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शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

जब मैं छोटा था ...

भूमंडलीकरण और हाई-टेक होते इस समय में बहुत कुछ है जो पीछे छूट रहा है। वक़्त की भागमभाग में बहुत सारी चीजें हम विस्मृत करते जा रहे हैं।  जिन चीजों के साथ हम बड़े हुए, उन्हें ही आज बिसरा दिया।  वास्तविक सम्बन्धों पर वर्चुअल रिलेशन हावी हो गए, खतों की खुशबू कब एसएम्एस और चैट में तब्दील हो गई, पता ही नहीं चला। बाल सुलभ जिज्ञासाओं पर गूगल बाबा कुछ इतने हावी हुए कि  हर कुछ इंटरनेट पर ही खंगालने लगे।  शब्दों के अर्थ बदलने लगे, भावनाएं सिमटने लगी, मानवीय  इच्छाओं पर आभासी रंग चढ़ने लगा। वाट्स-एप पर एक मित्र ने जब नीचे लिखी पंक्तियाँ शेयर कीं तो ऐसा ही लगा -

वक़्त की भागमभाग के साथ 
शायद ज़िंदगी बदल रही है
जब मैं छोटा था, शायद दुनिया
बहुत बड़ी हुआ करती थी। 

मुझे याद है मेरे घर से
'स्कूल' तक का वो रास्ता, 
क्या क्या नहीं था वहाँ 
चाट के ठेले, जलेबी की दुकान,
बर्फ के गोले, सब कुछ,
अब  वहाँ 'मोबाइल शॉप','वीडियो पार्लर' हैं,
फिर भी सब सूना है
शायद अब दुनिया सिमट रही है। 

जब मैं छोटा था,
शायद शामें बहुत लम्बी 
हुआ करती थीं
मैं हाथ में पतंग की डोर पकड़े,
घंटों उड़ा करता था,

वो लम्बी 'साइकिल रेस',
वो बचपन के खेल,
वो हर शाम थक के चूर हो जाना,

अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है
और सीधे रात हो जाती है
शायद वक्त सिमट रहा है। 


जब मैं छोटा था,
शायद दोस्ती
बहुत गहरी हुआ करती थी,
दिन भर वो हुजूम बनाकर खेलना,
वो दोस्तों के घर का खाना,
वो साथ हँसना और रोना। 

अब भी मेरे कई दोस्त हैं,
पर दोस्ती जाने कहाँ है,
जब भी 'ट्रैफिक सिग्नल' पर  मिलते हैं
हाय-हैलो  हो जाती है,
और अपने अपने रास्ते चल देते हैं। 

होली, दीवाली, जन्मदिन, नए साल
अब  बस एसएमएस  आ जाते हैं,
शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं। 


जब मैं छोटा था, 
तब खेल भी खूब हुआ करते थे,
छुपम-छुपाई, लँगड़ी  टाँग।
पोषम पा, कट केक, 
टिप्पी टीपी टाप.

अब वीडियो गेम, फेसबुक  से 
फुर्सत ही नहीं मिलती। 
शायद ज़िन्दगी बदल रही है। 


जिंदगी का सबसे बड़ा सच यही है।  
जो अक्सर कब्रिस्तान के बाहर
बोर्ड पर लिखा होता है
"मंजिल तो यही थी, 
बस जिंदगी गुज़र गयी मेरी
यहाँ आते आते।"


ज़िंदगी का लम्हा बहुत छोटा सा है 
कल की कोई बुनियाद नहीं है
और आने वाला कल सिर्फ सपने में ही है 

अब बच गए इस पल में
तमन्नाओं से भरी इस जिंदगी में
हम सिर्फ भाग रहे हैं.
कुछ रफ़्तार धीमी करो, 
मेरे दोस्त,

और इस ज़िंदगी को जियो
खूब जियो मेरे दोस्त … !!

- कृष्ण कुमार यादव @ शब्द-सृजन की ओर 
- फेसबुक पेज : https://www.facebook.com/KKYadav1977/


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