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शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

भूमंडलीकरण के दौर में भी प्रेमचन्द के साहित्यिक और सामाजिक विमर्श, उतने ही प्रासंगिक

प्रेमचन्द के साहित्यिक और सामाजिक विमर्श आज भूमंडलीकरण के दौर में भी उतने ही प्रासंगिक हैं और उनकी रचनाओं के पात्र आज भी समाज में कहीं न कहीं जिन्दा हैं। प्रेमचंद से पहले हिंदी साहित्य राजा-रानी के किस्सों, रहस्य-रोमांच में उलझा हुआ था। प्रेमचंद ने साहित्य को सच्चाई के धरातल पर उतारा। प्रेमचन्द जब अपनी रचनाओं में समाज के उपेक्षित व शोषित वर्ग को प्रतिनिधित्व देते हैं तो निश्चिततः इस माध्यम से वे एक युद्ध लड़ते हैं और गहरी नींद सोये इस वर्ग को जगाने का उपक्रम करते हैं। उनका साहित्य शाश्वत है और यथार्थ के करीब रहकर वह समय से होड़ लेती नजर आती हैं। उक्त उद्गार प्रेमचंद की जयंती पर राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं और हिंदी साहित्यकार साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव ने व्यक्त किये।  

डाक निदेशक श्री यादव ने कहा कि हिन्दी साहित्य के इतिहास में उपन्यास सम्राट के रूप में अपनी पहचान बना चुके मुंशी प्रेमचंद के पिता अजायब राय श्रीवास्तव डाकमुंशी के रूप में कार्य करते थे। ऐसे में प्रेमचंद का डाक-परिवार से अटूट सम्बन्ध था।   डाककर्मी के पुत्र मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य की नई इबारत  लिखी। जब प्रेमचंद के पिता गोरखपुर में डाकमुंशी के पद पर कार्य कर रहे थे उसी समय गोरखपुर में रहते हुए ही उन्होंने अपनी पहली रचना लिखी। उन्होंने कहा कि मुंशी प्रेमचंद को पढ़ते हुए हम  सब बड़े हो  गए। उनकी रचनाओं से बड़ी  आत्मीयता महसूस होती है। ऐसा लगता है जैसे इन रचनाओं के  पात्र हमारे आस-पास ही मौजूद हैं।   

  निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि  प्रेमचन्द ने अपने को किसी वाद से जोड़ने की बजाय तत्कालीन समाज में व्याप्त ज्वलंत मुद्दों से जोड़ा। राष्ट्र आज भी उन्हीं समस्याओं से जूझ रहा है जिन्हें प्रेमचन्द ने काफी पहले रेखांकित कर दिया था, चाहे वह जातिवाद या साम्प्रदायिकता का जहर हो, चाहे कर्ज की गिरफ्त में आकर आत्महत्या करता किसान हो, चाहे नारी की पीड़ा हो, चाहे शोषण और समाजिक भेद-भाव हो। कृष्ण कुमार यादव ने जोर देकर कहा कि आज प्रेमचन्द की प्रासंगिकता इसलिये और भी बढ़ जाती है कि आधुनिक साहित्य के स्थापित नारी-विमर्श एवं दलित-विमर्श जैसे तकिया-कलामों के बाद भी अन्ततः लोग इनके सूत्र किसी न किसी रूप में प्रेमचन्द की रचनाओं में ढूंढते नजर आते हैं। 







( इलाहाबाद में पोस्टिंग के दौरान बनारस गया तो मुंशी प्रेमचंद की जन्मस्थली लमही भी जाने का सु-अवसर प्राप्त हुआ। मुंशी प्रेमचंद स्मारक लमही, वाराणसी के पुस्तकालय हेतु हमने अपनी पुस्तक '16 आने 16 लोग' भी भेंट की, संयोगवश इसमें एक लेख प्रेमचंद के कृतित्व पर भी शामिल है। उसी दौरान लिए गए कुछेक चित्र।  आज साहित्य सम्राट प्रेमचंद की जयंती पर शत-शत नमन !!) 

बुधवार, 29 जुलाई 2015

सबके प्यारे अब्दुल कलाम चले गए...

आधुनिक भारत के भगवान चले गए।
इस देश के असली स्वाभिमान चले गए।।
धर्म को अकेला छोड़ विज्ञान चले गए।
एक साथ गीता और कुरान चले गए।।
मानवता के एकल प्रतिष्ठान चले गए।
धर्मनिरपेक्षता के मूल संविधान चले गए।।
इस सदी के श्रेष्ठ ऋषि महान चले गए।
कलयुग के इकलौते इंसान चले गए।।
ज्ञान राशि के अमित निधान चले गए।।
सबके प्यारे अब्दुल कलाम चले गए।।


पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का दिल का दौरा पड़ने से 27 जुलाई को शिलांग में निधन। 
राष्ट्र की एक अपूरणीय क्षति। 
विनम्र श्रद्धांजलि !!

रविवार, 21 जून 2015

पापा ही प्रेरक-शक्ति हैं ...


पिता जी के बिना यह जीवन अधूरा है।  जीवन के हर क्षण में वे हमारे साथ खड़े रहे। आज अगर मैं सिविल सेवाओं में हूँ तो पापा ही उसके पीछे प्रेरक-शक्ति हैं, अन्यथा हम तो कुछ दूसरा ही कैरियर बनाने की सोच रहे थे। 72 वर्ष की उम्र में भी पापा का लिखने-पढ़ने का जज्बा ख़त्म नहीं हुआ है। आज भी लेखन, चिंतन और अध्ययन उनकी सर्वाधिक पसंदीदा अभिरुचि है । आज हम पापा जरूर बन गए हैं, पर अपने पापा के लिए तो बच्चे ही हैं। 

संयोगवश आज फादर्स-डे है।  ऐसे में सोचें कि कोई भी पिता अपने बच्चों से क्या चाहता है- प्यार का सच्चा इजहार, बच्चों का साथ, मान-सम्मान और यह आश्वस्ति कि बुजुर्ग होने पर बच्चे उनका भी पूरा ख्याल रखेंगे। बच्चों की हर सफलता के साथ पिता गौरवान्वित होता है। उन्हें लगता है कि जिन आदर्शों  के लिए उन्होंने दिन-रात एक किया, बेटे-बेटियों ने उसे साकार किया। ऐसे में सिर्फ एक दिन ‘फादर्स डे‘ मना कर अपने दायित्वों से इतिश्री नहीं किया जा सकता। माता-पिता ही दुनिया की सबसे गहरी छाया होते हैं, जिनके सहारे जीवन जीने का सौभाग्य हर किसी के बस में नहीं होता। इसलिए माता-पिता का आशीर्वाद लेकर सिर्फ एक दिन ही उन्हें याद ना करते हुए प्रतिदिन उन्हें नमन कर अपना जीवन सार्थक करना चाहिए। 


इलाहाबाद में पोस्टिंग के दौरान पापा काफी दिनों तक साथ ही रहे। उस दौरान बिटिया अक्षिता (पाखी) ने प्यारे दादू की यह फोटो ली थी।  

रविवार, 7 जून 2015

अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन में "सृजनात्मक साहित्य में हिंदी ब्लॉग का योगदान" विषय पर परिचर्चा

हिंदी ब्लॉगिंग आज किसी परिचय का मोहताज नहीं रही।  अल्प समय में ही इसने समाज से लेकर राजनीति, साहित्य से लेकर सिनेमा और अन्य सभी विधाओं में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। सिर्फ भारत ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों में हिंदी ब्लॉग पर सृजनात्मक साहित्य रचा जा रहा है। स्थापित पत्र-पत्रिकाओं से लेकर न्यूज चैनल्स तक आवश्यकतानुसार हिंदी ब्लॉगों से सामग्री ले रहे हैं।  न्यू मीडिया के रूप में हिंदी ब्लॉग नित नए आयाम गढ़ रहा है। उक्त उद्गार वरिष्ठ हिंदी ब्लॉगर लेखक एवं सम्प्रति  राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर  के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने कोलम्बो (श्री लंका) के कॉनकॉर्ड ग्रैंड होटल में 25 मई, 2015  को हुए अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन में "सृजनात्मक साहित्य में हिंदी ब्लॉग का योगदान" विषय पर आयोजित परिचर्चा में  व्यक्त किये। 

अपने उद्बोधन में श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि ब्लॉग की लोकप्रियता इसी बात से सिद्ध होती है कि हर कोई ब्लॉग पर आना चाहता है | स्थापित साहित्यकार खतरा महसूस कर रहे है तथा ब्लॉगिंग की शक्ति को स्वीकार करके इसे अपना रहे हैं | आज  50 हजार से भी ज्यादा हिंदी ब्लॉग विभिन्न विषयों और विभिन्न क्षेत्रों में अपनी-अपनी क्षमता के हिसाब से योगदान दे रहे हैं । ब्लॉगिंग के नकरात्मक पहलू पर प्रकाश डालते हुए श्री यादव ने कहा कि वर्तनी का दोष, कट पेस्ट और भड़ास इसके नकारात्मक पक्ष हैं, इस पर समय रहते ध्यान देते हुए हिंदी ब्लॉग की सृजनात्मक शक्ति को और प्रभावी बनाया जा सकता है। 

हिंदी के पहले वेब पोर्टल वेब दुनिया डॉट कॉम के संस्थापक कंटेंट संपादक श्री प्रकाश हिंदुस्तानी ने कहा कि साहित्यकारों और साहित्य के पाठकों के लिए ब्लॉग एक अनमोल तोहफा है। अभिव्यक्ति का बेजोड़ हथियार। यहां अभिव्यक्ति के बाद भरपूर आत्मसंतोष मिलता है। ब्लॉगिंग के माध्यम से बेहतर लेखन भी संभव हो पाया है, क्योंकि लेखक खुद अपने आप को बार-बार सुधार सकता है। इसके साथ ही लेखन के क्षेत्र में नेटवर्किंग भी आसान हो गई है। किसी भी सृजनात्मक ब्लॉगर के लिए अपने पाठकों के सामने वैश्विक सौहाद्र्र को बढ़ाना एक प्रमुख लक्ष्य होता है। इसके साथ ही उसका लक्ष्य होता है साहित्य के लिए नई जमीन तलाशना। हिन्दी में ब्लॉगिंग अंग्रेजी की तुलना में देरी से शुरू हुई। 2003 में हिन्दी का पहला ब्लॉग 9-2-11 सामने आया। 2007 में यूनिकोड के आगमन के बाद हिन्दी की ब्लॉगिंग में तेजी आई। 

ए. बी. पी. न्यूज मुंबई के वरिष्ठ संपादक श्री जीतेन्द्र दीक्षित ने अपने महत्वपूर्ण शोध के माध्यम से विभीन्न आकडें प्रस्तुत करते हुए कहा कि  भारत में 50  हजार से अधिक हिंदी  ब्लॉग हैं | 11  करोड लोग फेसबुक से जुड़े है | इन सबकी सम्मिलित शक्ति को नक्कारना किसी भी सत्ता के लिए असम्भव होगा। यही कारण है कि आज आतंकवादी भी इससे भयभीत हैं और बंगलादेश में अभिजीत राम और वशिकुर्ररहमान जैसे ब्लॉगरों की हत्या करते है, जो कि शर्मनाक कृत्य है। 

परिचर्चा में अपने उद्वोधन के क्रम में उत्तर महाराष्ट्र  विश्वविद्यालय जलगांव के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. सुनील कुलकर्णी ने ब्लॉगिंग को एक शक्तिशाली माध्यम बताते हुए कहा कि ब्लॉग अभिव्यक्ति का ताकतवर माध्यम बनकर उभरा है | आज तमाम विश्विद्यालयों में ब्लॉग पर शोध हो रहे हैं, वहीँ शोधकर्ता विभिन्न ब्लॉगों पर प्रकाशित सामग्री को शोध के लिए उपयुक्त पा रहे हैं। 

अपने अध्यक्षीय व्यक्तव्य में कबीर कम्युनिकेशन की क्रिएटिव हेड डॉ. सर्जना शर्मा (दिल्ली) ने कहा कि ब्लॉगिंग से अधिकाधिक लोगों को जोड़ने की जरूरत है और इसके लिए  कार्यशालाओ की आवश्यकता  है, क्योकि इसके अभाव में संस्कारविहीन साहित्य आ रहा है |


परिचर्चा का सञ्चालन लखनऊ के डॉ. रामबहादुर मिश्र ने किया | 

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अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, श्रीलंका के उद्घाटन सत्र का दीप प्रज्वलन द्वारा शुभारम्भ करते हुए डॉन सोमरथ्न विथाना, वरिष्ठ नाट्यकर्मी, श्रीलंका, श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर, श्री नकुल दूबे, पूर्व नगर विकास मंत्री, उत्तरप्रदेश सरकार, श्री रवीन्द्र प्रभात, संयोजक- अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन, डॉ सुनील कुलकर्णी, हिन्दी विभागाध्यक्ष, उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय जलगांव एवं अन्य। 


अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, श्रीलंका में वरिष्ठ ब्लॉगर व् साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव (निदेशक डाक सेवाएं, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर) का संबोधन। 




अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, श्रीलंका में मानद अतिथि के रूप में वरिष्ठ ब्लॉगर व् साहित्यकार श्री कृष्ण कुमार यादव (निदेशक डाक सेवाएं, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर) का स्वागत व अभिनंदन करते श्री रवीन्द्र प्रभात, संयोजक- अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन एवं सुश्री सर्जना शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट व श्री राम बहादुर मिश्र, साहित्यकार व संपादक। 




अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, श्रीलंका के उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष डॉन सोमरथ्न विथाना, वरिष्ठ नाट्यकर्मी, श्रीलंका को सम्मानित करते श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर एवं श्री नकुल दूबे, पूर्व नगर विकास मंत्री, उत्तरप्रदेश सरकार।




अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन, श्रीलंका के उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष डॉन सोमरथ्न विथाना, वरिष्ठ नाट्यकर्मी, श्रीलंका,श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर एवं श्री नकुल दूबे, पूर्व नगर विकास मंत्री, उत्तरप्रदेश सरकार।



"सृजनात्मक साहित्य में हिंदी ब्लॉग का योगदान" विषय पर आयोजित परिचर्चा में मंचासीन  श्री प्रकाश हिंदुस्तानी, वरिष्ठ ब्लॉगर व् साहित्यकार श्री कृष्ण कुमार यादव (निदेशक डाक सेवाएं, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर), श्री जीतेन्द्र दीक्षित, डॉन सोमरथ्न विथाना, सुश्री सर्जना शर्मा, डॉ. सुनील कुलकर्णी। 

"सृजनात्मक साहित्य में हिंदी ब्लॉग का योगदान" विषय पर आयोजित परिचर्चा में विचार व्यक्त करते वरिष्ठ ब्लॉगर व् साहित्यकार श्री कृष्ण कुमार यादव (निदेशक डाक सेवाएं, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर) 


शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

चिट्ठियों ने जिया लम्बा दौर - कृष्ण कुमार यादव

इलाहाबाद के रहने वाले कृष्ण कुमार यादव करीब महीने भर पहले ही यहाँ राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर में डाक सेवाओं के निदेशक पद पर स्थानांतरित होकर आए हैं।  भारतीय डाक सेवा (आईपीएस) के अधिकारी यादव ने आते ही सुकन्या समृद्धि योजना सहित डाक विभाग की विभिन्न योजनाओं को लोगों तक पहुँचाने के लिए मेले और डाकघरों में कई कार्यक्रम आयोजित किए।  उनके महीने भर के कार्यकाल में ही जोधपुर में सुकन्या समृद्धि योजना के तहत करीब 20 हजार बेटियों ने खाते खुलवाए जो बेटियों की शादी व कॅरियर के लिए मील का पत्थर साबित होंगे।  डाक विभाग के बारे में उनकी योजनाओं व उनके व्यक्तित्व की जानकारी के लिए राजस्थान पत्रिका के संवाददाता गजेंद्र सिंह दहिया बुधवार दोपहर उनके दफ्तर पहुँचे।  पेश  है बातचीत के कुछ अंश -

प्रश्न  : आपको नहीं लगता कि डाक विभाग का महत्व दिन प्रतिदिन कम होता जा रहा है?
उत्तर : डाक विभाग ने 1854 में अपनी स्थापना से अब तक डेढ़ युग से अधिक का सफर तय किया है।  आर्टिकल डिलीवरी के लिए प्रसिद्ध इस विभाग की चिट्ठियों, पोस्टकार्ड और अंतरर्देषीय पत्र ने एक लम्बा दौर जिया है।  पेजर आया खत्म हो गया।  लैण्डलाईन फोन केवल सरकारी दफ्तरों में बचे हैं।  सोषल मीडिया आने के बाद मोबाइल की एसएमएस सेवा खत्म होने के कगार पर है, लेकिन चिट्ठियाँ आज भी आ रही हैं और जा रही हैं, बस स्वरूप व जरुरत थोड़ी बदल गई।

प्रश्न  : अन्य देशों की तुलना में भारतीय डाक में क्या अंतर है?
उत्तर : मैं भारतीय डाक अकादमी की ओर से दक्षिण कोरिया गया।  वहाँ डाकघर माॅल की तरह हैं  जहाँ ग्राहकों को डाकघर में हर सुविधा दी जा रही है,  यानी वे कामर्शियल  हो गया है, लेकिन भारतीय डाक ने अभी तक अपने आपको सामाजिक सरोकार से जोड़ रखा है।

प्रश्न  : डाक विभाग के पास देश में 1.50 लाख डाकघरों का नेटवर्क है वो भी प्राइम लोकेशन पर, वो इसका रिटेलिंग व मार्केटिंग के लिए इस्तेमाल क्यों नहीं करते ?
उत्तर : देश  के 70 फीसदी लोग गाँवों में रहते हैं।  उनको आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध करवाना विभाग का पहला काम है।  वैसे डाक विभाग धीरे-धीरे आईटी माॅर्डनाइजेशन की ओर बढ़ रहा है।

प्रश्न  : अपने बारे में बताइए?
उत्तर : मेरा जन्म 10 अगस्त,1977 को  उत्तर प्रदेश प्रदेश  के आजमगढ़ में हुआ।  शिक्षा इलाहाबाद में हुई।  एमए (राजनीति शास्त्र) फाईनल ईयर के दौरान ही 2001 में मेरा यूपीएससी में आईपीएस में चयन हो गया।  पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव जी स्वास्थ्य अधिकारी रहे हैं और माता श्रीमती विमला गृहिणी हैं।  तीन भाई-बहिनों में सबसे बड़ा हूँ।  छोटी बहन उत्तर प्रदेश में शिक्षक है और भाई सिविल सेवा की तैयारी कर रहा है।  शादी 2004 में काॅलेज में लेक्चरर आकांक्षा से हुई जो वर्तमान में फ्री लांसिंग करती हैं।  मेरी दो बेटियाँ हैं।

प्रश्न  : आप सिविल सेवा में ही आना चाहते थे?
उत्तर : नहीं, मैं डाॅक्टर बनना चाहता था, लेकिन पापा ने सिविल सर्विसेज़  में आने को कहा।  मैंने उनसे कहा कि यह परीक्षा कठिन है तो उनका जवाब था कि इस दुनिया में जो भी कुछ बनता है, करता है, वह मनुष्य  ही है।

प्रश्न  : आप एक कवि व साहित्यकार भी हैं और आपकी पत्नी भी?
उत्तर : जी हाँ, मेरी अब तक सात पुस्तकें और आकांक्षा की दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  कविता, कहानी, लघुकथा व बाल कविताओं के लिए कई सम्मान भी मिले हैं।  मैं और आकांक्षा ब्लाॅग भी लिखते हैं।  साहित्य लेखन इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन के समय परवान चढ़ा था।



( साभार : 'राजस्थान पत्रिका' (24 अप्रैल, 2015), जोधपुर  में प्रकाशित कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर का साक्षात्कार : चिट्ठियों ने जिया लम्बा दौर.

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

जब वृक्षों की रक्षा के लिए दे दी कुर्बानी

आज विश्व  पृथ्वी  दिवस  है।  अपनी धरती और अपने पर्यावरण के प्रति सचेत होने का एक और दिन। वृक्षों के रक्षार्थ जोधपुर के खेजड़ली गांव में सन् 1730 में खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा के लिए विश्नोई जाति के के बलिदान की गाथा रोमांचक और प्रेरणास्पद है। अमृता देवी विश्नोई  के नेतृत्व में 363 लोगों द्वारा वृक्षों के रक्षार्थ किया गया जीवन बलिदान अपनी पृथ्वी,  वृक्ष और पर्यावरण के प्रति अनुकरणीय राह दिखाता है। राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है- ‘सर साठे रुंख रहे तो भी सस्तो जाण’, यानी सिर कटवा कर भी वृक्षों की रक्षा हो सके, तो इसे फायदे का सौदा ही समझिए। 

खेजड़ली के बलिदान की गाथा रोमांचक और प्रेरणास्पद है।  सन् 1730 में जोधपुर के राजा अभयसिंह ने महल बनवाने का निश्चय किया. नया महल बनाने के कार्य में सबसे पहले चूने का भट्टा जलाने के लिए ईंधन की आवश्यकता बतायी गयी. राजा ने मंत्री गिरधारी दास  भण्डारी को लकड़ियों की व्यवस्था करने का आदेश दिया, मंत्री गिरधारी दास  भण्डारी  की नजर महल से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित गांव खेजडली पर पड़ी. मंत्री गिरधारी दास भण्डारी व दरबारियों ने मिलकर राजा को सलाह दी कि पड़ोस के गांव खेजड़ली में खेजड़ी के बहुत पेड़ है, वहां से लकड़ी मंगवाने पर चूना पकाने में कोई दिक्कत नहीं होगी. इस पर राजा ने तुरंत अपनी स्वीकृति दे दी. खेजड़ली गांव में अधिकांश बिश्नोई लोग रहते थे. बिश्नोईयों में पर्यावरण के प्रति प्रेम और वन्य जीव सरंक्षण जीवन का प्रमुख उद्देश्य रहा है. खेजड़ली गांव में प्रकृति के प्रति समर्पित इसी बिश्नोई समाज की 42 वर्षीय महिला अमृता देवी के परिवार में उनकी तीन पुत्रियां आसु, रतनी, भागु बाई  और पति रामू खोड़ थे, जो कृषि और पशुपालन से अपना जीवन-यापन करते थे.

खेजड़ली में राजा के कर्मचारी सबसे पहले अमृता देवी के घर के पास में लगे खेजड़ी के पेड़ को काटने आये तो अमृता देवी ने उन्हें रोका और कहा कि “यह खेजड़ी का पेड़ हमारे घर का सदस्य है यह मेरा भाई है इसे मैंने राखी बांधी है, इसे मैं नहीं काटने दूंगी.” इस पर राजा के कर्मचारियों ने प्रति प्रश्न किया कि “इस पेड़ से तुम्हारा धर्म का रिश्ता है, तो इसकी रक्षा के लिये तुम लोगों की क्या तैयारी है.” इस पर अमृता देवी और गांव के लोगों ने अपना संकल्प घोषित किया “सिर साटे रूख रहे तो भी सस्तो जाण” अर्थात् हमारा सिर देने के बदले यह पेड़ जिंदा रहता है तो हम इसके लिये तैयार है. उस दिन तो पेड़ कटाई का काम स्थगित कर राजा के कर्मचारी चले गये, लेकिन इस घटना की खबर खेजड़ली और आसपास के गांवों में शीघ्रता से फैल गयी.

 कुछ दिन बाद मंगलवार 21 सितम्बर 1730 ई. (भाद्रपद शुक्ल दशमी, विक्रम संवत 1787) को मंत्री गिरधारी दास भण्डारी लावलश्कर के साथ पूरी तैयारी से सूर्योदय होने से पहले आये, जब पूरा गाँव सो रहा था. गिरधारी दास भण्डारी के साथ आए लोगों ने सबसे पहले अमृता देवी के घर के पास लगे खेजड़ी के हरे पेड़ो की कटाई करना शुरु किया तो, आवाजें सुनकर अमृता देवी अपनी तीनों पुत्रियों के साथ घर से बाहर निकली उसने ये कृत्य विश्नोई धर्म में वर्जित (प्रतिबंधित) होने के कारण उनका विरोध किया  उद्घोष किया  “सिर साटे रुख रहे तो भी सस्तो जाण” और अमृता देवी गुरू जांभोजी महाराज की जय बोलते हुए सबसे पहले पेड़ से लिपट गयी, क्षण भर में उनकी गर्दन काटकर सिर धड़ से अलग कर दिया. फिर तीनों पुत्रियों पेड़ से लिपटी तो उनकी भी गर्दनें काटकर सिर धड़ से अलग कर दिये.

इस बात का पता चलते ही  खेजड़ली गांव के लोगों ने अपनी जान की कीमत पर भी वृक्षों की रक्षा करने का निश्चय किया। चौरासी गांवों को इस फैसले की सूचना दे दी गई। सैकड़ों की तादाद में लोग खेजड़ली गांव में इकट्ठे हो गए और पेड़ों को काटने से रोकने के लिए उनसे चिपक गए। उन्होनें एक मत से तय कर लिया कि एक पेड़ के एक विश्नोई लिपटकर अपने प्राणों की आहुति देगा. सबसे पहले बुजुर्गों ने प्राणों की आहुति दी. तब मंत्री गिरधारी दास  भण्डारी ने बिश्नोईयों को ताना मारा कि ये अवांच्छित बूढ़े लोगों की बलि दे रहे हो. उसके बाद तो ऐसा जलजला उठा कि बड़े, बूढ़े, जवान, बच्चे स्त्री-पुरुष सबमें प्राणों की बलि देने की होड़ मच गयी. बिश्नोई जन पेड़ो से लिपटते गये और प्राणों की आहुति देते गये. एक व्यक्ति के कटने पर तुरंत दूसरा व्यक्ति उसी पेड़ से चिपक जाता। इसमें कुल 363 बिश्नोईयों (71 महिलायें और 292 पुरूष) ने पेड़ की रक्षा में अपने प्राणों की आहूति दे दी. खेजड़ली की धरती बिश्नोईयों के बलिदानी रक्त से लाल हो गयी. जब इस घटना की सूचना जोधपुर के महाराजा को मिली तब जाकर उन्होंने पेड़ों की कटाई रुकवाई और भविष्य में वहां पेड़ न काटने के आदेश दिए। उन्होंने बिश्नोईयों को ताम्रपत्र से सम्मानित करते हुए जोधपुर राज्य में पेड़ कटाई को प्रतिबंधित घोषित किया और इसके लिये दण्ड का प्रावधान किया। 

 इस बलिदान में अमृतादेवी और उनकी दो पुत्रियां हरावल में रहीं। पुरुषों में सर्वप्रथम अणदोजी ने बलिदान दिया था और बाद में विरतो बणियाल, चावोजी, ऊदोजी, कान्होजी, किसनोजी, दयाराम आदि पुरुषों और दामी, चामी आदि स्त्रियों ने अपने प्राण दिए। मंगलवार 21 सितम्बर 1730 (भाद्रपद शुक्ल दशमी, विक्रम संवत 1787) का वह ऐतिहासिक दिन  इतिहास में सदैव के लिए प्रेरणा बनकर  अमर हो गया। खेजड़ली के इन वीरों की स्मृति में यहां हर वर्ष भादवा सुदी दशमी को मेला लगता है, जिसमें हजारों की संख्या में लोग इकट्ठे होते हैं।

(चित्र में : राष्ट्रीय पर्यावरण शहीद स्मारक, खेजड़ली-जोधपुर के समक्ष सपरिवार)

रविवार, 29 मार्च 2015

छुट्टियों का आनंद : उम्मेद भवन पैलेस, जोधपुर में


राजस्थान अपनी ऐतिहासिकता और स्थापत्य कला लिए प्रसिद्ध है।  जयपुर  यहाँ जोधपुर सबसे महत्वपूर्ण बड़ा शहर है।  उमेद भवन पैलेस यहाँ सबसे प्रमुख आकर्षण का केंद्र है। इसके संस्थापक महाराजा उमेदसिंह (1929-1942) के काल में ही जोधपुर एक आधुनिक शहर के रूप में विकसित हुआ।

महराजा उमेदसिंह  ने उमेद भवन पैलेस बनवाया था। यह महल छित्तर महल के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह महल वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है। हाथ से तराशे गए पत्थरों के टुक़डे अनोखे ढंग से एक-दूसरे पर टिकाए गए हैं। इनमें दूसरा कोई पदार्थ नहीं भरा गया है। महल के एक हिस्से में होटल और दूसरे में संग्रहालय है, जिसमें आधुनिक हवाई जहाज, शस्त्र, पुरानी घड़ियाँ, कीमती क्रॉकरी तथा शिकार किए जानवर रखे गए हैं।



उम्मेद भवन पैलेस का नाम इसके संस्थापक  महराजा उमेदसिंह (1929-1942) के नाम पर रखा गया है। चित्तर पहाड़ी पर होने के कारण यह सुंदर महल 'चित्तर पैलेस' के रूप में भी जाना जाता है। यह भारत - औपनिवेशिक स्थापत्य शैली और डेको-कला का एक आदर्श उदाहरण है। डेको कला स्थापत्य शैली यहाँ हावी है और यह 1920 और 1930 के दशक के आसपास की शैली है। 

महल को तराशे गये बलुआ पत्थरों को जोड़ कर बनाया गया था। महल के निर्माण के दौरान पत्थरों को बाँधने के लिये मसाले का उपयोग नहीं किया गया था। यह विशिष्टता बड़ी संख्या में पर्यटकों को इस महल की ओर आकर्षित करती है। इस सुंदर महल के वास्तुकार हेनरी वॉन, एक अंग्रेज थे। महल का एक हिस्सा हेरिटेज होटल में परिवर्तित कर दिया गया है, जबकि बाकी हिस्सा एक संग्रहालय के रूप में है, जिसमें विंटेज कारें, आधुनिक हवाई जहाज  प्रतिरूप, शस्त्र, पुरानी घड़ियाँ, कीमती क्रॉकरी तथा शिकार किए जानवर रखे गए हैं। अपने स्थापत्य के  कारण उम्मेद भवन पैलेस देश ही नही वरन विदेशो में भी काफी प्रसिद्ध है !!


शनिवार, 21 मार्च 2015

'संगम नगरी' इलाहाबाद को अलविदा....अब 'सूर्य नगरी' जोधपुर में



संगम नगरी 'प्रयाग' से सूर्य नगरी 'जोधपुर' तक का सफर। राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएँ रूप में 16 मार्च, 2015 को हमने कार्यभार ग्रहण कर लिया। इस क्षेत्र के अधीन कुल 10  डाक मंडल हैं। इनमें जोधपुर-जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, चुरू, झुंझुनू, नागौर, पाली, सीकर, सिरोही-जालोर, श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ शामिल हैं।




नया क्षेत्र, नया परिवेश, नए लोग, नई-नई बातें। वाकई जीवन का आनंद ठहराव में नहीं यायावरी में ही है !!



अब मुलाकातें जोधपुर में होंगी !!

रविवार, 1 मार्च 2015

लट्ठमार होली राधा-कृष्ण के बरसाना व नंदगाँव में

होली का त्योहार आने में भले ही अभी देरी हो लेकिन कृष्ण की नगरी नंदगांव, बरसाना, मथुरा, वृंदावन में हफ्ते भर पहले से ही रंग, अबीर, गुलाल उड़ने लगे हैं। गोपियों संग होली मनाने पहुंचे हुरियारों पर कहीं लाठियां बरसीं तो कहीं उड़े रंग-गुलाल। वैसे भी होली की रंगत बरसाने की लट्ठमार होली के बिना अधूरी ही मानी जाती है । इस होली में औरतें घूंघट ओढ़कर और हाथ में लाठी लेकर पुरुषों पर प्रहार करती हैं, और पुरुष उनके प्रहारों से बचने की भरसक कोशिश करते हैं।... और यह सब होता है बड़े ही प्यार से।  परंपरा के अनुसार यहां की होली में नंदगांव के पुरूष और बरसाने की महिलाएं भाग लेती हैं, क्योंकि कृष्ण नंदगांव के थे और राधा बरसाने की थीं। नंदगांव और बरसाने के लोगों का विश्वास है कि होली की इन लाठियों से किसी को चोट नहीं लगती है।

कृष्ण-लीला भूमि होने के कारण फाल्गुन शुल्क नवमी को ब्रज में बरसाने की लट्ठमार होली का अपना अलग ही महत्व है। ब्रज में तो वसंत पंचमी के दिन ही मंदिरों में डांढ़ा गाड़े जाने के साथ ही होली का शुभारंभ हो जाता है। बरसाना में हर साल फाल्गुन शुक्ल नवमी के दिन होने वाली लट्ठमार होली देखने व राधारानी के दर्शनों की एक झलक पाने के लिए यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु व पर्यटक देश-विदेश से खिंचे चले आते हैं। इस दिन नन्दगाँव के कृष्णसखा ‘हुरिहारे’ बरसाने में होली खेलने आते हैं, जहाँ राधा की सखियाँ लाठियों से उनका स्वागत करती हैं। यहाँ होली खेलने वाले नंदगाँव के हुरियारों के हाथों में लाठियों की मार से बचने के लिए मजबूत ढाल होती है। परंपरागत वेशभूषा में सजे-धजे हुरियारों की कमर में अबीर-गुलाल की पोटलियाँ बंधी होती हैं तो दूसरी ओर बरसाना की हुरियारिनों के पास मोटे-मोटे तेल पिलाए लट्ठ होते हैं। बरसाना की रंगीली गली में पहुँचते ही हुरियारों पर चारों  ओर से टेसू के फूलों से बने रंगों की बौछार होने लगती है। परंपरागत शास्त्रीय गान ‘ढप बाजै रे लाल मतवारे को‘ का गायन होने लगता है। हुरियारे ‘फाग खेलन बरसाने आए हैं नटवर नंद किशोर‘, का गायन करते हैं तो हुरियारिनें ‘होली खेलने आयै श्याम आज जाकूं रंग में बोरै री‘, का गायन करती हैं। भीड़ के एक छोर से गोस्वामी समाज के लोग परंपरागत वाद्यों के साथ महौल को शास्त्रीय रुप देते हैं। ढप, ढोल, मृदंग की ताल पर नाचते-गाते दोनों दलों में हंसी-ठिठोली होती है। हुरियारिनें अपनी पूरी ताकत से हुरियारों पर लाठियों के वार करती हैं तो हुरियार अपनी ढालों पर लाठियों की चोट सहते हैं। हुरियारे  मजबूत ढालों से अपने शरीर की रक्षा करते हैं एवं चोट लगने पर वहाँ ब्रजरज लगा लेते हैं। 

बरसाना की होली के दूसरे दिन फाल्गुन शुक्ल दशमी को सायंकाल ऐसी ही लट्ठमार होली नन्दगाँव में भी खेली जाती है। अन्तर मात्र इतना है कि इसमें नन्दगाँव की नारियाँ बरसाने के पुरूषों का लाठियों से सत्कार करती हैं। इसमें बरसाना के हुरियार नंदगाँव की हुरियारिनों से होली खेलने नंदगाँव पहुँचते हैं। फाल्गुन की नवमी व दशमी के दिन बरसाना व नंदगाँव के लट्ठमार आयोजनों के पश्चात होली का आकर्षण वृन्दावन के मंदिरों की ओर हो जाता है, जहाँ रंगभरी एकादशी के दिन पूरे वृंदावन में हाथी पर बिठा राधावल्लभ लाल मंदिर से भगवान के स्वरुपों की सवारी निकाली जाती है। बाद में भी ठाकुर के स्वरूप पर गुलाल और केशर के छींटे डाले जाते हैं। ब्रज की होली की एक और विशेषता यह है कि धूलैड़ी मना लेने के साथ ही जहाँ देश भर में होली का खूमार टूट जाता है, वहीं ब्रज में इसके चरम पर पहुँचने की शुरुआत होती है। 

- कृष्ण कुमार यादव : Krishna Kumar Yadav 
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वसंत और सरसों में खिले पीले फूल



वसंत को ऋतुराज कहा गया है।  इस समय पंचतत्त्व जल, वायु, धरती, आकाश और अग्नि अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने रूप में प्रकट होते हैं। इस दौरान सर्वत्र हरियाली दृष्टोगोचर होती है और उनमें पीली वस्तुओं का सम्मिलन इसे और भी मोहक बनाता है। भारतीय संस्कृति में पीले रंग को शुभ माना गया है।  बसंत पंचमी पर न केवल पीले रंग के वस्त्र पहने जाते हैं, अपितु खाद्य पदार्थों में भी पीले चावल पीले लड्डू व केसर युक्त खीर का उपयोग किया जाता है, जिसे बच्चे तथा बड़े-बूढ़े सभी पसंद करते हैं। अतः इस दिन सब कुछ पीला दिखाई देता है और प्रकृति खेतों को पीले-सुनहरे रंग से सज़ा देती है, तो दूसरी ओर घर-घर में लोग के परिधान भी पीले दृष्टिगोचर होते हैं। नवयुवक-युवती एक -दूसरे के माथे पर चंदन या हल्दी का तिलक लगाकर पूजा समारोह आरम्भ करते हैं। तब सभी लोग अपने दाएं हाथ की तीसरी उंगली में हल्दी, चंदन व रोली के मिश्रण को माँ सरस्वती के चरणों एवं मस्तक पर लगाते हैं, और जलार्पण करते हैं। धान व फलों को मूर्तियों पर बरसाया जाता है। गृहलक्ष्मी बेर, संगरी, लड्डू इत्यादि बांटती है। 



बसंत में न तो ज्यादा गर्मी होती है और न ही ठंडी।  आकाश स्वच्छ है, वायु सुहावनी है, अग्नि (सूर्य) रुचिकर है तो जल पीयूष के समान सुखदाता और धरती, उसका तो कहना ही क्या वह तो मानो साकार सौंदर्य का दर्शन कराने वाली प्रतीत होती है। ठंड से ठिठुरे विहंग अब उड़ने का बहाना ढूंढते हैं तो किसान लहलहाती जौ की बालियों और सरसों के फूलों को देखकर नहीं अघाते। बसंत की ऋतु हो तो सरसों नाम अनायास ही ओंठों पर आ जाता है। आर्युवेदिक ग्रंथ भावप्रकाश के अनुसार सरसों के बीज उष्ण, तीखे और त्वचा रोगों को हरने वाले होते हैं तथा ये वात, पित्त और कफ जनित दोषों को शांत करते हैं। होलिकोत्सव में सरसों के चूर्ण से उबटन लगाने की परंपरा है, ताकि ग्रीष्म ऋतु में त्वचा की सुरक्षा रहे। सरसों प्रकृति के सौंदर्य का प्रतीक तो है ही आर्थिक दृष्टि से भी यह भारत के सामाजिक जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। धनी जहाँ प्रकृति के नव-सौंदर्य को देखने की लालसा प्रकट करने लगते हैं तो वहीं निर्धन शिशिर की प्रताड़ना से मुक्त होने पर सुख की अनुभूति करने लगते हैं। सच! प्रकृति तो मानो उन्मादी हो जाती है। हो भी क्यों ना! पुनर्जन्म जो हो जाता है। श्रावण की पनपी हरियाली शरद के बाद हेमन्त और शिशिर में वृद्धा के समान हो जाती है, तब बसंत उसका सौन्दर्य लौटा देता है। नवगात, नवपल्लव, नवकुसुम के साथ नवगंध का उपहार देकर विलक्षण बना देता है।




आया वंसत आया वसंत
छाई जग में शोभा अनंत।
सरसों खेतों में उठी फूल
बौरें आमों में उठीं झूल
बेलों में फूले नए फूल
पल में पतझड़ का
हुआ अंत
आया वसंत आया वसंत। 
(कविवर सोहन लाल द्विवेदी)