समर्थक / Followers

सोमवार, 30 जुलाई 2012

आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण है

आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण है हमारे लिए। आज ही के दिन ईश्वर ने हमारी जीवन साथी आकांक्षा जी को इस दुनिया में भेजा था. वैसे कभी सोचा है कि हर किसी के लिए ईश्वर एक न एक पसंद बनाकर रखते हैं. तभी तो कहते हैं शादियाँ स्वर्ग में तय होती हैं. मैं भी शादी से पहले इसे नहीं मानता था, तब लगता था सफलता मिलेगी, अच्छे रिश्ते आपने आप मिलेंगे. खैर मैं सौभाग्यशाली लोगों में था.

वो लोग नसीब वाले हैं जिन्हें जीवन साथी के रूप में अच्छे लोग मिलते हैं. मैं भी अपने को उनमें से एक समझता हूँ और सौभाग्यवश आज मेरी जीवन-संगिनी आकांक्षा जी का जन्म-दिन भी है. दिन भी बढ़िया है, बारिश का रोमांटिक माहौल..खुशनुमा अहसास.. फिर क्या सोचना, इन्द्र देवता भी मेहरबान हैं, रेनी-डे के चलते अक्षिता की भी छुट्टी. पत्नी आकांक्षा और बिटिया अक्षिता (पाखी) और तान्या को जितनी खुशियाँ दे सकूँ...वही आज की उपलब्धि होगी. वैसे भी खुशियों को सेलिब्रेट करने का बहाना चाहिए और आज तो इतनी बड़ी ख़ुशी का दिन है.11 दिन बाद मेरा भी जन्मदिन है...सो, यह खुशियाँ चलती रहें !!

एक शायरी याद आ रही है (पर शायर का पता नहीं) -

आप वो फूल हो जो गुलशन में तो नही खिलते
पर जिसपे आसमान के फ़रिश्ते भी फक्र करते
आपकी ज़िन्दगी हद से ज़्यादा कीमती है
जन्मदिन आप हमेशा मनाएं यूँ ही हँसते हँसते.





शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

साहस और मानवता की अप्रतिम मूर्ति : कैप्टन लक्ष्मी सहगल

पीढ़ियों का अन्तराल महत्वपूर्ण नहीं होता, यदि पुरातन पीढ़ी वर्तमान परिवेश में भी अपनी प्रासंगिकता बनाये रहें. ऐसे ही पीढ़ी की एक जिंदादिल महिला हैं- कैप्टन डॉक्टर लक्ष्मी सहगल. उन्हें किताबों में पढ़ा, चित्रों में देखा, पोर्टब्लेयर गया तो वहां सेलुलर जेल की दीवारों पर देखा और कानपुर में रहने के दौरान एक साक्षात्कार के लिए उनसे रू-ब-रू भी हुआ. उनके बारे में इतना कुछ सुन रखा था कि कहीं-न-कहीं उनके व्यक्तित्व से आतंकित भी महसूस करता. पर जब पहली बार मिला तो इतना निश्छल और ममत्व भरा आत्मीय व्यवहार देखकर विश्वास ही नहीं हुआ कि यह आजाद हिन्द फौज की वही कर्नल हैं, जिन्होंने अपने साहस और बुद्धिमता के बल पर न सिर्फ आजादी को परवान पर चढ़ाया बल्कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को आजादी की जंग में नारी-शक्ति में अटूट विश्वास करने पर बाध्य भी कर दिया. देश की आजादी के बाद हर किसी ने उसे भुनाया और सत्ता की चांदी की होड़ में दिल्ली में बसकर अपनी पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करना सुनिश्चित किया, पर 98 वर्षीया यह डाक्टर आज भी अपने घर पर लोगों का इलाज करती हैं. देश-सेवा को भुनाने की बजे उन्होंने मानव-सेवा के पीछे अपना पूरा जीवन ही लगा दिया. यह संयोग ही है कि आज से ठीक दस वर्ष पूर्व वर्ष 2002 में 88 वर्ष की आयु में उन्होने वामपंथी दलों की ओर से श्री ए पी जे अब्दुल कलाम के विरुद्ध राष्ट्रपति पद का चुनाव लडा था और कल जब नए राष्ट्रपति के चुनाव के लिए मतदान हो रहा था तो उसी समय कैप्टन सहगल दिल के दौरे के बाद अस्पताल में भर्ती हो रही थीं.


कैप्टन डॉक्टर लक्ष्मी सहगल का जन्म 24 अक्तूबर 1914 को एक परंपरावादी तमिल परिवार में मद्रास उच्च न्यायालय के सफल वकील डॉ0 स्वामिनाथन और समाज सेविका व स्वाधीनता सेनानी अम्मुकुट्टी के घर हुआ था. घर पर बेटी के रूप में लक्ष्मी का आगमन हुआ तो मान-पिता ने उसका नाम ही रख दिया- लक्ष्मी स्वामिनाथन। बचपन से ही कुशाग्र लक्ष्मी ने 1930 में पिता के देहावसान का साहसपूर्वक सामना करते हुए 1932 में विज्ञान में स्नातक परीक्षा पास की। 1938 में उन्होने मद्रास मेडिकल कालेज से एम्.बी.बी.एस. किया और अगले वर्ष 1939 में जच्चा-बच्चा रोग विशेषज्ञ बनीं। कुछ दिन भारत में काम करके 1940 में वे सिंगापुर चली गयीं।

लक्ष्मी बचपन से ही राष्ट्रवादी आंदोलन से प्रभावित थीं और जब गाँधी जी ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन छेड़ा तो उन्होंने उसमें सक्रियता के साथ भाग लिया. उनका यह देश-प्रेम सिंगापुर जाने के बाद भी ख़त्म नहीं हुआ. सिंगापुर में उन्होने न केवल भारत से आये आप्रवासी मज़दूरों के लिये निशुल्क चिकित्सालय खोला बल्कि भारत स्वतंत्रता संघ की सक्रिय सदस्या भी बनीं। वर्ष 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब अंग्रेज़ों ने सिंगापुर को जापानियों को समर्पित कर दिया तब उन्होंने आहत युद्धबन्दियों के लिये काफी काम किया। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ही जब जापानी सेना ने सिंगापुर में ब्रिटिश सेना पर हमला किया तो उसी समय ब्रिटिश सेना के बहुत से भारतीय सैनिकों के मन में अपने देश की स्वतंत्रता के लिये काम करने का विचार उठ रहा था। ऐसे ही माहौल में 2 जुलाई 1943 को सिंगापुर की धरा पर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का ऐतिहासिक पदार्पण हुआ. नेता जी के विचारों से लक्ष्मी काफी प्रभावित हुईं और अंतत: उन्होंने इस पवित्र अभियान में नेताजी से अपने को भी शामिल करने की इच्छा जाहिर की. पहले तो नेताजी कुछ हिचकिचाए पर लक्ष्मी के बुलंद इरादों को देखकर उन्हें हामी भरनी ही पड़ी. फिर क्या था, आज़ाद हिन्द फौज़ की पहली महिला रेजिमेंट के विचार ने मूर्तरूप लिया जिसका नाम वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के सम्मान में रानी झाँसी रेजिमेंट रखा गया। 22 अक्तूबर 1943 को डॉ0 लक्ष्मी ने बतौर कैप्टन रानी झाँसी रेजिमेंट में कैप्टेन पद पर कार्यभार संभाला. यही नहीं अपने साहस और अद्भुत कार्य की बदौलत बाद में उन्हें कर्नल का पद भी मिला और उन्हें एशिया की प्रथम महिला कर्नल बनने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ, लेकिन जुबान पर चढ़ जाने के कारन लोगों ने उन्हें कैप्टन लक्ष्मी के रूप में ही याद रखा. यही नहीं वे 1943में सुभाषचन्द्र बोस की ‘‘आरजी हुकूमते आजाद हिन्द सरकार’’ में महिला विभाग की कैबिनेट मंत्री भी बनीं.

दितीय विश्व युद्ध में जापान की हार पश्चात् अंतत: ब्रिटिश सेनाओं ने आज़ाद हिंद फ़ौज के स्वतंत्रता सैनिकों की भी धरपकड़ की. सिंगापुर में पकडे गये आज़ाद हिन्द सैनिकों में कर्नल डॉ लक्ष्मी भी थीं। 4 जुलाई 1946 को भारत लाये जाने के बाद अंतत: उन्हें बरी कर दिया गया, पर इतिहास गवाह है की नेताजी के दायें हाथ मेजर जनरल शाहनवाज़ व कर्नल गुरबक्ष सिंह ढिल्लन और कर्नल प्रेमकुमार सहगल पर लाल किले में देशद्रोह के आरोप में मुकदमे चले जिसमें पण्डित जवाहर लाल नेहरू, भूलाभाई देसाई और कैलाशनाथ काटजू जैसे दिग्गज वकीलों की दलीलों के चलते तीनों जांबाजों को बरी करना पडा। कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने लाहौर में मार्च 1947 में कर्नल प्रेम कुमार सहगल से विवाह कर लिया और फिर कानपुर आकर बस गईं. पर उनका संघर्ष यहीं ख़त्म नहीं हुआ और वे वंचितों की सेवा में लग गईं. वे भारत विभाजन को कभी स्वीकार नहीं कर पाईं और अमीरों और ग़रीबों के बीच बढ़ती खाई का हमेशा विरोध करती रहीं.

कालांतर में वे सक्रिय राजनीति में भी आयीं और 1971 में मर्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से राज्यसभा की सदस्य बनीं। यह एक विडंबना ही है कि जिन वामपंथी पार्टियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान का साथ देने के लिए सुभाष चंद्र बोस की आलोचना की, उसी से अंतत: कैप्टन लक्ष्मी सहगल का जुडाव हुआ. वे अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की संस्थापक सदस्यों में रहीं .1998 में उन्हें भारत सरकार द्वारा उल्लेखनीय सेवाओं के लिए पद्म विभूषण से सम्मनित किया गया। वर्ष 2002 में 88 वर्ष की आयु में उन्होने वामपंथी दलों की ओर से श्री ए पी जे अब्दुल कलाम के विरुद्ध राष्ट्रपति पद का चुनाव भी लडा था।

डॉक्टर लक्ष्मी सहगल जीवन के अंतिम समय तक मानवता के सेवा के लिए तत्पर दिखती हैं. शरीर की स्वस्थता उम्र से नहीं वरन् सक्रियता से निर्धारित होती है, का अक्षरक्षः पालन करने वाली कैप्टन लक्ष्मी सहगल आज भी नियमित रूप से अपने क्लीनिक में मरीजों की देखभाल करती हैं। डाक्टर सहगल किसी कर्मकांड में विश्वास नहीं रखतीं बल्कि मरीजों की देख भाल से वे अपने को ईश्वर के करीब पाती हैं। आज भी वे सुबह 9.30 बजे अपने क्लीनिक के लिए निकल जाती हैं एवम् 10 बजे से 2 बजे तक का समय मरीजों की तीमारदारी में बिताती हैं । उनकी बेटी सुभाषिनी अली 1989 में कानपुर से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सांसद भी रहीं. सुभाषिनी अली ने कम्युनिस्ट नेत्री बृन्दा करात की फिल्म अमू में अभिनेत्री का किरदार भी निभाया था. डॉ सहगल के पौत्र और सुभाषिनी अली और मुज़फ्फर अली के पुत्र शाद अली फिल्म निर्माता निर्देशक हैं, जिन्होंने साथिया, बंटी और बबली इत्यादि चर्चित फ़िल्में बनाई हैं। प्रसिद्ध नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई उनकी सगी बहन हैं।

(आज ही सुबह ख़बरों में देखा कि पद्म विभूषण से सम्मानित आजाद हिंद फौज की कैप्टन डॉ. लक्ष्मी सहगल को गुरुवार सुबह दिल का दौरा पड़ने पर कानपुर मेडिकल सेंटर में भर्ती कराया गया। भर्ती कराने के बाद अस्पताल में ही उन्हें ब्रेन हेमरेज भी हो गया। 98 वर्षीया डॉ. सहगल की हालत नाजुक बनी हुई है।....डा. सहगल के शीघ्र स्वस्थ होने क़ी कामनाओं के साथ !!)

(चित्र में कैप्टन लक्ष्मी सहगल के साथ लेखक कृष्ण कुमार यादव)

शनिवार, 7 जुलाई 2012

सावन हे सखी सगरो सुहावन

प्रतीक्षा, मिलन और विरह की अविरल सहेली, निर्मल और लज्जा से सजी-धजी नवयौवना की आसमान छूती खुशी, आदिकाल से कवियों की रचनाओं का श्रृंगार कर, उन्हें जीवंत करने वाली ‘कजरी’ सावन की हरियाली बहारों के साथ तेरा स्वागत है। मौसम और यौवन की महिमा का बखान करने के लिए परंपरागत लोकगीतों का भारतीय संस्कृति में कितना महत्व है-कजरी इसका उदाहरण है। प्रतीक्षा के पट खोलती लोकगीतों की श्रृंखलाएं इन खास दिनों में गज़ब सी हलचल पैदा करती हैं, हिलोर सी उठती है, श्रृंगार के लिए मन मचलता है और उस पर कजरी के सुमधुर बोल! सचमुच वह सबकी प्रतीक्षा है, जीवन की उमंग और आसमान को छूते हुए झूलों की रफ्तार है। शहनाईयों की कर्णप्रिय गूंज है, सुर्ख़ लाल मखमली वीर बहूटी और हरियाली का गहना है, सावन से पहले ही तेरे आने का एहसास! महान कवियों और रचनाकारों ने तो कजरी के सम्मोहन की व्याख्या विशिष्ट शैली में की है।


भारतीय परम्परा का प्रमुख आधार तत्व उसकी लोक संस्कृति है। यहां लोक कोई एकाकी धारणा नहीं है बल्कि इसमें सामान्य-जन से लेकर पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, ऋतुएं, पर्यावरण, हमारा परिवेश और हर्ष-विषाद की सामूहिक भावना से लेकर श्रृंगारिक दशाएं तक शामिल हैं। ‘ग्राम-गीत‘ की भारत में प्राचीन परंपरा रही है। लोकमानस के कंठ में, श्रुतियों में और कई बार लिखित-रूप में यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होते रहते हैं। पं. रामनरेश त्रिपाठी के शब्दों में-‘ग्राम गीत प्रकृति के उदगार हैं। इनमें अलंकार नहीं, केवल रस है। छन्द नहीं, केवल लय है। लालित्य नहीं, केवल माधुर्य है। ग्रामीण मनुष्यों के स्त्री-पुरुषों के मध्य में हृदय नामक आसन पर बैठकर प्रकृति मानो गान करती है। प्रकृति का यह गान ही ग्राम गीत है....।’ इस लोक संस्कृति का ही एक पहलू है- कजरी। ग्रामीण अंचलों में अभी भी प्रकृति की अनुपम छटा के बीच कजरी की धाराएं समवेत फूट पड़ती हैं। यहाँ तक कि जो अपनी मिटटी छोड़कर विदेशों में बस गए, उन्हें भी यह कजरी अपनी ओर खींचती है। तभी तो कजरी अमेरिका, ब्रिटेन इत्यादि देशों में भी अपनी अनुगूंज छोड़ चुकी है। सावन के मतवाले मौसम में कजरी के बोलों की गूंज वैसे भी दूर-दूर तक सुनाई देती है -

रिमझिम बरसेले बदरिया,
गुईयां गावेले कजरिया
मोर सांवरिया भीजै न
वो ही धानियां की कियरिया
मोर सांविरया भीजै न।

वस्तुतः ‘लोकगीतों की रानी’ कजरी सिर्फ गायन भर नहीं है बल्कि यह सावन मौसम की सुन्दरता और उल्लास का उत्सवधर्मी पर्व है। चरक संहिता में तो यौवन की संरक्षा व सुरक्षा हेतु बसन्त के बाद सावन महीने को ही सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। सावन में नयी ब्याही बेटियाँ अपने पीहर वापस आती हैं और बगीचों में भाभी और बचपन की सहेलियों संग कजरी गाते हुए झूला झूलती हैं-

घरवा में से निकले ननद-भउजईया
जुलम दोनों जोड़ी साँवरिया।

छेड़छाड़ भरे इस माहौल में जिन महिलाओं के पति बाहर गये होते हैं, वे भी विरह में तड़पकर गुनगुना उठती हैं ताकि कजरी की गूँज उनके प्रीतम तक पहुँचे और शायद वे लौट आयें-

सावन बीत गयो मेरो रामा
नाहीं आयो सजनवा ना।
........................
भादों मास पिया मोर नहीं आये
रतिया देखी सपनवा ना।

यही नहीं जिसके पति सेना में या बाहर परदेश में नौकरी करते हैं, घर लौटने पर उनके सांवले पड़े चेहरे को देखकर पत्नियाँ कजरी के बोलों में गाती हैं -

गौर-गौर गइले पिया
आयो हुईका करिया
नौकरिया पिया छोड़ दे ना।

एक मान्यता के अनुसार पति विरह में पत्नियाँ देवि ‘कजमल’ के चरणों में रोते हुए गाती हैं, वही गान कजरी के रूप में प्रसिद्ध है-

सावन हे सखी सगरो सुहावन
रिमझिम बरसेला मेघ हे
सबके बलमउवा घर अइलन
हमरो बलम परदेस रे।

नगरीय सभ्यता में पले-बसे लोग भले ही अपनी सुरीली धरोहरों से दूर होते जा रहे हों, परन्तु शास्त्रीय व उपशास्त्रीय बंदिशों से रची कजरी अभी भी उत्तर प्रदेश के कुछ अंचलों की खास लोक संगीत विधा है। कजरी के मूलतः तीन रूप हैं- बनारसी, मिर्जापुरी और गोरखपुरी कजरी। बनारसी कजरी अपने अक्खड़पन और बिन्दास बोलों की वजह से अलग पहचानी जाती है। इसके बोलों में अइले, गइले जैसे शब्दों का बखूबी उपयोग होता है, इसकी सबसे बड़ी पहचान ‘न’ की टेक होती है-

बीरन भइया अइले अनवइया
सवनवा में ना जइबे ननदी।
रिमझिम पड़ेला फुहार
बदरिया आई गइले ननदी।

विंध्य क्षेत्र में गायी जाने वाली मिर्जापुरी कजरी की अपनी अलग पहचान है। अपनी अनूठी सांस्कृतिक परंपराओं के कारण मशहूर मिर्जापुरी कजरी को ही ज्यादातर मंचीय गायक गाना पसंद करते हैं। इसमें सखी-सहेलियों, भाभी-ननद के आपसी रिश्तों की मिठास और छेड़छाड़ के साथ सावन की मस्ती का रंग घुला होता है-

पिया सड़िया लिया दा मिर्जापुरी पिया
रंग रहे कपूरी पिया ना
जबसे साड़ी ना लिअईबा
तबसे जेवना ना बनईबे
तोरे जेवना पे लगिहैं मजूरी पिया
रंग रहे कपूरी पिया ना।

विंध्य क्षेत्र में पारंपरिक कजरी धुनों में झूला झूलती और सावन भादो मास में रात में चौपालों में जाकर ‌स्त्रियां उत्सव मनाती हैं। इस कजरी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है और इसकी धुनों व पद्धति को नहीं बदला जा सका, क्योंकि इसका कोई तोड़ ही नहीं है। कजरी की ही तरह विंध्य क्षेत्र में कजरी अखाड़ों की भी अनूठी परंपरा रही है। आषाढ़ पूर्णिमा के दिन गुरू पूजन के बाद इन अखाड़ों से कजरी का विधिवत गायन आरंभ होता है। स्वस्थ परंपरा के तहत इन कजरी अखाड़ों में प्रतिद्वंदिता भी होती है। कजरी लेखक गुरु अपनी कजरी को एक रजिस्टर पर नोट कर देता है, जिसे किसी भी हालत में न तो सार्वजनिक किया जाता है और न ही किसी को लिखित रूप में दिया जाता है, केवल अखाड़े का गायक ही इसे याद करके या पढ़कर गा सकता है-

कइसे खेलन जइबू
सावन में कजरिया
बदरिया घिर आईल ननदी
संग में सखी न सहेली
कईसे जइबू तू अकेली
गुंडा घेर लीहें तोहरी डगरिया।

बनारसी और मिर्जापुरी कजरी से परे गोरखपुरी कजरी की अपनी अलग ही टेक है और यह ‘हरे रामा‘ और ‘ऐ हारी‘ के कारण अन्य कजरी से अलग पहचानी जाती है-

हरे रामा, कृष्ण बने मनिहारी
पहिर के सारी, ऐ हारी।

सावन की अनुभूति के बीच भला किसका मन प्रिय मिलन हेतु नहीं तड़पेगा, फिर वह चाहे चंद्रमा ही क्यों न हो-

चंदा छिपे चाहे बदरी मा
जब से लगा सवनवा ना।

विरह के बाद संयोग की अनुभूति से तड़प और बेकरारी भी बढ़ती जाती है, फिर यही तो समय होता है इतराने का, फरमाइशें पूरी करवाने का-

पिया मेंहदी लिआय दा मोतीझील से
जायके साइकील से ना
पिया मेंहदी लिअहिया
छोटकी ननदी से पिसईहा
अपने हाथ से लगाय दा
कांटा-कील से
जायके साइकील से।
..................
धोतिया लइदे बलम कलकतिया
जिसमें हरी-हरी पतियां।

ऐसा नहीं है कि कजरी सिर्फ बनारस, मिर्जापुर और गोरखपुर के अंचलों तक ही सीमित है, बल्कि इलाहाबाद और अवध अंचल भी इसकी सुमधुरता से अछूते नहीं हैं। कजरी सिर्फ गाई नहीं जाती, बल्कि खेली भी जाती है। एक तरफ जहां मंच पर लोक गायक इसकी अद्भुत प्रस्तुति करते हैं, वहीं दूसरी ओर इसकी सर्वाधिक विशिष्ट शैली ‘धुनमुनिया’ है, जिसमें महिलाएं झुक कर एक दूसरे से जुड़ी हुई अर्धवृत्त में नृत्य करती हैं।

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ अंचलों में तो रक्षाबंधन पर्व को ‘कजरी पूर्णिमा’ के तौर पर भी मनाया जाता है। मानसून की समाप्ति को दर्शाता यह पर्व श्रावण अमावस्या के नवें दिन से आरंभ होता है, जिसे ‘कजरी नवमी’ के नाम से जाना जाता है। कजरी नवमी से लेकर कजरी पूर्णिमा तक चलने वाले इस उत्सव में नवमी के दिन महिलाएं खेतों से मिट्टी सहित फसल के अंश लाकर घरों में रखती हैं एवं उसकी साथ सात दिनों तक माँ भगवती के साथ कजमल देवी की पूजा करती हैं। घर को खूब साफ-सुथरा कर रंगोली बनायी जाती है और पूर्णिमा की शाम को महिलाएं समूह बनाकर पूजी जाने वाली फसल को लेकर नजदीक के तालाब या नदी पर जाती हैं और उस फसल के बर्तन से एक दूसरे पर पानी उलचाती हुई कजरी गाती हैं। इस उत्सवधर्मिता के माहौल में कजरी के गीत सातों दिन अनवरत गाए जाते हैं।

कजरी लोक संस्कृति की जड़ है और यदि हमें लोक जीवन की ऊर्जा और रंगत बनाए रखना है, तो इन तत्वों को सहेज कर रखना होगा। कजरी भले ही पावस गीत के रूप में गाई जाती हो, पर लोक रंजन के साथ ही इसने लोक जीवन के विभिन्न पक्षों में सामाजिक चेतना की अलख जगाने का भी कार्य किया है। कजरी सिर्फ राग-विराग या श्रृंगार और विरह के लोक गीतों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें चर्चित समसामयिक विषयों की भी गूंज सुनाई देती है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कजरी ने लोक चेतना को बखूबी अभिव्यक्त किया। आज़ादी की लड़ाई के दौर में एक कजरी के बोलों की रंगत देखें-

केतने गोली खाइके मरिगै
केतने दामन फांसी चढ़िगै
केतने पीसत होइहें जेल मां चकरिया
बदरिया घेरि आई ननदी।

1857 की क्रांति के पश्चात जिन जीवित लोगों से अंग्रेजी हुकूमत को ज्यादा ख़तरा महसूस हुआ, उन्हें कालापानी की सज़ा दे दी गई। अपने पति को कालापानी भेजे जाने पर एक महिला ‘कजरी’ के बोलों में गाती है-

अरे रामा नागर नैया जाला काले पनियां रे हरी
सबकर नैया जाला कासी हो बिसेसर रामा
नागर नैया जाला काले पनियां रे हरी
घरवा में रोवै नागर, माई और बहिनियां रामा
से जिया पैरोवे बारी धनिया रे हरी।

स्वतंत्रता की लड़ाई में हर कोई चाहता था कि उसके घर के लोग भी इस संग्राम में अपनी आहुति दें। कजरी के माध्यम से महिलाओं ने अन्याय के विरूद्ध लोगों को जगाया और दुश्मन का सामना करने को प्रेरित किया। ऐसे में उन नौजवानों को जो घर में बैठे थे, महिलाओं ने कजरी के माध्यम से व्यंग्य कसते हुए प्रेरित किया-

लागे सरम लाज घर में बैठ जाहु
मरद से बनिके लुगइया आए हरि
पहिरि के साड़ी, चूड़ी, मुंहवा छिपाई लेहु
राखि लेई तोहरी पगरइया आए हरि।

सुभाष चंद्र बोस ने जंग-ए-आजादी में नारा दिया कि-‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा, फिर क्या था पुरूषों के साथ-साथ महिलाएं भी उनकी फौज में शामिल होने के लिए बेकरार हो उठीं। तभी तो कजरी के शब्द फूट पड़े-

हरे रामा सुभाष चंद्र ने फौज सजायी रे हारी
कड़ा-छड़ा पैंजनिया छोड़बै, छोड़बै हाथ कंगनवा रामा
हरे रामा, हाथ में झंडा लै के जुलूस निकलबैं रे हारी।

महात्मा गांधी आज़ादी के दौर के सबसे बड़े नेता थे। चरखा कातकर उन्होंने स्वावलंबन और स्वदेशी का रूझान जगाया। नवयुवतियां अपनी-अपनी धुन में गांधी जी को प्रेरणास्त्रोत मानतीं और एक स्वर में कजरी के बोलों में गातीं-

अपने हाथे चरखा चलउबै
हमार कोऊ का करिहैं
गांधी बाबा से लगन लगउबै
हमार कोई का करिहैं।

कजरी में ’चुनरी’ शब्द के बहाने बहुत कुछ कहा गया है। आज़ादी की तरंगें भी कजरी से अछूती नहीं रही हैं-

एक ही चुनरी मंगाए दे बूटेदार पिया
माना कही हमार पिया ना
चंद्रशेखर की बनाना, लक्ष्मीबाई को दर्शाना
लड़की हो गोरों से घोड़ों पर सवार पिया।
जो हम ऐसी चुनरी पइबै, अपनी छाती से लगइबे
मुसुरिया दीन लूटै सावन में बहार पिया
माना कही हमार पिया ना।
..................
पिया अपने संग हमका लिआये चला
मेलवा घुमाए चला ना
लेबई खादी चुनर धानी, पहिन के होइ जाबै रानी
चुनरी लेबई लहरेदार, रहैं बापू औ सरदार
चाचा नेहरू के बगले बइठाए चला
मेलवा घुमाए चला ना
रहइं नेताजी सुभाष, और भगत सिंह खास
अपने शिवाजी के ओहमा छपाए चला
जगह-जगह नाम भारत लिखाए चला
मेलवा घुमाए चला

उपभोक्तावादी ग्लैमर में कजरी भले ही कुछ क्षेत्रों तक सिमट गई हो, पर यह प्रकृति से तादातम्य का गीत है और इसमें कहीं न कहीं पर्यावरण चेतना भी मौजूद है। इसमें कोई शक नहीं कि सावन प्रतीक है-सुख का, सुंदरता का, प्रेम का, उल्लास का और इन सब के बीच, कजरी जीवन के अनुपम क्षणों को अपने में समेटे यूं ही रिश्तों को खनकाती रहेगी और झूले की पींगों के बीच छेड़-छाड़ व मनुहार यूँ ही लुटाती रहेगी। कजरी हमारी जनचेतना की परिचायक है और जब तक धरती पर हरियाली रहेगी कजरी जीवित रहेगी। अपनी वाच्य परंपरा से जन-जन तक पहुंचने वाले कजरी जैसे लोकगीतों के माध्यम से लोकजीवन में तेजी से मिटते मूल्यों को बचाया जा सकता है।

कजरी! तेरी विशिष्टता के बखान के लिए शब्द भी कम पड़ते हैं, मैं तेरे और भी विशेषणों के साथ फिर लौटता हूं।


-कृष्ण कुमार यादव

रविवार, 17 जून 2012

पिता जी के लिए...

(आज फादर्स-डे है. इसी बहाने मैंने अपने पिता जी से जुडी बातों को सहेजने का प्रयास किया है. पिता जी उत्तर प्रदेश सरकार में वर्ष 2003 में स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी पद से सेवानिवृत्ति पश्चात सम्प्रति रचनात्मक लेखन व अध्ययन, बौद्धिक विमर्श एवं सामाजिक कार्यों में रचनात्मक भागीदारी में प्रवृत्त हैं. मुझे इस मुकाम तक पहुँचाने में उनका बहुत बड़ा योगदान है.)

बचपन में पिता जी के साथ न रहने की कसक-

किसी भी व्यक्ति के जीवन में पिता का बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है. माँ की ममता और पिता की नसीहत..दोनों ही जीवन को एक दिशा देते हैं. मेरा अधिकतर बचपन ननिहाल में गुजरा, बमुश्किल चार साल मैंने अपने पिताजी के साथ लगातार गुजारे होंगें. मेरे जन्म के बाद पिता जी का स्थानांतरण प्रतापगढ़ के लिए हो गया, तो हम मम्मी के साथ ननिहाल में रहे. पुन: पिता जी का स्थानान्तरण आजमगढ़ हुआ तो हम ननिहाल से पिता जी के पास लौट कर आए. कक्षा 2 से कक्षा 5 तक हम पिता जी के साथ रहे, फिर नवोदय विद्यालय में चयन हो गया तो वहां चले गए. कक्षा 6 से 12 तक जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर, आजमगढ़ के हास्टल में रहे और फिर इलाहाबाद. इलाहाबाद से ही सिविल-सर्विसेज में सफलता प्राप्त हुई, फिर तो वो दिन ही नहीं आए कि कभी पिता जी के साथ कई दिन गुजारने का अवसर मिला हो...हम घर जाते या पिता जी हमारे पास आते..दसेक दिन रहते, फिर अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त और मस्त. फोन पर लगभग हमेशा संवाद बना रहता है. पर मुझे आज भी कसक होती है कि मैं उन भाग्यशाली लोगों में नहीं रहा , जिन्होंने अपनी पिता जी के साथ लम्बा समय गुजारा हो.

लेखनी पर पिता जी का प्रभाव-

मैंने पिता जी को बचपन से ही किताबों और पत्र-पत्रिकाओं में तल्लीन देखा. वो पत्र-पत्रिकाओं से कुछ कटिंग करते और फिर उनमें से तथ्य और विचार लेकर कुछ लिखते. पर यह लिखना सदैव उनकी डायरी तक ही सीमित रहा. पिता जो को लिखते देखकर मुझे यह लगता था कि मैं भी उनकी तरह कुछ न कुछ लिखूंगा. छुट्टियों में घर आने पर पिताजी की नजरें चुराकर उनके बुकशेल्फ से किताबें और पत्र-पत्रिकायें निकालकर मैं मनोयोग से पढता था. पिताजी के आदर्शमय जीवन, ईमानदारी व उदात्त व्यक्तित्व का मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा और मेरे चरित्र निर्माण में पिताजी की अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका रही। अध्ययन और लेखन के क्षेत्र में भी मुझ पर पिताजी का प्रभाव पड़ा। पिताजी के अध्ययन प्रेमी स्वभाव एवम् लेखन के प्रति झुकाव को सरकारी सेवा की आचरण संहिताओं व समुचित वातावरण के अभाव में मैंने डायरी में ही कैद होते देखा है। वर्ष 1990 में पिताजी ने आर0 एस0 ‘अनजाने‘ नाम से एक पुस्तक ‘‘सामाजिक व्यवस्था और आरक्षण‘‘ लिखी, पर सरकारी सेवा की आचरण संहिताओं के भय के चलते खुलकर इसका प्रसार नहीं हो सका। फिलहाल पिताजी के सेवानिवृत्त होने के पश्चात उनके लेख देश की तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पा रहे हैं, पर किशोरावस्था में जब भी मैं पिताजी को नियमित रूप से अखबार की कतरनें काटते देखते और फिर कुछ समय बाद उन्हें पढ़कर जब वे फेंक देते, तो आप काफी उद्वेलित होता थे। ‘अखबार की कतरनें’ नामक अपनी कविता में इस भाव को मैंने बखूबी अभिव्यक्त किया है- ”मैं चोरी-चोरी पापा की फाइलों से/उन कतरनों को लेकर पढ़ता/पर पापा का एक समय बाद/उन कतरनों को फाड़कर फेंक देना/मुझमें कहीं भर देता था एक गुस्सा/ऐसा लगता मानो मेरा कोई खिलौना/तोड़कर फेंक दिया गया हो/उन चिंदियों को जोड़कर मैं/उनके मजमून को समझने की कोशिश करता/शायद कहीं कुछ मुझे उद्वेलित करता था।” जो भी हो पिताजी के चलते ही मेरे मन में यह भाव पैदा हुआ कि भविष्य में मैं रचनात्मक लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हूँगा और अपने विचारों व भावनाओं को डायरी में कैद करने की बजाय किताब के रूप में प्रकाशित कर रचना संसार में अपनी सशक्त उपस्थित दर्ज कराऊंगा.

पिता जी की सीख बनी सिविल- सर्विसेज में सफलता का आधार
वर्ष 1994 में मैं जवाहर नवोदय विद्यालय जीयनपुर, आजमगढ़ से प्रथम श्रेणी में 12वीं की परीक्षा उतीर्ण हुआ एवम् अन्य मित्रों की भांति आगे की पढ़ाई हेतु इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लेने का निर्णय लिया। जैसा कि 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद कैरियर बनाने की जद्दोजहद आरम्भ होती है, मैंने भी अपने मित्रों के साथ सी0बी0एस0ई0 मेडिकल की परीक्षा दी और पिताजी से डाॅक्टर बनने की इच्छा जाहिर की। पिताजी स्वयं स्वास्थ्य विभाग में थे, पर उन्होंने मुझे सिविल सर्विसेज परीक्षा उत्तीर्ण कर आई0 ए0 एस0 इत्यादि हेतु प्रयत्न करने को कहा। इस पर मैंने कहा कि- ‘‘पिताजी! यह तो बहुत कठिन परीक्षा होती है और मुझे नहीं लगता कि मैं इसमें सफल हो पाऊँगा।’’ पिताजी ने धीर गम्भीर स्वर में कहा-‘‘बेटा! इस दुनिया में जो कुछ भी करता है, मनुष्य ही करता है। कोई आसमान से नहीं पैदा होता।’’ पिताजी के इस सूत्र वाक्य को गांठकर मैंने वर्ष 1994 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कला संकाय में प्रवेश ले लिया और दर्शनशास्त्र, राजनीति शास्त्र व प्राचीन इतिहास विषय लेकर मनोयोग से अध्ययन में जुट गया । चूँकि छात्रावासों के माहौल से मैं पूर्व परिचित था, सो किराए पर कमरा लेकर ही रहना उचित समझा और ममफोर्डगंज में रहने लगा। जहाँ अन्य मित्र मेडिकल व इंजीनियरिंग की कोचिंग में व्यस्त थे, वहीं मैं अर्जुन की भांति सीधे आई0ए0एस0-पी0सी0एस0 रूपी कैरियर को चिडि़या की आँख की तरह देख रहा था. कभी-कभी दोस्त व्यंग्य भी कसते कि-‘‘क्या अभी से सिविल सर्विसेज की रट लगा रखी है? यहाँ पर जब किसी का कहीं चयन नहीं होता तो वह सिविल सर्विसेज की परीक्षा अपने घर वालों को धोखे में रखने व शादी के लिए देता है।’’ इन सबसे बेपरवाह मैं मनोयोग से अध्ययन में जुटा रहा. पिताजी ने कभी पैसे व सुविधाओं की कमी नहीं होने दी और मैंने कभी उनका सर नीचे नहीं होने दिया और अपने प्रथम प्रयास में ही सिविल- सर्विसेज की परीक्षा में चयनित हुआ !!

मेरी यह सफलता इस रूप में भी अभूतपूर्व रही कि नवोदय विद्यालय संस्था से आई0ए0एस0 व एलाइड सेवाओं में चयनित मैं प्रथम विद्यार्थी था और यही नहीं अपने पैतृक स्थान सरांवा, जौनपुर व तहबरपुर, आजमगढ़ जैसे क्षेत्र से भी इस सेवा में चयनित मैं प्रथम व्यक्ति था । मेरा चयन पिता जी के लिए भी काफी महत्वपूर्ण था क्योंकि उस समय उत्तर प्रदेश की राजकीय सेवाओं में सेवानिवृत्ति की आयु सीमा 58 वर्ष थी और पिताजी वर्ष 2001 में ही सेवानिवृत्त होने वाले थे। पर यह सुखद संयोग रहा कि मेरे चयन पश्चात ही उत्तर प्रदेश सरकार ने सेवानिवृत्ति की आयु सीमा 60 वर्ष कर दी और पिताजी को इसके चलते दो साल का सेवा विस्तार मिल गया।

***************************************************************************************
पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव जी का संक्षिप्त परिचय :

20 दिसम्बर 1943 को सरांवा, जौनपुर (उ0प्र0) में जन्म। काशी विद्यापीठ, वाराणसी (उ0प्र0) से 1964 में समाज शास्त्र में एम.ए.। वर्ष 1967में खण्ड प्रसार शिक्षक (कालांतर में ‘स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी’ पदनाम परिवर्तित) के पद पर चयन। आरंभ से ही अध्ययन-लेखन में अभिरुचि। उत्तर प्रदेश सरकार में वर्ष 2003 में स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी पद से सेवानिवृत्ति पश्चात सम्प्रति रचनात्मक लेखन व अध्ययन, बौद्धिक विमर्श एवं सामाजिक कार्यों में रचनात्मक भागीदारी। सामाजिक व्यवस्था एवं आरक्षण (1990) नामक पुस्तक प्रकाशित। लेखों का एक अन्य संग्रह प्रेस में। भारतीय विचारक, नई सहस्राब्दि का महिला सशक्तीकरणः अवधारणा, चिंतन एवं सरोकार, नई सहस्राब्दि का दलित आंदोलनः मिथक एवं यथार्थ सहित कई चर्चित पुस्तकों में लेख संकलित।

देश की शताधिक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं: युगतेवर, समकालीन सोच, संवदिया, रचना उत्सव, नव निकष, गोलकोण्डा दर्पण, समय के साखी, सोच विचार, इंडिया न्यूज, सेवा चेतना, प्रतिश्रुति, झंकृति, हरसिंगार, शोध प्रभांजलि, शब्द, साहित्य क्रान्ति, साहित्य परिवार, साहित्य अभियान, सृजन से, प्राची प्रतिभा, संवदिया, अनीश, सांवली, द वेक, सामथ्र्य, सामान्यजन संदेश, समाज प्रवाह, जर्जर कश्ती, प्रगतिशील उद्भव, प्रेरणा अंशु, यू0एस0एम0 पत्रिका, नारायणीयम, तुलसी प्रभा, राष्ट्र सेतु, पगडंडी, आगम सोची, शुभ्र ज्योत्स्ना, दृष्टिकोण, बुलंद प्रभा, सौगात, हम सब साथ-साथ, जीवन मूल्य संरक्षक न्यूज, श्रुतिपथ, मंथन, पंखुड़ी, सुखदा, सबलोग, बाबू जी का भारत मित्र, बुलंद इण्डिया, टर्निंग इण्डिया, इसमासो, नारी अस्मिता, अनंता, उत्तरा, अहल्या, कर्मश्री, अरावली उद्घोष, युद्धरत आम आदमी, अपेक्षा, बयान, आश्वस्त, अम्बेडकर इन इण्डिया, अम्बेडकर टुडे, दलित साहित्य वार्षिकी, दलित टुडे, बहुरि नहीं आवना, हाशिये की आवाज, आधुनिक विप्लव, मूक वक्ता, सोशल ब्रेनवाश, आपका आइना, कमेरी दुनिया, आदिवासी सत्ता, बहुजन ब्यूरो, वैचारिक उदबोध, प्रियंत टाइम्स, शिक्षक प्रभा, विश्व स्नेह समाज, विवेक शक्ति, हिन्द क्रान्ति, नवोदित स्वर, ज्ञान-विज्ञान बुलेटिन, पब्लिक की आवाज, समाचार सफर, सत्य चक्र, दहलीज, दि माॅरल, अयोध्या संवाद, जीरो टाइम्स, तख्तोताज, दिनहुआ, यादव ज्योति, यादव कुल दीपिका, यादव साम्राज्य, यादव शक्ति, यादव निर्देशिका सह पत्रिका, इत्यादि में विभिन्न विषयों पर लेख प्रकाशित।

इंटरनेट पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं: सृजनगाथा, रचनाकार, साहित्य कुंज, साहित्य शिल्पी, हिन्दीनेस्ट, हमारी वाणी, परिकल्पना ब्लाॅगोत्सव, स्वतंत्र आवाज डाॅट काम, नवभारत टाइम्स, वांग्मय पत्रिका, समय दर्पण, युगमानस इत्यादि पर लेखों का प्रकाशन। ”यदुकुल” ब्लॉग (http://www.yadukul.blogspot..in/) का 10 नवम्बर 2008 से सतत् संचालन।

सामाजिक न्याय सम्बन्धी लेखन, विशिष्ट कृतित्व एवं समृद्ध साहित्य-साधना हेतु राष्ट्रीय राजभाषा पीठ, इलाहाबाद द्वारा ’भारती ज्योति’ (2006), भारतीय दलित साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा ‘ज्योतिबा फुले फेलोशिप सम्मान‘ (2007) व डाॅ0 अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान (2011), आसरा समिति, मथुरा द्वारा ‘बृज गौरव‘ (2007), समग्रता शिक्षा साहित्य एवं कला परिषद, कटनी, म0प्र0 द्वारा ‘भारत-भूषण‘ (2010), रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया द्वारा ‘अम्बेडकर रत्न अवार्ड 2011‘ से सम्मानित।
*********************************************************
( पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव जी, माँ श्रीमती बिमला यादव जी, कृष्ण कुमार यादव, पत्नी श्रीमती आकांक्षा और बेटियाँ अक्षिता और अपूर्वा)
(पिता जी और मम्मी जी )
(बहन किरन यादव के शुभ-विवाह पर आशीर्वाद देते पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव जी, श्वसुर श्री राजेंद्र प्रसाद जी, MLC श्री कमला प्रसाद यादव जी और श्री समीर सौरभ जी (उप पुलिस अधीक्षक)
(बहन किरन यादव की शादी के दौरान रस्म निभाते मम्मी-पापा)
(पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव जी और वरिष्ठ बाल-साहित्यकार डा. राष्ट्रबंधु जी)
(पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव जी)
(पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव जी, नाना स्वर्गीय श्री दलजीत यादव जी, श्री वैदेही यादव जी)




शनिवार, 16 जून 2012

अमवा त खइला हो, कोसिलिया खींच मरला - कैलाश गौतम

(आजकल आम का सीजन चल रहा है. कभी भरी दोपहरी में बैग में बैठकर आम खाने का आनंद ही कुछ और था, पर वक़्त के साथ ये आम भी 'खास' हो गया. एक तो महंगाई, ऊपर से आम के नखरे कि इस साल अमुक पेड़ पर ही दिखूंगा. वाकई आम आज 'आम' नहीं रहा बल्कि 'खास' हो गया है. इसीलिए उसकी प्रशस्ति में बहुत कुछ लिखा जा रहा है. कभी कैलाश गौतम जी ने आम पर यह खास लेख लिखा था. आज वो हमारे बीच नहीं हैं, पर अपनी रचनाओं में जरुर जीवंत हैं)

कभी आम का नाम सुनते ही आदमी के मुंह में पानी आ जाता था, लेकिन आज आम का नाम सुनते ही आदमी के मुंह में गाली आ रही है-स्साला आम। आदमी ताव खा जा रहा है। ताव आदमी इसलिए खा रहा है कि ताव खाना आसान है, आम खाना मुश्किल। देख रहे हैं औसत आदमी आज किस निगाह से आज आम को देख रहा है। मुफ्त मिले तो कच्चे का अचार डाल दें और पक्का मिले तो चूस-चूसकर भूंसी छुड़ा दें। लेकिन ऐसा संयोग बन कहां रहा है? दरअसल आम नंबर एक का धोखेबाज फल है, बड़े-बड़े बाग वाले राह देखते रह गए लेकिन पट्ठा आम बाग में नहीं आया तो नहीं आया। और यह अचरज़ देखिए कि बगि में बिल्कुल ही नहीं आया, लेकिन देशभर की सट्टियां आमों से पटी पड़ी हैं। दरबे में एक भी मुर्गी नहीं पर बाज़ार में अंडे ही अंडे, वहीं हाल आम का। वैसे इस समस्या प्रधान देश में इस तरह का आश्चर्य चुनाव के दिनों में ही दिखाई देता है जहां चिरई का पूत कहा जाने वाला सिंगल मतदाता भी नहीं होता, वहां भी मतपेटियां मतपत्रों से भरी मिलती हैं। औसत भारतीय पत्नियां आम की ओर फूटी आंखों से भी नहीं देख रही हैं, क्यों देखें ? जब स्वभाविक मचली जैसे संकट के समय आम उनके काम नहीं आया, तो वह संकट मुक्त होने पर आम की ओर बिल्कुल नहीं देखेंगी। वह आभारी हैं इमली की, मचली के दिनों में उनका साथ इमली ने दिया आम ने नहीं।

आम ने सचमुच अपना विश्वास खो दिया है और सुना तो यहां तक गया है कि भीतर-भीतर अविश्वास प्रस्ताव की तैयारी भी फलों में चल रही है। लेकिन होगी वही जो होता आया है, ऐन मौके पर कुछ फल गायब हो जाएंगे या कुछ फल कैद कर लिए जाएंगे और अविश्वास प्रस्ताव पास नहीं होगा। आम फलों का राजा बना रहेगा। आम जब देशी था तब बहुत अच्छा था लेकिन कलमी हुआ है तब से हिलमी और इलमी तो हुआ ही हुआ और जुल्मी भी हुआ है। देशी में ऐसी बनावट नहीं थी तो ऐसी गिरावट भी नहीं थी, कलमी आम नागा बहुत करता है। एक दिन मेहरी न आए तो हाय-तौबा मच जाती है, एक दिन अख़बार न आए तो हाय-तौबा मच जाती है, एक दिन पानी न आए, बिजली न आए तो हाय-तौबा मच जाती है। जबकि आम साल का साल नागा मारता है लेकिन आदमी इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाता। किसी राजा का अपने राज्य से साल साल भर गायब रहना क्या कोई अच्छी बात है। अरे ऐसी हरकत तो उम्मीदवारों को ही शोभा देती है, जो केवल चुनाव में ही दिखाई देते हैं। कुछ परिवारों में आम से कहीं से ज़्यादा महत्व आम की गुठली का होता है शायद इसीलिए कहा गया है कि आम के आम गुठलियों के दाम। सचमुच जिन परिवारों में कुंवारे लड़के-लड़कियां चूसे हुए आम की गुठली उछालकर परस्पर एक-दूसरे के ब्याह की दिशा बताते हैं, वहां आम न होने से इन दिनों शून्य बटा सन्नाटा चल रहा है। मेरे क्रोनिक बैचलर पैसठ वर्षीय मित्र सेठी साहब आम का रोना उतना नहीं रो रहे हैं, जितना रो रहे हैं आम की गुठली का रोना। सेठी साहब, आजकल हर मीटिंग सोसाइटी में दिखाई देते हैं, जहां किसी न किसी बहाने आम की चर्चा की हो रही होती है। भोजपुरी लोकगीतों में एक ऐसा उदाहरण मिलता है जिसमें आम की ताज़ा चूसी गई गुठली से बड़ा महत्वपूर्ण काम लिया गया है। अरे गुठली न सही गुठली की चर्चा ही सही-

‘अमवा त खइला हो, कोसिलिया खींच मरला
दागी नउला दुलहा
हमरी चटकी चुनरिया दागी नउला दुलहा’

दरअसल, तब अमूमन शादियां गर्मियों में ही होती थीं। एक तो मौसम गर्मी का दूसरे शादी की गर्मी। इसीलिए एक-दूसरे को डायरेक्ट छूने में समझदार दंपति हिचकता था। नई नवेली पत्नी को दूल्हा हाथ नहीं लगाता था। पहले वह आम खाता था फिर वह उसकी गुठली से पत्नी को छेड़ता था। आज दूल्हे भी हैं, पत्नियां भी हैं, आम का सीजन भी है, लेकिन नहीं है तो सिर्फ़ आम नहीं है, आम की गुठली नहीं है। वैसे अगर जगह-जगह ‘गुठली मारो’ मेले का आयोजन किया जाए तो निश्चित ही इस मेले से सरकार को करोड़ों का अरबों की आमदनी होगी। भला सोचिए जहां हाल में ब्याहे सैकड़ों हजारों नए जोड़े इकट्ठे किए जाएंगे और हर दूल्हे को दस-दस पके आम दिए जाएंगे कि आम खाये और चूसी हुई गुठली से नई नवेेली पत्नी को गेंद की तरह फेंक कर मारे। मैं सच कहता हूं देखने वालों का तांता लग जाएगा, आम आदमी भले न देख पाए लेकिन ख़ास-ख़ास लोग तो हवाई जहाज या हेलिकप्टर से भागकर आएंगे। मैं एक ऐसा प्रस्ताव भारत सरकार के आमदनी बढ़ाओ विभाग के पास भेजने वाला हूं।

एक आम के चलते न जाने कैसे-कैसे लोग हाई-लाईट हो जाते हैं, अब सरौता को ही देखिए। बड़की भौजी का जो आम फाड़ने वाला बड़का सरौता है ना, उसे इस साल कोई घास नहीं डाल रहा है, वर्ना हर साल बड़की भौजी का सरौता बिजी रहता था। कोई-कोई उसे देखने को तरस जाता था। कभी चैबाइन के पास है, तो कभी ठकुराइन के पास है। इस साल सरौते के लिए बड़की भौजी के यहां कोई झांकने भी नहीं आया। बड़की भौजी रोज़ एक बार अपने सरौत पर हाथ फेरती हैं फिर रख देता हैं- वेट माई डियर सरौता वेड। जब नीके दिन आइहैं बनत न लगिहैं देर। अपना राजपाट फिर लौटेगा प्यारे! तुम्हारी तरह न जाने कितने लोग बदलाव के इंतज़ार में बैठे हुए हैं। इस समय मुझे एक भोजपुरी कहावत याद आ रही है। कहावत इस प्रकार है-

‘झरल आम अब झरल पताई
श्रोवा लइको बप्पा माई’

ऐसी नौबत बस आने ही वाली है। आम भी बस जाने ही वाला है। वैसे इस आम ने इस साल मेरे दफ्तर के रामदास केजुएल को जितना रूलाया, उतना शायद ही किसी को रूलाया हो। रामदास की घरवाली मां होने वाली है। वह बार-बार रामदास से कहती है-हे एक पक्का आम खिला दो वरना पैदा होने वाले बच्चे की जि़न्दगीभर लार गिरेगी। रामदास ने बहुत कहा- तू केला खा ले, संतरा खा ले, जामुन खा ले लेकिन आम का नाम मत ले। इसे सर्वहारा ने हमेशा के लिए त्याग दिया है। यहि तन सती भेंट नाहि। लेकिन रामदास की पत्नी ऐसा ताना दिया कि रामदास तिलमिला उठा- लानत है तुम्हारे जैसे पति पर, अरे उन्हें देखों जिन्होंने अपनी जगह अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बना दिया और एक तुम हो, एक पका आम भी नहीं खिला सकते अपनी पत्नी को। ब्याह करना अच्छा लगा अब दोहद खिलाने में..... आगे की बात रामदास नहीं सुन सका और बिना साइकिल उठाए घबराहट में पैदल ही केजुएल होने चला गया। दफ्तर में पहले से रामदास केजुएल की ढुढाई मची थी। दरअसल यह हुआ कि बड़े साहब की बीवी ने बड़े साहब से कहा कि दो किलो आम लेते आइएगा। बड़े साहब ने दफ्तर पहुंचकर बड़े बाबू से कहा कि बड़े बाबू यार दो किलो आम मंगवा दीजिए। आम बिना आम के घर में घुस नहीं पाउंगा और तब से बड़े बाबू रामदास केजुएल को तलाश रहे हैं। सहसा, रामदास केजुएल टकरा ही गया। बड़े बाबू स्वयं इतने परेशानी में थे कि रामदास केजुएल के नमस्ते का जवाब भी नहीं दिया और अपनी बात करने लगे। रामदास रामदास सुन सुन एक महीने के लिए और दफ्तर में रखने के लिए बड़े साहब राज़ी हो गए हैं। समझे रामदास, बड़े बाबू को धन्यवाद देने लगा, लेकिन बड़े बाबू उसका धन्यवाद सुनें तब न! वो तो अपना आम राग अलापे जा रहे हैं। जाओ जल्दी से पांच किलो दशहरी ले आओ। बड़े साहब का हुकुम है। मरता क्या न करता रामदास केजुएल, जुगाड़ करके जैसे-तैसे दशहरी ले आता है, जिसमें साठ प्रतिशत बड़े बाबू अपने झोले में डाल लेते हैं और चालीस प्रतिशत साहब के पास भेजवा देते हैं।

दिनभर का थका-हारा रामदास केजुएल शाम को जब घर पहुंचता है तो जेब एक आम निकालता है और घरवाली के सामने रखकर हंसने लगता है। उसकी घरवाली लपकरक आम उठाती है और मुंह में दबा लेती है, यह देखकर रामदास और जोर से हंसता है, उसकी घरवाली आम को हाथ में लेकर गौर से देखने लगती है, फिर पूछती है कि यह क्या, इसमें न रस है, न गूदा, न छिलका। रामदास केजुलए की आंखें भर आती हैं- मेरी जान! अगर द्रोणाचार्य की पत्नी चावल का घोल दूध बताकर अपने बच्चे को पिला सकती है तो तुम भी यह प्लास्टिक का नकली आम दिखाकर अपने होने वाले बच्चे को पाल सकती हो। असली आम तो केवल मौसम भर साथ देता है पगली! यह बारहों महीने साथ देगा, बस इसे आग से बचाकर रखना। यह आम खेलने के लिए है खाने के लिए नहीं।

-कैलाश गौतम

मंगलवार, 5 जून 2012

पाठ्यक्रमों से परे पर्यावरण को रोज के व्यवहार से जोड़ने की जरुरत

मानव सभ्यता के आरंभ से ही प्रकृति के आगोश में पला और पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति सचेत रहा। पर जैसे-जैसे विकास के सोपानों को मानव पार करता गया, प्रकृति का दोहन व पर्यावरण से खिलवाड़ रोजमर्रा की चीज हो गई. ऐसे में आज समग्र विश्व में पर्यावरण चर्चा व चिंता का विषय बना हुआ है। इसके प्रति चेतना जागृत करने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्रसंघ के तत्वावधान में हर वर्ष 5 जून को 'विश्व पर्यावरण दिवस' का आयोजन वर्ष 1972 से आरम्भ किया गया। इसका प्रमुख उद्देश्य पर्यावरण के प्रति राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक जागरूकता लाते हुए सभी को इसके प्रति सचेत व शिक्षित करना एवं पर्यावरण-संरक्षण के प्रति प्रेरित करना है. प्रकृति और पर्यावरण, हम सभी को बहुत कुछ देते हैं, पर बदले में कभी कुछ माँगते नहीं। पर हम इसी का नाजायज फायदा उठाते हैं और उनका ही शोषण करने लगते हैं। हमें हर किसी के बारे में सोचने की फुर्सत है, पर प्रकृति और पर्यावरण के बारे में नहीं. यदि पर्यावरण इसी तरह प्रदूषित होता रहे तो क्या होगा... कुछ नहीं। ना हम, ना आप और ना ये सृष्टि. पर इसके बावजूद रोज प्रकृति व पर्यावरण से खिलवाड़ किये जा रहे हैं. हम नित धरती माँ को अनावृत्त किये जा रहे हैं. जिन वृक्षों को उनका आभूषण माना जाता है, उनका खात्मा किये जा रहे हैं. विकास की इस अंधी दौड़ के पीछे धरती के संसाधनों का जमकर दोहन किये जा रहे हैं. वाकई विकास व प्रगति के नाम पर जिस तरह से हमारे वातावरण को हानि पहुँचाई जा रही है, वह बेहद शर्मनाक है. हम सभ्यता का गला घोंट रहें हैं. हम जिस धरती की छाती पर बैठकर इस प्रगति व लम्बे-लम्बे विकास की बातें करते हैं, उसी छाती को रोज घायल किये जा रहे हैं. पृथ्वी, पर्यावरण, पेड़-पौधे हमारे लिए दिनचर्या नहीं अपितु पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनकर रह गए हैं. वास्तव में देखा जाय तो पर्यावरण शुद्ध रहेगा तो आचरण भी शुद्ध रहेगा. लोग निरोगी होंगे और औसत आयु भी बढ़ेगी. पर्यावरण-रक्षा कार्य नहीं, बल्कि धर्म है.


सौभाग्य से आज विश्व पर्यावरण दिवस है। लम्बे-लम्बे भाषण, दफ्ती पर स्लोगन लेकर चलते बच्चे, पौधारोपण के कुछ सरकारी कार्यक्रम....शायद कल के अख़बारों में पर्यावरण दिवस को लेकर यही कुछ दिखेगा और फिर हम भूल जायेंगे. हम कभी साँस लेना नहीं भूलते, पर स्वच्छ वायु के संवाहक वृक्षों को जरुर भूल गए हैं। यही कारण है की नित नई-नई बीमारियाँ जन्म ले रही हैं. इन बीमारियों पर हम लाखों खर्च कर डालते हैं, पर अपने पर्यावरण को स्वस्थ व स्वच्छ रखने के लिए पाई तक नहीं खर्च करते.


एक दिन मेरी बिटिया अक्षिता बता रही थी कि पापा, आज स्कूल में टीचर ने बताया कि हमें अपने पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए। पहले तो पेड़ काटो नहीं और यदि काटना ही पड़े तो एक की जगह दो पेड़ लगाना चाहिए। पेड़-पौधे धरा के आभूषण हैं, उनसे ही पृथ्वी की शोभा बढती है और पर्यावरण स्वच्छ रहता है। पहले जंगल होते थे तो खूब हरियाली होती, बारिश होती और सुन्दर लगता पर अब जल्दी बारिश भी नहीं होती, खूब गर्मी भी पड़ती है...लगता है भगवान जी नाराज हो गए हैं. इसलिए आज सभी लोग संकल्प लेंगें कि कभी भी किसी पेड़-पौधे को नुकसान नहीं पहुँचायेंगे, पर्यावरण की रक्षा करेंगे, अपने चारों तरफ खूब सारे पौधे लगायेंगे और उनकी नियमित देख-रेख भी करेंगे. अक्षिता के नन्हें मुँह से कही गई ये बातें मुझे देर तक झकझोरती रहीं। आखिर हम बच्चों में प्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा के संस्कार क्यों नहीं पैदा करते. मात्र स्लोगन लिखी तख्तियाँ पकड़ाने से पर्यावरण का उद्धार संभव नहीं है. इस ओर सभी को तन-मन-धन से जुड़ना होगा. अन्यथा हम रोज उन अफवाहों से डरते रहेंगे कि पृथ्वी पर अब प्रलय आने वाली है. पता नहीं इस प्रलय के क्या मायने हैं, पर कभी ग्लोबल वार्मिंग, कभी सुनामी, कभी कैटरीना व आईला चक्रवात तो कभी बाढ़, सूखा, भूकंप, आगजनी और अकाल मौत की घटनाएँ ॥क्या ये प्रलय नहीं है? गौर कीजिये इस बार तो चिलचिलाती ठण्ड के तुरंत बाद ही चिलचिलाती गर्मी आ गई, हेमंत, शिशिर, बसंत का कोई लक्षण ही नहीं दिखा..क्या ये प्रलय नहीं है. अभी भी वक़्त है, हम चेतें अन्यथा प्रकृति कब तक अनावृत्त होकर हमारे अनाचार सहती रहेंगीं. जिस प्रलय का इंतजार हम कर रहे हैं, वह इक दिन इतने चुपके से आयेगी कि हमें सोचने का मौका भी नहीं मिलेगा.


ऐसे में जरुरत हें कि हम खुद ही चेतें और प्रकृति व पर्यावरण के संरक्षण को मात्र पाठ्यक्रमों व कार्यक्रमों की बजाय अपने दैनिंदिन व्यवहार का हिस्सा बनायें. आज पर्यावरण के प्रति लोगों को सचेत करने के लिए सामूहिक जनभागीदारी द्वारा भी तमाम कदम उठाये जा रहे हैं. मसलन, फूलों को तोड़कर उपहार में बुके देने की बजाय गमले में लगे पौधे भेंट किये जाएँ. स्कूल में बच्चों को पुरस्कार के रूप में पौधे देकर, उनके अन्दर बचपन से ही पर्यावरण संरक्षण का बोध कराया जा सकता है. जीवन के यादगार दिनों मसलन- जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगाँठ या अन्य किसी शुभ कार्य की स्मृतियों को सहेजने के लिए पौधे लगायें और उनका पोषण करें. री-सायकलिंग द्वारा पानी की बर्बादी रोकें और टॉयलेट इत्यादि में इनका उपयोग करें. पानी और बिजली का अपव्यय रोकें. फ्लश का इस्तेमाल कम से कम करें. शानो-शौकत में बिजली की खपत को स्वत: रोकें. सूखे वृक्षों को भी तभी काटा जाय, जब उनकी जगह कम से कम दो नए पौधे लगाने का प्रण लिया जाय. अपनी वंशावली को सुरक्षित रखने हेतु ऐसे बगीचे तैयार किये जा सकते हैं, जहाँ हर पीढ़ी द्वारा लगाये गए पौधे मौजूद हों. यह मजेदार भी होगा और पर्यावरण को सुरक्षित रखने की दिशा में एक नेक कदम भी. हमारे पूर्वजों ने यूँ ही नहीं कहा है कि- 'एक वृक्ष - दस पुत्र सामान.'

शनिवार, 2 जून 2012

लीजिये हम भी डाक-टिकट पर आ गए...


भारतीय डाक विभाग डाक-टिकटों के क्षेत्र में नित नए और अनूठे प्रयोग कर रहा है. पिछले वर्षों में जहाँ चन्दन, गुलाब व जूही की सुगंध से सुवासित खुशबूदार डाक-टिकट और हालमार्क के साथ मिलकर सोने के डाक टिकट जारी किये गए, वहीँ अब 'माई स्टांप' या 'पर्सनालाईजड स्टैम्प' के साथ डाक-टिकट पर कोई व्यक्ति अपनी भी तस्वीर लगा सकता है. फ़िलहाल ये 17 डाक-टिकटों के साथ उपलब्ध हैं. इनमें ताजमहल, पंचतंत्र, एयरो फ्लाईट, स्टीम इंजन, वाइल्ड लाइफ डाक-टिकटों के साथ 12 राशियों के डाक टिकट भी उपलब्ध हैं.

दुनिया के कई देशों में 'माई स्टाम्प' सुविधा पहले से ही लागू है, पर भारत में पहली बार इसे भारतीय डाक विभाग द्वारा वर्ष 2000 में कोलकाता में 'इंदिपेक्स एशियाना' के आयोजन के दौरान जारी किया गया था. पर उस समय यह उतनी लोकप्रिय न हो सकी. पिछले वर्ष नई दिल्ली में विश्व डाक टिकट प्रदर्शनी (12-18 फरवरी 2011 ) के आयोजन के दौरान इसे पुन: लांच किया गया और लोगों ने इसे हाथों-हाथ लिया. नतीजन देखते ही देखते हजारों लोगों ने डाक टिकटों के साथ अपनी तस्वीर लगाकर इसका लुत्फ़ उठाया. उत्तर प्रदेश में 17 -19 दिसंबर, 2011 के दौरान लखनऊ में आयोजित राज्य स्तरीय डाक टिकट प्रदर्शनी में इसे जारी किया गया और अभी तक अकेले उत्तर प्रदेश में लगभग 5000 लोग इसे जारी करा चुके हैं, जिनमें से अधिकतर लोगों ने ताजमहल के साथ अपनी तस्वीर लगवानी पसंद की.

इस सेवा का लाभ उठाने के लिए अपने शहर में स्थित फिलाटेलिक ब्यूरो में पंजीकरण कराना होता है. एक फार्म भरकर उसके साथ अपनी फोटो और 300 /-जमा करने होते हैं. एक शीट में कुल 12 डाक-टिकटों के साथ फोटो लगाई जा सकती है. इसके लिए आप अपनी अच्छी तस्वीर डाक विभाग को दे सकते हैं, जो उसे स्कैन करके आपका खूबसूरत 'माई स्टांप' बना देगा. यदि कोई तत्काल भी फोटो खिंचवाना चाहे तो उसके लिए भी प्रबंध किया गया है. 'माई स्टैम्प' को ही 'पर्सनालाईजड स्टैम्प' भी कहा जाता है. इस पर सिर्फ जीवित व्यक्तियों की ही तस्वीर लगाई जा सकती है. सम्बंधित व्यक्ति को फिलाटेलिक ब्यूरो में व्यक्तिगत रूप से जाना पड़ता है, यदि किसी कारणवश न जा सके तो सम्बंधित संदेशवाहक से अपना फोटो युक्त परिचय पत्र भेजना पड़ता है.

तो अब देर किस बात की, किसी को उपहार देने का इससे नायब तरीका शायद ही हो. इसके लिए जेब भी ज्यादा नहीं ढीली करनी पड़ेगी, मात्र 300 रूपये में 12 डाक-टिकटों के साथ आपकी खूबसूरत तस्वीर. अब आप इसे चाहें अपने परिवारजनों को दें, मित्रों को या फिर अपने प्रेमी-प्रेमिका को. डाक-टिकट पर आप अपनों की तस्वीर भी छपवा कर उसे भेज सकते हैं. मतलब, आप किसी से बेशुमार प्यार करते हैं, तो इस प्यार को बेशुमार दिखाने का भी मौका है. पांच रुपए के डाक-टिकट, जिस पर आपकी तस्वीर होगी, वह देशभर में कहीं भी भेजी जा सकती है.

'माई स्टाम्प' पर सिर्फ आप अपनी तस्वीर ही नहीं देखते, बल्कि वक़्त की नजाकत के अनुसार इसे विभिन्न डाक-टिकटों के साथ देख सकते हैं. मसलन, प्रेम को दर्शाने के लिए ताजमहल, बच्चों के लिए पञ्चतंत्र, एडवेंचर के लिए वाइल्ड लाइफ से जुड़ा डाक टिकट या फिर एयरो फ्लाईट और स्टीम इंजन. यही नहीं अपनी राशि के अनुरूप भी डाक-टिकट पसंद कर उस पर अपनी फोटो लगवा सकते हैं!!

(चित्र में : माई स्टैम्प के तहत ताजमहल के साथ कृष्ण कुमार यादव की तस्वीर)


- कृष्ण कुमार यादव
निदेशक डाक सेवाएँ, इलाहबाद परिक्षेत्र, इलाहबाद-211001

सोमवार, 28 मई 2012

बेहतर संभावनाएं ब्लागिंग में...


'डेली न्यूज एक्टिविस्ट' अख़बार के 22 मई, 2012 अंक में ब्लागिंग पर मेरा एक साक्षात्कार प्रकाशित हुआ है. यह साक्षात्कार हिमांशु पाण्डेय द्वारा लिया गया था. आप भी इसे क्लिक करके पूरा पढ़ सकते हैं !!

रविवार, 13 मई 2012

माँ...



मेरा प्यारा सा बच्चा
गोद में भर लेती है बच्चे को
चेहरे पर नजर न लगे
माथे पर काजल का टीका लगाती है
कोई बुरी आत्मा न छू सके
बाँहों में ताबीज बाँध देती है।

बच्चा स्कूल जाने लगा है
सुबह से ही माँ जुट जाती है
चैके-बर्तन में
कहीं बेटा भूखा न चला जाये।
लड़कर आता है पड़ोसियों के बच्चों से
माँ के आँचल में छुप जाता है
अब उसे कुछ नहीं हो सकता।

बच्चा बड़ा होता जाता है
माँ मन्नतें माँगती है
देवी-देवताओं से
बेटे के सुनहरे भविष्य की खातिर
बेटा कामयाबी पाता है
माँ भर लेती है उसे बाँहों में
अब बेटा नजरों से दूर हो जायेगा।

फिर एक दिन आता है
शहनाईयाँ गूँज उठती हैं
माँ के कदम आज जमीं पर नहीं
कभी इधर दौड़ती है, कभी उधर
बहू के कदमों का इंतजार है उसे
आशीर्वाद देती है दोनों को
एक नई जिन्दगी की शुरूआत के लिए।

माँ सिखाती है बहू को
परिवार की परम्परायें व संस्कार
बेटे का हाथ बहू के हाथों में रख
बोलती है
बहुत नाजों से पाला है इसे
अब तुम्हें ही देखना है।

माँ की खुशी भरी आँखों से
आँसू की एक गरम बूँद
गिरती है बहू की हथेली पर।

शनिवार, 5 मई 2012

पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह ने किया कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रहों का विमोचन

युगल दंपत्ति एवं चर्चित साहित्यकार व ब्लागर कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रह 'जंगल में क्रिकेट' एवं 'चाँद पर पानी' का विमोचन पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह और डा. रत्नाकर पाण्डेय (पूर्व सांसद) ने राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास एवं भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद्, नई दिल्ली द्वारा गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में 27 अप्रैल, 2012 को किया. उद्योग नगर प्रकाशन, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित इन दोनों बाल-गीत संग्रहों में कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के 30 -30 बाल-गीत संगृहीत हैं.
इस अवसर पर दोनों संग्रहों का विमोचन करते हुए अपने उद्बोधन में पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह ने युगल दम्पति की हिंदी साहित्य के प्रति समर्पण की सराहना की. उन्होंने कहा कि बाल-साहित्य बच्चों में स्वस्थ संस्कार रोपता है, अत: इसे बढ़ावा दिए जाने क़ी जरुरत है. पूर्व सांसद डा. रत्नाकर पाण्डेय ने युवा पीढ़ी में साहित्य के प्रति बढती अरुचि पर चिंता जताते हुए कहा कि, यह प्रसन्नता का विषय है कि भारतीय डाक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी होते हुए भी श्री यादव अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं और यह बात उनकी कविताओं में भी झलकती है. युगल दम्पति के बाल-गीत संग्रह क़ी प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें आज का बचपन है और बीते कल का भी और यही बात इन संग्रह को महत्वपूर्ण बनाती है.
कार्यक्रम में राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास के संयोजक डा. उमाशंकर मिश्र ने कहा कि यदि युगल दंपत्ति आज यहाँ उपस्थित रहते तो कार्यक्रम कि रौनक और भी बढ़ जाती. गौरतलब है कि अपनी पूर्व व्यस्तताओं के चलते यादव दंपत्ति इस कार्यक्रम में शरीक न हो सके. आभार ज्ञापन उद्योग नगर प्रकाशन के विकास मिश्र द्वारा किया गया. इस कार्यक्रम में तमाम साहित्यकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार इत्यादि उपस्थित थे.

- रत्नेश कुमार मौर्या, संयोजक- 'शब्द-साहित्य', इलाहाबाद.


सोमवार, 23 अप्रैल 2012

ज्ञानदायिनी प्यारी पुस्तक




प्यारी पुस्तक, न्यारी पुस्तक

ज्ञानदायिनी प्यारी पुस्तक

कला-संस्कृति, लोकजीवन की

कहती है कहानी पुस्तक।


अच्छी-अच्छी बात बताती

संस्कारों का पाठ पढ़ाती

मान और सम्मान बड़ों का

सुन्दर सीख सिखाती पुस्तक।


सीधी-सच्ची राह दिखाती

ज्ञान पथ पर है ले जाती

कर्म और कर्तव्य हमारे

सद्गुण हमें सिखाती पुस्तक।

("विश्व पुस्तक दिवस" पर यह बाल कविता)

-- कृष्ण कुमार यादव--

रविवार, 25 मार्च 2012

आज हमारी बिटिया अक्षिता (पाखी) का जन्म-दिवस है..

. आज 25 मार्च को पाखी का जन्म-दिवस है। इस दिन का हम बेसब्री से इंतजार करते हैं, और वो खुशनसीब दिन आज है. पाखी को जन्म-दिवस की ढेर सारी बधाई, आशीष और प्यार. वह यूँ ही हँसती-खिलखिलाती रहे और हमारे दामन में खुशियाँ भरती रहे !!
पाखी को जन्म-दिवस की ढेर सारी बधाई, आशीष और प्यार. वह यूँ ही हँसती-खिलखिलाती रहे और हमारे दामन में खुशियाँ भरती रहे !!

गुरुवार, 22 मार्च 2012

नया जीवन


टकटकी बाँधकर देखती है
जैसे कुछ कहना हो
और फुर्र हो जाती है तुरन्त
फिर लौटती है
चोंच में तिनके लिए
अब तो कदमों के पास
आकर बैठने लगी है
आज उसके घोंसले में दिखे
दो छोटे-छोटे अंडे
कुर्सी पर बैठा रहता हूँ
पता नहीं कहाँ से आकर
कुर्सी के हत्थे पर बैठ जाती है
शायद कुछ कहना चाहती है
फिर फुर्र से उड़कर
घोंसले में चली जाती है
सुबह नींद खुलती है
चूँ...चूँ ...चूँ..... की आवाज
यानी दो नये जीवनों का आरंभ
खिड़कियाँ खोलता हूँ
उसकी चमक भरी आँखों से
आँखें टकराती हैं
फिर चूँ....चूँ....चूँ....।

गुरुवार, 8 मार्च 2012

फागुनी फिजाओं में रामलीला का उत्सव

भारत में त्यौहारों का संबंध विभिन्न प्रसंगों से जोड़ा जाता है। हर त्यौहार के पीछे मिथक व मान्यताएं होती हैं, पर कई बार ये त्यौहार आपस में इतने जुड़ जाते हैं कि वे उत्सवी परंपरा के ही अभिन्न अंग लगने लगते हैं। मसलन, फागुन में जब रंगों की फुहारें भगवान श्री कृष्ण के बरसाने के होली उत्सव की याद दिलाती हैं तो रामलीला का आयोजन कुछ अजीब लगता है, लेकिन बरेली शहर में होली के रंगो में भगवान राम के आदर्श भी गूंजते हैं। 150 से भी अधिक साल से यहाँ फागुन में वमनपुरी की रामलीला होती आ रही है। संभवतः देश में यह अकेला ऐसी रामलीला है जो होली के उपलक्ष्य में होती है।

इस रामलीला की अपनी दीर्घ ऐतिहासिक परंपरा है। वमनपुरी की यह रामलीला 1861 में शुरु हुई थी। तब इस क्षेत्र के उत्साही बच्चे टीन-गत्ते आदि के मुकुट और बालों की दाढ़ी-मूँछ लगाकर रामलीला का मंचन करते थे। पात्रों का श्रृंगार राजसी शैली में प्राकृतिक रंगो और सितारों से होता था। ये रामलीलाएं वमनपुरी और उसके आसपास के मोहल्लों की गलियों-चैराहों पर होती थीं। उन्हीं परंपराओं के तहत आज भी रामलीला के कई प्रसंगों का मंचन वमनपुरी व आसपास के मोहल्लों की गलियों में होता है। ‘शबरी लीला’ चटोरी गली में होती है। वमनपुरी में रामलीला का मुख्य मंचन श्री नृसिंह मंदिर में होता है। इस रामलीला को नया स्वरूप मिला 1888-89 में, जब उस समय के प्रतिष्ठित एवं गणमान्य हकीम कन्हैया लाल, गोपेश्वर बाबू, जगन रस्तोगी, पंडित जंगबहादुर, बेनी माधव, लाला बिहारी लाल, पंडित राधेश्याम कथावाचक एवं मिर्जा जी रामलीला का मंचन कराने लगे। पंडित रघुवर दयाल और पंडित रज्जन गुरु भी चैपाइयों का वाचन करते थे। सन् 1935-38 के बीच शहरवासियों ने रामलीला के लिए खुले हाथ से सहयोग देना प्रारंभ कर दिया। 1949 में साहूकारा के शिवचरन लाल ने राम एवं केवट संवाद को सजीव बनाने के लिए लकड़ी की नाव बनवाकर रामलीला सभा को भेंट की थी। तब से ही भगवान राम- केवट संवाद का मंचन इसी नाव के जरिए साहूकारा स्थित भैरो मंदिर में होता है।


यहाँ चैत्र कृष्ण एकादशी पर रामलीला का मंचन शुरु हो जाता है और धुलंडी के दिन तक रोज विभिन्न प्रसंगों का मंचन होता है। रामलीला का समापन नृसिंह भगवान की शोभा यात्रा के साथ होता है। होली के दिन रामलीला से निकलने वाली राम बारात शहर में अनूठे रंग बिखेरती है। इसमें सौहार्द के फूल बरसते हैं। हिन्दू हो या मुस्लिम सभी पुष्पवर्षा कर राम बारात का स्वागत करते हैं। फागुनी फिजाओं में रामलीला का यह उत्सव वाकई अद्भुत है।

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

प्रेम


प्रेम एक भावना है
समर्पण है, त्याग है
प्रेम एक संयोग है
तो वियोग भी है
किसने जाना प्रेम का मर्म
दूषित कर दिया लोगों ने
प्रेम की पवित्र भावना को
कभी उसे वासना से जोड़ा
तो कभी सिर्फ उसे पाने से
भूल गये वे कि प्यार सिर्फ
पाना ही नहीं खोना भी है
कृष्ण तो भगवान थे
पर वे भी न पा सके राधा को
फिर भी हम पूजते हैं उन्हें
पतंगा बार-बार जलता है
दीये के पास जाकर
फिर भी वो जाता है
क्योंकि प्यार
मर-मिटना भी सिखाता !!

शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

डाकिया बाबू के लिए...

(दुनिया में हर काम की अपनी महत्ता है. इसी नजरिये से पश्चिमी देशों में हर दिन को किसी न किसी रिश्ते या कार्य से जोड़ दिया गया है. अमेरिका सहित तमाम देशों में 4 फरवरी को Thanks a Mailperson Day के रूप में मनाया जाता है. आखिर अमेरिका के राष्ट्रपति रहे अब्राहम लिंकन पोस्टमैन तो भारत में पदस्थ वायसराय लार्ड रीडिंग डाक वाहक रहे।

भारत में अभी इसका उतना प्रचलन नहीं है, पर वक़्त के साथ यह दिन भी यहाँ दस्तक देता नजर आयेगा. आखिर मेल-पर्सन यानी डाकिया बाबू को भला कौन भुला सकता है. वरिष्ठ साहित्यकार पद्मश्री गिरिराज किशोर ने एक बार मुझसे कहा था कि चिट्ठियों और साहित्य का गहरा अंतर्संबंध है. आखिर दोनों का ही नाता संवेदनाओं से है. वैसे भी जो इंतजार डाकिया के इंतजार में था, वह अब कहाँ रहा ? कानपुर में रह रहे चर्चित बाल साहित्यकार डा. राष्ट्रबंधु तो बाकायदा कानपुर जी. पी. ओ. में डाकिया रह चुके हैं.)


पिछले दिनों आफिस में बैठकर कुछ जरूरी फाइलें निपटा रहा था, तभी एक बुजुर्गवार व्यक्ति ने अन्दर आने की इजाजत मांगी। वे अपने क्षेत्र के डाकिये की शिकायत करने आये थे कि न तो उसे बड़े छोटे की समझ है एवं न ही वह समय से डाक पहुंचाता है। बात करते-करते वे अतीत के दिनों में पहुंच गये और बोले-साहब! हमारे जमाने के डाकिये बहुत समझदार हुआ करते थे। हमारा उनसे अपनापन का नाता था। इससे पहले कि हम अपना पत्र खोलें वे लिखावट देखकर बता दिया करते थे-अच्छा! राकेश बाबू (हमारे सुपुत्र) का पत्र आया है, सब ठीक तो है न। वे सज्जन बताने लगे कि जब हमारे पुत्र का नौकरी हेतु चयन हुआ तो डाकिया बाबू नियुक्ति पत्र लेकर आये और मुझे आवाज लगाई। मेरी अनुपस्थिति में मेरी श्रीमती जी बाहर्र आइं व पत्र को खोलकर देखा तो झूम उठीं। डाकिया बाबू ने पूछा- अरे भाभी, क्या बात है, कुछ हमें भी तो बताओ। श्रीमती जी ने जवाब दिया कि आपका भतीजा साहब बन गया है।

शाम को मैं लौटकर घर आया तो पत्नी ने मुझे भी खुशखबरी सुनाई और पल्लू से पैसे निकालते हुए कहा कि जाइये अभी डाकिया बाबू को एक किलो मोतीचूर लड्डू पहुंचा आइये। मैंने तुरंत साइकिल उठायी और लड्डू खरीद कर डाकिया बाबू के घर पहुंचा। उस समय वे रात्रि के खाने की तैयारी कर रहे थे। मुझे देखते ही उन्होंने गले लगकर बेटे के चयन की बधाई दी और जवाब में मैंने लड्डू का पैकेट उनके हाथों में रख दिया। डाकिया बाबू बोले- ‘‘अरे ये क्या कर रहे हैं आप? चिट्ठियां बांटना तो मेरा काम है। किसी को सुख बांटता हूँ तो किसी को दुःख।‘‘ मैंने कहा नहीं साहब, आप तो हमारे घर हमारा सौभाग्य लेकर आये थे, अतः आपको ये मिठाई स्वीकारनी ही पड़ेगी।

ये बताते-बताते उन बुजुर्ग की आंखों से आँसू झलक पड़े। और बोले, साहब! जब मेरे बेटे की शादी हुई तो डाकिया बाबू रोज सुबह मेरे घर पर आते और पूछ जाते कि कोई सामान तो बाजार से नहीं मंगवाना है। इसके बाद वे अपने वर्तमान डाकिया के बारे में बताने लगे, साहब! उसे तो बात करने की भी तमीज नही। डाक सीढ़ियों पर ही फेंककर चला जाता है। पिछले दिनों मेरे नाम एक रजिस्ट्री पत्र आया। घर में मात्र मेरी बहू थी। उसने कहा बाबू जी तो घर पर नहीं हैं, लाइये मुझे ही दे दीजिए। जवाब में उसने तुनक कर कहा जब वह आ जाएं तो बोलना कि डाकखाने से आकर पत्र ले जाएं।

मैं उस बुजुर्ग व्यक्ति की बात ध्यान से सुन रहा था और मेरे दिमाग में भी डाकिया के कई रूप कौंध रहे थे। कभी मुझे एक प्रतिष्ठित साहित्यकार की कहानी का वह अंश याद आता, जिसमें डाकिये ने एक व्यक्ति को उसके रिश्तेदार की मौत की सूचना वाला पत्र इसलिए मात्र नहीं दिया, क्योंकि इस दुःखद समाचार से उस व्यक्ति की बेटी की शादी टल सकती थी, जो कि बड़ी मुश्किलों के बाद तय हुई थी। तो कभी विदेश से लौटकर आये एक व्यक्ति की बात कानों में गूँजती कि- कम से कम भारत में अपने यहाँ डाकिया हरेक दरवाजे पर जाता तो है। तो कभी अपने गाँव का वह डाकिया आता, जिसकी शक्ल सिर्फ वही लोग पहचानते थे जो कभी बाजार गये हों। क्योंकि वह डाकिया पत्र-वितरण हेतु कभी गाँव में आता ही नहीं था। हर बाजार के दिन वह खाट लगाकर एक निश्चित दुकान के सामने बैठ जाता और सभी पत्रों को खाट पर सजा देता। गाँव वाले हाथ बांधे खड़े इन्तजार करते कि कब उनका नाम पुकारा जायेगा। जो लोग बाजार नहीं आते, उनके पत्र पड़ोसियों को सौंप दिये जाते। तो कभी एक महिला डाकिया का चेहरा सामने आता जिसने कई दिन की डाक इकट्ठा हो जाने पर उसे रद्दी वाले को बेच दी। या फिर इलाहाबाद में पुलिस महानिरीक्षक रहे एक आई.पी.एस. अधिकारी की पत्नी को जब डाकिये ने उनके बेटे की नियुक्ति का पत्र दिखाया तो वह इतनी भावविह्नल हो गईं कि उन्होंने नियुक्ति पत्र लेने हेतु अपना आंचल ही फैला दिया, मानो मुट्ठी में वो खुशखबरी नहीं संभल सकती थी।

मैं इस तथ्य का प्रतिपादन नहीं करना चाहता कि हर डाकिया बुरा ही होता है या अच्छा ही होता है। पर यह सच है कि ‘‘डाकिया‘‘ भारतीय सामाजिक जीवन की एक आधारभूत कड़ी है। डाकिया द्वारा डाक लाना, पत्रों का बेसब्री से इंतजार, डाकिया से ही पत्र पढ़वाकर उसका जवाब लिखवाना इत्यादि तमाम महत्वपूर्ण पहलू हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आप डाकिये के रहन-सहन, वेश-भूषा एवं वेतन पर मत जाइये, क्योंकि उसके परिचित सभी तबके के लोग हैं। कभी-कभी जो काम बड़े अधिकारी भी नहीं करा पाते वह डाकिया चंद मिनटों में करा देता है। कारण डाक विभाग का वह सबसे मुखर चेहरा है। जहाँ कई अन्य देशों ने होम-टू-होम डिलीवरी को खत्म करने की तरफ कदम बढ़ाये हैं, या इसे सुविधा-शुल्क से जोड़ दिया है, वहीं भारतीय डाकिया आज भी देश के हर होने में स्थित गाँव में निःशुल्क अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है।

जैसे-जैसे व्यक्तिगत एवं सामाजिक रिश्तों में आत्मीयता व भावनात्मकता कम होती गयी, वैसे-वैसे ही डाकिया का दृष्टिकोण भी भावनात्मक की बजाय व्यवसायिक होता गया। कल तक लोग थके-हारे धूप, सर्दी व बरसात में चले आ रहे डाकिये को कम से कम एक गिलास पानी तो पूछते थे, पर आज की पीढ़ी डाकिये को एक हरकारा मात्र समझकर पत्र लेने के तत्काल बाद दरवाजा धड़ाम से बन्द कर कर लेती है, फिर भावनात्मकता व आत्मीयता कहाँ? कहां गया वह अपनापन जब डाकिया चीजों को ढोने वाला हरकारा मात्र न मानकर एक ही थैले में सुख और दुःख दोनों को बांटने वाला दूत समझा जाता था?

वे बुजुर्ग व्यक्ति मेरे पास लम्बे समय तक बैठकर अपनी व्यथा सुनाते रहे और मैंने उनकी शिकायत के निवारण का भरोसा भी दिलाया, पर तब तक मेरा मनोमस्तिष्क ऊपर व्यक्त की गई भावनाओं में विचरण कर चुका था।

(यह आलेख मैंने गुजरात के सूरत मंडल में वरिष्ठ डाक अधीक्षक रहते हुए प्राप्त अनुभवों के आधार पर लिखा था-कृष्ण कुमार यादव )

सोमवार, 30 जनवरी 2012

गाँधी जी जैसे इतिहास पुरूष...










गाँधी जी जैसे इतिहास पुरूष
इतिहास में कब ढल पाते हैं
बौनी पड़ जाती सभी उपमायें
शब्द भी कम पड़ जाते हैं ।

सत्य-अहिंसा की लाठी
जिस ओर मुड़ जाती थी
स्वातंत्रय समर के ओज गीत
गली-गली सुनाई देती थी।

बैरिस्टरी का त्याग किया
लिया स्वतंत्रता का संकल्प
बन त्यागी, तपस्वी, सन्यासी
गाए भारत माता का जप।

चरखा चलाए, धोती पहने
अंग्रेजों को था ललकारा
देश की आजादी की खातिर
तन-मन-धन सब कुछ वारा।

हो दृढ़ प्रतिज्ञ, संग ले सबको
आगे कदम बढ़ाते जाते
गाँधी जी के दिखाये पथ पर
बलिदानी के रज चढ़ते जाते।

हाड़-माँस का वह मनस्वी
युग-दृष्टा का था अवतार
आलोक पुंज बनकर दिखाया
आजादी का तारणहार।

भारत को आजाद कराया
दुनिया में मिला सम्मान
हिंसा पर अहिंसा की विजय
स्वातंत्रय प्रेम का गायें गान।

( - कृष्ण कुमार यादव : महात्मा गाँधी जी की पुण्य तिथि पर सादर श्रद्धांजलिस्वरूप यह कविता...)

गुरुवार, 26 जनवरी 2012

आन-बान से लहराता


तीन रंगों का प्यारा झण्डा
राष्ट्रीय ध्वज है कहलाता
केसरिया, सफेद और हरा
आन-बान से यह लहराता

चौबीस तीलियों से बना चक्र
प्रगति की राह है दिखाता
समृद्धि और विकास के सपने
ले ऊँचे नभ में सदा फहराता

अमर शहीदों की वीरता और
बलिदान की याद दिलाता
कैसे स्वयं को किया समर्पित
इसकी झलक दिखलाता

आओ हम यह खायें कसम
शान न होगी इसकी कम
वीरों के बलिदानों को
व्यर्थ न जानें देंगे हम।

कृष्ण कुमार यादव

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

आकांक्षा यादव को मानद डाक्टरेट की उपाधि

विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार के सोलहवें महाधिवेशन (13-14 दिसंबर, 2011)में युवा कवयित्री, साहित्यकार एवं चर्चित ब्लागर आकांक्षा यादव को मानद डाक्टरेट (विद्यावाचस्पति) की उपाधि से विभूषित किया गया। आकांक्षा यादव को मानद डाक्टरेट की इस उपाधि के लिए उनकी सुदीर्घ हिंदी सेवा, सारस्वत साधना, शैक्षिक प्रदेयों, राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में महनीय शोधपरक लेखन के द्वारा प्राप्त प्रतिष्ठा के आधार पर अधिकृत किया गया। उज्जैन में आयोजित कार्यक्रम में उज्जैन विश्वविद्यालय के कुलपति ने यह उपाधि प्रदान की।

गौरतलब है कि आकांक्षा यादव की रचनाएँ देश-विदेश की शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं। नारी विमर्श, बाल विमर्श एवं सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रूचि रखने वाली आकांक्षा यादव के लेख, कवितायें और लघुकथाएं जहाँ तमाम संकलनों /पुस्तकों की शोभा बढ़ा रहे हैं, वहीं आपकी तमाम रचनाएँ आकाशवाणी से भी तरंगित हुई हैं। पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ इंटरनेट पर भी सक्रिय आकांक्षा यादव की रचनाएँ तमाम वेब/ई-पत्रिकाओं और ब्लॉगों पर भी पढ़ी-देखी जा सकती हैं। व्यक्तिगत रूप से ‘शब्द-शिखर’(http://shabdshikhar.blogspot.com) और युगल रूप में ‘बाल-दुनिया’ (http://balduniya.blogspot.com),‘सप्तरंगी प्रेम’ (http://saptrangiprem.blogspot.com) व ‘उत्सव के रंग’ (http://utsavkerang.blogspot.com) ब्लॉग का संचालन करने वाली आकांक्षा यादव न सिर्फ एक साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं, बल्कि सक्रिय ब्लागर के रूप में भी उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। ’क्रांति-यज्ञ: 1857-1947 की गाथा‘ पुस्तक का कृष्ण कुमार यादव के साथ संपादन करने वाली आकांक्षा यादव के व्यक्तित्व-कृतित्व पर वरिष्ठ बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु ने ‘बाल साहित्य समीक्षा‘ पत्रिका का एक अंक भी विशेषांक रुप में प्रकाशित किया है।

मूलतः उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और गाजीपुर जनपद की निवासी आकांक्षा यादव वर्तमान में अपने पतिदेव श्री कृष्ण कुमार यादव के साथ अंडमान-निकोबार में रह रही हैं और वहां रहकर भी हिंदी को समृद्ध कर रही हैं। श्री यादव भी हिंदी की युवा पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर हैं और सम्प्रति अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं। एक रचनाकार के रूप में बात करें तो आकांक्षा यादव ने बहुत ही खुले नजरिये से संवेदना के मानवीय धरातल पर जाकर अपनी रचनाओं का विस्तार किया है। बिना लाग लपेट के सुलभ भाव भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें यही आपकी लेखनी की शक्ति है। उनकी रचनाओं में जहाँ जीवंतता है, वहीं उसे सामाजिक संस्कार भी दिया है।

इससे पूर्व भी आकांक्षा यादव को विभिन्न साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। जिसमें भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ’भारती ज्योति’, ‘एस0एम0एस0‘ कविता पर प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा पुरस्कार, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘साहित्य गौरव‘ व ‘काव्य मर्मज्ञ‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘साहित्य श्री सम्मान‘, मथुरा की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘आसरा‘ द्वारा ‘ब्रज-शिरोमणि‘ सम्मान, मध्यप्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘साहित्य मनीषी सम्मान‘ व ‘भाषा भारती रत्न‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘साहित्य सेवा सम्मान‘, देवभूमि साहित्यकार मंच, पिथौरागढ़ द्वारा ‘देवभूमि साहित्य रत्न‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘उजास सम्मान‘, ऋचा रचनाकार परिषद, कटनी द्वारा ‘भारत गौरव‘, अभिव्यंजना संस्था, कानपुर द्वारा ‘काव्य-कुमुद‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ‘शब्द माधुरी‘, महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ’महिमा साहित्य भूषण सम्मान’, अन्तर्राष्ट्रीय पराविद्या शोध संस्था,ठाणे, महाराष्ट्र द्वारा ‘सरस्वती रत्न‘, अन्तज्र्योति सेवा संस्थान गोला-गोकर्णनाथ, खीरी द्वारा ’श्रेष्ठ कवयित्री’ की मानद उपाधि, जीवी प्रकाशन, जालंधर द्वारा ’राष्ट्रीय भाषा रत्न’ इत्यादि शामिल हैं।

विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार के इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न भागों में कार्यरत हिन्दी सेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि, विभिन्न विश्वविद्यालयों के विद्वान, शिक्षक-साहित्यकार, पुरातत्वविद्, इतिहासकार, पत्रकार और जन-प्रतिनिधि शामिल थे। उक्त जानकारी विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ के कुल सचिव डा. देवेंद्र नाथ साह ने दी।

दुर्गविजय सिंह ’दीप’
उपनिदेशक - आकाशवाणी (समाचार)
पोर्टब्लेयर, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह

रविवार, 15 जनवरी 2012

अंडमान-निकोबार द्वीप पर्यटन उत्सव की सैर

जब सारा भारत ठण्ड से ठिठुर रहा होता है, उस संमय अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में मौसम सुहाना होता है. देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए यहाँ नवम्बर से फरवरी माह का संमय घूमने और मौज-मस्ती के करने के लिए उम्दा माना जाता है. खूबसूरत समुद्र-तट और लहरों की अठखेलियाँ, प्राकृतिक सौंदर्य, जैव-विविधता के बीच सेलुलर जेल और काला-पानी की ऐतिहासिकता पर्यटकों को रोमांचित करती है. समुद्र में सीप, मोलस्क, रंग-बिरंगी मछलियों के मध्य स्कूबा डाइविंग और स्नोरकलिंग का आनंद एक नए ही जीवन में ले जाता है.

ऐसे ही खुशनुमा अहसास के बीच जनवरी माह में आरंभ होता है- अंडमान-निकोबार द्वीप पर्यटन उत्सव. उत्सव क्या, मानिये पूरा भारत ही सिमट आता है. भिन्न-भिन्न प्रान्तों की संस्कृति के दर्शन यहाँ करने को मिलते हैं. इस साल मैं भी सपरिवार इस पर्यटन उत्सव में पहुंचा. राजधानी पोर्ट ब्लेयर में आरंभ होने वाला द्वीप पर्यटन उत्सव पांच जनवरी को आरंभ होकर आज पंद्रह जनवरी को ख़त्म होगा. इस उत्सव में जहाँ तमाम सरकारी विभागों की गतिविधियाँ उनके स्टाल पर परिलक्षित होती हैं, वहीँ मुख्यभूमि से मध्य प्रदेश, कर्नाटक, मेघालय, दिल्ली और गोवा जैसे राज्यों के पर्यटन निगम भी अपने स्टॉल लगाकर लोगों को आकर्षित कर रहे हैं. द्वीप महोत्सव का उद्घाटन भले ही उपराज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल भूपेन्द्र सिंह ने एक ही स्थान पर किया हो, पर यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है. शाम को सड़कों पर निकालिए तो आपको संगीत की मधुर स्वर-लहरियां अपने चारों तरफ गुंजित होती सुनाई देंगीं. पोर्टब्लेयर के साथ-साथ द्वीपसमूह के अन्य पर्यटक स्थलों पर भी सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन चलता रहता है. इनमें डिगलीपुर, लोंग आइलैंड, नील, हैवलॉक, विम्बर्लीगंज और भातू बस्ती इत्यदि शामिल हैं।आई.टी.एफ. मैदान में आयोजित होने वाला हास्य कवि सम्मेलन तो इस कार्यक्रम की जन है, जहाँ मुख्यभूमि से तमाम चर्चित कवि अपनी रचनाओं से लोगों को बांधने के लिए पहुँचते हैं. स्थानीय कवियों का कवि-समेलन तो होता ही है. तमाम स्कूलों के बच्चे अंतर स्कूल नृत्य प्रतियोगिता में भाग लेकर प्रोत्साहित होते हैं तो सेना और पुलिस की ओर से भी तमाम कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं. रॉक बैंड ‘यूफोरिया’ का प्रदर्शन तो इस बार लाजवाब रहा.

पोर्टब्लेयर में आयोजित द्वीप पर्यटन उत्सव अब इन द्वीपों से बाहर भी अपनी रंगत बिखेरने लगा है. इसीलिए इसे पहली बार राष्ट्रीय प्रसारण में भी शामिल किया गया. उद्घाटन समारोह का दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल डी.डी. भारती से सीधा प्रसारण किया गया. सभी द्वीपों के अलावा बत्तीस अन्य राष्ट्रों में भी यह सीधा प्रसारण देखा गया. इसके अलावा दूरदर्शन के राष्ट्रीय प्रसारण चैनल डी.डी.वन पर द्वीप पर्यटन उत्सव पर बाइस मिनट की टी.वी.रिपोर्ट भी प्रसारित की गई.

इस बार पहली बार निकोबार में भी द्वीप पर्यटन उत्सव आयोजित किया गया. गौरतलब है कि निकोबार भारत का सबसे दूरस्थ क्षेत्र है और इंदिरा प्वाइंट भी यहीं पर स्थित है. जिला मुख्यालय कार निकोबार में निकोबार पर्यटन महोत्सव सात जनवरी से आरंभ होकर ग्यारह जनवरी तक चला. यहाँ भी पर्यटन उत्सव का उद्घाटन करने उपराज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल भूपेन्द्र सिंह पहुंचे. विभिन्न विभागों के स्टॉल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों कि छटा के साथ-साथ निकोबारी संस्कृति को नजदीक से महसूस करने का अपना अलग ही लुत्फ़ है. वैसे भी अंडमान-निकोबार कि जनजातियों में अभी मात्र निकोबारी ही सभ्य हुए हैं, अन्य अभी भी आदिम अवस्था में ही हैं.

-कृष्ण कुमार यादव

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

कृष्ण कुमार यादव को विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ द्वारा ’विद्यावाचस्पति’ की मानद उपाधि

विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार के सोलहवें महाधिवेशन (13-14 दिसंबर 2011) में युवा साहित्यकार एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव को ’विद्यावाचस्पति’ की मानद उपाधि से विभूषित किया गया। श्री यादव को यह उपाधि उनकी साहित्यिक रचनाशीलता एवं हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए प्रदान किया गया। उज्जैन में आयोजित कार्यक्रम में उज्जैन विश्वविद्यालय के कुलपति ने यह उपाधि प्रदान की। श्री कृष्ण कुमार यादव वर्तमान में अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर कार्यरत हैं ।

सरकारी सेवा में उच्च पदस्थ अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लागिंग के क्षेत्र में भी चर्चित नाम श्री कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को देश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में देखा-पढ़ा जा सकता हैं। विभिन्न विधाओं में अनवरत प्रकाशित होने वाले श्री यादव की अब तक कुल 5 पुस्तकें- अभिलाषा (काव्य-संग्रह-2005), 'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श' (निबंध-संग्रह-2006 व 2007), India Post : 150 Glorious Years (2006) एवं 'क्रांति -यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' (2007) प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डा. राष्ट्रबन्धु द्वारा श्री यादव के व्यक्तित्व व कृतित्व पर ‘‘बाल साहित्य समीक्षा‘‘ पत्रिका का विशेषांक जारी किया गया है तो इलाहाबाद से प्रकाशित ‘‘गुफ्तगू‘‘ पत्रिका ने भी श्री यादव के ऊपर परिशिष्ट अंक जारी किया है। आपके व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर: कृष्ण कुमार यादव‘‘ (सं. डा. दुर्गाचरण मिश्र, 2009) भी प्रकाशित हो चुकी है। पचास से अधिक प्रतिष्ठित पुस्तकों/संकलनों में विभिन्न विधाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं व ‘सरस्वती सुमन‘ (देहरादून) पत्रिका के लघु-कथा विशेषांक (जुलाई-सितम्बर, 2011) का संपादन भी आपने किया है। आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर व पोर्टब्लेयर और दूरदर्शन से आपकी कविताएँ, वार्ता, साक्षात्कार इत्यादि का प्रसारण हो चुका हैं।

श्री कृष्ण कुमार यादव ब्लागिंग में भी सक्रिय हैं और व्यक्तिगत रूप से शब्द सृजन की ओर (www.kkyadav.blogspot.com) व डाकिया डाक लाया (www.dakbabu.blogspot.com) और युगल रूप में ‘बाल-दुनिया’ ,‘सप्तरंगी प्रेम’ ‘उत्सव के रंग’ ब्लॉगों के माध्यम से सक्रिय हैं। विभिन्न वेब पत्रिकाओं, ई पत्रिकाओं, और ब्लॉग पर प्रकाशित होने वाले श्री यादव की इंटरनेट पर ’कविता कोश’ में भी काव्य-रचनाएँ संकलित हैं।

इससे पूर्व श्री कृष्ण कुमार यादव को भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘’महात्मा ज्योतिबा फुले फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘‘ व ‘’डाॅ0 अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘‘, साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ”हिंदी भाषा भूषण”, भारतीय बाल कल्याण संस्थान द्वारा ‘‘प्यारे मोहन स्मृति सम्मान‘‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ”काव्य शिरोमणि” एवं ”महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ सम्मान”, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ‘‘भारती रत्न‘‘, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनन्दन समिति मथुरा द्वारा ‘‘कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान‘‘, ‘‘महाकवि शेक्सपियर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान‘‘, मेधाश्रम संस्था, कानपुर द्वारा ‘‘सरस्वती पुत्र‘‘, सहित विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु 50 से ज्यादा सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त हो चुकी हैं।

विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार के इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न भागों में कार्यरत हिन्दी सेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि, विभिन्न विश्वविद्यालयों के विद्वान, शिक्षक-साहित्यकार, पुरातत्वविद्, इतिहासकार, पत्रकार और जन-प्रतिनिधि शामिल थे। उक्त जानकारी विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ के कुल सचिव डा. देवेंद्र नाथ साह ने दी।


- दुर्ग विजय सिंह 'दीप'
उपनिदेशक-आकाशवाणी (समाचार)
आल इण्डिया रेडियो, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह.

रविवार, 1 जनवरी 2012

नव वर्ष की बेला आई..




नव वर्ष की बेला आई,
खुशियों की सौगातें लाई।
कर गुजरने का है मौका,
सद्भावों की नौका लाई।

नया वर्ष है, नया तराना,
झूमें-नाचें गाएं गाना।
और नया संकल्प हमारा,
कभी किसी को नहीं सताना।

बदला साल, कैलेण्डर बदला,
बदला है इस तरह जमाना।
भेजें सबको नेह निमंत्रण,
नए वर्ष का गाएं तराना।

नव वर्ष-2012 की हार्दिक बधाई

कृष्ण कुमार यादव