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गुरुवार, 19 सितंबर 2013

ब्लागर दंपति कृष्ण कुमार यादव व आकांक्षा नेपाल में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन में सम्मानित

इंटरनेट पर हिंदी के व्यापक प्रचार-प्रसार और ब्लागिंग के माध्यम से देश-विदेश में अपनी रचनाधर्मिता को विस्तृत आयाम देने वाले ब्लागर दम्पति कृष्ण कुमार यादव और  आकांक्षा  यादव को काठमांडू, नेपाल में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन में क्रमशः ''परिकल्पना साहित्य सम्मान'' एवं ''परिकल्पना ब्लाग विभूषण'' से नवाजा गया। नेपाल की विषम राजनीतिक परिस्थितियों के चलते मुख्य अतिथि नेपाल के राष्ट्रपति डा0 राम बरन यादव की अनुपस्थिति में यह सम्मान नेपाल सरकार के पूर्व शिक्षा व स्वास्थ्य मंत्री तथा संविधान सभा के अध्यक्ष अर्जुन नरसिंह केसी ने दिया। इस सम्मेलन में एकमात्र बाल ब्लागर के रूप में गल्र्स हाई स्कूल, इलाहाबाद की कक्षा 1 की छात्रा अक्षिता ने भी भाग लिया। 

इस अवसर पर यादव दम्पति सहित देश-विदेश के हिंदी, नेपाली, भोजपुरी, अवधी, छत्तीसगढ़ी, मैथिली आदि भाषाओं के ब्लागर्स को भी सम्मानित किया गया। परिकल्पना समूह द्वारा आयोजित यह समारोह 13-15 सितम्बर के मध्य काठमांडू के लेखनाथ साहित्य सदन, सोरहखुटे सभागार में हुआ।

इस अवसर पर ’’न्यू मीडिया के सामाजिक सरोकार’’ सत्र में वक्ता के रूप में कृष्ण कुमार यादव ने बदलते दौर में न्यू मीडिया व ब्लागिंग व इसके सामाजिक प्रभावों पर विस्तृत चर्चा की, वहीं ’’साहित्य में ब्लागिंग की भूमिका’’ पर हुयी चर्चा को सारांशक रूप में आकांक्षा यादव ने मूर्त रूप दिया।

गौरतलब है कि इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं पद पर पदस्थ कृष्ण कुमार यादव एवं उनकी पत्नी आकांक्षा यादव एक लंबे समय से ब्लाग और न्यू मीडिया के माध्यम से हिंदी साहित्य एवं विविध विधाओं में अपनी रचनाधर्मिता को प्रस्फुटित करते हुये अपनी व्यापक पहचान बना चुके हैं।

(साभार प्रकाशित)

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

सुनहरी यादें छोड़ गया काठमांडू में हुआ अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मलेन...


(सम्मान : अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर  सम्मलेन, काठमांडू-नेपाल में  कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, इलाहाबाद परिक्षेत्र, नेपाल सरकार के पूर्व मंत्री तथा संविधान सभा के अध्यक्ष अर्जुन नरसिंह केसी जी, ब्लागर्स सम्मलेन संयोजक रवीन्द्र प्रभात और  कुमुद अधिकारी,वरिष्ठ नेपाली साहित्यकार।)


(अंतर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन, काठमांडू (13 सितम्बर, 2013 ) में कृष्ण कुमार यादव को ''परिकल्पना साहित्य सम्मान'' से विभूषित करते नेपाल सरकार के पूर्व मंत्री तथा संविधान सभा के अध्यक्ष अर्जुन नरसिंह केसी। साथ में परिकल्पना के संयोजक रवीन्द्र प्रभात.)


(सम्मान : अंतर्राष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन, काठमांडू (13 सितम्बर, 2013 ) में आकांक्षा यादव को ''परिकल्पना ब्लॉग विभूषण'' से सम्मानित  करते नेपाल सरकार के पूर्व मंत्री तथा संविधान सभा के अध्यक्ष अर्जुन नरसिंह केसी जी। साथ में परिलक्षित हैं- कृष्ण कुमार यादव, बेटियाँ अक्षिता व अपूर्वा, परिकल्पना के संयोजक रवीन्द्र प्रभात  और वरिष्ठ नेपाली साहित्यकार कुमुद अधिकारी।)


(मुलाकात : नेपाल सरकार के पूर्व मंत्री तथा संविधान सभा के अध्यक्ष अर्जुन नरसिंह केसी जी के साथ कृष्ण कुमार यादव।)


(स्वागत : ब्लागर राजीवशंकर मिश्रा बनारस वाले द्वारा बैज लगाकर स्वागत।)


(लोकार्पण : अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर  सम्मलेन, काठमांडू-नेपाल में 'परिकल्पना समय' पत्रिका का लोकार्पण करते कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, इलाहाबाद परिक्षेत्र, नेपाल सरकार के पूर्व मंत्री तथा संविधान सभा के अध्यक्ष अर्जुन नरसिंह केसी जी,  रवीन्द्र प्रभात, ब्लागर्स सम्मलेन संयोजक, माला चौबे, कार्यकारी संपादक- परिकल्पना समय, नमिता राकेश एवं डा. रमा दिवेद्धी, सम्पादक-'पुष्पक' पत्रिका।)


(लोकार्पण : अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर  सम्मलेन, काठमांडू-नेपाल में  ''धरती पकड़ निर्दलीय'' (व्यंग्य संग्रह, रवीन्द्र प्रभात, हिन्द युग्म प्रकाशन-नई दिल्ली)  का लोकार्पण करते मनोज पाण्डेय, कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, इलाहाबाद परिक्षेत्र, नेपाल सरकार के पूर्व मंत्री तथा संविधान सभा के अध्यक्ष अर्जुन नरसिंह केसी जी, कुमुद अधिकारी,वरिष्ठ नेपाली साहित्यकार, रवीन्द्र प्रभात, ब्लागर्स सम्मलेन संयोजक, माला चौबे, कार्यकारी संपादक- परिकल्पना समय।)


(लोकार्पण : अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर  सम्मलेन, काठमांडू-नेपाल में  'सांसों की सरगम' (हाइकु संग्रह, डा. रमा दिवेद्धी।  हिन्द युग्म प्रकाशन-नई दिल्ली)  का लोकार्पण करते कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, इलाहाबाद परिक्षेत्र, नेपाल सरकार के पूर्व मंत्री तथा संविधान सभा के अध्यक्ष अर्जुन  नरसिंह केसी जी, कुमुद अधिकारी,वरिष्ठ नेपाली साहित्यकार, डा. रमा दिवेद्धी, शैलेश भारतवासी, सम्पादक-हिन्द युग्म,  नमिता राकेश और रवीन्द्र प्रभात, ब्लागर्स सम्मलेन संयोजक।)


(लोकार्पण : अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर  सम्मलेन, काठमांडू-नेपाल में  'यात्रा-क्रम' ( संपत देवी मुरारका,ज्ञान भारती प्रकाशन-नई दिल्ली)  का लोकार्पण करते कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, इलाहाबाद परिक्षेत्र, नेपाल सरकार के पूर्व मंत्री तथा संविधान सभा के अध्यक्ष अर्जुन नरसिंह केसी जी, कुमुद अधिकारी,वरिष्ठ नेपाली साहित्यकार, संपत देवी मुरारका, डा. रमा दिवेद्धी,  नमिता राकेश और रवीन्द्र प्रभात, ब्लागर्स सम्मलेन संयोजक।)

(तृतीय अंतर्राष्ट्रीय ब्लोगर सम्मलेन, काठमांडू :  मंच का एक दृश्य )


(संबोधन : अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर  सम्मलेन, काठमांडू-नेपाल में कृष्ण कुमार यादव का संबोधन।)


(ग्रुप फोटोग्राफ : तृतीय अंतर्राष्ट्रीय ब्लोगर सम्मलेन, काठमांडू)


(नन्ही ब्लागर का प्रतिनिधित्व : बिटिया अक्षिता (पाखी) के साथ ब्लागर्स।)



(नन्ही ब्लागर अक्षिता (पाखी) को पुष्प-गुच्छ देकर सम्मानित करते  अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर  सम्मलेन, काठमांडू-नेपाल के संयोजक रवीन्द्र प्रभात जी के सुपुत्र।)


(फुर्सत के पल : बिटिया अक्षिता (पाखी) के साथ नेपाल सरकार के पूर्व मंत्री तथा संविधान सभा के अध्यक्ष अर्जुन नरसिंह केसी जी।)


( अलविदा की बेला)

बुधवार, 11 सितंबर 2013

लघु कथा: हिन्दी सप्ताह / कृष्ण कुमार यादव

हिन्दी सप्ताह का आगमन होते ही सरकारी कार्यालय में दिशा-निर्देश जारी होने लगे। पुराने बैनर और नेम प्लेटों को धो-पोंछकर  चमकाया जाने लगा, बस साल बदल जाना था। फिर तलाश आरम्भ हुई एक अदद अतिथि की, जो कि एक बाबू के पड़ोस में मिल गए। समारोह में आते ही फूल-मालाओं व उपहारों के बीच उन्होंने हिन्दी के राजभाषा बनने से लेकर अपने योगदान तक की चर्चा कर डाली। 

हिन्दी सप्ताह खत्म होते ही बाबू ने कुल खर्च की फाइल अधिकारी महोदय के सामने रखी। अधिकारी महोदय ने रोमन में लिख दिया- सेंक्सन्ड। 

बाबू ने धीमे से टोका-‘स......ऽ.....र‘

 तो अधिकारी महोदय ने नजरें तरेरते हुए कहा- ‘‘क्या तुम्हें यह भी बताना पड़ेगा कि हिन्दी सप्ताह बीत चुका है।’’

रविवार, 1 सितंबर 2013

देश के युवाओं को श्रीकृष्ण के विराट चरित्र से सीखने की जरूरत - कृष्ण कुमार यादव




अखिल भारतीय श्री कृष्ण चेतना संस्थान के तत्वाधान में 1 सितम्बर, 2013 को श्री कृष्ण जन्मोत्सव का आयोजन इलाहाबाद में किया गया। इस अवसर पर जहाँ भगवान श्री कृष्ण के विचारों को पुनः रेखांकित किया गया, वहीँ श्रीकृष्ण के जीवन पर आधारित सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं संगोष्ठी का भी आयोजन किया गया। 


कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ एवं चर्चित साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि श्रीकृष्ण साधारण व्यक्ति न होकर युग पुरुष थे। उनके व्यक्तित्व में भारत को एक प्रतिभासम्पन्न राजनीतिवेत्ता ही नहीं, एक महान कर्मयोगी और दार्शनिक प्राप्त हुआ, जिसका गीता-ज्ञान समस्त मानव-जाति एवं सभी देश-काल के लिए पथ-प्रदर्शक है। डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने इस बात पर जोर दिया कि आज देश के युवाओं को श्रीकृष्ण के विराट चरित्र के बृहद अध्ययन की जरूरत है। राजनेताओं को उनकी विलक्षण राजनीति समझने की दरकार है और धर्म के प्रणेताओं, उपदेशकोंको यह समझने की आवश्यकता है कि श्रीकृष्ण ने जीवन से भागने या पलायन करने या निषेध का संदेश कभी नहीं दिया। श्री यादव ने कहा कि श्रीकृष्ण ने कभी कोई निषेध नहीं किया। उन्होंने पूरे जीवन को समग्रता के साथ स्वीकारा है। 


कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में इलाहाबाद के पूर्व जिलाधिकारी श्री महावीर यादव ने कहा कि हमारे अध्यात्म के विराट आकाश में श्रीकृष्ण ही अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों व ऊंचाइयों पर जाकर भी गंभीर या उदास नहीं हैं। इलाहाबाद विश्विद्यालय के प्रो. उमाकांत यादव ने कहा कि भगवान श्री कृष्ण की स्तुति लगभग सारे भारत में किसी न किसी रूप में की जाती है। यहाँ तक कि वे लोग जिन्हें हम साधारण रूप में नास्तिक या धर्म निरपेक्ष की श्रेणी में रखते हैं, वे भी निश्चित रूप से भगवतगीता से प्रभावित हैं। जिला सूचना अधिकारी जे. एस. यादव ने श्री कृष्ण के विचारों को सदैव प्रासंगिक बताया। संस्थान के 
अध्यक्ष इं. राम किशोर यादव ने सभी का स्वागत करते हुए भगवान श्री कृष्ण के जीवन से प्रेरणा लेने की बात कही। संस्थान के महामंत्री जगदम्बा सिंह यादव ने सभी का आभार ज्ञापन किया।


कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को सम्मानित भी किया। 


जगदम्बा सिंह यादव 

महामंत्री - अखिल भारतीय श्री कृष्ण चेतना संस्थान, इलाहाबाद 

शनिवार, 24 अगस्त 2013

काठमांडू में 'परिकल्पना साहित्य सम्मान' और 'ब्लॉग विभूषण' सम्मान

कुछ माह पहले लुम्बिनी गया था तो सोचा था कि जल्द ही काठमांडू भी जाऊंगा। लीजिए, ऊपर वाले ने सुन ली। हिंदी ब्लॉगिंग के माध्यम से समाज और साहित्य के बीच सेतु निर्माण के निमित्त हमारी जीवन संगिनी आकांक्षा जी को ''परिकल्पना ब्लॉग विभूषण सम्मान'' और हमें ( कृष्ण कुमार यादव) ''परिकल्पना साहित्य सम्मान'' के लिए चुना गया है। यह सम्मान 13-14 सितंबर 2013 को काठमाण्डू में आयोजित "अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन" में प्रदान किया जायेगा। इन सम्मान के अंतर्गत स्मृति चिन्ह, सम्मान पत्र, श्री फल, पुस्तकें अंगवस्त्र और एक निश्चित धनराशि प्रदान किए जाएंगे। इस समारोह में अन्य ब्लागर्स और साहित्यकारों को भी सम्मानित किया जाएगा .....इस चयन के लिए रवीन्द्र प्रभात जी और उनकी पूरी टीम का बहुत-बहुत आभार !!

इस सम्मान को विभिन्न प्रतिष्ठित अख़बारों ने भी भरपूर कवरेज दिया, उन सभी का आभार। आप भी इन्हें पढ़ सकते हैं !!


Rising Blogger Couple : i-next (24 Aug. 2013) में ब्लागिंग हेतु काठमांडू में सम्मान की चर्चा।


'दैनिक जागरण' (24 अगस्त, 2013 ) में ब्लागिंग हेतु ब्लागर्स कांफ्रेंस, काठमांडू में सम्मान की चर्चा : डाक निदेशक और उनकी पत्नी होंगी सम्मानित। 


'हिन्दुस्तान' (24 अगस्त, 2013) में ब्लागिंग हेतु सम्मान की चर्चा :: केके यादव व आकांक्षा को काठमांडू में मिलेगा सम्मान।

'अमर उजाला' (24 अगस्त, 2013 )  में ब्लागिंग हेतु ब्लागर्स कांफ्रेंस, काठमांडू में सम्मान की चर्चा : केके यादव और आकांक्षा यादव को सम्मान.


Hindustan Times (24 August, 2013) : Blogger couple set to receive international award. 


 Times of India (25 August, 2013) : Postal Official, wife to get award for Hindi blogging)


पंजाब केसरी (26 अगस्त, 2013 ) : के.के. यादव और उनकी पत्नी को मिलेगा सम्मान. 

बुधवार, 14 अगस्त 2013

स्वतंत्रता की गाथा सिर्फ अतीत भर नहीं है...


कल देश अपनी आजादी की एक और सालगिरह मनाएगा। स्वतंत्रता को आज व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरुरत है। स्वतंत्रता माने सिर्फ राजनैतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक, वैचारिक, आध्यात्मिक,पारिवारिक और अन्तत: वैयक्तिक स्वतंत्रता भी है, जहाँ हर स्तर पर निर्णय-प्रक्रिया में हम भागीदार हो सकें और सकारात्मक रूप में देश और समाज के लिए कुछ कर सकें। स्वतंत्रता अपने आप में संपूर्ण है। इसका शाब्दिक विश्लेषण करें तो यह स्व का तंत्र है, अर्थात स्वयं को पा लेना. इस स्वतंत्रता दिवस पर आत्म विश्लेषण करके देखने की जरुरत है कि क्या हम अपनी चेतना को पूर्ण रूप में पा चुके हैं और सच्चे अर्थों में वाकई स्वतंत्र हैं.

स्वतंत्रता की गाथा सिर्फ अतीत भर नहीं है बल्कि आगामी पीढ़ियों हेतु यह कई सवाल भी छोड़ती है। वस्तुतः भारत का स्वाधीनता संग्राम एक ऐसा आन्दोलन था, जो अपने आप में एक महाकाव्य है। लगभग एक शताब्दी तक चले इस आन्दोलन ने भारतीय राष्ट्रीयता की अवधारणा से संगठित हुए लोगों को एकजुट किया। यह आन्दोलन किसी एक धारा का पर्याय नहीं था, बल्कि इसमें सामाजिक-धार्मिक सुधारक, राष्ट्रवादी साहित्यकार, पत्रकार, क्रान्तिकारी, कांग्रेसी, गाँधीवादी इत्यादि सभी किसी न किसी रूप में सक्रिय थे।

1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम को अंग्रेज इतिहासकारों ने ‘सिपाही विद्रोह‘ मात्र की संज्ञा देकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि यह विद्रोह मात्र सरकार व सिपाहियों के बीच का अल्पकालीन संघर्ष था, न कि सरकार व जनता के बीच का संघर्ष। वस्तुतः इस प्रचार द्वारा उन्होंने भारत के कोने-कोने में पनप रही राष्ट्रीयता की भावना को दबाने का पूरा प्रयास किया। पर इसमें वे पूर्णतया कामयाब नहीं हुये और इस क्रान्ति की ज्वाला अनेक क्षेत्रों में एक साथ उठी, जिसने इसे अखिल भारतीय स्वरूप दे दिया। इस संग्राम का मूल रणक्षेत्र भले ही नर्मदा और गंगा के बीच का क्षेत्र रहा हो, पर इसकी गूँज दूर-दूर तक दक्षिण मराठा प्रदेश, दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों, गुजरात और राजस्थान के इलाकों और यहाँ तक कि पूर्वोत्तर भारत के खासी-जंैतिया और कछार तक में सुनाई दी। परिणामस्वरूप, भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन का यह प्रथम प्रयास पे्ररणास्रोत बन गया और ठीक 90 साल बाद भारत ने स्वाधीनता के कदम चूमकर एक नये इतिहास का आगाज किया।

भारतीय राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि आजादी के दीवानों का लक्ष्य सिर्फ अंग्रजों की पराधीनता से मुक्ति पाना नहीं था, बल्कि वे आजादी को समग्र रूप में देखने के कायल थे। भारतीय पुनर्जागरण के जनक कहे जाने वाले राजाराममोहन राय से लेकर भगतसिंह जैसे क्रान्तिकारी और महात्मा गाँधी तक ने एक आदर्श को मूर्तरूप देने का प्रयास किया। राजाराममोहन राय ने सती प्रथा को खत्म करवाकर नारी मुक्ति की दिशा में पहला कदम रखा, ज्योतिबाफुले व ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने शैक्षणिक सुधार की दिशा में कदम उठाए, स्वामी विवेकानन्द व दयानन्द सरस्वती ने आध्यात्मिक चेतना का जागरण किया, दादाभाई नौरोजी ने गरीबी मिटाने व धन-निकासी की अंग्रेजी अवधारणाओं को सामने रखा, लाल-बाल-पाल ने राजनैतिक चेतना जगाकर आजादी को अधिकार रूप में हासिल करने की बात कही, वीर सावरकर ने 1857 की क्रान्ति को प्रथम स्वाधीनता संग्राम के रूप में चिन्हित कर इसकी तुलना इटली में मैजिनी और गैरिबाल्डी के मुक्ति आन्दोलनों से व्यापक परिप्रेक्ष्य में की, भगत सिंह ने क्रान्ति को जनता के हित में स्वराज कहा और बताया कि इसका तात्पर्य केवल मालिकों की तब्दीली नहीं बल्कि नई व्यवस्था का जन्म है, महात्मा गाँधी ने सत्याग्रह व अहिंसा द्वारा समग्र भारतीय समाज को जनान्दोलनों के माध्यम से एक सूत्र में जोड़कर अद्वैत का विश्व रूप दर्शन खड़ा किया, पं0 नेहरू ने वैज्ञानिक समाजवाद द्वारा विचारधाराओं में सन्तुलन साधने का प्रयास किया, डा0 अम्बेडकर ने स्वाधीनता को समाज में व्याप्त विषमता को खत्म कर दलितों के उद्धार से जोड़ा....। इस आन्दोलन में जहाँ हिन्दू-मुसलमान एकजुट होकर लड़े, दलितों-आदिवासियों-किसानों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। तमाम नारियों ने समाज की परवाह न करते हुये परदे की ओट से बाहर आकर इस आन्दोलन में भागीदारी की।

स्वाधीनता का आन्दोलन सिर्फ इतिहास के लिखित पन्नों पर नहीं है, बल्कि लोक स्मृतियों में भी पूरे ठाठ-बाट के साथ जीवित है। तमाम साहित्यकारों व लोक गायकों ने जिस प्रकार से इस लोक स्मृति को जीवंत रखा है, उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। वैसे भी पिस्तौल और बम इन्कलाब नहीं लाते बल्कि इन्कलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है (भगत सिंह)। यह अनायास ही नहीं है कि अधिकतर नेतृत्वकर्ता और क्रान्तिकारी अच्छे विचारक, कवि, लेखक या साहित्यकार थे। तमाम रचनाधर्मियों ने इस ‘क्रान्ति यज्ञ’ में प्रेरक शक्ति का कार्य किया और स्वाधीनता आन्दोलन को एक नयी परिभाषा दी।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस बात की आवश्यकता है कि राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन के तमाम छुये-अनछुये पहलुओं को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाये और औपनिवेशिक पूर्वाग्रहों को खत्म किया जाये। इतिहास के पन्नों में स्वाधीनता आन्दोलन के साक्षात्कार और इसके गहन विश्लेषण के बीच आत्मगौरव के साथ-साथ उससे जुड़े सबकों को भी याद रखना जरूरी है। राजनैतिक स्वतन्त्रता से परे सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता भी सच्चे अर्थों में हमारा ध्येय होना चाहिए। इसी क्रम में युवा पीढ़ी को राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास से रूबरू कराना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए, पर उससे पहले इतिहास को पाठ्यपुस्तकों से निकालकर लोकाचार से जोड़ना होगा।

(चित्र में : बेटी अपूर्वा और अक्षिता (पाखी) तिरंगे के साथ, जिसे उन्होंने मिलकर बनाया और कलर किया है)

स्वतंत्रता दिवस की आप सभी को शुभकामनायें !!

सोमवार, 12 अगस्त 2013

Glimpses of the '9th All India Laxmi salon of Photography-2013' at Allahabad

The '9th All India Laxmi salon of Photography-2013' was inaugurated at the Nirala Art Gallery of Allahabad University, on Monday, 12th august 2013. Mr. Krishna Kumar Yadav, Director Postal Services, Allahabad Region, inaugurated the two days photo exhibition at 1 pm. The winning entries of the 9th All India Photo Salon hosted by the social organisation Sri Ganga Kalyan Sewa Samiti, were exhibited in the photo-exhibition. The inaugural function was presided by Dr Ajay Jaitley, Head of the Visual Arts department of Allahabad University and District magistrate, Allahabad Mr. Rajshekhargrace the fuction as Guest of honour. The photo competition was participated by over a hundred photographers from all parts of the country, in monochrome, colour, nature, photo journalism and travel categories, informed Jitendra Prakash, secretary of the organisation.


      (Krishna Kumar Yadav, Director Postal Services, Allahabad Region Inaugurating '9th All India Laxmi salon of Photography -2013' by Ribbon-Cut, at Nirala Art Gallery, University of Allahabad on 12th August 2013.)


(Krishna Kumar Yadav, Director Postal Services, Allahabad Region Inaugurating '9th All India Laxmi salon of Photography -2013' by lighting-lamp, at Nirala Art Gallery, University of Allahabad on 12th August 2013.)


(A view of Photographs exhibited at '9th All India Laxmi salon of Photography-2013' at Nirala Art Gallery, University of Allahabad on 12th August 2013.) 


(A view of Photographs exhibited by Krishna Kumar Yadav, Director Postal Services, Allahabad Region along with Jitendra Prakash, Secretary, Shri Ganga kalyan Sewa samiti after Inaugurating of '9th All India Laxmi salon of Photography-2013' at Nirala Art Gallery, University of Allahabad on 12th August 2013.)

(Mr. Krishna Kumar yadav, Director Postal Services, Allahabad Region and Mr. Rajshekhar, District Magistrate, Allahabad on dais during '9th All India Laxmi salon of Photography-2013' at Nirala Art Gallery, University of Allahabad on 12th August 2013.)


(Mr. Krishna Kumar Yadav, Director Postal Services, Allahabad Region, Mr. Rajshekhar, District Magistrate, Allahabad, Dr. Ajay Jaitly, Head of the Visual Arts department of Allahabad University on the dais during '9th All India Laxmi salon of Photography-2013' at Nirala Art Gallery, University of Allahabad on 12th August 2013.)


(Address by Mr. Krishna Kumar Yadav, Director Postal Services, Allahabad Region at '9th All India Laxmi salon of Photography -2013' at Nirala Art Gallery, University of Allahabad on 12th August 2013.) 


(Mr. Krishna Kumar yadav, Director Postal Services, Allahabad Region, Mr. Rajshekhar, District Magistrate, Allahabad, Dr Ajay Jaitley, Head of the Visual Arts department of Allahabad University and others during '9th All India Laxmi salon of Photography-2013' at Nirala Art Gallery, University of Allahabad on 12th August 2013.)

श्री गंगा कल्याण समिति की ओर से दो दिवसीय नौवीं अखिल भारतीय लक्ष्मी छायाचित्र प्रदर्शनी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के निराला आर्ट गैलरी में 12 अगस्त को शुरू हुई। प्रदर्शनी का उद्घाटन मुख्य अतिथि के रूप में इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवायें, कृष्ण कुमार यादव ने दीप प्रज्जवलित कर किया। उन्होंने प्रदर्शनी का अवलोकन करने के बाद कहा कि इस तरह की छायाचित्र प्रदर्शनी का आयोजन नियमित रूप से होना चाहिए। इससे युवा पीढ़ी को प्रेरणा मिलती है। डाक निदेशक श्री यादव ने कहा कि फोटोग्राफी एक विधा के साथ-साथ हमारे समाज और परिवेश का प्रतिबिंब भी है। मात्र आड़ी तिरछी लाइनें खींचनी ही फोटोग्राफी नहीं हैं बल्कि उसका यथार्थ भी निकलना चाहिए।

विशिष्ट अतिथि जिलाधिकारी राजशेखर ने फोटो प्रदर्शनी की प्रशंसा करते हुए कहा कि ऐसी छायाचित्र प्रदर्शनी का आयोजन होना चाहिए जिससे कि कुछ नयापन लोगों को देखने को मिले। उन्होंने कहा कि छायाचित्र अपनी संस्कृति की पहचान को बढ़ावा देते हैं।  इससे अधिक से अधिक लोगों को जुड़ना चाहिए।

अध्यक्षता करते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दृश्य कला विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो0 अजय जेतली ने कहा कि इलाहाबाद शुरू से ही साहित्यकारों, कलाकारो का कर्मक्षेत्र रहा है। इस शहर से सभी क्षेत्रों में लोगांे में पहचान भी बनायी है।

छायाचित्र प्रदर्शनी के सचिव जितेन्द्र प्रकाश ने प्रदर्शनी पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि अगले वर्ष से अंतर्राष्ट्रीय स्तर के छायाकारों के भी छायाचित्र प्रदर्शनी में देखने को मिलेगा। उन्होंने बताया कि इस बार छायाचित्र प्रदर्शनी में 119 फोटोग्राफरों की 1160 तस्वीरें आयी थीं। श्रीमती लक्ष्मी अवस्थी ने अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम में वीरेन्द्र पाठक, एस के यादव, राजेश सिंह, पवन द्विवेदी, संजोग मिश्रा, विरेन्द्र प्रकाश, केनिथ जान, अनुराग अस्थाना, अमरदीप, रजत शर्मा, संजीव बनर्जी, संजय सक्सेना सहित बड़ी संख्या में छायाकार और अन्य लोग मौजूद रहे। संचालन वरिष्ठ पत्रकार अभिलाष नारायण ने किया।

बुधवार, 7 अगस्त 2013

भारतीय भाषा संवर्धन परिषद में हिन्दी भाषा हेतु डा0 बद्री नारायण तिवारी सदस्य नामित

( डा. बद्री नारायण तिवारी जी का नाम बहुतों के लिए अनजान नहीं है। कानपुर में 'मानस संगम' और  डा. बद्री नारायण तिवारी एक दूसरे के पर्याय माने जाते हैं। कानपुर में पोस्टिंग के दौरान ही उनसे मुलाकात हुई और आज भी हम एक-दूसरे को याद करते रहते हैं। कल ही उनका फोन आया और पता चला कि भारतीय भाषा संवर्धन परिषद में हिन्दी भाषा हेतु उन्हें सदस्य नामित किया गया है और उन्होंने  अपना कार्य आरंभ भी कर दिया है ......हमारी तरफ से बहुत सारी  शुभकामनाएं और यह आशा भी कि वे हिंदी के संवर्धन और प्रचार-प्रसार के लिए तत्पर रहेंगें !!)


भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने हिन्दी सहित 22 भारतीय भाषाओं के संवर्धन के लिए पुर्नगठित ’भारतीय भाषा संवर्धन परिषद’ (सीपीआईएल) में प्रतिष्ठित हिन्दी एवं साहित्य सेवी डा0 बद्री नारायण तिवारी को हिन्दी भाषा के लिए सदस्य मनोनीत किया है। दो वर्ष के लिए पुर्नगठित यह परिषद संविधान में मान्यता प्राप्त 22 भाषाओं के विकास-प्रसार हेतु भारत सरकार को अपने सुझाव देगी।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उच्चतर शिक्षा विभाग द्वारा गठित इस परिषद के अध्यक्ष मानव संसाधन विकास मंत्री एवं उपाध्यक्ष राज्यमंत्री हैं। उच्चतर शिक्षा सचिव, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के अध्यक्ष एवं भारतीय भाषाओं के केन्द्रीय संस्थान (सीआईआईएल, मैसूर) के निदेशक सहित कुल 27 सदस्य परिषद में हैं ।

परिषद में राष्ट्र भाषा हिन्दी के लिए डा0 बद्री नारायण तिवारी, उर्दू के लिए प्रो0 गोपीचंद नारंग, संस्कृत के लिए राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान (दिल्ली) के प्रो0 राधा बल्लभ त्रिपाठी, मैथिली के लिए प्रो0 मायानन्द मिश्र, सिंधी के लिए वासुदेव मोही एवं कन्नड़ भाषा के लिए फिल्मी हस्ती गिरीश कर्नाड को मनोनीत किया गया है।


उल्लेखनीय है कि डा0 बद्री नारायण ने हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिज पर प्रतिष्ठित करने और इसे 21वीं सदी की भाषा के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। डा0 तिवारी ने उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के सदस्य, उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष और हिन्दी उर्दू समिति के संरक्षक के रूप में हिन्दी की अहर्निश सेवा की है। हिन्दी सेवा में उनके योगदान और कृतित्व के लिए अब तक सैकड़ों संस्थाओं ने उनका सम्मान किया है। मारीशस सरकार द्वारा उन्हें महर्षि अगस्त्य सम्मान एवं डा0 कर्ण सिंह द्वारा विश्व हिन्दी प्रतिष्ठान भी सम्मानित कर चुका है। श्री तिवारी पर दो शोध एवं चार लघु शोध अब तक किए जा चुके है। तीसरा शोध आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम विश्वविद्यालय में किया जा रहा है।

( चित्र 1 में : डा0 बद्री नारायण तिवारी और कृष्ण कुमार यादव )

( चित्र 2 में : एक पुस्तक के विमोचन अवसर पर कृष्ण कुमार यादव, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान  के तत्कालीन कार्यकारी अध्यक्ष शम्भु नाथ जी, विख्यात हिंदी कमेंटटर जसदेव सिंह जी, नवनीत के पूर्व संपादक गिरिजा शंकर त्रिवेदी जी एवं डा0 बद्री नारायण तिवारी )

रविवार, 14 जुलाई 2013

अब बस यादों में रह जायेगा टेलीग्राम

(जब हम कल सुबह जगेंगे तो एक तकनीक खो चुके होंगे. कल 15 जुलाई से टेलीग्राम सेवा भारत में ख़त्म हो जाएगी। 160 साल पुरानी इस सेवा ने इतिहास के कई बनते-बिगड़ते पहलू देखे हैं और अब खुद इतिहास बनने जा रही है। टेलीग्राम भले ही न रहेगा, पर हमारी स्मृतियों में सदैव जीवंत रहेगा !!)

21वीं सदी में टेक्नालाजी के विकास एवं संचार व सूचना क्रांति ने बहुत सारी बातों को पीछे छोड़ दिया है। एक दौर में जिन तकनीकों को अपरिहार्य माना जाता था, वही अब अतीत की चीज बनकर रह गये हैं । न जाने कितनी चीजें हमारी आँखों के सामने आरम्भ हुईं और हमारे ही सामने उनका दौर भी खत्म हो गया। फ्लापी, पेजर, ब्लैक एंड व्हाइट टीवी, छतों पर दिखता टीवी का एंटीना, रेडियो एंटीना, वाकमैन और भी बहुत कुछ। नयी पीढ़ी इन्हें या तो म्यूजियम में देखती है, या तो इन्टरनेट पर खंगालती है। ऐसी ही एक सेवा टेलीग्राम (तार) अब अतीत की वस्तु बनने वाली है। टेलीग्राम एक जगह से दूसरी जगह संदेश भेजने का यांत्रिक माध्यम है। इसमें किसी चीज का भौतिक विनिमय किए बगैर संदेश भेजा जाता है। इसमें विशेष संकेतों के जरिये कोई सूचना कहीं भेजी जाती है। स्मार्ट फोन, ईमेल और एसएमएस के मौजूदा दौर में अब 160 साल पुरानी टेलीग्राम सेवा को सरकार ने 15 जुलाई से बंद करने का फैसला किया है। लेकिन तार का बंद हो जाना सिर्फ एक अप्रासंगिक हो चुकी सेवा का बंद हो जाना भर नहीं है। आज भी एक नहीं, ऐसी कई-पीढियां मौजूद हैं, जिन्होंने एक समय में तेजी से और आवश्यक संचार के लिए मुख्य स्त्रोत मानी जाने वाली इस सेवा के माध्यम से ही सुख-दुख के न जाने कितने संदेश ग्रहण किए, लेकिन नई तकनीक के आने और संचार के नए साधनों से टेलीग्राम खुद को बेगाना पाने लगा।

आज मोबाइल-इंटरनेट के दौर में नवीनतम तकनीक से संवाद चल रहा है, लेकिन एक जमाने में जल्द संदेश भेजने का एकमात्र जरिया टेलीग्राम या तार ही था। इंटरनेट और मोबाइल फोन के युग में पैदा हुई पीढ़ी यह सुनकर हैरत में पड़ सकती है कि कभी डाकिया द्वारा यह सुनकर कि टेलीग्राम आया है, सुनकर लोगों के दिलों की धड़कन बढ़ जाती थी। लोग मनाने लगते, कोई बुरी खबर न आए। कुछेक मामलों में टेलीग्राम खुशखबरी भी लाता। शहरों में कामकाज के लिए आने वाले लोग अपने घर-परिवार को या फिर उनके परिवार के सदस्य जल्द संदेश के लिए टेलीग्राम ही भेजा करते थे। सीमा पर तैनात फौजियों का उनकी पत्नियों व परिवार से अकस्मात संवाद टेलीग्राम द्वारा ही होता था। दूर देश से अपने परिचितों को जल्दी से जल्दी संदेश भेजने का माध्यम भी तब टेलीग्राम या तार ही हुआ करता था। नौकरियों की सूचना भी टेलीग्राम या तार से आती थी। यह सेवा बहुत सस्ती नहीं थी, इसलिए 'थोड़ा लिखा है ज्यादा समझना’ वाले अंदाज में संदेश भेजे जाते थे। इसके लिए देश के सभी इलाकों में सरकार ने तार-घर खोले हुए थे। 

टेलीग्राम का भी अपना लम्बा इतिहास रहा है। माना जाता है कि टेलीग्राम की अवधारणा को जमीन पर उतारने में कुल 22 लोगों का हाथ है। 1792 से ही यूरोप में संकेतों के जरिये समाचार भेजने के यंत्र सेमाफोर लाइन के रूप में यह विधि मौजूद थी। पर वर्ष 1837 में महान अमेरिकी वैज्ञानिक सैमुअल एफबी मोर्स ने मोर्स कोर्ड टेलीग्राफ की खोज करके दुनिया में संचार क्रांति को नया रूप दिया था। कहा जाता है कि सैमुअल मोर्स मूलतः पेंटर थे। वर्ष 1825 में न्यूयार्क में जब वे अपनी पेटिंग पर काम कर रहे थे, उन्हें पत्नी की बीमारी के बारे में एक घुड़सवार ने पत्र लाकर दिया। पर दुर्भागयवश जब तक वे घर पहुँचते, पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। मोर्स इस घटना से इतने आहत हुए कि उन्होंने एक ऐसा यन्त्र इजाद करने की सोची, जिससे किसी आकस्मिक स्थिति में तुरन्त सन्देश भेजा  जा सके। फिर क्या थे वे इस मिशन पर जुट गए। अन्ततः सैमुअल मोर्स ने सन 1844 में अमेरिका में वॉशिंगटन और बॉल्टिमोर के बीच पहला टेलीग्राम भेजकर इसका इजाद किया।

19वीं सदी में जब टेलीफोन की खोज नहीं हुई थी उस समय संकेत के द्वारा संदेश एक जगह से दूसरी जगह तक भेजे जाते थे। सैमुएल मोर्स ने इसका निर्माण वैद्युत टेलीग्राफ के माध्यम से संदेश भेजने के लिए किया था। 1840 के दशक में संदेश भेजने की इस नई पद्धति का नाम ‘डैश-डाट‘ प्रणाली था, जिसे मोर्स कोड के नाम से जाना जाता है। मोर्स कोड में वस्तुतः एक लघु संकेत तथा दूसरा दीर्घ संकेत प्रयोग किया जाता है। मोर्स कोड में कुछ भी लिखने के लिए लघु संकेत के रूप में डाट का प्रयोग तथा दीर्घ संकेत के लिए डैश का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा मोर्स कोड के लघु और दीर्घ संकेतों के लिए अन्य चिन्ह भी प्रयुक्त हो सकते हैं जैसे- ध्वनि, पल्स या प्रकाश आदि। मोर्स कोड दुनिया भर में मान्य हुआ और यह टेलीग्राफी की प्राथमिक भाषा बन गया। मोर्स के ईजाद किए गए टेलीग्राफ को स्मिथसोनियन संस्थान में (जहाँ अमेरिकी इतिहास का राष्टीय संग्रहालय है) रखा गया है। मोर्स का जमाना औद्योगिक क्रांति का था। यह वह दौर था, जब यूरोप और अमेरिका में बड़े पैमाने पर आविष्कार हो रहे थे। इस तरह तार ने औद्योगिक क्रांति में बड़ी भूमिका निभाई। इससे विशेष संकेतों के जरिये सूचनाएं कभी भी और कहीं भी तुरंत भेजी जा सकती थीं। उसके बाद लंबी दूरी की सूचनाओं को प्रेषित करने और प्राप्त करने के यंत्र को टेलीग्राफ और उन संदेशों को टेलीग्राम कहा जाने लगा। 

    टेलीग्राफ यूनानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है दूर से लिखना। इसमें विभिन्न संदेशों को कोड में बदलकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजा जाता है। संदेश के मिलने पर कोड को डीकोड करके एक बार फिर संदेश के रूप मे लेकर प्राप्त करने वाले तक भेजा जाता है। संदेश की कोडिंग और डी-कोडिंग का काम टेलीग्राफिस्ट की ओर से किया जाता है। इसका प्रचालन समय के साथ भले ही कम होता गया, पर अभी भी मोर्स कोड पद्धति का इस्तेमाल कई जगह पर गुप्त संदेश भेजने के लिए किया जाता है। पानी के जहाज पर अभी भी इसके जरिए संदेश भेजे जाते हैं। आसानी से पकड़े नहीं जाने के कारण गुप्तचर भी इस पद्धति का प्रयोग करते हैं। सेना के सिग्नल रेजिमेंट में इसका बहुत काम है। मोर्स कोड का इस्तेमाल प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में जमकर किया गया। मोर्स कोड के जरिए संदेश को कोड के रूप में बदलकर टेलीग्राफ लाइन और समुद्र के नीचे बिछी केबलों के द्वारा एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाता था। संदेश पहुंँचने के बाद इसे डीकोड करके लोगों तक भेजा जाता था। 
   भारत में ब्रिटिश काल के दौरान पहली इलेक्ट्रिकल टेलीग्राफ लाइन डायमंड हार्बर और कोलकाता के बीच 5 नवम्बर 1850 को प्रायोगिक तौर पर शुरू की गई थी, जब शिबचंद्र नंदी का डायमंड हार्बर से भेजा गया संदेश गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी की मौजूदगी में पढ़ा गया था। यह पहली प्रायोगिक तार लाइन 21 मील की थी। इसे बनाने में  डॉ. विलियम ओ’ शौघ्नेस्सी का बहुत बड़ा योगदान रहा, जिन्हें भारत में तार का जनक भी कहा जाता है। भारत में टेलीग्राफ और टेलीफोन का बीड़ा उठाने वाले डॉ. विलियम ओ’ शौघ्नेस्सी लोक निर्माण विभाग में काम करते थे। 1851 में, इसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए खोला गया था। डाक और टेलीग्राफ विभाग उस समय लोक निर्माण विभाग के एक छोटे से कोने में अवस्थित हुआ करता था। नवंबर 1853 में, उत्तर में कोलकाता (कलकत्ता) और पेशावर को आगरा सहित और मुंबई (बॉम्बे) को सिंदवा घाट्स के जरिए दक्षिण में चेन्नई, यहां तक कि ऊटकमंड और बंगलोर के साथ जोड़ने वाली 4000 मील (6400 किमी) की टेलीग्राफ लाइनों का निर्माण शुरू किया गया। कालांतर में ब्रिटिश सरकार द्वारा दस्तावेजों के मंगाने-भेजने के अलावा समुद्र में सबमरीन केबिल डालकर विदेशों से भी टेलीग्राम मंगाए जाने लगे। डाॅट और डैश जैसे दो संकेतकों के जरिये संदेश भेजने वाली इस सेवा के लिए अक्टूबर 1854 में ब्रिटेन सरकार ने भारत के लिए पहला टेलीग्राफी एक्ट पास किया। उसी साल व्यवस्थित तरीके से देश में डाक विभाग की स्थापना हुई। उसके अधीन देश भर के 700 पोस्ट आॅफिस थे। टेलीग्राफ विभाग को भी डाक विभाग के साथ संबद्ध कर दिया गया और उसका नाम पोस्ट और टेलीग्राफ विभाग हो गया। आज भी अधिकतर लोग डाक विभाग को डाक-तार विभाग के नाम से ही जानते हंै। 11 फरवरी 1855 को भारत में सार्वजनिक टेलीग्राम सेवाएं शुरू र्हुइं। तब एक रुपए में 16 शब्दों का तार 400 मील की दूरी तक भेजा जा सकता था। शाम छह से लेकर सुबह छह बजे तक टेलीग्राम के लिए दोगुना चार्ज लिया जाता था। 1885-86 में डाक और तार विभाग के दफ्तर एक कर दिए गए। इसके बाद 1 जनवरी 1882 से अंतरदेशीय प्रेस टेलीग्राम शुरू हुए जिनका फायदा अखबारों ने उठाया। इनसे छोटे-बड़े सभी अखबारों को काफी मदद मिली। संवाददाता मुफ्त में अपनी खबरें तार के जरिए भेज सकते थे। तार विभाग में प्रेस के लिए कमरे बनाए गए। इसने खबरों को लोगों तक जल्द से जल्द पहुंँचाने में योगदान दिया। 
         आजादी के बाद 1 जनवरी 1949 को नौ तारघरों आगरा, इलाहाबाद, जबलपुर, कानपुर, पटना और वाराणसी आदि में हिंदी में तार सेवा की शुरुआत हुई। आजादी मिलने के बाद भारत ने पहली पंचवर्षीय योजना में ही सिक्किम के खांबजांग इलाके में दुनिया की सबसे ऊंची तार लाइन पहँुंचा दी। तेज गति से तार बांटने का काम करने के लिए 1949-50 में मोटरसाइकिलों का इस्तेमाल शुरू कर दिया गया। आँकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 1957-58 में एक साल में तीन करोड़ दस लाख तार भेजे गए, और इनमें से 80 हजार तार हिंदी में थे। इसमें दिनों-ब-दिन इजाफा होता गया और वर्ष 1981-82 तक देश में 31 हजार 457 तारघर थे और देशी तारों की बुकिंग 7 करोड़ 14 लाख तक पहुँच  चुकी थी। नब्बे के दशक की शुरुआत से तार का आकर्षण कम होना शुरू हुआ और नब्बे का दशक बीतने के बाद मोबाइल-इंटरनेट की तेज गति ने इसे हाशिये पर डाल दिया। 1984 मंे पोस्ट और टेलीग्राफ विभाग दो भागों में विभाजित होकर डाक विभाग और दूरसंचार विभाग कहलाया। 1980 का दशक वो सुनहरा युग था जब अकेले दिल्ली मेन आफिस के जरिये एक दिन में एक लाख टेलीग्राम भेजे व प्राप्त किये जाते थे, जबकि आज देश भर में महज एक लाख टेलीग्राम भेजे व प्राप्त किये जाते हैं। यही नहीं, 2006-07 के दौरान रोजाना 21-22 हजार का टेलीग्राम टैªफिक था जो कि 2011-12 के दौरान घटकर 5 हजार पर आ गया। सबसे ज्यादा टेलीग्राम सरकारी कार्यालयों या अदालती सम्मनों इत्यादि से जुड़े होते थे। मई 2013 के दौरान दिल्ली में 7031 टेलीग्राम बुक किये गए जिनमें पब्लिक टेलीग्राम की संख्या मात्र 2802 थी। कभी सबसे ज्यादा टेलीग्राम बुक कराने वालों में ’पे्रस’ श्रेणी होती थी। दरअसल इस सेवा को बनाए रखने पर बीएसएनएल को सालाना करीब 400 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा था। गिरते राजस्व से परेशान सरकार ने मई, 2010 में अंतर्देशीय सेवाओं के लिए टेलीग्राम दरों में पिछले 60 वर्षों में पहली बार बढ़ोत्तरी की थी। इनको साढ़े तीन और साढ़े चार रूपये से बढ़ाकर साढ़े 27 रूपये किया गया। यहां तक कि दो महीने पहले विदेश के लिए टेलीग्राम सेवाओं को बंद कर दिया गया। अन्ततः टेलीग्राम सेवा से लगातार गिरते राजस्व के बाद सरकार ने बीएसएनएल बोर्ड को फैसला लेने का अधिकार दिया और उसने डाक विभाग से सलाह-मशविरे के बाद टेलीग्राम सेवा को 15 जुलाई से बंद करने का फैसला किया। 
एक जमाने में तेज और संचार का मुख्य स्त्रोत मानी जाने वाली यह सेवा स्वाधीनता आंदोलन सहित न जाने कितनी ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रही है। यह नहीं भूलना चाहिए कि तार ने लोगों के एकीकरण में प्रमुख भूमिका निभाई है। भारत में रेलों के विस्तार से पहले ही तार का आगमन हो चुका था। इतिहासकार बताते हैं कि 1857 के परिणामों में एक भूमिका तार की भी थी। ब्रिटिश हुकूमत के लिए तार ऐसा सहारा था जिसके जरिए वो सेना की मौजूदगी, विद्रोह की खबरें, रसद की सूचनाएं और अपनी व्यूहरचना सैकड़ों मील दूर बैठे अपने कमांडरों के साथ साझा कर सकते थे। यही कारण था कि विद्रोह का बिगुल बजने वाले भारतीय क्रांतिकारियों ने तार को सबसे पहला निशाना बनाया। विद्रोह के प्रमुख केंद्र रहे दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, इंदौर जैसी जगहों पर उन्होंने तार लाइनें ध्वस्त कर दीं और वहां काम कर रहे अंग्रेज कर्मचारियों को मार डाला। मेरठ समेत कई जगहों पर बागियों ने तार के खंभों को जलावन की तरह इस्तेमाल किया। कुछेक जगहों पर तो क्रांतिकारियों ने इन तार से गोलियां तक बनाई। लोहारों ने तार के खंभों का इस्तेमाल तोप बनाने तक में किया। इस दौरान 918 मील लंबी तार की लाइनें तोड़ दी गईं, पर अंततरू इसी तार की बदौलत अपने सूचना तंत्र के जरिये अंग्रेज इस विद्रोह को समाप्त करने में सफल रहे। 1857-58 में तार की वजह से मिली कामयाबी के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने पूरे हिंदुस्तान को तार के लिए जरिए जोड़ने का फैसला किया और सैकड़ों मील की नई लाइनें बिछाई गईं।
    
 टेलीग्राम सेवा भले ही खत्म कर दी जाय, पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह सिर्फ संदेश ही नहीं देता था, बल्कि कई मौकों पर अदालत में बतौर प्रमाण भी इसका इस्तेमाल किया जाता रहा है। सीमा पर तैनात जवानों व ग्रामीण अंचलों के लिए तो यह दूत का काम करता था। नौकरी की नियुक्ति पत्र हो या शोक संदेश या फिर स्थानांतरण की सूचना, टेलीग्राम वक्त पर यह सूचना संबंधित को देता था। इसकी लोकप्रियता इस कदर थी कि कई हिंदी फिल्मों में इसे केंद्र में रख कर कहानी लिखी गयी। टेलीग्राम की कुछ बानगी विकिलीक्स के अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर के दौर के डिप्लोमैटिक केबल के खुलासों में भी सामने आई थीं, जिसमें यहाँ से भेजे जाने वाले तारों में भारतीय राजनीति में मची उथल-पुथल की जानकारियां थीं।
     
इतिहास ने तमाम ऐतिहासिक टेलीग्रामों को सुरक्षित रखा हुआ है। इसी क्रम में 23 जून, 1870 को पोर्थकुर्नो (इंग्लैंड) से बांबे भेजे गए पहले टेलीग्राम को कांप्लिमेंटरी टेलीग्राम नाम दिया गया था। यह टेलीग्राम लंदन में बैठे प्रबंध निदेशक ने बांबे (अब मुंबई) के प्रबंधक को भेजा था। इसका जवाब पांँच मिनट में प्राप्त हो गया था। इसके बाद बांबे के गवर्नर को भी संदेश भेजे गए थे। एक संदेश शिमला स्थित वाइसराय को उनकी पत्नी ने भेजा था। यह उस जमाने में तकनीक का बेजोड़ काम था। खासकर तब जब दो देशों के बीच संदेश पहुंँचाने में महीनों लग जाते थे। पहला संदेश प्रबंध निदेशक एंडरसन ने प्रबंधक स्टेसी को भेजा था - हाउ आर यू ऑल ? इसका जवाब मिला- आल वेल। लंदन से 506 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में अटलांटिक तट पर स्थित कॉर्नवाल में यह पोर्थकुर्नो घाटी है। इसी जगह से टेलीग्राम क्रांति की शुरुआत भी मानी जाती है। यहां से ब्रिटेन और इसके पूर्व उपनिवेश आपस में बातचीत करते थे। इतिहास में 15 अप्रैल 1912 को टाइटेनिक जहाज से आया टेलीग्राम भी दर्ज है, जिसमें लिखा था कि, हम तेजी से डूब रहे हैं। यात्रियों को नावों में बैठाया जा रहा है।
   ऐसा नहीं है कि टेलीग्राम का वजूद पूरी दुनिया से ही समाप्त हो चुका है। बहरीन, बेल्जियम, कनाडा, जापान, मैक्सिको, नीदरलैड, न्यूजीलैण्ड, रूस, स्वीडन, स्विटरजलैंड जैसे देशों में अब भी तार-सेवा है। अमेरिका में वेस्टर्न यूनियन ने वर्ष 2006 में तार-सेवा बंद कर दी थी, लेकिन एक कंपनी आईटेलीग्राम ने इसे खरीद लिया। ब्रिटेन में इसे आनलाइन नाम कंपनी संभालती है। जर्मनी में डोएचे पोस्ट टेलीग्राम की डिलीवरी करता है, पर वर्ष 2000 में इसे बंद कर दिया गया, लेकिन निजी कंपनी टेलीग्राम डायरेक्ट ने जर्मनी में इस सेवा को अभी भी जारी रखा है।
वस्तुतः टेलीग्राम की तकनीक मोर्स कोड ने बेतार संचार के क्षेत्र में एक ऐसा रास्ता खोला जो आगे चलकर संचार क्रांति में बदल गया। तकनीक की खूबी या खामी यही है कि वह अपने को लगातार नया करती है और पुराने को अनुपयोगी साबित करती है। टेलीग्राम से ही आगे चलकर टेलीफोन और मोबाइल क्रांति का सूत्रपात हुआ। एक तरह से यह वायरलेस तकनीक की शुरूआत थी और इसी के आधार पर आगे चलकर टेलीफोन, मोबाइल और सेटेलाइट फोन का आगमन हुआ। यह तकनीक पुरानी हो जाने के बावजूद अभी भी काफी प्रासंगिक है और सेना, नौसेना और हैम रेडियो में इसका इस्तेमाल किया जाता है। कई बार सरकारी कार्यालयों में भी आपात स्थिति हेतु इसका उपयोग किया जाता रहा है। 
परिवर्तन, प्रकृति का शाश्वत नियम है। पेड़ पर नई कोंपलों को फूटने के लिए पुराने पत्तों को झड़ना ही होता है। वक्त के साथ बहुत सारी चीजें बदल जाती हैं। डाक-तार विभाग की कई सेवायें मसलन- अंडर पोस्टल सर्टिफिकेट (यूपीसी), क्विक मेल सर्विस, सेटेलाइट मनीआर्डर, हाईब्रिड मेल सर्विस, प्रतियोगिता पोस्टकार्ड इत्यादि अतीत का हिस्सा बन गयीं। अभी बहुत दिन नहीं बीते, जब सरकार ने चवन्नी को बंद करने का फैसला लिया था। तब भी उसकी अहमियत के तमाम किस्से एकाएक सामने आने लगे थे। ऐसे ही तार के साथ भी हुआ। अब तार नहीं आएगा तो क्या, संदेश तो आते ही रहेंगे। कभी घोड़े पर सवार हरकारे संदेश लाया करते थे, फिर तार आया, फिर मोबाइल। बदलते वक्त के साथ कोई ऐसा उपकरण भी आ सकता है, जो संदेश पहुँचाने के लिहाज से इन सबसे से ज्यादा प्रभावी होगा। कहना आसान है कि बेतार पर सवार तकनीक के इस युग में तार का भला क्या काम, पर यह तो मानना ही पड़ेगा कि तमाम सेवाओं के सापेक्ष तार की यात्रा काफी लंबी रही। टेलीग्राम और तार-घर अब भले ही इतिहास बन जाएंगे लेकिन उनका अतीत हमेशा जिंदा रहेगा। तभी तो तार के बंद होने की सूचना मिलते ही लोग तारघर की तरफ दौड़ पड़े, एक अदद अंतिम तार अपने किसी इष्टजन को भेजने और उसकी यादों को हमेशा के लिए सहेजकर रख लेने के लिए।