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शनिवार, 28 जून 2025

Shree Dwarkadhish Temple : द्वारकाधीश श्री कृष्ण की द्वारका नगरी आज भी रहस्यमयी है

वर्तमान उत्तर प्रदेश के मथुरा और वृन्दावन में पले-बढे और रास-लीला रचाते कृष्ण-कन्हैया गुजरात में आकर द्वारकाधीश हो जाते हैं। हम लोग उनकी बाल-लीला, रास-लीला के बारे में देखते-सुनते बड़े हुए हैं, वहीं सौराष्ट्र में गुजरात की प्रथम राजधानी ‘द्वारका’ बसाने वाले रणछोड़दास श्री कृष्ण यहाँ एक राजा के रूप में श्रद्धेय हैं।




श्रीकृष्ण मथुरा में उत्पन्न हुए, पर राज उन्होंने द्वारका में किया। यहीं बैठकर उन्होंने सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। पांड़वों को सहारा दिया। धर्म की जीत कराई और शिशुपाल व दुर्योधन जैसे  तमाम अधर्मी राजाओं को मिटाया। गोमती नदी और अरब सागर के किनारे ओखामंडल प्रायद्वीप के पश्चिमी तट पर बसी द्वारका चारधाम और सप्तपुरी में से भी एक है। ऐसी मान्यता है कि मथुरा छोड़ने के बाद अपने परिजनों एवं यादव वंश की रक्षा हेतु भगवान श्रीकृष्ण ने भाई बलराम तथा यादववंशियों के साथ मिलकर द्वारकापुरी का निर्माण विश्वकर्मा से करवाया था। कहा जाता है कि यह एक किलेबंद शहर के रूप में लगभग 84 किलोमीटर तक फैला हुआ था, जहाँ गोमती नदी और अरब सागर मिलते थे।


इससे बीस मील आगे कच्छ की खाड़ी में एक छोटा सा टापू है। इस पर बेट-द्वारका बसी है। मान्यता है कि यहाँ उनका राज निवास था। पहले यहाँ सिर्फ़ पानी के रास्ते जा सकते थे, परंतु अब ‘सुदर्शन सेतु’ बनने से सड़क के द्वारा जाते हैं।






वर्तमान में द्वारका में लोग द्वारकाधीश मंदिर के दर्शन करते हैं। ऐसा माना जाता है कि द्वारकाधीश मंदिर भगवान कृष्ण के परपोते वज्रनाभ द्वारा 2500 साल पहले स्थापित किया गया था। इस प्राचीन मंदिर का कई बार जीर्णोद्धार किया गया है। इसके प्रांगण में अन्य मंदिर भी हैं।





कहते हैं कि, लगभग 125 वर्षों के जीवनकाल के बाद श्री कृष्ण ने अपनी लीला समाप्त की। उनके अवतार समाप्ति के तुरंत बाद परीक्षित के राज्य का कालखंड आता है। राजा परीक्षित, जो अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र तथा अर्जुन के पौत्र थे, के समय से ही कलियुग का आरंभ माना जाता है।

द्वारका नगरी का धार्मिक महत्व तो है ही, रहस्य भी कम नहीं है। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई, महाभारत युद्ध के लगभग 36 वर्ष पश्चात। आज भी यहां उस नगरी के अवशेष मौजूद हैं।

बताते हैं कि 1963 में सबसे पहले द्वारका नगरी का ऐस्कवेशन डेक्कन कॉलेज पुणे, डिपार्टमेंट ऑफ़ आर्कियोलॉजी और गुजरात सरकार ने मिलकर किया था। इस दौरान करीब 3 हजार साल पुराने बर्तन मिले थे। इसके तकरीबन एक दशक बाद आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया की अंडर वॉटर आर्कियोलॉजी विंग को समुद्र में कुछ ताँबे के सिक्के और ग्रेनाइट स्ट्रक्चर भी मिले। 2005 में द्वारिका के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए पुन: अभियान शुरू किया गया। इस अभियान में भारतीय नौसेना ने भी मदद की।अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-छटे पत्थर मिले और यहां से लगभग 200 अन्य नमूने भी एकत्र किए। आज भी यहां वैज्ञानिक स्कूबा डायविंग के जरिए समंदर की गहराइयों में कैद इस रहस्य को सुलझाने में लगे हैं। हाल ही में देश के प्रधानमंत्री जी भी स्कूबा डायविंग के ज़रिए द्वारका नगरी के अवशेष देखने पहुँचे थे !!

- कृष्ण कुमार यादव 

 !! जय श्री द्वारकाधीश !!

शुक्रवार, 15 नवंबर 2019

अहमदाबाद इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल होंगे डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव

चर्चित ब्लॉगर व साहित्यकार एवं लखनऊ मुख्यालय परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव  गुजरात में आयोजित होने वाले अहमदाबाद इंटरनेशनल लिटरेचर में बतौर स्पीकर शामिल होंगे। डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव "भाषा के बदले स्वरुप" सत्र को सम्बोधित करेंगे और लोगों से संवाद करेंगे। श्री यादव के साथ इस सत्र में बॉलीवुड के चर्चित गीतकार व कवि संदीप नाथ एवं फौक़िया वाजिद भी शामिल होंगे। 16 और 17 नवंबर को आयोजित होने वाले इस लिटरेचर फेस्टिवल में देश-दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियों को आमंत्रित किया गया है। इस फेस्टिवल का उद्घाटन गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत करेंगे। 
गौरतलब है कि डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने प्रशासन के साथ-साथ साहित्यिक क्षेत्र में भी ख्याति अर्जित की है।  विभिन्न विधाओं में आपकी सात पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  देश-विदेश में तमाम मंचों से सम्मानित श्री यादव ब्लॉगिंग और सोशल मीडिया के क्षेत्र में भी बेहद सक्रिय हैं।  इसी प्रकार चर्चित गीतकार संदीप नाथ ने पेज थ्री, सरकार, कॉरपोरेट, सांवरिया, सरकार राज, फैशन, जेल, पान सिंह तोमर, साहेब बीवी और गैंग्सटर, बुलेट राजा, आशिकी 2 और सिंघम रिटर्न जैसी कई हिट फिल्मों के लिए गीत लिखे हैं।










अहमदाबाद इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल होंगे डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव 
"भाषा के बदले स्वरुप" सत्र को सम्बोधित करेंगे डाक निदेशक केके यादव 

रविवार, 29 मार्च 2015

छुट्टियों का आनंद : उम्मेद भवन पैलेस, जोधपुर में


राजस्थान अपनी ऐतिहासिकता और स्थापत्य कला लिए प्रसिद्ध है।  जयपुर  यहाँ जोधपुर सबसे महत्वपूर्ण बड़ा शहर है।  उमेद भवन पैलेस यहाँ सबसे प्रमुख आकर्षण का केंद्र है। इसके संस्थापक महाराजा उमेदसिंह (1929-1942) के काल में ही जोधपुर एक आधुनिक शहर के रूप में विकसित हुआ।

महराजा उमेदसिंह  ने उमेद भवन पैलेस बनवाया था। यह महल छित्तर महल के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह महल वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है। हाथ से तराशे गए पत्थरों के टुक़डे अनोखे ढंग से एक-दूसरे पर टिकाए गए हैं। इनमें दूसरा कोई पदार्थ नहीं भरा गया है। महल के एक हिस्से में होटल और दूसरे में संग्रहालय है, जिसमें आधुनिक हवाई जहाज, शस्त्र, पुरानी घड़ियाँ, कीमती क्रॉकरी तथा शिकार किए जानवर रखे गए हैं।



उम्मेद भवन पैलेस का नाम इसके संस्थापक  महराजा उमेदसिंह (1929-1942) के नाम पर रखा गया है। चित्तर पहाड़ी पर होने के कारण यह सुंदर महल 'चित्तर पैलेस' के रूप में भी जाना जाता है। यह भारत - औपनिवेशिक स्थापत्य शैली और डेको-कला का एक आदर्श उदाहरण है। डेको कला स्थापत्य शैली यहाँ हावी है और यह 1920 और 1930 के दशक के आसपास की शैली है। 

महल को तराशे गये बलुआ पत्थरों को जोड़ कर बनाया गया था। महल के निर्माण के दौरान पत्थरों को बाँधने के लिये मसाले का उपयोग नहीं किया गया था। यह विशिष्टता बड़ी संख्या में पर्यटकों को इस महल की ओर आकर्षित करती है। इस सुंदर महल के वास्तुकार हेनरी वॉन, एक अंग्रेज थे। महल का एक हिस्सा हेरिटेज होटल में परिवर्तित कर दिया गया है, जबकि बाकी हिस्सा एक संग्रहालय के रूप में है, जिसमें विंटेज कारें, आधुनिक हवाई जहाज  प्रतिरूप, शस्त्र, पुरानी घड़ियाँ, कीमती क्रॉकरी तथा शिकार किए जानवर रखे गए हैं। अपने स्थापत्य के  कारण उम्मेद भवन पैलेस देश ही नही वरन विदेशो में भी काफी प्रसिद्ध है !!