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गुरुवार, 10 सितंबर 2009

हिन्दी का सफरनामा


भारत सदैव से विभिन्नताओं का देश रहा है। आज संसार भर में लगभग 5000 भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं । उनमें से लगभग 1652 भाषाएँ व बोलियाँ भारत में सूचीबद्ध की गई हैं जिनमें 63 भाषाएँ अभारतीय हैं । चूँकि इन 1652 भाषाओं को बोलने वाले समान अनुपात में नहीं हैं अतः संविधान की आठवीं अनुसूची में 18 भाषाओं को शामिल किया गया जिन्हें देश की कुल जनसंख्या के 91 प्रतिशत लोग प्रयोग करते हैं। इनमें भी सर्वाधिक 46 प्रतिशत लोग हिन्दी का प्रयोग करते हैं अतः हिन्दी को राजभाषा को रूप में वरीयता दी गयी। अधिकतर भारतीय भाषाएं दो समूहों से आती हैं- आर्य भाषा परिवार की भाषाएं और द्रविड़ भाषा परिवार की भाषाएं। द्रविड़ भाषाओं व बोलियों का एक अलग ही समूह हैं और आर्य भाषाओं के आगमन के बहुत पहले से ही भारत में उनका उपयोग किया जा रहा है। तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और मलयालम प्रमुख द्रविड़ भाषाएं हैं।



आर्य भाषा में सबसे प्राचीन संस्कृत भाषा (2500 ई0 पू0- 500 ई0 पू0) मानी जाती है। वेदों की रचना भी संस्कृत में की गई। संस्कृत माने परिमार्जित अथवा विशुद्ध। संस्कृत किसी समय जनभाषा थी पर व्याकरण के कठोर नियमों और उच्चारण की कठिनता के कारण संस्कृत विशिष्ट वर्ग की भाषा बनकर रह गयी। संस्कृत के साथ ही उस समय कई लोकभाषाएँ प्रचलित थीं, जिनसे संस्कृत के विभिन्न रूप प्रचलित हुए। संस्कृत के इन विभिन्न रूपों से विभिन्न प्राकृतों व अपभ्रंशों का विकास हुआ और अंत में हिन्दी आदि प्रान्तीय भाषाओं (1000 ई0 के लगभग) का विकास हुआ। कुल 7 अपभ्रंशों से आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास माना जाता है, जिसमें शौरसेनी से पश्चिमी हिन्दी (खड़ी बोली, ब्रजभाषा, वांगरू, कन्नौजी व बुन्देली बोलियाँ), राजस्थानी (मारवाडी़, जयपुरी, मालवी व मेवाती बोलियाँ), और गुजराती भाषा, महाराष्ट्री से मराठी भाषा (दक्षिणी, कोंकणी, नागपुरी व बरारी बोलियाँ), मागधी से भोजपुरी मैथिली, मगही, बंगला, उड़िया व असमी भाषाएं, अर्धमागधी से पूर्वी हिन्दी (अवधी, बघेली व छत्तीसगढ़ी बोलियाँ), पैशाची से लहँदी, ब्राचउ से सिंधी व पंजाबी भाषा तथा खस से पहाड़ी भाषाओं का उद्भव हुआ।



आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय हिन्दी भाषा हुई। कबीर की निर्गुण भक्ति एवम् भक्ति काल के सूफी-संतों ने हिन्दी को काफी समृद्ध किया। कालांतर में मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत और गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की अवधी में रचना कर हिन्दी को और भी जनप्रिय बनाया। अमीर खुसरो ने इसे ‘हिंदवी’ गाया तो हैदराबाद के मुस्लिम शासक कुली कुतुबशाह ने इसे ‘जबाने हिन्दी’ बताया। स्वतंत्रता तक हिन्दी ने कई पड़ावों को पार किया व दिनों-ब-दिन और भी समृद्ध होती गई। सन् 1741 में राम प्रसाद निरंजनी द्वारा खड़ी बोली में प्रथम ग्रंथ ‘भाषा योग्यवासिष्ठ’ लिखा गया तो सन् 1796 में देवनागरी लिपि में टाइप की गयी प्रथम प्रिंटिंग तैयार हुई। सन् 1805 में फोर्ट विलियम कालेज, कलकत्ता के लिए अध्यापक जान गिलक्राइस्ट के आदेश से लल्लू लाल जी ने खड़ी बोली गद्य में ‘प्रेमसागर’ लिखा जिसमें भागवत दशम्स्कंध की कथा वर्णित की गई। यह अंग्रेजों द्वारा भारतीय संस्कृति को हिन्दी के माध्यम से समझने का एक शुरूआती प्रयास था। सन् 1826 में कानपुरवासी पं0 जुगल किशोर ने हिन्दी का प्रथम समाचार पत्र ‘उदंत मार्तंड’ निकालना शुरू किया, जो एक वर्ष बाद ही सहायता के अभाव में बंद हो गया।


- कृष्ण कुमार यादव

7 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

Wakai bahut sundar likha apne..badhai.

Bhanwar Singh ने कहा…

हिंदी के सफरनामा पर बेहद रोचक प्रस्तुति...बधाई.

Amit Kumar Yadav ने कहा…

युवा-वर्ग हेतु प्रेरक जानकारी. जरुरत अपनी जड़ों की तरफ लौटने की है.

Ram Shiv Murti Yadav ने कहा…

कबीर की निर्गुण भक्ति एवम् भक्ति काल के सूफी-संतों ने हिन्दी को काफी समृद्ध किया। कालांतर में मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत और गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की अवधी में रचना कर हिन्दी को और भी जनप्रिय बनाया। अमीर खुसरो ने इसे ‘हिंदवी’ गाया तो हैदराबाद के मुस्लिम शासक कुली कुतुबशाह ने इसे ‘जबाने हिन्दी’ बताया।
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वाकई हिंदी सामाजिक सद्भाव को भी जोड़ती है...बेहतरीन आलेख...साधुवाद.

हिंदी साहित्य संसार : Hindi Literature World ने कहा…

Nice Post.

Shyama ने कहा…

बहुत सी नई बातों से रु-ब-रु होने का मौका मिला. आप हिंदी पर अच्छा कार्य कर रहे हैं.

Dr. Brajesh Swaroop ने कहा…

हिंदी के बारे में शोधपूर्ण लेख के लिए बधाई.