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रविवार, 29 मार्च 2015

छुट्टियों का आनंद : उम्मेद भवन पैलेस, जोधपुर में


राजस्थान अपनी ऐतिहासिकता और स्थापत्य कला लिए प्रसिद्ध है।  जयपुर  यहाँ जोधपुर सबसे महत्वपूर्ण बड़ा शहर है।  उमेद भवन पैलेस यहाँ सबसे प्रमुख आकर्षण का केंद्र है। इसके संस्थापक महाराजा उमेदसिंह (1929-1942) के काल में ही जोधपुर एक आधुनिक शहर के रूप में विकसित हुआ।

महराजा उमेदसिंह  ने उमेद भवन पैलेस बनवाया था। यह महल छित्तर महल के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह महल वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है। हाथ से तराशे गए पत्थरों के टुक़डे अनोखे ढंग से एक-दूसरे पर टिकाए गए हैं। इनमें दूसरा कोई पदार्थ नहीं भरा गया है। महल के एक हिस्से में होटल और दूसरे में संग्रहालय है, जिसमें आधुनिक हवाई जहाज, शस्त्र, पुरानी घड़ियाँ, कीमती क्रॉकरी तथा शिकार किए जानवर रखे गए हैं।



उम्मेद भवन पैलेस का नाम इसके संस्थापक  महराजा उमेदसिंह (1929-1942) के नाम पर रखा गया है। चित्तर पहाड़ी पर होने के कारण यह सुंदर महल 'चित्तर पैलेस' के रूप में भी जाना जाता है। यह भारत - औपनिवेशिक स्थापत्य शैली और डेको-कला का एक आदर्श उदाहरण है। डेको कला स्थापत्य शैली यहाँ हावी है और यह 1920 और 1930 के दशक के आसपास की शैली है। 

महल को तराशे गये बलुआ पत्थरों को जोड़ कर बनाया गया था। महल के निर्माण के दौरान पत्थरों को बाँधने के लिये मसाले का उपयोग नहीं किया गया था। यह विशिष्टता बड़ी संख्या में पर्यटकों को इस महल की ओर आकर्षित करती है। इस सुंदर महल के वास्तुकार हेनरी वॉन, एक अंग्रेज थे। महल का एक हिस्सा हेरिटेज होटल में परिवर्तित कर दिया गया है, जबकि बाकी हिस्सा एक संग्रहालय के रूप में है, जिसमें विंटेज कारें, आधुनिक हवाई जहाज  प्रतिरूप, शस्त्र, पुरानी घड़ियाँ, कीमती क्रॉकरी तथा शिकार किए जानवर रखे गए हैं। अपने स्थापत्य के  कारण उम्मेद भवन पैलेस देश ही नही वरन विदेशो में भी काफी प्रसिद्ध है !!


शनिवार, 21 मार्च 2015

'संगम नगरी' इलाहाबाद को अलविदा....अब 'सूर्य नगरी' जोधपुर में



संगम नगरी 'प्रयाग' से सूर्य नगरी 'जोधपुर' तक का सफर। राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएँ रूप में 16 मार्च, 2015 को हमने कार्यभार ग्रहण कर लिया। इस क्षेत्र के अधीन कुल 10  डाक मंडल हैं। इनमें जोधपुर-जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, चुरू, झुंझुनू, नागौर, पाली, सीकर, सिरोही-जालोर, श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ शामिल हैं।




नया क्षेत्र, नया परिवेश, नए लोग, नई-नई बातें। वाकई जीवन का आनंद ठहराव में नहीं यायावरी में ही है !!



अब मुलाकातें जोधपुर में होंगी !!

रविवार, 1 मार्च 2015

लट्ठमार होली राधा-कृष्ण के बरसाना व नंदगाँव में

होली का त्योहार आने में भले ही अभी देरी हो लेकिन कृष्ण की नगरी नंदगांव, बरसाना, मथुरा, वृंदावन में हफ्ते भर पहले से ही रंग, अबीर, गुलाल उड़ने लगे हैं। गोपियों संग होली मनाने पहुंचे हुरियारों पर कहीं लाठियां बरसीं तो कहीं उड़े रंग-गुलाल। वैसे भी होली की रंगत बरसाने की लट्ठमार होली के बिना अधूरी ही मानी जाती है । इस होली में औरतें घूंघट ओढ़कर और हाथ में लाठी लेकर पुरुषों पर प्रहार करती हैं, और पुरुष उनके प्रहारों से बचने की भरसक कोशिश करते हैं।... और यह सब होता है बड़े ही प्यार से।  परंपरा के अनुसार यहां की होली में नंदगांव के पुरूष और बरसाने की महिलाएं भाग लेती हैं, क्योंकि कृष्ण नंदगांव के थे और राधा बरसाने की थीं। नंदगांव और बरसाने के लोगों का विश्वास है कि होली की इन लाठियों से किसी को चोट नहीं लगती है।

कृष्ण-लीला भूमि होने के कारण फाल्गुन शुल्क नवमी को ब्रज में बरसाने की लट्ठमार होली का अपना अलग ही महत्व है। ब्रज में तो वसंत पंचमी के दिन ही मंदिरों में डांढ़ा गाड़े जाने के साथ ही होली का शुभारंभ हो जाता है। बरसाना में हर साल फाल्गुन शुक्ल नवमी के दिन होने वाली लट्ठमार होली देखने व राधारानी के दर्शनों की एक झलक पाने के लिए यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु व पर्यटक देश-विदेश से खिंचे चले आते हैं। इस दिन नन्दगाँव के कृष्णसखा ‘हुरिहारे’ बरसाने में होली खेलने आते हैं, जहाँ राधा की सखियाँ लाठियों से उनका स्वागत करती हैं। यहाँ होली खेलने वाले नंदगाँव के हुरियारों के हाथों में लाठियों की मार से बचने के लिए मजबूत ढाल होती है। परंपरागत वेशभूषा में सजे-धजे हुरियारों की कमर में अबीर-गुलाल की पोटलियाँ बंधी होती हैं तो दूसरी ओर बरसाना की हुरियारिनों के पास मोटे-मोटे तेल पिलाए लट्ठ होते हैं। बरसाना की रंगीली गली में पहुँचते ही हुरियारों पर चारों  ओर से टेसू के फूलों से बने रंगों की बौछार होने लगती है। परंपरागत शास्त्रीय गान ‘ढप बाजै रे लाल मतवारे को‘ का गायन होने लगता है। हुरियारे ‘फाग खेलन बरसाने आए हैं नटवर नंद किशोर‘, का गायन करते हैं तो हुरियारिनें ‘होली खेलने आयै श्याम आज जाकूं रंग में बोरै री‘, का गायन करती हैं। भीड़ के एक छोर से गोस्वामी समाज के लोग परंपरागत वाद्यों के साथ महौल को शास्त्रीय रुप देते हैं। ढप, ढोल, मृदंग की ताल पर नाचते-गाते दोनों दलों में हंसी-ठिठोली होती है। हुरियारिनें अपनी पूरी ताकत से हुरियारों पर लाठियों के वार करती हैं तो हुरियार अपनी ढालों पर लाठियों की चोट सहते हैं। हुरियारे  मजबूत ढालों से अपने शरीर की रक्षा करते हैं एवं चोट लगने पर वहाँ ब्रजरज लगा लेते हैं। 

बरसाना की होली के दूसरे दिन फाल्गुन शुक्ल दशमी को सायंकाल ऐसी ही लट्ठमार होली नन्दगाँव में भी खेली जाती है। अन्तर मात्र इतना है कि इसमें नन्दगाँव की नारियाँ बरसाने के पुरूषों का लाठियों से सत्कार करती हैं। इसमें बरसाना के हुरियार नंदगाँव की हुरियारिनों से होली खेलने नंदगाँव पहुँचते हैं। फाल्गुन की नवमी व दशमी के दिन बरसाना व नंदगाँव के लट्ठमार आयोजनों के पश्चात होली का आकर्षण वृन्दावन के मंदिरों की ओर हो जाता है, जहाँ रंगभरी एकादशी के दिन पूरे वृंदावन में हाथी पर बिठा राधावल्लभ लाल मंदिर से भगवान के स्वरुपों की सवारी निकाली जाती है। बाद में भी ठाकुर के स्वरूप पर गुलाल और केशर के छींटे डाले जाते हैं। ब्रज की होली की एक और विशेषता यह है कि धूलैड़ी मना लेने के साथ ही जहाँ देश भर में होली का खूमार टूट जाता है, वहीं ब्रज में इसके चरम पर पहुँचने की शुरुआत होती है। 

- कृष्ण कुमार यादव : Krishna Kumar Yadav 
https://www.facebook.com/krishnakumaryadav1977

वसंत और सरसों में खिले पीले फूल



वसंत को ऋतुराज कहा गया है।  इस समय पंचतत्त्व जल, वायु, धरती, आकाश और अग्नि अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने रूप में प्रकट होते हैं। इस दौरान सर्वत्र हरियाली दृष्टोगोचर होती है और उनमें पीली वस्तुओं का सम्मिलन इसे और भी मोहक बनाता है। भारतीय संस्कृति में पीले रंग को शुभ माना गया है।  बसंत पंचमी पर न केवल पीले रंग के वस्त्र पहने जाते हैं, अपितु खाद्य पदार्थों में भी पीले चावल पीले लड्डू व केसर युक्त खीर का उपयोग किया जाता है, जिसे बच्चे तथा बड़े-बूढ़े सभी पसंद करते हैं। अतः इस दिन सब कुछ पीला दिखाई देता है और प्रकृति खेतों को पीले-सुनहरे रंग से सज़ा देती है, तो दूसरी ओर घर-घर में लोग के परिधान भी पीले दृष्टिगोचर होते हैं। नवयुवक-युवती एक -दूसरे के माथे पर चंदन या हल्दी का तिलक लगाकर पूजा समारोह आरम्भ करते हैं। तब सभी लोग अपने दाएं हाथ की तीसरी उंगली में हल्दी, चंदन व रोली के मिश्रण को माँ सरस्वती के चरणों एवं मस्तक पर लगाते हैं, और जलार्पण करते हैं। धान व फलों को मूर्तियों पर बरसाया जाता है। गृहलक्ष्मी बेर, संगरी, लड्डू इत्यादि बांटती है। 



बसंत में न तो ज्यादा गर्मी होती है और न ही ठंडी।  आकाश स्वच्छ है, वायु सुहावनी है, अग्नि (सूर्य) रुचिकर है तो जल पीयूष के समान सुखदाता और धरती, उसका तो कहना ही क्या वह तो मानो साकार सौंदर्य का दर्शन कराने वाली प्रतीत होती है। ठंड से ठिठुरे विहंग अब उड़ने का बहाना ढूंढते हैं तो किसान लहलहाती जौ की बालियों और सरसों के फूलों को देखकर नहीं अघाते। बसंत की ऋतु हो तो सरसों नाम अनायास ही ओंठों पर आ जाता है। आर्युवेदिक ग्रंथ भावप्रकाश के अनुसार सरसों के बीज उष्ण, तीखे और त्वचा रोगों को हरने वाले होते हैं तथा ये वात, पित्त और कफ जनित दोषों को शांत करते हैं। होलिकोत्सव में सरसों के चूर्ण से उबटन लगाने की परंपरा है, ताकि ग्रीष्म ऋतु में त्वचा की सुरक्षा रहे। सरसों प्रकृति के सौंदर्य का प्रतीक तो है ही आर्थिक दृष्टि से भी यह भारत के सामाजिक जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। धनी जहाँ प्रकृति के नव-सौंदर्य को देखने की लालसा प्रकट करने लगते हैं तो वहीं निर्धन शिशिर की प्रताड़ना से मुक्त होने पर सुख की अनुभूति करने लगते हैं। सच! प्रकृति तो मानो उन्मादी हो जाती है। हो भी क्यों ना! पुनर्जन्म जो हो जाता है। श्रावण की पनपी हरियाली शरद के बाद हेमन्त और शिशिर में वृद्धा के समान हो जाती है, तब बसंत उसका सौन्दर्य लौटा देता है। नवगात, नवपल्लव, नवकुसुम के साथ नवगंध का उपहार देकर विलक्षण बना देता है।




आया वंसत आया वसंत
छाई जग में शोभा अनंत।
सरसों खेतों में उठी फूल
बौरें आमों में उठीं झूल
बेलों में फूले नए फूल
पल में पतझड़ का
हुआ अंत
आया वसंत आया वसंत। 
(कविवर सोहन लाल द्विवेदी) 



सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

बेटियों को मुखर होना होगा ...

नारी सशक्तिकरण आज के दौर की एक प्रमुख जरूरत है। राजनैतिक-प्रशासनिक हलकों  से लेकर सामाजिक, आर्थिक और वैयक्तिक स्तर तक इसके लिए प्रयास किये जा रहे हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी जी ने भी बेटी बचाओ अभियान की शुरुआत की है।  इससे पहले भी इस तरह की तमाम पहल हुई हैं। ऐसी सभी कवायदों से परे रचनात्मक तौर पर साहित्यकार, कलाकार और बुद्धिजीवी भी इस ओर समाज को उन्मुख कर रहे हैं। 'दामिनी' केस की गूँज दिल्ली से लेकर विदेशों तक सुनाई दी थी पर अभी भी समाज में संवेदना और संचेतना उस स्तर तक नहीं पहुँच सकी है।  पिछले दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय की कला छात्रा दामिनी शर्मा द्वारा लगाई गई कला प्रदर्शनी को देखा तो उसमें तमाम ऐसी कलाकृतियाँ मौजूद थीं, जो नारियों/बेटियों  के प्रति समाज में हो रही घटनाओं को रेखांकित करती हैं, वहीं अब नारी द्वारा मुखर होकर व्यक्त किये गए तमाम भावों को भी कला के माध्यम से शब्द दिया गया है। वाकई आज जरूरत है कि बेटियाँ स्वयं इन सब चीजों के प्रति मुखर हों, उनका डटकर सामना करें और यह पहल परिवार से आरम्भ होकर राष्ट्र तक पहुँचनी चाहिए !!







शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

गाँधी जी की आत्मा

महात्मा गाँधी
सत्य और अहिंसा की मूर्ति
जिसके सत्याग्रह ने
साम्राज्यवाद को भी मात दी
जिसने भारत की मिट्टी से
एक तूफान पैदा किया
जिसने पददलितों और उपेक्षितों
की मूकता को आवाज दी
जो दुनिया की नजरों में
जीती-जागती किवदंती बना 
आज उसी गाँधी को हमने 
चौराहों, मूर्तियों, सेमिनारों और किताबों
तक समेट दिया
गोडसे ने तो सिर्फ
उनके भौतिक शरीर को मारा
पर हम रोज उनकी
आत्मा को कुचलते देखते हैं
खामोशी से।



महात्मा गाँधी जी दुनिया की एकमात्र शख्शियत हैं, जिनके ऊपर प्राय: अधिकतर देशों ने डाक टिकट जारी किये हैं।  यही नहीं, भारत में भी डाक टिकटों पर महात्मा गाँधी ही सर्वाधिक बार प्रकाशित हुए हैं।  गाँधी जी भौतिक रूप से भले ही हमारे बीच नहीं हैं, पर उन्होंने सत्य-अहिंसा और सत्याग्रह की पूरे विश्व में जो अलख जगाई, वह उन्हें चिर-काल तक जीवंत रखेगी।  आज गाँधी जी की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि !!

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

फिर से चर्चा में है हिंदी ब्लॉगिंग


हिंदी ब्लॉगिंग आज न्यू मीडिया के एक सशक्त माध्यम के रूप में कार्यरत है। देश ही नहीं विदेशों में भी हिंदी ब्लॉगिंग के मुरीदों की कमी नहीं है।  इसी क्रम में 15 से 18 जनवरी 2015 तक भूटान की राजधानी थिम्पू और सांस्कृतिक राजधानी पारो में  चतुर्थ ‘‘अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन‘‘ का आयोजन किया गया। सम्मेलन के दौरान वैश्विक परिप्रेक्ष्य विशेषकर सार्क देशों में हिन्दी के पठन-पाठ्न, हिन्दी साहित्य के प्रचार-प्रसार, न्यू मीडिया के रूप में ब्लॉगिंग के विभिन्न आयामों एवं बदलते दौर में सोशल मीडिया की भूमिका इत्यादि विषयों पर भी चर्चा हुई। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि भूटान चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के महासचिव श्री फूब शृंग ने कहा कि भूमण्डलीकरण के इस दौर में विभिन्न देशों के साहित्य, संस्कृति एवं परिवेश को ब्लागिंग और सोशल मीडिया के माध्यम से न सिर्फ महसूस किया जा सकता है बल्कि उसे विस्तार भी दिया जा सकता है। उन्होंने  भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी एवं राष्ट्रपति की हालिया भूटान यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि भूटान में अंतर्राष्ट्रीय  ब्लागर सम्मेलन को भी उसी कड़ी  में देखने की जरूरत है। सार्क समिति के महिला विंग  की अध्यक्ष श्रीमती थिनले ल्हाम ने कहा कि नारी सशक्तीकरण पर आज विश्व भर में चर्चा हो रही है और ऐसे में सार्क देशों में ब्लागिंग से जुडी तमाम महिलाओं को देखना एक सुखद एहसास देता है। 

इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ और ब्लॉगर श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि ब्लॉगिंग  न सिर्फ देशों और भाषाओं के बीच दूरियाॅं कम करती है बल्कि यह विभिन्न प्लेटफार्म पर काम कर रहे लोगों के विचारों को एकाकार रूप में देखने की सहूलियत भी देती है । ब्लागिंग व सोशल मीडिया के समाजिक सरोकारों पर चर्चा करते हुए इसे उन्होंने  दूर दराज के इलाकों तक भी जोडने की बात कही। असम विश्वविद्यालय सिल्चर के भाषा विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर नित्यानन्द पाण्डेय  ने कहा कि हिन्दी को समृद्ध करने में ब्लागिंग का महत्वपूर्ण योगदान है और इसके माध्यम से दुनिया भर के लोग हिन्दी से जुड रहे हैं। वरिष्ठ व्यंग्यकार गिरीश पंकज ने अपने उद्बोधन में हिंदी ब्लॉगिंग के विभिन्न पहलुओं की चर्चा करते हुए इसे पुस्तकाकार रूप में भी लिपिबद्ध करने की बात कही। 

सम्मेलन के संयोजक श्री रवीन्द्र प्रभात ने कहा कि भूटान में अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉग सम्मलेन आयोजित करने के पीछे उद्देश्य हिंदी संस्कृति को भूटानी संस्कृति के करीब लाना और हिंदी भाषा को यहाँ के वैश्विक वातावरण में प्रतिष्ठापित करना है। उन्होंने बताया कि सम्मेलन का मूल उद्देश्य दक्षिण एशिया में ब्लॉग के विकास हेतु पृष्ठभूमि तैयार करना, हिंदी-संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना, भाषायी सौहार्द्रता एवं सांस्कृतिक अध्ययन-पर्यटन का अवसर उपलब्ध कराना है। 

‘‘अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन‘‘ के दौरान  उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद से ब्लॉगर और साहित्यकार एवं निदेशक डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव, हैदराबाद की सम्पत देवी मुरारका और रायपुर छतीसगढ़ के ललित शर्मा को  सर्वोच्च 'परिकल्पना सार्क शिखर सम्मान' से नवाजा गया। इस सम्मान के अंतर्गत उन्हें 25,000 की धनराशि, स्मृति चिन्ह, सम्मान-पत्र और अंगवस्त्र प्रदान किए गए। साथ ही महाराष्ट्र के औरंगाबाद की अनुवादक सुनीता प्रेम यादव को परिकल्पना सार्क सम्मान प्रदान किया गया। इस सम्मान के अंतर्गत उन्हें पाँच  हजार की धनराशि, स्मृति चिन्ह, सम्मान-पत्र और अंगवस्त्र प्रदान किए गए। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश के जनपदों मसलन सुल्तानपुर के डॉ राम बहादुर मिश्र को परिकल्पना साहित्य भूषण सम्मान, बाराबंकी के  एडवोकेट रणधीर सिंह सुमन व डॉ विनय दास को क्रमशः परिकल्पना सोशल मीडिया सम्मान और परिकल्पना कथा सम्मान, लखनऊ की कुसुम वर्मा को परिकल्पना लोक-संस्कृति सम्मान, बहराइच के डॉ अशोक गुलशन को परिकल्पना हिन्दी गौरव सम्मान, रायबरेली से सूर्य प्रसाद शर्मा को परिकल्पना साहित्य सम्मान तथा हैदरगढ के ओम प्रकाश जयंत व विष्णु कुमार शर्मा को क्रमशः को परिकल्पना साहित्य श्री सम्मान व परिकल्पना सृजन श्री सम्मान तथा उन्नाव के विश्वंभरनाथ अवस्थी को परिकल्पना नागरिक सम्मान प्रदान किए गए। इसके अलावा इंदौर के प्रकाश हिन्दुस्तानी, रायपुर के गिरीश पंकज, अल्पना देशपांडे, अदिति देशपांडे, दिल्ली की सर्जना शर्मा और निशा सिंह, मुंबई से आलोक भारद्वाज, सिल्चर की डॉ शुभदा पाण्डेय आदि के साथ-साथ  देश-विदेश के लगभग तीस ब्लॉगर्स को विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान के लिए परिकल्पना सम्मान से नवाजा गया। 

इस अवसर पर पांच पुस्तकों क्रमशः संपत देवी मुरारका की यात्रा वृत्त तृतीय भाग, कुसुम वर्मा की ह्रदय कँवल, सूर्य प्रसाद शर्मा निशिहर की संघर्षों का खेल, विष्णु कुमार शर्मा की दोहावली, अशोक गुलशन की क्या कहूँ किससे कहूँ और परिकल्पना समय पत्रिका के जनवरी अंक के विमोचन के साथ-साथ परिकल्पना कोश  वेबसाईट का लोकार्पण हुआ, वहीं रायपुर छत्तीसगढ़ की अल्पना देशपांडे और अदिति देशपांडे की कलाकृतियों की प्रदर्शनी का लोकार्पण संपन्न हुआ।  इस अवसर पर कुसुम वर्मा के अवधी लोकगीतों की खुशबू में नहाई भूटान की एक शाम। डॉ राम बहादुर मिश्र के कुशल संचालन में सुर सरस्वती और संस्कृति की त्रिवेणी प्रवाहित करती काव्य संध्या और ब्लॉग पर हाशिए का समाज परिचर्चा में शामिल हुए भारत और भूटान के एक दर्जन से ज्यादा ब्लोगर्स। कार्यक्रम का  संचालन महाराष्ट्र के औरंगाबाद निवासी श्रीमती सुनीता प्रेम यादव ने किया।















(अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, भूटान  के दौरान  उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद से ब्लॉगर और साहित्यकार एवं निदेशक डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव को  सर्वोच्च 'परिकल्पना सार्क शिखर सम्मान' प्राप्त होने पर  21 जनवरी, 2015 को विभिन्न हिंदी-अंग्रेजी अख़बारों में प्रकाशित समाचार)






मंगलवार, 20 जनवरी 2015

अन्तर्राष्ट्रीय ब्लाॅगर सम्मेलन, भूटान में कृष्ण कुमार यादव “परिकल्पना सार्क शिखर सम्मान’’ से सम्मानित

हिंदी साहित्य और ब्लाॅग पर संस्मरणात्मक सृजन के लिए चर्चित ब्लाॅगर व साहित्यकार एवं सम्प्रति इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ श्री कृष्ण कुमार यादव को 15-18 जनवरी 2015 के दौरान भूटान की राजधानी थिम्पू में आयोजित चतुर्थ अन्तर्राष्ट्रीय ब्लाॅगर सम्मेलन में ब्लाॅगिंग हेतु सर्वोच्च “परिकल्पना सार्क शिखर सम्मान’’ से सम्मानित किया गया। श्री यादव को उक्त सम्मान भूटान चेंबर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्री के जनरल सेक्रेटरी श्री फूप श्रृंग एवं इंटरनेशनल स्कूल ऑफ भूटान तथा सार्क समिति ऑफ विमेन ऑर्गनाइजेशन  की अध्यक्ष श्रीमती थिनले लम्हा द्वारा दिया गया। सम्मान के तहत 25,000 रूपये की धनराशि, सम्मान पत्र, प्रतीक चिन्ह, श्रीफल और अंगवस्त्रम  देकर श्री कृष्ण कुमार यादव को सम्मानित किया गया। उक्त जानकारी सम्मलेन के संयोजक श्री रवीन्द्र प्रभात ने दी। 


    
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साहित्यिक रचनाधर्मिता के साथ-साथ 7 पुस्तकों के लेखक एवं हिन्दी ब्लाॅगिंग व सोशल मीडिया को नये आयाम देनेवाले श्री कृष्ण कुमार यादव को इससे पूर्व भी शताधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। श्री यादव ने वर्ष 2008 में ब्लाॅग जगत में कदम रखा और विभिन्न विषयों पर आधारित दसियों ब्लाॅग का संचालन-सम्पादन करके कई लोगों को ब्लाॅगिंग की तरफ प्रवृत्त किया। कृष्ण कुमार यादव के दो व्यक्तिगत ब्लॉग हैं। इनमें “शब्द सृजन की ओर“ (http://kkyadav.blogspot.com) ब्लॉग सामयिक विषयों, मर्मस्पर्शी कविताओं व जानकारीपरक, शोधपूर्ण आलेखों से परिपूर्ण है; वहीं “डाकिया डाक लाया“ (http://dakbabu.blogspot.com) डाक सेवाओं की रोचक दुनिया को सहेजता है। इन ब्लॉग  को अब तक लाखों लोगों ने पढ़ा है और करीब सौ ज्यादा देशों में इन्हें देखा-पढ़ा जाता है।

     गौरतलब है कि श्री कृष्ण कुमार यादव यादव सिर्फ व्यक्तिशः नहीं बल्कि सपरिवार ब्लाॅगिंग के क्षेत्र में सशक्त दखल रखते हैं। उनकी सुपुत्री अक्षिता (पाखी) को जहाँ भारत सरकार द्वारा ब्लाॅगिंग के लिए राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है, वहीं पत्नी आकांक्षा यादव भी अग्रणी महिला ब्लॉगर हैं। यादव दम्पति को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा “अवध सम्मान“, हिंदी ब्लॉगिंग के दशक वर्ष में सपत्नीक “दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दम्पति“ का सम्मान एवं नेपाल में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय ब्लाॅगर सम्मेलन में भी सम्मानित किया जा चुका है।  

       भूटान में सम्मेलन के दौरान श्री कृष्ण कुमार यादव ने वैश्विक परिप्रेक्ष्य विशेषकर सार्क देशों में  हिन्दी के प्रचार-प्रसार, न्यू मीडिया के रूप में ब्लाॅगिंग के विभिन्न आयामों एवं बदलते दौर में सोशल मीडिया की भूमिका पर व्याख्यान भी दिया। 

इस दौरान भूटान चैंबर ऑफ कामर्स के डिप्टी जनरल सेक्रेटरी श्री चंद्र क्षेत्री, केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा के पूर्व निदेशक एवं सम्प्रति असम विश्वविद्यालय, सिलचर के भाषा विज्ञानं विभाग के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर नित्यानंद पाण्डेय, चर्चित ब्लॉगर और साहित्यकार एवं सम्प्रति इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ श्री कृष्ण कुमार यादव, छत्तीसगढ़ से वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री गिरीश पंकज और अन्तर्राष्ट्रीय ब्लाॅगर सम्मेलन के आयोजक श्री रवीन्द्र प्रभात मंचासीन रहे। 

सम्मेलन में संपत देवी मुरारका की यात्रा वृत्त तृतीय भाग, कुसुम वर्मा की ह्रदय कँवल, सूर्य प्रसाद शर्मा निशिहर की दोहावली, अशोक गुलशन की क्या कहूँ किससे कहूँ सहित पाँच पुस्तकों और 'परिकल्पना समय' पत्रिका के जनवरी अंक का विमोचन के अलावा विभिन्न देशों के लगभग तीस ब्लॉगर्स को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में लखनऊ की कुसुम वर्मा के अवधी लोकगीतों ने अंतर्राष्ट्रीय ब्लोगर सम्मलेन को जीवंतता के साथ साथ भूटान की  शाम को खुशनुमा बना दिया।  कार्यक्रम का संचालन औरंगाबाद की ब्लॉगर श्रीमती सुनीता प्रेमी यादव द्वारा किया गया। 

प्रस्तुति :
रत्नेश कुमार मौर्या
संयोजक - ’शब्द साहित्य’, इलाहाबाद-211003