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शुक्रवार, 13 जून 2008

आत्मा


रात को
आसमान से टूटते तारे
बचपन में हम सोचते थे
ये आत्मा है
जो शरीर को छोड़कर
ईश्वर के पास जाती है
जहाँ वे तारे बनकर
अपनों को राह दिखाती रहेंगी ।
रात को छत पर बैठ
हम गिना करते थे
आज कितने लोग बनेंगे तारे
फ़िर एक दिन
किताब में पढ़ा
ये आत्मा नहीं उल्का पिंड हैं।
पर मन मानता ही नहीं
उसे अब भी विश्वास है
की ये टिमटिमाते तारे आत्मा ही हैं
जो अपनों को दिखाते हैं राह।
***कृष्ण कुमार यादव ***
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