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बुधवार, 4 अगस्त 2010

पोर्टब्लेयर में प्रेमचन्द जयंती पर संगोष्ठी : रिपोर्ट

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द जी की 131 वीं जयंती पर अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर में हिंदी साहित्य कला परिषद् के तत्वाधान में संगोष्ठी का आयोजन किया गया. संगोष्ठी का विषय था- ''भूमंडलीकरण का वर्तमान सन्दर्भ और प्रेमचन्द का कथा साहित्य'' . संगोष्ठी का शुभारम्भ द्वीप-प्रज्वलन और प्रेमचन्द जी के चित्र पर माल्यार्पण द्वारा हुआ. मुख्या अतिथि के रूप में संगोष्ठी को संबोधित करते हुए चर्चित साहित्यकार और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि- प्रेमचन्द के साहित्य और सामाजिक विमर्श आज भूमंडलीकरण के दौर में भी उतने ही प्रासंगिक हैं और उनकी रचनाओं के पात्र आज भी समाज में कहीं न कहीं जिन्दा हैं। प्रेमचन्द जब अपनी रचनाओं में समाज के उपेक्षित व शोषित वर्ग को प्रतिनिधित्व देते हैं तो निश्चिततः इस माध्यम से वे एक युद्ध लड़ते हैं और गहरी नींद सोये इस वर्ग को जगाने का उपक्रम करते हैं। श्री यादव ने कहा कि प्रेमचन्द ने जिस दौर में सक्रिय रूप से लिखना शुरू किया, वह छायावाद का दौर था। निराला, पंत, प्रसाद और महादेवी जैसे रचनाकार उस समय चरम पर थे पर प्रेमचन्द ने अपने को किसी वाद से जोड़ने की बजाय तत्कालीन समाज में व्याप्त ज्वलंत मुद्दों से जोड़ा। राष्ट्र आज भी उन्हीं समस्याओं से जूझ रहा है जिन्हें प्रेमचन्द ने काफी पहले रेखांकित कर दिया था, चाहे वह जातिवाद या साम्प्रदायिकता का जहर हो, चाहे कर्ज की गिरफ्त में आकर आत्महत्या करता किसान हो, चाहे नारी की पीड़ा हो, चाहे शोषण और समाजिक भेद-भाव हो। कृष्ण कुमार यादव ने जोर देकर कहा कि आज प्रेमचन्द की प्रासंगिकता इसलिये और भी बढ़ जाती है कि आधुनिक साहित्य के स्थापित नारी-विमर्श एवं दलित-विमर्श जैसे तकिया-कलामों के बाद भी अन्ततः लोग इनके सूत्र किसी न किसी रूप में प्रेमचन्द की रचनाओं में ढूंढते नजर आते हैं.
हिंदी साहित्य कला परिषद्, पोर्टब्लेयर के अध्यक्ष आर० पी0 सिंह ने संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए कहा कि, प्रेमचंद से पहले हिंदी साहित्य राजा-रानी के किस्सों, रहस्य-रोमांच में उलझा हुआ था। प्रेमचंद ने साहित्य को सच्चाई के धरातल पर उतारा। आज भी भूमंडलीकरण के इस दौर में इस सच्चाई को पहचानने की जरुरत है. डा० राम कृपाल तिवारी ने कहा कि प्रेमचन्द की रचनाओं में किसान, मजदूर को लेकर जो भी कहा गया, वह आज भी प्रासंगिक है. उनका साहित्य शाश्वत है और यथार्थ के करीब रहकर वह समय से होड़ लेती नजर आती हैं. जयबहादुर शर्मा ने प्रेमचन्द के जीवन पर संक्षिप्त प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्होंने जीवन और कालखंड की सच्चाई को पन्ने पर उतारा। वे सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, जमींदारी, कर्जखोरी, गरीबी, उपनिवेशवाद पर आजीवन लिखते रहे। डी0 एम0 सावित्री ने कहा कि प्रेमचन्द का लेखन हिन्दी साहित्य की एक ऐसी विरासत है जिसके बिना हिन्दी का विकास संभव ही नहीं था। उन्होंने दूसरा विवाह अपनी प्रगतिशील परंपरा के अनुरूप बाल-विधवा शिवरानी देवी से करके एक नजीर गढ़ी. जगदीश नारायण राय ने प्रेमचन्द की कहानियों पर जोर देते हुए बताया कि वे उर्दू का संस्कार लेकर हिन्दी में आए थे और हिन्दी के महान लेखक बने। उनकी तुलना विश्व स्तर पर मैक्सिम गोर्की जैसे साहित्यकार से की जाती है. वे युग परिवर्तक के साथ-साथ युग निर्माता भी थे और आज भी ड्राइंग रूमी बुद्धिजीवियों की बजाय प्रेमचन्द की परम्परा के लेखकों की जरुरत है. संत प्रसाद राय ने कहा कि प्रेमचन्द भूमंडलीकरण के दौर में इसलिए भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि वर्षों पूर्व उन्होंने जिस समाज, गरीबी प्रथा के बारे में लिखा था वह आज भी देखने को प्राय: मिलती हैं.
द्वीप- लहरी के संपादक और परिषद् के साहित्य सचिव डा0 व्यासमणि त्रिपाठी ने कहा कि वे आम भारतीय के रचनाकार थे। उनकी रचनाओं में वे नायक हुए, जिसे भारतीय समाज अछूत और घृणित समझा था. उन्होंने सरल, सहज और आम बोल-चाल की भाषा का उपयोग किया और अपने प्रगतिशील विचारों को दृढ़ता से तर्क देते हुए समाज के सामने प्रस्तुत किया। इस ग्लैमर और उपभोक्तावादी संस्कृति में प्रेमचन्द की रचनाएँ आज भी जीवंत हैं क्योंकि वे आम आदमी की बाते करती हैं. अनिरुद्ध त्रिपाठी ने कहा कि प्रेमचन्द ने गांवों का जो खाका खिंचा, वह वैसा ही है. उनके चरित्र होरी, गोबर, धनिया आज भी समाज में दिख जाते हैं. भूमंडलीकरण की चकाचौंध से भी इनका उद्धार नहीं हुआ. परिषद् के प्रधान सचिव सदानंद राय ने कहा कि गोदान, गबन, निर्मला, प्रेमाश्रम जैसी उनकी रचनाएँ आज के समाज को भी उतना ही प्रतिबिंबित करती हैं. प्रेमचंद के कई साहित्यिक कृतियों का अंग्रेज़ी, रूसी, जर्मन सहित अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। यह उनकी विश्वस्तर पर लोकप्रियता का परिचायक है. कार्यक्रम का सञ्चालन डा0 व्यासमणि त्रिपाठी व धन्यवाद परिषद् के उपाध्यक्ष शम्भूनाथ तिवारी द्वारा किया गया।




(रिपोर्ट : डा0 व्यासमणि त्रिपाठी, संपादक-द्वीप लहरी, हिंदी साहित्य कला परिषद्, पोर्टब्लेयर)




इस रिपोर्ट को को सृजनगाथा, सहित्याशिल्पी, स्वतंत्र आवाज़, शब्दकार, पर भी पढ़ सकते हैं.

19 टिप्‍पणियां:

कविता रावत ने कहा…

Premchand jayanti par kee gaye saarthak sahitik sangosthi prastutikaran ke liye aabhar...
Nisandeh premchand ka sahitya sarjan kaaljayee hai..

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

वाह जी बल्ले बल्ले. फ़ोटो कुछ कम नहीं रह गईं?

Babli ने कहा…

वाह! बहुत बढ़िया लगा! प्रेमचंद जयंती पर सुन्दर प्रस्तुती!

KK Yadav ने कहा…

@ Kajal ji,

कहें तो दो-चार और लगा दूँ...

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत अच्छा लगा जी धन्यवाद

नीरज गोस्वामी ने कहा…

एक बहुत सार्थक प्रयास की अच्छी रपट प्रस्तुत की है आपने...
नीरज

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत अच्छी रिपोर्टिंग।

sada ने कहा…

बहुत ही खूबसूरती से प्रस्‍तुत किया है आपने इस रिपोर्ट को, बधाई ।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

प्रेम चाँद जयंती पर बढ़िया प्रस्तुति । अपने प्रेमचंद जी के कार्य पर सही प्रकाश डाला है । हमारी भी जानकारी बढ़ी । आभार ।

Ratnesh Kr. Maurya ने कहा…

भाई के.के. जी, आप पोर्टब्लेयर में भी हिंदी की अलख जगाये हुए हैं. पहले टैगोर और अब प्रेमचंद जी पर संगोष्ठी...साधुवाद.

Ratnesh Kr. Maurya ने कहा…

बेहतरीन रिपोर्टिंग के लिए व्यासमणि त्रिपाठी जी को बधाई..

माधव ने कहा…

पढकर अच्छा लगा .

Dr. Brajesh Swaroop ने कहा…

आज प्रेमचन्द की प्रासंगिकता इसलिये और भी बढ़ जाती है कि आधुनिक साहित्य के स्थापित नारी-विमर्श एवं दलित-विमर्श जैसे तकिया-कलामों के बाद भी अन्ततः लोग इनके सूत्र किसी न किसी रूप में प्रेमचन्द की रचनाओं में ढूंढते नजर आते हैं...Bahut khubkaha apne..badhai.

शरद कुमार ने कहा…

प्रेमचन्द जैसा साहित्यकार आज तक नहीं पैदा हुआ...बहुत सुन्दर रिपोर्टिंग.

शरद कुमार ने कहा…

प्रेमचन्द जैसा साहित्यकार आज तक नहीं पैदा हुआ...बहुत सुन्दर रिपोर्टिंग

Bhanwar Singh ने कहा…

विश्लेष्णात्मक रिपोर्ट...के.के. सर को बधाई.

KK Yadava ने कहा…

@ Ratnesh ji,

हम तो कोशिश मात्र करते हैं...

KK Yadava ने कहा…

आप सभी को यह रिपोर्ट पसंद आई, अच्छा लगा...यूँ ही अपना स्नेह बनाये रहें.

Shahroz ने कहा…

प्रेमचंद को पढना मुझे अच्छा लगता है...अच्छी रिपोर्ट.