समर्थक / Followers

संस्कृतिकर्मी : व्यक्तित्व-कृतित्व लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
संस्कृतिकर्मी : व्यक्तित्व-कृतित्व लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

मशहूर अमेरिकी गीतकार बॉब डिलन को साहित्य का नोबेल पुरस्कार : 115 साल में पहली बार गीतकार को साहित्य का नोबेल

पिछले 50 वर्षो से अपनी पीढ़ी की आवाज माने जाने वाले अमेरिकी गीतकार और गायक बॉब डिलन को वर्ष  2016 के साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है। 1901 से अब तक 115 साल में 109 शख्सियतों को यह नोबेल मिला, लेकिन ऐसा पहली बार होगा जब किसी गीतकार और गायक को साहित्य के नोबेल के लिए चुना गया है। बॉब डिलन का लेखन उपन्यास, कविता या किसी अन्य परंपरागत विधा में नहीं आता है, जिसके लिए अब तक यह पुरस्कार दिया जाता रहा है।

स्वीडन की नोबेल अकादमी ने 13 अक्टूबर, 2016 को इसकी घोषणा करते हुए कहा कि अमेरिकी गीतों की परंपरा में कविता के नए भावों को रचने के लिए बॉब डिलन को यह पुरस्कार दिया जा रहा है। एकेडमी की स्थायी सचिव सारा दानियस ने कहा कि डिलेन के गाने ‘कानों में कविता जैसे लगते हैं। ’ डिलन ने अमेरिका में प्रचलित गायन परंपरा में एक नए युग की शुरुआत की है। ब्लोविन इन द विंड, मास्टर्स ऑफ वार, ए हार्ड रेन्स ए-गोना फॉल, द टाइम्स दे आर ए-चेंजिंग और लाइक ए रोलिंग स्टोन जैसे गीतों में उन्होंने विद्रोह, असंतोष और स्वतंत्रता जैसे भावों को अभिव्यक्ति दी है। 

साठ के दशक में अपने गिटार और माउथऑर्गन के साथ संगीत की दुनिया में आए डिलन को लोकगीतों का रॉक स्टार भी कहा जाता है। 75 साल के डिलन आज भी गाने लिखते हैं और अक्सर टूर पर रहते हैं। स्वीडिश अकादमी के सदस्य पर वास्टबर्ग ने कहा कि वह शायद सबसे महान जीवित कवि हैं। उपन्यासकार टोनी मोरिसन के बाद से नोबेल पुरस्कार हासिल करने वाले डिलन पहले अमेरिकी साहित्यकार हैं। मोरिसन को 1993 में इस पुरस्कार से नवाजा गया था।

रॉबर्ट एलेन जिमेरमन उर्फ बॉब डिलेन का जन्म 24 मई, 1941 को अमेरिका में  मिनेसोटा के डुलुथ में एक साधारण परिवार में  हुआ। 1959 में उन्होंने मिनेसोटा के कॉफी हाउस में गायक के तौर पर कैरियर शुरू किया।1961 में वह न्यूयॉर्क चले आए। 1961 में ही उन्होंने अपना नाम औचारिक रूप से रॉबर्ट ज़िम्मरमैन से बदलकर बॉब डिलन कर लिया था। यहां के ग्रीनविच गांव में वह क्लब और कैफे में गाना गाने लगे। बड़े होने के साथ उन्होंने हार्मोनिका, गिटार और पियानो बजाना सीखा। 1961 में पहला अलबम 'बॉब डिलन' बाजार में आया। पहले अलबम की अपार सफलता के बाद बॉब ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उस समय अमेरिका के लोकप्रिय संगीत पर उनके गानों का जबर्दस्त असर पड़ा। अमेरिका के बदलते दौर और कलचर को पांच  दशकों से डिलन बखूबी गायकी और लेखन में उतारते रहे हैं। उन्हें अमेरिका की दिक्कतें बताने वाला अनौपचारिक इतिहासकार भी कहा जाता है।

 बॉब के बारे में कहा जाता है कि वो परंपरा के खिलाफ अलग तरह के गाने लिखते और गाते हैं। इसकी वजह से वो कई बार विवादों में भी रहे। बॉब डिलन के ‘ब्लोविन इन द विंड और द टाइम्स दे आर ए चेंज इन’ जैसे गानों  को अमेरिका में जंग के खिलाफ और सिविल राइट्स मूवमेंट के प्रतीक के तौर पर भी देखा जाता है। बॉब डिलन ने 54 साल में 70 एलबम निकाले, 653 गाने गाए और लिखे एवम 6 किताबें खुद लिखीं।  बॉब के हिट एल्बमों में 1965 में ब्रिंगिंग इट ऑल बैक होम और हाइवे 61 रिविजिटेड,1966 में ब्लांड ऑन ब्लांड, 1975 में ब्लड ऑन द ट्रैक्स, 1989 में ओह मर्सी,1997 में टाइम आउट ऑफ माइंड और 2006 में मॉडर्न टाइम्स शामिल हैं। उनके सबसे लोकप्रिय गीतों में मिस्टर टैंबूरिन मैन से लेकर लाइक ए रोलिंग स्टोन, ब्लोइंग इन द विंड और द टाइम्स दे आर चेजिंग शामिल हैं। 

बॉब डिलन ने अकॉस्टिक सिंगर और सॉन्ग राइटर के तौर पर करियर शुरू किया था। कहा जाता है कि शुरुआती वर्षों में बॉब डिलन जर्मन तानाशाह हिटलर से बेहद प्रभावित थे।1965 के फोक फेस्टिवल में वे तब विवादों  में आ गए जब उन्होंने अपनी अकॉस्टिक गिटार अलग रख दी और इलेक्ट्रिक गिटार से परफॉर्मेंस दी। इस फेस्टिवल में लोगों ने बॉब डिलन के खिलाफ हूटिंग भी की, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 1966 में उनका एक्सीडेंट हो गया। माना गया कि वे शोहरत का दबाव महसूस कर रहे थे। इसलिए उन्होंने इस हादसे के बारे में हकीकत कभी सामने नहीं आने दी। एक्सीडेंट के बाद 8 साल तक उन्होंने कोई टूर नहीं किया।

बॉब डिलन सिर्फ अमेरिका में ही नहीं बल्कि विश्व भर में प्रसिद्ध हैं।  बॉब डिलन को साहित्य को नोबेल मिलने पर भारत में भी खुशियां जताई जा रही हैं। सरोद वादक अमजद अली खान से लेकर संगीत निर्देशक ए आर रहमान तक ने डिलन को बधाइयां दी हैं। दोनों ने ही इसे संगीत से जुड़े सभी लोगों के लिए ‘‘गौरव का क्षण'' बताया। प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर कि यह खबर सुनकर काफी उत्साहित हूं। हम कुछ चीजों को लेकर काफी नैतिकतावादी हो जाते हैं। किसी गाने को साहित्य के तौर पर नहीं देखा जाता। गजल और नज्म को साहित्य समझा जाता है। बॉब एक शानदार इंसान हैं। उन्होंने इतिहास रचा है।

गौरतलब है कि 1901 से अब तक साहित्यर के 108 नोबेल पुरस्का र दिए जा चुके हैं। बॉब डिलन साहित्यल का नोबेल पाने वाली 109वीं शख्सियत हैं। अब तक साहित्य में सबसे अधिक नोबेल पुरस्कार  जीतने वाले अंग्रेजी के लेखक (27) रहे हैं। उसके बाद फ्रेंच (14) और तीसरे नंबर पर (13) जर्मन हैं। नोबेल पुरस्कार जीतने वालों को करीब 80 लाख स्वीडिश क्रोनर (करीब छह करोड़ रुपये) पुरस्कार के तौर पर मिलते हैं। सभी पुरस्कार विजेता 10 दिसंबर को अल्फ्रेड नोबेल की पुण्यतिथि पर स्वीडेन में पुरस्कार ग्रहण करते हैं।
कृष्ण कुमार यादव @ शब्द-सृजन की ओर 
Krishna Kumar Yadav @ http://kkyadav.blogspot.in/


गुरुवार, 6 नवंबर 2014

टैगोर आज ही के दिन हुए थे साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित

विश्वविख्यात कवि व साहित्यकार रवीन्द्र नाथ टैगोर को आज ही के दिन (6 नवम्बर) 1913 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह पुरस्कार उन्हें 'गीतांजलि' के लिए दिया गया था। टैगोर साहित्य का नोबेल जीतने वाले पहले भारतीय थे। टैगोर को नोबेल मिलने के 100 वर्षों बाद भी किसी भारतीय साहित्यकार को साहित्य का नोबेल न मिलना अपने आप में उनकी प्रासंगिकता और कालजयी कृतित्व को दर्शाता है।  वे एकमात्र कवि हैं जिनकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं- भारत का राष्ट्र-गान जन गण मन और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान आमार सोनार बांग्ला।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर को नोबेल पुरस्कार मिलने के संबंध में ब्रिटिश समाचार पत्रों में उस दौर में मिश्रित प्रतिक्रिया हुई थी । इस संबंध में 'द टाइम्स' ने लिखा था कि 'स्वीडिश एकेडेमी' के इस अप्रत्याशित निर्णय पर कुछ समाचार पत्रों में आश्चर्य व्यक्त किया गया है' पर इस पत्र के स्टाकहोम स्थित संवाददाता ने अपने डिस्पेच में लिखा था कि स्वीडन के प्रमुख कवियों और लेखकों ने स्वीडिश कमेटी के सदस्यों की हैसियत से नोबेल कमेटी के इस निर्णय पर पूर्ण संतोष व्यक्त किया है। ब्रिटेन के कट्टर रुढ़िवादी कंजरवेटिव समाचार पत्र 'डेली टेलीग्राफ' ने उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलने की सूचना तक प्रकाशित करना उचित नहीं समझा जबकि उस दिन के अन्य सभी समाचार पत्रों में इस सूचना के साथ ही पुरस्कृत कृति 'गीतांजलि' के संबंध में वहाँ के समीक्षकों की सम्मति भी प्रकाशित हुई। इसी संबंध में ब्रिटेन के प्रतिष्ठित समाचार पत्र 'मेन्चेस्टर गार्डियन' ने लिखा था कि रवीन्द्रनाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिलने की सूचना पर कुछ लोगों को आश्चर्य अवश्य हुआ पर असंतोष नहीं। टैगोर एक प्रतिभाशाली कवि हैं। बाद में 'द केरसेण्ट मून' की समीक्षा करते हुए एक समाचार पत्र ने लिखा था कि इस बंगाली (यानी रवीन्द्रनाथ ठाकुर) का अंग्रेज़ी भाषा पर जैसा अधिकार है वैसा बहुत कम अंग्रेज़ों का होता है।

शनिवार, 21 मार्च 2009

कानपुर से अटूट सम्बन्ध रहा बिस्मिल्लाह खाँ का (जन्मतिथि 21 मार्च पर विशेष)

शहनाई वादन को विवाह-मंडप, मंदिर और मंगल मौकों से इतर शास्त्रीय संगीत के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ (21 मार्च 1916-21 अगस्त 2006) का कानपुर से अटूट संबंध रहा। शहनाई के शहंशाह माने जाने वाले भारतरत्न बिस्मिल्लाह खाँ साहब का मानना था कि उनका गंगा से नजदीकी रिश्ता है और चूँकि कानपुर भी गंगा के तट पर है अतः यहाँ भी उन्हें वही खुशबू नजर आती है। पाँच वक्त के नमाजी खाँ साहब गंगा-यमुना तहजीब की जीती-जागती मिसाल थे। मंदिरों में रियाज कर अपने फन को मूर्त रूप देने वाले बिस्मिल्लाह खाँ धर्मनिरपेक्षता के साक्षात् उदाहरण थे। अपनी शहनाई से निकले ठुमरी और कजरी के अनमोल बोलांे से उन्होंने शहनाई को शांति और माधुर्य का माध्यम बना दिया। उनके लिए संगीत और खुदा की इबादत एक दूसरे के पर्यायवाची थे।

बिस्मिल्लाह खाँ ने कानपुर की जमीं पर कई बार अपनी शहनाई की रंगत दिखायी। पाँच दशक पूर्व खाँ साहब सर्वप्रथम कानपुर के लालाराम रतन गुप्ता के यहाँ एक वैवाहिक कार्यक्रम में शहनाई बजाने आए थे। ऐसे समय में जबकि बड़े घरानों के वैवाहिक कार्यक्रम ही चर्चित हो पाते थे, खाँ साहब की शहनाई ने इस कार्यक्रम को अपनी कला की बदौलत शोहरत दे दी और बारातियों से ज्यादा उनकी शहनाई की धुन सुनने वालों की भीड थी। सन् 1974 में श्री कृष्ण पहलवान समिति द्वारा मोती झील में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में खाँ साहब पुनः कानपुर पधारे और अपनी शमा छोड़ गए। इसके कुछ ही साल बाद कानपुर में नवरात्र की अष्टमी अवसर पर आयोजित संगीत संध्या में एक बार फिर से खाँ साहब ने अपनी शहनाई से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। करीब 27 वर्ष पूर्व लाजपत भवन में हिन्दी दैनिक ‘आज’ द्वारा आयोजित पावस कार्यक्रम में बिस्मिल्लाह खाँ ने शहनाई की जो धुनें छेड़ीं, उस पर श्रोताओं ने एक बार और की फरमाईशों द्वारा खाँ साहब को अपने असली रूप में आने को मजबूर कर दिया। फिर क्या था, खिलौना फिल्म के गाने ‘दिल का खिलौना हाय टूट गया’, जिसे उन्होंने ही संगीतबद्ध किया था के तराने खाँ साहब की शहनाई से मदमस्त होकर गुंज उठी। 1987 में एक बार पुनः खाँ साहब नाद ब्रह्मन संगीत संस्था के संचालक एम0 बर्द्धराजन के बुलावे पर कानपुर आये और भीमसेन जोशी के साथ ‘नाद ब्रह्मन’ कार्यक्रम का उद्घाटन किया। यहाँ उन्होंने राग ‘यमन कल्याण’ बजाकर सभी को भावाविभोर कर दिया। लगभग 17 वर्ष पूर्व बिस्मिल्लाह खाँ दुनिया के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान आई0आई0टी0 कानपुर में भी शहनाई वादन के लिए आए और अपनी वादन तकनीक व कला से यहाँ देश-विदेश से पधारे तमाम प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों व इंजीनियरों को अपनी सुर-साधना तकनीक का कायल बना दिया।

अंतिम बार बिस्मिल्लाह खाँ 1992 में कानपुर पधारे और इसी वर्ष आरम्भ ‘बिठूर महोत्सव‘ का आगाज अपने शहनाई वादन से किया। इसी कार्यक्रम के दौरान बी0 डी0 जोग के वायलिन के साथ उनकी शहनाई की अनुपम जुगलबंदी ने कानपुरवासियों को सम्मोहित कर दिया। उस दौरान अयोध्या में राम मंदिर व बाबरी मस्जिद का विवाद चरम पर था। ऐसे माहौल में खाँ साहब ने भावुक होते हुए कहा कि-‘‘अगर हिन्दू-मुसलमानों के बीच किसी समझौते से अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण हुआ तो वहाँ भी वह बैठ कर शहनाई बजाकर खुद को निहाल करेंगे।’’ उनके इस भावकुतापूर्ण व निश्छल शब्दों से गंगा तट का किनारा तालियों की गड़गड़हट से इस प्रकार गूंज उठा मानों एक साथ मंदिरों की घंटियाँ अपने आप ही बज उठी हों एवं पाश्र्व में नमाज के बोल उठ रहे हों। उस दिन बिस्मिल्लाह खाँ का फन पूरे शवाब पर था और एक बार फिर उन्होंने गंगा के बहाने कानपुर से अपना रिश्ता जाहिर किया। और कहा कि- ‘‘यदि उन्होंने यहाँ बिठूर में गंगा तट पर शहनाई नहीं बजायी होती तो उनकी संगीत की इबादत अधूरी रह जाती।‘‘

आज बिस्मिल्लाह खाँ हमारे बीच भौतिक रूप से नहीं रहे पर उनकी शहनाई की गूंज अभी भी हमारे जेहन में है। 14 अगस्त 1947 को मध्य रात्रि में भारत के नवप्रभात का स्वागत करते हुए खाँ साहब ने लाल किले की प्राचीर से शहनाई वादन किया था और उनकी दिली इच्छा अंतिम बार इंडिया गेट पर शहनाई बजाने की थी, पर आतंकवाद के चलते वह भी अधूरी रह गयी। उनकी महानता, विनम्रता व सदाशयता को इसी से समझा जा सकता है कि उन्होंने हमेशा यह प्रयास किया कि दिग्गजों के साथ-साथ वह उभरते कलाकारों के साथ भी बैठें। संसद में उभरती कलाकार डाॅ0 सोमाघोष के साथ जुगलबंदी पर उन्होंने कहा था कि-‘‘अगर मेरे साथ बैठने से कोई आगे बढ़ता है, तो मुझे खुशी होगी। मैं तो एक भिखारिन के साथ भी बैठने को तैयार हूँ बशर्ते कि उसमें कण्ठरस हो।’’

- कृष्ण कुमार यादव