है। स्कूलों में जब बच्चों को पत्र लिखना सिखाया जाता है तो अनायास ही वे अपने माता-पिता, रिश्तेदारों या मित्रों को पत्र लिखने का प्रयास करने लगते हैं। पत्र सदैव सम्बंधों की उष्मा बनाये रखते हैं। पत्र लिखने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें कोई जल्दबाजी या तात्कालिकता नहीं होती, यही कारण है कि हर छोटी से छोटी बात पत्रों में किसी न किसी रूप में अभिव्यक्त हो जाती है जो कि फोन या ई-मेल द्वारा सम्भव नहीं है। पत्रों की सबसे बड़ी विशेषता इनका स्थायित्व है। कल्पना कीजिये जब अपनी पुरानी किताबों के बीच से कोई पत्र हम अचानक पाते हैं, तो लगता है जिन्दगी मुड़कर फिर वहीं चली गयी हो। जैसे-जैसे हम पत्रोें को पलटते हैं, सम्बन्धों का एक अनंत संसार खुलता जाता है। व्यक्ति पत्र तात्कालिक रूप से भले ही जल्दी-जल्दी पढ़ ले पर फिर शुरू होती है-एकान्त की खोज और फिर पत्र अगर किसी खास के हों तो सम्बन्धों की पवित्र गोपनीयता की रक्षा करते हुए उसे छिप-छिप कर बार-बार पढ़ना व्यक्ति को ऐसे उत्साह व ऊर्जा से भर देता है, जहाँ से उसके कदम जमीं पर नहीं होते। वह जितनी ही बार पत्र पढ़ता है, उतने ही नये अर्थ उसके सामने आते हैं।

सिर्फ साधारण व्यक्ति ही नहीं बल्कि प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने भी पत्रों के अंदाज को जिया है। माक्र्स-एंजिल्स के मध्य ऐतिहासिक मित्रता का सूत्रपात पत्रों से ही हुआ। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने उस स्कूल के प्राचार्य को पत्र लिखा, जिसमें उनका पुत्र अध्ययनरत था। इस पत्र में उन्होंने प्राचार्य से अनुरोध किया था कि उनके पुत्र को वे सारी शिक्षायें दी जाय, जो कि एक बेहतर नागरिक बनने हेतु जरूरी हैं। इसमें किसी भी रूप में उनका पद आडे़ नहीं आना चाहिये। महात्मा गाँधी तो पत्र लिखने में इतने सिद्धहस्त थे कि दाहिने हाथ के साथ-साथ वे बाएं हाथ से भी पत्र लिखते थे। पं0 जवाहर लाल नेहरू अपनी पुत्री इन्दिरा गाँधी को जेल से भी पत्र लिखते रहे। ये पत्र सिर्फ पिता-पुत्री के रिश्तों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें तात्कालिक राजनैतिक एवं सामाजिक परिवेश का भी सुन्दर चित्रण है। इन्दिरा गाँधी के व्यक्तित्व को गढ़ने में इन पत्रों का बहुत बड़ा हाथ रहा है। आज ये किताब के रूप में प्रकाशित होकर ऐतिहासिक दस्तावेज बन चुके हैं। इन्दिरा गाँधी ने इस परम्परा को जीवित रखा एवं दून में अध्ययनरत अपने बेटे राजीव गाँधी को घर की छोटी-छोटी चीजों और तात्कालिक राजनैतिक-सामाजिक परिस्थितियों के बारे में लिखती रहीं। एक पत्र में तो वे राजीव गाँधी को रीवा के महाराज से मिले सौगातों के बारे में भी बताती हैं। तमाम राजनेताओं-साहित्यकारों के पत्र समय-समय पर पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित होते रहते हैं। इनसे न सिर्फ उस व्यक्ति विशेष के संबंध में जाने-अनजाने पहलुओं का पता चलता है बल्कि तात्कालिक राजनैतिक-सामाजिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश के संबंध में भी बहुत सारी जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। इसी ऐतिहासिक के कारण आज भी पत्रों की नीलामी लाखों रूपयों में होती हैं।

कहते हैं कि पत्रों का संवेदनाओं से गहरा रिश्ता है और यही कारण है कि पत्रों से जुड़े डाक विभाग ने तमाम प्रसिद्ध विभूतियों को पल्लवित-पुष्पित किया है। अमेरिका के राष्ट्रपति रहे अब्राहम लिंकन पोस्टमैन तो भारत में पदस्थ वायसराय लार्ड रीडिंग डाक वाहक रहे। विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक व नोबेल पुरस्कार विजेता सी0वी0 रमन भारतीय डाक विभाग में अधिकारी रहे वहीं प्रसिद्ध साहित्यकार व ‘नील दर्पण‘ पुस्तक के लेखक दीनबन्धु मित्र पोस्टमास्टर थे। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लोकप्रिय तमिल उपन्यासकार पी0वी0अखिलंदम, राजनगर उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित अमियभूषण मजूमदार, फिल्म निर्माता व लेखक पद्मश्री राजेन्द्र सिंह बेदी, मशहूर फिल्म अभिनेता देवानन्द डाक कर्मचारी रहे हैं। उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द जी के पिता अजायबलाल डाक विभाग में ही क्लर्क रहे। ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी ने आरम्भ में डाक-तार विभाग में काम किया था तो प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु भी पोस्टमैन रहे। सुविख्यात उर्दू समीक्षक पद्मश्री शम्सुररहमान फारूकी, शायर कृष्ण बिहारी नूर, महाराष्ट्र के प्रसिद्ध किसान नेता शरद जोशी सहित तमाम विभूतियाँ डाक विभाग की गोद में अपनी सृजनात्मक-रचनात्मक काया का विस्तार पाने में सफल रहीं।

भारतीय परिपे्रक्ष्य में इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भारत एक कृषि प्रधान एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था वाला देश है, जहाँ 70 फीसदी आबादी गाँवों में बसती है। समग्र टेनी घनत्व भले ही 60 का आंकड़ा छूने लगा हो पर ग्रामीण क्षेत्रों में यह बमुश्किल 15 से 20 फीसदी ही है। यदि हर माह 2 करोड़ नए मोबाइल उपभोक्ता पैदा हो रहे हैं तो उसी के सापेक्ष डाक विभाग प्रतिदिन दो करोड़ से ज्यादा डाक वितरित करता है। 1985 में यदि एस0एम0एस0 पत्रों के लिए चुनौती बनकर आया तो उसके अगले ही वर्ष दुतगामी ‘स्पीड पोस्ट‘ सेवा भी आरम्भ हो गई। यह एक सुखद संकेत है कि डाक-सेवाएं नवीनतम टेक्नाॅलाजी का अपने पक्ष में भरपूर इस्तेमाल कर रही हैं। ‘ई-मेल‘ के मुकाबले ‘ई-पोस्ट‘ के माध्यम से डाक विभाग ने डिजिटल डिवाइड को भी कम करने की मुहिम छेड़ी है। आखिरकार अपने देश में इंटरनेट प्रयोक्ता महज 7 फीसदी हंै। आज डाकिया सिर्फ सिर्फ पत्र नहीं बांटता बलिक घरों से पत्र इकट्ठा करने और डाक-स्टेशनरी बिक्री का भी कार्य करता है। समाज के हर सेक्टर की जरूरतों के मुताबिक डाक-विभाग ने डाक-सेवाओं का भी वर्गीकरण किया है, मसलन बल्क मेलर्स के लिए बिजनेस पोस्ट तो कम डाक दरों के लिए बिल मेल सेवा उपलब्ध है। पत्रों के प्रति क्रेज बरकरार रखने के लिए खुश्बूदार डाक-टिकट तक जारी किए गए हैं। आई0टी0 के इस दौर में चुनौतियों का सामना करने के हेतु डाक विभाग अपनी ब्रांडिंग भी कर रहा है। ‘प्रोजेक्ट एरो‘ के तहत डाकघरों का लुक बदलने से लेकर काउंटर सेवाओं, ग्राहकों के प्रति व्यवहार, सेवाओं को समयानुकूल बनाने जैसे तमाम कदम उठाए गए हैं। इस पंचवर्षीय योजना में डाक घर कोर बैंकिंग साल्यूशन के तहत एनीव्हेयर, एनी टाइम, एनीब्रांच बैंकिंग भी लागू करने जा रहा है। सिम कार्ड से लेकर रेलवे के टिकट और सोने के सिक्के तक डाकघरों के काउंटरों पर खनकने लगे हैं और इसी के साथ डाकिया डायरेक्ट पोस्ट के तहत पम्फ्लेट इत्यादि भी घर-घर जाकर बांटने लगा है। पत्रों की मनमोहक दुनिया अभी खत्म नहीं हुई है। तभी तो अन्तरिक्ष-प्रवास के समय सुनीता विलियम्स अपने साथ भगवद्गीता और गणेशजी की प्रतिमा के साथ-साथ पिताजी के हिन्दी में लिखे पत्र ले जाना नहीं भूलती। हसरत मोहानी ने यूँ ही नहीं लिखा था-

लिक्खा था अपने हाथों से जो तुमने एक बार।
अब तक हमारे पास है वो यादगार खत ।।

(विश्व डाक दिवस पर लिखा यह लेख आकाशवाणी पोर्टब्लेयर से प्रसारित)

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

अस्तित्व के लिए जूझते अंडमान के आदिवासी

भारत सरकार ने 29 सितम्बर को 10 आदिवासियों को 12 अंकों वाली विशिष्ट पहचान संख्या सौंप कर बहुचर्चित ‘आधार‘ परियोजना के शुभारंभ की घोषणा की। पर यह हैरतअंगेज है कि जिसे हर भारतीय की पहचान के लिए पहल रूप में देखा जा रहा है उससे अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह के आदिवासी महरूम रहेंगे। दुनिया की सबसे पुरानी जनजातियों में शामिल यहाँ के आदिवासियों को सरकार का यह बयान मानो चिढ़ाता है कि विशिष्ट संख्या जारी करना नए आधुनिक भारत का संकेत देता है। हर आदिवासी के मन में यह सवाल उठता है कि क्या वे आधुनिक भारत नहीं बल्कि पाषणकालीन भारत के अवशेष हैं। आखिर सरकार इनके कल्याण के लिए क्यों नहीं सोचती ?

ग्रेट अंडमानीज जिन्होंने कभी अंग्रेज हुकूमत को ललकारा था, आज 43 पर सिमट गए हैं। ओंगी (96), जारवा (240), शोम्पेन (398) व सेंटीनली की संख्या मात्र 39 बची है। सरकार इन्हें भोजन दे रही है, पर यह भोजन ही उनके शरीर का क्षय कर रही है। आखिर बैठे-बैठे भोजन किसे अच्छा नहीं लगता, पर इस भोजन ने उनकी शिकार-प्रवृत्ति को ख़त्म कर काफी हद तक कमजोर भी बना दिया है. इसी के साथ उनके अन्दर तमाम रोगों और बुराइयों का भी प्रवेश हो रहा है, नतीजन संक्रमणकालीन अवस्था के बीच वे रोज अपनी जिंदगी के दिन गिन रहे हैं. इनमें से सेंटीनली आदिवासियों से तो अभी आत्मीय संपर्क तक नहीं हो सका है। जारवा लोगों के कौतुहल का केंद्र-बिंदु बने हुए हैं और इनके नाम पर पर्यटन का धंधा भी अच्छा चल रहा है। सुबह और शाम वे पोर्टब्लेयर से बाराटांग जानी वाली रोड के किनारे खड़े होकर पर्यटकों से बिस्कुट और अन्य खाने की वस्तुओं की मांग करते हैं। लोग गाड़ियाँ रोकते हैं, जारवाओं को खाद्य-सामग्री व कभी-कभी कपड़े देते हैं और बदले में उनकी तस्वीरों को कैद कर लेते हैं। अभी भी पाषाण काल में जी रहे जारवा कई बार पें-पे (पैसे ) की मांग भी करते हैं और न मिलने पर कैमरा इत्यादि लेकर भाग जाते हैं। जारवा-महिलाएं सजधजकर सड़कों के किनारे छुपी रहती हैं और मौका पाकर अचानक गाड़ियों पर झपट्टा मारकर खाद्य-सामग्री लेकर जंगलों में कूद जाती हैं। समस्या यह है कि जारवा मुख्यधारा में तो आना चाहते हैं, पर सरकार उन्हें उनकी सीमाओं में ही कैद रखना चाहती है। अचूक निशानेबाजी उनका लक्षण है पर उनके इलाके के बीच दौड़ रही सड़क और तथाकथित सभ्य जन उन्हें भयभीत करते हैं। पेट की भूख शांत करने के लिए वे पर्यटकों के सामने हाथ फैलाते हैं तो पर्यटक उनकी फोटोग्राफ कैद करने के लिए लालची बना रहे हैं।

पता नहीं सरकारों को कब समझ आएगा कि अण्डमान-निकोबार के आदिवासी भी आधुनिक भारत का अंग हैं। द्वीपों में अक्सर विदेशियों द्वारा घुसपैठ बढ़ रही है, डर लगता है कहीं वे इन्हें भी न बरगलाने लगें। मुख्यभूमि के आदिवासियों पर नक्सलवाद-माओवाद के आरोप लगाए जा रहे हैं, शुक्र है यहाँ के आदिवासी इन सबसे बचे हुए हैं। पर उनकी लगातार अनदेखी कठिनाईयाँ भी पैदा कर सकती हैं। शिकार के अभाव में कमजोर होते इन आदिवासियों की जनसंख्या वैसे भी विलुप्त होने के कगार पर है, पर हर भारतीय की पहचान के लिए पहल करती सरकार यदि इनकी पहचान व अस्तित्व-रक्षा के लिए भी प्रबंध करती तो बेहतर होता। अन्यथा, अभी तक तो ये उस आधुनिक भारत से कोसों दूर हैं, जहाँ प्रतीकात्मक रूप में आदिवासियों के नाम पर हो रही हलचल को समझने का प्रयास किया जा रहा है।

दुर्भाग्यवश अण्डमान-निकोबार के आदिवासियों को मतदान का अधिकार भी नहीं है। वे भारतीय संविधान में 18 वर्ष से ऊपर की आयु के हर व्यक्ति को मतदान के अधिकार के अपवाद हैं....? यदि समय रहते सरकार ने इन्हें मुख्यधारा से जोड़कर इनका वाजिब हक नहीं दिया तो फिर इन्हें भी गलत रास्तों पर जाने से रोकना दुःस्साध्य होगा।

(चित्र में सड़क किनारे कड़ी जारवा महिला और हाथ में बिस्कुट और तीर-धनुष लिए जारवा पुरुष)

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

हे राम...


गुजरात-दंगों के दौरान यह कविता मैंने लिखी थी. गौरतलब है कि गुजरात, गाँधी जी की जन्मस्थली भी है. आज गाँधी-जयंती पर इसे ही यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ-

एक बार फिर
गाँधी जी खामोश थे
सत्य और अहिंसा के प्रणेता
की जन्मस्थली ही
सांप्रदायिकता की हिंसा में
धू-धू जल रही थी
क्या इसी दिन के लिए
हिन्दुस्तान व पाक के बंटवारे को
जी पर पत्थर रखकर स्वीकारा था!
अचानक उन्हें लगा
किसी ने उनकी आत्मा
को ही छलनी कर दिया
उन्होंने ‘हे राम’ कहना चाहा
पर तभी उन्मादियों की एक भीड़
उन्हें रौंदती चली गई।

बुधवार, 22 सितंबर 2010

सूरज और दीया


एक कहानी सुनी थी
सूरज ने पूछा
मेरे बाद
कौन देगा प्रकाश
एक टिमटिमाते
दीये ने कहा
मैं दूँगा।

पर देखता हूँ
इस समाज में
लोगों का झुण्ड चला जाता है
कंधों से कंधा टकराते
हर कोई सूरज की
पहली किरण को
लेना चाहता है
अपने आगोश में
पर नहीं चाहता वह
नन्हा दीया बनना
जो सूरज के बाद भी
दे सके प्रकाश।

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

भूमण्डलीकरण के दौर में हिन्दी के बढ़ते कदम

भूमण्डलीकरण, उदारीकरण, उन्नत प्रौद्योगिकी एवं सूचना-तकनीक के बढ़ते इस युग में सबसे बड़ा खतरा भाषा, साहित्य और संस्कृति के लिए पैदा हुआ है। इतिहास साक्षी है कि जब-जब समाज पथभ्रमित हुआ है या अपसंस्कृति हावी हुयी है तो साहित्य ने ही उसे संभाला है। कहा भी गया है कि- ‘‘साहित्य समाज का दर्पण है।’’ साहित्य का सम्बन्ध सदैव संस्कृति से रहा है और हिन्दी भारतीय संस्कृति की अस्मिता की पहचान है। संस्कृत वाग्डमय का पूरा सांस्कृतिक वैभव हिन्दी के माध्यम से ही आम जन तक पहुँचा है। हिन्दी का विस्तार क्षेत्र काफी व्यापक रहा है, यहाँ तक कि उसमें संस्कृत साहित्य की परंपरा और लोक भाषाओं की वाचिक परम्परा की संस्कृति भी समाविष्ट रही है। स्वतंत्रता संग्राम में भी हिन्दी और उसकी लोकभाषाओं ने घर-घर स्वाधीनता की जो लौ जलायी वह मात्र राजनैतिक स्वतंत्रता के लिए ही नहीं थी, वरन् सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा के लिए भी थी। भारत में साहित्य, संस्कृति और हिन्दी एक दूसरे के दर्पण रहे हैं ऐसा कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा।

यदि हम व्यवहारिक धरातल पर बात करें तो हिन्दी सदैव से राजभाषा, मातृभाषा व लोकभाषा रही है पर दुर्भाग्य से हिन्दी कभी भी राजपे्रयसी नहीं रही। स्वतंत्रता आंदोलन में जनभाषा के रूप में लोकप्रियता, विदेशी विद्वानों द्वारा हिन्दी की अहमियत को स्वीकारना, तमाम समाज सुधारकों व महापुरूषों द्वारा हिन्दी को राजभाषा/राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की बातें, पर अन्ततः संविधान सभा ने तीन दिनों तक लगातार बहस के बाद 14 सितम्बर 1949 को पन्द्रह वर्ष तक अंग्रेजी जारी रखने के परन्तुक के साथ ही हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। राष्ट्रभाषा के सवाल पर संविधान सभा में 300 से ज्यादा संशोधन प्रस्ताव आए। जी0 एस0 आयंगर ने मसौदा पेश करते हुए हिन्दी की पैरोकारी की पर अंततः कहा कि -‘‘हिन्दी आज काफी समुन्नत भाषा नहीं है। अंग्रेजी शब्दों के हिन्दी पर्याय नहीं मिल पाते।’’ यद्यपि हिन्दी के पक्ष में काफी सदस्यों ने विचार व्यक्त किए। पुरूषोतम दास टंडन ने अंग्रेज ध्वनिविज्ञानी इसाक पिटमैन के हवाले से कहा कि विश्व मंे हिन्दी ही सर्वसम्पन्न वर्णमाला है तो सेठ गोविन्द दास ने कहा कि- ‘‘इस देश में हजारों वर्षों से एक संस्कृति है। अतः यहाँ एक भाषा और एक लिपि ही होनी चाहिए।’’ आर0 वी0 धुलेकर ने काफी सख्त लहजे में हिन्दी की पैरवी करते हुए कहा कि- ‘‘मैं कहता हूँ हिन्दी राजभाषा है, राष्ट्रभाषा है। हिन्दी के राष्ट्रभाषा/राजभाषा हो जाने के बाद संस्कृत विश्व भाषा बनेगी। अंग्रेजों के नाम 15 वर्ष का पट्टा लिखने से राष्ट्र का हित साधन नहीं होगा।’’ स्वयं पं0 नेहरू ने भी हिन्दी की पैरवी में कहा था- ‘‘पिछले एक हजार वर्ष के इतिहास में भारत ही नहीं सारे दक्षिण पूर्वी एशिया में और केन्द्रीय एशिया के कुछ भागों में भी विद्वानों की भाषा संस्कृत ही थी। अंग्रेजी कितनी ही अच्छी और महत्वपूर्ण क्यों न हो किन्तु इसे हम सहन नहीं कर सकते, हमें अपनी ही भाषा (हिन्दी) को अपनाना चाहिए।’’

आज हिन्दी भारत ही नहीं वरन् पाकिस्तान, नेपाल बंाग्लादेश, इराक, इंडोनेशिया, इजरायल, ओमान, फिजी, इक्वाडोर, जर्मनी, अमेरिका, फ्रांस, ग्रीस, ग्वाटेमाला, सउदी अरब, पेरू, रूस, कतर, म्यंमार, त्रिनिदाद-टोबैगो, यमन इत्यादि देशों में जहाँ लाखों अनिवासी भारतीय व हिन्दी -भाषी हैं, में भी बोली जाती है। चीन, रूस, फ्रांस, जर्मनी, व जापान इत्यादि राष्ट्र जो कि विकसित राष्ट्र हंै की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी नहीं वरन् उनकी खुद की मातृभाषा है। फिर भी ये दिनों-ब-दिन तरक्की के पायदान पर चढ़ रहे हैं। विज्ञान और प्रौेद्योगिकी क्षेत्र में अंग्रेजी के बिना विकास नहीं हो पाने की अवधारणा को इन विकसित देशों ने परे धकेल दिया है।

यह एक कटु सत्य है कि आज वैश्विक स्तर पर हिन्दी को प्रतिष्ठा मिलने के बाद भी हिन्दी अपनों से ही उपेक्षित रही है। एक प्रतिष्ठित शख्सियत ने विदेशी मंच पर कहा कि-‘‘हिन्दी एक पिछड़ी भाषा है, यहाँ तक कि हिन्दी में रैट और माउस हेतु के अलग-अलग शब्द नही हैं।’’ इसी प्रकार प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य सैम पित्रोदा ने मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित राजेन्द्र सिंह द्वारा हिन्दी में दिए गए भाषण पर न केवल आपत्ति की बल्कि माफी भी माँगी। क्या यह माँ व प्रेयसी के द्वंद में असलियत जानते हुए भी प्रेयसी को ज्यादा भाव दिये जाने की सोच का परिचायक नहीं है कि प्रेयसीे कहीं मुझे पिछड़ा और गंवार न समझ ले? भारत की 70 प्रतिशत जनसंख्या गाँवों में रहती है और अभी भी भारत में अंग्रेजी-तहजीब वालों की गिनती अंगुलियों पर की जा सकती है। अधिकतर शहरी घरों में आज भी बच्चे भले ही अंग्रेजी भाषी स्कूलों में पढ़ते हांे, पर क्या वाकई वे अपने माता-पिता, रिश्तेदारों और मित्रों से अंग्रेजी मंे बातें करते हंै। निश्चिततः इन सबकेे पीछे ही छुपा है हिन्दी की उपेक्षा का भाव। असलियत तो यही है कि हम हिन्दी अपनाना चाहते हंै पर आड़े आता है, स्टेट्स सिम्बल और समाज की यह सोच कि हिन्दी रोजगार नहीं दिला सकती। राजनैतिक व प्रशासनिक नेतृत्व के शीर्ष की भाषा अंग्रेजी हो सकती है पर मध्यम व निचले पायदान पर हिन्दी या अन्य क्षेत्रीय भाषाएँ ही काबिज हैं। फील्ड में काम कर रहे तमाम अधिकारियों को भी लोगों से उनकी मातृभाषा मंे ही सम्वाद करना पड़ता है। हिन्दी को यदि उचित प्रतिष्ठा नहीं मिली है तो उसका एक अन्य प्रमुख कारण हिन्दी पर कुण्डली मारकर बैठे साहित्यकारों-प्रकाशकों-सम्पादकों का त्रिगुट है। अपना वर्चस्व न टूटनेे देने हेतु यह त्रिगुट नवागन्तुकों को हतोत्साहित करता है। पैसे व चमचागिरी की बदौलत एक अयोग्य व्यक्ति समाज में प्रतिष्ठा पाता है वहीं योग्य व्यक्ति अपनी रचनाएँ लेकर सम्पादकों और प्रकाशकों के दरवाजे भटकता रहता है। निश्चिततः हिन्दी के विकास में ऐसे कदम अवरोध उत्पन्न करते हैं।

निज भाषा उन्नति अहै, सब भाषन को मूल....... आज वाकई इस बात को अपनाने की जरूरत है। भूमण्डलीकरण एवं सूचना क्रांति के इस दौर में जहाँ एक ओर ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ बढ़ा है, वहीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियांे की नीतियों ने भी विकासशील व अविकसित राष्ट्रों की संस्कृतियों पर प्रहार करने की कोशिश की है। सूचना क्रांति व उदारीकरण द्वारा सारे विश्व के सिमट कर एक वैश्विक गाँव में तब्दील होने की अवधारणा में अपनी संस्कृति, भाषा, मान्यताओं, विविधताओं व संस्कारों को बचाकर रखना सबसे बड़ी जरूरत है। एक तरफ बहुराष्ट्रीय कम्पनियां जहाँ हमारी प्राचीन सम्पदाआंेें का पेटेंट कराने में जुटी हैं वहीं इनके ब्राण्ड-विज्ञापनों ने बच्चों व युवाओं की मनोस्थिति पर भी काफी प्रभाव डाला है, निश्चिततः इन सबसे बचने हेतु हमं अपनी आदि भाषा संस्कृत व हिन्दी की तरफ उन्मुख होना होगा। हम इस तथ्य को नक्कार नहीं सकते कि हाल ही में प्रकाशित आक्सफोर्ड अंग्रेजी शब्दकोष में हिन्दी के तमाम प्रचलित शब्दों, मसलन-आलू, अच्छा, अरे, देसी, फिल्मी, गोरा, चड्डी, यार, जंगली, धरना, गुण्डा, बदमाश, बिंदास, लहंगा, मसाला इत्यादि को स्थान दिया गया है तो दूसरी तरफ अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने राष्ट्रीय सुरक्षा भाषा कार्यक्रम के तहत अपने देशवासियों से हिन्दी, फारसी, अरबी, चीनी व रूसी भाषायें सीखने को कहा है। अमेरिका जो कि अपनी भाषा और अपनी पहचान के अलावा किसी को श्रेष्ठ नहीं मानता, हिन्दी सीखने में उसकी रूचि का प्रदर्शन निश्चिततः भारत के लिए गौरव की बात है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने स्पष्टतया घोषणा की कि- ‘‘हिन्दी ऐसी विदेशी भाषा है, जिसे 21 वीं सदी में राष्ट्रीय सुरक्षा और समृद्धि के लिए अमेरिका के नागरिकों को सीखनी चाहिए।’’ इसी क्रम में टेक्सास के स्कूलों में पहली बार ‘नमस्ते जी‘ नामक हिन्दी की पाठ्यपुस्तक को हाईस्कूल के छा़त्रों के लिए पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। 480 पेज की इस पुस्तक को भारतवंशी शिक्षक अरूण प्रकाश ने आठ सालों की मेहनत से तैयार की है। निश्चिततः भूमण्डलीकरण के दौर में दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र, सर्वाधिक जनसंख्या वाले राष्ट्र और सबसे बडे़ उपभोक्ता बाजार कीे भाषा हिन्दी को नजर अंदाज करना अब सम्भव नहीं रहा। प्रतिष्ठित अंग्रेजी प्रकाशन समूहों ने हिन्दी में अपने प्रकाशन आरम्भ किए हैं तो बी0 बी0 सी, स्टार प्लस, सोनी, जी0 टी0 वी0, डिस्कवरी आदि अनेक चैनलों ने हिन्दी में अपने प्रसारण आरम्भ कर दिए हैं। हिन्दी फिल्म संगीत तथा विज्ञापनों की ओर नजर डालने पर हमें एक नई प्रकार की हिन्दी के दर्शन होते हंै। यहाँ तक कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियांे के विज्ञापनों में अब क्षेत्रीय बोलियों भोजपुरी इत्यादि का भी प्रयोग होने लगा है और विज्ञापनों के किरदार भी क्षेत्रीय वेश-भूषा व रंग-ढंग में नजर आते हैं। निश्चिततः मनोरंजन और समाचार उद्योग पर हिन्दी की मजबूत पकड़ ने इस भाषा में सम्प्रेषणीयता की नई शक्ति पैदा की है पर वक्त के साथ हिन्दी को वैश्विक भाषा के रूप में विकसित करने हेतु हमें भाषाई शुद्धता और कठोर व्याकरणिक अनुशासन का मोह छोड़ते हुए उसका नया विशिष्ट स्वरूप विकसित करना होगा अन्यथा यह भी संस्कृत की तरह विशिष्ट वर्ग तक ही सिमट जाएगी। हाल ही मे विदेश मंत्रालय ने इसी रणनीति के तहत प्रति वर्ष दस जनवरी को ‘विश्व हिन्दी दिवस’ मनाने का निर्णय लिया है, जिसमें विदेशों मे स्थित भारतीय दूतावासों में इस दिन हिन्दी दिवस समारोह का आयोजन किया जाएगा। आगरा के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान में देश का प्रथम हिन्दी संग्रहालय तैयार किया जा रहा है, जिसमें हिन्दी विद्वानों की पाण्डुलिपियाँ, उनके पत्र और उनसे जुड़ी अन्य सामग्रियाँ रखी जायेंगी।

आज की हिन्दी वो नहीं रही..... बदलती परिस्थितियों में उसने अपने को परिवर्तित किया हैै। विज्ञान-प्रौद्योगिकी से लेकर तमाम विषयों पर हिन्दी की किताबें अब उपलब्ध हैं, क्षेत्रीय अखबारों का प्रचलन बढ़ा है, इण्टरनेट पर हिन्दी की बेबसाइटों में बढ़ोत्तरी हो रही है, सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कई कम्पनियों ने हिन्दी भाषा मंे परियोजनाएं आरम्भ की हंै। सूचना क्रांति के दौर में कम्प्यूटर पर हिन्दी में कार्य संस्कृति को बढ़ावा देने हेतु सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के प्रतिष्ठान सी-डैक ने निःशुल्क हिन्दी साफ्टवेयर जारी किया है, जिसमें अनेक सुविधाएं उपलब्ध हैं। माइक्रोसाफ्ट ने आॅफिस हिन्दी के द्वारा भारतीयों के लिए कम्प्यूटर का प्रयोग आसान कर दिया है। आई0 बी0 एम0 द्वारा विकसित साॅफ्टवेयर में हिन्दी भाषा के 65,000 शब्दों को पहचानने की क्षमता है एवं हिन्दी और हिन्दुस्तानी अंग्रेजी के लिए आवाज पहचानने की प्रणाली का भी विकास किया गया है जो कि शब्दों को पहचान कर कम्प्यूटर लिपिबद्ध कर देती है। एच0 पी0 कम्प्यूटरस एक ऐसी तकनीक का विकास करने में जुटी हुई है जो हाथ से लिखी हिन्दी लिखावट को पहचान कर कम्प्यूटर में आगे की कारवायी कर सके। चूँकि इण्टरनेट पर ज्यादातर सामग्री अंग्रेजी में है और अपने देश में मात्र 13 फीसदी लोगों की ही अंग्रेजी पर ठीक-ठाक पकड़ है। ऐसे में हाल ही में गूगल द्वारा कई भाषाओं में अनुवाद की सुविधा प्रदान करने से अंग्रेजी न जानने वाले भी अब इण्टरनेट के माध्यम से अपना काम आसानी से कर सकते हैं। अपनी तरह की इस अनोखी व पहली सेवा में हिन्दी, तमिल, तेलगू, कन्नड़ और मलयालम का अंग्रेजी में अनुवाद किया जा सकता है। यह सेवा इण्टरनेट पर www.google.in/translate_t टाइप कर हासिल की जा सकती है। हिन्दी के वेब पोर्टल समाचार, व्यापार, साहित्य, ज्योतिषी, सूचना प्रौद्योगिकी एवं तमाम जानकारियां सुलभ करा रहे हंै। यहाँ तक कि दक्षिण भारत में भी हिन्दी के प्रति दुराग्रह खत्म हो गया है। निश्चिततः इससे हिन्दी भाषा को एक नवीन प्रतिष्ठा मिली है।

- कृष्ण कुमार यादव

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

बिखरते शब्द


शंकर जी के डमरू से
निकले डम-डम अपरंपार
शब्दों का अनंत संसार
शब्द है तो सृजन है
साहित्य है, संस्कृति है
पर लगता है
शब्द को लग गई
किसी की बुरी नजर
बार-बार सोचता हूँ
लगा दूँ एक काला टीका
शब्द के माथे पर
उत्तर संरचनावाद और विखंडनवाद के इस दौर में
शब्द बिखर रहे हैं
हावी होने लगा है
उन पर उपभोक्तावाद
शब्दों की जगह
अब शोरगुल हावी है !!

- कृष्ण कुमार यादव

शनिवार, 4 सितंबर 2010

हिन्दी पखवाड़ा


सरकारी विभागों में सितम्बर माह के प्रथम दिवस से ही हिन्दी पखवाड़ा मनाना आरम्भ हो जाता है और हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) आते-आते बहुत कुछ होता जाता है। ऐसी ही कुछ भावनाओं को इस कविता में व्यक्त किया गया है-

एक बार फिर से
हिन्दी पखवाड़ा का आगमन
पुराने बैनर और नेम प्लेटें
धो-पोंछकर चमकाये जाने लगे
बस साल बदल जाना था

फिर तलाश आरम्भ हुई
एक अदद अतिथि की
एक हिन्दी के विद्वान
एक बाबू के
पड़ोस में रहते थे
सो आसानी से तैयार हो गये
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बनने हेतु

आते ही
फूलों का गुलदस्ता
और बंद पैक में भेंट
उन्होंने स्वीकारी
हिन्दी के राजभाषा बनने से लेकर
अपने योगदान तक की चर्चाकर डाली

मंच पर आसीन अधिकारियों ने
पिछले साल के
अपने भाषण में
कुछ काट-छाँट कर
फिर से
हिन्दी को बढ़ावा देने की शपथ ली
अगले दिन तमाम अखबारों में
समारोह की फोटो भी छपी

सरकारी बाबू ने कुल खर्च की फाइल
धीरे-धीरे अधिकारी तक बढ़ायी
अधिकारी महोदय ने ज्यों ही
अंग्रेजी में अनुमोदन लिखा
बाबू ने धीमे से टोका
अधिकारी महोदय ने नजरें उठायीं
और झल्लाकर बोले
तुम्हें यह भी बताना पड़ेगा
कि हिन्दी पखवाड़ा बीत चुका है !!

-- कृष्ण कुमार यादव

बुधवार, 1 सितंबर 2010

सृजनशील जीवन का संदेश देती कृष्ण जन्माष्टमी

जब-जब भी धरती पर अत्याचार बढ़ा है व धर्म का पतन हुआ है तब-तब भगवान ने पृथ्वी पर अवतार लेकर सत्य और धर्म की स्थापना की है। इसी कड़ी में भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में भगवान कृष्ण ने अवतार लिया। चूँकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे अतः इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी अथवा जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। इस दिन स्त्री-पुरुष रात्रि बारह बजे तक व्रत रखते हैं। इस दिन मंदिरों में झाँकियाँ सजाई जाती हैं और भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है।

पाप और शोक के दावानल से दग्ध इस जगती तल में भगवान ने पदार्पण किया। इस बात को आज पाँच सहस्र वर्ष हो गए। वे एक महान सन्देश लेकर पधारे। केवल सन्देश ही नहीं, कुछ और भी लाए। वे एक नया सृजनशील जीवन लेकर आए। वे मानव प्रगति में एक नया युग स्थापित करने आए। इस जीर्ण-शीर्ण रक्तप्लावित भूमि में एक स्वप्न लेकर आए। जन्माष्टमी के दिन उसी स्वप्न की स्मृति में महोत्सव मनाया जाता है। हम लोगों में जो इस तिथि को पवित्र मानते हैं कितने ऐसे हैं जो इस विनश्वर जगत में उस दिव्य जीवन के अमर-स्वप्न को प्रत्यक्ष देखते हैं?

श्रीकृष्ण गोकुल और वृन्दावन में मधुर-मुरली के मोहक स्वर में कुरुक्षेत्र युद्धक्षेत्र में (गीता रूप में) सृजनशील जीवन का वह सन्देश सुनाया जो नाम-रूप, रूढ़ि तथा साम्प्रदायिकता से परे है। रणांगण में अर्जुन को मोह हुआ। भाई-बन्धु, सुहृद-मित्र कुटुम्ब-परिवार, आचार-व्यवहार और कीर्ति अपकीर्ति ये सब नाम-रूप ही तो हैं। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इन सबसे उपर उठने को कहा, व्यष्टि से उठकर समष्टि में अर्थात सनातन तत्त्व की ओर जाने का उपदेश दिया। वही सनातन तत्त्व आत्मा है। 'तत्त्वमसि'!मनुष्य- ! तू आत्मा है ! परमात्मा प्राण है ! मोह रज्जु से बंधा हुआ ईश्वर है! चौरासी के चक्कर में पड़ा हुआ चैतन्य है! क्या यही गीता के उपदेश का सार नहीं है? मेरे प्यारे बन्धुओं! क्या हम और आप सभी सान्त से अनन्त की ओर नहीं जा रहे हैं। क्या तुम भगवान को खोजते हो? अपने हृदय वल्लभ की टोह में हो? यदि ऐसा है तो उसे अपने अन्दर खोजो। वहीं तुम्हें वह प्रियतम मिलेगा.

(कृष्ण-जन्माष्टमी पर्व पर शुभकामनायें. संयोगवश मेरा जन्म भी कृष्ण-जन्माष्टमी के दिन ही हुआ था और नाम भी उसी अनुरूप पड़ा. ऐसे में श्री कृष्ण भगवान के प्रति आसक्ति स्वाभाविक है....)

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

साहित्य की अनुपम दीपशिखा : अमृता प्रीतम

(आज अमृता प्रीतम जी की जयंती (31 अगस्त) है। अमृता प्रीतम मेरी मनपसंदीदा लेखिकाओं में से हैं. उन पर मेरा एक लेख आज ब्लागोत्सव 2010 में रविन्द्र प्रभात जी द्वारा प्रकाशित है. रविन्द्र जी का आभार. इस आलेख को यहाँ भी आप लोगों हेतु प्रस्तुत कर रहा हूँ।)


वह दिसम्बर की कड़कड़ाती सर्दियों की रात थी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उस समय मैं बी0ए0 कर रहा था कि अचानक दिल्ली से आए मेरे एक मित्र कमरे पर पधारे। छोटा सा कमरा और एक ही बेड...... सो संकोचवश मैंने मित्र से कहा कि आप आराम से सो जाइये, क्योंकि मेरी रात को पढ़ने की आदत है। कुछ ही देर में वे खर्राटे लेते नजर आये और मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा सोच रहा था कि, आखिर रात कैसे गुजारूं क्योंकि रात में पढ़ने का तो एक बहाना मात्र था। इसी उधेड़बुन में मेरी निगाह मित्र के बैग से झांकती एक किताब पर पड़ी तो मंैने उसे बाहर निकाल लिया और यह किताब थी- अमृता प्रीतम का आत्मकथ्यात्मक उपन्यास ‘रसीदी टिकट’। ‘रसीदी टिकट’ को पढ़ते हुए कब आँखों ही आँखों में रात गुजर गयी, पता ही नहीं चला। ईमानदारी के साथ स्वीकारोक्ति करूं तो फिर ‘रसीदी टिकट’ मेरी सहचरी बन गयी। तब से आज तक के सफर में जिंदगी न जाने कहाँ से कहाँ पहुँच गयी, पर ‘रसीदी टिकट’ अभी भी मेरी अमानत में सुरक्षित है।

अमावस पूर्व 31 अक्टूबर, 2005 की शाम ..... पटाखों के शोर के बीच अचानक टेलीविजन पर खबर देखी कि- अमृता प्रीतम नहीं रहीं। ऐसा लगा कोई अपना नजदीकी बिछुड़ गया हो। दूसरे कमरे में जाकर देखा तो मानो ‘रसीदी टिकट’ को भी अमृता जी के न रहने का आभास हो गया हो.... स्याह, उदास व गमगीन उस ‘रसीदी टिकट’ पर कब आँसू की एक बूंद गिरी, पता ही नहीं चला। ऐसा लगा मानो हम दोनों ही एक दूसरे को ढांढस बंधाने की कोशिश कर रहे हों।

1919 का दौर..... गाँधीजी के नेतृत्व में इस देश ने अंग्रेजी के दमनकारी रौलेट एक्ट का विरोध आरम्भ कर दिया था। ब्रिटिश सरकार की चूलें हिलती नजर आ रही थीं। इसी दौर में उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द ने, जो कि उस समय गोरखपुर में एक स्कूल में अध्यापक थे, एक अंग्रेज स्कूल इंस्पेक्टर को अपने घर के सामने सलाम करने से मना कर दिया। उनका तर्क था- “मैं जब स्कूल में रहता हूँ तब मैं नौकर हूँ बाद में अपने घर का बादशाह हूँ” ऐसे ही क्रांतिकारी दिनों में पंजाब के गुजराँवाला (अब पाकिस्तान में) में 31 अगस्त 1919 को अमृता प्रीतम का जन्म हुआ था। मात्र 11 वर्ष की अल्पायु में, जबकि उन्होंने दुनिया को अपनी नजरों से समझा भी नहीं था माँ का देहावसान हो गया। कड़क स्वभाव के लेखक पिता के सान्निध्य में अमृता का बचपन लाहौर में बीता और शिक्षा -दीक्षा भी वहीं हुयी। लेखन के प्रति तो उनका आकर्षण बचपन से ही था पर माँ की असमय मौत ने इसमें और भी धार ला दी। अपनी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ में उन्होंने माँ के अभाव को जिया है- “सोलहवां साल आया-एक अजनबी की तरह। घर में पिताजी के सिवाय कोई नहीं था- वह भी लेखक जो सारी रात जागते थे, लिखते थे और सारे दिन सोते थे। माँ जीवित होतीं तो शायद सोलहवां साल और तरह से आता- परिचितों की तरह, सहेलियों-दोस्तों की तरह, सगे-संबंधियों की तरह, पर माँ की गैरहाजिरी के कारण जिंदगी में से बहुत कुछ गैरहाजिर हो गया था। आस-पास के अच्छे-बुरे प्रभावों से बचाने के लिए पिताजी को इसी में सुरक्षा समझ में आई कि मेरा कोई परिचित न हो। न स्कूल की कोई लड़की, न पड़ोस का कोई लड़का।”

अमृता जी की प्रथम कविता इंडिया किरण में छपी तो प्रथम कहानी 1943 में कुंजियाँ में। मोहन सिंह द्वारा प्रकाशित पत्रिका पंज दरया ने अमृता की प्रारम्भिक पहचान बनाई। सन~ 1936 में अमृता की प्रथम किताब छपी। इससे प्रभावित होकर महाराजा कपूरथला ने बुजुर्गाना प्यार देते हुए दो सौ रूपये भेजे तो महारानी ने प्रेमवश पार्सल से एक साड़ी भिजवायी। इस बीच जीवन यापन हेतु 1937 में उन्होंने लाहौर रेडियो ज्वाइन कर लिया। जब देश आजाद हुआ तो उनकी उमz मात्र 28 वर्ष थी। वक्त के हाथों मजबूर हो वो उस पार से इस पार आयी और देहरादून में पनाह ली। इस बीच 1948 में वे उद्घोषिका रूप में आल इण्डिया रेडियो से जुड़ गयीं। पर विभाजन के जिस दर्द को अमृता जी ने इतने करीब से देखा था, उसकी टीस सदैव स्मृति पटल पर बनी रही और रचनाओं में भी प्रतिबिम्बित हुयी। बँटवारे पर उन्होंने लिखा- “पुराने इतिहास के भीषण अत्याचारी काण्ड हम लोगों ने भले ही पढ़े हुये थे, पर फिर तब भी हमारे देश के बंटवारे के समय जो कुछ हुआ, किसी की कल्पना में भी उस जैसा खूनी काण्ड नहीं आ सकता.... मैने लाशें देखी थीं लाशें जैसे लोग देखे थे।” बँटवारे की टीस और क्रंदन को वे कभी भी भुला नहीं पायीं। जिस प्रकार प्रणय-क्रीड़ा में रत क्रौंच पक्षी को व्याध द्वारा बाण से बींधने पर कौंची के करूण शब्द सुन विचलित वाल्मीकि अपने को रोक न पाये थे और बहेलिये को शाप दे दिया था, जो कि भारतीय संस्कृति का आदि “लोक बना, ठीक वैसे ही पंजाब की इस बेटी की आत्मा लाखों बेटियों की क्रंदन सुनकर बार-बार द्रवित होती जाती थी।....... और फिर यूं ही ट्रेन-यात्रा के दौरान उनके जेहन में वारिस भाह की ये पंक्तियाँ गूंज उठीं - भला मोए ते, बिछड़े कौन मेले.....। अमृता को लगा कि वारिस भाह ने तो हीर के दु:ख को गा दिया पर बँटवारे के समय लाखों बेटियों के साथ जो हुआ, उसे कौन गायेगा। फिर उसी रात चलती हुयी ट्रेन में उन्होंने यह कविता लिखी- "अज्ज आख्यां वारिस भाह नूँ, किते कबरां बिच्चों बोलते अज्ज किताबे-इश्क दा कोई अगला वरका खोल।इक रोई-सी धी पंजाब दी, तूं लिख-लिख मारे बैनअज्ज लक्खां धीयां रोंदियां, तैनूं वारिस भाह नूं कहन।"

यह कविता जब छपी तो पाकिस्तान में भी पढ़ी गयी। उस दौर में इसका इतना मार्मिक असर पड़ा कि लोग इस कविता को अपनी जेबों में रखकर चलते और एकांत मिलते ही निकालकर पढ़ते व रोते.......मानो यह उन पर गुजरी दास्तां को सहलाकर उन्हें हल्का करने की कोशिश करती। विभाजन के दर्द पर उन्होनें ‘पिंजर’ नामक एक उपन्यास भी लिखा, जिस पर कालान्तर में फिल्म बनी।

अमृता प्रीतम ने करीब 100 रचनायें रचीं, जिनमें कविता, कहानी, उपन्यास, यात्रा संस्मरण और आत्मकथा शामिल है ।उनकी रचनाओं में पाँच बरस लम्बी सड़क, उन्चास दिन, कोरे कागज, सागर और सीपियाँ , रंग का पत्ता, अदालत, डॉक्टर देव, दिल्ली की गलियाँ, हरदत्त का जिन्दगीनामा, पिंजर (उपन्यास), कहानियाँ जो कहानियाँ नहीं हैं, कहानियों के आँगन में, एक शहर की मौत, अंतिम पत्र, दो खिड़कियाँ, लाल मिर्च (कहानी संग्रह ), कागज और कैनवस, धूप का टुकड़ा, सुनहरे (कविता संग्रह ), एक थी सारा, कच्चा आँगन (संस्मरण), रसीदी टिकट, अक्षरों के साये में, दस्तावेज (आत्मकथा) प्रमुख हैं। अन्य रचनाओं में एक सवाल, एक थी अनीता, एरियल, आक के पत्ते,यह सच है, एक लड़की: एक जाम, तेरहवां सूरज, नागमणि, न राधा-न रूक्मिणी, खामोशी के आँचल में, रात भारी है, जलते-बुझते लोग, यह कलम-यह कागज-यह अक्षर, लाल धागे का रिश्ता इत्यादि प्रमुख हैं। उन्होंने पंजाबी कविता की अन्तराष्ट्रीय स्तर पर एक अलग पहचान कायम की पर इसके बावजूद वे पंजाबी से ज्यादा हिन्दी की लेखिका रूप में जानी जाती थीं। यहाँ तक कि विदेशों में भी उनकी रचनायें उतने ही मनोयोग से पढ़ी जाती थीं। एक समय में तो राजकपूर की फिल्में देखना और अमृता प्रीतम की कवितायें पढ़ना सोवियत संघ के लोगों का शगल बन गया था। अमृता जी की रचनाओं में साझी संस्कृति की विरासत को आगे बढ़ाने और समृद्ध करने का पुट शामिल था। सन~ 1957 में साहित्य अकादमी पुरस्कार ('सुनहरे’ कविता संकलन पर) पाने वाली वह प्रथम महिला रचनाकार बनीं तो 1958 में उन्हें पंजाब सरकार ने पंजाब अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया। 1982 में ‘कागज के केनवास’ के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया तो पद्मश्री और पद्मविभूषण जैसे सम्मान भी उनके आँचल में आए। 1973 में दिल्ली विश्वविद्यालय ने अमृता को डी0 लिट की आनरेरी डिग्री दी तो पिंजर उपन्यास के फ्रेंच अनुवाद को फ्रांस का सर्वश्रे’ठ साहित्य सम्मान भी प्राप्त हुआ। 1975 में अमृता के लिखे उपन्यास ‘धरती सागर और सीपियाँ’ पर कादम्बरी फिल्म बनी और कालान्तर में उनके उपन्यास ‘पिंजर’ पर चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने एक फिल्म का निर्माण किया। पचास के दशक में नागार्जुन ने अमृता की कई पंजाबी कविताओं के हिन्दी अनुवाद किए। अमृता प्रीतम राज्यसभा की भी सदस्य रहीं। विभाजन ने पंजाबी संस्कृति को बाँटने की जो कोशिश की थी, वे उसके खिलाफ सदैव संघर्ष करती रहीं और उसे कभी भी विभाजित नहीं होने दिया। पंजाबी साहित्य को समृद्ध करने हेतु वे ‘नागमणि’ नामक एक साहित्यिक मासिक पत्रिका भी निकालती थीं।

आज स्त्री विमर्श , महिला सशक्तिकरण , नारी स्वातंत्रय और लिव-इन-रिलेशनशिप जैसी जिन बातों को नारे बनाकर उछाला जा रहा है, अमृता जी की रचनाओं में वे काफी पहले ही स्थान पा चुकी थीं। शायद भारतीय भाषाओं में वह प्रथम ऐसी जनप्रिय लेखिका थीं, जिन्होंने पिंजरे में कैद छटपटाहट की कलात्मक अभिव्यक्तियों को मुखर किया। ज्वलंत मुद्दों पर जबरदस्त पकड़ के साथ-साथ उनके लेखन में विद्रोह का भी स्वर था। उन्होंने परम्पराओं को जिया तो दकियानूसी से उन्हें निजात भी दिलायी। आधुनिकता उनके लिए फैशन नहीं जरूरत थी। यही कारण था कि वे समय से पूर्व ही आधुनिक समाज को रच पायीं। ऐसा नहीं है कि इन सबके पीछे मात्र लिखने का जुनून था वरन~ बँटवारे के दर्द के साथ-साथ अपने व्यक्तिगत जीवन की रूसवाइयों और तन्हाइयों को भी अमृता जी ने इन रचनाओं में जिया। ‘अमृता प्रीतम’ शीर्षक से लिखी एक कविता में उन्होंने अपने दर्द को यूं उकेरा- एक दर्द था जो सिगरेट की तरह मैंने चुपचाप पिया है सिर्फ कुछ नज्में हैं - जो सिगरेट से मैंने राख की तरह झाड़ी हैं। कभी-कभी तो उनकी रचनाओं को पढ़कर समझ में ही नहीं आता कि वे किसी पात्र को जी रही हैं या खुद को। उन्होंने खुद के बहाने औरत को जिया और उसे परिवर्तित भी किया। ठेठ पंजाबियत के साथ रोमांटिसिज्म का नया मुहावरा गढ़कर दर्द को भी दिलचस्प बना देने वाली अमृता कहीं न कहीं सूफी कवियों की कतार में खड़ी नजर आती हैं। उनकी रचना ‘दिल्ली की गलियाँ’ में जब कामिनी नासिर की पेंटिग देखने जाती है तो कहती है- “तुमने वूमेन विद फ्लॉवर , वूमेन विद ब्यूटी या वूमेन विद मिरर को तो बड़ी खूबसूरती से बनाया पर वूमेन विद माइंड बनाने से क्यों रह गए।निश्चितत: यह वाक्य पुरुष वर्ग की उस मानसिकता को दर्शाता है जो नारी को सिर्फ भावों का पुंज समझता है, एक समग्र व्यक्तित्व नहीं। सिमोन डी बुआ ने भी अपनी पुस्तक ‘सेकेण्ड सेक्स’ में इसी प्रश्न को उठाया है। ‘लिव-इन-रिलेशनशिप एक ऐसा मुद्दा है जिस पर अमृता जी ने समय से काफी पहले ही लेखनी चलायी थी। अपनी रचना ‘नागमणि’ में अलका व कुमार के बहाने उन्होंने खुद को ही जिया है, जो बिना विवाह के एक अनजान गाँव में साथ रहते हैं और वह भी बिना किसी अतिरिक्त हक व अपराध-बोध के। स्वयं अमृता जी का जीवन भी ऐसी ही दास्तां थी। वे प्रेम के मर्म को जीना चाहती थीं, उसके बाहरी रूप को नहीं। इसीलिए तमाम आलोचनाओं की परवाह किए बिना उन्होंने अपने परम्परागत पति प्रीतम सिंह को तिलांजलि देकर चित्रकार इमरोज (असली नाम इन्द्रजीत ) को अपना हमसफर बनाया और आलोचनाओं का जवाब अपने लेखन को और भी धारदार बनाके दिया। नतीजन, भारत ही नहीं विश्व स्तर पर उनकी रचनाओं की मांग बढ़ने लगी।

विवाद और अवसाद अमृता के साथ बचपन से ही जुड़े रहे। माँ की असमय मौत ने उनके जीवन को अंदर तक झकझोर दिया था। इस घटना ने उनका इश्वर पर से विश्वास उठा दिया। जिन्दगी के अवसादों के बीच जूझते हुए उन्होंने कई महीनों तक मनोवैज्ञानिक इलाज भी कराया। डॉक्टर के ही कहने पर उन्होंने अपनी परेशानियों और सपनों को कागज पर उकेरना आरम्भ किया। इस बीच अमृता ने फोटोग्राफी , नृत्य, सितार वादन, टेनिस....... न जाने कितने शौकों को अपना राहगीर बनाया। उनका विवाह लाहौर के अनारकली बाजार में एक बड़ी दुकान के मालिक सरदार प्रीतम सिंह से हुआ पर वो भी बहुत दिन तक नहीं निभ सका। इस बीच शमा पत्रिका हेतु उनके उपन्यास डा0देव के इलेष्ट्रेशन बना रहे चित्रकार इमरोज से 1957 में मुलाकात हुयी और 1960 से वे साथ रहने लगे। इमरोज के बारे में अमृता ने लिखा कि- “मंैने अपने सपने को कभी उसके साथ जोड़कर नहीं देखा था, लेकिन यह एक हकीकत है कि उससे मिलने के बाद फिर कभी मैंने सपना नहीं देखा।” अपने उपन्यास ‘दिल्ली की गलियाँ’ में नासिर के रूप मेंं उन्होंने इमरोज को ही जिया था। अगर इमरोज के साथ उनका सम्बंध विवादों में रहा तो ‘हरदत्त का जिन्दगी नामा’ नाम के कारण ‘जिन्दगीनामा’ की लेखिका कृ’णा सोबती ने उनके विरूद्ध अदालत का दरवाजा भी खटखटाया। अपने अन्तिम दिनों में अमृता अतिशय आध्यात्मिकता, ओ”ाो प्रेम, मिस्टिसिज्म का शिकार हो गई थीं पर अन्तिम समय तक वे आशावान और उर्जावान बनी रहीं। अपने अन्तिम दिनों में उन्होंने इमरोज को समर्पित एक कविता ‘फिर मिलूंगी’ लिखी-

"तुम्हें फिर मिलूंगी

कहाँ? किस तरह? पता नहीं।

शायद तुम्हारी कल्पनाओं का चित्र बनकर

तुम्हारे कैनवस पर उतरूंगी

सर फिर तुम्हारे कैनवस के ऊपर

एक रहस्यमयी लकीर बनकर

खामोश तुम्हें ताकती रहूँगी।"

ऐसा था अमृता जी का जीवन...... एक ही साथ वे मानवतावादी, अस्तित्ववादी, स्त्रीवादी और आधुनिकतावादी थीं। जब विभाजन के दर्द को वे जीती हैं तो मानवतावादी, जब तमाम दुख-दर्दों और आलोचनाओं से परे स्वत:स्फूर्त वे स्व में से उद~भूत होती हैं तो अस्तित्ववादी, जब पुरुष की दकियानूसी मानसिकता पर चोट कर उसे स्त्री को समग्र व्यक्तित्व रूप में अपनाने की बात कहती हैं तो स्त्रीवादी एवं जब समय से आगे परम्पराओं के विपरीत अपने हमसफर को बिना किसी बंधन के समाज में स्वीकारती हैं तो आधुनिकतावादी रूप में उनका व्यक्तित्व सामने आता है। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा कि- “मरी हुयी मिटटी के पास, किसी जमाने में, लोग पानी के घड़े या सोने-चाँदी की वस्तुएं रखा करते थे। ऐसी किसी आव”यकता में मेरी कोई आस्था नहीं है-पर हर चीज के पीछे आस्था का होना आव”यक नहीं होता, चाहती हूँ इमरोज मेरी मिटटी के पास मेरा कलम रख दे।’’ पर किसे पता था कि साहित्य की यह अनुपम दीपशिखा एक दिन दीपावली की पूर्व संध्या पर अंधेरे में गुम हो जाएगी और छोड़ जाएगी एक अलौकिक शमां , जिसकी रोशनी में आने वाली पीढियां दैदीप्यमान होती रहेंगीं।

(इसे ब्लागोत्सव 2010 में भी पढ़ें )

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

तुम्हारी खामोशी


तुम हो
मैं हूँ
और एक खामोशी
तुम कुछ कहते क्यूँ नहीं
तुम्हारे एक-एक शब्द
मेरे वजूद का
अहसास कराते हैं
तुम्हारी पलकों का
उठना व गिरना
तुम्हारा होठों में ही
मंद-मंद मुस्कुराना
तुम्हारा बेकाबू होती
साँसों की धड़कनें
तुम्हारे शरीर की खुशबू
तुम्हारी छुअन का अहसास
सब कुछ
इस खामोशी को
झुठलाता है।

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

राखी का त्यौहार (बाल-गीत)



राखी का त्यौहार अनोखा
भाई-बहन का प्यार अनोखा

आओ भैया, आओ भैया
जल्दी से तुम हाथ बढ़ाओ

रंग-बिरंगी राखी लायी
अपने हाथों में बंधवाओ

करूँ आरती, तिलक लगाऊँ
और मिठाई तुम्हें खिलाऊँ

जल्दी से दे दो उपहार
बहना का है यह त्यौहार

भैया मेरे भूल न जाना
रक्षा का कर्तव्य निभाना।

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

कामनवेल्थ खेलों की अग्रदूत : क्वीन्स बैटन

भारत इस वर्ष 19 वें राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन कर रहा है। परंपरानुसार इसकी शुरूआत 29 अक्तूबर, 2009 को बकिंघम पैलेस, लंदन में महारानी एलिजाबेथ द्वितीय द्वारा भारत की राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल को क्वीन्स बैटन हस्तांतरित करके हुई। इसके बाद ओलम्पिक एयर राइफल चैंपियन, अभिनव बिंद्रा ने क्वीन विक्टोरिया माॅन्युमेंट के चारों ओर रिले करते हुए क्वीन्स बैटन की यात्रा शुरू की। क्वीन्स बैटन सभी 71 राष्ट्रमंडल देशों में घूमने के बाद 25 जून, 2010 को पाकिस्तान से बाघा बार्डर द्वारा भारत में पहुँच गई और उसे पूरे देश में 100 दिनों तक घुमाया जाएगा। इस बीच यह जिस भी शहर से गुजर रही है, वहाँ इसका रंगारंग कार्यक्रमों द्वारा स्वागत किया जा रहा है. गौरतलब है कि आस्ट्रेलिया के बाद भारत दूसरा देश है, जहाँ इसके सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में बैटन रिले ले जाया जा रहा है.

गौरतलब है कि सन् 1958 से प्रत्येक काॅमनवेल्थ खेलों का अग्रदूत रही क्वीन्स बैटन रिले इन खेलों की सर्वश्रेष्ठ परंपराओं में एक है। वस्तुतः ’रिले’, खेल और संस्कृति के इस चार वर्षीय उत्सव में राष्ट्रमंडल देशों के एकजुट होने का प्रतीक है। विगत वर्षों में, क्वीन्स बैटन रिले राष्ट्रमंडल देशों की एकता एवं अनेकता के सशक्त प्रतीक के रूप में विकसित हुआ है। प्रत्येक खेल के साथ, पैमाने और महत्व की दृष्टि से इस परम्परा का विस्तार हो रहा है एवं इसमें और देश और प्रतिभागी शामिल हो रहे हैं। दिल्ली 2010 बैटन रिले यात्रा को अब तक की सबसे बड़ी रिले यात्रा माना जा रहा है। इस बैटन को माइकल फाॅली ने डिजाइन किया है, जो नेशनल इंस्टिट्यूट आॅफ डिजाइन के स्नातक हैं। यह बैटन तिकोने आकार का अल्युमिनियम से बना हुआ है, जिसे मोड़ कर कुण्डली का आकार दिया गया है। इसे भारत के सभी क्षेत्रों से एकत्र विभिन्न रंगों की मिट्टी के रंगों से रंगा गया है। क्वीन्स बैटन को रूप प्रदान करने में विभिन्न रंगों की मिट्टी का इस्तेमाल पहली बार किया गया है। रत्नजड़ित बक्से में ब्रिटेन के महारानी के संदेश को रखा गया है और इस संदेश को प्राचीन भारतीय पत्रों के प्रतीक 18 कैरट सोने की पŸाी में लेजर से मीनिएचर के रूप में उकेरा गया है ताकि इसे आसानी से प्रयोग किया जा सके। क्वीन्स बैटन की रूपरेखा अत्यंत परिश्रम से तैयार की गई है। इसकी उंचाई 664 मिलीमीटर है, निचले हिस्से में इसकी चैड़ाई 34 मिलीमीटर है और ऊपरी हिस्से में इसकी चैड़ाई 86 मिलीमीटर है। इसका वजन 1,900 ग्राम है।

क्वीन्स बैटन अपने अंदर बहुत सी विलक्ष्ण विशेषताओं को समेटे हुए है, जिससे इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। मसलन, इसमें चित्र खींचने और ध्वनि रिकार्ड करने की क्षमता है तो इसमें ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) टेक्नोलाॅजी भी मौजूद है जिससे बैटन के स्थान की स्थिति हरदम प्राप्त की जा सकती है। यही नहीं इसमें जड़े हुए लाइट एमिटिंग डायोड (एलईडी) द्वारा जिस देश में बैटन ह,ै उस देश के झंडे के रंग में परिवर्तित हो जाता है। इसके अलावा यह टेक्स्ट मैसेजिंग क्षमता से लैस है ताकि लोग बैटन वाहकों को समूचे रिले के दौरान बधाई एवं प्रेरणादायक संदेश भेज सकें। यह अब तक की सबसे लंबी तकनीकी रूप से विकसित बैटन रिले भी है। गौरतलब है कि भारतीय डाक विभाग ने भी काॅमनवेल्थ खेल 2010 के अग्रदूत के रूप में बैटन के भारत में पहुंचने के उपलक्ष्य में इस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में दो स्मारक डाक टिकटों का सेट जारी किया है। एक सेट में बैटन का चित्र है और दूसरे में दिल्ली के इंडिया गेट की पृष्ठभूमि में गौरवान्वित शेरा को बैटन पकड़े हुए चित्रित किया गया है।



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पोर्टब्लेयर में भी पहुँची क्वींस बैटन रिले-


19 अगस्त 2010 को राष्ट्रमंडल खेलों की क्वींस बैटन रिले भारत के दक्षिणतम क्षोर अण्डमान निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर में भी चेन्नई से पहुंची, जहाँ सवेरे 7.45 बजे पोर्टब्लेयर हवाई अड्डे पर बैटन रिले का भव्य स्वागत किया गया. रिले औपचारिक रूप से शाम को 3 बजे ऐतिहासिक राष्ट्रीय स्मारक सेलुलर जेल परिसर से आरंभ हुई, जहाँ उपराज्यपाल (अवकाश प्राप्त ले0 जनरल) भूपेंद्र सिंह द्वारा इसका शुभारम्भ किया गया. सेलुलर जेल में बैटन का आगमन एक तरह से उन तमाम क्रांतिकारियों के प्रति श्रद्धांजलि भी थी, जिन्होंने इन्हीं चहारदीवारियों में रहकर आजाद भारत और उसकी तरक्की का सपना देखा था. अंडमान-निकोबार ओलम्पिक असोसिअशन के अध्यक्ष जी. भास्कर ने राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति के अतिरिक्त महानिदेशक (अवकाश प्राप्त ले0 जनरल) राज कड़ियान से क्वींस बैटन को प्राप्त कर इसे उपराज्यपाल को सौंपा और इसी के साथ विश्व-प्रसिद्ध ऐतिहासिक सेलुलर जेल और यहाँ एकत्र तमाम सैन्य व सिविल अधिकारी, खिलाडी और गणमान्य नागरिक इस पल के जीवंत गवाह बने. उपराज्यपाल ने प्रतीकात्मक रूप से कुछ देर दौड़ लगाकर इसे प्रथम धावक के रूप में मुख्य सचिव विवेक रे को सौंपा और फिर तो बढ़ते क़दमों के साथ कड़ियाँ जुडती ही गईं. वाकई इसे नजदीक से देखना एक सुखद अनुभव था. राष्ट्रीय स्मारक सेल्युलर जेल से शुरू होकर क्वींस बैटन रिले पोर्टब्लेयर के विभिन्न प्रमुख भागों - घंटाघर, माडल स्कूल, बंगाली क्लब, गोलघर, दिलानिपुर, फिनिक्स बे, लाइट हाउस सिनेमा, गाँधी प्रतिमा, अबरदीन बाजार, घंटाघर से होते हुए ऐतिहासिक नेताजी स्टेडियम पहुँचकर सम्पन्न हुई, जहाँ सांसद श्री विष्णुपद राय ने क्वींस बैटन को प्राप्त कर सक्षम अधिकारियों को सौंपा. इस शानदार अवसर पर बैटन रिले को यादगार बनाने के लिए जहाँ प्रमुख स्थलों पर तोरण द्वार स्थापित किये गए, वहीँ पोर्टब्लेयर के डा0 बी. आर. अम्बेडकर सभागार में सांस्कृतिक संध्या का भी आयोजन किया गया . यही नहीं अबर्दीन जेटी और रास द्वीपों के बीच जहाजों को रोशनियों से सजाया भी गया और पूरा पोर्टब्लेयर मानो रंगायमान हो उठा. रिले के दौरान भारी संख्या में स्कूली विद्यार्थी और नागरिक जन इसका स्वागत करते दिखे. रिले के दौरान द्वीपों के राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त खिलाड़ियों और अधिकारीयों के अलावा करीब 30 लोग बैटन धारक के रूप में इसे लेकर आगे बढ़ते रहे. पोर्टब्लेयर में क्वींस बैटन रिले का आगमन भारत की सांस्कृतिक विविधता को भी दर्शाता है, क्योंकि यहाँ देश के प्राय: सभी प्रान्तों के लोग बसे हुए हैं और इसका लोगों ने भरपूर लुत्फ़ उठाया. इसे नजदीक से देखना वाकई एक यादगार अनुभव रहा. क्वींस बैटन रिले के इस परिभ्रमण के साथ ही द्वीपवासियों और देशवासियों की शुभकामनायें भी इससे जुडती जा रही हैं और आशा की जानी चाहिए की 3 अक्तूबर, 2010 से दिल्ली में आरंभ होने वाले कामनवेल्थ गेम्स भी ऐतिहासिक होंगें और विश्व-पटल पर भारत को एक नई पहचान देंगें !!


शनिवार, 14 अगस्त 2010

समग्र रूप में देखें स्वाधीनता को

स्वतंत्रता की गाथा सिर्फ अतीत भर नहीं है बल्कि आगामी पीढ़ियों हेतु यह कई सवाल भी छोड़ती है। वस्तुतः भारत का स्वाधीनता संग्राम एक ऐसा आन्दोलन था, जो अपने आप में एक महाकाव्य है। लगभग एक शताब्दी तक चले इस आन्दोलन ने भारतीय राष्ट्रीयता की अवधारणा से संगठित हुए लोगों को एकजुट किया। यह आन्दोलन किसी एक धारा का पर्याय नहीं था, बल्कि इसमें सामाजिक-धार्मिक सुधारक, राष्ट्रवादी साहित्यकार, पत्रकार, क्रान्तिकारी, कांग्रेसी, गाँधीवादी इत्यादि सभी किसी न किसी रूप में सक्रिय थे।

1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम को अंग्रेज इतिहासकारों ने ‘सिपाही विद्रोह‘ मात्र की संज्ञा देकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि यह विद्रोह मात्र सरकार व सिपाहियों के बीच का अल्पकालीन संघर्ष था, न कि सरकार व जनता के बीच का संघर्ष। वस्तुतः इस प्रचार द्वारा उन्होंने भारत के कोने-कोने में पनप रही राष्ट्रीयता की भावना को दबाने का पूरा प्रयास किया। पर इसमें वे पूर्णतया कामयाब नहीं हुये और इस क्रान्ति की ज्वाला अनेक क्षेत्रों में एक साथ उठी, जिसने इसे अखिल भारतीय स्वरूप दे दिया। इस संग्राम का मूल रणक्षेत्र भले ही नर्मदा और गंगा के बीच का क्षेत्र रहा हो, पर इसकी गूँज दूर-दूर तक दक्षिण मराठा प्रदेश, दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों, गुजरात और राजस्थान के इलाकों और यहाँ तक कि पूर्वोत्तर भारत के खासी-जंैतिया और कछार तक में सुनाई दी। परिणामस्वरूप, भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन का यह प्रथम प्रयास पे्ररणास्रोत बन गया और ठीक 90 साल बाद भारत ने स्वाधीनता के कदम चूमकर एक नये इतिहास का आगाज किया।

भारतीय राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि आजादी के दीवानों का लक्ष्य सिर्फ अंग्रजों की पराधीनता से मुक्ति पाना नहीं था, बल्कि वे आजादी को समग्र रूप में देखने के कायल थे। भारतीय पुनर्जागरण के जनक कहे जाने वाले राजाराममोहन राय से लेकर भगतसिंह जैसे क्रान्तिकारी और महात्मा गाँधी तक ने एक आदर्श को मूर्तरूप देने का प्रयास किया। राजाराममोहन राय ने सती प्रथा को खत्म करवाकर नारी मुक्ति की दिशा में पहला कदम रखा, ज्योतिबाफुले व ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने शैक्षणिक सुधार की दिशा में कदम उठाए, स्वामी विवेकानन्द व दयानन्द सरस्वती ने आध्यात्मिक चेतना का जागरण किया, दादाभाई नौरोजी ने गरीबी मिटाने व धन-निकासी की अंग्रेजी अवधारणाओं को सामने रखा, लाल-बाल-पाल ने राजनैतिक चेतना जगाकर आजादी को अधिकार रूप में हासिल करने की बात कही, वीर सावरकर ने 1857 की क्रान्ति को प्रथम स्वाधीनता संग्राम के रूप में चिन्हित कर इसकी तुलना इटली में मैजिनी और गैरिबाल्डी के मुक्ति आन्दोलनों से व्यापक परिप्रेक्ष्य में की, भगत सिंह ने क्रान्ति को जनता के हित में स्वराज कहा और बताया कि इसका तात्पर्य केवल मालिकों की तब्दीली नहीं बल्कि नई व्यवस्था का जन्म है, महात्मा गाँधी ने सत्याग्रह व अहिंसा द्वारा समग्र भारतीय समाज को जनान्दोलनों के माध्यम से एक सूत्र में जोड़कर अद्वैत का विश्व रूप दर्शन खड़ा किया, पं0 नेहरू ने वैज्ञानिक समाजवाद द्वारा विचारधाराओं में सन्तुलन साधने का प्रयास किया, डा0 अम्बेडकर ने स्वाधीनता को समाज में व्याप्त विषमता को खत्म कर दलितों के उद्धार से जोड़ा....। इस आन्दोलन में जहाँ हिन्दू-मुसलमान एकजुट होकर लड़े, दलितों-आदिवासियों-किसानों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। तमाम नारियों ने समाज की परवाह न करते हुये परदे की ओट से बाहर आकर इस आन्दोलन में भागीदारी की।

स्वाधीनता का आन्दोलन सिर्फ इतिहास के लिखित पन्नों पर नहीं है, बल्कि लोक स्मृतियों में भी पूरे ठाठ-बाट के साथ जीवित है। तमाम साहित्यकारों व लोक गायकों ने जिस प्रकार से इस लोक स्मृति को जीवंत रखा है, उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। वैसे भी पिस्तौल और बम इन्कलाब नहीं लाते बल्कि इन्कलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है (भगत सिंह)। यह अनायास ही नहीं है कि अधिकतर नेतृत्वकर्ता और क्रान्तिकारी अच्छे विचारक, कवि, लेखक या साहित्यकार थे। तमाम रचनाधर्मियों ने इस ‘क्रान्ति यज्ञ’ में प्रेरक शक्ति का कार्य किया और स्वाधीनता आन्दोलन को एक नयी परिभाषा दी।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस बात की आवश्यकता है कि राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन के तमाम छुये-अनछुये पहलुओं को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाये और औपनिवेशिक पूर्वाग्रहों को खत्म किया जाये। इतिहास के पन्नों में स्वाधीनता आन्दोलन के साक्षात्कार और इसके गहन विश्लेषण के बीच आत्मगौरव के साथ-साथ उससे जुड़े सबकों को भी याद रखना जरूरी है। राजनैतिक स्वतन्त्रता से परे सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता भी सच्चे अर्थों में हमारा ध्येय होना चाहिए। इसी क्रम में युवा पीढ़ी को राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास से रूबरू कराना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए, पर उससे पहले इतिहास को पाठ्यपुस्तकों से निकालकर लोकाचार से जोड़ना होगा।

स्वतंत्रता दिवस की आप सभी को शुभकामनायें !!

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

अपने जन्मदिन के बहाने पुरानी यादें...



आज मेरा जन्मदिन है। वाकई इस दिन का महत्त्व भी है, आखिर यह दिन न होता तो फिर दुनिया में कैसे आते. जन्मदिन खुशियाँ भी देता है तो कई बार चिंता में भी डाल देता है कि एक साल और गुजर गए. खैर यही जीवन-चक्र है. आज भी स्कूल के वो दिन याद आते हैं, जब हम साथियों को टाफियाँ बाँटकर जन्म दिन मनाया करते थे। कई बार स्कूल की प्रातः सभा में यह ऐलान भी किया जाता कि आज फलां का जन्मदिन है। कई दोस्त तो सरप्राइज देने के लिए अपने हाथों से बना ग्रीटिंग कार्ड भी सामूहिक रूप से देते थे। जब हम जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर- आजमगढ़ में पढ़ते थे तो कुछ ऐसे ही बर्थडे मनाते थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए आये तो बर्थडे का मतलब होता-किसी थियेटर में जाकर बढ़िया फिल्म देखना और शाम को मित्रों के साथ जमकर चिकन-करी खाना। हर मित्र इन्तजार करता कि कब किसी का बर्थडे आये और उसे बकरा बनाया जाय। बर्थडे केक जैसी चीजें तो एक औपचारिकता मात्र होती। ऐसे दोस्त-यार बड़ी काम की चीज होते, जिनकी कोई गर्लफ्रेन्ड होती। ऐसे लोग बर्थडे की शोभा बढ़ाने के लिए जरूर बुलाये जाते। वो बन्धुवर तो हफ्तेभर पहले से ही दोस्तों को समझाता कि यार ध्यान रखना अपनी गर्लफ्रेण्ड के साथ आ रहा हूँ। मेरी इज्जत का जनाजा न निकालना। कुछ भी हो उन बर्थडे का अपना अलग ही मजा था।


जब सरकारी सेवा में आया तो बर्थडे का मतलब भी बदलता गया। बर्थडे बकायदा एक त्यौहार हो गया और उसी के साथ नये-नये शगल भी पालते गये। बर्थडे केक, रंग-बिरंगे गुब्बारे, खूबसूरत और मंहगे गिफ्ट, किसी फाइव स्टार होटल का लजीज डिनर और इन सबके बीच सुन्दर परिधानों मे सजा हुआ व्यक्तित्व...कब जीवन का अंग बन गया, पता ही नहीं चला। पहले कभी किसी मित्र या रिश्तेदार का जन्मदिन पर भेजा हुआ ग्रीटिंग कार्ड मिलता था तो बड़ी आत्मीयता महसूस होती थी, पर अब तो सुबह से ही एस0एम0एस0, ई-मेल, आरकुटिंग स्क्रैप्स की बौछार आ जाती है। कई लोग तो एक ही मैसेज स्थाई रूप से सेव किये रहते हैं, और ज्यों ही किसी का बर्थडे आया उसे फारवर्ड कर दिया। कभी एक अदद गुलाब ही बर्थडे के लिए काफी था पर अब तो फूलों का पूरा गुच्छा अर्थात बुके का जमाना है। अगली सुबह जब इन बुके को देखिये तो उनका मुरझाया चेहरा देखकर पिछला दिन याद आता है कि कितनी दिल्लगी से ये प्रस्तुत किये गये थे।

वाकई जन्मदिन भी बड़ी आत्मीय चीज है. कई बार यह मुड़कर देखने को मजबूर भी करती है कि पिछले सालों का लेखा-जोखा लिया जाय. पर कुछ भी हो, इस दिन से जुडी इतनी यादें जेहन में बसी हैं कि यह दिन कभी भी नहीं भूल पाता. आप सभी लोगों की आत्मीयता, प्यार और स्नेह हर दिन को और भी खुशनुमा बनाते हैं !!

शनिवार, 7 अगस्त 2010

पचमढ़ी की याद में : एक कविता

पचमढ़ी मेरी पसंदीदा जगहों में से है. वहां की कई बार सैर भी कर चूका हूँ. पहली बार तब जाना हुआ था, जब मैं भोपाल में ट्रेनिंग कर रहा था. उस समय पचमढ़ी के सौंदर्य पर मोहित होकर एक कविता लिखी थी-

पचमढ़ी
यानी पांडवों की पाँच मढ़ी
यहीं पांडवों ने अज्ञातवास किया
फिर छोड़ दिया इसे
सभ्यताओं की खोज तक दरकने हेतु।

पचमढ़ी
यहीं रची गई शंकर-भस्मासुर की कहानी
जिसमें विष्णु ने अंततः
नारी का रूप धरकर
स्वयं भस्मासुर को ही भस्म कर दिया
आज भी जीती - जागती सी
लगती हैं कंदरायें
जहाँ पर यह शिव - लीला चली।

पचमढ़ी
सतपुड़ा के घने जंगलों के बीच
मखमली घासों को चितवन से निहारते
बड़े - बड़े पहाड़ हाथ फैलाकर
मानो धरा को अपने आप में
समेट लेना चाहते हों।

बुधवार, 4 अगस्त 2010

पोर्टब्लेयर में प्रेमचन्द जयंती पर संगोष्ठी : रिपोर्ट

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द जी की 131 वीं जयंती पर अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर में हिंदी साहित्य कला परिषद् के तत्वाधान में संगोष्ठी का आयोजन किया गया. संगोष्ठी का विषय था- ''भूमंडलीकरण का वर्तमान सन्दर्भ और प्रेमचन्द का कथा साहित्य'' . संगोष्ठी का शुभारम्भ द्वीप-प्रज्वलन और प्रेमचन्द जी के चित्र पर माल्यार्पण द्वारा हुआ. मुख्या अतिथि के रूप में संगोष्ठी को संबोधित करते हुए चर्चित साहित्यकार और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि- प्रेमचन्द के साहित्य और सामाजिक विमर्श आज भूमंडलीकरण के दौर में भी उतने ही प्रासंगिक हैं और उनकी रचनाओं के पात्र आज भी समाज में कहीं न कहीं जिन्दा हैं। प्रेमचन्द जब अपनी रचनाओं में समाज के उपेक्षित व शोषित वर्ग को प्रतिनिधित्व देते हैं तो निश्चिततः इस माध्यम से वे एक युद्ध लड़ते हैं और गहरी नींद सोये इस वर्ग को जगाने का उपक्रम करते हैं। श्री यादव ने कहा कि प्रेमचन्द ने जिस दौर में सक्रिय रूप से लिखना शुरू किया, वह छायावाद का दौर था। निराला, पंत, प्रसाद और महादेवी जैसे रचनाकार उस समय चरम पर थे पर प्रेमचन्द ने अपने को किसी वाद से जोड़ने की बजाय तत्कालीन समाज में व्याप्त ज्वलंत मुद्दों से जोड़ा। राष्ट्र आज भी उन्हीं समस्याओं से जूझ रहा है जिन्हें प्रेमचन्द ने काफी पहले रेखांकित कर दिया था, चाहे वह जातिवाद या साम्प्रदायिकता का जहर हो, चाहे कर्ज की गिरफ्त में आकर आत्महत्या करता किसान हो, चाहे नारी की पीड़ा हो, चाहे शोषण और समाजिक भेद-भाव हो। कृष्ण कुमार यादव ने जोर देकर कहा कि आज प्रेमचन्द की प्रासंगिकता इसलिये और भी बढ़ जाती है कि आधुनिक साहित्य के स्थापित नारी-विमर्श एवं दलित-विमर्श जैसे तकिया-कलामों के बाद भी अन्ततः लोग इनके सूत्र किसी न किसी रूप में प्रेमचन्द की रचनाओं में ढूंढते नजर आते हैं.
हिंदी साहित्य कला परिषद्, पोर्टब्लेयर के अध्यक्ष आर० पी0 सिंह ने संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए कहा कि, प्रेमचंद से पहले हिंदी साहित्य राजा-रानी के किस्सों, रहस्य-रोमांच में उलझा हुआ था। प्रेमचंद ने साहित्य को सच्चाई के धरातल पर उतारा। आज भी भूमंडलीकरण के इस दौर में इस सच्चाई को पहचानने की जरुरत है. डा० राम कृपाल तिवारी ने कहा कि प्रेमचन्द की रचनाओं में किसान, मजदूर को लेकर जो भी कहा गया, वह आज भी प्रासंगिक है. उनका साहित्य शाश्वत है और यथार्थ के करीब रहकर वह समय से होड़ लेती नजर आती हैं. जयबहादुर शर्मा ने प्रेमचन्द के जीवन पर संक्षिप्त प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्होंने जीवन और कालखंड की सच्चाई को पन्ने पर उतारा। वे सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, जमींदारी, कर्जखोरी, गरीबी, उपनिवेशवाद पर आजीवन लिखते रहे। डी0 एम0 सावित्री ने कहा कि प्रेमचन्द का लेखन हिन्दी साहित्य की एक ऐसी विरासत है जिसके बिना हिन्दी का विकास संभव ही नहीं था। उन्होंने दूसरा विवाह अपनी प्रगतिशील परंपरा के अनुरूप बाल-विधवा शिवरानी देवी से करके एक नजीर गढ़ी. जगदीश नारायण राय ने प्रेमचन्द की कहानियों पर जोर देते हुए बताया कि वे उर्दू का संस्कार लेकर हिन्दी में आए थे और हिन्दी के महान लेखक बने। उनकी तुलना विश्व स्तर पर मैक्सिम गोर्की जैसे साहित्यकार से की जाती है. वे युग परिवर्तक के साथ-साथ युग निर्माता भी थे और आज भी ड्राइंग रूमी बुद्धिजीवियों की बजाय प्रेमचन्द की परम्परा के लेखकों की जरुरत है. संत प्रसाद राय ने कहा कि प्रेमचन्द भूमंडलीकरण के दौर में इसलिए भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि वर्षों पूर्व उन्होंने जिस समाज, गरीबी प्रथा के बारे में लिखा था वह आज भी देखने को प्राय: मिलती हैं.
द्वीप- लहरी के संपादक और परिषद् के साहित्य सचिव डा0 व्यासमणि त्रिपाठी ने कहा कि वे आम भारतीय के रचनाकार थे। उनकी रचनाओं में वे नायक हुए, जिसे भारतीय समाज अछूत और घृणित समझा था. उन्होंने सरल, सहज और आम बोल-चाल की भाषा का उपयोग किया और अपने प्रगतिशील विचारों को दृढ़ता से तर्क देते हुए समाज के सामने प्रस्तुत किया। इस ग्लैमर और उपभोक्तावादी संस्कृति में प्रेमचन्द की रचनाएँ आज भी जीवंत हैं क्योंकि वे आम आदमी की बाते करती हैं. अनिरुद्ध त्रिपाठी ने कहा कि प्रेमचन्द ने गांवों का जो खाका खिंचा, वह वैसा ही है. उनके चरित्र होरी, गोबर, धनिया आज भी समाज में दिख जाते हैं. भूमंडलीकरण की चकाचौंध से भी इनका उद्धार नहीं हुआ. परिषद् के प्रधान सचिव सदानंद राय ने कहा कि गोदान, गबन, निर्मला, प्रेमाश्रम जैसी उनकी रचनाएँ आज के समाज को भी उतना ही प्रतिबिंबित करती हैं. प्रेमचंद के कई साहित्यिक कृतियों का अंग्रेज़ी, रूसी, जर्मन सहित अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। यह उनकी विश्वस्तर पर लोकप्रियता का परिचायक है. कार्यक्रम का सञ्चालन डा0 व्यासमणि त्रिपाठी व धन्यवाद परिषद् के उपाध्यक्ष शम्भूनाथ तिवारी द्वारा किया गया।




(रिपोर्ट : डा0 व्यासमणि त्रिपाठी, संपादक-द्वीप लहरी, हिंदी साहित्य कला परिषद्, पोर्टब्लेयर)




इस रिपोर्ट को को सृजनगाथा, सहित्याशिल्पी, स्वतंत्र आवाज़, शब्दकार, पर भी पढ़ सकते हैं.

रविवार, 1 अगस्त 2010

आज का दिन दोस्तों के नाम...

आज फ्रैंडशिप-डे है, सो आज का दिन दोस्तों के नाम. इसी बहाने कुछ पुराने दोस्तों को फोन करके देखा जाय कि वे कहाँ हैं. जिंदगी की इस भागमभाग में दोस्ती के पैमाने भी बदल गए और उनके मायने भी. कई बार याद आते हैं स्कूल के वो दिन जब दोस्ती निभाने की बड़ी-बड़ी कसमें खाते थे, पर आज वो दोस्त कहाँ हैं पता ही नहीं. आर्कुट, फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स ने वर्चुअल दोस्तों की एक अच्छी-खासी फ़ौज खड़ी कर दी है, पर प्रोफाइल पर हाय-हेलो के अलावा शायद ही इसका कोई महत्त्व हो. यद्यपि इन सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स ने उन तमाम दोस्तों से जोड़ने में मदद अवश्य की है जो इधर-उधर बिखरे हुए हैं. खैर, अच्छी दोस्ती का कोई विकल्प नहीं और अच्छे दोस्त जीवन में बहुत कम मिलते हैं...सो, आज का दिन ऐसे ही दोस्तों के नाम !!

शनिवार, 31 जुलाई 2010

साहित्य से इतर भी प्रासंगिक हैं प्रेमचन्द के विचार

प्रेमचन्द सिर्फ साहित्यिक प्राणी ही नहीं थे बल्कि उनकी कलम सामाजिक विमर्श और तत्कालीन समस्याओं पर भी चली। प्रेमचन्द ने 19वीं सदी के अन्तिम दशक से लेकर 20वीं सदी के लगभग तीसरे दषक तक, भारत में फेैली हुई तमाम सामाजिक समस्याओं पर लेखनी चलायी। देश की स्वतन्त्रता के प्रति उनमें अगाध प्रेम था। चैरी-चैरा काण्ड के ठीक चार दिन बाद 16 फरवरी 1921 को पे्रमचन्द ने भी सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया । इसी प्रकार 11 अगस्त 1908 को जब 15 वर्षीय क्रान्तिकारी खुदीराम बोस को अंग्रेज सरकार ने निर्ममता से फांसी पर लटका दिया तो प्रेमचन्द के अन्दर का देशप्रेम हिलोरें मारने लगा और वे खुदीराम बोस की एक तस्वीर बाजार से खरीदकर अपने घर लाये और कमरे की दीवार पर टांग दिया। खुदीराम बोस को फांसी दिये जाने से एक वर्ष पूर्व ही उन्होंने ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’ नामक अपनी प्रथम कहानी लिखी थी, जिसके अनुसार- ‘खून की वह आखिरी बूँद जो देश की आजादी के लिये गिरे, वही दुनिया का सबसे अनमोल रतन है।’




प्रेमचन्द ने जिस दौर में सक्रिय रूप से लिखना शुरू किया, वह छायावाद का दौर था। निराला, पंत, प्रसाद और महादेवी जैसे रचनाकार उस समय चरम पर थे पर प्रेमचन्द ने अपने को किसी वाद से जोड़ने की बजाय तत्कालीन समाज में व्याप्त छुआछूत, साम्प्रदायिकता, हिन्दू- मुस्लिम एकता, दलितों के प्रति सामाजिक समरसता जैसे ज्वलंत मुद्दों से जोड़ा। एक लेखक से परे भी उनकी चिन्तायें थीं और उनकी रचनाओं में इसकी मुखर अभिव्यक्ति हुई है। उनकी कहानियों और उपन्यासों के पात्र सामाजिक व्यवस्थाओं से जूझते हंै और अपनी नियति के साथ-साथ भविष्य की इबारत भी गढ़ते हैं। नियति में उन्हें यातना, दरिद्रता व नाउम्मीदी भले ही मिलती हो पर अंततः वे हार नहीं मानते हंै और संघर्षों की जीजिवषा के बीच भविष्य की नींव रखते हैं। अपने वैयक्तिक जीवन के संघर्षों से प्रेमचन्द ने जाना था कि संघर्ष का रास्ता बेहद पथरीला है और मात्र संवेदनाओं व हृदय परिवर्तन से इसे नहीं पार किया जा सकता। यही कारण था कि प्रेमचन्द ऊपर से जितने उद्विग्न थे, अन्दर से उतने ही विचलित। वस्तुतः प्रेमचन्द एक ऐसे राष्ट््र-राज्य की कल्पना करते थे जिसमें किसी भी तरह का भेदभाव न हो- न वर्ण का, न जाति का, न रंग का और न धर्म का। प्रेमचन्द का सपना हर तरह की विषमता, सामाजिक कुरीतियों और साम्प्रदायिक-वैमनस्य से परे एक ऐसे राष्ट््र का निर्माण था जिसमें समता सर्वोपरि हो। प्रेमचन्द इस तथ्य को भली-भाँति जानते थे कि भारतीय समाज में विद्यमान पृथकता ही उपनिवेशवाद की जड़ रहा है। अंग्रेजों ने इस पृथकता व विषमता की खाई को और भी गहरा करने का प्रयास किया और भारत को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक व सांस्कृतिक सभी मोर्चों पर क्षति पहुँचायी। यही कारण है कि सन् 1933 में जब संयुक्त प्रान्त के गर्वनर मालकम हेली ने कहा कि- ‘‘ जहाँ तक भारत की मनोवृत्ति का हमंे परिचय है, यह कहना युक्तिसंगत है कि वह आज से 50 वर्ष बाद भी अपने लिये कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बना पाएगा, जो स्पष्ट रूप से बहुमत के लिये जवाबदेह हो।’’ प्रेमचन्द ने इसका कड़ा प्रतिवाद किया और लिखा कि- ‘‘जिनका सारा जीवन ही भारत की राष्ट््रीय आकांक्षाओं का दमन करते गुजरा है, उनका यह कथन उचित नहीं प्रतीत होता।’’



प्रेमचन्द ने छुआछूत की समस्या को दूर करना, सामाजिक समता के लिए महत्वपूर्ण बताया। परम्परागत वर्णाश्रम व्यवस्था के सम्बन्ध में उन्होंने लिखा कि- भारतीय राष्ट््र का आदर्श मानव शरीर है जिसके मुख, हाथ, पेट और पाँव- ये चार अंग हैं। इनमें से किसी भी अंग के अभाव या विच्छेदन से देह का अस्तित्व निर्जीव हो जाएगा। वे प्रश्न उठाते हैं कि यदि वर्णाश्रम व्यवस्था के पाँव माने जाने वाले शूद्रों का सामाजिक व्यवस्था से विच्छेदन कर दिया जाय तो इसकी क्या गति होगी? इसी आधार पर वे समाज में किसी भी प्रकार के छुआछूत का सख्त विरोध करते हैं। अपने एक लेख में वे लिखते हैं- ‘‘क्या अब भी हम अपने बड़प्पन का, अपनी कुलीनता का ढिंढोरा पीटते फिरेंगे। यह ऊँच-नीच, छोटे-बड़े का भेद हिन्दू जीवन के रोम-रोम में व्याप्त हो गया है। हम यह किसी तरह नहीं भूल सकते कि हम शर्मा हैं या वर्मा, सिन्हा हैं या चैधरी, दूबे हैं या तिवारी, चैबे हैं या पाण्डे, दीक्षित हैं या उपाध्याय। हम आदमी पीछे हैं, चैबे या तिवारी पहले और यह प्रथा कुछ इतनी भ्रष्ट हो गई है कि आज जो निरक्षर भट्टाचार्य है, वह भी अपने को चतुर्वेदी या त्रिवेदी लिखने में जरा भी संकोच नहीं करता।’’ प्रेमचन्द ने 1932 में महात्मा गाँधी द्वारा मैकडोनाल्ड अवार्ड द्वारा प्रस्तावित पृथक निर्वाचन के विरोध में किये गए आमरण अनशन का समर्थन किया और गाँधी जी के इन विचारों का भी समर्थन किया कि शेष हिन्दू समाज के लिये निर्वाचन की चाहे जितनी कड़ी शर्तंे लगा दी जायें पर दलितांे के लिये शिक्षा और जायदाद की कोई शर्त न रखी जाये और हरेक दलित को निर्वाचन का अधिकार हो। वस्तुतः प्रेमचन्द दलितांे को समाज का एक अभिन्न हिस्सा मानते थे, इसलिये वे उनकी पृथक पहचान के लिए सहमत नहीं थे। यही कारण था कि उन्होंने नागपुर में हरिजनों के लिये स्थापित पृथक छात्रावास व्यवस्था की भी आलोचना की। दलितों के सम्बन्ध में प्रेमचन्द द्वारा दिये गये उद्गारों से उन्हें ब्राह्मण विरोधी भी कहा गया पर प्रेमचन्द इसकी परवाह किये बिना हिन्दू समाज में व्याप्त विषमता की लगातार आलोचना करते रहे। उन्होंने दलितों के लिये काशी विश्वनाथ मंदिर के पट नहीं खोलने पर कहा कि- ‘‘विश्वनाथ किसी एक जाति या सम्प्रदाय के देवता नहीं हंै, वह तो प्राणी मात्र के नाथ हैं। उनपर सबका हक बराबर-बराबर का है।’’ शास्त्रों की आड़ में दलितों के मंदिर प्रवेश को पाप ठहराने वालों को जवाब देते हुए प्रेमचन्द ने ऐसे लोगों की विद्या-बुद्धि व विवेक पर सवाल उठाया और कहा कि- ‘‘विद्या अगर व्यक्ति को उदार बनाती है, सत्य व न्याय के ज्ञान को जगाती है और इंसानियत पैदा करती है तो वह विद्या है और यदि वह स्वार्थपरता व अभिमान को बढ़ावा देती है, तो वह अविद्या से भी बदतर है।’’ वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थकों द्वारा हिन्दू मंदिरों की दलितों से रक्षा करने के सन्दर्भ में वायसराय को सम्बोधित ज्ञापन की तीखी आलोचना करते हुए प्रेमचन्द ने वर्णाश्रम व्यवस्था समर्थकों पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए लिखा कि- ‘‘राष्ट््र की वर्तमान अधोगति हेतु ऐसे ही लोग जिम्मेदार हैं। दक्षिणा में अछूतों द्वारा दिए गये पैसे लेने में इन्हें कोई पाप नहीं दिखता पर किसी अछूत के मंदिर में प्रवेश मात्र से ही इनके देवता अपवित्र हो जाते हैं। यदि इनके देवता ऐसे निर्बल हैं कि दूसरों के स्पर्श से ही अपवित्र हो जाते हैं, तो उन्हें देवता कहना ही मिथ्या है। देवता तो वह है, जिसके सम्मुख जाते ही चांडाल भी पवित्र हो जाये।’’ प्रेमचन्द धर्म का उद्देश्य मानव मात्र की समता मानते थे एवं किसी भी प्रकार के विभेद को राष्ट््र के लिये अहितकर मानते थे। प्रेमचन्द का स्पष्ट मानना था कि- ‘‘हरिजनों की समस्यायें मंदिर प्रवेश मात्र से नहीं हल होने वाली। उनके विकास में धार्मिक बाधाओं से कहीं कठोर आर्थिक बाधायें है।’’

प्रेमचन्द ने साम्प्रदायिकता पर भी कलम चलायी। प्रेमचन्द ने स्पष्ट रूप से कहा कि हिन्दू-मुसलमान की आपसी शिकायतें मसलन- ‘‘मुसलमानों को यह शिकायत है कि हिन्दू उनसे परहेज करते हैं, अछूत समझते हैं, उनके हाथ का पानी नहीं पीना चाहते तो हिन्दुओं को शिकायत है कि मुसलमानों ने उनके मंदिर तोडे़, उनके तीर्थ स्थलों को लूटा, हिन्दू राजाओं की लड़कियाँ अपने महल में डालीं’’, जायज हो सकतीं हैं पर इस आधार पर साम्प्रदायिकता को उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने हिन्दू -मुसलिम एकता को ही स्वराज का दर्जा दिया पर दोनों सम्प्रदायों की विशिष्टताओं के साथ। उन्होने एक दूसरे के धर्म का परस्पर आदर करने पर जोर दिया और कहा कि- ‘‘हिन्दू और मुसलमान न कभी दूध और चीनी थे, न हांेगे और न होने चाहिये। दोनों की पृथक-पृथक सूरतें बनी रहनी चाहिये और बनी रहेंगी।’’ 1931 में मैकडोनाल्ड अवार्ड द्वारा दलितों के लिये पृथक निर्वाचन की व्यवस्था किये जाने पर मुसलमानों में भी पृथक और संयुक्त निर्वाचन पर बहस छिड़ी पर 19 अक्टूबर 1932 को लखनऊ में सम्पन्न हुए मुस्लिम सर्वधर्म सम्मेलन में पृथक निर्वाचन की अवधारणा को अस्वीकार कर दिया गया। इस पर टिप्पणी करते हुए प्रेमचन्द ने कहा कि राष्ट््रीयता ने पूना में प्रथम विजय पायी मगर लखनऊ में उसने जो विजय प्राप्त की है, उसने तो साम्प्रदायिकता को जैसे सुरंग में बारूद लगाकर उड़ा दिया हो।

प्रेमचन्द के राष्ट््र-राज्य में दलितों के साथ स्त्रियाँ और किसान समान भाव से मौजूद हैं, जिनके विकास के बिना भारत के विकास के कल्पना भी बेमानी है। स्त्रियों के साथ समाज में हो रहे दोयम व्यवहार का प्रेमचन्द ने कड़ा विरोध किया और अपनी रचनाओं में उसे स्वतंत्र व्यक्तित्व का दर्जा देते हुये, विकास की धुरी बनाया। इसी प्रकार प्रेमचन्द ने कृषक समुदाय को भारत की प्राणवायु बताया। कर्ज में डूबे किसान, उन पर ढाये जाते जुल्म, उनकी बद से बद्तर होती गरीबी, व्यवस्थागत विक्षोभ और किसानों की समस्याओं को किसी भी साहित्यकार ने उस रूप में नहीं उठाया, जिस प्रकार प्रेमचन्द ने उठाया। प्रेमचन्द का पूरा साहित्य ही दलित, स्त्री और किसान की लड़ाई का साहित्य है जिसमें समता, न्याय और सामाजिक परिवर्तन की घोषणा है। यहाँ धर्म, संस्कृति, रीति-रिवाज, जाति, वर्ण, ऊँच-नीच के लिये कोई जगह नहीं है, जगह है तो सिर्फ मानवता की- जिसके बिना जीवित रहना ही अकारथ है।



प्रेमचन्द एक ऐसे राष्ट््र -राज्य का सपना देखते थे जो समतावादी समाज पर आधारित हो। यहाँ तक कि जब काशी में उन्होंने सरस्वती प्रेस खोला तो कर्मचारियों को रोज कुछ न कुछ देना ही पड़ता पर उतनी आय नहीं होने से सबकी माँग रोज पूरी नहीं हो पाती थी। ऐसे में प्रेमचन्द सबके सामने रोज शाम को आमदनी का हिसाब रख देते और कहते-‘‘इतने पैसों में तुम्हीं लोग अपने और मेरे लिये ब्योंत कर दो, मुझे पान-तम्बाकू और इक्का-भाड़ा-भर देकर बाकी आपस में बाँट लो।’’ वस्तुतः प्रेमचन्द के चिन्तन और व्यवहार में समरसता और साहचर्य महत्वपूर्ण है, केन्द्र-बिन्दु बनना नहीं। यही कारण है कि ऐसे लोग जो आन्दोलनों का केन्द्र-बिन्दु बनकर स्वंय के लिये कुर्सी हथियाना चाहते हैं, प्रेमचन्द उन्हें बाधा नजर आते हैं। उनके उपन्यास ‘रंगभूमि’ की प्रतियाँ जलाने वाले वर्गीय संरचनाओं की जटिलता और यंत्रणादायी व्यवस्था के स्तर को नहीं समझना चाहते, सिर्फ निश्चित फाॅर्मूलों में निबद्ध दलित आत्मकथाओं व घृणित प्रतिक्रियाओं पर आधारित रचनाओं को ही दलित लेखन समझते हैं तो इसमें प्रेमचन्द का क्या दोष? प्रेमचन्द ने राष्ट््रीयता को पारिभाषित करते हुए लिखा कि- ‘‘हम जिस राष्ट््रीयता की परिकल्पना कर रहे हैं, उसमें जन्मगत वर्ण व्यवस्था की गंध तक नहीं होगी। वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न हरिजन, न क्षत्रिय, न कायस्थ। उसमें सभी भारतवासी हांेगे, सभी ब्राह्मण होंगे या सभी हरिजन होंगे।’’ प्रेमचन्द की समतावादी व्यवस्था में दलित बेहतरी के हकदार हैं, किसी के दयाभावी न्याय के नहीं। प्रेमचन्द ने अपनी कहानियों के पात्रों के बारे में एक बार कहा था कि- ‘‘हमारी कहानियों में आपको पदाधिकारी, महाजन, वकील और पुजारी गरीबों का खून चूसते हुए दिखेंगे और गरीब किसान, मजदूर, अछूत और दरिद्र उनके आघात सहकर भी अपने धर्म और मनुष्यता को हाथ से न जाने देंगे, क्योंकि हमने उन्हीं में सबसे ज्यादा सच्चाई और सेवा भाव पाया है।’’



प्रेमचन्द ने 19वीं सदी के अन्तिम दशक से लेकर 20वीं सदी के लगभग तीसरे दशक तक, भारत में फेैली हुई तमाम सामाजिक समस्याओं पर लेखनी चलायी। चाहे वह किसानों-मजदूरों एवं जमींदारों की समस्या हो, चाहे छुआछूत अथवा नारी-मुक्ति का सवाल हो, चाहे नमक का दरोगा के माध्यम से समाज में फैले इंस्पेक्टर-राज का जिक्र हो, कोई भी अध्याय उनकी निगाहों से बच नहीं सका। प्रेमचन्द ने हिन्दी कथा साहित्य को एक नया मोड़ दिया, जहाँ पहले साहित्य मायावी भूल-भुलैयों में पड़ा स्वप्नलोक और विलासिता की सैर कर रहा था, ऐसे में प्रेमचन्द ने कथा साहित्य में जनमानस की पीड़ा को उभारा। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो0 विपिन चन्द्र ने एक बार टिप्पणी की थी-‘‘यदि कभी बीसवीं शताब्दी में आजादी के पूर्व किसानों की हालत के बारे में इतिहास लिखा जाएगा तो इतिहासकार का प्राथमिक स्त्र्रोत होगा प्रेमचंद का ‘गोदान’, क्योंकि इतिहास कभी भी अपने समय के साहित्य को ओझल नहीं करता।’’ गोदान मात्र किसान की संघर्ष गाथा नहीं है वरन् इसमें स्त्री की बहुरूपात्मक स्थिति को दर्शाते हुए उसकी संघर्ष गाथा को भी चित्रित किया गया है। गोदान में अभिव्यक्त गोबर व झुनिया के बीच अवैध प्रेम और विवाह, सिलिया चमाइन और मातादीन पण्डित का प्रेम-प्रसंग जहाँ परम्परा में सेंध लगाते हैं और स्त्री को मुक्त करते हैं वहीं मेहता से प्रेम करते वाली मालती मलिन बस्तियों में मुफ्त दवा बाँट कर सामाजिक कार्यकत्रीे के रूप में नजर आती है तो क्लब - संस्कृति के बहाने वह जीवन का द्वैत भी जीती है। मेहता और मालती का प्रेम एक प्रकार से लिव - इन - रिलेशनशिप का उदाहरण है। ‘गोदान’ ने प्रेमचन्द को हिन्दी साहित्य में वही स्थान दिया जो रूसी साहित्य में ‘मदर’ लिखकर मैक्सिम गोर्की को मिला। ‘सेवा सदन’ में एक वेश्या के बहाने प्रेमचन्द्र ने धर्म के नाम पर चलने वाले अनाथालयों एवं पाखण्डों का भण्डाफोड़ किया है। ‘कर्मभूमि’ में मुन्नी द्वारा बलात्कारी सिपाही की हत्या स्त्री-मुक्ति के संघर्ष का अनूठा साक्ष्य है। यही कारण है कि पे्रमचन्द को हर शख्स अपने करीब पाता है और अलग-अलग रूप में उनकी व्याख्या करता है । असहयोग आन्दोलन के कारण गाँधी जी से प्रभावित होकर सरकारी नौकरी से इस्तीफा देने के कारण किसी ने उन्हें गाँधीवादी कहा तो अपनी रचनाओं में वर्ग-संघर्ष को प्रमुखता से उभारने के कारण उन्हंे साम्यवादी अथवा वामपंथी कहा गया तो समाज में छुआछूत व दलितों की स्थिति पर लेखनी चलाने के कारण उन्हें दलित समर्थक कहा गया और नारी-मुक्ति को प्रश्रय देने के कारण उन्हंे नारी-समर्थक कहा गया।

साहित्य से इतर सामाजिक विमर्शों पर प्रेमचन्द के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं और उनकी रचनाओं के पात्र आज भी समाज में कहीं न कहीं जिन्दा हैं। प्रेमचन्द जब अपनी रचनाओं में समाज के उपेक्षित व शोषित वर्ग को प्रतिनिधित्व देेते हैं तो निश्चिततः इस माध्यम से वे एक युद्ध लड़ते हैं और गहरी नींद सोये इस वर्ग को जगाने का उपक्रम करते हैं। राष्ट््र आज भी उन्हीं समस्याओं से जूझ रहा है जिन्हें प्रेमचन्द ने काफी पहले रेखांकित कर दिया था, चाहे वह जातिवाद या साम्प्रदायिकता का जहर हो, चाहे कर्ज की गिरफ्त में आकर आत्महत्या करता किसान हो, चाहे नारी की पीड़ा हो, चाहे शोषण और सामाजिक भेद-भाव हो। इन बुराईयों के आज भी मौजूद होने का एक कारण यह है कि राजनैतिक सत्तालोलुपता के समानान्तर हर तरह के सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक आन्दोलन की दिशा नेतृत्वकर्ताओं को केन्द्र-बिन्दु बनाकर लड़ी गयी जिससे मूल भावनाओं के विपरीत आन्दोलन गुटों में तब्दील हो गये एवं व्यापक व सक्रिय सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा कुछ लोगों की सत्तालोलुपता की भेंट चढ़ गयी।

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

खुशियों का दिन : जन्मदिन आकांक्षा का





आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण है हमारे लिए। आज ही के दिन ईश्वर ने हमारी जीवन साथी आकांक्षा जी को इस दुनिया में भेजा था. वैसे कभी सोचा है कि हर किसी के लिए ईश्वर एक न एक पसंद बनाकर रखते हैं. तभी तो कहते हैं शादियाँ स्वर्ग में तय होती हैं. मैं भी शादी से पहले इसे नहीं मानता था, तब लगता था सफलता मिलेगी, अच्छे रिश्ते आपने आप मिलेंगे. खैर मैं सौभाग्यशाली लोगों में था. सरकारी सेवा में आने के 9 साल बाद , अब भी किस ऐसे मित्रों को देखता हूँ जो सौभाग्यशाली नहीं हैं. 2-3 साल पहले तो अपने एक मित्र जो एक जिला के कलेक्टर भी थे, शादी के लिए बहुत परेशान थे. चूँकि उनकी ऊंचाई थोड़ी कम थी, सो कोई अपनी आगामी पीढियां उस तरह की नहीं देखना चाहता था. भाई जी दिन भर कलेक्टरी करते और शाम को शादी के सपने देखते....जब सलेक्सन हुआ था तो दरवाजे पर लाल-नीली बत्तियों वालों का हुजूम था, पर जनाब तो टरकाते गए अभी दो साल बाद. दो साल बाद दो रिजल्ट निकल चुके थे और कुंवारी लड़कियों की शादी हो गई. भाई साहब फ्लैश-बैक में चले गए. अब जाकर कहीं एक लड़की ढूंढ़ पाए हैं....ऐसे न जाने कितने वाकये समाज में हैं. पर वो लोग नसीब वाले हैं जिन्हें जीवन साथी के रूप में अच्छे लोग मिलते हैं. मैं भी अपने को उनमें से एक समझता हूँ और सौभाग्यवश आज मेरी जीवन-संगिनी आकांक्षा जी का जन्म-दिन भी है. दिन भी बढ़िया है, दो दिन की छुट्टियाँ और हाँ, आज तो सैलरी-डे भी था. फिर क्या सोचना, ईश्वर मेहरबान हैं. पत्नी आकांक्षा और बिटिया अक्षिता को जितनी खुशियाँ दे सकूँ...वही आज की उपलब्धि होगी. वैसे भी खुशियों को सेलिब्रेट करने का बहाना चाहिए और आज तो इतनी बड़ी ख़ुशी का दिन है. दस दिन बाद मेरा भी जन्मदिन है...सो, यह खुशियाँ चलती रहें !!






(हम दोनों का यह चित्र बिटिया अक्षिता (पाखी) ने लिया है)

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

सावन आया झूम के....

सावन मास की अपनी महत्ता है। सावन आज 27 जुलाई से आरंभ हो गया और 24 अगस्त तक रहेगा। सावन मास को श्रावण भी कहा जाता है। यह महीना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दौरान भक्ति, आराधना तथा प्रकृति के कई रंग देखने को मिलते हैं। श्रावण मास त्रिदेव और पंच देवों में प्रधान भगवान शिव की भक्ति को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि इस मास में विधिपूर्वक शिव उपासना करने से मनचाहे फल की प्राप्ति होती है। पौराणिक मान्यता है कि देव-दानव द्वारा किए गए समुद्र मंथन से निकले हलाहल यानि जहर का असर देव-दानव सहित पूरा जगत सहन नहीं कर पाया। तब सभी ने भगवान शंकर से प्रार्थना की। भगवान शंकर ने पूरे जगत की रक्षा और कल्याण के लिए उस जहर को पीना स्वीकार किया। विष पीकर शंकर नीलकंठ कहलाए। मान्यता है कि भगवान शंकर ने विष पान से हुई दाह की शांति के लिए समुद्र मंथन से ही निकले चंद्रमा को अपने सिर पर धारण किया। यह भी धार्मिक मान्यता है कि इस विष के प्रभाव को शांत करने के लिए भगवान शंकर ने गंगा को अपनी जटाओं में स्थान दिया। इसी धारणा को आगे बढ़ाते हुए भगवान शंकराचार्य ने ज्योर्तिलिंग रामेश्वरम पर गंगा जल चढ़ाकर जगत को शिव के जलाभिषेक का महत्व बताया।


शास्त्रों के अनुसार भगवान शंकर ने समुद्र मंथन से निकले विष का पान श्रावण मास में ही किया था। धार्मिक दृष्टि से यही कारण है कि इस मास में शिव आराधना का विशेष महत्व है। यह काल शिव भक्ति का पुण्य काल माना जाता है। शिव भक्तों द्वारा पूरी श्रद्धा, भक्ति और आस्था के साथ भगवान शिव की पूजा-अर्चना, अभिषेक, जलाभिषेक, बिल्वपत्र सहित अनेक प्रकार से की जाती है। इस काल में शिव की उपासना भौतिक सुखों को देने वाली होती है। व्यावहारिक रुप से देखें तो भगवान शंकर द्वारा विष पीकर कंठ में रखना और उससे हुई दाह के शमन के लिए गंगा और चंद्रमा को अपनी जटाओं और सिर पर धारण करना इस बात का प्रतीक है कि मानव को अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए। खास तौर पर कटु वचन से बचना चाहिए, जो कंठ से ही बाहर आते हैं और व्यावहारिक जीवन पर बुरा प्रभाव डालते हैं। किंतु कटु वचन पर संयम तभी हो सकता है, जब व्यक्ति मन को काबू में रखने के साथ ही बुद्धि और ज्ञान का सदुपयोग करे। शंकर की जटाओं में विराजित गंगा ज्ञान की सूचक है और चंद्रमा मन और विवेक का। गंगा और चंद्रमा को भगवान शंकर ने उसी स्थान पर रखा है जहां मानव का भी विचार केन्द्र यानि मस्तिष्क होता है।


सावन मास के दौरान ही कई प्रमुख त्योहार जैसे- हरियाली अमावस्या, नागपंचमी तथा रक्षा बंधन आदि भी आते हैं। सावन में प्रकृति अपने पूरे शबाब पर होती है इसलिए यह भी कहा जाता कि यह महीना प्रकृति को समझने व उसके निकट जाने का है। सावन की रिमझिम बारिश और प्राकृतिक वातावरण बरबस में मन में उल्लास व उमंग भर देती है। सावन में ही महिलाएं कजरी-गायन कर खूब रंग बिखेरती हैं. सावन का महीना पूरी तरह से शिव तथा प्रकृति को समर्पित है. तो आप भी हर-हर महादेव के जयकारे के साथ गाइए- सावन आया झूम के !!

बुधवार, 21 जुलाई 2010

लघु कथा : माँ /तारा निगम

मांमाँमाँ           
माँ ने बच्चे को खाना दिया, और जल्दी-जल्दी काम में लग गयी, बच्चे से बोली- बेटा, जल्दी खाले, मुझे आफिस जाना है।

 चीं चीं चीं की आवाज से बच्चे का ध्यान ट्यूबलाइट पर बैठी चिडिया पर गया, वो मुंह में दाना दबाये थी और घोंसले से बच्चे चोंच निकालकर चीं चीं चीं कर रहे थे, चिडिया ने मुंह का दाना बारी-बारी से बच्चों के मुंह में डाल दिया और फिर से दाना लेने उड गयी।

 बच्चे ने मां को दिखाया, देखो मां, चिडिया कैसे प्यार से अपने बच्चों को दाना ला लाकर खिला रही है। काश! मैं भी चिडिया का बच्चा होता!

((तारा निगम जी की यह लघुकथा पिछले दिनों दैनिक जागरण में पढ़ी थी. पसंद आई, सो यहाँ पर भी प्रस्तुत कर रहा हूँ.)

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

रूपये का चेहरा अब बदला-बदला सा

आपने रूपये का चेहरा देखा. कितना अजीब लगता था कि दुनिया की इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था के पास अपने रूपये का कोई चिन्ह तक नहीं है. खैर अमेरिकी डालर, जापानी येन, ब्रिटिश पौंड स्टलि’ग और यूरोपीय संघ के यूरो की तरह अब भारतीय रुपये को भी अपना चिह्न मिल गया है. केबिनेट ने कल रुपये के चिन्ह को मंजूरी दे दी। यह चिह्न भारतीय रुपए को विभिन्न भाषाओं में एक ही तरह से पेश करने में भी सहायक होगा। इससे भारतीय रुपए की पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका और इंडोनेशिया जैसे देशों की मुद्राओं से अलग पहचान बनेगी, जहाँ रुपया या रुपइया चलता है. भारतीय रूपये के इस इस चिन्ह को ‘यूनीकोड मानक, आईएसओ-आईईसी 10646 और आईएस 13194’ में शामिल करने के बाद इसका इस्तेमाल भारत और भारत के बाहर किया जा सकेगा।
गौरतलब है कि इसके लिए तीन हजार एंट्रीज आई थी, जिसमें पांच को चुना गया था। आईआईटी के पोस्ट ग्रेजुएट डी उदय कुमार द्वारा डिजाइन किये गये चिन्ह को पांच प्रविष्टियों में चुना गया। यह चिन्ह हिन्दी का अक्षर ‘र’ है, जिसमें एक समानान्तर लाइन और डाली गयी है। यह अंग्रेजी के अक्षर ‘आर’ से भी काफी मिलता जुलता है। इसकी खूबसूरती पर हर कोई दंग है. अभिनेत्री सोनम कपूर के शब्दों पर गौर करें-''यह बहुत खूबसूरत है, यह भविष्योन्मुखी और भारतीयता से भरा है, यह आधुनिक भारत की तरह लगता है।’'

रूपये के इस नए चिन्ह को व्यावहारिक रूप में इस्तेमाल करने के लिए काफी तकनिकी पहलुओं से भी गुजरना पड़ेगा. चिह्न की एनकोडिंग के बाद नैसकॉम रुपए को सॉफ्टवेअर में शामिल करने के लिए भारतीय सॉफ्टवेअर विकास कंपनियों से संपर्क साधेगा ताकि दुनिया भर में कंप्यूटर इस्तेमाल करने वाले लोग इसका आसानी से उपयोग कर सकें, भले ही यह चिह्न कीबोर्ड पर न बना हो। गौरतलब है कि यूरो का निशान भारत में इस्तेमाल होने वाले कीबोर्ड में नहीं है लेकिन उसका इस्तेमाल होता है। भारत में बनने वाले कीबोर्ड में इस चिह्न को शामिल करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी निर्माता एसोसिएशन चिह्न की अधिसूचना जारी होने के बाद इसे कीबोर्ड में शामिल करने की पहल भी करेगा।रूपये के इस चिहन के इस्तेमाल के लिए भले ही लोग प्रोत्साहित हो रहे हैं, पर रूपये के निशान को भारतीय मानकों में एन्कोड करने की प्रक्रिया में छह महीने लगेगा जबकि यूनीकोड और अन्य मानकों में ऐसा करने के लिए अभी डेढ से दो साल का वक्त लगेगा । चिह्न को भारतीय मानकों में शामिल करने के लिए भारतीय मानक ब्यूरो की मौजूदा सूची में भी संशोधन करना होगा। इंडियन स्क्रिप्ट कोड फॉर इन्फॉरमेशन इंटरचेंज के तहत रुपए का चिह्न शामिल करना होगा. आईएससीआईआई ही कंप्यूटर प्रोसेसिंग के लिए कीबोर्ड ले-आउट सहित भारतीय भाषाओं के विभिन्न कोड की व्याख्या करता है।फ़िलहाल इंतजार रहेगा इस चिन्ह को वास्तविक रूप में आँखों से देखने और महसूस करने का.

सोमवार, 12 जुलाई 2010

भगवान को पाती

आपने वो वाली कहानी तो सुनी ही होगी, जिसमें एक किसान पैसों के लिए भगवान को पत्र लिखता है और उसका विश्वास कायम रखने के लिए पोस्टमास्टर अपने स्टाफ से पैसे एकत्र कर उसे मनीआर्डर करता है. दुर्भाग्यवश, पूरे पैसे एकत्र नहीं हो पाते और अंतत: किसान डाकिये पर ही शक करता है कि उसने ही पैसे निकाल लिए होंगे, क्योंकि भगवान जी कम पैसे कैसे भेज सकते हैं।



सवाल आस्था से जुड़ा हुआ है. कहते हैं आस्था में बड़ी ताकत होती है. अपनी आस्था प्रदर्शित करने के हर किसी के अपने तरीके हैं. कुछ लोग शांति के साथ पूजा करते हैं, तो कुछ मंत्रोच्चार के साथ अथवा भजन गाकर। लेकिन उड़ीसा के खुर्दा जिले में एक मंदिर ऐसा भी है, जहाँ लोग ईश्वर को पत्र लिखकर अपनी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए आराधना करते हैं। भुवनेश्वर से 50 किलोमीटर दूर यह मंदिर हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे का भी प्रतीक है। गुंबद पर जहाँ अर्द्धचंद्राकार कृति है, वहीं चक्र भी बना हुआ है।



इस मंदिर में पत्र लिखने की परंपरा की शुरुआत कब हुई, इसकी जानकारी तो किसी को नहीं है, लेकिन ऐसी मान्यता है कि पत्र लिखकर आप कोई इच्छा व्यक्त करते हैं, तो आपकी मनोकामना पूरी होगी। आपकी जो भी मनोकामना हो उसे लिख डालें और फिर उसे मंदिर की दीवार पर लगा दें। 17 वीं शताब्दी के इस बोखारी बाबा के मंदिर में प्रतिदिन हजारों लोग पहुंचते हैं। इसे सत्य पीर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ हिन्दू और मुस्लिम दोनों संप्रदाय के लोग पहुंचते हैं।



इस मंदिर की खासियत यह है कि यहाँ का पुजारी मुसलमान है, लेकिन दूध, और केले से बने भोग को हिन्दू तैयार करते हैं। यहाँ के धांदू महापात्र बड़े गर्व से बताए हैं कि हमारा परिवार पीढ़ियों से मंदिर में फूल पहुंचाता रहा है और अब मैं भी उसी परंपरा का निर्वाह कर रहा हूँ. यह स्थल सांप्रदायिक सद्भाव की जीती-जागती मिसाल है। यहाँ मुस्लिम श्रद्धालु चादर चढ़ाते हैं तो हिन्दू श्रद्धालु पुष्प अर्पित करते हैं। मंदिर के पुजारी सतार खान बताते हैं कि इस मंदिर में विभिन्न धर्मों के लोग आतें हैं।वे यहाँ कागज के टुकड़े पर अपनी मनोकामना लिखते हैं और फिर उसे दीवार पर लगा देते हैं। जब उनकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है तो दोबारा आते हैं और बोखारी बाबा को चादर अथवा फूल चढ़ाते हैं। उन्होंने कहा कि जो श्रद्धालु यहाँ आने में असमर्थ होते हैं, वे यहाँ पत्र भेज देते हैं और हम उसे दीवार पर लगा देते हैं। वाकई हम 21 वीं सदी में विज्ञानं के बीच भले ही जी रहे हों, पर ईश्वरीय आस्था जस की तस कायम है. यही हमारी परम्परा है, आस्था है, संस्कृति है...!!

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

पाश्चात्य नहीं खुद के अन्दर झांकें

भारतीय संस्कृति की एक अक्षुण परम्परा है. दुनिया के प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद, वेदों की एक लाख श्रुतियों, उपनिषदों के ज्ञान, महाभारत के राजनैतिक दर्शन, गीता की समग्रता, रामायण के रामराज्य, पौराणिक जीवन दर्शन एवं भागवत दर्शन से लेकर संस्कृति के तमाम अध्याय और योग जैसी विधाओं के जनक भारत की उसी संस्कृति को आज पाश्चात्य संस्कृति से खतरा बताया जा रहा है. जिस योग की महिमा आज पूरे दुनिया में गई जा रही है, वह भारत की ही देन है. योगासनों का सबसे पहले उल्लेख पतंजलि योग सूत्र में मिलता है जिसकी रचना करीब दो हजार साल पहले हुई थी। हम योग को भले ही भुला बैठे पर पश्चिमी देशों ने उसे लपक लिया. यहाँ तक कि अमेरिका में प्राचीन भारतीय विद्या योग के आसनों के करीब 150 पेटेंट, 2,000 ट्रेडमार्क और 150 काॅपीराइट करा लिए गए हैं। यही नहीं अमेरिकी और यूरोप के पेटेंट कार्यालयों में योगासनों पर पेटेंट कराने के 250 दावे अब भी लंबित हैं।

वस्तुतः हम भारतीय अपनी परम्परा, संस्कृति, ज्ञान और यहाँ तक कि महान विभूतियों को तब तक खास तवज्जो नहीं देते जब तक विदेशों में उसे न स्वीकार किया जाये। यही कारण है कि आज यूरोपीय राष्ट्रों और अमेरिका में योग, आयुर्वेद, शाकाहार, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, होम्योपैथी और सिद्धा जैसे उपचार लोकप्रियता पा रहे हैं जबकि हम उन्हें बिसरा चुके हैं। हमें अपनी जड़ी-बूटियों, नीम, हल्दी और गोमूत्र का ख्याल तब आता है जब अमेरिका उन्हें पेटेंट करवा लेता है। योग को हमने उपेक्षित करके छोड़ दिया पर जब वही ‘योगा’ बनकर आया तो हम उसके दीवाने बने बैठे हैं। अब जब योरोप और अमेरिका में योगासनों का धड़धड़ पेटेंट कराया जा रहा है, तो भारत को अपनी धरोहर का ख्याल आया और इसके बाद आरम्भ हुआ योग की संस्कृत भाषा की शब्दावली को विभिन्न विदेशी भाषाओं में अनुवाद करने का ताकि हम जोर देकर कह सकें कि योग विदेशों का नहीं बल्कि हमारी संस्कृति का अंग है। अब डिपार्टमेन्ट आफ आयुर्वेद, योग और नैचुरोपैथी, यूनानी, सिद्ध तथा होम्योपैथी के साथ मिलकर मोरारजी देसाई नेशनल इंस्टीट्यिूट आफ योग एवं पुणे का केवल धाम मिलकर योग के विभिन्न आसनों और योगिक क्रियाओं के संस्कृत नामों का अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मनी सहित पाँच भाषाओं में अनुवाद कर रहे हैं। यही नहीं इससे सतर्क हुई भारत सरकार अब आसनों की वीडियोग्राफी करा रही है जिन्हें अमेरिकी और यूरोप के पेटेंट, कार्यालयों को मुहैया कराया जाएगा ताकि और नुकसान रोका जा सके. पारंपरिक ज्ञान डिजीटल लाइब्रेरी (TKDL) द्वारा 900 योगासनों की वीडियोग्राफी कर उन्हें डिजीटल रूप दिया जा रहा रहा है। इनमें दो हजार वर्ष पुराने पंतजलि योग सूत्र, भगवद् गीता, अष्टांग हृदय, हठ प्रदीपिका, घेरंड संहिता और सांद्र सत्कर्म जैसे प्राचीन ग्रंथों से संदर्भ लिए गए हैं।


गौरतलब है कि हाल ही में मानव संसाधन विकास पर संसद की एक स्थायी समिति ने भी स्कूलों में योग शिक्षा आरम्भ करने पर जोर दिया था. आँकड़ों पर गौर करें तो 2005-06 के एक अनुमान के मुताबिक पश्चिमी देशों में तब योग विद्या विद्या से जुड़ा कारोबार अरबों डालर का था। अमेरिका में करीब 1.65 करोड़ लोग योगाभ्यास करते हैं और वहाँ की जनता हर वर्ष योग पर लगभग तीन अरब डालर का खर्च करती है। इसी तरह विदेशों में दिनों-ब-दिन आयुर्वेदिक दवाओं की माँग बढ़ती जा रही है। मौजूदा समय में प्रतिवर्ष 3000 करोड़ रुपये की आयुर्वेदित दवाइयाँ और इससे सम्बन्धित उत्पादों का भारत द्वारा विदेशों को निर्यात किया जा रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन, स्पेन, रूस और आस्ट्रेलिया को किये जाने वाले निर्यात में औसतन 25 फीसदी की बढ़ोत्तरी हो रही है। पाश्चात्य संस्कृति में पले-बसे लोग भारत आकर संस्कार और मंत्रोच्चार के बीच विवाह के बन्धन में बँधना पसन्द कर रहे हैं और हमें अपने ही संस्कार दरियाकनूसी और बकवास लगते हैं। वर्ष 2007 में अमेरिका के तमाम प्रान्तों की विधानसभाओं का सत्र और अमेरिकी सीनेट का सत्र हिन्दू वैदिक मंत्रोच्चार की गूँज के साथ आरम्भ हुआ। यही नहीं अमेरिकी गिरजाघरों में भी ऋग्वेद के मंत्र और भगवद्गीता के श्लोक गूंजने लगे हैं. इन सबसे प्रभावित होकर अमेरिका के रूट्जर्स विश्वविद्यालय ने हिन्दू धर्म से सम्बन्धित छः पाठ्यक्रम आरम्भ करने का फैसला लिया , जिसमें वाचन परम्परा, हिन्दू संस्कार महोत्सव, हिन्दू प्रतीक, हिन्दू दर्शन एवं हिन्दुत्व तथा आधुनिकता जैसे पाठ्यक्रम शामिल हैं तथा नान क्रेडिट कोर्स में योग और ध्यान तथा हिन्दू शास्त्रीय और लोकनृत्य शामिल किये गए हैं. और-तो-और अमेरिका में ‘रामायण रिबोर्न’ श्रृंखला वाली कामिक्स ने बैटमैन, सुपरमैन और स्पाइडरमैन को पीछे छोड़कर धूम मचा रखी है। अमेरिका की वरजिन कामिक्स द्वारा गाथम कामिक्स के साथ मिलकर 30 हिस्सों वाली इस श्रृखंला के प्रकाशन में सिर्फ रामायण आधारित कामिक्स ही नहीं अपितु भारतीय पात्रों जैसे साधू और देवी तथा नागिन को लेकर बनी कामिक्स भी धूम मचा रही हैं। निश्चिततः कर्म, भाग्य और समय जैसी भारतीय अवधारणाओं ने फन्तासियों पर आधारित अमेरिकी कामिक्स बाजार में भूचाल पैदा कर दिया।


पश्चिमी विज्ञान भी अब यह स्वीकारने लगा है कि भारतीय जीवन प्रतीको में दम है. एक दौर में पश्चिमी देशों के लोग भारत को सपेरों व जादूगरों के देश के रूप में पहचानते थे। धर्म व अध्यात्म के रस में लिपटे प्रतीकों को वे उपहास की वस्तु समझते थे। पर अब चीजें बदल रही हैं. वे हमारे अध्यात्म की तरफ उन्मुख हो रहे हैं. हाल ही में अमेरिका के रिसर्च ऐंड एक्सपेरीमेंटल इंस्टीट्यूट आॅफ न्यूरो साइंसेज के वैज्ञानिकों ने ऊँ के उच्चारण से शरीर में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन किया और पाया कि इसके नियमित प्रयोग से अनेक असाध्य रोग दूर हो गए।......अब जरुरत है कि हम भी अपनी संस्कृति को समझें और पश्चिम कि तरफ मुँह करके देखने की बजाय खुद के अन्दर झांकें !!

सोमवार, 5 जुलाई 2010

भारत बंद की दुहाई


मुट्ठियाँ ताने चंद लोग
हवाओं में नारेबाजी करते
बड़े-बड़े बैनर और दफ्तियाँ संभाले
पल भर में
पूरा भारत बंद कर देते हैं
वे दुहाई देते हैं
जनता के हितों की
आश्वासन देते हैं
एक सुखद भविष्य का
पर नहीं दिखता उन्हें
इस बंद में फंसे लोगों का हित
जिनका आज का भविष्य
शायद यही होगा कि
बच्चों की कक्षायें
छूट गयी होंगी
आॅफिस लेट पहुँचने वालों को
बाॅस की डाँट सुननी होगी
कोई मरीज अस्पताल न पहुँचने पर
दम तोड़ रहा होगा
या कोई बेरोजगार युवा
साक्षात्कार में शामिल न हो पाने पर
अपना सिर पीट रहा होगा !!
(आज भारत-बंद की घोषणा की गई है. पर क्या वाकई इसका कोई अर्थ है. इस कविता के माध्यम से महसूस कीजिये उन लोगों का दर्द जो आज इसके शिकार होने जा रहे हैं )