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गुरुवार, 6 अगस्त 2009

लिंग समता के मायने

सृष्टि के आरम्भ से ही नर व नारी एक दूसरे के पूरक रहे हैं। यह बात इस तथ्य से बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि यदि नर व नारी दोनों में से कोई भी एक न हुआ होता तो सृष्टि की रचना ही सम्भव न थी। कुछेक अपवादों को छोड़कर विश्व में लगभग हर प्रकार के जीव-जन्तुओं में दोनों रूप नर-मादा विद्यमान हैं. समाज में यह किवदन्ती प्रचलित है कि भगवान भी अर्द्धनारीश्वर हैं अर्थात उनका आधा हिस्सा नर का है और दूसरा नारी का। यह एक तथ्य है कि पुरूष व नारी के बिना सृष्टि का अस्तित्व सम्भव नहीं, दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं किन्तु इसके बावजूद भी पुरूष व नारी के बीच समाज विभिन्न रूपों में भेद-भाव करता है। जिसकी प्रतिक्रियास्वरूप “लिंग समता” अवधारणा का उद्भव हुआ अर्थात “लिंग के आधार पर भेदभाव या असमानता का अभाव”।

जैविक आधार पर देखें तो स्त्री-पुरूष की संरचना समान नहीं है। उनकी शारीरिक-मानसिक शक्ति में असमानता है तो बोलने के तरीके में भी । इन सब के चलते इन दोनों में और भी कई भेद दृष्टिगत होते हैं। इसी आधार पर कुछ विचारकों का मानना है कि -“स्त्री-पुरूष असमता का कारण सर्वथा जैविक है।” अरस्तू ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि - “स्त्रियाँ कुछ निश्चित गुणों के अभाव के कारण स्त्रियाँ हैं” तो संत थॉमस ने स्त्रियों को “अपूर्ण पुरूष” की संज्ञा दी। पर जैविक आधार मात्र को स्वीकार करके हम स्त्री के गरिमामय व्यक्तित्व की अवहेलना कर रहे हैं। प्रकृति द्वारा स्त्री-पुरूष की शारीरिक संरचना में भिन्नता का कारण इस सृष्टि को कायम रखना था । अतः शारीरिक व बौद्धिक दृष्टि से सबको समान बनाना कोरी कल्पना मात्र है। अगर हम स्त्रियों को इस पैमाने पर देखते हैं तो इस तथ्य की अवहेलना करना भी उचित नहीं होगा कि हर पुरूष भी शारीरिक व बौद्धिक दृष्टि के आधार पर समान नहीं होता। अतः इस सच्चाई को स्वीकार करके चलना पडे़गा कि जैविक दृष्टि से इस जगत में भेद व्याप्त है और इस अर्थ में लिंग भेद समाप्त नहीं किया जा सकता।

इसमें कोई शक नहीं कि लिंग-समता को बौद्धिक स्तर पर कोई भी खण्डित नहीं कर सकता। नर-नारी सृष्टि रूपी परिवार के दो पहिये हैं। तमाम देशों ने संविधान के माध्यम से इसे आदर्श रूप में प्रस्तुत किया है पर जरूरत है कि नारी अपने हकों हेतु स्वयं आगे आये। मात्र नारी आन्दोलनों द्वारा पुरुषों के विरुद्ध प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण व्यक्त करने से कुछ नहीं होगा। पुरूषों को भी यह धारणा त्यागनी होगी कि नारी को बराबरी का अधिकार दे दिया गया तो हमारा वर्चस्व समाप्त हो जायेगा। उन्हें यह समझना होगा कि यदि नारियाँ बराबर की भागीदार बनीं तो उन पर पड़ने वाले तमाम अतिरिक्त बोझ समाप्त हो जायेंगे और वे तनावमुक्त होकर जी सकेंगे। यह नर-नारी समता का एक सुसंगत एवं आदर्श रूप होगा ।

12 टिप्‍पणियां:

Ram Shiv Murti Yadav ने कहा…

यदि नारियाँ बराबर की भागीदार बनीं तो उन पर पड़ने वाले तमाम अतिरिक्त बोझ समाप्त हो जायेंगे और वे तनावमुक्त होकर जी सकेंगे। यह नर-नारी समता का एक सुसंगत एवं आदर्श रूप होगा....Bahut sahi likha apne..badhai !!

Dr.T.S. Daral ने कहा…

यह सच है की शारीरिक और बौधिक स्तर पर भगवान् ने नर और नारी की संरचना भिन्न प्रकार से की है. इसीलिए वे एक दूसरे के पूरक भी हैं. परन्तु मानव अधिकारों के मामले में कोई भी भेद भावः अमानवीय है.
सही सोच और अच्छी रचना पढ़कर अच्छा लगा.

shama ने कहा…

स्त्री पुरुष समानता ये शब्द ही मुझे हमेशा विक्षप्त लगते हैं......असल में कहना चाहिए , इंसानी समानता ..एक इंसान दूसरे इंसान से न कम है न अधिक ..शैक्षणिक पात्रता , आर्थिक असमानता हो सकती है ,lekin, 'स्त्रीवाद " अदि शब्द क्यों ?
"मानवता वाद " ये शब्द इस्तेमाल में हो ...!

Femism ke b nisbat hona chahiye 'humanism'..

Aurat ko insaan ke roop me to dekhe ye samaj..!

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Prabhat01 ने कहा…

Ideas changes with the time,importance and responsibility in the society. In the current time man and woman have equal importance; this truth should be accepted. Marvelous article by you, SIR. [ Prabhat, blog: http://www.onedaywithnature.blogspot.com ].

Vivek Rastogi ने कहा…

बहुत अच्छा आलेख ।

विनोद पाराशर ने कहा…

यादव जी,आपने ठीक कहा कि नर-नारी,शारीरिक व मानसिक रुप से असमान हॆं,तो उन्हें एक ही पॆमाने से नहीं,मापा जा सकता.एक-दूसरे के नेचर को समझे बिना-घर-परिवार भी नहीं चल सकता.

Bhanwar Singh ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Bhanwar Singh ने कहा…

Apse 100 % sahmat hoon.

युवा ने कहा…

Behad logical base par apne bat rakhi...nice one.

हर्षवर्धन ने कहा…

सही है

Ghanshyam ने कहा…

गहन विवेचन व सम्यक पड़ताल करता आलेख.

SR Bharti ने कहा…

प्रभावशाली आलेख.