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शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

डिजिटल वर्ल्ड से हिंदी में आएगा बदलाव

दुनिया के विभिन्न देशों में हिंदी के प्रति लोगों का झुकाव बढ़ रहा है, इसलिए जरूरी है कि हिंदी को और समृद्ध व सशक्त बनाने की दिशा में प्रयास किए जाएं। इसके साथ हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं से जोड़ते हुए उसका डिजिटल दुनिया में उपयोग बढ़ाना होगा। उक्त उद्गार मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 10 सितंबर को को तीन दिवसीय 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्त किये। विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन स्थल लाल परेड मैदान में बसे माखनलाल चतुर्वेदी नगर में रामधारी सिंह दिनकर सभागार में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने विदेशी प्रवासों का जिक्र करते हुए कहा कि इन प्रवासों के दौरान उन्हें पता चला है कि दुनिया के अन्य देशों में हिंदी के क्षेत्र में कितना काम हो रहा है और वे हिंदी को कितना पसंद करते हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आने वाले दिनों में हिंदी का महत्व और बढ़ने वाला है, क्योंकि भाषा शास्त्रियों का मत है कि जिस तरह से दुनिया बदल रही है उसके चलते 21वीं शताब्दी के खत्म होने तक छह हजार भाषाओं में से 90 प्रतिशत भाषाएं विलुप्त हो जाने की संभावना दिखाई दे रही है। इस चेतावनी को अगर हम न समझे और हमने अपनी भाषा का संरक्षण नहीं किया तो वह पुरातत्व का विषय बन जाएगा, हमारा दायित्व बनता है कि भाषा को समृद्ध  कैसे बनाएं, और चीजों को जोड़ें। जब भाषा के दरवाजे बंद किए गए तब भाषा का नुकसान हुआ है।

उन्होंने कहा कि अगर हम हिंदी और रामचरित मानस को भूल जाते हैं तो हमारी स्थिति ठीक वैसी ही होगी, जैसे बगैर पैर के खड़े हैं। फणीश्वरनाथ रेणु, जयशंकर प्रसाद, मुंशी प्रेमचंद जो हमें दे गए हैं, उसे नहीं पढ़ा तो हम बिहार की गरीबी और ग्रामीण जीवन को नहीं जान पाएंगे। इसलिए भाषा को समृद्ध बनाना होगा। अगर भाषा ही नहीं बची तो इतना बड़ा साहित्य का भंडार और अनुभव कहां बचेगा।

हिंदी, अंग्रेजी, चीनी भाषा का होगा दबदबा :

उन्होंने कहा कि डिजिटल वर्ल्ड से दुनिया में बड़ा बदलाव आने वाला है। बाप-बेटा और पति-पत्नी तक वॉट्सएप का इस्तेमाल करने लगे हैं। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि इस क्षेत्र में आने वाले दिनों में तीन भाषाएं अंग्रेजी, चायनीज और हिंदी का दबदबा रहेगा। जो तकनीक से जुड़े हुए हैं उनका दायित्व बनता है कि वे तकनीक को इस तरह से परिवर्तित करें कि वह भारतीय भाषा और हिंदी के लिए हो।

प्रधानमंत्री ने कहा कि हर पीढ़ी का दायित्व है कि उसके पास जो विरासत है उसे सुरक्षित रखें और आने वाली पीढ़ी को सौंपे। भाषा जड़ नहीं होती उसमें जीवन की तरह चेतना होती है। इस चेतना की अनुभूति भाषा के विकास और समृद्धि से होती है। भाषा में ताकत होती है जहां से भी गुजरती है वहां की परिस्थिति को अपने में समाहित करती है। हिन्दुस्तान की सभी भाषाओं की उत्तम चीजों को हिन्दी भाषा की समृद्घि का हिस्सा बनाना चाहिए। मातृभाषा के रूप में हर राज्य के पास भाषा का खजाना है, इसे जोड़ने में सूत्रधार का काम करें।

मोदी ने कहा कि डिजिटल दुनिया ने हमारे जीवन में गहरे तक प्रवेश कर लिया है। हमें हिंदी और भारतीय भाषाओं को तकनीकी के लिए परिवर्तित करना होगा। बदले हुए तकनीकी परिदृश्य में भाषा का बड़ा बाजार बनने वाला है। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। भाषा हर किसी को जोड़ने वाली होनी चाहिए। हर भारतीय भाषा अमूल्य है। भाषा की ताकत का अंदाजा उसके लुप्त होने के बाद होता है।

अहिंदीभाषियों ने चलाया हिंदी भाषा आंदोलन :

हिन्दी भाषा का आंदोलन देश में ऐसे महापुरुषों ने चलाया जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं थी, यह प्रेरणा देता है। भाषा और लिपि की ताकत अलग-अलग होती है। देश की सारी भाषाएं नागरी लिपि में लिखने का आंदोलन यदि प्रभावी हुआ होता तो लिपि राष्ट्रीय एकता की ताकत के रूप में उभर कर आती। भारतीय फिल्मों ने भी दुनिया में हिन्दी को पहुंचाने का कार्य किया है। उन्होंने कहा कि विश्व हिन्दी सम्मेलन के माध्यम से हिन्दी को समृद्घ बनाने की पहल होगी और निश्चित परिणाम निकलेंगे।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने सम्मेलन को मध्यप्रदेश और भोपाल में आयोजित करने का कारण बताते हुए कहा कि मध्यप्रदेश हिन्दी के लिए समर्पित राज्य है और भोपाल सफल आयोजन करने के लिये विख्यात है। उन्होंने विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजनों की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 32 वर्षों बाद यह भारत में आयोजित हो रहा है। पहला सम्मेलन 1975 में नागपुर में हुआ था। तब से भोपाल के दसवें सम्मेलन तक आयोजन का स्वरूप बदला है। पहले के सम्मेलन साहित्य केन्द्रित थे लेकिन दसवां सम्मेलन भाषा की उन्नति पर केन्द्रित है।

सम्मेलन का शुभारंभ हिन्दी के स्तुति गान के साथ हुआ। अतिथियों को अंग वस्त्र भेंट कर स्वागत किया गया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रधानमंत्री और अतिथियों का स्वागत किया। विदेश राज्य मंत्री जनरल वी़ क़े सिंह ने आभार व्यक्त किया।

इस अवसर पर राज्यपाल रामनरेश यादव, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी, राज्यपाल गोवा मृदुला सिन्हा, केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद, झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डा. हर्षवर्धन, गृह राज्य मंत्री ड़ किरण रिजिजू, मॉरीशस की मानव संसाधन एवं विज्ञान मंत्री लीलादेवी दुक्कन, विदेश सचिव अनिल वाधवा, आयोजन समिति के उपाध्यक्ष सांसद अनिल माधव दवे सहित विभिन्न देश से आये हिंदी विद्वान और राज्य मंत्रिमंडल के सदस्य उपस्थित थे।

मंगलवार, 8 सितंबर 2015

हिन्दी भाषी लोगों के लिए हिन्दी में आएगी सोशल नेटवर्किंग साइट 'मूषक'

गणेश जी का वाहन मूषक जगप्रसिद्ध है।  गणेश जी को देश-दुनिया में दौड़ने के लिए मूषक जी का ही सहारा है। ऐसे में मूषक जी का महत्व समझा जा सकता है।  कम्प्यूटर का माउस भी मूषक का ही अंग्रेजी रूपांतरण है और काफी हद तक इसकी आकृति भी।  ऐसे में ट्विटर' की तर्ज पर पूरी तरह हिन्दी में काम करने वाला 'मूषक' सोशल नेटवर्किंग साइट चर्चा में है। 

भोपाल में आयोजित हो रहे दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में शिरकत करने आए पुणे के अनुराग गौड़ व उनके साथियों ने 'ट्विटर' की तर्ज पर पूरी तरह हिन्दी में काम करने वाला 'मूषक' सोशल नेटवर्किंग साइट देशवासियों और हिन्दी प्रेमियों के लिए पेश की है। यह साइट अभी ऑनलाइन नहीं हुई है, कहा जा रहा है कि 10 सितंबर को इसे जारी किया जाएगा।

हिन्दी सोशल नेटवर्किंग साइट 'मूषक' के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) अनुराग गौड़ ने बताया कि जहां ट्विटर पर शब्दों की समय सीमा 140 शब्द हैं, वहीं हमने मूषक पर इसे 500 रखा है। कम्प्यूटर अथवा स्मार्टफोन पर हिन्दी टाइप करना रोमन लिपि पर आधारित है, इसलिए लोग हिन्दी लिखने से कतराते हैं। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में बदलती तकनीक के साथ हिन्दी को लोगों से परिचित कराना होगा, ताकि लोग रोमन लिपि से पिछड़कर अपनी पहचान ना खो दें।

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि स्मार्टफोन पर उनकी इस सोशल नेटवर्किंग साइट 'मूषक' को गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है तथा इसके अलावा कम्प्यूटर पर इसे गूगल सर्च में www.mooshak.in के नाम से खोजा जा सकता है।

गौड़ ने कहा कि भाषा वैज्ञानियों का विचार है कि जो भाषा हम बोलना जानते हैं, उसे थोड़े प्रयत्नों से ही सरलता से लिखना सीख जाते हैं। उन्होंने कहा कि 'मूषक' का उद्देश्य हिन्दी और देवनागरी को आज की पीढ़ी के लिए सामयिक और प्रचलित करना है। इस सोशल नेटवर्किंग साइट पर हिन्दी भाषी रोमन में टाइप करने से वहीं तत्काल हिन्दी शब्द का विकल्प पा सकेंगे।

एक अन्य प्रश्न के उत्तर में 'मूषक' के सीईओ ने कहा कि ट्विटर, फेसबुक सरीखे सोशल नेटवर्किंग साइट्स, जिसे हमारे नेताओं, अभिनेताओं और प्रतिष्ठित लोगों ने जोर-शोर से अपनाया है, वहां प्राथमिकता अंग्रेजी भाषा को दी जाती है और उसे ही देश की आवाज समझा जाता है। हिन्दी दोयम दर्जे की मानी जाती है। उन्होंने कहा कि मूषक द्वारा हम इस प्रक्रिया को सही मायनों में गणतांत्रिक बनाना चाहते हैं, जहां गण की आवाज गण की भाषा में ही उठे।

शनिवार, 5 सितंबर 2015

श्रीकृष्ण की सार्थकता हर युग में बनी रहेगी - कृष्ण कुमार यादव


श्रीकृष्ण सिर्फ एक भगवान या अवतार भर नहीं थे।  इन सबसे आगे वह एक ऐसे पथ-प्रदर्शक और मार्गदर्शक थे, जिनकी सार्थकता  हर युग में बनी रहेगी।  उनके व्यक्तित्व में भारत को एक प्रतिभासम्पन्न राजनीतिवेत्ता ही नहीं, एक महान कर्मयोगी और दार्शनिक प्राप्त हुआ, जिसका गीता-ज्ञान समस्त मानव-जाति एवं सभी देश-काल के लिए पथ-प्रदर्शक है। उक्त विचार राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ  एवं चर्चित साहित्यकार श्री कृष्ण कुमार यादव ने यादव समाज, जोधपुर द्वारा गाँधी शांति प्रतिष्ठान केंद्र, जोधपुर में 5 सितंबर को आयोजित जन्माष्टमी  स्नेह मिलन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किये।  


डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने इस बात पर जोर दिया कि आज देश के युवाओं को श्रीकृष्ण के विराट चरित्र के बृहद अध्ययन की जरूरत है। राजनेताओं को उनकी विलक्षण राजनीति समझने की दरकार है और धर्म के प्रणेताओं, उपदेशकों को यह समझने की आवश्यकता है कि श्रीकृष्ण ने जीवन से भागने या पलायन करने या निषेध का संदेश कभी नहीं दिया। श्री यादव ने कहा कि श्रीकृष्ण ने कभी कोई निषेध नहीं किया। उन्होंने पूरे जीवन को समग्रता के साथ स्वीकारा है। यही कारण है कि भगवान श्री कृष्ण की स्तुति लगभग सारी दुनिया में किसी न किसी रूप में की जाती है। यहाँ तक कि वे लोग जिन्हें हम साधारण रूप में नास्तिक या धर्मनिरपेक्ष की श्रेणी में रखते हैं, वे भी निश्चित रूप से भगवदगीता से प्रभावित हैं। श्री यादव ने कहा कि श्रीकृष्ण द्वारा गीता में कहे गए उपदेशों का हर एक वाक्य हमें कर्म करने और जीने की कला सिखाता है। अब तो कॉरपोरेट जगत भी मैनेजमेंट के सिद्धांतों को गीता से जोड़कर प्रतिपादित कर रहा है। 

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में अतिरिक्त रजिस्ट्रार, सहकारी समिति जोधपुर संभाग योगेन्द्र सिंह यादव ने कहा कि हमारे अध्यात्म के विराट आकाश में श्रीकृष्ण ही अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों व ऊंचाइयों पर जाकर भी गंभीर या उदास नहीं हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे यादव समाज, जोधपुर के अध्यक्ष डॉ. शैलेष यादव ने कहा कि कृष्ण की सभी लीलाएँ कुछ न कुछ सन्देश देती हैं। उन लीलाओं को उनके आध्यात्मिक स्वरूप में ही समझा जा सकता है। यूथ हॉस्टल, जोधपुर के प्रबंधक ले. कर्नल (सेनि) प्रकाश चन्द्र यादव ने श्री कृष्ण के विचारों को सदैव प्रासंगिक बताते हुए उनके  जीवन से प्रेरणा लेने की बात कही। 

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि  निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने यादव समाज द्वारा जारी स्मारिका का विमोचन भी किया।  इस अवसर पर उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को सम्मानित भी किया। इस अवसर पर  मदन सिंह यादव, अरुण यादव, आनंद यादव, राजकुमार यादव सहित तमाम लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन नंदकिशोर यादव ने किया। 

-डॉ. शैलेष यादव
अध्यक्ष - यादव समाज जोधपुर 

बुधवार, 19 अगस्त 2015

बिसरा दिया हमने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का डिजाइन बनाने वाले पिंगलि वेंकय्या को


तिरंगे के प्रति सम्मान स्वाभाविक है, आखिर यह हमारे देश का राष्ट्रीय ध्वज है।  हर कोई इसकी आन-बान पर न्यौछावर होने का जज्बा रखता है।  पर शायद बहुत कम लोगों को ही पता हो कि हमारे देश के राष्ट्रीय ध्वज का डिजाइन बनाने वाले पिंगलि वेंकय्या जी थे। 

अगस्त माह में जब स्वतंत्रता दिवस के चलते चारों तरफ राष्ट्र भक्ति की गूंज सुनाई देती है।  अख़बारों के पन्नों से लेकर सोशल मीडिया तक तिरंगे की फोटो लगाकर जयजयकार होती है, उसी माह में 15 अगस्त से ठीक तीन दिन पूर्व इसका डिजायन बनाने वाले पिंगलि वेंकय्या की जयंती (12 अगस्त) भी होती  है। पर शायद ही हममें से कोई उन्हें याद करता है। 

संसद के हंगामे और सोशल मीडिया पर फहराते तिरंगे के बीच काश कोई ऐसे महापुरुषों को भी याद करता, तो शायद यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होती।  अन्यथा वो पंक्तियाँ याद आती हैं -

सो गई लिपटकर.
तिरंगे के साथ अलमारी में!
देशभक्ति है.
तारीखों पर जागती है!

सोमवार, 17 अगस्त 2015

कश्मीर की हिंदी पत्रिका - वितस्ता

देश-विदेश की 250 से अधिक छोटी-बड़ी पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न विधाओं में हमारी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। कभी सोचता था कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और अण्डमान से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक की पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पा सकूँ। काफी हद तक सफलता भी मिली। 

कश्मीर की कमी "वितस्ता" ने दूर कर दी, जो कि प्रोफ़ेसर दिलशाद जीलानी के सम्पादन में हिंदी विभाग, कश्मीर विश्वविद्यालय, श्रीनगर द्वारा प्रकाशित होती है।

 हाल ही में 40 वें अंक के रूप में इसका 2014-15 अंक आया है। 230 पृष्ठों के इस अंक में कुल 19 लेख शामिल हैं, जिसमें "कश्मीर की सूफी परम्परा की राह में अब्दुल रहमान राही" शीर्षक से हमारे लेख के साथ-साथ सहधर्मिणी आकांक्षा यादव का एक लेख "भूमंडलीकरण के दौर में भाषाओं पर बढ़ता खतरा" भी प्रकाशित है !!

वितस्ता (अंक-40, वर्ष 2014-15) : संपादिका - प्रोफ़ेसर दिलशाद जीलानी, हिंदी विभाग, कश्मीर विश्वविद्यालय, श्रीनगर-190006 


शनिवार, 15 अगस्त 2015

आजादी के जश्न की बधाइयाँ

शताब्दियों की दासता के बाद जब भारत में स्वतंत्रता का मंगल प्रभात हुआ था तो सबकी आँखों में एक नई रोशनी टिमटिमाई थी।  नए सपने, नई सोच, नए जज्बे .... वाकई आज हमने एक लंबा सफ़र तय कर लिया है। आजादी के 69वें साल में प्रवेश कर रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनायें !! 


गाँव से लेकर शहर तक आजादी का जश्न। 





आजादी की घोषणा उस दौरान के अख़बारों में। 


15 अगस्त 1947 पर भारतीय डाक विभाग ने एक नई मुहर  जारी की थी, जिस पर जय हिन्द अंकित था। हिंदुस्तान अख़बार में डाकखाने की इस मुहर पर प्रथम पृष्ठ पर समाचार भी प्रकाशित था। 


रविवार, 2 अगस्त 2015

त्यौहारों से भरपूर अगस्त माह

 हर माह की अपनी महत्ता है। अगस्त माह तो त्यौहारों से भरपूर है। प्रथम दिन से ही श्रावण माह के शुभारम्भ के साथ कजरी के बीच झूलों पर पड़ती पींगें हैं, भगवान शिव की आराधना है।  'फ्रेंडशिप-डे' के बहाने पुराने दोस्तों को याद करने और दोस्ती बढ़ाने की कवायद  है तो भाई-बहन के प्यार को बढ़ाता "रक्षा बंधन" भी इसी माह है। नन्द लाल कृष्ण के जन्मोत्सव "कृष्ण जन्माष्टमी" के बहाने फिर से लीलाएं होंगी, मटकियाँ फूटेंगीं और उन सबके बीच बहेगी आस्था की रसधार। प्रत्यूष पर्व की शुरुआत भी इसी माह में है।  आजादी का सबसे बड़ा पर्व "स्वतंत्रता दिवस" भी इसी माह उन तमाम नाम-अनाम शहीदों और महापुरुषों को याद करने का मौका होगा, जिनकी बदौलत हम आजाद हवाओं में सांसें ले रहे हैं। 

…… और हाँ, हमारे लिए यह माह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 10 अगस्त को हमारा जन्मदिन भी पड़ता है।  आप सभी को अगस्त माह की शुभकामनायें !! 


शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

भूमंडलीकरण के दौर में भी प्रेमचन्द के साहित्यिक और सामाजिक विमर्श, उतने ही प्रासंगिक

प्रेमचन्द के साहित्यिक और सामाजिक विमर्श आज भूमंडलीकरण के दौर में भी उतने ही प्रासंगिक हैं और उनकी रचनाओं के पात्र आज भी समाज में कहीं न कहीं जिन्दा हैं। प्रेमचंद से पहले हिंदी साहित्य राजा-रानी के किस्सों, रहस्य-रोमांच में उलझा हुआ था। प्रेमचंद ने साहित्य को सच्चाई के धरातल पर उतारा। प्रेमचन्द जब अपनी रचनाओं में समाज के उपेक्षित व शोषित वर्ग को प्रतिनिधित्व देते हैं तो निश्चिततः इस माध्यम से वे एक युद्ध लड़ते हैं और गहरी नींद सोये इस वर्ग को जगाने का उपक्रम करते हैं। उनका साहित्य शाश्वत है और यथार्थ के करीब रहकर वह समय से होड़ लेती नजर आती हैं। उक्त उद्गार प्रेमचंद की जयंती पर राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं और हिंदी साहित्यकार साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव ने व्यक्त किये।  

डाक निदेशक श्री यादव ने कहा कि हिन्दी साहित्य के इतिहास में उपन्यास सम्राट के रूप में अपनी पहचान बना चुके मुंशी प्रेमचंद के पिता अजायब राय श्रीवास्तव डाकमुंशी के रूप में कार्य करते थे। ऐसे में प्रेमचंद का डाक-परिवार से अटूट सम्बन्ध था।   डाककर्मी के पुत्र मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य की नई इबारत  लिखी। जब प्रेमचंद के पिता गोरखपुर में डाकमुंशी के पद पर कार्य कर रहे थे उसी समय गोरखपुर में रहते हुए ही उन्होंने अपनी पहली रचना लिखी। उन्होंने कहा कि मुंशी प्रेमचंद को पढ़ते हुए हम  सब बड़े हो  गए। उनकी रचनाओं से बड़ी  आत्मीयता महसूस होती है। ऐसा लगता है जैसे इन रचनाओं के  पात्र हमारे आस-पास ही मौजूद हैं।   

  निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि  प्रेमचन्द ने अपने को किसी वाद से जोड़ने की बजाय तत्कालीन समाज में व्याप्त ज्वलंत मुद्दों से जोड़ा। राष्ट्र आज भी उन्हीं समस्याओं से जूझ रहा है जिन्हें प्रेमचन्द ने काफी पहले रेखांकित कर दिया था, चाहे वह जातिवाद या साम्प्रदायिकता का जहर हो, चाहे कर्ज की गिरफ्त में आकर आत्महत्या करता किसान हो, चाहे नारी की पीड़ा हो, चाहे शोषण और समाजिक भेद-भाव हो। कृष्ण कुमार यादव ने जोर देकर कहा कि आज प्रेमचन्द की प्रासंगिकता इसलिये और भी बढ़ जाती है कि आधुनिक साहित्य के स्थापित नारी-विमर्श एवं दलित-विमर्श जैसे तकिया-कलामों के बाद भी अन्ततः लोग इनके सूत्र किसी न किसी रूप में प्रेमचन्द की रचनाओं में ढूंढते नजर आते हैं। 







( इलाहाबाद में पोस्टिंग के दौरान बनारस गया तो मुंशी प्रेमचंद की जन्मस्थली लमही भी जाने का सु-अवसर प्राप्त हुआ। मुंशी प्रेमचंद स्मारक लमही, वाराणसी के पुस्तकालय हेतु हमने अपनी पुस्तक '16 आने 16 लोग' भी भेंट की, संयोगवश इसमें एक लेख प्रेमचंद के कृतित्व पर भी शामिल है। उसी दौरान लिए गए कुछेक चित्र।  आज साहित्य सम्राट प्रेमचंद की जयंती पर शत-शत नमन !!) 

बुधवार, 29 जुलाई 2015

सबके प्यारे अब्दुल कलाम चले गए...

आधुनिक भारत के भगवान चले गए।
इस देश के असली स्वाभिमान चले गए।।
धर्म को अकेला छोड़ विज्ञान चले गए।
एक साथ गीता और कुरान चले गए।।
मानवता के एकल प्रतिष्ठान चले गए।
धर्मनिरपेक्षता के मूल संविधान चले गए।।
इस सदी के श्रेष्ठ ऋषि महान चले गए।
कलयुग के इकलौते इंसान चले गए।।
ज्ञान राशि के अमित निधान चले गए।।
सबके प्यारे अब्दुल कलाम चले गए।।


पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का दिल का दौरा पड़ने से 27 जुलाई को शिलांग में निधन। 
राष्ट्र की एक अपूरणीय क्षति। 
विनम्र श्रद्धांजलि !!

रविवार, 21 जून 2015

पापा ही प्रेरक-शक्ति हैं ...


पिता जी के बिना यह जीवन अधूरा है।  जीवन के हर क्षण में वे हमारे साथ खड़े रहे। आज अगर मैं सिविल सेवाओं में हूँ तो पापा ही उसके पीछे प्रेरक-शक्ति हैं, अन्यथा हम तो कुछ दूसरा ही कैरियर बनाने की सोच रहे थे। 72 वर्ष की उम्र में भी पापा का लिखने-पढ़ने का जज्बा ख़त्म नहीं हुआ है। आज भी लेखन, चिंतन और अध्ययन उनकी सर्वाधिक पसंदीदा अभिरुचि है । आज हम पापा जरूर बन गए हैं, पर अपने पापा के लिए तो बच्चे ही हैं। 

संयोगवश आज फादर्स-डे है।  ऐसे में सोचें कि कोई भी पिता अपने बच्चों से क्या चाहता है- प्यार का सच्चा इजहार, बच्चों का साथ, मान-सम्मान और यह आश्वस्ति कि बुजुर्ग होने पर बच्चे उनका भी पूरा ख्याल रखेंगे। बच्चों की हर सफलता के साथ पिता गौरवान्वित होता है। उन्हें लगता है कि जिन आदर्शों  के लिए उन्होंने दिन-रात एक किया, बेटे-बेटियों ने उसे साकार किया। ऐसे में सिर्फ एक दिन ‘फादर्स डे‘ मना कर अपने दायित्वों से इतिश्री नहीं किया जा सकता। माता-पिता ही दुनिया की सबसे गहरी छाया होते हैं, जिनके सहारे जीवन जीने का सौभाग्य हर किसी के बस में नहीं होता। इसलिए माता-पिता का आशीर्वाद लेकर सिर्फ एक दिन ही उन्हें याद ना करते हुए प्रतिदिन उन्हें नमन कर अपना जीवन सार्थक करना चाहिए। 


इलाहाबाद में पोस्टिंग के दौरान पापा काफी दिनों तक साथ ही रहे। उस दौरान बिटिया अक्षिता (पाखी) ने प्यारे दादू की यह फोटो ली थी।  

रविवार, 7 जून 2015

अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन में "सृजनात्मक साहित्य में हिंदी ब्लॉग का योगदान" विषय पर परिचर्चा

हिंदी ब्लॉगिंग आज किसी परिचय का मोहताज नहीं रही।  अल्प समय में ही इसने समाज से लेकर राजनीति, साहित्य से लेकर सिनेमा और अन्य सभी विधाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। सिर्फ भारत ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों में हिंदी ब्लॉग पर सृजनात्मक साहित्य रचा जा रहा है। स्थापित पत्र-पत्रिकाओं से लेकर न्यूज चैनल्स तक आवश्यकतानुसार हिंदी ब्लॉगों से सामग्री ले रहे हैं।  न्यू मीडिया के रूप में हिंदी ब्लॉग नित नए आयाम गढ़ रहा है। उक्त उद्गार वरिष्ठ हिंदी ब्लॉगर लेखक एवं सम्प्रति  राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर  के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने कोलम्बो (श्री लंका) के कॉनकॉर्ड ग्रैंड होटल में 25 मई, 2015  को हुए अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन में "सृजनात्मक साहित्य में हिंदी ब्लॉग का योगदान" विषय पर आयोजित परिचर्चा में  व्यक्त किये। 

अपने उद्बोधन में श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि ब्लॉग की लोकप्रियता इसी बात से सिद्ध होती है कि हर कोई ब्लॉग पर आना चाहता है | स्थापित साहित्यकार खतरा महसूस कर रहे है तथा ब्लॉगिंग की शक्ति को स्वीकार करके इसे अपना रहे हैं | आज  50 हजार से भी ज्यादा हिंदी ब्लॉग विभिन्न विषयों और विभिन्न क्षेत्रों में अपनी-अपनी क्षमता के हिसाब से योगदान दे रहे हैं । ब्लॉगिंग के नकरात्मक पहलू पर प्रकाश डालते हुए श्री यादव ने कहा कि वर्तनी का दोष, कट पेस्ट और भड़ास इसके नकारात्मक पक्ष हैं, इस पर समय रहते ध्यान देते हुए हिंदी ब्लॉग की सृजनात्मक शक्ति को और प्रभावी बनाया जा सकता है। 

हिंदी के पहले वेब पोर्टल वेब दुनिया डॉट कॉम के संस्थापक कंटेंट संपादक श्री प्रकाश हिंदुस्तानी ने कहा कि साहित्यकारों और साहित्य के पाठकों के लिए ब्लॉग एक अनमोल तोहफा है। अभिव्यक्ति का बेजोड़ हथियार। यहां अभिव्यक्ति के बाद भरपूर आत्मसंतोष मिलता है। ब्लॉगिंग के माध्यम से बेहतर लेखन भी संभव हो पाया है, क्योंकि लेखक खुद अपने आप को बार-बार सुधार सकता है। इसके साथ ही लेखन के क्षेत्र में नेटवर्किंग भी आसान हो गई है। किसी भी सृजनात्मक ब्लॉगर के लिए अपने पाठकों के सामने वैश्विक सौहाद्र्र को बढ़ाना एक प्रमुख लक्ष्य होता है। इसके साथ ही उसका लक्ष्य होता है साहित्य के लिए नई जमीन तलाशना। हिन्दी में ब्लॉगिंग अंग्रेजी की तुलना में देरी से शुरू हुई। 2003 में हिन्दी का पहला ब्लॉग 9-2-11 सामने आया। 2007 में यूनिकोड के आगमन के बाद हिन्दी की ब्लॉगिंग में तेजी आई। 

ए. बी. पी. न्यूज मुंबई के वरिष्ठ संपादक श्री जीतेन्द्र दीक्षित ने अपने महत्वपूर्ण शोध के माध्यम से विभीन्न आकडें प्रस्तुत करते हुए कहा कि  भारत में 50  हजार से अधिक हिंदी  ब्लॉग हैं | 11  करोड लोग फेसबुक से जुड़े है | इन सबकी सम्मिलित शक्ति को नक्कारना किसी भी सत्ता के लिए असम्भव होगा। यही कारण है कि आज आतंकवादी भी इससे भयभीत हैं और बंगलादेश में अभिजीत राम और वशिकुर्ररहमान जैसे ब्लॉगरों की हत्या करते है, जो कि शर्मनाक कृत्य है। 

परिचर्चा में अपने उद्वोधन के क्रम में उत्तर महाराष्ट्र  विश्वविद्यालय जलगांव के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. सुनील कुलकर्णी ने ब्लॉगिंग को एक शक्तिशाली माध्यम बताते हुए कहा कि ब्लॉग अभिव्यक्ति का ताकतवर माध्यम बनकर उभरा है | आज तमाम विश्विद्यालयों में ब्लॉग पर शोध हो रहे हैं, वहीँ शोधकर्ता विभिन्न ब्लॉगों पर प्रकाशित सामग्री को शोध के लिए उपयुक्त पा रहे हैं। 

अपने अध्यक्षीय व्यक्तव्य में कबीर कम्युनिकेशन की क्रिएटिव हेड डॉ. सर्जना शर्मा (दिल्ली) ने कहा कि ब्लॉगिंग से अधिकाधिक लोगों को जोड़ने की जरूरत है और इसके लिए  कार्यशालाओ की आवश्यकता  है, क्योकि इसके अभाव में संस्कारविहीन साहित्य आ रहा है |


परिचर्चा का सञ्चालन लखनऊ के डॉ. रामबहादुर मिश्र ने किया | 

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अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, श्रीलंका के उद्घाटन सत्र का दीप प्रज्वलन द्वारा शुभारम्भ करते हुए डॉन सोमरथ्न विथाना, वरिष्ठ नाट्यकर्मी, श्रीलंका, श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर, श्री नकुल दूबे, पूर्व नगर विकास मंत्री, उत्तरप्रदेश सरकार, श्री रवीन्द्र प्रभात, संयोजक- अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन, डॉ सुनील कुलकर्णी, हिन्दी विभागाध्यक्ष, उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय जलगांव एवं अन्य। 


अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, श्रीलंका में वरिष्ठ ब्लॉगर व् साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव (निदेशक डाक सेवाएं, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर) का संबोधन। 




अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, श्रीलंका में मानद अतिथि के रूप में वरिष्ठ ब्लॉगर व् साहित्यकार श्री कृष्ण कुमार यादव (निदेशक डाक सेवाएं, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर) का स्वागत व अभिनंदन करते श्री रवीन्द्र प्रभात, संयोजक- अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन एवं सुश्री सर्जना शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट व श्री राम बहादुर मिश्र, साहित्यकार व संपादक। 




अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, श्रीलंका के उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष डॉन सोमरथ्न विथाना, वरिष्ठ नाट्यकर्मी, श्रीलंका को सम्मानित करते श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर एवं श्री नकुल दूबे, पूर्व नगर विकास मंत्री, उत्तरप्रदेश सरकार।




अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, श्रीलंका के उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष डॉन सोमरथ्न विथाना, वरिष्ठ नाट्यकर्मी, श्रीलंका,श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर एवं श्री नकुल दूबे, पूर्व नगर विकास मंत्री, उत्तरप्रदेश सरकार।



"सृजनात्मक साहित्य में हिंदी ब्लॉग का योगदान" विषय पर आयोजित परिचर्चा में मंचासीन  श्री प्रकाश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ ब्लॉगर व् साहित्यकार श्री कृष्ण कुमार यादव (निदेशक डाक सेवाएं, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर), श्री जीतेन्द्र दीक्षित, डॉन सोमरथ्न विथाना, सुश्री सर्जना शर्मा, डॉ. सुनील कुलकर्णी। 

"सृजनात्मक साहित्य में हिंदी ब्लॉग का योगदान" विषय पर आयोजित परिचर्चा में विचार व्यक्त करते वरिष्ठ ब्लॉगर व् साहित्यकार श्री कृष्ण कुमार यादव (निदेशक डाक सेवाएं, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर) 


शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

चिट्ठियों ने जिया लम्बा दौर - कृष्ण कुमार यादव

इलाहाबाद के रहने वाले कृष्ण कुमार यादव करीब महीने भर पहले ही यहाँ राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर में डाक सेवाओं के निदेशक पद पर स्थानांतरित होकर आए हैं।  भारतीय डाक सेवा (आईपीएस) के अधिकारी यादव ने आते ही सुकन्या समृद्धि योजना सहित डाक विभाग की विभिन्न योजनाओं को लोगों तक पहुँचाने के लिए मेले और डाकघरों में कई कार्यक्रम आयोजित किए।  उनके महीने भर के कार्यकाल में ही जोधपुर में सुकन्या समृद्धि योजना के तहत करीब 20 हजार बेटियों ने खाते खुलवाए जो बेटियों की शादी व कॅरियर के लिए मील का पत्थर साबित होंगे।  डाक विभाग के बारे में उनकी योजनाओं व उनके व्यक्तित्व की जानकारी के लिए राजस्थान पत्रिका के संवाददाता गजेंद्र सिंह दहिया बुधवार दोपहर उनके दफ्तर पहुँचे।  पेश  है बातचीत के कुछ अंश -

प्रश्न  : आपको नहीं लगता कि डाक विभाग का महत्व दिन प्रतिदिन कम होता जा रहा है?
उत्तर : डाक विभाग ने 1854 में अपनी स्थापना से अब तक डेढ़ युग से अधिक का सफर तय किया है।  आर्टिकल डिलीवरी के लिए प्रसिद्ध इस विभाग की चिट्ठियों, पोस्टकार्ड और अंतरर्देषीय पत्र ने एक लम्बा दौर जिया है।  पेजर आया खत्म हो गया।  लैण्डलाईन फोन केवल सरकारी दफ्तरों में बचे हैं।  सोषल मीडिया आने के बाद मोबाइल की एसएमएस सेवा खत्म होने के कगार पर है, लेकिन चिट्ठियाँ आज भी आ रही हैं और जा रही हैं, बस स्वरूप व जरुरत थोड़ी बदल गई।

प्रश्न  : अन्य देशों की तुलना में भारतीय डाक में क्या अंतर है?
उत्तर : मैं भारतीय डाक अकादमी की ओर से दक्षिण कोरिया गया।  वहाँ डाकघर माॅल की तरह हैं  जहाँ ग्राहकों को डाकघर में हर सुविधा दी जा रही है,  यानी वे कामर्शियल  हो गया है, लेकिन भारतीय डाक ने अभी तक अपने आपको सामाजिक सरोकार से जोड़ रखा है।

प्रश्न  : डाक विभाग के पास देश में 1.50 लाख डाकघरों का नेटवर्क है वो भी प्राइम लोकेशन पर, वो इसका रिटेलिंग व मार्केटिंग के लिए इस्तेमाल क्यों नहीं करते ?
उत्तर : देश  के 70 फीसदी लोग गाँवों में रहते हैं।  उनको आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध करवाना विभाग का पहला काम है।  वैसे डाक विभाग धीरे-धीरे आईटी माॅर्डनाइजेशन की ओर बढ़ रहा है।

प्रश्न  : अपने बारे में बताइए?
उत्तर : मेरा जन्म 10 अगस्त,1977 को  उत्तर प्रदेश प्रदेश  के आजमगढ़ में हुआ।  शिक्षा इलाहाबाद में हुई।  एमए (राजनीति शास्त्र) फाईनल ईयर के दौरान ही 2001 में मेरा यूपीएससी में आईपीएस में चयन हो गया।  पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव जी स्वास्थ्य अधिकारी रहे हैं और माता श्रीमती विमला गृहिणी हैं।  तीन भाई-बहिनों में सबसे बड़ा हूँ।  छोटी बहन उत्तर प्रदेश में शिक्षक है और भाई सिविल सेवा की तैयारी कर रहा है।  शादी 2004 में काॅलेज में लेक्चरर आकांक्षा से हुई जो वर्तमान में फ्री लांसिंग करती हैं।  मेरी दो बेटियाँ हैं।

प्रश्न  : आप सिविल सेवा में ही आना चाहते थे?
उत्तर : नहीं, मैं डाॅक्टर बनना चाहता था, लेकिन पापा ने सिविल सर्विसेज़  में आने को कहा।  मैंने उनसे कहा कि यह परीक्षा कठिन है तो उनका जवाब था कि इस दुनिया में जो भी कुछ बनता है, करता है, वह मनुष्य  ही है।

प्रश्न  : आप एक कवि व साहित्यकार भी हैं और आपकी पत्नी भी?
उत्तर : जी हाँ, मेरी अब तक सात पुस्तकें और आकांक्षा की दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  कविता, कहानी, लघुकथा व बाल कविताओं के लिए कई सम्मान भी मिले हैं।  मैं और आकांक्षा ब्लाॅग भी लिखते हैं।  साहित्य लेखन इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन के समय परवान चढ़ा था।



( साभार : 'राजस्थान पत्रिका' (24 अप्रैल, 2015), जोधपुर  में प्रकाशित कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर का साक्षात्कार : चिट्ठियों ने जिया लम्बा दौर.