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मंगलवार, 26 अगस्त 2025

जन्मदिन व वर्षगांठ जैसे महत्वपूर्ण दिनों पर वृक्षारोपण कर दी जा सकती है समाज को नई दिशा - पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव

पर्यावरण की रक्षा के लिए जरुरी है कि हम इसे अपनी दिनचर्या में शामिल करने के साथ पौधारोपण को जीवन के विभिन्न महत्वपूर्ण दिनों से जोड़ें। भारतीय परंपरा में पेड़-पौधों को परमात्मा का प्रतीक मान कर उनकी पूजा का विधान बनाया गया  है। हमारी साँसें चलती रहें, इसके लिए ऑक्सीजन बेहद जरुरी है। ऐसे में जन्मदिन व विवाह वर्षगांठ जैसे जीवन के महत्वपूर्ण दिनों को विशेष बनाने के लिए पौधारोपण कर समाज को नई दिशा दी जा सकती है। 




उक्त संदेश वरिष्ठ ब्लॉगर, साहित्यकार, लोकप्रिय प्रशासक एवं सम्प्रति उत्तर गुजरात परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने स्वदेशी समाज सेवा समिति द्वारा 10 अगस्त, 2025 को अपने 48वें जन्म दिवस पर आयोजित पौधारोपण कार्यक्रम में दिया।







इस अवसर पर श्री कृष्ण कुमार यादव ने अपनी पत्नी एवं अग्रणी महिला ब्लॉगर व साहित्यकार श्रीमती आकांक्षा यादव, पुत्री सुश्री अक्षिता, राष्ट्रीय बाल पुरस्कार विजेता एवं पुत्री सुश्री अपूर्वा संग अपने आवास पर पौधारोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।   

स्वदेशी समाज सेवा समिति, फिरोजाबाद के तत्त्वावधान में स्वामी ध्यानानन्द आश्रम नगला जोरे, फिरोजाबाद में आयोजित उक्त कार्यक्रम में श्री कृष्ण कुमार यादव, पोस्टमास्टर जनरल, उत्तर गुजरात परिक्षेत्र के 48वें जन्मदिन पर रुद्राक्ष, तुलसी, नीम, आम, आंवला, तेजपत्ता, दालचीनी, तुलसी, पान, सिंगोनियम, रजनीगन्धा, गंधराज इत्यादि के फलदार, औषधीय, छायादार वृक्षों, बेल व पुष्प सहित 48 पौधों का रोपण कर धरा को हराभरा एवं पर्यावरण को शुद्ध बनाने का संकल्प लिया गया।

इस अवसर पर स्वदेशी समाज सेवा समिति केअध्यक्ष श्री मातादीन यादव ने कहा, यह जीवन परमात्मा का उपहार है, सेवा ही सबसे बड़ी उपासना है और प्रकृति की रक्षा ही आज का सबसे बड़ा धर्म है। वर्तमान परिस्थितियों में जब वन क्षेत्र का निरंतर ह्रास होता जा रहा है तब संपूर्ण समाज को इस तरह के आयोजनों से सीख लेने की आवश्यकता है। स्वदेशी समाज सेवा समिति के संस्थापक सचिव विवेक यादव 'रुद्राक्ष मैन' ने कहा कि  सम्पूर्ण धरा और प्रकृति को सुरक्षित व संतुलित रखने हेतु हमें पौधारोपण के प्रति लोगों को सजग बनाना होगा। स्वदेशी समाज सेवा समिति के संकल्पों से जुड़कर सेवा, संस्कार एवं पर्यावरण रक्षा के इस यज्ञ में लोगों से अपनी आहुति देने का आह्वान भी किया। इस अवसर पर जितेन्द्र कुमार, आशीष, रिशभ, प्रबल प्रताप सहित तमाम पर्यावरण प्रेमियों ने पौधारोपण में अपना योगदान दिया।





 पोस्टमास्टर जनरल एवं वरिष्ठ साहित्यकार श्री कृष्ण कुमार यादव के जन्मदिन पर स्वदेशी समाज सेवा समिति ने किया वृक्षारोपण कार्यक्रम

जन्मदिन व वर्षगांठ जैसे महत्वपूर्ण दिनों पर वृक्षारोपण कर दी जा सकती है समाज को नई दिशा-पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव
 
चलो आज इस जमीं को, फिर से जन्नत बनाते हैं,
रोज न सही आज दो चार पौधे लगाते हैं !!🍁🌳

 धरती पर शिद्दत से एक पेड़ अपलोड तो करके देखिये,
बादलों के सैकड़ों झुंड आएंगे लाइक करने के लिए।
🌱🌲🌳🌴🌾🌿☘️🍁🌷
Save Trees, Save Earth, Save Environment.

 

शुक्रवार, 31 मई 2024

Baobab, Parijat and Kalpvriksha Tree : बाओबाब, पारिजात और कल्प वृक्ष...


'पारिजात' और 'कल्प वृक्ष' के नाम से प्रसिद्ध एवं प्रयागराज के झूंसी में पवित्र नदी गंगा के बाएं किनारे पर मिट्टी के एक विशाल टीले पर स्थित अफ्रीका के एडानसोनिया डिजिटाटा प्रजाति के दुर्लभ एवं प्राचीन 'बाओबाब' वृक्ष (Baobab tree of the Adansonia Digitata species) पर प्रयागराज प्रधान डाकघर में आयोजित एक समारोह में 30 मई, 2024 को एक विशेष आवरण व विरूपण का विमोचन किया गया। शेख तकी की मजार के पास मौजूद इस ऐतिहासिक दुर्लभ वृक्ष की आयु  750 से 1350 वर्ष के बीच मानी जाती है और इसके साथ तमाम किवदंतियां और लोगों की आस्था जुड़ी हुई है। इसके तने की मोटाई 17.3 मीटर है और इस वृक्ष का फूल बड़ा तथा फल लंबा और हरे रंग का होता है। कुछ लोग इसे 'विलायती इमली' के नाम से जानते हैं। माघ मास में देश-विदेश  से आने वाले श्रद्धालु इसकी परिक्रमा करके पूजते हैं। यह वृक्ष प्रयागराज की पंचकोसी परिक्रमा के अंतर्गत आता है। ऐसे में इस पर विशेष डाक आवरण और विरूपण के माध्यम से इसकी ऐतिहासिकता, आध्यात्मिकता, वैज्ञानिकता और औषधीय गुणों के बारे में देश-दुनिया में प्रसार होगा और इसे शोध और पर्यटन से भी जोड़ने में सुविधा होगी। 

'द ट्री ऑफ लाइफ' के नाम से प्रसिद्ध 'बाओबाब' वृक्ष मूलतः मैडागास्कर, अफ्रीका और आस्ट्रेलिया में पाए जाते हैं। बाओबाब बेशकीमती वृक्ष है, जिसे अफ्रीका में 'द वर्ल्ड ट्री' की उपाधि दी गई है और वहां के आर्थिक विकास में इन वृक्षों का विशेष महत्व है। साल में नौ महीने तक बिना पत्ते के रहने वाला दुनिया का यह अद्भूत वृक्ष मेडागास्कर का राष्ट्रीय वृक्ष होने का गौरव प्राप्त कर चुका है। इन्हें एशिया और अन्य भागों में संभवतः पुर्तगालियों द्वारा प्रसारित किया गया। 'बाओबाब' वृक्ष का वैज्ञानिक नाम एडानसोनिया डिजिटाटा है, जो फ्रांसीसी प्रकृति विज्ञानी मिशेल एडनसन के नाम पर आधारित है। एडनसन ने ही सर्वप्रथम इस वृक्ष की विशेषताओं का अध्ययन किया था और उनका वर्णन किया था। इसमें वसन्त ऋतु से लेकर छह महीने तक ही पत्तियाँ रहती हैं, शेष छह महीने तक यह ठूँठ रहता है। इसलिए इसे उल्टा वृक्ष भी कहते हैं। ठूँठ अवस्था में इसे देख कर ऐसा लगता है जैसे इसकी जड़ें ऊपर और डालियाँ नीचे की ओर कर दी गई हैं। बाओबाब के मोटे तने में वर्षा जल को संग्रहीत करने का अनूठा गुण होता है। यह विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है। इसकी प्रमुख विशेषता अतिजीविता है। यह वृक्ष अपने जीवन काल में लगभग 1,20,000 लीटर तक का पानी संग्रह कर सकता है। कहते हैं कि यदि इसे क्षति न पहुँचाई जाय तो यह छह हजार साल तक जीवित रह सकता है। संभवतः इसकी अतिजीविता और विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रहने की विशेषता के कारण इसे 'कल्पवृक्ष' या 'पारिजात' कहा गया है। 










सोमवार, 22 अगस्त 2016

आगामी पीढ़ियों के जीवन को बचाने हेतु वृक्षारोपण जरुरी - कृष्ण कुमार यादव

वृक्षारोपण मानव समाज का वैयक्तिक और सामाजिक दायित्व है। प्राचीन काल से ही मानव और वृक्षों का घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। मानवीय सभ्यता-संस्कृति के आरम्भिक विकास का पहला चरण भी वन-वृक्षों  की सघन छाया में ही उठाया गया। ऐसे में उनकी रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है। अपने और आने वाली पीढ़ी के जीवन को बचाने के लिए हमें वृक्षारोपण करना ही होगा। उक्त उद्गार राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव ने जवाहर नवोदय विद्यालय, तिलवासिनी, जोधपुर में आयोजित पौधारोपण कार्यक्रम में कहीं। इस अवसर पर श्री यादव ने पौधरोपण कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। 

डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि वृक्ष कभी भी हमसे कुछ नहीं लेते, सिर्फ देते हैं।  ऐसे में यदि हर व्यक्ति अपने जीवन में एक पेड़ लगाने और उसे भरपूर समृद्ध करने का भी संकल्प ले ले तो पर्यावरण को सतत सुरक्षित किया जा सकता है। विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा के तहत वृक्षारोपण के बारे में बताने और उन्हें इस ओर प्रेरित करने पर भी श्री यादव ने जोर दिया। 

जवाहर नवोदय विद्यालय, तिलवासनी, जोधपुर के प्रधानाचार्य  चिंतामणि ने कहा कि हमारी परंपरा में एक वृक्ष को दस पुत्रों के सामान मन गया है, क्योंकि वृक्ष पीढ़ियों तक हमारी सेवा करते हैं। उन्होंने कहा कि  वृक्षारोपण और उनके रक्षण के  दायित्व का निर्वाह कर सृष्टि को भावी विनाश से बचाया जा सकता है । 

इस अवसर पर जवाहर नवोदय विद्यालय के तमाम अध्यापक और विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के आरम्भ में बच्चों ने  पर्यावरण संरक्षण एवम इसमें वृक्षों के योगदान पर संगीतमय प्रस्तुति दी। 




रविवार, 2 अगस्त 2015

त्यौहारों से भरपूर अगस्त माह

 हर माह की अपनी महत्ता है। अगस्त माह तो त्यौहारों से भरपूर है। प्रथम दिन से ही श्रावण माह के शुभारम्भ के साथ कजरी के बीच झूलों पर पड़ती पींगें हैं, भगवान शिव की आराधना है।  'फ्रेंडशिप-डे' के बहाने पुराने दोस्तों को याद करने और दोस्ती बढ़ाने की कवायद  है तो भाई-बहन के प्यार को बढ़ाता "रक्षा बंधन" भी इसी माह है। नन्द लाल कृष्ण के जन्मोत्सव "कृष्ण जन्माष्टमी" के बहाने फिर से लीलाएं होंगी, मटकियाँ फूटेंगीं और उन सबके बीच बहेगी आस्था की रसधार। प्रत्यूष पर्व की शुरुआत भी इसी माह में है।  आजादी का सबसे बड़ा पर्व "स्वतंत्रता दिवस" भी इसी माह उन तमाम नाम-अनाम शहीदों और महापुरुषों को याद करने का मौका होगा, जिनकी बदौलत हम आजाद हवाओं में सांसें ले रहे हैं। 

…… और हाँ, हमारे लिए यह माह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 10 अगस्त को हमारा जन्मदिन भी पड़ता है।  आप सभी को अगस्त माह की शुभकामनायें !! 


बुधवार, 22 अप्रैल 2015

जब वृक्षों की रक्षा के लिए दे दी कुर्बानी

आज विश्व  पृथ्वी  दिवस  है।  अपनी धरती और अपने पर्यावरण के प्रति सचेत होने का एक और दिन। वृक्षों के रक्षार्थ जोधपुर के खेजड़ली गांव में सन् 1730 में खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा के लिए विश्नोई जाति के के बलिदान की गाथा रोमांचक और प्रेरणास्पद है। अमृता देवी विश्नोई  के नेतृत्व में 363 लोगों द्वारा वृक्षों के रक्षार्थ किया गया जीवन बलिदान अपनी पृथ्वी,  वृक्ष और पर्यावरण के प्रति अनुकरणीय राह दिखाता है। राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है- ‘सर साठे रुंख रहे तो भी सस्तो जाण’, यानी सिर कटवा कर भी वृक्षों की रक्षा हो सके, तो इसे फायदे का सौदा ही समझिए। 

खेजड़ली के बलिदान की गाथा रोमांचक और प्रेरणास्पद है।  सन् 1730 में जोधपुर के राजा अभयसिंह ने महल बनवाने का निश्चय किया. नया महल बनाने के कार्य में सबसे पहले चूने का भट्टा जलाने के लिए ईंधन की आवश्यकता बतायी गयी. राजा ने मंत्री गिरधारी दास  भण्डारी को लकड़ियों की व्यवस्था करने का आदेश दिया, मंत्री गिरधारी दास  भण्डारी  की नजर महल से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित गांव खेजडली पर पड़ी. मंत्री गिरधारी दास भण्डारी व दरबारियों ने मिलकर राजा को सलाह दी कि पड़ोस के गांव खेजड़ली में खेजड़ी के बहुत पेड़ है, वहां से लकड़ी मंगवाने पर चूना पकाने में कोई दिक्कत नहीं होगी. इस पर राजा ने तुरंत अपनी स्वीकृति दे दी. खेजड़ली गांव में अधिकांश बिश्नोई लोग रहते थे. बिश्नोईयों में पर्यावरण के प्रति प्रेम और वन्य जीव सरंक्षण जीवन का प्रमुख उद्देश्य रहा है. खेजड़ली गांव में प्रकृति के प्रति समर्पित इसी बिश्नोई समाज की 42 वर्षीय महिला अमृता देवी के परिवार में उनकी तीन पुत्रियां आसु, रतनी, भागु बाई  और पति रामू खोड़ थे, जो कृषि और पशुपालन से अपना जीवन-यापन करते थे.

खेजड़ली में राजा के कर्मचारी सबसे पहले अमृता देवी के घर के पास में लगे खेजड़ी के पेड़ को काटने आये तो अमृता देवी ने उन्हें रोका और कहा कि “यह खेजड़ी का पेड़ हमारे घर का सदस्य है यह मेरा भाई है इसे मैंने राखी बांधी है, इसे मैं नहीं काटने दूंगी.” इस पर राजा के कर्मचारियों ने प्रति प्रश्न किया कि “इस पेड़ से तुम्हारा धर्म का रिश्ता है, तो इसकी रक्षा के लिये तुम लोगों की क्या तैयारी है.” इस पर अमृता देवी और गांव के लोगों ने अपना संकल्प घोषित किया “सिर साटे रूख रहे तो भी सस्तो जाण” अर्थात् हमारा सिर देने के बदले यह पेड़ जिंदा रहता है तो हम इसके लिये तैयार है. उस दिन तो पेड़ कटाई का काम स्थगित कर राजा के कर्मचारी चले गये, लेकिन इस घटना की खबर खेजड़ली और आसपास के गांवों में शीघ्रता से फैल गयी.

 कुछ दिन बाद मंगलवार 21 सितम्बर 1730 ई. (भाद्रपद शुक्ल दशमी, विक्रम संवत 1787) को मंत्री गिरधारी दास भण्डारी लावलश्कर के साथ पूरी तैयारी से सूर्योदय होने से पहले आये, जब पूरा गाँव सो रहा था. गिरधारी दास भण्डारी के साथ आए लोगों ने सबसे पहले अमृता देवी के घर के पास लगे खेजड़ी के हरे पेड़ो की कटाई करना शुरु किया तो, आवाजें सुनकर अमृता देवी अपनी तीनों पुत्रियों के साथ घर से बाहर निकली उसने ये कृत्य विश्नोई धर्म में वर्जित (प्रतिबंधित) होने के कारण उनका विरोध किया  उद्घोष किया  “सिर साटे रुख रहे तो भी सस्तो जाण” और अमृता देवी गुरू जांभोजी महाराज की जय बोलते हुए सबसे पहले पेड़ से लिपट गयी, क्षण भर में उनकी गर्दन काटकर सिर धड़ से अलग कर दिया. फिर तीनों पुत्रियों पेड़ से लिपटी तो उनकी भी गर्दनें काटकर सिर धड़ से अलग कर दिये.

इस बात का पता चलते ही  खेजड़ली गांव के लोगों ने अपनी जान की कीमत पर भी वृक्षों की रक्षा करने का निश्चय किया। चौरासी गांवों को इस फैसले की सूचना दे दी गई। सैकड़ों की तादाद में लोग खेजड़ली गांव में इकट्ठे हो गए और पेड़ों को काटने से रोकने के लिए उनसे चिपक गए। उन्होनें एक मत से तय कर लिया कि एक पेड़ के एक विश्नोई लिपटकर अपने प्राणों की आहुति देगा. सबसे पहले बुजुर्गों ने प्राणों की आहुति दी. तब मंत्री गिरधारी दास  भण्डारी ने बिश्नोईयों को ताना मारा कि ये अवांच्छित बूढ़े लोगों की बलि दे रहे हो. उसके बाद तो ऐसा जलजला उठा कि बड़े, बूढ़े, जवान, बच्चे स्त्री-पुरुष सबमें प्राणों की बलि देने की होड़ मच गयी. बिश्नोई जन पेड़ो से लिपटते गये और प्राणों की आहुति देते गये. एक व्यक्ति के कटने पर तुरंत दूसरा व्यक्ति उसी पेड़ से चिपक जाता। इसमें कुल 363 बिश्नोईयों (71 महिलायें और 292 पुरूष) ने पेड़ की रक्षा में अपने प्राणों की आहूति दे दी. खेजड़ली की धरती बिश्नोईयों के बलिदानी रक्त से लाल हो गयी. जब इस घटना की सूचना जोधपुर के महाराजा को मिली तब जाकर उन्होंने पेड़ों की कटाई रुकवाई और भविष्य में वहां पेड़ न काटने के आदेश दिए। उन्होंने बिश्नोईयों को ताम्रपत्र से सम्मानित करते हुए जोधपुर राज्य में पेड़ कटाई को प्रतिबंधित घोषित किया और इसके लिये दण्ड का प्रावधान किया। 

 इस बलिदान में अमृतादेवी और उनकी दो पुत्रियां हरावल में रहीं। पुरुषों में सर्वप्रथम अणदोजी ने बलिदान दिया था और बाद में विरतो बणियाल, चावोजी, ऊदोजी, कान्होजी, किसनोजी, दयाराम आदि पुरुषों और दामी, चामी आदि स्त्रियों ने अपने प्राण दिए। मंगलवार 21 सितम्बर 1730 (भाद्रपद शुक्ल दशमी, विक्रम संवत 1787) का वह ऐतिहासिक दिन  इतिहास में सदैव के लिए प्रेरणा बनकर  अमर हो गया। खेजड़ली के इन वीरों की स्मृति में यहां हर वर्ष भादवा सुदी दशमी को मेला लगता है, जिसमें हजारों की संख्या में लोग इकट्ठे होते हैं।

(चित्र में : राष्ट्रीय पर्यावरण शहीद स्मारक, खेजड़ली-जोधपुर के समक्ष सपरिवार)

रविवार, 1 मार्च 2015

वसंत और सरसों में खिले पीले फूल



वसंत को ऋतुराज कहा गया है।  इस समय पंचतत्त्व जल, वायु, धरती, आकाश और अग्नि अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने रूप में प्रकट होते हैं। इस दौरान सर्वत्र हरियाली दृष्टोगोचर होती है और उनमें पीली वस्तुओं का सम्मिलन इसे और भी मोहक बनाता है। भारतीय संस्कृति में पीले रंग को शुभ माना गया है।  बसंत पंचमी पर न केवल पीले रंग के वस्त्र पहने जाते हैं, अपितु खाद्य पदार्थों में भी पीले चावल पीले लड्डू व केसर युक्त खीर का उपयोग किया जाता है, जिसे बच्चे तथा बड़े-बूढ़े सभी पसंद करते हैं। अतः इस दिन सब कुछ पीला दिखाई देता है और प्रकृति खेतों को पीले-सुनहरे रंग से सज़ा देती है, तो दूसरी ओर घर-घर में लोग के परिधान भी पीले दृष्टिगोचर होते हैं। नवयुवक-युवती एक -दूसरे के माथे पर चंदन या हल्दी का तिलक लगाकर पूजा समारोह आरम्भ करते हैं। तब सभी लोग अपने दाएं हाथ की तीसरी उंगली में हल्दी, चंदन व रोली के मिश्रण को माँ सरस्वती के चरणों एवं मस्तक पर लगाते हैं, और जलार्पण करते हैं। धान व फलों को मूर्तियों पर बरसाया जाता है। गृहलक्ष्मी बेर, संगरी, लड्डू इत्यादि बांटती है। 



बसंत में न तो ज्यादा गर्मी होती है और न ही ठंडी।  आकाश स्वच्छ है, वायु सुहावनी है, अग्नि (सूर्य) रुचिकर है तो जल पीयूष के समान सुखदाता और धरती, उसका तो कहना ही क्या वह तो मानो साकार सौंदर्य का दर्शन कराने वाली प्रतीत होती है। ठंड से ठिठुरे विहंग अब उड़ने का बहाना ढूंढते हैं तो किसान लहलहाती जौ की बालियों और सरसों के फूलों को देखकर नहीं अघाते। बसंत की ऋतु हो तो सरसों नाम अनायास ही ओंठों पर आ जाता है। आर्युवेदिक ग्रंथ भावप्रकाश के अनुसार सरसों के बीज उष्ण, तीखे और त्वचा रोगों को हरने वाले होते हैं तथा ये वात, पित्त और कफ जनित दोषों को शांत करते हैं। होलिकोत्सव में सरसों के चूर्ण से उबटन लगाने की परंपरा है, ताकि ग्रीष्म ऋतु में त्वचा की सुरक्षा रहे। सरसों प्रकृति के सौंदर्य का प्रतीक तो है ही आर्थिक दृष्टि से भी यह भारत के सामाजिक जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। धनी जहाँ प्रकृति के नव-सौंदर्य को देखने की लालसा प्रकट करने लगते हैं तो वहीं निर्धन शिशिर की प्रताड़ना से मुक्त होने पर सुख की अनुभूति करने लगते हैं। सच! प्रकृति तो मानो उन्मादी हो जाती है। हो भी क्यों ना! पुनर्जन्म जो हो जाता है। श्रावण की पनपी हरियाली शरद के बाद हेमन्त और शिशिर में वृद्धा के समान हो जाती है, तब बसंत उसका सौन्दर्य लौटा देता है। नवगात, नवपल्लव, नवकुसुम के साथ नवगंध का उपहार देकर विलक्षण बना देता है।




आया वंसत आया वसंत
छाई जग में शोभा अनंत।
सरसों खेतों में उठी फूल
बौरें आमों में उठीं झूल
बेलों में फूले नए फूल
पल में पतझड़ का
हुआ अंत
आया वसंत आया वसंत। 
(कविवर सोहन लाल द्विवेदी) 



गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

मानव हृदय को आलोकित करने वाला पर्व है दीपावली

दीपावली सिर्फ घरों को जगमगाने वाला पर्व नहीं है बल्कि यह मानव हृदय को आलोकित करने वाला पर्व भी है। हमारी परम्परा एक तरफ दीपावली के दिन घरों को साफ-सुथरा कर गणेश-लक्ष्मी के रूप में सुख-समृद्धि का आह्वान करती है, वहीं रात के अंधियारे में आशाओं के दीप जगमगाते हैं तो निराशा के काले घने बादल स्वमेव छँटते जाते हैं। 

दीपावली जहाँ मन से विकार, कटुता, निराशा, अवसाद और अन्य नकारात्मक प्रवृत्तियों को बाहर निकालती है, वहीँ दीये की रोशनी तमाम कीट-पतंगों और गन्दगी को ख़त्म करती है। 

दीपावली एक सामाजिक त्यौहार है, इसके साथ कइयों की रोजी-रोटी जुडी हुई है। 'ज्योत से ज्योत जलाते चलो' की परम्परा में एक दीया हजारों दीयों को रोशन कर सकता है, पर झालर और बल्ब दूसरे झालरों और बल्बों को रोशन नहीं कर सकते। दीपावली सुख, स्वास्थ्य और सामाजिक सद्भाव का पर्व है। पर पटाखों के शोर-शराबे के बीच फैलता प्रदूषण और हानिकारक कीटों को आमंत्रित करती विदेशी झालरें और इन सब पर व्यय किये गए करोड़ों रूपये इस पवित्र त्यौहार के मूल भाव को ही ख़त्म करने पर तुले हैं। आतिशबाजी और पटाखों की आड़ में खर्च होने वाले करोड़ों रूपये किसी गरीब व्यक्ति को दो वक़्त की रोटी दे सकते हैं। विदेशी आतिशबाजी से दूर रहकर न केवल प्रदूषण से निजात पाया जा सकता है, बल्कि निज बंधुओं के जीवन में खुशियाँ भी भरी जा सकती है।

!! आप सभी को दीपावली पर्व पर सपरिवार शुभकामनाएँ !!


रविवार, 10 अगस्त 2014

जीवन निरंतर चलने का नाम है ....


जन्मदिन सिर्फ सेलिब्रेशन तक नहीं होता।  जन्मदिन के बहाने पिछले एक साल के पन्ने पलटकर देखना भी होता है कि क्या कमियाँ रहीं, क्या उपलब्धियाँ रहीं।  क्या खोया, क्या पाया। इसके साथ ही अगले सालों के लिए दृढ निश्चय होकर फिर आगे बढ़ जाने का नाम भी है जन्मदिन। क्योंकि जीवन निरंतर चलने का नाम है और यह चलना सिर्फ पाँवों पर नहीं होता, बल्कि इसमें बहुत कुछ जुड़ता जाता है !! 
               (चित्र में : हमारे जीवन की पहली फोटो, जो कि बचपन में ली गई थी)





10 अगस्त को हमारा जन्मदिन है और रक्षाबंधन भी। इस शुभ दिन पर हमने खूब सारे पौधे लगाए। जब ये पौधे बड़े होकर लहलहाएंगे, उन पर फूल खिलेंगे, फल उगेंगे तो चिड़ियों की चहचहाहट के बीच प्रकृति भी हमें दिल से आशीष देगी !!