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सोमवार, 5 जनवरी 2009

गोपाल दास ‘नीरज‘ जी से मेरी प्रथम मुलाकात

.....पद्मभूषण गोपाल दास 'नीरज' जी आज ८४ साल के हो गए. मंचों के बादशाह माने जाने वाले नीरज जी आज भी हिंदी कविता की लोकप्रियता की कसौटी हैं. काव्य-साधना के ६८ वर्षीय जीवन में नीरज जी को तमाम सम्मान-पुरस्कार हासिल हुए, पर उनके गीतों ने लोकप्रियता का जो रंग बिखेरा है, वह कम ही लोगों को मिलता है. अपने गीतों में प्रेम को उन्होंने नए आयाम दिए हैं. बकौल नीरज जी-''आज भले भी कुछ कह लो तुम, पर कल विश्व कहेगा सारा, नीरज से पहले गीतों में सब कुछ था पर प्यार नहीं था." जीवन के विविध पक्षों को सहज भाषा में स्वर देने वाले नीरज जी जीवन में भी उतने ही सहज हैं. मेरी उनसे मुलाकात अब तक सिर्फ एक बार हुयी है, पर यह अविस्मरनीय याद अभी भी जेहन में मौजूद है।

अपने प्रथम काव्य-संग्रह ‘‘अभिलाषा‘‘ के प्रकाशन के सन्दर्भ में 7 मार्च 2005 को प्रख्यात गीतकार व कवि गोपाल दास ‘नीरज‘ जी से मेरी मुलाकात हुई। उस समय मैं लखनऊ में असिस्टेंट पोस्टमास्टर जनरल के पद पर तैनात था. लखनऊ के वी.वी.आई.पी. गेस्ट हाउस में हमारी मुलाकात हुयी. जिस गर्मजोशी से नीरज जी ने मेरा स्वागत किया, उससे मुझे उनके बड़प्पन का एहसास हुआ. लुंगी-बनियान में बैठे इस शख्शियत को देखकर मुझे उनकी सादगी का भी एहसास हुआ. काफी देर तक पारिवारिक और अन्य मुद्दों पर उनसे बात होती रही. बहुत संकोच में अपनी कवितायेँ मैंने उन्हें दिखायीं तो वे काफी खुश हुए और बोले - अरे! आप तो प्रशासन में होते हुए भी इतना अच्छा लिखते हैं. फिर तो बैठे-बैठे उन्होंने मेरी कई कवितायेँ सुनीं और उनकी सराहना की. जिस निश्छल भाव से वह मुझे सुनते, उसी भाव से मैं उनका मुरीद होता जाता।

इस बीच मैंने नीरज जी से अपने काव्य-संग्रह ''अभिलाषा'' की चर्चा की तो सहर्ष वे उसके लिए दो-शब्द लिखने को तैयार हो गए. लगभग एक घंटा साथ रहने के बाद मैं अपने ऑफिस लौट आया. देर शाम तक नीरज जी ने लगभग दो पृष्ठों में ''अभिलाषा'' की भूमिका लिखकर भिजवा दी. इसमें समकालीन साहित्यिक परिवेश पर भी उन्होंने प्रकाश डाला था. इसे पढ़कर नीरज जी की ही पंक्तियाँ याद आ गई-''मत उसे ढूँढिये शब्दों के नुमाइश घर में, हर पपीहा यहाँ नीरज का पता देता है.''......फ़िलहाल नीरज जी के मेरे बारे में लिखे शब्द आज भी मेरी रचनाधर्मिता की पूंजी हैं-

''कृष्ण कुमार यादव यद्यपि एक उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी हैं किन्तु फिर भी उनके भीतर जो एक सहज कवि है वह उन्हें एक श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में प्रस्तुत करने के लिए निरन्तर बेचैन रहता है। वे यद्यपि छन्दमुक्त कविता से जुड़े हुये हैं लेकिन उनके समकालीनों में जो अत्यधिक बौद्धिकता एवं दुरुहता दिखाई पड़ती है, उससे वे सर्वथा अलग हैं। उनमें बुद्धि और हृदय का एक अपूर्व सन्तुलन है। उनकी रचनायें जहाँ हमें सोचने के लिए विवश करती हैं, वहीं हृदय को भी रसाद्र करती हैं। वो व्यक्तिनिष्ठ नहीं समाजनिष्ठ कवि हैं जो वर्तमान परिवेश की विद्रूपताओं, विसंगतियों, षडयन्त्रों और पाखण्डों का बड़ी मार्मिकता के साथ उद्घाटन करते हैं। श्री यादव की कविताएं पढ़कर भविष्य में एक श्रेष्ठ रचनाकार के जन्म की आहट हमें मिलती है।''
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