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गुरुवार, 5 जून 2014

Think as a global citizen on World Environment Day

Five things that We can do as a global citizen on World Environment Day:

1) Spread awareness: Let's start making changes from the household level. As an environment enthusiast, you can spread awareness on a small level by talking to children in your family, or at your office or in your locality. Spread awareness about the environment in general.

2) Build a small farm or garden: We know it's difficult to find space in a metropolitan city, but if you're blessed with one, make and maintain a small farm or garden. Grow fruits, vegetables. Learn about various seeds, plants and manure. Create a part of your garden where you grow edible plants and another where you can grow flowers.

This will help you interact with nature and will also give you an opportunity to do something new. For those who are not blessed with huge spaces, start with a sapling or potato in a bag or a small sprout garden in your windowsill.

3) Travel by public transport: Take public transportation on World Environment Day and vow to take it more often than you do. If you're already a public transport user, take a walk. Introduce the concept of public transport to your family or car-lover friends. Cycle. It's fun and a great way to exercise.

4) Refuse, Reduce, Reuse, Renew, Recycle: If you're not already into this habit, it's a good day of the year to start. These 5R's are magic mantras when it comes to environmental conservation and sustainable usage. The concept is already taught to students at school. The problem is that elders have forgotten about it. Take time on World Environment Day to learn about this concept. There are many things that you can do on a personal level, if you just keep these 5R's in your mind.

5) Publicise: Did something nice to protect the environment? Talk about it! Show off. Share pictures and posts on Facebook, Twitter and Pinterest. Let people know what you plan to do and do it this World Environment Day. You can use Facebook invites to invite your friends to participate. Use Twitter hashtags like ‪#‎StayGreen‬ or ‪#‎WorldEnvDay‬ to spread your message faster.

You can also involve yourself with various conservation, restoration, or local eco-community projects in your area !!

Wish you all A very-very Happy Environment day !!

रविवार, 1 जून 2014

भारत और इंडिया में अंतर


भारत में गॉंव है, गली है, चौबारा है.
इंडिया में सिटी है, मॉल है, पंचतारा है.

भारत में घर है, चबूतरा है, दालान है.
इंडिया में फ्लैट और मकान है.

भारत में काका है, बाबा है, दादा है, दादी है.
इंडिया में अंकल आंटी की आबादी है.

भारत में खजूर है, जामुन है, आम है.
इंडिया में मैगी, पिज्जा, माजा का नकली आम है.

भारत में मटके है, दोने है, पत्तल है.
इंडिया में पोलिथीन, वाटर व वाईन की बोटल है.

भारत में गाय है, गोबर है, कंडे है.
इंडिया में सेहतनाशी चिकन बिरयानी अंडे है.

भारत में दूध है, दही है, लस्सी है.
इंडिया में खतरनाक विस्की, कोक, पेप्सी है.

भारत में रसोई है, आँगन है, तुलसी है.
इंडिया में रूम है, कमोड की कुर्सी है.

भारत में कथडी है, खटिया है, खर्राटे हैं.
इंडिया में बेड है, डनलप है और करवटें है.

भारत में मंदिर है, मंडप है, पंडाल है.
इंडिया में पब है, डिस्को है, हॉल है.

भारत में गीत है, संगीत है, रिदम है.
इंडिया में डान्स है, पॉप है, आईटम है.

भारत में बुआ है, मौसी है, बहन है.
इंडिया में सब के सब कजन है.

भारत में पीपल है, बरगद है, नीम है.
इंडिया में वाल पर पूरे सीन है.

भारत में आदर है, प्रेम है, सत्कार है.
इंडिया में स्वार्थ, नफरत है, दुत्कार है.

भारत में हजारों भाषा हैं, बोली है.
इंडिया में एक अंग्रेजी एक बडबोली है.

भारत सीधा है, सहज है, सरल है.
इंडिया धूर्त है, चालाक है, कुटिल है.

भारत में संतोष है, सुख है, चैन है.
इंडिया बदहवास, दुखी, बेचैन है.

क्योंकि …
भारत को देवों ने, वीरों ने रचाया है.
इंडिया को लालची, अंग्रेजों ने बसाया है !!

(जिस किसी ने भी लिखा है, बेहद दिल्लगी से लिखा है )


शुक्रवार, 30 मई 2014

मासूम सवाल


माँ 6 साल के बच्चे को पीटते हुये बोली,
"नालायक, तूने भँगी के घर
की रोटी खायी, तू भँगी हो गया, तूने
अपना धर्म भ्रष्ट कर लिया. अब
क्या होगा?
.
.
बच्चे का मासूम सवाल : 
माँ, मैने तो एक
बार उनके घर की रोटी खाई,
तो मैं भँगी हो गया, ।
लेकिन वो लोग
तो हमारे घर की रात
की बची रोटी बर्षो से खा रहे हैं,
तो वो ब्राह्राण क्यों नही हो पाये ??


( व्हाट्स ऎप पर प्राप्त एक पोस्ट, जिसे आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूँ। )

रविवार, 18 मई 2014

लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ के पहरुए पत्रकारों की सुरक्षा बेहद जरुरी - कृष्ण कुमार यादव

पत्रकार लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ के पहरुए हैं और उनकी सुरक्षा बेहद जरुरी है। यह एक अजीब संयोग है कि जो पत्रकार लोगों की आवाज़ उठाते हैं, अपने ही मामले में शांत रह जाते हैं।  उक्त उद्गार हिंदुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद में 14 मई, 2014 को  'प्रयाग प्रेस क्लब’ एवं 'उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा)' के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं एवं चर्चित साहित्यकार व् सोशल मीडिया एक्टिविस्ट श्री कृष्ण कुमार यादव ने व्यक्त किया। श्री यादव ने कहा कि प्रयाग प्रेस क्लब ने जिस कार्य के लिए इस संगठन का गठन किया है, वह बहुत ही सराहनीय कार्य है। आज पत्रकारों की सबसे अहम समस्या आवास की है और पत्रकारों को आवास उपलब्ध कराने का जो बीड़ा प्रयाग प्रेस क्लब ने उठाया है, वह काबिलेतारीफ है। इस अवसर पर प्रयाग प्रेस क्लब’ की तरफ से  अध्यक्ष श्री पवन कुमार द्विवेदी ने श्री कृष्ण कुमार यादव का माल्यापर्ण द्वारा एवं शाल ओढ़ाकर सम्मान भी किया। कार्यक्रम के दौरान इलाहाबाद परिक्षे़त्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने  शहर के कई वरिष्ठ पत्रकारों को सम्मानित किया । 

प्रयाग प्रेस क्लब के अध्यक्ष पवन कुमार द्विवेदी और महामंत्री भूपेश सिंह ने कार्यक्रम के मुख्य अतिथि निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव के अलावा  वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार आनन्द नारायण शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार के सी मौर्या, नचिकेता नारायण, संजय कुमार को माल्यार्पण कर एवं शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार शुक्ला ने कहा कि आज पत्रकारों की सुरक्षा बहुत महत्वपूर्ण हो गयी है, प्रयाग प्रेस क्लब की ओर से पत्रकारों का जो दुर्घटना बीमा कराया गया है, वह वास्तव में संगठन का सराहनीय कार्य है। विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार आनन्द नारायण शुक्ला, के सी मौर्या, नचिकेता नारायण ने कहा कि यह ऐसा पहला पत्रकार संगठन है, जिसने पत्रकारों के हित के बारे में सोचा है। प्रयाग प्रेस कलब के अध्यक्ष, महामंत्री समेत सभी पदाधिकारी इसके लिए धन्यवाद के पात्र हैं। प्रयाग प्रेस क्लब के अध्यक्ष पवन कुमार द्विवेदी ने नवगठित प्रयाग प्रेस क्लब के बारे में बताते हुए आगामी योजनाओं की घोषणा की। 

मुख्य अतिथि इलाहाबाद परिक्षे़त्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने  इस मौके पर तमाम पत्रकारों और फोटो जर्नलिस्ट्स को बीमा बांड वितरित किया। मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट अतिथियों के हाथों बीमा बांड ग्रहण करने वालों में वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश मिश्रा, पवन कुमार द्विवेदी, भूपेश सिंह, कुन्दन श्रीवास्तव, संजय कुमार, संदीप कुमार दुबे, सूर्य प्रकाश त्रिपाठी, वरिष्ठ छायाकार विभु गुप्ता, रंजन मिश्रा, नवीन सारस्वत, अनुराग शुक्ला, जितेन्द्र प्रकाश, भीम सिंह यादव, अनूप रावत, सत्यम श्रीवास्तव, दिलीप गुप्ता, विनोद कुमार, पत्रकार नागेन्द्र सिंह, अंजनी श्रीवास्तव, विद्याकांत मिश्रा, मनीष द्विवेदी, अमरदीप चौधरी, संतोष जायसवाल, वीरेन्द्र द्विवेदी, अनुराग तिवारी, गौरव केशरवानी, चन्द्रशेखर सेन, देवेन्द्र त्रिपाठी, संतोष तिवारी, सलीम अहमद, प्रदीप गुप्ता, रोहित शर्मा, अमरजीत सिंह, इरफान खान समेत 151 पत्रकार शामिल हैं। वहीं इस मौके पर अतिथियों को उपजा द्वारा प्रकाशित डायरेक्टरी भी वितरित की गयी। समारोह का संचालन वरिष्ठ पत्रकार मनीष द्विवेदी एवं धन्यवाद ज्ञापन अध्यक्ष पवन कुमार द्विवेदी ने किया। 



















रविवार, 11 मई 2014

माँ का आँचल


मेरा प्यारा सा बच्चा
गोद में भर लेती है बच्चे को
चेहरे पर नजर न लगे
माथे पर काजल का टीका लगाती है
कोई बुरी आत्मा न छू सके
बाँहों में ताबीज बाँध देती है।

बच्चा स्कूल जाने लगा है
सुबह से ही माँ जुट जाती है
चौके-बर्तन में
कहीं बेटा भूखा न चला जाये।
लड़कर आता है पड़ोसियों के बच्चों से
माँ के आँचल में छुप जाता है
अब उसे कुछ नहीं हो सकता।

बच्चा बड़ा होता जाता है
माँ मन्नतें माँगती है
देवी-देवताओं से
बेटे के सुनहरे भविष्य की खातिर
बेटा कामयाबी पाता है
माँ भर लेती है उसे बाँहों में
अब बेटा नजरों से दूर हो जायेगा।

फिर एक दिन आता है
शहनाईयाँ गूँज उठती हैं
माँ के कदम आज जमीं पर नहीं
कभी इधर दौड़ती है, कभी उधर
बहू के कदमों का इंतजार है उसे
आशीर्वाद देती है दोनों को
एक नई जिन्दगी की शुरूआत के लिए।

माँ सिखाती है बहू को
परिवार की परम्परायें व संस्कार
बेटे का हाथ बहू के हाथों में रख
बोलती है
बहुत नाजों से पाला है इसे
अब तुम्हें ही देखना है।

माँ की खुशी भरी आँखों से
आँसू की एक गरम बूँद
गिरती है बहू की हथेली पर।  

- कृष्ण कुमार यादव 
https://www.facebook.com/krishnakumaryadav1977

गुरुवार, 1 मई 2014

वोट उसे जिसका जनसरोकारों से जुड़ाव व साफ सुथरी छवि : कृष्ण कुमार यादव



चुनावी सरगर्मी चरम पर है। सभी दल व प्रत्याशी जनता को लुभाने के लिए बढ़चढ़कर वादे कर रहे हैं। मतदाताओं के सामने अहम चुनौती है कि किसको चुने और किसको नकारे ? हमारा सांसद न केवल संसद में हमारे क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है वरन हमारी रोजमर्रा की दुश्वारियों को दुरूस्त करने व बेहतर कल के निर्माण का जिम्मा भी उसके ही साथ में होता है। ऐसे में बिना समझे-बूझे अपने प्रतिनिधित्व का जिम्मा किसी के भी हाथ में दे देना समझदारी नहीं कहीं जा सकती है। योग्य प्रतिनिधि का चुनाव भी ठोक बजाकर करना चाहिए।

जनता को अपने मताधिकार का प्रयोग करते समय पार्टी, प्रत्याशी और मुद्दों में एक संतुलन बनाना चाहिए। कई बार होता है हम अपने जानने वाले को वोट दे देते हैं। यह अच्छी स्थिति नहीं है। हमें चुनाव में खड़े उम्मीदवारों में यह देखना पड़ेगा कि उसमें से कौन ऐसा है जो हमारी स्थानीय समस्याओं के साथ राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर संसद में आवाज उठा सकता है। सांसद का काम सिर्फ हैंडपंप लगवाने तक सीमित नहीं होता। इसलिए यह देखना चाहिए कि हमारा प्रतिनिधि राष्ट्रीय स्तर पर बनने वाली नीतियों के निर्माण में कितनी भागीदारी कर सकता है? कौन ऐसा प्रत्याशी है जो जनता की बात को समझता हो और जनता के बीच में रहता है। यह अहम नहीं कि हम जिसे वोट दे रहे उससे जुड़ी पार्टी की सरकार बनती है या वह विपक्ष में बैठता है। कोई व्यक्ति विपक्ष में बैठकर भी ज्यादा प्रभावी हो सकता है। इसलिए जिसको भी वोट दिया जाये उसकी छवि साफ-सुथरी हो तथा वह जनसरोकारों से जुड़ा हो।

-कृष्ण कुमार यादव
https://www.facebook.com/krishnakumaryadav1977


( साभार : डेली न्यूज एक्टिविस्ट, 30 अप्रैल 2014)



बुधवार, 30 अप्रैल 2014

लोकतंत्र का यह त्यौहार




वोट आपकी ताकत है, 
वोट देश की चाहत है। 
वोट सबका अधिकार है, 
बनाता यह सरकार है। 

लोकतंत्र का यह त्यौहार,
मनाओ जैसे उत्सव-मेला।
करो न इसमें कोई कोताही, 
पाँच साल में आती यह बेला।

बंद करो अब शोर मचाना, 
मतदान केंद्र, सुबह पहुँच जाना।
अपनी पसन्द का बटन दबाना, 
किसी के भुलावे में नहीं आना। 


                                                                                     ************
कृष्ण कुमार यादव

गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

लोकतंत्र का महापर्व : खुद वोट दें और दूसरों को भी प्रेरित करें


दान भारतीय संस्कृति की पहचान है। इसे जीवन मुक्ति का मार्ग माना जाता है। मान्यता है कि इससे इहलोक और परलोक दोनों सुधर जाता है। लेकिन  जब यही बात लोकतंत्र के महापर्व के लिए ’मत’दान की आती है, तब  लोग अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं करते या मतदान करने ही नहीं जाते । मतदान अधिकार ही नहीं पुनीत कर्तव्य  है। इसके माध्यम से हम अपने जन प्रतिनिधियों को न सिर्फ चुनते और सचेत करते हैं, बल्कि देश के नीति निर्धारण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करते हैं। युवा देश के कर्णधार हैं, उनकी इस चुनाव में अहम भूमिका है। यदि हम घरों, चौपालों में बैठकर या  सोशल मीडिया के माध्यम से व्यवस्था को कोसते रहेंगे तो इससे भला नहीं होगा। इसलिए खुद वोट दें और दूसरों को भी प्रेरित करें !!

कृष्ण कुमार यादव
निदेशक डाक सेवाएं
इलाहाबाद परिक्षेत्र, इलाहाबाद (उ.प्र.)-211001

( साभार : हिन्दुस्तान, 24 अप्रैल 2014)

रविवार, 20 अप्रैल 2014

Solah Aane Solah Log : A selective chronicle of Who’s Who in Indian literature



"Solah Aane Solah Log by Krishna Kumar Yadav is a selective chronicle of Who’s Who in Indian literature (Hindi & regional). Selective because it resorts to a limited list of 16 luminaries in Hindi Sahitya and thus conceiving upon the title – Solah Aane Solah Log (Solah Aana among Hindi dialect means complete, cent percent or unquestionable being). What sets apart this book from others in the category is that ..."

                               

read full Book Review Here

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

हिंदी एक वैज्ञानिक भाषा : हिंदी भाषियों का दिमाग ज्यादा तंदुरुस्त


हिंदी एक वैज्ञानिक भाषा है, और कोई भी अक्षर वैसा क्यूँ है उसके पीछे कुछ कारण हैं। अंग्रेजी भाषा में ये बात देखने में नहीं आती। गौर कीजियेगा -
______________________
क, ख, ग, घ, ङ- कंठव्य कहे गए,
क्योंकि इनके उच्चारण के समय 
ध्वनि 
कंठ से निकलती है। 
एक बार बोल कर देखिये।

च, छ, ज, झ,ञ- तालव्य कहे गए, 
क्योंकि इनके उच्चारण के 
समय जीभ 
तालू से लगती है।
एक बार बोल कर देखिये।

ट, ठ, ड, ढ , ण- मूर्धन्य कहे गए, 
क्योंकि इनका उच्चारण जीभ के 
मूर्धा से लगने पर ही सम्भव है। 
एक बार बोल कर देखिये।


त, थ, द, ध, न- दंतीय कहे गए, 
क्योंकि इनके उच्चारण के 
समय 
जीभ दांतों से लगती है। 
एक बार बोल कर देखिये।

प, फ, ब, भ, म,- ओष्ठ्य कहे गए, 
क्योंकि इनका उच्चारण ओठों के 
मिलने 
पर ही होता है। एक बार बोल 
कर देखिये ।
________________________

हम अपनी भाषा पर गर्व करते हैं, ये सही है परन्तु लोगो को इसका कारण भी बताईये।इतनी वैज्ञानिकता दुनिया की किसी भाषा में नहीं है !!


वैसे हिंदी स्वास्थ्य और मानसिक विकास के लिए भी अहम् है।  
पढ़िए यह रिपोर्ट -हिंदी भाषियों का दिमाग ज्यादा तंदुरुस्त.


- कृष्ण कुमार यादव 



मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

मुंशी प्रेमचंद के 'लमही' में



मुंशी प्रेमचंद को पढ़ते हुए हम  सब बड़े हो  गए।  उनकी रचनाओं से बड़ी  आत्मीयता महसूस होती है।  ऐसा लगता है जैसे इन रचनाओं के  पात्र हमारे आस-पास ही मौजूद हैं। पिछले दिनों बनारस गया तो मुंशी प्रेमचंद की जन्मस्थली लमही भी जाने का सु-अवसर प्राप्त हुआ। मुंशी प्रेमचंद स्मारक लमही, वाराणसी के पुस्तकालय हेतु हमने अपनी पुस्तक '16 आने 16 लोग' भी भेंट की, संयोगवश इसमें एक लेख प्रेमचंद के कृतित्व पर भी शामिल है। 

लमही गॉंव में एक ऊंचा प्रवेश द्वार और अगल-बगल खडे़ प्रेमचंद की रचनाओं को इंगित करते पत्‍थर के बैल, होरी जैसे किसान और बूढ़ी काकी जैसी कुछ पथरीली मूर्तियाँ बताती हैं कि यह उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का गाँव है।  वही गाँव जहाँ से प्रेमचंद ने साहित्य को नए  दिए और अपने आस-पास के परिवेश से पात्रों को उठाकर हमेशा के लिए जिन्दा कर दिया। अभी भी प्रेमचंद के खानदान के कुछेक लोग यहाँ रहते हैं, पर उनकी परम्परा से उनका कोई लेना-देना नहीं। प्रेमचंद के परिवारीजन लमही को कब का छोड़ चुके हैं।  हाँ, वे 'लमही'  नाम से एक पत्रिका का प्रकाशन जरुर करते हैं। लमही की मुंशी प्रेमचंद स्मारक भवन एवं विकासीय योजना समिति उनकी जयंती को 1978 से लगातार मनाती आ रही है।

बहुत पहले अख़बारों में पढ़ा था कि, वह दिन दूर नहीं जब आप लमही में बैठकर कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद को पढ़ सकेंगे बल्कि उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर शोध भी कर सकेंगे। यहां उपलब्ध होंगी कथा सम्राट की रचनाओं संग अन्य विद्वानों की भी रचनाएं। दरअसल लमही में मुंशी प्रेमचंद की स्मृति में 'मुंशी प्रेमचंद स्मारक शोध एवं अध्ययन केंद्र' भवन के निर्माण की कवायद शुरू हो गई है। नींव की खोदाई केंद्रीय सार्वजनिक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) ने शुरू कर दी है। शोध संस्थान की रूपरेखा बीएचयू के जिम्मे है और इस निमित्त दो करोड़ रुपये भी मिले हैं। मुंशीजी के नाम पर 2.49 हेक्टेयर (2490 वर्ग मीटर) पर संस्थान प्रस्तावित है। जानकारी के मुताबिक इसमें दो तल होंगे। एक कांफ्रेस हाल, अनुसंधान कक्ष, ग्रंथालय व निदेशक कक्ष आदि बनाया जाना प्रस्तावित है। कहा गया कि संस्थान निर्माण से मुंशीजी के वे पहलू भी सामने आ सकेंगे जो अब तक लोगों से दूर हैं। इस सब हेतु मुंशीजी की 131वीं जयंती पर 29 जुलाई 2011 को लमही में आयोजित समारोह राज्य सरकार की ओर से औपचारिक रूप से भूमि बीएचयू को हस्तांतरित की गई थी। 

पर हालात तो कुछ दूसरे ही हैं। मुंशी प्रेमचंद का लमही, बनारस स्थित पैतृक निवास स्थल का बोर्ड लगाकर  भवन भले ही भव्य बन गया हो, पर अंदर पूरा सन्नाटा है। यहाँ प्रेमचंद स्मारक तथा अध्ययन केंद्र एवं शोध संस्थान बनाने के लिए शिलान्यास 31 जुलाई 2005 को ही हो चुका है, पर स्थिति सिवाय भवन निर्माण के अलावा शून्य है। इसके  बगल में ही मुंशी प्रेमचंद स्मारक लमही लिखा गेट दिखता है। इसका पूरा दारोमदार सामाजिक संस्था प्रेमचंद स्मारक न्यास लमही के अध्यक्ष सुरेशचंद्र दुबे पर है, जो इसकी साफ-सफाई से लेकर आगंतुकों को अटेंड करने और फिर उन्हें प्रेमचंद के बारे में बताने का कार्य करते हैं।  एक कमरे को पुस्तकालय का रूप देते हुए उन्होंने  प्रेमचंद की अनेक प्रकाशित किताबें सहेजी हैं, और इसके साथ ही उनकी तस्‍वीरें और तरह-तरह की चीजें जिससे प्रेमचंद की जीवन शैली प्रतिबिंबित हो सके।  यहाँ पर प्रेमचंद के हुक्के से लेकर उनका चरखा तक रखा हुआ है। सुरेशचंद्र दुबे बड़ी तल्लीनता से एक-एक चीजें दिखाते हैं - तमाम साहित्यकारों पर जारी  डाक-टिकट, प्रेमचंद के साथ साहित्यकारों के यादगार फोटो, और फिर वर्त्तमान में चल रही गतिविधियों को संजोते चित्र।  मुंशी प्रेमचंद की वंशावली उन्होंने सहेज कर रखी है। वे बताते हैं कि प्रेमचंद के पिताजी डाक-मुंशी थे और इसके अलावा उनके पिताजी के अन्य दो भाई भी डाक विभाग में ही कार्यरत थे।  

प्रेमचंद ने खूब लेखनी चलाई और समाज को एक नई  दिशा भी दिखाई। पर जिस तरह से उनके नाम पर बन रहे स्मारक में लेट-लतीफी दिखती है , वह चिंताजनक है।  आखिर हम  कब अपने साहित्यकारों और कलाकारों की स्मृतियों को करीने से सहेजना  शुरू करेंगे। सुरेशचंद्र दुबे वहाँ तमाम पत्रिकाओं के अंक भी प्रदर्शित करने की कोशिश करते हैं, पर उनकी आर्थिक स्थिति इसमें आड़े आती है। हमने उनसे वादा किया कि अपने संग्रह से तमाम पत्र -पत्रिकाओं की प्रतियां और कुछेक पुस्तकें उनके पास भिजवाएंगे और अन्य लोगों को भी प्रेरित करेंगें !!  





















रविवार, 23 मार्च 2014

23 मार्च की याद में : जब चूम लिया था उन्होंने फांसी का फंदा

23 मार्च : आज ही के दिन  भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने देश की आजादी की ख़ातिर हँसते-हँसते फाँसी का फंदा चूम लिया था। उनकी शहादत रंग रंग लाई और देश आजाद हुआ।  पर किसने सोचा था कि यही आजाद देश उन्हें 'शहीद' का दर्जा तक नहीं दे पाएगा। आज भी किताबों में इन्हें उग्रवादी का दर्जा ही दिया जाता है। 

23 मार्च, 1931 को  शाम के 7 बजकर 33 मिनट पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने भारत माता के उन तीन सपूतों सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी थी, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया था और जो जाते-जाते फांसी की काली कोठरी से एक नए शोषणमुक्त भारत के नव निर्माण का अमर संदेश हमें दे गए थे।

फांसी की सजा सुनने के बाद कौम के नाम अपने एक संदेश में सरदार भगत सिंह ने हुंकार की थी- ''हम लोग इंकलाब जिन्दाबाद का नारा लगाते हैं। यह नारा हमारे लिए काफी पवित्र हैं। इसका प्रयोग काफी सोच समझकर करना चाहिए। क्रांति से हमारा अभिप्राय समाज के मौजूदा ढांचे और संगठन को उखाड़ फेंकना है। उस उद्देश्य के लिए पहले हम सत्ता अपने हाथ में ले लेना चाहते हैं। हम इस आदर्श के लिए लड़ रहे हैं। लेकिन हमें इसके लिए आम जनता को शिक्षित करना चाहिए।''


कहा जाता है कि पिताजी ने जब भगत सिंह का विवाह करने का प्रस्ताव उनके सामने रखा तो सरदार भगत सिंह ने अपने मित्रों से कहा- ‘मित्रों  मैं आज आपको बताता हूं कि यदि मेरा विवाह गुलाम भारत में हुआ तो केवल मृत्यु ही मेरी दुल्हन होगी, शव साथ बारात होगी और देश के शहीद ही मेरी बाराती होंगे।’ 

बहरी अंग्रेज सरकार को तो उन्होंने धमाकों से दहला कर अपनी आवाज़ सुना दी, पर आज उनकी आवाज़ कौन सुनेगा ?? .... खैर, सरकारी दस्तावेजों का क्या, आम जन की निगाह में तो ये सदैव शहीद क्रन्तिकारी ही बने रहेंगे।  आज इस दिन विशेष पर उन तीन महान आत्माओं को पुण्य श्रद्धांजलि !!

रविवार, 16 मार्च 2014

स्नेह से रँग दो दुनिया सारी


प्यार के रंग से भरो पिचकारी
स्नेह से रँग दो दुनिया सारी 
ये रंग न जाने कोई जात न बोली
आप सभी को मुबारक हो यह होली !!


शनिवार, 8 मार्च 2014

एक सवाल, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर


नहीं हूँ मैं माँस-मज्जा का एक पिंड
जिसे जब तुम चाहो जला दोगे
नहीं हूँ मैं एक शरीर मात्र
जिसे जब तुम चाहो भोग लोगे
नहीं हूँ मैं शादी के नाम पर अर्पित कन्या
जिसे जब तुम चाहो छोड़ दोगे
नहीं हूँ मैं कपड़ों में लिपटी एक चीज
जिसे जब तुम चाहो तमाशा बना दोगे।

मैं एक भाव हूँ, विचार हूँ
मेरा एक स्वतंत्र अस्तित्व है
ठीक वैसे ही, जैसे तुम्हारा
अगर तुम्हारे बिना दुनिया नहीं है
तो मेरे बिना भी यह दुनिया नहीं है।

फिर बताओं
तुम क्यों अबला मानते हो मुझे
क्यों पग-पग पर तिरस्कृत करते हो मुझे
क्या देह का बल ही सब कुछ है
आत्मबल कुछ नहीं
खामोश क्यों हो
जवाब क्यों नहीं देते........?
https://www.facebook.com/KKYadav1977

रविवार, 2 मार्च 2014

157 साल बाद मिली 1857 के दफन शहीदों को 'आजादी'

1857 के गदर को गुजरे सदी बीत गई, पर गाहे-बगाहे चर्चा में बना रहता है।  सोचकर कितना अजीब लगता है कि 1857 के गदर में अंग्रेजों के जुल्मों के शिकार हुए 282 भारतीय सैनिकों को 157 साल बाद 'आजादी' नसीब हो पाई है। अमृतसर के अजनाला में शहीदां वाला खूह (शहीदों का कुआं) की खुदाई में इन वीर सैनिकों की अस्थियां मिल रही हैं। इन अस्थियों को पूरे सम्मान के साथ हरिद्वार और गोइंदवाल साहिब ले जाकर विसर्जित किया जाएगा, जिससे शहीदों की आत्माओं को शांति मिल सके। कुएं की खुदाई का काम गुरुद्वारा शहीदगंज की शहीदां वाला खूह प्रबंधक कमेटी द्वारा कराया जा रहा है। 

इतिहास के पन्ने पलटें तो, 30 जुलाई 1857 को मेरठ छावनी से निकली विद्रोह की चिंगारी लाहौर की मियामीर छावनी तक पहुंच गई थी। बंगाल नेटिव इन्फेंट्री की 26 रेजिमेंट के 500 सैनिकों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। इसकी सूचना अंग्रेजों को मिली तो विद्रोह को दबाने के लिए अगले दिन 218 सैनिकों को अजनाला के पास रावी नदी इलाके में गोली मार दी गई। 282 सैनिकों को अमृतसर का डिप्टी कमिश्नर फैड्रिक हेनरी कूपर गिरफ्तार करके अजनाला ले गया। यहां सुबह 237 सैनिकों को गोली मारकर कुएं में फेंक दिया गया, जबकि 45 सैनिकों को जिंदा ही कुएं में दफना दिया गया। इसके बाद कुएं को मिट्टी से भर दिया गया। तब से लेकर आज तक इनकी किसी ने खैर-खबर नहीं ली। स्वतंत्रता संग्राम के ये रणबांकुरे शहीद होने के 157 साल तक 'आजादी' को तरसते रहे। आखिरकार अब जाकर शहीदां वाला खूह की खुदाई की जा रही है, जिससे इन शहीद सैनिकों की आत्माओं को शांति नसीब होगी।

कुएं को महज 8 फुट ही खोदा गया कि अस्थियों का मिलना शुरू हो गया। इस कार्य में सैकड़ों महिलाएं भी लगीं हैं। पूरा काम इस हिसाब से किया जा रहा है कि दफन शहीदों की अस्थियों को नुकसान पहुंचे। खुदाई वाले इलाके का माहौल भावुक बना हुआ है। जैसे ही कोई अस्थि मिलती है पूरा माहौल भावुक हो जाता है। यहाँ तक कि बारिश के बावजूद भी कुएं की खुदाई का काम जारी रहा,  ऐसा लगा मानो प्रकृति भी इस अवसर पर ग़मगीन है।  कुएं की खुदाई तब तक जारी रहेगी, जब तक अस्थियां पूरी तरह नहीं मिल जातीं।  सेवकों ने कुएं से निकाली गई मिट्टी को एक जगह इकट्ठा कर लिया है। इस मिट्टी का इस्तेमाल इन शहीदों की याद में बनाए जाने वाले स्मारकों के लिए किया जाएगा। कार सेवा कर रही गुरुद्वारा शहीदगंज की शहीदां वाला खूह प्रबंधक कमिटी अब इन अस्थियों को कलश में भरकर सम्मानपूर्वक जुलूस की शक्ल में हरिद्वार और गोइंदवाल साहिब लेकर जाएगी। इसके बाद अस्थियों की जांच करवाई जाएगी। सरकार की ओर से शहीदों के संस्कार और उनकी समाधियों के निर्माण के लिए उचित जगह मिलने पर इनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

अख़बारों में भी छाया '16 आने 16 लोग'


विश्व पुस्तक मेले में निदेशक Krishna Kumar Yadav की किताब का हुआ विमोचन।
(साभार : अमृत प्रभात, 24 फरवरी 2014)
 


'16 आने 16 लोग' का हुआ विमोचन।
(साभार : दैनिक जागरण, 24 फरवरी 2014)
 



समकालीन सरोकारों से जोड़ती है किताब : निश्चल 
16 आने 16 लोग' पुस्तक का विमोचन।
(साभार : डेली न्यूज एक्टिविस्ट, 24 फरवरी 2014)



'16 आने 16 लोग' का विमोचन।
(साभार : युनाइटेड भारत, 24 फरवरी 2014)

सराही गई किताब '16 आने 16 लोग'
(साभार : पायनियर, 24 फरवरी 2014)
 



विश्व पुस्तक मेले में लोकार्पित हुई Krishna Kumar Yadav की पुस्तक।
(साभार : स्वतंत्र चेतना , 24 फरवरी 2014)