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रविवार, 14 जुलाई 2013

अब बस यादों में रह जायेगा टेलीग्राम

(जब हम कल सुबह जगेंगे तो एक तकनीक खो चुके होंगे. कल 15 जुलाई से टेलीग्राम सेवा भारत में ख़त्म हो जाएगी। 160 साल पुरानी इस सेवा ने इतिहास के कई बनते-बिगड़ते पहलू देखे हैं और अब खुद इतिहास बनने जा रही है। टेलीग्राम भले ही न रहेगा, पर हमारी स्मृतियों में सदैव जीवंत रहेगा !!)

21वीं सदी में टेक्नालाजी के विकास एवं संचार व सूचना क्रांति ने बहुत सारी बातों को पीछे छोड़ दिया है। एक दौर में जिन तकनीकों को अपरिहार्य माना जाता था, वही अब अतीत की चीज बनकर रह गये हैं । न जाने कितनी चीजें हमारी आँखों के सामने आरम्भ हुईं और हमारे ही सामने उनका दौर भी खत्म हो गया। फ्लापी, पेजर, ब्लैक एंड व्हाइट टीवी, छतों पर दिखता टीवी का एंटीना, रेडियो एंटीना, वाकमैन और भी बहुत कुछ। नयी पीढ़ी इन्हें या तो म्यूजियम में देखती है, या तो इन्टरनेट पर खंगालती है। ऐसी ही एक सेवा टेलीग्राम (तार) अब अतीत की वस्तु बनने वाली है। टेलीग्राम एक जगह से दूसरी जगह संदेश भेजने का यांत्रिक माध्यम है। इसमें किसी चीज का भौतिक विनिमय किए बगैर संदेश भेजा जाता है। इसमें विशेष संकेतों के जरिये कोई सूचना कहीं भेजी जाती है। स्मार्ट फोन, ईमेल और एसएमएस के मौजूदा दौर में अब 160 साल पुरानी टेलीग्राम सेवा को सरकार ने 15 जुलाई से बंद करने का फैसला किया है। लेकिन तार का बंद हो जाना सिर्फ एक अप्रासंगिक हो चुकी सेवा का बंद हो जाना भर नहीं है। आज भी एक नहीं, ऐसी कई-पीढियां मौजूद हैं, जिन्होंने एक समय में तेजी से और आवश्यक संचार के लिए मुख्य स्त्रोत मानी जाने वाली इस सेवा के माध्यम से ही सुख-दुख के न जाने कितने संदेश ग्रहण किए, लेकिन नई तकनीक के आने और संचार के नए साधनों से टेलीग्राम खुद को बेगाना पाने लगा।

आज मोबाइल-इंटरनेट के दौर में नवीनतम तकनीक से संवाद चल रहा है, लेकिन एक जमाने में जल्द संदेश भेजने का एकमात्र जरिया टेलीग्राम या तार ही था। इंटरनेट और मोबाइल फोन के युग में पैदा हुई पीढ़ी यह सुनकर हैरत में पड़ सकती है कि कभी डाकिया द्वारा यह सुनकर कि टेलीग्राम आया है, सुनकर लोगों के दिलों की धड़कन बढ़ जाती थी। लोग मनाने लगते, कोई बुरी खबर न आए। कुछेक मामलों में टेलीग्राम खुशखबरी भी लाता। शहरों में कामकाज के लिए आने वाले लोग अपने घर-परिवार को या फिर उनके परिवार के सदस्य जल्द संदेश के लिए टेलीग्राम ही भेजा करते थे। सीमा पर तैनात फौजियों का उनकी पत्नियों व परिवार से अकस्मात संवाद टेलीग्राम द्वारा ही होता था। दूर देश से अपने परिचितों को जल्दी से जल्दी संदेश भेजने का माध्यम भी तब टेलीग्राम या तार ही हुआ करता था। नौकरियों की सूचना भी टेलीग्राम या तार से आती थी। यह सेवा बहुत सस्ती नहीं थी, इसलिए 'थोड़ा लिखा है ज्यादा समझना’ वाले अंदाज में संदेश भेजे जाते थे। इसके लिए देश के सभी इलाकों में सरकार ने तार-घर खोले हुए थे। 

टेलीग्राम का भी अपना लम्बा इतिहास रहा है। माना जाता है कि टेलीग्राम की अवधारणा को जमीन पर उतारने में कुल 22 लोगों का हाथ है। 1792 से ही यूरोप में संकेतों के जरिये समाचार भेजने के यंत्र सेमाफोर लाइन के रूप में यह विधि मौजूद थी। पर वर्ष 1837 में महान अमेरिकी वैज्ञानिक सैमुअल एफबी मोर्स ने मोर्स कोर्ड टेलीग्राफ की खोज करके दुनिया में संचार क्रांति को नया रूप दिया था। कहा जाता है कि सैमुअल मोर्स मूलतः पेंटर थे। वर्ष 1825 में न्यूयार्क में जब वे अपनी पेटिंग पर काम कर रहे थे, उन्हें पत्नी की बीमारी के बारे में एक घुड़सवार ने पत्र लाकर दिया। पर दुर्भागयवश जब तक वे घर पहुँचते, पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। मोर्स इस घटना से इतने आहत हुए कि उन्होंने एक ऐसा यन्त्र इजाद करने की सोची, जिससे किसी आकस्मिक स्थिति में तुरन्त सन्देश भेजा  जा सके। फिर क्या थे वे इस मिशन पर जुट गए। अन्ततः सैमुअल मोर्स ने सन 1844 में अमेरिका में वॉशिंगटन और बॉल्टिमोर के बीच पहला टेलीग्राम भेजकर इसका इजाद किया।

19वीं सदी में जब टेलीफोन की खोज नहीं हुई थी उस समय संकेत के द्वारा संदेश एक जगह से दूसरी जगह तक भेजे जाते थे। सैमुएल मोर्स ने इसका निर्माण वैद्युत टेलीग्राफ के माध्यम से संदेश भेजने के लिए किया था। 1840 के दशक में संदेश भेजने की इस नई पद्धति का नाम ‘डैश-डाट‘ प्रणाली था, जिसे मोर्स कोड के नाम से जाना जाता है। मोर्स कोड में वस्तुतः एक लघु संकेत तथा दूसरा दीर्घ संकेत प्रयोग किया जाता है। मोर्स कोड में कुछ भी लिखने के लिए लघु संकेत के रूप में डाट का प्रयोग तथा दीर्घ संकेत के लिए डैश का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा मोर्स कोड के लघु और दीर्घ संकेतों के लिए अन्य चिन्ह भी प्रयुक्त हो सकते हैं जैसे- ध्वनि, पल्स या प्रकाश आदि। मोर्स कोड दुनिया भर में मान्य हुआ और यह टेलीग्राफी की प्राथमिक भाषा बन गया। मोर्स के ईजाद किए गए टेलीग्राफ को स्मिथसोनियन संस्थान में (जहाँ अमेरिकी इतिहास का राष्टीय संग्रहालय है) रखा गया है। मोर्स का जमाना औद्योगिक क्रांति का था। यह वह दौर था, जब यूरोप और अमेरिका में बड़े पैमाने पर आविष्कार हो रहे थे। इस तरह तार ने औद्योगिक क्रांति में बड़ी भूमिका निभाई। इससे विशेष संकेतों के जरिये सूचनाएं कभी भी और कहीं भी तुरंत भेजी जा सकती थीं। उसके बाद लंबी दूरी की सूचनाओं को प्रेषित करने और प्राप्त करने के यंत्र को टेलीग्राफ और उन संदेशों को टेलीग्राम कहा जाने लगा। 

    टेलीग्राफ यूनानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है दूर से लिखना। इसमें विभिन्न संदेशों को कोड में बदलकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजा जाता है। संदेश के मिलने पर कोड को डीकोड करके एक बार फिर संदेश के रूप मे लेकर प्राप्त करने वाले तक भेजा जाता है। संदेश की कोडिंग और डी-कोडिंग का काम टेलीग्राफिस्ट की ओर से किया जाता है। इसका प्रचालन समय के साथ भले ही कम होता गया, पर अभी भी मोर्स कोड पद्धति का इस्तेमाल कई जगह पर गुप्त संदेश भेजने के लिए किया जाता है। पानी के जहाज पर अभी भी इसके जरिए संदेश भेजे जाते हैं। आसानी से पकड़े नहीं जाने के कारण गुप्तचर भी इस पद्धति का प्रयोग करते हैं। सेना के सिग्नल रेजिमेंट में इसका बहुत काम है। मोर्स कोड का इस्तेमाल प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में जमकर किया गया। मोर्स कोड के जरिए संदेश को कोड के रूप में बदलकर टेलीग्राफ लाइन और समुद्र के नीचे बिछी केबलों के द्वारा एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाता था। संदेश पहुंँचने के बाद इसे डीकोड करके लोगों तक भेजा जाता था। 
   भारत में ब्रिटिश काल के दौरान पहली इलेक्ट्रिकल टेलीग्राफ लाइन डायमंड हार्बर और कोलकाता के बीच 5 नवम्बर 1850 को प्रायोगिक तौर पर शुरू की गई थी, जब शिबचंद्र नंदी का डायमंड हार्बर से भेजा गया संदेश गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी की मौजूदगी में पढ़ा गया था। यह पहली प्रायोगिक तार लाइन 21 मील की थी। इसे बनाने में  डॉ. विलियम ओ’ शौघ्नेस्सी का बहुत बड़ा योगदान रहा, जिन्हें भारत में तार का जनक भी कहा जाता है। भारत में टेलीग्राफ और टेलीफोन का बीड़ा उठाने वाले डॉ. विलियम ओ’ शौघ्नेस्सी लोक निर्माण विभाग में काम करते थे। 1851 में, इसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए खोला गया था। डाक और टेलीग्राफ विभाग उस समय लोक निर्माण विभाग के एक छोटे से कोने में अवस्थित हुआ करता था। नवंबर 1853 में, उत्तर में कोलकाता (कलकत्ता) और पेशावर को आगरा सहित और मुंबई (बॉम्बे) को सिंदवा घाट्स के जरिए दक्षिण में चेन्नई, यहां तक कि ऊटकमंड और बंगलोर के साथ जोड़ने वाली 4000 मील (6400 किमी) की टेलीग्राफ लाइनों का निर्माण शुरू किया गया। कालांतर में ब्रिटिश सरकार द्वारा दस्तावेजों के मंगाने-भेजने के अलावा समुद्र में सबमरीन केबिल डालकर विदेशों से भी टेलीग्राम मंगाए जाने लगे। डाॅट और डैश जैसे दो संकेतकों के जरिये संदेश भेजने वाली इस सेवा के लिए अक्टूबर 1854 में ब्रिटेन सरकार ने भारत के लिए पहला टेलीग्राफी एक्ट पास किया। उसी साल व्यवस्थित तरीके से देश में डाक विभाग की स्थापना हुई। उसके अधीन देश भर के 700 पोस्ट आॅफिस थे। टेलीग्राफ विभाग को भी डाक विभाग के साथ संबद्ध कर दिया गया और उसका नाम पोस्ट और टेलीग्राफ विभाग हो गया। आज भी अधिकतर लोग डाक विभाग को डाक-तार विभाग के नाम से ही जानते हंै। 11 फरवरी 1855 को भारत में सार्वजनिक टेलीग्राम सेवाएं शुरू र्हुइं। तब एक रुपए में 16 शब्दों का तार 400 मील की दूरी तक भेजा जा सकता था। शाम छह से लेकर सुबह छह बजे तक टेलीग्राम के लिए दोगुना चार्ज लिया जाता था। 1885-86 में डाक और तार विभाग के दफ्तर एक कर दिए गए। इसके बाद 1 जनवरी 1882 से अंतरदेशीय प्रेस टेलीग्राम शुरू हुए जिनका फायदा अखबारों ने उठाया। इनसे छोटे-बड़े सभी अखबारों को काफी मदद मिली। संवाददाता मुफ्त में अपनी खबरें तार के जरिए भेज सकते थे। तार विभाग में प्रेस के लिए कमरे बनाए गए। इसने खबरों को लोगों तक जल्द से जल्द पहुंँचाने में योगदान दिया। 
         आजादी के बाद 1 जनवरी 1949 को नौ तारघरों आगरा, इलाहाबाद, जबलपुर, कानपुर, पटना और वाराणसी आदि में हिंदी में तार सेवा की शुरुआत हुई। आजादी मिलने के बाद भारत ने पहली पंचवर्षीय योजना में ही सिक्किम के खांबजांग इलाके में दुनिया की सबसे ऊंची तार लाइन पहँुंचा दी। तेज गति से तार बांटने का काम करने के लिए 1949-50 में मोटरसाइकिलों का इस्तेमाल शुरू कर दिया गया। आँकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 1957-58 में एक साल में तीन करोड़ दस लाख तार भेजे गए, और इनमें से 80 हजार तार हिंदी में थे। इसमें दिनों-ब-दिन इजाफा होता गया और वर्ष 1981-82 तक देश में 31 हजार 457 तारघर थे और देशी तारों की बुकिंग 7 करोड़ 14 लाख तक पहुँच  चुकी थी। नब्बे के दशक की शुरुआत से तार का आकर्षण कम होना शुरू हुआ और नब्बे का दशक बीतने के बाद मोबाइल-इंटरनेट की तेज गति ने इसे हाशिये पर डाल दिया। 1984 मंे पोस्ट और टेलीग्राफ विभाग दो भागों में विभाजित होकर डाक विभाग और दूरसंचार विभाग कहलाया। 1980 का दशक वो सुनहरा युग था जब अकेले दिल्ली मेन आफिस के जरिये एक दिन में एक लाख टेलीग्राम भेजे व प्राप्त किये जाते थे, जबकि आज देश भर में महज एक लाख टेलीग्राम भेजे व प्राप्त किये जाते हैं। यही नहीं, 2006-07 के दौरान रोजाना 21-22 हजार का टेलीग्राम टैªफिक था जो कि 2011-12 के दौरान घटकर 5 हजार पर आ गया। सबसे ज्यादा टेलीग्राम सरकारी कार्यालयों या अदालती सम्मनों इत्यादि से जुड़े होते थे। मई 2013 के दौरान दिल्ली में 7031 टेलीग्राम बुक किये गए जिनमें पब्लिक टेलीग्राम की संख्या मात्र 2802 थी। कभी सबसे ज्यादा टेलीग्राम बुक कराने वालों में ’पे्रस’ श्रेणी होती थी। दरअसल इस सेवा को बनाए रखने पर बीएसएनएल को सालाना करीब 400 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा था। गिरते राजस्व से परेशान सरकार ने मई, 2010 में अंतर्देशीय सेवाओं के लिए टेलीग्राम दरों में पिछले 60 वर्षों में पहली बार बढ़ोत्तरी की थी। इनको साढ़े तीन और साढ़े चार रूपये से बढ़ाकर साढ़े 27 रूपये किया गया। यहां तक कि दो महीने पहले विदेश के लिए टेलीग्राम सेवाओं को बंद कर दिया गया। अन्ततः टेलीग्राम सेवा से लगातार गिरते राजस्व के बाद सरकार ने बीएसएनएल बोर्ड को फैसला लेने का अधिकार दिया और उसने डाक विभाग से सलाह-मशविरे के बाद टेलीग्राम सेवा को 15 जुलाई से बंद करने का फैसला किया। 
एक जमाने में तेज और संचार का मुख्य स्त्रोत मानी जाने वाली यह सेवा स्वाधीनता आंदोलन सहित न जाने कितनी ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रही है। यह नहीं भूलना चाहिए कि तार ने लोगों के एकीकरण में प्रमुख भूमिका निभाई है। भारत में रेलों के विस्तार से पहले ही तार का आगमन हो चुका था। इतिहासकार बताते हैं कि 1857 के परिणामों में एक भूमिका तार की भी थी। ब्रिटिश हुकूमत के लिए तार ऐसा सहारा था जिसके जरिए वो सेना की मौजूदगी, विद्रोह की खबरें, रसद की सूचनाएं और अपनी व्यूहरचना सैकड़ों मील दूर बैठे अपने कमांडरों के साथ साझा कर सकते थे। यही कारण था कि विद्रोह का बिगुल बजने वाले भारतीय क्रांतिकारियों ने तार को सबसे पहला निशाना बनाया। विद्रोह के प्रमुख केंद्र रहे दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, इंदौर जैसी जगहों पर उन्होंने तार लाइनें ध्वस्त कर दीं और वहां काम कर रहे अंग्रेज कर्मचारियों को मार डाला। मेरठ समेत कई जगहों पर बागियों ने तार के खंभों को जलावन की तरह इस्तेमाल किया। कुछेक जगहों पर तो क्रांतिकारियों ने इन तार से गोलियां तक बनाई। लोहारों ने तार के खंभों का इस्तेमाल तोप बनाने तक में किया। इस दौरान 918 मील लंबी तार की लाइनें तोड़ दी गईं, पर अंततरू इसी तार की बदौलत अपने सूचना तंत्र के जरिये अंग्रेज इस विद्रोह को समाप्त करने में सफल रहे। 1857-58 में तार की वजह से मिली कामयाबी के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने पूरे हिंदुस्तान को तार के लिए जरिए जोड़ने का फैसला किया और सैकड़ों मील की नई लाइनें बिछाई गईं।
    
 टेलीग्राम सेवा भले ही खत्म कर दी जाय, पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह सिर्फ संदेश ही नहीं देता था, बल्कि कई मौकों पर अदालत में बतौर प्रमाण भी इसका इस्तेमाल किया जाता रहा है। सीमा पर तैनात जवानों व ग्रामीण अंचलों के लिए तो यह दूत का काम करता था। नौकरी की नियुक्ति पत्र हो या शोक संदेश या फिर स्थानांतरण की सूचना, टेलीग्राम वक्त पर यह सूचना संबंधित को देता था। इसकी लोकप्रियता इस कदर थी कि कई हिंदी फिल्मों में इसे केंद्र में रख कर कहानी लिखी गयी। टेलीग्राम की कुछ बानगी विकिलीक्स के अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर के दौर के डिप्लोमैटिक केबल के खुलासों में भी सामने आई थीं, जिसमें यहाँ से भेजे जाने वाले तारों में भारतीय राजनीति में मची उथल-पुथल की जानकारियां थीं।
     
इतिहास ने तमाम ऐतिहासिक टेलीग्रामों को सुरक्षित रखा हुआ है। इसी क्रम में 23 जून, 1870 को पोर्थकुर्नो (इंग्लैंड) से बांबे भेजे गए पहले टेलीग्राम को कांप्लिमेंटरी टेलीग्राम नाम दिया गया था। यह टेलीग्राम लंदन में बैठे प्रबंध निदेशक ने बांबे (अब मुंबई) के प्रबंधक को भेजा था। इसका जवाब पांँच मिनट में प्राप्त हो गया था। इसके बाद बांबे के गवर्नर को भी संदेश भेजे गए थे। एक संदेश शिमला स्थित वाइसराय को उनकी पत्नी ने भेजा था। यह उस जमाने में तकनीक का बेजोड़ काम था। खासकर तब जब दो देशों के बीच संदेश पहुंँचाने में महीनों लग जाते थे। पहला संदेश प्रबंध निदेशक एंडरसन ने प्रबंधक स्टेसी को भेजा था - हाउ आर यू ऑल ? इसका जवाब मिला- आल वेल। लंदन से 506 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में अटलांटिक तट पर स्थित कॉर्नवाल में यह पोर्थकुर्नो घाटी है। इसी जगह से टेलीग्राम क्रांति की शुरुआत भी मानी जाती है। यहां से ब्रिटेन और इसके पूर्व उपनिवेश आपस में बातचीत करते थे। इतिहास में 15 अप्रैल 1912 को टाइटेनिक जहाज से आया टेलीग्राम भी दर्ज है, जिसमें लिखा था कि, हम तेजी से डूब रहे हैं। यात्रियों को नावों में बैठाया जा रहा है।
   ऐसा नहीं है कि टेलीग्राम का वजूद पूरी दुनिया से ही समाप्त हो चुका है। बहरीन, बेल्जियम, कनाडा, जापान, मैक्सिको, नीदरलैड, न्यूजीलैण्ड, रूस, स्वीडन, स्विटरजलैंड जैसे देशों में अब भी तार-सेवा है। अमेरिका में वेस्टर्न यूनियन ने वर्ष 2006 में तार-सेवा बंद कर दी थी, लेकिन एक कंपनी आईटेलीग्राम ने इसे खरीद लिया। ब्रिटेन में इसे आनलाइन नाम कंपनी संभालती है। जर्मनी में डोएचे पोस्ट टेलीग्राम की डिलीवरी करता है, पर वर्ष 2000 में इसे बंद कर दिया गया, लेकिन निजी कंपनी टेलीग्राम डायरेक्ट ने जर्मनी में इस सेवा को अभी भी जारी रखा है।
वस्तुतः टेलीग्राम की तकनीक मोर्स कोड ने बेतार संचार के क्षेत्र में एक ऐसा रास्ता खोला जो आगे चलकर संचार क्रांति में बदल गया। तकनीक की खूबी या खामी यही है कि वह अपने को लगातार नया करती है और पुराने को अनुपयोगी साबित करती है। टेलीग्राम से ही आगे चलकर टेलीफोन और मोबाइल क्रांति का सूत्रपात हुआ। एक तरह से यह वायरलेस तकनीक की शुरूआत थी और इसी के आधार पर आगे चलकर टेलीफोन, मोबाइल और सेटेलाइट फोन का आगमन हुआ। यह तकनीक पुरानी हो जाने के बावजूद अभी भी काफी प्रासंगिक है और सेना, नौसेना और हैम रेडियो में इसका इस्तेमाल किया जाता है। कई बार सरकारी कार्यालयों में भी आपात स्थिति हेतु इसका उपयोग किया जाता रहा है। 
परिवर्तन, प्रकृति का शाश्वत नियम है। पेड़ पर नई कोंपलों को फूटने के लिए पुराने पत्तों को झड़ना ही होता है। वक्त के साथ बहुत सारी चीजें बदल जाती हैं। डाक-तार विभाग की कई सेवायें मसलन- अंडर पोस्टल सर्टिफिकेट (यूपीसी), क्विक मेल सर्विस, सेटेलाइट मनीआर्डर, हाईब्रिड मेल सर्विस, प्रतियोगिता पोस्टकार्ड इत्यादि अतीत का हिस्सा बन गयीं। अभी बहुत दिन नहीं बीते, जब सरकार ने चवन्नी को बंद करने का फैसला लिया था। तब भी उसकी अहमियत के तमाम किस्से एकाएक सामने आने लगे थे। ऐसे ही तार के साथ भी हुआ। अब तार नहीं आएगा तो क्या, संदेश तो आते ही रहेंगे। कभी घोड़े पर सवार हरकारे संदेश लाया करते थे, फिर तार आया, फिर मोबाइल। बदलते वक्त के साथ कोई ऐसा उपकरण भी आ सकता है, जो संदेश पहुँचाने के लिहाज से इन सबसे से ज्यादा प्रभावी होगा। कहना आसान है कि बेतार पर सवार तकनीक के इस युग में तार का भला क्या काम, पर यह तो मानना ही पड़ेगा कि तमाम सेवाओं के सापेक्ष तार की यात्रा काफी लंबी रही। टेलीग्राम और तार-घर अब भले ही इतिहास बन जाएंगे लेकिन उनका अतीत हमेशा जिंदा रहेगा। तभी तो तार के बंद होने की सूचना मिलते ही लोग तारघर की तरफ दौड़ पड़े, एक अदद अंतिम तार अपने किसी इष्टजन को भेजने और उसकी यादों को हमेशा के लिए सहेजकर रख लेने के लिए।


बुधवार, 5 जून 2013

पर्यावरण - हाइकु


1-
पर्यावरण
सुरक्षित रहेगा
संपन्न धरा।

2-
काटिये नहीं
हरे-भरे वृक्षों को
जीवन देंगे।

3-
दूषित वायु
घटता जलस्तर
बढ़ता शोर।

4-
पिघले हिम
ये ग्लोबल वार्मिंग
बढ़ता ताप।

5-
कटते पेड़
फैलता रेगिस्तान
जीवन त्रस्त।

6-
पौधे रोपिए
उर्वरता बचाएं
समृद्ध धरा।

7-
स्वच्छ जल
नदियाँ अविरल
टले संकट।

8-
पर्यावरण
हो सतत् विकास
यही संकल्प।

                                                                  -कृष्ण कुमार यादव-



प्रकृति का सामीप्य तो हमें खूब भाता है। आज विश्व पर्यावरण दिवस है। प्रकृति और पर्यावरण का संरक्षण बेहद जरुरी है। सोचिए, यदि हमारे आस-पास पेड़-पौधे न हों, मुस्कुराते फूल न हों, चिड़ियों की चहचहाहट न हो, भिन्न-भिन्न ऋतुएं न हों ......तो सब कुछ कितना सूना लगेगा। सो, अभी भी देर नहीं हुई है। यदि पहले से संजीदगी न रही हो तो अभी से शुरुआत कर लें !! 

शनिवार, 25 मई 2013

बुद्ध और अंगुलिमाल






ठहरो!
तुम आगे नहीं जा सकते
फिर भी बुद्ध आगे बढ़ते रहे
अविचलित मुस्कुराते हुए
चेहरे पर तेज के साथ

अंगुलिमाल अवाक्
मानो किसी ने सारी हिंसा
उसके अन्दर से खींच ली हो
कदम अपने आप उठने लगे
और बुद्ध के चरणों में सिर रख दिया

उसने जान लिया कि
शारीरिक शक्ति से महत्वपूर्ण
आत्मिक शक्ति है
आत्मा को जीतना ही
परमात्मा को जीतना है।

(चित्र में : सारनाथ में कृष्ण कुमार यादव)

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आज बुद्ध पूर्णिमा है। जिस महात्मा बुद्ध ने तमाम कर्मकांडों के विरुद्ध आवाज़ उठाई, उसे हमने मूर्तियों, पूजा और कर्मकांडों के बीच उलझा दिया। दुर्भाग्य यही है कि जब कोई अच्छा कार्य करता है तो हम उसे मानव की बजाय भगवान बना देते हैं और इसी के साथ उसके विचारों की बजाय आडम्बर को ज्यादा महत्त्व देने लगते हैं। बुद्ध का मध्यम मार्ग मुझे बहुत भाता है, न तो अतिवादिता और न ही निम्नता। आज जीवन को अच्छे से जीने का यही माध्यम मार्ग भी उत्तम है !!

 (जीवन संगिनी आकांक्षा जी के फेस बुक टाइम लाइन से  )

रविवार, 12 मई 2013

माँ के आँसू



आज मदर्स डे है. माँ हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं और माँ की वजह से हम आज इस दुनिया में हैं. दुनिया में माँ का एक ऐसा अनूठा रिश्ता है, जो सदैव दिल के करीब होता है. हर छोटी-बड़ी बात हम माँ से शेयर करते हैं. दुनिया के किसी भी कोने में रहें, माँ की लोरी, प्यार भरी डांट और चपत, माँ का प्यार, दुलार, स्नेह, अपनत्व व ममत्व, माँ के हाथ का बना हुआ खाना, किसी से झगडा करके माँ के आँचल में छुप कर अपने को महफूज़ समझना, बीमार होने पर रात भर माँ का जगकर गोदी में सर लिए बैठे रहना, हमारी हर छोटी से छोटी जिद को पूरी करना, हमारी सफलता के लिए देवी-देवताओं से मन्नतें मांगना ..ना जाने क्या-क्या कष्ट माँ हमारे लिए सहती है और एक दिन हम सफलता के पायदान पर चढ़ते हुए अपनी अलग ही जिदगी बसा लेते हैं. माँ की नजरों से दूर अपनी दुनिया में, फिर भी माँ रोज हमारी चिंता करती है. हम सोचते हैं कि हम बड़े हो चुके हैं, पर माँ की निगाह में तो हम बच्चे ही हैं. आज मदर्स डे पर ऐसा ही कुछ भाव लिए मेरी यह कविता –


बचपन से ही देखता आ रहा हूँ माँ के आँसू

सुख में भी, दुख में भी

जिनकी कोई कीमत नहीं

मैं अपना जीवन अर्पित करके भी

इनका कर्ज नहीं चुका सकता।


हमेशा माँ की आँखों में आँसू आये

ऐसा नहीं कि मैं नहीं रोया

लेकिन मैंने दिल पर पत्थर रख लिया

सोचा, कल को सफल आदमी बनूँगा

माँ को सभी सुख-सुविधायें दूँगा

शायद तब उनकी आँखों में आँसू नहीं हो

पर यह मेरी भूल थी।


आज मैं सफल व्यक्ति हूँ

सारी सुख-सुविधायें जुटा सकता हूँ

पर एक माँ के लिए उसके क्या मायने ?


माँ को सिर्फ चाहिए अपना बेटा

जिसे वह छाती से लगा जी भर कर प्यार कर सके

पर जैसे-जैसे मैं ऊँचाईयों पर जाता हूँ

माँ का साथ दूर होता जाता है

शायद यही नियम है प्रकृति का।

शुक्रवार, 10 मई 2013

10 मई 1857 : जब हुआ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का आगाज़


आज 10 मई है। इस दिन का भारतीय इतिहास में एक विशिष्ट स्थान है। 1857 में भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम इसी दिन आरंभ हुआ था. 1857 वह वर्ष है, जब भारतीय वीरों ने अपने शौर्य की कलम को रक्त में डुबो कर काल की शिला पर अंकित किया था और ब्रिटिश साम्राज्य को कड़ी चुनौती देकर उसकी जडे़ं हिला दी थीं। 1857 का वर्ष वैसे भी उथल-पुथल वाला रहा है। इसी वर्ष कैलिफोर्निया के तेजोन नामक स्थान पर 7.9 स्केल का भूकम्प आया था तो टोकियो में आये भूकम्प में लगभग एक लाख लोग और इटली के नेपल्स में आये 6.9 स्केल के भूकम्प में लगभग 11,000 लोग मारे गये थे। 1857 की क्रान्ति इसलिये और भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि ठीक सौ साल पहले सन् 1757 में प्लासी के युद्ध में विजय प्राप्त कर राबर्ट क्लाइव ने अंग्रेजी राज की भारत में नींव डाली थी। विभिन्न इतिहासकारों और विचारकांे ने इसकी अपने-अपने दृष्टिकोण से व्याख्यायें की हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और महान चिन्तक पं0 जवाहरलाल नेहरू ने लिखा कि- ‘‘यह केवल एक विद्रोह नहीं था, यद्यपि इसका विस्फोट सैनिक विद्रोह के रूप में हुआ था, क्योंकि यह विद्रोह शीघ्र ही जन विद्रोह के रूप में परिणित हो गया था।’’ बेंजमिन डिजरायली ने ब्रिटिश संसद में इसे ‘‘राष्ट्रीय विद्रोह’’ बताया। प्रखर विचारक बी0डी0सावरकर व पट्टाभि सीतारमैया ने इसे ”भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम”, जान विलियम ने ”सिपाहियों का वेतन सुविधा वाला मामूली संघर्ष“ व जान ब्रूस नार्टन ने ‘‘जन-विद्रोह’’ कहा। माक्र्सवादी विचारक डा0 राम विलास शर्मा ने इसे संसार की प्रथम साम्राज्य विरोधी व सामन्त विरोधी क्रान्ति बताते हुए 20वीं सदी की जनवादी क्रान्तियों की लम्बी श्रृंखला की प्रथम महत्वपूर्ण कड़ी बताया। प्रख्यात अन्तर्राष्ट्रीय राजनैतिक विचारक मैजिनी तो भारत के इस प्रथम स्वाधीनता संग्राम को अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखते थे और उनके अनुसार इसका असर तत्कालीन इटली, हंगरी व पोलैंड की सत्ताओं पर भी पड़ेगा और वहाँ की नीतियाँ भी बदलेंगी।


1857 की क्रान्ति को लेकर तमाम विश्लेषण किये गये हैं। इसके पीछे राजनैतिक-सामाजिक-धार्मिक-आर्थिक सभी तत्व कार्य कर रहे थे, पर इसका सबसे सशक्त पक्ष यह रहा कि राजा-प्रजा, हिन्दू-मुसलमान, जमींदार-किसान, पुरूष-महिला सभी एकजुट होकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े। 1857 की क्रान्ति को मात्र सैनिक विद्रोह मानने वाले इस तथ्य की अवहेलना करते हैं कि कई ऐसे भी स्थान थे, जहाँ सैनिक छावनियाँ न होने पर भी ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध क्रान्ति हुयी। इसी प्रकार वे यह भूल जाते है कि वास्तव में ये सिपाही सैनिक वर्दी में किसान थे और किसी भी व्यक्ति के अधिकारों के हनन का सीधा तात्पर्य था कि किसी-न-किसी सैनिक के अधिकारों का हनन, क्योंकि हर सैनिक या तो किसी का पिता, बेटा, भाई या अन्य रिश्तेदार है। यह एक तथ्य है कि अंगे्रजी हुकूमत द्वारा लागू नये भू-राजस्व कानून के खिलाफ अकेले सैनिकों की ओर से 15,000 अर्जियाँ दायर की गयी थीं। डाॅ0 लक्ष्मीमल्ल सिंघवी के शब्दों में- ‘‘सन् 1857 की क्रान्ति को चाहे सामन्ती सैलाब या सैनिक गदर कहकर खारिज करने का प्रयास किया गया हो, पर वास्तव में वह जनमत का राजनीतिक-सांस्कृतिक विद्रोह था। भारत का जनमानस उसमें जुड़ा था, लोक साहित्य और लोक चेतना उस क्रान्ति के आवेग से अछूती नहीं थी। स्वाभाविक है कि क्रान्ति सफल न हो तो इसे ‘विप्लव’ या ‘विद्रोह’ ही कहा जाता है।’’ यह क्रान्ति कोई यकायक घटित घटना नहीं थी, वरन् इसके मूल में विगत कई सालों की घटनायें थीं, जो कम्पनी के शासनकाल में घटित होती रहीं। एक ओर भारत की परम्परा, रीतिरिवाज और संस्कृति के विपरीत अंग्रेजी सत्ता एवं संस्कृति सुदृढ हो रही थी तो दूसरी ओर भारतीय राजाओं के साथ अन्यायपूर्ण कार्रवाई, अंग्रेजों की हड़पनीति, भारतीय जनमानस की भावनाओं का दमन एवं विभेदपूर्ण व उपेक्षापूर्ण व्यवहार से राजाओं, सैनिकों व जनमानस में विद्रोह के अंकुर फूट रहे थे।


इसमें कोई शक नहीं कि 1757 से 1856 के मध्य देश के विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न वर्गों द्वारा कई विद्रोह किये गये। यद्यपि अंग्रेजी सेना बार-बार इन विद्रोहों को कुचलती रही पर उसके बावजूद इन विद्रोहों का पुनः सर उठाकर खड़ा हो जाना भारतीय जनमानस की जीवटता का ही परिचायक कहा जायेगा। 1857 के विद्रोह को इसी पृष्ठभूमि में देखे जाने की जरूरत है। अंग्रेज इतिहासकार फॅारेस्ट ने एक जगह सचेत भी किया है कि- ‘‘1857 की क्रान्ति हमें इस बात की याद दिलाती है कि हमारा साम्राज्य एक ऐसे पतले छिलके के ऊपर कायम है, जिसके किसी भी समय सामाजिक परिवर्तनों और धार्मिक क्रान्तियों की प्रचण्ड ज्वालाओं द्वारा टुकडे़-टुकडे़ हो जाने की सम्भावना है।’’ अंग्रेजी हुकूमत को भी 1757 से 1856 तक चले घटनाक्रमों से यह आभास हो गया था कि वे अब अजेय नहीं रहे। तभी तो लार्ड केनिंग ने फरवरी 1856 में गर्वनर जनरल का कार्यभार ग्रहण करने से पूर्व कहा था कि - ‘‘मैं चाहता हूँ कि मेरा कार्यकाल शान्तिपूर्ण हो। मैं नहीं भूल सकता कि भारत के गगन में, जो अभी शान्त है, कभी भी छोटा सा बादल, चाहे वह एक हाथ जितना ही क्यों न हो, निरन्तर विस्तृत होकर फट सकता है, जो हम सबको तबाह कर सकता है।’’ लार्ड केनिंग की इस स्वीकारोक्ति में ही 1857 की क्रान्ति के बीज छुपे हुये थे।

1857 की क्रान्ति की सफलता-असफलता के अपने-अपने तर्क हैं पर यह भारत की आजादी का पहला ऐसा संघर्ष था, जिसे अंग्रेज समर्थक सैनिक विद्रोह अथवा असफल विद्रोह साबित करने पर तुले थे, परन्तु सही मायनों में यह पराधीनता की बेड़ियों से मुक्ति पाने का राष्ट्रीय फलक पर हुआ प्रथम महत्वपूर्ण संघर्ष था। अमरीकी विद्वान प्रो0 जी0 एफ0 हचिन्स के शब्दों में-‘‘1857 की क्रान्ति को अंग्रेजों ने केवल सैनिक विद्रोह ही कहा क्योंकि वे इस घटना के राजद्रोह पक्ष पर ही बल देना चाहते थे और कहना चाहते थे कि यह विद्रोह अंग्रेजी सेना के केवल भारतीय सैनिकों तक ही सीमित था। परन्तु आधुनिक शोध पत्रों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह आरम्भ से सैनिक विद्रोह के ही रूप में हुआ, परन्तु शीघ्र ही इसमें लोकप्रिय विद्रोह का रूप धारण कर लिया।’’ वस्तुतः इस क्रान्ति को भारत में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध पहली प्रत्यक्ष चुनौती के रूप में देखा जा सकता है। यह आन्दोलन भले ही भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति न दिला पाया हो, लेकिन लोगों में आजादी का जज्बा जरूर पैदा कर गया। 1857 की इस क्रान्ति को कुछ इतिहासकारों ने महास्वप्न की शोकान्तिका कहा है, पर इस गर्वीले उपक्रम के फलस्वरूप ही भारत का नायाब मोती ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों से निकल गया और जल्द ही कम्पनी भंग हो गयी। 1857 के संग्राम की विशेषता यह भी है कि इससे उठे शंखनाद के बाद जंगे-आजादी 90 साल तक अनवरत चलती रही और अंतत: 15 अगस्त, 1947 को हम आजाद हुए !!

बुधवार, 8 मई 2013

दौड़ रही थी तितलियों के पीछे...




आज मैंने उसको देखा
वह दौड़ रही थी
तितलियों के पीछे

जूही, गेंदा, गुलाब
और जाने
कितने-कितने फूलों के पास

तितलियाँ भी छेड़ती थीं उसे
हाथ में आकर भी छूट जातीं

पर एक तितली को
शायद अच्छा लगा
वह उसके हाथ ही गई

उसकी खुशी का ठिकाना रहा
उसे लेकर वह वहीं
फूलों के बीच लेट गई
अपनी अल्हड़ धड़कनों पर
काबू पाने के लिए

तभी हवा का तेज झोंका आया
और उसके सीने पर रखे
दुपट्टे को उड़ा ले गया

ऐसा लगा
मानों तितलियों का झुंड
फूलों का रस पीकर उड़ा जा रहा हो।

शुक्रवार, 3 मई 2013

जब हिंदी फिल्मों की पहली नायिका बना एक वेटर


आज हम भले ही हिंदी फिल्मों को देखकर रोमांचित होते हैं, पर इसका यह सफ़र इतना आसान नहीं था। आज से ठीक सौ साल पहले 3 मई 1913 को देश में पहली स्वदेश निर्मित फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' रिलीज हुई थी। दादा साहब फाल्के द्वारा निर्मित  चालीस मिनट की इस फिल्म में आज यह सोचना भी अटपटा लगता है कि नायिका का रोल एक वेटर ने किया था। 

दरअसल 1912 में पटकथा लेखन के बाद दादा साहब फालके को तमाम कलाकार तो मिल गए, मगर महारानी तारामती का रोल करने के लिए कोई महिला तैयार नहीं हुई। हारकर दादा वेश्याओं के बाजार में उनके कोठे पर गए और उनसे तारामती रोल के लिए निवेदन किया। वेश्याओं ने दादा को टका-सा जवाब दिया कि उनका पेशा, फिल्म में काम करने वाली बाई से ज्यादा बेहतर है। फिल्म में काम करना घटिया बात है। दादा निराश तथा हताश होकर लौट रहे थे। रास्ते में सड़क किनारे एक ढाबे में रुके और चाय का ऑर्डर दिया। जो वेटर चाय का गिलास लेकर आया, दादा ने देखा कि उसकी अंगुलियां बड़ी नाजुक हैं और चालढाल में थोड़ा जनानापन है। दादा ने उससे पूछा- यहां कितनी तनख्वाह मिलती है? उसने जवाब दिया कि 5 रुपए महीना। दादा ने फिर कहा कि यदि तुम्हें 5 रुपए रोजाना मिले तो काम करोगे? उत्सुकता से वेटर ने तेजी से पूछा- क्या काम करना होगा? दादा ने सारी बात समझाई। इस तरह भारत की पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र की नायिका कोई महिला न होकर एक पुरुष थी। उसका नाम था अण्णा सालुंके। 

 नायिका की खोज पूरी होने के बाद सन् 1912 की बरसात के बाद बंबई के दादर इलाके में राजा हरिश्चंद्र की शूटिंग आरंभ हुई। राजा हरिश्चन्द्र की भूमिका निभाई दत्तात्रेय दामोदर दाबके ने और एनी प्रमुख कलाकार थे- भालचंद्र फाल्के, साने, तेलांग, शिंदे और औंधकर इत्यादि। सूरज की रोशनी में शूटिंग होती। शाम को पूरी यूनिट का खाना बनता। रात को किचन को डार्करूम में बदल दिया जाता। दादा और काकी सरस्वती देवी मिलकर फिल्म की डेवलपिंग-‍प्रिंटिंग का काम करते। 21 अप्रैल 1913 को बंबई के ओलिम्पिया सिनेमा में राजा हरिश्चंद्र का प्रथम प्रदर्शन मेहमानों के लिए किया गया। राजा हरिश्चंद्र लगातार 13 दिन चली, जो उस समय का रिकॉर्ड था।

यहाँ यह भी उल्लेख करना जरुरी है कि 'राजा हरिश्चंद्र' के बाद दादा साहेब फालके ने नासिक में 1913 में कथा फिल्म 'मोहिनी-भस्मासुर' का निर्माण किया। इस फिल्म के लिए रंगमंच पर काम करने वाली अभिनेत्री कमलाबाई गोखले दादा साहब को मिल गईं। कमलाबाई को हिन्दी फिल्मों की प्रथम महिला नायिका माना जाता है। 

हिंदी फिल्मों के पितामह धुंडीराज गोविंद फालके यानी दादा साहेब फाल्के ने पहली हिंदी फिल्म का निर्माण यूँ ही नहीं कर लिया, बल्कि इसके लिए उन्हें काफी पापड़ भी बेलने पड़े।  30 अप्रैल 1870 को नासिक के पास त्र्यम्बकेश्वर गांव के ब्राह्मण परिवार में जन्मे फाल्के ने बचपन में घर पर ही उत्तीर्ण होने पर बंबई के कला संस्थान जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में प्रवेश लिया। वहां उन्होंने छात्रवृत्ति मिलने पर एक कैमरा भी खरीद लिया। फिर क्या था, कैमरे के साथ-साथ फाल्के साहेब का मन भी रोमांचित होने लगा और अन्तत: उस दौर के नायक लोकमान्यबाल गंगाधर तिलक के विचारों से प्रभावित दादा फालके ने सरकारी नौकरी छोड़ दी। भागीदारी में प्रिंटिंग प्रेस का संचालन किया। 
 दादा साहेब फाल्के के जीवन में क्रन्तिकारी परिवर्तन तब आया जब सन् 1911 में क्रिसमस में बंबई के एक तम्बू सिनेमा में उन्होंने 'लाइफ ऑफ क्राइस्ट' नामक फिल्म देखी। वे फिल्म‍ देखकर घर लौटे और सारी रात बेचैन रहे। दूसरे दिन अपनी पत्नी सरस्वती काकी के साथ वही फिल्म दोबारा देखी। लगातार अलग-अलग नजरिए से उन्होंने 10 दिन फिल्म देखकर मन में निश्चय किया कि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन पर फिल्म बनाना चाहिए। यह बात अपनी पत्नी, रिश्तेदार तथा मित्रों को बताई। सबने फिल्म निर्माण की व्यावहारिक कठिनाइयां सामने रखीं। उभरकर सुझाव आया कि कृष्ण के जीवन में विस्तार तथा उतार-चढ़ाव अधिक हैं इसलिए किसी सरल कथानक पर फिल्म बनाना चाहिए। अंत में राजा हरिश्चंद्र का कथानक सबको पसंद आया।
दादा साहब के व्यापारी मित्र नाडकर्णी ने बाजार दर पर रुपए उधार देने की पेशकश की। चूँकि उस जमाने में भारत में फिल्म निर्माण के विषय में नहीं के बराबर ही जानकारी थी इसलिये इंगलैंड में रहकर फिल्म निर्माण की कला सीखी।1 फरवरी 1912 को दादा साहब लंदन के लिए पानी के जहाज से रवाना हुए। वहां उनका कोई परिचित नहीं था। केवल 'बायस्कोप' पत्रिका के संपादक को इसलिए जानते थे कि उसकी पत्रिका नियमित मंगाकर पढ़ते थे। दादा फालके 'बायस्कोप' के संपादक कैबोर्ग से मिले। वह भला आदमी था। वह उन्हें स्टुडियो तथा सिनेमा उपकरण एवं केमिकल्स की दु‍कानों पर ले गया और फिल्म निर्माण का सारा सामान खरीदवा दिया। 1 अप्रैल 1912 को दादा बंबई लौट आए और फिर आरंभ हुआ हिंदी सिनेमा की पहली फिल्म के निर्माण का।

फिल्म निर्माण कला सीख कर वापस भारत आने पर दादा साहेब फाल्के ने "राजा हरिश्चन्द्र" फिल्म बनाना शुरू किया। किन्तु उस जमाने में फिल्म बनाना आसान नहीं था क्योंकि लोग फिल्मों को अंग्रेजों का जादू-टोना समझते थे। फिल्म के लिये कलाकार मिलना मुश्किल होता था। किसी प्रकार से पुरुष कलाकार तो मिल जाते थे किन्तु महिला कलाकार मिल ही नहीं पाते थे क्योंकि महिलाओं का नाटक, नौटंकी, फिल्मों आदि में काम करना वर्जित माना जाता था। पुरुष कलाकारों को ही महिलाओं के वस्त्र पहनकर महिला-चरित्रों को निभाना पड़ता था। "राजा हरिश्चन्द्र" के निर्माण के दौरान दादा साहेब फाल्के के समक्ष अनेक बाधाएँ आईं किन्तु उन्होंने अडिग रहकर अपनी फिल्म बनाने में सफलता प्राप्त कर ही लिया और फिल्म 3 मई 1913 को प्रदर्शित हो गई।
प्रदर्शित होने पर "राजा हरिश्चन्द्र" ने इतनी अधिक लोकप्रियता प्राप्त की कि मुंबई (उन दिनों बंबई) के गिरगाँव स्थित कोरोनेशन सिनेमा के सामने सड़कों पर लोगों की विशाल भीड़ इकट्ठी हो जाया करती थी। यह फिल्म उस जमाने में जनता के मनोरंजन का केंद्र बिंदु बनी। परदे पर चलती फिरती आकृतियों को देखकर दर्शक भौचक थे. इस फिल्म की इतनी अधिक मांग बढ़ी कि ग्रामीण क्षेत्रों में इसके प्रदर्शन के लिये दादा साहेब फाल्के को फिल्म के और भी कई प्रिंट बनाने पड़े। फिल्म ने जबरदस्त सफलता प्राप्त की और दादा साहेब फाल्के एक फिल्म निर्माता के रूप में स्थापित हो गये और भारतीय फिल्म उद्योग के लिये एक रास्ता खुल गया। आज भारत सरकार के द्वारा फ़िल्म निर्माण में क्षेत्र में उत्कृष्ठ योगदानकर्ता को ’दादा साहब फालके’ सम्मान द्वारा नवाजा जाता है जो कि इस क्षेत्र का सर्वोच्च सम्मान है।


फ़िलहाल भारत में बनी यह पहली मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ अब डीवीडी फॉरमैट में भी  उपलब्ध है। पुणे स्थित भारतीय राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार (एनएफएआई)  ने इस फिल्म को डीवीडी फॉरमैट में प्रस्तुत किया है.
हिंदी फिल्मों की शताब्दी पर दादा साहेब फाल्के के साथ उन सभी का पुनीत स्मरण, जिन्होंने हिंदी सिनेमा को देश और  भाषा की सीमा से परे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक पहचान दिलाई। 



सोमवार, 29 अप्रैल 2013

'विज्ञान परिषद प्रयाग शताब्दी सम्मान' से कृष्ण कुमार यादव भी सम्मानित



राष्ट्रभाषा हिन्दी के माध्यम से विज्ञान लोकप्रियकरण के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिये विज्ञान के प्रति समर्पित संस्था 'विज्ञान परिषद प्रयाग' ने अपने शताब्दी वर्ष में विभिन्न विभूतियों को  'विज्ञान परिषद प्रयाग शताब्दी सम्मान' से विभूषित किया। 

प्रशासन के साथ-साथ लेखन और ब्लागिंग में अनवरत सक्रिय एवं सम्प्रति इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवायें  कृष्ण कुमार यादव को भी इस अवसर पर  'विज्ञान परिषद प्रयाग शताब्दी सम्मान' से सम्मानित किया गया। 

उक्त सम्मान 27 अप्रैल 2013 को इलाहाबाद में  विज्ञान परिषद प्रयाग के सभागार  में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में छत्तीसगढ़ के राजपाल महामहिम श्री शेखर दत्त द्वारा प्रदान किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता  डा0 वीरेन्द्र पाल सिंह, अध्यक्ष विश्व कृषि वानिकी केन्द्र (दक्षिण एशिया), नई दिल्ली ने की। 


इस अवसर पर हिंदी में विज्ञान लेखन करने और इसे प्रोत्साहित करने हेतु देश के बारह विश्वविद्यालयों के कुलपति, विभिन्न प्रमुख संस्थानों/विभागों के आठ निदेशकों, दस डाक्टर्स एवं बीस शिक्षाविद, साहित्यकार व ब्लागर्स को सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर विज्ञान परिषद् के सभापति दीनानाथ मिश्र, संस्था के प्रधानमंत्री शिवगोपाल  मिश्र, के . के . भूटानी सहित तमाम विश्वविद्यालयों के कुलपति, विभिन्न प्रमुख संस्थानों/विभागों के निदेशक, अधिकारीगण,  चिकित्सक, शिक्षाविद, साहित्यकार, लेखक, पत्रकार, ब्लागर्स, शोधार्थी इत्यादि उपस्थित थे। 

(साभार प्रस्तुति : )

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

'चिट्ठा' के दस साल का सफ़र

न्यू मीडिया के रूप में तेजी से उभरी हिन्दी ब्लागिंग के एक दशक पूरा होने पर प्रिंट मीडिया ने भी इसे हाथों-हाथ लिया। इलाहाबाद के तमाम पत्रकारों ने अन्य ब्लागर्स के साथ हम लोगों  से भी संपर्क किया और इस विधा के बारे में अपनी जानकारी में इजाफा करते हुए हिंदी ब्लागिंग के दस साल पूरे होने पर व्यापक और बेहतर कवरेज भी दी। इनमें आकांक्षा जी के  'शब्द-शिखर' के अलावा मेरे  'शब्द-सृजन की ओर' व 'डाकिया डाक लाया', अक्षिता के 'पाखी की दुनिया' के साथ-साथ हिंदी में ब्लागिंग कर रहे सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, गौरव कृष्णा बंसल इत्यादि की भी चर्चा की गई है। सबसे रोचक तो यह रहा कि हिन्दी मीडिया के साथ-साथ इस अवसर को अंग्रेजी-मीडिया ने भी भरपूर स्थान दिया। टाइम्स आफ इण्डिया, हिंदुस्तान टाइम्स  जैसे प्रतिष्ठित अंग्रेजी समाचार पत्रों के अलावा नार्दर्न इण्डिया पत्रिका ने भी इस पर बखूबी कलम चलाई। आप भी इन रिपोर्ताज को यहाँ पढ़ सकते हैं- 












At the completion of 10 years since its inception, Hindi blogging has come a long way. Even in a city like Allahabad there are individuals who are not just expressing their views and more on blog space, but even bringing home awards for their skills. One such accolade has been brought to the city by Krishna Kumar Yadav and his wife Akanksha Yadav, who won the 'Best Blogging Couple of the Decade' award for their blogs in Hindi since 2003 when Unicode made it possible to write blogs in our national language. Credit of pioneering Hindi blogs goes to a person named Alok, who first posted his blog titled 'Nau Do Gyarah'. He is the one who used the word 'Chittha' for a blog for the first time. Today it has evolved as a strong platform for dialogue, information exchange, self expression and communication. Allahabad has always enjoyed the pride of being a seat of literature, education, culture and art and the city's bloggers have lived up to that reputation. 

Krishna Kumar Yadav, who was awarded with 'Awadh Samman' for 'Excellence in New Media and Blogging' in November 2013 by Chief Minister Akhilesh Yadav. 

Posted as director Postal Services of Allahabad region, Yadav told TOI that he runs two blogs named 'Shabd Srijan ki Ore' and 'Daakiya Daak Laaya'. 'Shabd Srijan ki Ore' (http://kkyadav.blogspot.com) , started on June 13, 2008 is alive with contemporary issues, beautiful and soul-stirring poems, informational and well researched articles, whereas his other blog 'Daakiya Daak Laaya' (http://dakbabu.blogspot.com) contains rich history of Postal Services, information about great personas related with service and information about amazing world of postage stamps. His wife Akanksha Yadav is his partner in blogging. Through her blog 'Shabd Shikhar' (http://shabdshikhar.blogspot.com), she writes about woman and child issues, and social concerns. She is an eminent blogger and women empowerment is the basic theme of her writing. 

The couple began blogging in 2003 and within five years through their 10 blogs, motivated several others to start blogs of their own. The couple was awarded 'The Best Couple Blogger of the Decade' award at an International Hindi Blogging Conference organised in Lucknow on August 27, 2012. Blogs of this couple have readers not only in India but abroad as well. While Krishna Kumar Yadav's blogs 'Daakiya Daak Laya' has been viewed in 104 countries and 'Shabd Srijan Ki Ore' in 78 countries, Akanksha Yadav's blog 'Shabd Shikhar' has been viewed in 81 countries. 

Akanksha Yadav says, "Blogging emerged as a 'new media' and has opened a new prospect for women's aspirations. In her blog, she presents data to illustrate that today there are more than 50,000 blogs out of which about one-fourth are operated by women. These women are not only discussing socio-political and economic issues but also creating literature in their own style. 

The Youngest blogger in Hindi, a girl named Akshita is also from Allahabad. She is the first blogger to have received State Award for blogging and has received National Children's Award from Government of India in 2011. Her blog 'Pakhi Ki Duniya' (http://pakhi-akshita.blogspot.com) is amazing and is viewed/read in about 105 countries and contains more than 320 posts.   (Courtesy : Times of India, 22 April 2013)