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बुधवार, 10 दिसंबर 2008

पुरस्कारों की अहमियत


डर लगने लगा है
पुरस्कारों को लेने से
अब वे योग्यता के नहीं
जोड़-तोड़ के
मानदण्ड बन गए हैं
जितनी ऊपर पहुँच
उतने बड़े पुरस्कार
हर पुरस्कार के साथ
ही जुड़ जाता है
रूठने और मनाने का खेल
जाति, धर्म, क्षेत्र
और दल के खाँचे में
बाँटने का खेल
फ़िर भी बात न बने तो
अस्वीकारने और लौटाने का खेल
समाज सेवा के नाम पर
चाटुकारिता को बँटते पुरस्कार
संस्कृति के नाम पर
नौटंकी और सेक्स को बँटते पुरस्कार
साहित्य के नाम पर
छपाऊ नामों को बँटते पुरस्कार
फिर भी समझ न आये तो
नेताओं और अभिनेताओं को
बँटते पुरस्कार
मानो पुरस्कार नहीं
रेवड़ी बँट रही हो।

***कृष्ण कुमार यादव***
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