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बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली में 'हिंद युग्म' के स्टॉल पर कृष्ण कुमार यादव यादव की पुस्तक ’16 आने 16 लोग’


प्रगति मैदान, नई दिल्ली में चल  रहे विश्व पुस्तक मेला (15-23 फरवरी) में इलाहाबादियों की भी उपस्थिति दिखेगी। इस दौरान यहाँ से जुड़े लोगों की भी तमाम पुस्तकें जारी/लोकार्पित की जायेंगी। इनमें इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव की पुस्तक ''16 आने 16 लोग'' भी शामिल है। हिन्द युग्म प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में उन्होंने विभिन्न कालखंड के 16 चिंतकों, साहित्यकारों, लेखकों को समकालीन सरोकारों  से जोड़ते हुए उनकी रचनाधर्मिता के फलक को विस्तृत किया है। श्री कृष्ण कुमार यादव ने इस सम्बन्ध में बताया कि यह उनकी 7वीं पुस्तक/कृति होगी। इस पुस्तक में रवीन्द्रनाथ टैगोर, नागार्जुन, निराला, प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन, गणेश शंकर विद्यार्थी, अज्ञेय, कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी, अहमद फराज, कैफी आजमी जैसी अमर शख्सियतों के अलावा वर्तमान समय में सक्रिय अब्दुल रहमान राही, कुंवर नारायण, गोपालदास नीरज के अवदानों की भी चर्चा की गयी है। इसके अलावा इस पुस्तक में अमृता प्रीतम और कर्रतुल ऐन हैदर जैसी लेखिकाओं के व्यक्तित्व और कृतित्व के बहाने आज के स्त्री-विमर्श को जानने-समझने का भी गंभीर प्रयत्न है।

गौरतलब है कि सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लागिंग के क्षेत्र में भी चर्चित श्री यादव की अब तक कुल 6 पुस्तकें 'अभिलाषा' (काव्य-संग्रह, 2005) 'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श'  (निबंध-संग्रह, 2006 व 2007), 'India Post : 150 Glorious Years'(2006),'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' व जंगल में क्रिकेट (बाल-गीत संग्रह,2012) प्रकाशित हो चुकी हैं। विभिन्न सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा शताधिक सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त कृष्ण कुमार यादव के व्यक्तित्व-कृतित्व पर 'बाल साहित्य समीक्षा'(सं. डा. राष्ट्रबंधु, कानपुर, सितम्बर 2007) और 'गुफ्तगू' (सं. मो. इम्तियाज़ गाज़ी, इलाहाबाद, मार्च 2008 द्वारा विशेषांक जारी किया जा चुका है। उनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक 'बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव'  (सं0 डा0 दुर्गाचरण मिश्र, 2009, आलोक प्रकाशन, इलाहाबाद) भी प्रकाशित हो चुकी  है। श्री यादव देश-विदेश से प्रकाशित तमाम रिसर्च जनरल, पत्र पत्रिकाओं एवं इंटरनेट पर भी प्रमुखता से प्रकाशित होते रहते हैं।

विश्व पुस्तक मेले में लोकार्पित होगी कृष्ण कुमार यादव Krishna Kumar Yadav की पुस्तक। 
(साभार : पायनियर, 15 फरवरी 2014) 

दिल्ली के पुस्तक मेले में कृष्ण कुमार यादव Krishna Kumar Yadav की पुस्तक भी शामिल।
(साभार : पंजाब केसरी, 16 फरवरी 2014)
 


Krishna Kumar Yadav's '16 Aane 16 Log' to be released at World Book Fair, New Delhi. (Courtesy : Hindustan Times, 15 February 2014) 

विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली में 'हिंद युग्म' के स्टॉल पर हमारी  पुस्तक ’’16 आने 16 लोग’’ विक्रय और प्रदर्शन के लिए उपलब्ध है। एकबार अवश्य पधारें ।

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

विश्व हिन्दी साहित्य सेवा संस्थान द्वारा कृष्ण कुमार यादव ‘’साहित्य गौरव‘‘ से सम्मानित


विश्व हिन्दी साहित्य सेवा संस्थान ने इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ एवं युवा साहित्यकार श्री कृष्ण कुमार यादव को हिन्दुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद में 16 फरवरी 2014 को आयोजित 11वें साहित्य मेला सम्मेलन में हिन्दी के संवर्द्धन एवं विशिष्ट साहित्य सेवा हेतु ‘’साहित्य गौरव‘‘ की मानद उपाधि से सम्मानित किया। विभिन्न विधाओं में अब तक कुल 7 पुस्तकें लिख चुके श्री यादव को इससे पूर्व विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु 50 से ज्यादा सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त हो चुकीं हैं। 



इस अवसर पर सुश्री बीएस शांताबाई, प्रधान सचिव, कर्नाटक महिला हिन्दी सेवा समिति, प्रोफेसर नित्यानंद पाण्डेय, पूर्व निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा, जाने-माने कवि-चित्रकार संदीप राशिनकर, श्री गोकुलेश्वर द्विवेदी, डा राम आसरे गोयल, हितेश पांडेय, नरेश पाण्डेय ’चकोर’ सहित तमाम साहित्यकार, पत्रकार व बुद्धिजीवी उपस्थित थे।


     गौरतलब है कि श्री कृष्ण कुमार यादव को इससे पूर्व उ.प्र. के मुख्यमंत्री द्वारा ’’अवध सम्मान’’, परिकल्पना समूह द्वारा ’’दशक के श्रेष्ठ हिन्दी ब्लागर दम्पति’’ सम्मान, विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार द्वारा डाक्टरेट (विद्यावाचस्पति) की मानद उपाधि, भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’डा0 अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘‘, साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ”हिंदी भाषा भूषण”, वैदिक क्रांति परिषद, देहरादून द्वारा ‘’श्रीमती सरस्वती सिंहजी सम्मान‘’, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ”महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान”, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान‘‘, भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ द्वारा ’’पं0 बाल कृष्ण पाण्डेय पत्रकारिता सम्मान’’, सहित विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु 50 से ज्यादा सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त हो चुकी हैं।   


डाक निदेशक Krishna Kumar Yadav को 'साहित्य गौरव' सम्मान।
(साभार : पायनियर, 18 फरवरी 2014)
 

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

जब मैं छोटा था ...

भूमंडलीकरण और हाई-टेक होते इस समय में बहुत कुछ है जो पीछे छूट रहा है। वक़्त की भागमभाग में बहुत सारी चीजें हम विस्मृत करते जा रहे हैं।  जिन चीजों के साथ हम बड़े हुए, उन्हें ही आज बिसरा दिया।  वास्तविक सम्बन्धों पर वर्चुअल रिलेशन हावी हो गए, खतों की खुशबू कब एसएम्एस और चैट में तब्दील हो गई, पता ही नहीं चला। बाल सुलभ जिज्ञासाओं पर गूगल बाबा कुछ इतने हावी हुए कि  हर कुछ इंटरनेट पर ही खंगालने लगे।  शब्दों के अर्थ बदलने लगे, भावनाएं सिमटने लगी, मानवीय  इच्छाओं पर आभासी रंग चढ़ने लगा। वाट्स-एप पर एक मित्र ने जब नीचे लिखी पंक्तियाँ शेयर कीं तो ऐसा ही लगा -

वक़्त की भागमभाग के साथ 
शायद ज़िंदगी बदल रही है
जब मैं छोटा था, शायद दुनिया
बहुत बड़ी हुआ करती थी। 

मुझे याद है मेरे घर से
'स्कूल' तक का वो रास्ता, 
क्या क्या नहीं था वहाँ 
चाट के ठेले, जलेबी की दुकान,
बर्फ के गोले, सब कुछ,
अब  वहाँ 'मोबाइल शॉप','वीडियो पार्लर' हैं,
फिर भी सब सूना है
शायद अब दुनिया सिमट रही है। 

जब मैं छोटा था,
शायद शामें बहुत लम्बी 
हुआ करती थीं
मैं हाथ में पतंग की डोर पकड़े,
घंटों उड़ा करता था,

वो लम्बी 'साइकिल रेस',
वो बचपन के खेल,
वो हर शाम थक के चूर हो जाना,

अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है
और सीधे रात हो जाती है
शायद वक्त सिमट रहा है। 


जब मैं छोटा था,
शायद दोस्ती
बहुत गहरी हुआ करती थी,
दिन भर वो हुजूम बनाकर खेलना,
वो दोस्तों के घर का खाना,
वो साथ हँसना और रोना। 

अब भी मेरे कई दोस्त हैं,
पर दोस्ती जाने कहाँ है,
जब भी 'ट्रैफिक सिग्नल' पर  मिलते हैं
हाय-हैलो  हो जाती है,
और अपने अपने रास्ते चल देते हैं। 

होली, दीवाली, जन्मदिन, नए साल
अब  बस एसएमएस  आ जाते हैं,
शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं। 


जब मैं छोटा था, 
तब खेल भी खूब हुआ करते थे,
छुपम-छुपाई, लँगड़ी  टाँग।
पोषम पा, कट केक, 
टिप्पी टीपी टाप.

अब वीडियो गेम, फेसबुक  से 
फुर्सत ही नहीं मिलती। 
शायद ज़िन्दगी बदल रही है। 


जिंदगी का सबसे बड़ा सच यही है।  
जो अक्सर कब्रिस्तान के बाहर
बोर्ड पर लिखा होता है
"मंजिल तो यही थी, 
बस जिंदगी गुज़र गयी मेरी
यहाँ आते आते।"


ज़िंदगी का लम्हा बहुत छोटा सा है 
कल की कोई बुनियाद नहीं है
और आने वाला कल सिर्फ सपने में ही है 

अब बच गए इस पल में
तमन्नाओं से भरी इस जिंदगी में
हम सिर्फ भाग रहे हैं.
कुछ रफ़्तार धीमी करो, 
मेरे दोस्त,

और इस ज़िंदगी को जियो
खूब जियो मेरे दोस्त … !!

- कृष्ण कुमार यादव @ शब्द-सृजन की ओर 
- फेसबुक पेज : https://www.facebook.com/KKYadav1977/


शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

हाँ, यही प्यार है

डायरी के पुराने पन्नों को पलटिये तो बहुत कुछ सामने आकर घूमने लगता है. ऐसे ही इलाहाबाद विश्विद्यालय में अध्ययन के दौरान प्यार को लेकर एक कविता लिखी थी. आज आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूँ-



दो अजनबी निगाहों का मिलना
मन ही मन में गुलों का खिलना
हाँ, यही प्यार है............ !!

आँखों ने आपस में ही कुछ इजहार किया
हरेक मोड़ पर एक दूसरे का इंतजार किया
हाँ, यही प्यार है............ !!

आँखों की बातें दिलों में उतरती गई
रातों की करवटें और लम्बी होती गई
हाँ, यही प्यार है............ !!

सूनी आँखों में किसी का चेहरा चमकने लगा
हर पल उनसे मिलने को दिल मचलने लगा
हाँ, यही प्यार है............ !!

चाँद व तारे रात के साथी बन गये
न जाने कब वो मेरी जिन्दगी के बाती बन गये
हाँ, यही प्यार है............ !!



- कृष्ण कुमार यादव

फेसबुक पर भी मिलें - https://www.facebook.com/krishnakumaryadav1977

प्यार का भी भला कोई दिन होता है। इसे समझने में तो जिंदगियां गुजर गईं और प्यार आज भी बे-हिसाब है। कबीर ने यूँ ही नहीं कहा कि 'ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय' . प्यार का न कोई धर्म होता है, न जाति, न उम्र, न देश और न काल। … बस होनी चाहिए तो अंतर्मन में एक मासूम और पवित्र भावना। प्यार लेने का नहीं देने का नाम है, तभी तो प्यार समर्पण मांगता है। कभी सोचा है कि पतंगा बार-बार दिये के पास क्यों जाता है, जबकि वह जानता है कि दीये की लौ में वह ख़त्म हो जायेगा, पर बार-बार वह जाता है, क्योंकि प्यार मारना नहीं, मर-मिटना सिखाता है। तभी तो कहते हैं प्यार का भी भला कोई नाम होता है। यह तो सबके पास है, बस जरुरत उसे पहचानने और अपनाने की है न कि भुनाने की। -- कृष्ण कुमार यादव


मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

सृजनशीलता और उल्लास का प्रतीक है 'वसंत'

वसंत का आगमन हो चुका है।  फिजा में चारों तरफ मादकता और उल्लास का अहसास है।  कभी पढ़ा करते कि 6 ऋतुएं होती हैं- जाड़ा, गर्मी, बरसात, शिशिर, हेमत, वसंत।  पर ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते प्रभाव ने इन्हें इतना समेट दिया कि पता ही नहीं चलता कब कौन सी ऋतु निकल गई। पूरे वर्ष को जिन छः ऋतुओं में बांटा गया है, उनमें वसंत मनभावन मौसम है,  न अधिक गर्मी है न अधिक ठंड। यह तो शुक्र है कि अपने देश भारत में कृषि एवम् मौसम के साथ त्यौहारों का अटूट सम्बन्ध है। रबी और खरीफ फसलों की कटाई के साथ ही साल के दो सबसे सुखद मौसमों वसंत और शरद में तो मानों उत्सवों की बहार आ जाती है। वसंत में वसंतोत्सव, सरस्वती पूजा, महाशिवरात्रि, रंग पंचमी, होली और शीतला सप्तमी के अलावा चैत्र नवरात्रि में  नव संवत्सर आरंभ, गुड़ी पड़वा,घटस्थापना, रामनवमी, चैती दशहरा, महावीर जयंती इत्यादि त्यौहार मनाये जाते हैं। वास्तव में ये पर्व सिर्फ एक अनुष्ठान भर नहीं हैं, वरन् इनके साथ सामाजिक समरसता और नृत्य-संगीत का अद्भुत दृश्य भी जुड़ा हुआ है। वसंत ऋतु में चैती, होरी, धमार जैसे लोक संगीत तो माहौल को और मादक बना देते हैं। 

माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी से ऋतुओं के राजा वसंत का आरंभ हो जाता है। वसंत का उत्सव प्रकृति और श्रृंगार का उत्सव है। इसी समय से प्रकृति के सौंदर्य में निखार दिखने लगता है। वसंत में उर्वरा शक्ति अर्थात उत्पादन क्षमता अन्य ऋतु की अपेक्षा बढ़ जाती है।  वन में टेसू के फूल आग के अंगारे की तरह लहक उठते हैं, खेतों में सरसों के पीले-पीले फूल वसंत ऋतु की पीली साड़ी- सदृश दिखते हैं। किसी कवि ने कहा है कि वसंत तो अब गांवों में ही दिखता है, शहरों में नहीं। यदि शहरों में देखना है तो इस दिन पीले कपड़े पहने लड़कियां ही वसंत का अहसास कराती हैं। यह सच भी है क्योंकि क्योंकि वसंत में सरसों पर आने वाले पीले फूलों से समूची धरती पीली नजर आती है। इसी कारण इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनने का चलन है।इन दिनों बोगनवेलिया, टेसू (पलाश), गुलाब, कचनार, कनेर आदि फूलने लगते हैं। आमों में बौर आ जाते हैं, गुलाब और मालती आदि के फूल खिलने लगते हैं। आम-मंजरी और फूलों पर भौंरे मँडराने लगते हैं और कोयल की कुहू-कुहू की आवाज प्राणों को उद्वेलित करने लगती है। वृक्षों के पुराने पत्ते झड़ जाते हैं और उनमें नए-नए गुलाबी रंग के पल्लव मन को मुग्ध करते हैं। सतत सुंदर लगने वाली प्रकृति वसंत ऋतु में सोलह कलाओं से खिल उठती है। जौ-गेहूँ में बालियाँ आने लगती हैं और वन वृक्षों की हरीतिमा मन को अपनी ओर आकर्षित करती है। पक्षियों के कलरव, पुष्पों पर भौरों का गुंजन तथा कोयल की कुहू-कुहू मिलकर एक मादकता से युक्त वातावरण निर्मित करते हैं। यौवन हमारे जीवन का वसंत है तो वसंत इस सृष्टि का यौवन है। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में वसंत का अति सुंदर व मनोहारी चित्रण किया है। भगवान कृष्ण ने गीता में 'ऋतूनां कुसुमाकरः' कहकर ऋतुराज वसंत को अपनी विभूति माना है। कविवर जयदेव तो वसंत का वर्णन करते थकते ही नहीं। 

हमारे यहाँ त्यौहारों को केवल फसल एवं ऋतुओं से ही नहीं वरन् दैवी घटनाओं से जोड़कर धार्मिक व पवित्र भी बनाया गया है। यही कारण है कि भारतीय पर्व और त्यौहारों में धार्मिक देवी-देवताओं, सामाजिक घटनाओं व विश्वासों का अद्भुत संयोग प्रदर्शित होता है। वसंत पंचमी को त्योहार के रूप में मनाए जाने के पीछे भी कई ऐसे दृष्टान्त हैं। पीत वस्त्र धारण कर, पीत भोजन सेवन कर वसंत का स्वागत आज भी इसी दिन से होता है। ऐसा माना जाता है कि वसंत पंचमी के दिन ही देवी सरस्वती का अवतरण हुआ था। इसीलिए इस दिन विद्या तथा संगीत की देवी की पूजा की जाती है। पुराणों के अनुसार एक मान्यता यह भी है कि वसंत पंचमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने पहली बार सरस्वती की पूजा की थी और तब से वसंत पंचमी के दिन सरस्वती की पूजा करने का विधान हो गया। छोटे बच्चों को अक्षरारंभ कराने के लिए भी यह अत्यंत शुभ दिन माना जाता है।

चरक संहिता में कहा गया है कि इस दिन कामिनी और कानन में अपने आप यौवन फूट पड़ता है। यही कारण है कि वसंत पंचमी का उत्सव मदनोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है और तदनुसार  वसंत के सहचर कामदेव तथा रति की भी पूजा होती है। इस अवसर पर ब्रजभूमि में भगवान्‌ श्रीकृष्ण और राधा के आनंद-विनोद का उत्सव मुख्य रूप से मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण इस उत्सव के अधिदेवता हैं। वसंत पंचमी के दिन से ही होली आरंभ हो जाती है और उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाई जाती है। इस दिन से होली और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। लोग वासंती वस्त्र धारण कर गायन, वाद्य एवं नृत्य में विभोर हो जाते हैं। ब्रज में तो इसे बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन किसान नए अन्न में घी और गुड़ मिलाकर अग्नि तथा पितृ तर्पण भी करते हैं।
 रामचरित मानस के अयोध्याकांड में भी ऋतुराज वसंत कि महिमा गाई गई है - 
रितु वसंत हबह त्रिबिध बयारी। 
सब कहं सुलभ पदारथ चारी॥ 
स्त्रक चंदन बनितादिक भोग। 
देखि हरष बिसमय बस लोग॥ 

- अर्थात् वसंत ऋतु है। शीतल, मंद, सुगंध तीन प्रकार की हवा बह रही है। सभी को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पदार्थ सुलभ हैं। माला, चंदन, स्त्री आदि भोगों को देखकर सब लोग हर्ष और विस्मय के वश हो रहे हैं।

वसंत में मौसम खुशनुमा और ऊर्जावान होता है, न ज्यादा ठंडा होता है और न गर्म। यही कारण है कि इस दौरान रचनात्मक व कलात्मक कार्य अधिक होते हैं। इस दौरान प्रकृति लोगों की  कार्यक्षमता में भी वृद्धि करती है, तभी तो लोगों की सृजन क्षमता बढ़ जाती है। ऐसे में भला कैसे सम्भव है कि वसंत पर कोई भी सृजनधर्मी कलम न चलाये।

ऐसा मानते हैं कि वसंत का उत्सव अमर आशावाद का प्रतीक है। वसंत का सच्चा पुजारी जीवन में कभी निराश नहीं होता। पतझड़ में जिस प्रकार वृक्ष के पत्ते गिर जाते हैं, उसी प्रकार वह अपने जीवन में से निराशा और असफलताओं को झटक देता है। निराशा से घिरे हुए जीवन में वसंत आशा का संदेश लेकर आता है। निराशा के वातावरण में आशा की अनोखी किरण फूट पड़ती है।

त्यौहारों की रंगत और उल्लास अपनी जगह है, पर क्या इसे बहाने हम प्रकृति में हो रहे बदलावों के प्रति भी सचेत हैं. ऋतुओं का असमय आना-जाना यदि इसी तरह चलता रहा तो हम तारीखों में ही इन्हें ढूंढते रह जायेंगें. इन त्यौहारों के बहाने यह भी सीखने की जरुरत है कि वसंत का पीलापन और होली के टेसू कैसे बचाए जाएँ...!!

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

'आम' आदमी तो ये लोग हैं

बहुत दिनों बाद ट्रेन की यात्रा की और वो भी दिन में। 'गोदान' एक्सप्रेस द्वारा इलाहाबाद से गोरखपुर तक की यात्रा। किसी ने ठीक ही कहा है कि असली भारत को समझना है तो ट्रेन से सफ़र कर लीजिए। नजरों के सामने तेजी से आते खेत-खलिहान और उनमें काम करते लोग, गाँव के दृश्य, कई बार कूड़े और गन्दगी का ढेर और उनमें से कुछ चुनते भारत के भावी नौनिहाल और भी बहुत कुछ दृश्य। इन्हें देखकर लगता है कि वाकई 'आम' आदमी तो ये लोग हैं, जिनके लिए कोई टोपी नहीं पहनता, कोई आवाज़ नहीं उठाता। जिस तरह से 'आम आदमी' शब्द की ब्रांडिंग हो रही है, उससे तो ये कोसों दूर है। काश वाकई कोई इस 'आम आदमी' के लिए आवाज़ उठाता ......!!


शनिवार, 4 जनवरी 2014

2013 का सबसे अनूठा शब्द : 'सेल्फी'

स्मार्टफोन या वेबकैम आदि से खींची गई खुद की फोटोग्राफ को सोशल मीडिया वेबसाइट्स पर अपलोड करने का फैशन चल  पड़ा है।  हर कोई अपनी इन फोटुओं द्वारा अपने बारे में दुनिया को बताना चाहता है, जताना चाहता है। बहुत लोग ऐसा करते तो हैं, पर उन्हें यह नहीं पता होगा कि इसके लिए एक विशेष शब्द भी है - 'सेल्फी'. वस्तुत: सेल्फी सोशल मीडिया से निकला हुआ शब्द है जो अब आम बोल-चाल में यूज होने लगा है। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी की परिभाषा के अनुसार ''सेल्फी का मतलब किसी स्मार्टफोन या वेबकैम से खुद अपनी तस्वीर खींचना और उसे सोशल वेबसाइट्स पर अपलोड करना है.''
सेल्फी' को लेकर  ज्वलंत विवाद अभी भी चर्चा में बना हुआ है, जब पिछले दिनों नेल्सन मंडेला की शोकसभा में शामिल होने गये अमेरिकी राष्ट्रपति के 'सेल्फी' बर्ताव की  पूरी दुनिया में आलोचना और चर्चा हुई।  दिवंगत नेता की याद में आयोजित एक समारोह में अमेरिकी राष्ट्रपति, ब्रिटिश पीएम डेविड कैमरन और डेनमार्क की पीएम हेले थोर्निंग-स्मिट एक साथ जिन तस्वीरों में दिखे हैं उसमें वो काफी उस्ताहित और खुश होकर अपनी तस्वीर खींचते नजर आ रहे हैं। इंटरनेट पर ये तेजी से वाइरल हुई  हैं।

मंडेला की शोकसभा के दौरान ये तीनों खुद की तस्वीर खींच कर बेहद खुश होते दिख रहें हैं। इंटरनेट पर इस तस्वीर के आते ही लोगों ने प्रतिक्रियाएं देनी शुरु कर दी । शोकसभा की टाइमिंग और उनके व्यवहार पर सवाल उठाए जा रहे हैं। अधिकतर लोगों ने इस गंभीर मौके पर ओबामा और उनके साथी नेताओं की इस हरकत पर हैरानी जतायी । अधिकतर न्यूज टैबलॉयड्स ने भी इस तस्वीर को आलोचनात्मक सुर्खियों के साथ छापा। इस तस्वीर में थोर्निंग-स्मिट कैमरन और ओबामा के साथ खुद की एक तस्वीर लेती नजर आ रही हैं। तस्वीर में जहां ये तीनों नेता खुशी-खुशी डेनमार्क की पीएम के मोबाइल कैमरे में पोज करते नजर आ रहे हैं, वहीं साथ में ओबामा के बगल में बैठी मिशेल ओबामा गंभीर मुद्रा में नजर आ रही हैं। ओबामा के साथ- साथ ब्रिटिश पीएम डेविड कैमरन से भी इस तस्वीर को लेकर सवाल किए जा रहे हैं। यहां तक की ब्रिटिश संसद में तो उनके इस एटीट्यूड पर सवाल में भी किया है।

स्पष्ट है कि आम आदमी से लेकर खास तक इसके दीवाने हैं। फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल साइट्स पर अपनी (सेल्फी) तस्वीर ट्वीट करने का यह ट्रेंड इस कदर चला कि अब सेल्फी को ऑक्सफोर्ड वर्ड ऑफ द इयर 2013 घोषित कर दिया गया है। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के एडीटर्स द्वारा किए गए लैंग्वेज रिसर्च में ये बात सामने आई है कि अंग्रेजी भाषा में सेल्फी शब्द का प्रयोग पिछले साल के मुकाबले 17,000 प्रतिशत बढ़ा है। यह शब्द कितनी बार इस्तेमाल हुआ ये जानने के लिए ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने एक रिसर्च प्रोग्राम का इस्तेमाल किया।  यह प्रोग्राम हर महीने इंटरनेट पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले करीब 15 करोड़ नए अंग्रेजी शब्दों को इकट्ठा करता है। 

सेल्फी के सिवा जो शब्द वर्ड ऑफ द इयर की दौड़ में शामिल थे उनमें ट्वर्क और बिंग-वाच (बहुत टीवी देखना) भी हैं। सेल्फी ने अपने कड़े कॉम्पटीटर ट्वर्क को पछाड़ते हुए यह खिताब हासिल किया। ट्वर्क, एक्टर-सिंगर माइली साइरस द्वारा परफार्म किए गए एक घटिया डांस स्टेप का नाम है। ट्वर्क ही पहले ऑक्सफोड डिक्शनरी का ऑक्सफोर्ड वर्ड ऑफ द इयर बनने वाला था। 'सेशमीट' शब्द जिसका मतलब जैविक ऊतकों से बना कृत्रिम मांस होता है, भी एक दावेदार रहा.

सेल्फी का प्रयोग पहली बार एक ऑस्ट्रेलियाई फोरम में 2002 में हुआ था। यह आम बोलचाल की भाषा में तब शामिल हुआ जब 2013 में सोशल मीडिया पर सेल्फ-पोट्रेट फोटोग्राफ के शार्टकट के रूप में इसका इस्तेमाल  किया जाने लगा। सेल्फी को अगस्त 2013 में ही ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी डॉट कॉम में शामिल कर लिया गया था। पर यह अभी तक ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी में शामिल नहीं किया गया है।

इस साल 2013 में यह शब्द तब काफी चर्चा में आया जब किशोर किशोरियों के साथ की पोप की एक तस्वीर सोशल साइट्स पर खूब चर्चित हुई।  यह तस्वीर खूब शेयर की गई और इस पर ढेर सारी टिप्पणियां आईं।

गौरतलब है कि वर्ड ऑफ द इयर का खिताब उन मौलिक  अंग्रेजी शब्दों को दिया जाता है जो सामाजिक, राजनीतिक या तकनीकी बदलावों से गुजरते हैं। वर्ष  2004 में 'चाव',  2008 में 'क्रेडिट क्रंच' और पिछले साल 2012 में 'ओमनीशैम्बुल्स' को 'वर्ड ऑफ द इयर' से नवाजा गया था। यह कोई जरूरी नहीं कि पुरस्कार जीतने की दावेदारी करने वाले शब्द पिछले 12 महीनों में गढ़े गए हों।  हां, ये जरूर है कि वह अपने समय का खास और चर्चित शब्द हो। 

बुधवार, 1 जनवरी 2014

नव वर्ष हाइकु

नवल वर्ष 
खुशियाँ खूब छाए 
हो उजियारा।  

लालिमा लिए 
सूरज की किरणें 
मुस्कुराईं। 

सुबह हुई 
भौंरा गुनगुनाया 
पक्षी चहके। 

नव-सृजन 
धूप खिलखिलाई 
बजी बधाई। 

ख़ामोशी तोड़ो 
यूँ आवाज़ उठाओ 
परिवर्तन। 

मिटे अँधेरा 
यूँ फैले उजियारा 
नव वर्ष में। 

नूतन वर्ष 
जज्बे और जोश का 
अभिनन्दन। 

हो नव वर्ष 
पल्लवित -पुष्पित 
शुभकामना। 


(नव वर्ष पर शुभकामनाओं सहित हाइकु)

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा कृष्ण कुमार यादव ‘’भगवान बुद्ध राष्ट्रीय फेलोशिप सम्मान-2013‘‘ से सम्मानित

भारतीय दलित साहित्य अकादमी ने इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ एवं युवा साहित्यकार श्री कृष्ण कुमार यादव को दिल्ली में 12-13 दिसम्बर, 2013 को आयोजित 29वें राष्ट्रीय दलित साहित्यकार सम्मेलन में सामाजिक समरसता सम्बन्धी लेखन, विशिष्ट कृतित्व एवं समृद्ध साहित्य-साधना और सामाजिक कार्यों में रचनात्मक योगदान हेतु ‘’भगवान बुद्ध राष्ट्रीय फेलोशिप सम्मान-2013‘‘ से सम्मानित किया। इससे पूर्व श्री यादव को विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु 50 से ज्यादा सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त हैं। 

सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य, लेखन, ब्लागिंग व सोशल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय 36 वर्षीय श्री कृष्ण कुमार यादव की अब तक कुल 6 पुस्तकें- ”अभिलाषा” (काव्य संग्रह), ”अभिव्यक्तियों के बहाने” व ”अनुभूतियाँ और विमर्श” (निबंध संग्रह), इण्डिया पोस्ट: 150 ग्लोरियस ईयर्ज (2006) एवं ”क्रांतियज्ञ: 1857-1947 की गाथा” (2007), ”जंगल में क्रिकेट” (बालगीत संग्रह) प्रकाशित हैं। इनकी रचनाधर्मिता को देश-विदेश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं, इंटरनेट पर वेब पत्रिकाओं व ब्लॉग पर निरंतर देखा-पढा जा सकता हैं। 

गौरतलब है कि वर्ष 1984 में बाबू जगजीवन राम द्वारा दलित साहित्य के संवर्धन और प्रोत्साहन हेतु भारतीय दलित साहित्य अकादमी की स्थापना की गयी थी।

 साभार :

 कृष्ण कुमार यादव को 'भगवान बुद्ध राष्ट्रीय फेलोशिप' 
(अमर उजाला' 14 दिसंबर, 2013 में चर्चा)

के.के. यादव को 'भगवान बुद्ध राष्ट्रीय फेलोशिप' सम्मान
 ( 'पंजाब केसरी',15 दिसंबर, 2013 में चर्चा।)

निदेशक केकेयादव 'भगवान बुद्ध राष्ट्रीय फेलोशिप' सम्मान से सम्मानित। 
('स्वतंत्र चेतना' 14 दिसंबर, 2013 में चर्चा।)

कृष्ण को मिला बुद्ध  फेलोशिप सम्मान 
( अमृत प्रभात,16 दिसंबर, 2013 में चर्चा)

कृष्ण कुमार यादव को 'भगवान बुद्ध राष्ट्रीय फेलोशिप' सम्मान 
( कैनविज टाइम्स, 14 दिसंबर, 2013 में चर्चा)

कृष्ण कुमार यादव 'भगवान बुद्ध राष्ट्रीय फेलोशिप सम्मान-2013' से सम्मानित। 
( 'युनाइटेड भारत' 14 दिसंबर, 2013 में चर्चा)

'भगवान बुद्ध फेलोशिप' से नवाजे गए कृष्ण कुमार यादव 
( जनसंदेश टाइम्स, 14 दिसंबर, 2013 में चर्चा)


The Pioneer (14 Dec. 2013) talking about :
 Director Postal Services Krishna Kumar Yadav felicitated.


Director Postal Services Krishna Kumar Yadav felicitated :
 Times of India, 14 Dec. 2013


Northern India Patrika (15 Dec. 2013) talking about :
 KK Yadav felicitated with "Lord Buddha National Fellowship Award-2013"









शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

एक और गाँधी 'मंडेला' का जाना

नस्लवाद के खिलाफ जंग के मसीहा और दक्षिण अफ्रीका के महान अश्वेत नेता नेल्सन मंडेला नहीं रहे। मंडेला  ऐसे महान व्यक्तित्व थे, जिनसे आज की  पीढ़ी भी उतनी ही शिद्दत से  प्रेरणा पाती थी। 27 साल से अधिक अवधि तक जेल में रहे दक्षिण अफ्रीका के इस नेता ने दुनिया को नैतिक नेतृत्व देने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तभी तो सारी दुनिया उनमें गाँधी जी का अक्स ढूंढती थी।  आखिर हो भी क्यों न, मंडेला महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांतों, विशेषकर वकालत के दिनों में दक्षिण अफ्रीका के उनके आंदोलनों से प्रेरित थे। महात्मा गांधी की ही भांति नेल्सन मंडेला भी युद्ध के खिलाफ थे। वह राष्ट्रीय सहमति तथा सुलह के पक्षधर थे। मंडेला ने भी हिंसा पर आधारित रंगभेदी शासन के खिलाफ अहिंसा के माध्यम से संघर्ष किया। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद को खत्म करने में अग्रणी भूमिका निभाकर दुनिया भर में अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बन चुके नेल्सन मंडेला ने न सिर्फ पूरे अफ्रीकी महाद्वीप को, बल्कि दुनिया के दूसरे हिस्सों को भी स्वतंत्रता की भावना से ओत-प्रोत किया था। अपनी जिंदगी के 27 साल जेल की अंधेरी कोठरी में काटने वाले मंडेला अपने देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने थे, जिससे देश पर अब तक चले आ रहे अल्पसंख्यक श्वेतों के अश्वेत विरोधी शासन का अंत हुआ और एक बहु-नस्ली लोकतंत्र का उद्भव हुआ।

      दक्षिण अफ्रीका में रंगभेदी शासन के खिलाफ मंडेला की लड़ाई को भारत में अंग्रेजों के शासन के खिलाफ गांधी की लड़ाई के समान समझा जाता है। मंडेला ने कहा था, गांधी का सबसे ज्यादा आदर अहिंसा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए किया जाता है और कांग्रेस (अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस) का आंदोलन गांधीवादी दर्शन से बहुत ज्यादा प्रभावित था, इसी दर्शन ने 1952 के अवज्ञा अभियान के दौरान लाखों दक्षिण अफ्रीकियों को एकजुट करने में मदद की। इस अभियान ने ही एएनसी को लाखों जनता से जुड़े एक संगठन के तौर पर स्थापित किया। 'सत्य और अहिंसा' के लिए गांधी की हमेशा प्रशंसा करने वाले मंडेला ने 1993 में दक्षिण अफ्रीका में गांधी स्मारक का अनावरण करते हुए कहा था, गांधी हमारे इतिहास का अभिन्न हिस्सा हैं, क्योंकि उन्होंने यहीं सबसे पहले सत्य के साथ प्रयोग किया, यहीं उन्होंने न्याय के लिए अपनी दृढ़ता जताई, यहीं उन्होंने एक दर्शन एवं संघर्ष के तरीके के रूप में सत्याग्रह का विकास किया।

    नेल्सन मंडेला का जन्म 1918 में केप ऑफ साउथ अफ्रीका के पूर्वी हिस्से के एक छोटे से गांव के थेंबू समुदाय में हुआ था। उन्हें अक्सर उनके कबीले 'मदीबा' के नाम से बुलाया जाता था। मंडेला का मूल नाम रोलिहलाहला दलिभुंगा था। उनके स्कूल में एक शिक्षक ने उन्हें उनका अंग्रेजी नाम नेल्सन दिया। मंडेला नौ साल के थे जब उनके पिता का निधन हो गया। उनके पिता थेंबू के शाही परिवार के सलाहकार थे। 1941 में 23 साल की उम्र में जब उनकी शादी की जा रही थी, तब मंडेला सब कुछ छोड़ कर जोहानिसबर्ग भाग गए। दो साल बाद वह अफ्रीकानेर विटवाटरस्रांड विश्वविद्यालय में वकालत की पढ़ाई करने लगे, जहां उनकी मुलाकात सभी नस्लों और पृष्टभूमि के लोगों से हुई। इस दौरान वह उदारवादी, कट्टरपंथी और अफ्रीकी विचारधाराओं के संपर्क में आए, साथ ही उन्होंने नस्लभेद और भेदभाव को महसूस किया, जिससे राजनीति के प्रति उनमें जुनून पैदा हुआ।

   1943 में मंडेला अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (एएनसी) में शामिल हुए और बाद में एएनसी यूथ लीग की सह-स्थापना की। 1944 में एवेलिन मैसे के साथ उनकी पहली शादी हुई, जिनसे उनके चार बच्चे हुए। 1958 में दोनों का तलाक हो गया। इसके बाद मंडेला ने वकालत शुरू कर दी और 1952 में ओलिवर टांबो के साथ मिलकर देश के पहले अश्वेत वकालत संस्था की शुरुआत की। 1956 में 155 अन्य कार्यकर्ताओं के साथ मंडेला पर देशद्रोह का मामला चला, लेकिन चार साल की सुनवाई के बाद उनके खिलाफ लगे आरोप हटा लिए गए। 1958 में मंडेला ने विनी मादीकीजेला से शादी की, जिन्होंने बाद में अपने पति को कैद से रिहा कराने के लिए चलाए गए अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    1960 में एएनसी को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया और मंडेला भूमिगत हो गए। 1960 में रंगभेदी शासन के साथ तनाव बहुत बढ़ गया, जब शारपेविले नरसंहार में पुलिस ने 69 अश्वेतों की गोली मारकर हत्या कर दी। इससे अब तक चले आ रहे शांतिपूर्ण प्रतिरोध का अंत हो गया और एएनसी के तत्कालीन उपाध्यक्ष मंडेला ने आर्थिक कार्रवाई शुरू कर दी। सन् 1964 में रंगभेदी शासन का तख्ता पलटने की तैयारियां करने के आरोप में उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा दी गई। उन्हें रोबेन द्वीप पर स्थित एक जेल में बंद कर दिया गया। मंडेला रोबेन द्वीप पर 18 साल कैद रहे और 1982 में उन्हें यहां से पोल्समूर जेल में स्थानांतरित किया गया।  नेल्सन मंडेला ने अदालत के सामने बोलते हुए कहा था कि वह दक्षिणी अफ्रीका में एक ऐसे लोकतांत्रिक समाज का निर्माण करना चाहते हैं जिसमें सभी जातियों और नस्लों के लोग शांति और सद्भाव से रह सकें। पर जेल उन्हें न तोड़ सकी, न ही उनमें कड़वाहट भर सकी। उन्होंने कभी भी आशा का दमन नहीं छोड़ा। यहाँ तक कि कानून की शिक्षा उन्होंने जेल में ही पाई थी। कारावास के दिनों में उन्होंने एक साथ कई विश्वविद्यालयों से विधिशास्त्र की शिक्षा पाई। अंतत: अपनी जिंदगी के 27 साल जेल की अंधेरी कोठरी में काटने वाले मंडेला सन् 1990 में  रिहा हुए। रिहाई पर भारी भीड़ ने उनका स्वागत कर बदलाव की पूर्व भूमिका का इशारा कर दिया था।

   मंडेला  की रिहाई पर पूरी दुनिया की  निगाहें टिकी हुई थीं।  उन का नाम भारत से लेकर पूरी दुनिया में व्याप्त हो चुका  था।  रंगभेदियों की क़ैद से छूटने के बाद मंडेला जब एक निजी दौरे पर हिंदुस्तान आए थे तो गाँधी जी से जुड़ी जगहों पर जाना उनके लिए तीर्थयात्रा सा रहा। 1990 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया था। मंडेला पूरी दुनिया में शांति के दूत बनकर उभरे थे और दिसंबर 1993 में मंडेला और अफ्रीका के तत्कालीन राष्ट्रपति एफ डब्ल्यू डी क्लार्क को नोबल शांति पुरस्कार भी दिया गया। इसके अगले वर्ष ही  1994 में मंडेला दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति चुने गए। सन् 1994 से 1999 तक वह दक्षिणी अफ्रीका के राष्ट्रपति रहे। नेल्सन मंडेला एक समय पर गुट-निरपेक्ष आंदोलन के अध्यक्ष भी रहे ।

मंडेला में अंत तक जीजिविषा बनी रही।  उनके जीवन काल में दुनिया के पचास सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों ने उन्हें अपना मानद सदस्य बनाया हुआ है।  दुनिया भर के कई शहरों में बने स्मारक नेल्सन मंडेला को समर्पित हैं, कई सड़कों और चौराहों, स्टेडियमों और स्कूलों को उनका नाम दिया गया है। यदि उनके कारावास की सभी अवधियों को जोड़ लिया जाए तो उनके कारावास की कुल अवधि 31 साल बनती है। आधुनिक युग के किसी भी राष्ट्रपति ने अपने जीवन-काल में जेलें की इतनी लंबी सज़ा नहीं काटी। यद्यपि उनका पारिवारिक जीवन बहुत सुखमय नहीं कहा जा सकता। उनकी पहली पत्नी एवेलिन का सन् 2004 में देहांत हो गया। दूसरी पत्नी विन्नी को सन् 1991 में हत्या के मामले में एक सह-अपराधी के नाते छह साल जेल की सज़ा हुई। उनका अंतिम, तीसरा विवाह मोज़म्बीक के नेता समोरा माशेल की विधवा ग्रेस माशेल से हुआ था।| उनके बड़े बेटे मकगाहो की 2005 में एड्स से मृत्यु हो गई। छोटा बेटा तेम्बेकिले कार-दुर्घटना में मारा गया। सन् 2010 में उनकी परपोती की मृत्यु भी ऐसे ही हुई थी। मंडेला की तीन बेटियां उनके पीछे रह गई हैं।

  नेल्सन मंडेला पिछले कुछ समय से बहुत बीमार रहते थे। जून माह में उन्हें फेफड़ों में संक्रमण होने के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था। डाक्टरों का कहना था कि यह संक्रामक रोग उस तपेदिक से ही सीधा जुड़ा हुआ था जो उन्हें केप ऑफ गुड होप के नज़दीक स्थित रोबेन द्वीप पर 27 वर्ष के कारावास के दौरान हुआ था। एक लम्बे समय से फेफड़ों के संक्रमण से ग्रस्त मंडेला ने अंतत: 6 दिसंबर, 2013 को अंतिम सांस ली, पर इसी के साथ छोड़ गए एक दीर्घ परम्परा।


नेल्सन मंडेला ने एक आम आदमी और एक नेता के तौर पर बेहद सरल और प्रंशसनीय ढंग से यह साबित किया कि घृणा, हिंसा और नस्लभेद से बाहर निकला जा सकता है। मेल, शांति और न्याय की मिसाल  मंडेला सिर्फ अपनी पीढ़ी के लिए ही नहीं, बल्कि अब तक की सभी मिसालों में सबसे कद्दावर नेता थे। रंगभेद समाप्त करने में उन्होंने निजी तौर पर जो भूमिका निभाई, वह अतुलनीय रही। उनकी बातों से हमें यह सोचना चाहिए कि आजादी अपने आप नहीं मिल जाती, उसे बचाकर अपने पास रखना पड़ता है।  उनका चमत्कारी व्यकित्व, हास्य विनोद क्षमता और अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को लेकर कड़ुवाहट न होना, उनकी अद्भुत जीवन गाथा से उनके असाधारण वैश्विक अपील का पता चलता है। उन्होंने शांति और स्वतंत्रता की जो झलक दिखाईसामंजस्य बनाने और संवेदनशीलता से लोगों के साथ पेश आने की बात कही, यह बातें दुनिया भर में लोगों के लिए प्रेरणा और उम्मीद का स्रोत बनी रहेंगी। अहिंसा की उनकी राजनीतिक विरासत और उनका हर तरह के नस्लभेद की निंदा करना आने वाले कई सालों तक दुनिया भर के लोगों को प्रेरित करता रहेगा।

कृष्ण कुमार यादव @ www.kkyadav.blogspot.com/ 

बुधवार, 27 नवंबर 2013

दाम्पत्य और रचनाधर्मिता की युगलबंदी





सृष्टि  में नव-रत्नों की  बड़ी महिमा गाई गई है और हम भी अपने जीवन में नौ अंक के बहुत करीब हैं. 28 नवम्बर का दिन हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान  है.  28 नवम्बर, 2013  को हमारी (कृष्ण कुमार यादव-आकांक्षा यादव) शादी की 9 वीं सालगिरह है। दाम्पत्य के साथ-साथ साहित्य और ब्लागिंग में भी सम्मिलित सृजनशीलता की युगलबंदी करते हुए जीवन के इस सफ़र में दिन, महीने और फिर साल कितनी तेजी से पंख लगाकर उड़ते चले गए, पता ही नहीं चला। आज हम वैवाहिक जीवन के 9  वर्ष पूरे करके 10 वें वर्ष में प्रवेश करेंगें। वैसे भी 9 हमारा पसंदीदा नंबर है।


जीवन के इस प्रवाह में सुख-दुःख के बीच सफलता के तमाम आयाम हमने एक साथ छुए. कभी जिंदगी सरपट दौड़ती तो कई बार ब्रेक लग जाता. एक-दूसरे के साथ बिताये गए ये नौ साल सिर्फ इसलिए नहीं महत्वपूर्ण हैं कि हमने जीवन-साथी के संबंधों का दायित्व प्रेमपूर्वक निभाया, बल्कि इसलिए भी कि हमने एक-दूसरे को समझा, सराहा और संबल दिया. अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि प्रशासनिक व्यस्तताओं के बीच कैसे समय निकल लेते हैं तो इसके पीछे आकांक्षा जी का ही हाथ है. यदि उन्होंने मेरी रचनात्मकता को सपोर्ट नहीं किया होता तो मैं आज एक अदद सिविल सर्वेंट मात्र होता, लेखक-कवि-साहित्यकार के तमगे मेरे साथ नहीं लगे रहते. यह हमारा सौभाग्य है कि हम दोनों साहित्य प्रेमी हैं और कई सामान रुचियों के कारण कई मुद्दों पर खुला संवाद भी कर लेते हैं। एक-दूसरे की रचनात्मकता को सपोर्ट करते हुए ही आज हम इस मुकाम पर हैं...!!









मंगलवार, 26 नवंबर 2013

चुनावी बेला में 'मताधिकार'



लोकतंत्र की इस चकरघिन्नी में
पिसता जाता है आम आदमी
सुबह से शाम तक
भरी धूप में कतार लगाये
वह बाट जोहता है
अपने मताधिकार का
वह जानता भी नहीं
अपने इस अधिकार का मतलब
बस एक औपचारिकता है
जिसे वह पूरी कर आता है
और इस औपचारिकता के बदले
दे देता है अधिकार
चंद लोगों को
अपने ऊपर
राज करने का
जो अपने हिसाब से
इस मताधिकार का अर्थ निकालते हैं
और फिर छोड़ देते हैं
आम आदमी को
इंतजार करने के लिए
अगले मताधिकार का।

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

दीपावली पर पटाखे नहीं, दीये जलाएँ

दीपावली भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख त्यौहार है जिसका बेसब्री से इंतजार किया जाता है। दीपावली माने ''दीपकों की पंक्ति'' । दीपावली पर्व के पीछे मान्यता है कि रावण- वध के बीस दिन पश्चात भगवान राम अनुज लक्ष्मण व पत्नी सीता के साथ चैदह वर्षों के वनवास पश्चात  अयोध्या वापस लौटे  थे। जिस दिन श्री राम अयोध्या लौटे, उस रात्रि कार्तिक मास की अमावस्या थी अर्थात आकाश में चाँद बिल्कुल नहीं दिखाई देता था। ऐसे माहौल में नगरवासियों ने भगवान राम के स्वागत में पूरी अयोध्या को  दीपों के प्रकाश से जगमग करके मानो धरती पर ही सितारों को उतार दिया। तभी से दीपावली का त्यौहार मनाने की परम्परा चली आ रही है। 

वक्त के साथ दीपावली का स्वरूप भी बदला है। पारम्परिक सरसों के तेल की दीपमालायें न सिर्फ प्रकाश व उल्लास का प्रतीक होती हैं बल्कि उनकी टिमटिमाती रोशनी के मोह में घरों के आसपास के तमाम कीट-पतंगे भी मर जाते हैं, जिससे बीमारियों पर अंकुश लगता है। इसके अलावा देशी घी और सरसों के तेल के दीपकों का जलाया जाना वातावरण के लिए वैसे ही उत्तम है जैसे जड़ी-बूटियां युक्त हवन सामग्री से किया गया हवन। पर वर्तमान में जिस प्रकार बल्बों और झालरों का प्रचलन बढ़ रहा है, वह दीपावली के परम्परागत स्वरूप के ठीक उलटा है। 

समाज में अपनी हैसियत दिखाने हेतु एवं प्रदर्शन करने हेतु करोड़ों रुपये के पटाखे लोग जला डालते है तो दूसरी ओर न जाने  कितने लोग सिर्फ एक समय का खाना खाकर पूरा दिन बिता देते हैं। एक अनुमानानुसार हर साल दीपावली की रात पूरे देश में करीब तीन हजार करोड़  रूपये के पटाखे जला दिए जाते हैं और करोड़ों रूपये जुए में लुटा दिए जाते हैं। क्या हमारी अंतश्चेतना यह नहीं कहती कि करोड़ों रुपये के पटाखे छोड़ने के बजाय भूखे-नंगे लोगों हेतु कुछ प्रबन्ध किए जायें? क्या पटाखे फोड़कर  हम पर्यावरण को प्रदूषित नहीं कर रहे हैं? 

निश्चिततः इन सभी प्रश्नों का जवाब अगर समय रहते नहीं दिया गया तो अगली पीढि़याँ शायद त्यौहारों की वास्तविक परिभाषा ही भूल जायें।  दीपावली दीये  का त्यौहार  है न कि पटाखों का। अत: दीपावली पर दीये जलाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखें, न कि पटाखों और आतिशबाजी द्वारा इसे प्रदूषित करें ..दीपावली पर्व पर आप सभी को शुभकामनाएँ !!