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सोमवार, 7 मई 2018

भारतीय उपमहाद्वीप में साहित्य के एकमात्र नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्र नाथ टैगोर जी की जयंती


नहीं मांगता, प्रभु, विपत्ति से,
मुझे बचाओ, त्राण करो
विपदा में निर्भीक रहूँ मैं,
इतना, हे भगवान, करो।

नहीं मांगता दुःख हटाओ
व्यथित ह्रदय का ताप मिटाओ
दुखों को मैं आप जीत लूँ
ऐसी शक्ति प्रदान करो
विपदा में निर्भीक रहूँ मैं,
इतना, हे भगवान,करो।

कोई जब न मदद को आये
मेरी हिम्मत टूट न जाये।
जग जब धोखे पर धोखा दे
और चोट पर चोट लगाये -
अपने मन में हार न मानूं, 
ऐसा, नाथ, विधान करो।
विपदा में निर्भीक रहूँ मैं,
इतना, हे भगवान,करो।

नहीं माँगता हूँ, प्रभु, मेरी
जीवन नैया पार करो
पार उतर जाऊँ अपने बल
इतना, हे करतार, करो।
नहीं मांगता हाथ बटाओ
मेरे सिर का बोझ घटाओ
आप बोझ अपना संभाल लूँ
ऐसा बल-संचार करो।
विपदा में निर्भीक रहूँ मैं,
इतना, हे भगवान,करो।

सुख के दिन में शीश नवाकर
तुमको आराधूँ, करूणाकर।
औ' विपत्ति के अन्धकार में, 
जगत हँसे जब मुझे रुलाकर--
तुम पर करने लगूँ न संशय, 
यह विनती स्वीकार करो।
विपदा में निर्भीक रहूँ मैं, 
इतना, हे भगवान, करो।

- रवीन्द्रनाथ टैगोर-

आज रवीन्द्र नाथ टैगोर जी (7  मई 1861-7 अगस्त 1941) की जयंती है।  दो-दो देशों (भारत और बांग्लादेश) के राष्ट्रगान के रचयिता, आधुनिक भारत के असाधारण सृजनशील कलाकार, साहित्यकार-संगीतकार-लेखक-कवि-नाटककार-संस्कृतिकर्मी एवं भारतीय उपमहाद्वीप में साहित्य के एकमात्र नोबेल पुरस्कार विजेता टैगोर जी की 157वीं  जयंती पर शत-शत नमन !!

-कृष्ण कुमार यादव @ शब्द-सृजन की ओर 

शनिवार, 28 नवंबर 2015

पति-पत्नी का रिश्ता




पति-पत्नी,
एक बनाया गया रिश्ता,
पहले कभी एक दूसरे को देखा भी नहीं था,
अब सारी जिंदगी एक दूसरे के साथ,
पहले अपरिचित,
फिर धीरे-धीरे होता परिचय,
धीरे-धीरे होने वाला स्पर्श,
फिर
नोकझोंक, झगड़े, बोलचाल बंद,
कभी जिद, कभी अहम का भाव,
फिर धीरे-धीरे बनती जाती प्रेम पुष्पों की माला।
फिर
एकजीवता...तृप्तता,
वैवाहिक जीवन को परिपक्व होने में समय लगता है,
धीरे धीरे जीवन में स्वाद और मिठास आती है,
ठीक वैसे ही जैसे, 
अचार जैसे-जैसे पुराना होता जाता है,
उसका स्वाद बढ़ता जाता है।
पति-पत्नी एक दूसरे  को अच्छी प्रकार
जानने-समझने लगते हैं,
वृक्ष बढ़ता जाता है, बेलाएँ फूटती जातीं हैं,
फूल आते हैं, फल आते हैं,
रिश्ता और मजबूत होता जाता है।
धीरे-धीरे बिना एक दूसरे के अच्छा ही नहीं लगता।
उम्र बढ़ती जाती है, दोनों एक दूसरे  पर
अधिक आश्रित होते जाते हैं,
एक दूसरे के बगैर खालीपन महसूस होने लगता है।
फिर धीरे-धीरे मन में एक भय का निर्माण होने लगता है,
" ये चली गईं तो, मैं कैसे जिऊँगा ? "
" ये चले गए तो, मैं कैसे जिऊंगी  ? "
अपने मन में घुमड़ते इन सवालों के बीच जैसे,
खुद का स्वतंत्र अस्तित्व दोनों भूल जाते हैं।
कैसा अनोखा रिश्ता,
कौन कहाँ का,
एक बनाया गया खूबसूरत रिश्ता
पति-पत्नी का, सात जन्मों के बंधन का रिश्ता !!







यूँ ही हँसते, मुस्कुराते और जीवन में प्रीतिकर रंग भरते एक-दूसरे के साथ 11 साल बीत गए। 
आज हमारी शादी की सालगि‍रह है और आप सभी की शुभकामनाओं और स्नेह के आकांक्षी हैं।

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

राजस्थानी भाषा में कविताएँ


अब हमारी कविताएँ राजस्थानी भाषा में भी। राजस्थानी पत्रिका ''माणक'' (नवंबर 2015) में प्रकाशित हमारी कुछेक कविताएँ, जिनका हिंदी से राजस्थानी में अनुवाद जुगल परिहार ने किया है।  आभार !!


संपर्क -
माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) :  संपादक - पदम मेहता
माणक प्रकाशन, जालोरी गेट, जोधपुर (राजस्थान) -342003  


गुरुवार, 1 अक्टूबर 2015

साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल...


गाँधी जी जब भी स्मृतियों में आते हैं, कविवर प्रदीप द्वारा रचा गया गीत "साबरमती के संत" स्वत: जुबाँ पर आ जाता है।  स्कूली दिनों  गीत को हम बड़ी तन्मयता से गांधी जयंती पर गाया करते थे।  एक बार फिर से उन स्मृतियों को आजसे जोड़ते हुए वही गीत - 


दे दी हमें आज़ादी बिना खड्‌ग बिना ढाल

साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

आँधी में भी जलती रही गाँधी तेरी मशाल

साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

दे दी ...

धरती पे लड़ी तूने अजब ढंग की लड़ाई

दागी न कहीं तोप न बंदूक चलाई

दुश्मन के किले पर भी न की तूने चढ़ाई

वाह रे फ़कीर खूब करामात दिखाई

चुटकी में दुश्मनों को दिया देश से निकाल

साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

दे दी ...

रघुपति राघव राजा राम

शतरंज बिछा कर यहाँ बैठा था ज़माना

लगता था मुश्किल है फ़िरंगी को हराना

टक्कर थी बड़े ज़ोर की दुश्मन भी था ताना

पर तू भी था बापू बड़ा उस्ताद पुराना

मारा वो कस के दांव के उलटी सभी की चाल

साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

दे दी ...

रघुपति राघव राजा राम

जब जब तेरा बिगुल बजा जवान चल पड़े

मज़दूर चल पड़े थे और किसान चल पड़े

हिंदू और मुसलमान, सिख पठान चल पड़े

कदमों में तेरी कोटि कोटि प्राण चल पड़े

फूलों की सेज छोड़ के दौड़े जवाहरलाल

साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

दे दी ...

रघुपति राघव राजा राम

मन में थी अहिंसा की लगन तन पे लंगोटी

लाखों में घूमता था लिये सत्य की सोंटी

वैसे तो देखने में थी हस्ती तेरी छोटी

लेकिन तुझे झुकती थी हिमालय की भी चोटी

दुनिया में भी बापू तू था इन्सान बेमिसाल

साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

दे दी ...

रघुपति राघव राजा राम

जग में जिया है कोई तो बापू तू ही जिया

तूने वतन की राह में सब कुछ लुटा दिया

माँगा न कोई तख्त न कोई ताज भी लिया

अमृत दिया तो ठीक मगर खुद ज़हर पिया

जिस दिन तेरी चिता जली, रोया था महाकाल

साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल

साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

रघुपति राघव राजा राम !!



!! गाँधी जयंती पर शत-शत नमन !!

बुधवार, 29 जुलाई 2015

सबके प्यारे अब्दुल कलाम चले गए...

आधुनिक भारत के भगवान चले गए।
इस देश के असली स्वाभिमान चले गए।।
धर्म को अकेला छोड़ विज्ञान चले गए।
एक साथ गीता और कुरान चले गए।।
मानवता के एकल प्रतिष्ठान चले गए।
धर्मनिरपेक्षता के मूल संविधान चले गए।।
इस सदी के श्रेष्ठ ऋषि महान चले गए।
कलयुग के इकलौते इंसान चले गए।।
ज्ञान राशि के अमित निधान चले गए।।
सबके प्यारे अब्दुल कलाम चले गए।।


पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का दिल का दौरा पड़ने से 27 जुलाई को शिलांग में निधन। 
राष्ट्र की एक अपूरणीय क्षति। 
विनम्र श्रद्धांजलि !!

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

गाँधी जी की आत्मा

महात्मा गाँधी
सत्य और अहिंसा की मूर्ति
जिसके सत्याग्रह ने
साम्राज्यवाद को भी मात दी
जिसने भारत की मिट्टी से
एक तूफान पैदा किया
जिसने पददलितों और उपेक्षितों
की मूकता को आवाज दी
जो दुनिया की नजरों में
जीती-जागती किवदंती बना 
आज उसी गाँधी को हमने 
चौराहों, मूर्तियों, सेमिनारों और किताबों
तक समेट दिया
गोडसे ने तो सिर्फ
उनके भौतिक शरीर को मारा
पर हम रोज उनकी
आत्मा को कुचलते देखते हैं
खामोशी से।



महात्मा गाँधी जी दुनिया की एकमात्र शख्शियत हैं, जिनके ऊपर प्राय: अधिकतर देशों ने डाक टिकट जारी किये हैं।  यही नहीं, भारत में भी डाक टिकटों पर महात्मा गाँधी ही सर्वाधिक बार प्रकाशित हुए हैं।  गाँधी जी भौतिक रूप से भले ही हमारे बीच नहीं हैं, पर उन्होंने सत्य-अहिंसा और सत्याग्रह की पूरे विश्व में जो अलख जगाई, वह उन्हें चिर-काल तक जीवंत रखेगी।  आज गाँधी जी की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि !!

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

माँ और पिता


जिसकी कोख से जन्म होता : वह माँ
जिसके पेट पर खेलने में मजा आता : वह पिता !

जो धारण करती : वह माँ
जो सिंचन करता : वह पिता !

जो गोद में लेकर सहलाती : वह माँ
जो हाथों में धर कर ऊंचा उठाता : वह पिता!

जो उंगली पकड़कर चलना सिखाती: वह माँ
जो कंधों पर लेकर दौड़ना सिखाता : वह पिता!

जो डूब-डूब गगरी करती: वह माँ
जो हर-हर गंगे करता : वह पिता!

जो आँचल तले दबाती: वह माँ
जो पिंजड़े से बाहर निकालता : वह पिता!

जो व्याकुल होती : वह माँ
जो संयम सिखाता : वह पिता!

जो आशीर्वचन जैसी: वह माँ
जो नमस्कार तुल्य : वह पिता!

जिसके सिवा जीवन नहीं : वह माँ
जिसके सिवा भविष्य नहीं: वह पिता !!

बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

मिट्टी के ही दीये जलाएँ, दीवाली पर अबकी बार


इस दीपावली पर जरा यह भी गौर कीजियेगा


कुम्हारन बैठी सड़क किनारे, लेकर दीये दो-चार।
जाने क्या होगा अबकी, करती मन में विचार।।

याद करके आँख भर आई, पिछला  दीवाली त्योहार।
बिक न पाया आधा समान, चढ गया सर पर उधार।।

सोच रही है अबकी बार, दूँगी सारे कर्ज उतार।
सजा रही है सारे दीये, करीने से बार बार।।

पास से गुजरते लोगों को, देखे कातर निहार।
बीत जाए न अबकी दीवाली, जैसा पिछली बार।।

नम्र निवेदन मित्रोंजनों से, करता हुँ मैँ मनुहार।
मिट्टी के ही दीये जलाएँ, दीवाली पर अबकी बार।।


आपकी सदाशयता किसी गरीब के घर में दीवाली ला  सकती है। 
आप सभी को दीपावली पर्व पर सपरिवार शुभकामनाएँ !!



शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

तेजाब के हमले में घायल एक लड़की के दिल से निकलीं कुछ पंक्तियाँ



चलो, फेंक दिया
सो फेंक दिया....
अब कसूर भी बता दो मेरा

तुम्हारा इजहार था
मेरा इन्कार था
बस इतनी सी बात पर
फूंक दिया तुमने
चेहरा मेरा....

गलती शायद मेरी थी
प्यार तुम्हारा देख न सकी
इतना पाक प्यार था
कि उसको मैं समझ ना सकी....

अब अपनी गलती मानती हूँ
क्या अब तुम ... अपनाओगे मुझको?
क्या अब अपना ... बनाओगे मुझको?

क्या अब ... सहलाओगे मेरे चहरे को?
जिन पर अब फफोले हैं
मेरी आंखों में आंखें डालकर देखोगे?
जो अब अन्दर धस चुकी हैं
जिनकी पलकें सारी जल चुकी हैं
चलाओगे अपनी उंगलियाँ मेरे गालों पर?
जिन पर पड़े छालों से अब पानी निकलता है

हाँ, शायद तुम कर लोगे....
तुम्हारा प्यार तो सच्चा है ना?

अच्छा! एक बात तो बताओ
ये ख्याल 'तेजाब' का कहाँ से आया?
क्या किसी ने तुम्हें बताया?
या जेहन में तुम्हारे खुद ही आया?
अब कैसा महसूस करते हो तुम मुझे जलाकर?
गौरान्वित..???
या पहले से ज्यादा
और भी मर्दाना...???

तुम्हें पता है
सिर्फ मेरा चेहरा जला है
जिस्म अभी पूरा बाकी है

एक सलाह दूँ!
एक तेजाब का तालाब बनवाओ
फिर इसमें मुझसे छलाँग लगवाओ
जब पूरी जल जाऊँगी मैं
फिर शायद तुम्हारा प्यार मुझमें
और गहरा और सच्चा होगा....

एक दुआ है....
अगले जन्म में
मैं तुम्हारी बेटी बनूँ
और मुझे तुम जैसा
आशिक फिर मिले
शायद तुम फिर समझ पाओगे
तुम्हारी इस हरकत से
मुझे और मेरे परिवार को
कितना दर्द सहना पड़ा है।
तुमने मेरा पूरा जीवन
बर्बाद कर दिया है।

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गुरुवार, 4 सितंबर 2014

मास्टर जी की छड़ी

स्कूल के दिनों में मास्टर जी की छड़ी याद है न। आज का परिवेश भले ही बदल गया हो, पर हमारे दौर में मास्टर जी की छड़ी बड़ी अहमियत रखती थी। कभी इस छड़ी को लेकर एक कविता लिखी थी, जिसे आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूँ। संयोगवश कल 'शिक्षक दिवस' भी है -



बचपन में खींच दी थी
मास्टर जी ने हाथों में लकीर

बाँस की ताजी टहनियों से बनी
उस दुबली-पतली छड़ी का साया
चुप कराने के लिए काफी था
जब कभी पड़ती वो किसी के हाथों पर 
तो बन जाती लकीरें आड़ी-तिरछी

शाम को घर लौटते हुये
ढूँढ़ने की कोशिश करते 
उन लकीरों में अपना भविष्य

कुछ की लकीरें तो
रात भर में ही गायब हो जातीं 
कुछ की लकीरें
दे जातीं जिंदगी का एक अर्थ 
जो कि उस लकीर की कडि़याँ बना
रचते जिंदगी का एक फलसफाँ।

( यह चित्र जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर-आजमगढ़ में कक्षा 6 में पढाई के दौरान का है।  इसमें हम भी हैं, कोशिश करिये, शायद पहचान पाएँ) 

रविवार, 1 जून 2014

भारत और इंडिया में अंतर


भारत में गॉंव है, गली है, चौबारा है.
इंडिया में सिटी है, मॉल है, पंचतारा है.

भारत में घर है, चबूतरा है, दालान है.
इंडिया में फ्लैट और मकान है.

भारत में काका है, बाबा है, दादा है, दादी है.
इंडिया में अंकल आंटी की आबादी है.

भारत में खजूर है, जामुन है, आम है.
इंडिया में मैगी, पिज्जा, माजा का नकली आम है.

भारत में मटके है, दोने है, पत्तल है.
इंडिया में पोलिथीन, वाटर व वाईन की बोटल है.

भारत में गाय है, गोबर है, कंडे है.
इंडिया में सेहतनाशी चिकन बिरयानी अंडे है.

भारत में दूध है, दही है, लस्सी है.
इंडिया में खतरनाक विस्की, कोक, पेप्सी है.

भारत में रसोई है, आँगन है, तुलसी है.
इंडिया में रूम है, कमोड की कुर्सी है.

भारत में कथडी है, खटिया है, खर्राटे हैं.
इंडिया में बेड है, डनलप है और करवटें है.

भारत में मंदिर है, मंडप है, पंडाल है.
इंडिया में पब है, डिस्को है, हॉल है.

भारत में गीत है, संगीत है, रिदम है.
इंडिया में डान्स है, पॉप है, आईटम है.

भारत में बुआ है, मौसी है, बहन है.
इंडिया में सब के सब कजन है.

भारत में पीपल है, बरगद है, नीम है.
इंडिया में वाल पर पूरे सीन है.

भारत में आदर है, प्रेम है, सत्कार है.
इंडिया में स्वार्थ, नफरत है, दुत्कार है.

भारत में हजारों भाषा हैं, बोली है.
इंडिया में एक अंग्रेजी एक बडबोली है.

भारत सीधा है, सहज है, सरल है.
इंडिया धूर्त है, चालाक है, कुटिल है.

भारत में संतोष है, सुख है, चैन है.
इंडिया बदहवास, दुखी, बेचैन है.

क्योंकि …
भारत को देवों ने, वीरों ने रचाया है.
इंडिया को लालची, अंग्रेजों ने बसाया है !!

(जिस किसी ने भी लिखा है, बेहद दिल्लगी से लिखा है )


रविवार, 11 मई 2014

माँ का आँचल


मेरा प्यारा सा बच्चा
गोद में भर लेती है बच्चे को
चेहरे पर नजर न लगे
माथे पर काजल का टीका लगाती है
कोई बुरी आत्मा न छू सके
बाँहों में ताबीज बाँध देती है।

बच्चा स्कूल जाने लगा है
सुबह से ही माँ जुट जाती है
चौके-बर्तन में
कहीं बेटा भूखा न चला जाये।
लड़कर आता है पड़ोसियों के बच्चों से
माँ के आँचल में छुप जाता है
अब उसे कुछ नहीं हो सकता।

बच्चा बड़ा होता जाता है
माँ मन्नतें माँगती है
देवी-देवताओं से
बेटे के सुनहरे भविष्य की खातिर
बेटा कामयाबी पाता है
माँ भर लेती है उसे बाँहों में
अब बेटा नजरों से दूर हो जायेगा।

फिर एक दिन आता है
शहनाईयाँ गूँज उठती हैं
माँ के कदम आज जमीं पर नहीं
कभी इधर दौड़ती है, कभी उधर
बहू के कदमों का इंतजार है उसे
आशीर्वाद देती है दोनों को
एक नई जिन्दगी की शुरूआत के लिए।

माँ सिखाती है बहू को
परिवार की परम्परायें व संस्कार
बेटे का हाथ बहू के हाथों में रख
बोलती है
बहुत नाजों से पाला है इसे
अब तुम्हें ही देखना है।

माँ की खुशी भरी आँखों से
आँसू की एक गरम बूँद
गिरती है बहू की हथेली पर।  

- कृष्ण कुमार यादव 
https://www.facebook.com/krishnakumaryadav1977

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

लोकतंत्र का यह त्यौहार




वोट आपकी ताकत है, 
वोट देश की चाहत है। 
वोट सबका अधिकार है, 
बनाता यह सरकार है। 

लोकतंत्र का यह त्यौहार,
मनाओ जैसे उत्सव-मेला।
करो न इसमें कोई कोताही, 
पाँच साल में आती यह बेला।

बंद करो अब शोर मचाना, 
मतदान केंद्र, सुबह पहुँच जाना।
अपनी पसन्द का बटन दबाना, 
किसी के भुलावे में नहीं आना। 


                                                                                     ************
कृष्ण कुमार यादव

शनिवार, 8 मार्च 2014

एक सवाल, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर


नहीं हूँ मैं माँस-मज्जा का एक पिंड
जिसे जब तुम चाहो जला दोगे
नहीं हूँ मैं एक शरीर मात्र
जिसे जब तुम चाहो भोग लोगे
नहीं हूँ मैं शादी के नाम पर अर्पित कन्या
जिसे जब तुम चाहो छोड़ दोगे
नहीं हूँ मैं कपड़ों में लिपटी एक चीज
जिसे जब तुम चाहो तमाशा बना दोगे।

मैं एक भाव हूँ, विचार हूँ
मेरा एक स्वतंत्र अस्तित्व है
ठीक वैसे ही, जैसे तुम्हारा
अगर तुम्हारे बिना दुनिया नहीं है
तो मेरे बिना भी यह दुनिया नहीं है।

फिर बताओं
तुम क्यों अबला मानते हो मुझे
क्यों पग-पग पर तिरस्कृत करते हो मुझे
क्या देह का बल ही सब कुछ है
आत्मबल कुछ नहीं
खामोश क्यों हो
जवाब क्यों नहीं देते........?
https://www.facebook.com/KKYadav1977

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

जब मैं छोटा था ...

भूमंडलीकरण और हाई-टेक होते इस समय में बहुत कुछ है जो पीछे छूट रहा है। वक़्त की भागमभाग में बहुत सारी चीजें हम विस्मृत करते जा रहे हैं।  जिन चीजों के साथ हम बड़े हुए, उन्हें ही आज बिसरा दिया।  वास्तविक सम्बन्धों पर वर्चुअल रिलेशन हावी हो गए, खतों की खुशबू कब एसएम्एस और चैट में तब्दील हो गई, पता ही नहीं चला। बाल सुलभ जिज्ञासाओं पर गूगल बाबा कुछ इतने हावी हुए कि  हर कुछ इंटरनेट पर ही खंगालने लगे।  शब्दों के अर्थ बदलने लगे, भावनाएं सिमटने लगी, मानवीय  इच्छाओं पर आभासी रंग चढ़ने लगा। वाट्स-एप पर एक मित्र ने जब नीचे लिखी पंक्तियाँ शेयर कीं तो ऐसा ही लगा -

वक़्त की भागमभाग के साथ 
शायद ज़िंदगी बदल रही है
जब मैं छोटा था, शायद दुनिया
बहुत बड़ी हुआ करती थी। 

मुझे याद है मेरे घर से
'स्कूल' तक का वो रास्ता, 
क्या क्या नहीं था वहाँ 
चाट के ठेले, जलेबी की दुकान,
बर्फ के गोले, सब कुछ,
अब  वहाँ 'मोबाइल शॉप','वीडियो पार्लर' हैं,
फिर भी सब सूना है
शायद अब दुनिया सिमट रही है। 

जब मैं छोटा था,
शायद शामें बहुत लम्बी 
हुआ करती थीं
मैं हाथ में पतंग की डोर पकड़े,
घंटों उड़ा करता था,

वो लम्बी 'साइकिल रेस',
वो बचपन के खेल,
वो हर शाम थक के चूर हो जाना,

अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है
और सीधे रात हो जाती है
शायद वक्त सिमट रहा है। 


जब मैं छोटा था,
शायद दोस्ती
बहुत गहरी हुआ करती थी,
दिन भर वो हुजूम बनाकर खेलना,
वो दोस्तों के घर का खाना,
वो साथ हँसना और रोना। 

अब भी मेरे कई दोस्त हैं,
पर दोस्ती जाने कहाँ है,
जब भी 'ट्रैफिक सिग्नल' पर  मिलते हैं
हाय-हैलो  हो जाती है,
और अपने अपने रास्ते चल देते हैं। 

होली, दीवाली, जन्मदिन, नए साल
अब  बस एसएमएस  आ जाते हैं,
शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं। 


जब मैं छोटा था, 
तब खेल भी खूब हुआ करते थे,
छुपम-छुपाई, लँगड़ी  टाँग।
पोषम पा, कट केक, 
टिप्पी टीपी टाप.

अब वीडियो गेम, फेसबुक  से 
फुर्सत ही नहीं मिलती। 
शायद ज़िन्दगी बदल रही है। 


जिंदगी का सबसे बड़ा सच यही है।  
जो अक्सर कब्रिस्तान के बाहर
बोर्ड पर लिखा होता है
"मंजिल तो यही थी, 
बस जिंदगी गुज़र गयी मेरी
यहाँ आते आते।"


ज़िंदगी का लम्हा बहुत छोटा सा है 
कल की कोई बुनियाद नहीं है
और आने वाला कल सिर्फ सपने में ही है 

अब बच गए इस पल में
तमन्नाओं से भरी इस जिंदगी में
हम सिर्फ भाग रहे हैं.
कुछ रफ़्तार धीमी करो, 
मेरे दोस्त,

और इस ज़िंदगी को जियो
खूब जियो मेरे दोस्त … !!

- कृष्ण कुमार यादव @ शब्द-सृजन की ओर 
- फेसबुक पेज : https://www.facebook.com/KKYadav1977/


शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

हाँ, यही प्यार है

डायरी के पुराने पन्नों को पलटिये तो बहुत कुछ सामने आकर घूमने लगता है. ऐसे ही इलाहाबाद विश्विद्यालय में अध्ययन के दौरान प्यार को लेकर एक कविता लिखी थी. आज आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूँ-



दो अजनबी निगाहों का मिलना
मन ही मन में गुलों का खिलना
हाँ, यही प्यार है............ !!

आँखों ने आपस में ही कुछ इजहार किया
हरेक मोड़ पर एक दूसरे का इंतजार किया
हाँ, यही प्यार है............ !!

आँखों की बातें दिलों में उतरती गई
रातों की करवटें और लम्बी होती गई
हाँ, यही प्यार है............ !!

सूनी आँखों में किसी का चेहरा चमकने लगा
हर पल उनसे मिलने को दिल मचलने लगा
हाँ, यही प्यार है............ !!

चाँद व तारे रात के साथी बन गये
न जाने कब वो मेरी जिन्दगी के बाती बन गये
हाँ, यही प्यार है............ !!



- कृष्ण कुमार यादव

फेसबुक पर भी मिलें - https://www.facebook.com/krishnakumaryadav1977

प्यार का भी भला कोई दिन होता है। इसे समझने में तो जिंदगियां गुजर गईं और प्यार आज भी बे-हिसाब है। कबीर ने यूँ ही नहीं कहा कि 'ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय' . प्यार का न कोई धर्म होता है, न जाति, न उम्र, न देश और न काल। … बस होनी चाहिए तो अंतर्मन में एक मासूम और पवित्र भावना। प्यार लेने का नहीं देने का नाम है, तभी तो प्यार समर्पण मांगता है। कभी सोचा है कि पतंगा बार-बार दिये के पास क्यों जाता है, जबकि वह जानता है कि दीये की लौ में वह ख़त्म हो जायेगा, पर बार-बार वह जाता है, क्योंकि प्यार मारना नहीं, मर-मिटना सिखाता है। तभी तो कहते हैं प्यार का भी भला कोई नाम होता है। यह तो सबके पास है, बस जरुरत उसे पहचानने और अपनाने की है न कि भुनाने की। -- कृष्ण कुमार यादव


मंगलवार, 26 नवंबर 2013

चुनावी बेला में 'मताधिकार'



लोकतंत्र की इस चकरघिन्नी में
पिसता जाता है आम आदमी
सुबह से शाम तक
भरी धूप में कतार लगाये
वह बाट जोहता है
अपने मताधिकार का
वह जानता भी नहीं
अपने इस अधिकार का मतलब
बस एक औपचारिकता है
जिसे वह पूरी कर आता है
और इस औपचारिकता के बदले
दे देता है अधिकार
चंद लोगों को
अपने ऊपर
राज करने का
जो अपने हिसाब से
इस मताधिकार का अर्थ निकालते हैं
और फिर छोड़ देते हैं
आम आदमी को
इंतजार करने के लिए
अगले मताधिकार का।

बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

हाड़-माँस का वह मनस्वी



गाँधी जैसे इतिहास पुरूष
इतिहास में कब ढल पाते हैं 
बौनी पड़ जाती सभी उपमायें
शब्द भी कम पड़ जाते हैं ।

सत्य-अहिंसा की लाठी
जिस ओर मुड़ जाती थी
स्वातंत्र्य समर के ओज गीत
गली-गली सुनाई देती थी।

बैरिस्टरी का त्याग किया
लिया स्वतंत्रता का संकल्प
बन त्यागी, तपस्वी, सन्यासी
गाए भारत माता का जप।

चरखा चलाए, धोती पहने
अंग्रेजों को था ललकारा
देश की आजादी की खातिर
तन-मन-धन सब कुछ वारा।

हो दृढ़ प्रतिज्ञ, संग ले सबको
आगे कदम बढ़ाते जाते
गाँधी जी के दिखाये पथ पर
बलिदानी के रज चढ़ते जाते।

हाड़-माँस का वह मनस्वी
युग-दृष्टा का था अवतार
आलोक पुंज बनकर दिखाया
आजादी का तारणहार।

भारत को आजाद कराया
दुनिया में मिला सम्मान
हिंसा पर अहिंसा की विजय
स्वातंत्र्य प्रेम का गायें गान।


सोमवार, 23 सितंबर 2013

बेटियाँ सिर्फ बेटियाँ नहीं होतीं

कल डाटर्स-डे था। भला बेटियों को भी किसी दिन में बांधा जा सकता है। बेटियों का तो सारा जहां है, उनके बिना यह जग ही अधूरा है। तभी तो कहते हैं कि बेटे भाग्य से मिलते हैं और बेटियाँ सौभाग्य से। बेटियों को लेकर लिखी गई जीवन-संगिनी आकांक्षा जी की यह कविता  बहुत अपील करती है-


हमारी बेटियाँ 
घर को सहेजती-समेटती
एक-एक चीज का हिसाब रखतीं
मम्मी की दवा तो
पापा का आफिस
भैया का स्कूल
और न जाने क्या-क्या।

इन सबके बीच तलाशती
हैं अपना भी वजूद
बिखेरती हैं अपनी खुशबू
चहरदीवारियों से पार भी
पराये घर जाकर
बना लेती हैं उसे भी अपना
बिखेरती है खुशियाँ
किलकारियों की गूंज  की ।

हमारी  बेटियाँ 
सिर्फ बेटियाँ  नहीं होतीं
वो घर की लक्ष्मी
और आँगन की तुलसी हैं
मायके में आँचल का फूल
तो ससुराल में वटवृक्ष होती हैं 
हमारी बेटियाँ ।


शनिवार, 25 मई 2013

बुद्ध और अंगुलिमाल






ठहरो!
तुम आगे नहीं जा सकते
फिर भी बुद्ध आगे बढ़ते रहे
अविचलित मुस्कुराते हुए
चेहरे पर तेज के साथ

अंगुलिमाल अवाक्
मानो किसी ने सारी हिंसा
उसके अन्दर से खींच ली हो
कदम अपने आप उठने लगे
और बुद्ध के चरणों में सिर रख दिया

उसने जान लिया कि
शारीरिक शक्ति से महत्वपूर्ण
आत्मिक शक्ति है
आत्मा को जीतना ही
परमात्मा को जीतना है।

(चित्र में : सारनाथ में कृष्ण कुमार यादव)

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आज बुद्ध पूर्णिमा है। जिस महात्मा बुद्ध ने तमाम कर्मकांडों के विरुद्ध आवाज़ उठाई, उसे हमने मूर्तियों, पूजा और कर्मकांडों के बीच उलझा दिया। दुर्भाग्य यही है कि जब कोई अच्छा कार्य करता है तो हम उसे मानव की बजाय भगवान बना देते हैं और इसी के साथ उसके विचारों की बजाय आडम्बर को ज्यादा महत्त्व देने लगते हैं। बुद्ध का मध्यम मार्ग मुझे बहुत भाता है, न तो अतिवादिता और न ही निम्नता। आज जीवन को अच्छे से जीने का यही माध्यम मार्ग भी उत्तम है !!

 (जीवन संगिनी आकांक्षा जी के फेस बुक टाइम लाइन से  )