समर्थक / Followers

शनिवार, 12 सितंबर 2009

हिन्दी का सफरनामा : राष्ट्रीय आन्दोलन की भाषा बनी हिन्दी



राजनैतिक स्तर पर भी हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने हेतु कई समाज सुधारकों व साहित्यकारों ने यत्न किए। गुजराती कवि नर्मद (1833-86) ने हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव किया तो सन् 1918 में मराठी भाषी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से घोषित किया कि- हिन्दी भारत की राजभाषा होगी। उसी समय देश की राजनीति में एक नक्षत्र की भांति तेजी से उभर रहे गुजराती भाषी महात्मा गाँधी ने भी कहा -''हिन्दी ही देश को एकसूत्र में बाँध सकती है। मुझे अंग्रेजी बोलने में शर्म आती है और मेरी दिली इच्छा है कि देश का हर नागरिक हिन्दी सीख ले व देश की हर भाषा देवनागरी में लिखी जाये।'' उन्होनें इसको तार्किक रूप देते हुए कहा कि-‘‘सभी भाषाओं को एक ही लिपि में लिखने से वही लाभ होगा जो यूरोप की तमाम भाषाओं को एक ही लिपि में लिखे जाने से हुआ। इससे तमाम यूरोपीय भाषाएँ अधिक विकसित और समुन्नत हुयीं।’’ 1918 में इन्दौर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन सभा में महात्मा गाँधी ने दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचारकों को भेजा, इनमें स्वयं उनके पुत्र देवदास गाँधी भी थे। 1919 के बाद तो गाँधी जी ने कांग्रेस को अपने सभी कार्य हिन्दी में करना एक तरह से बाध्यकारी बना दिया। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि जिसे हिन्दी नहीं आती उसे कांग्रेस के अधिवेशनों में बोलने का अवसर नहीं दिया जाएगा। इसी से प्रभावित होकर सरदार पटेल ने 1919 में अहमदाबाद के कांग्रेस अधिवेशन में अपना स्वागत भाषण हिन्दी में दिया और अधिवेशन के स्वागत मंत्री पी0 जी0 मावलंकर, जो कि कालांतर में प्रथम लोकसभा अध्यक्ष बने, ने अधिवेशन के सभी दस्तावेज हिन्दी में तैयार किए।





स्वामी दयानन्द सरस्वती, केशव चन्द्र सेन, सुभाष चन्द्र बोस, आचार्य कृपलानी, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जैसे अनेक अहिन्दी भाषी नेताओं ने हिन्दी को भारत की राजभाषा बनाने की पैरवी की। 20 दिसम्बर, 1928 को कलकत्ता में राजभाषा सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सुभाष चन्द्र बोस ने देश के प्रत्येक नागरिक विशेषकर नवयुवकों से हिन्दी सीखने की अपील की तथा इस बात पर खेद भी व्यक्त किया कि वे स्वयं अच्छी हिन्दी नहीं बोल पाते हैं। 1935 में मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री रूप में सी0 राजगोपालाचारी ने हिन्दी शिक्षा को अनिवार्य कर दिया। 1935 में ही बेल्जियम के नागरिक डाॅ0 कामिल बुल्के इसाई धर्म प्रचार के लिए भारत आए पर फ्रेंच, अंग्रेजी, लेमिश, आयरिश भाषाओं पर अधिकार होने के बाद भी हिन्दी को ही अभिव्यक्ति का माध्यम चुना। अपने हिन्दी ज्ञान में वृद्धि हेतु उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम0ए0 किया और तुलसी दास को अपने प्रिय कवि के रूप में चुनकर ‘रामकथा उद्भव और विकास’ पर डी0 फिल की उपाधि भी प्राप्त की। निश्चिततः स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में हिन्दी राष्ट्रीय आन्दोलन और भारतीय संस्कृति की अभिव्यक्ति की भाषा बनी।

एक टिप्पणी भेजें