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बुधवार, 1 जनवरी 2014

नव वर्ष हाइकु

नवल वर्ष 
खुशियाँ खूब छाए 
हो उजियारा।  

लालिमा लिए 
सूरज की किरणें 
मुस्कुराईं। 

सुबह हुई 
भौंरा गुनगुनाया 
पक्षी चहके। 

नव-सृजन 
धूप खिलखिलाई 
बजी बधाई। 

ख़ामोशी तोड़ो 
यूँ आवाज़ उठाओ 
परिवर्तन। 

मिटे अँधेरा 
यूँ फैले उजियारा 
नव वर्ष में। 

नूतन वर्ष 
जज्बे और जोश का 
अभिनन्दन। 

हो नव वर्ष 
पल्लवित -पुष्पित 
शुभकामना। 


(नव वर्ष पर शुभकामनाओं सहित हाइकु)

बुधवार, 5 जून 2013

पर्यावरण - हाइकु


1-
पर्यावरण
सुरक्षित रहेगा
संपन्न धरा।

2-
काटिये नहीं
हरे-भरे वृक्षों को
जीवन देंगे।

3-
दूषित वायु
घटता जलस्तर
बढ़ता शोर।

4-
पिघले हिम
ये ग्लोबल वार्मिंग
बढ़ता ताप।

5-
कटते पेड़
फैलता रेगिस्तान
जीवन त्रस्त।

6-
पौधे रोपिए
उर्वरता बचाएं
समृद्ध धरा।

7-
स्वच्छ जल
नदियाँ अविरल
टले संकट।

8-
पर्यावरण
हो सतत् विकास
यही संकल्प।

                                                                  -कृष्ण कुमार यादव-



प्रकृति का सामीप्य तो हमें खूब भाता है। आज विश्व पर्यावरण दिवस है। प्रकृति और पर्यावरण का संरक्षण बेहद जरुरी है। सोचिए, यदि हमारे आस-पास पेड़-पौधे न हों, मुस्कुराते फूल न हों, चिड़ियों की चहचहाहट न हो, भिन्न-भिन्न ऋतुएं न हों ......तो सब कुछ कितना सूना लगेगा। सो, अभी भी देर नहीं हुई है। यदि पहले से संजीदगी न रही हो तो अभी से शुरुआत कर लें !! 

गुरुवार, 7 मार्च 2013

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर : कृष्ण कुमार यादव के हाइकु

 
जाग उठी है
आज शिक्षित नारी
हक लेने को।
 
अबला नहीं
संवेदना की स्रोत
जानिए इसे।
 
रिश्तों की डोर
सहेजती ये नारी
रुप विभिन्न।
 
नारी की शक्ति
पहचानिए इसे
दुर्गा-भवानी।
 
हर क्षेत्र में
रचे नया संसार
आज की नारी।
 
बाधाएँ तोड़
आसमां के सितारे
छू रही नारी।
 
नारी सशक्त
समाज बने सुखी
समृद्ध राष्ट्र।
-कृष्ण कुमार यादव-

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

12-12-12 : 12 हाइकु


 
1-
नई-नवेली
दुल्हन सी धरती
सजने लगी।

2-
पोषण कर
सुख-समृद्धि देती
पावन धरा।

3-
प्रकृति बंधी
नियमों से अटल
ललकारो ना।

4-
पर्यावरण
प्रदूषित हो रहा
रोकिए इसे।

5-
हर तरफ
कटते जंगलात
धरा रो रही।

6-
स्वच्छ जल
कहाँ से मिले अब
दूषित पानी।

7-
फैलता शोर
कनफोड़ू आवाज
घुटते लोग।

8-
संकटापन्न
विलुप्त होते प्राणी
कहाँ जाएं ये?

9-
घटती आयु
बढ़ता प्रदूषण
संकट आया।

10-
बढ़ते लोग
घटते संसाधन
पिसती धरा।

11-
पूछ रही है
धरती मदहोश
बंधन खोल।

12-
मत छेडि़ए
प्रकृति को यूँ अब
जला देगी ये।
 
-कृष्ण कुमार यादव-
 
 
 
 



 

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

कृष्ण कुमार यादव के हाइकु

आधुनिकता
क्षीण हो रहे मूल्य
चकाचौंध में।


टूटते रिश्ते
सूखती संवेदना
कैसे बचाएं।


संवेदनाएं
लहुलुहान होती
समय कैसा।


सत्य-असत्य
के पैमाने बदले
छाई बुराई।


खलनायक
नेता या अभिनेता
खामोश सब।


अहं में चूर
मानव शर्मसार
अब तो जाग।


-कृष्ण कुमार यादव

शनिवार, 8 सितंबर 2012

कृष्ण कुमार यादव के हाइकु


पावन शब्द
अवर्णनीय प्रेम
सदा रहेंगे।

सहेजते हैं
सपने नाजुक से
टूट न जाएं।

जीवंत रहे
राधा-कृष्ण का प्रेम
अलौकिक सा।

फिल्मी संस्कृति
पसरी हर ओर
कामुक दृश्य

अपसंस्कृति
टूटती वर्जनाएँ
विद्रूप दृश्य

ये स्वछंदता
एक सीमा तक ही
लगती भली

रविवार, 4 दिसंबर 2011

हाइकु-दिवस पर कृष्ण कुमार यादव के हाइकु

हाइकु हिंदी-साहित्य में तेजी से अपने पंख फ़ैलाने लगा है. कम शब्दों (5-7-5)में मारक बात. भारत में प्रो० सत्यभूषण वर्मा का नाम हाइकु के अग्रज के रूप में लिया जाता है. यही कारण है कि उनका जन्मदिन हाइकु-दिवस के रूप में मनाया जाता है. आज 4 दिसम्बर को उनका जन्म-दिवस है, अत: आज ही हाइकु दिवस भी है। इस बार हाइकुकार इसे पूरे सप्ताह तक (4 दिसम्बर - 11 दिसम्बर 2011 तक) मना रहे हैं. इस अवसर पर मेरे कुछ हाइकु का लुत्फ़ उठाएं-

टूटते रिश्ते
सूखती संवेदना
कैसे बचाएं

विद्या की अर्थी
रोज ही निकलती
योग्यता त्रस्त।

हर किसी का
फिक्स हो गया रेट
रिश्वतखोरी।

पावन शब्द
अवर्णनीय प्रेम
सदा रहेंगे।

प्रकृति बंधी
नियमों से अटल
ललकारो ना।