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बुधवार, 9 नवंबर 2016

आधुनिक दौर में बच्चों में अध्ययन के साथ-साथ रचनात्मकता होना बहुत जरूरी- कृष्ण कुमार यादव


आधुनिक दौर में बच्चों में अध्ययन के प्रति समर्पण के साथ-साथ रचनात्मकता होना भी बहुत जरूरी है। यह रचनात्मकता ही हमें जिज्ञासु बनाती है और संवेदनशीलता को बरकरार रखती है। इसके लिए हमारे भीतर का बचपन जिन्दा रहना चाहिए। उक्त उद्गार राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएँ एवं चर्चित साहित्यकार व ब्लॉगर श्री कृष्ण कुमार यादव ने 8 नवम्बर, 2016 को राजस्थान साहित्य परिषद् की ओर से पुलकित सीनियर सैकण्डरी स्कूल, हनुमानगढ़  में आयोजित पुस्तक लोकार्पण समारोह में वरिष्ठ बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा की चार बाल पुस्तकों का लोकार्पण करते हुए कहीं। 

बोधि प्रकाशन, जयपुर द्वारा  प्रकाशित चारों पुस्तकों  हिन्दी बाल गीत-‘चिडिय़ा चहके गीत सुनाए’, शिशु गीत-‘रसगुल्ला’, बाल कहानियां-‘मित्र की मदद’ तथा राजस्थानी बाल गीत-‘दिवळो कोई जगावां’ के लोकार्पण अवसर पर उपस्थित विद्यार्थियों और स्कूली बच्चों से रूबरू होते हुए  निदेशक डाक सेवाएँ एवं चर्चित साहित्यकार व ब्लॉगर श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि हमें मात्र रूटीनी गतिविधियाँ करके रोबोट नहीं बनना। किताबी पढ़ाई बहुत कुछ है लेकिन यह ही सब कुछ नहीं है। असली संसार तो इन किताबों से बाहर बसता है, जिसे कवि, लेखक और साहित्यकार अपने खूबसूरत शब्दों के माध्यम से पन्नों के दायरे में बाँधने की कोशिश करते हैं और हम सबसे रूबरू करवाते हैं। 

श्री कृष्ण कुमार यादव ने वर्तमान दौर में बच्चों के मन में चल रहे अन्तर्दन्द्धों और सपनों को बाहर लेन की बात कही। उन्होंने कहा कि समाचार पत्रों और न्यूज चैनलों पर अक्सर देखते और पढ़ते हैं कि अमुक जगह पर किसी बच्चे ने फेल होने पर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या किसी समस्या का हल नहीं है। पढ़ाई के अलावा भी बहुत कुछ है। किसी बच्चे को खेल में, किसी को पेण्टिंग या ड्राइंग में तो किसी को संगीत आदि में रूचि होती है। हमें अपनी रूचियों को बढ़ावा देते हुए इसमें और आगे बढऩा चाहिए। 

श्री यादव ने कहा कि बाल साहित्यकार के रूप में दीनदयाल शर्मा ने तमाम खूबसूरत कृतियाँ रची हैं और इन रचनाओं में हमारा-आपका सभी का बचपन जीवंत होता है।  इनकी रचनाओं में सहजता है और बाल सुलभता है। बच्चों से संवाद करती इन बाल रचनाओं ने दीनदयाल शर्मा जी को सिर्फ राजस्थान ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाई है। श्री यादव ने आशा व्यक्त की कि सेवानिवृत्त  होने के बाद दीनदयाल शर्मा बाल-साहित्य के लिए और भी समय निकल सकेंगें और उनके मार्गदर्शन में तमाम भावी बाल साहित्यकार भी पैदा होंगे। 





लोकार्पण के मौके पर पुस्तकों के रचनाकार दीनदयाल शर्मा ने लोकार्पित पुस्तकों से कुछ कविताएं भी सुनाईं। कार्यक्रम के आरंभ में मुख्य अतिथि निदेशक डाक सेवाएं एवं वरिष्ठ साहित्यकार कृष्णकुमार यादव को माल्यार्पण करके श्रीफल भेंट किया गया तथा शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के अंत में स्कूल के प्रधानाचार्य राजेश मिढ़ा ने अतिथियों को धन्यवाद देते हुए आभार जताया। कार्यक्रम का संचालन सुदर्शन सामरिया, जोधपुर ने किया।
(प्रस्तुति - दीनदयाल शर्मा, संपादक -टाबर टोली, हनुमानगढ़, राजस्थान)






मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

मेरा भी तो ब्याह रचाओ

 
राजा जी की निकली सवारी,
हाथी-घोड़ा औ' दरबारी।
हाथी दादा रूठ गए,
पीछे-पीछे छूट गए।

रानी बोली हाथी लाओ,
फिर आगे को कदम बढ़ाओ।
सारे सैनिक दौड़ पड़े,
हाथी दादा अडिग खड़े।

पहले मानो मेरी बात,
तब आऊँ मैं सबके साथ।
बोले मेरी हथिनी लाओ,
मेरा भी तो ब्याह रचाओ।

शनिवार, 5 मई 2012

पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह ने किया कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रहों का विमोचन

युगल दंपत्ति एवं चर्चित साहित्यकार व ब्लागर कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रह 'जंगल में क्रिकेट' एवं 'चाँद पर पानी' का विमोचन पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह और डा. रत्नाकर पाण्डेय (पूर्व सांसद) ने राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास एवं भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद्, नई दिल्ली द्वारा गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में 27 अप्रैल, 2012 को किया. उद्योग नगर प्रकाशन, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित इन दोनों बाल-गीत संग्रहों में कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के 30 -30 बाल-गीत संगृहीत हैं.
इस अवसर पर दोनों संग्रहों का विमोचन करते हुए अपने उद्बोधन में पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह ने युगल दम्पति की हिंदी साहित्य के प्रति समर्पण की सराहना की. उन्होंने कहा कि बाल-साहित्य बच्चों में स्वस्थ संस्कार रोपता है, अत: इसे बढ़ावा दिए जाने क़ी जरुरत है. पूर्व सांसद डा. रत्नाकर पाण्डेय ने युवा पीढ़ी में साहित्य के प्रति बढती अरुचि पर चिंता जताते हुए कहा कि, यह प्रसन्नता का विषय है कि भारतीय डाक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी होते हुए भी श्री यादव अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं और यह बात उनकी कविताओं में भी झलकती है. युगल दम्पति के बाल-गीत संग्रह क़ी प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें आज का बचपन है और बीते कल का भी और यही बात इन संग्रह को महत्वपूर्ण बनाती है.
कार्यक्रम में राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास के संयोजक डा. उमाशंकर मिश्र ने कहा कि यदि युगल दंपत्ति आज यहाँ उपस्थित रहते तो कार्यक्रम कि रौनक और भी बढ़ जाती. गौरतलब है कि अपनी पूर्व व्यस्तताओं के चलते यादव दंपत्ति इस कार्यक्रम में शरीक न हो सके. आभार ज्ञापन उद्योग नगर प्रकाशन के विकास मिश्र द्वारा किया गया. इस कार्यक्रम में तमाम साहित्यकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार इत्यादि उपस्थित थे.

- रत्नेश कुमार मौर्या, संयोजक- 'शब्द-साहित्य', इलाहाबाद.


सोमवार, 23 अप्रैल 2012

ज्ञानदायिनी प्यारी पुस्तक




प्यारी पुस्तक, न्यारी पुस्तक

ज्ञानदायिनी प्यारी पुस्तक

कला-संस्कृति, लोकजीवन की

कहती है कहानी पुस्तक।


अच्छी-अच्छी बात बताती

संस्कारों का पाठ पढ़ाती

मान और सम्मान बड़ों का

सुन्दर सीख सिखाती पुस्तक।


सीधी-सच्ची राह दिखाती

ज्ञान पथ पर है ले जाती

कर्म और कर्तव्य हमारे

सद्गुण हमें सिखाती पुस्तक।

("विश्व पुस्तक दिवस" पर यह बाल कविता)

-- कृष्ण कुमार यादव--

गुरुवार, 26 जनवरी 2012

आन-बान से लहराता


तीन रंगों का प्यारा झण्डा
राष्ट्रीय ध्वज है कहलाता
केसरिया, सफेद और हरा
आन-बान से यह लहराता

चौबीस तीलियों से बना चक्र
प्रगति की राह है दिखाता
समृद्धि और विकास के सपने
ले ऊँचे नभ में सदा फहराता

अमर शहीदों की वीरता और
बलिदान की याद दिलाता
कैसे स्वयं को किया समर्पित
इसकी झलक दिखलाता

आओ हम यह खायें कसम
शान न होगी इसकी कम
वीरों के बलिदानों को
व्यर्थ न जानें देंगे हम।

कृष्ण कुमार यादव

रविवार, 1 जनवरी 2012

नव वर्ष की बेला आई..




नव वर्ष की बेला आई,
खुशियों की सौगातें लाई।
कर गुजरने का है मौका,
सद्भावों की नौका लाई।

नया वर्ष है, नया तराना,
झूमें-नाचें गाएं गाना।
और नया संकल्प हमारा,
कभी किसी को नहीं सताना।

बदला साल, कैलेण्डर बदला,
बदला है इस तरह जमाना।
भेजें सबको नेह निमंत्रण,
नए वर्ष का गाएं तराना।

नव वर्ष-2012 की हार्दिक बधाई

कृष्ण कुमार यादव

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

गुलाब


गुलाब की प्यारी खुशबू
ने ऐसा रंग जमाया
फूलों में बन सर्वोत्तम
फूलांे का राजा कहलाया।

सफेद,गुलाबी,पीले,लाल
हर रंग में ये आए
एक बार जो देखे इनको
मन ही मन हर्षाये।

कांँटों में गुलाब पलता है
कष्टों में गुलाब चलता है
बच्चों अपनाओं इस गुण को
जीवन इसी तरह चलता है।

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

नव वर्ष की बेला आई..


नव वर्ष की बेला आई
खुशियों की सौगातें लाई
नया कर गुजरने का मौका
सद्भावों की नौका लाई

नया वर्ष है, नया तराना
झूमो-नाचो, गाओ गाना
इस वर्ष संकल्प है अपना
नहीं किसी को है सताना

बदला साल, कैलेण्डर बदला
बदला है इस तरह जमाना
भेजो सबको स्नेह निमंत्रण
गाओ नव वर्ष का तराना।

कृष्ण कुमार यादव
चित्र साभार : वेबदुनिया

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

राखी का त्यौहार (बाल-गीत)



राखी का त्यौहार अनोखा
भाई-बहन का प्यार अनोखा

आओ भैया, आओ भैया
जल्दी से तुम हाथ बढ़ाओ

रंग-बिरंगी राखी लायी
अपने हाथों में बंधवाओ

करूँ आरती, तिलक लगाऊँ
और मिठाई तुम्हें खिलाऊँ

जल्दी से दे दो उपहार
बहना का है यह त्यौहार

भैया मेरे भूल न जाना
रक्षा का कर्तव्य निभाना।

मंगलवार, 25 मई 2010

कितने सुंदर हैं गुब्बारे

सरस पायस पर प्रकाशित मेरी बाल कविता कितने सुंदर हैं गुब्बारे का लुत्फ़ आप भी उठाइए। रावेन्द्रकुमार रवि जी ने इसमें कुछेक परिवर्तन कर इसे और भी रोचक बना दिया है... आभार !!

लाल-बैंगनी-हरे-गुलाबी,
रंग-बिरंगे हैं ये प्यारे।
एक नहीं हैं इतने सारे,
कितने सुंदर हैं गुब्बारे।

गुब्बारों की दुनिया होती,
कितनी-प्यारी और निराली।
हँस देते रोनेवाले भी,
खिल जाती चेहरे पर लाली।

हम सब दौड़ें इनके पीछे,
कसकर पकड़े इन्हें हाथ में।
सीना ताने घूम रहे हैं,
हम सब इनको लिए साथ में।

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

पुस्तकों के प्रति आकर्षण जरुरी (विश्व पुस्तक दिवस पर)

पढना किसे अच्छा नहीं लगता। बचपन में स्कूल से आरंभ हुई पढाई जीवन के अंत तक चलती है. पर दुर्भाग्यवश आजकल पढ़ने की प्रवृत्ति लोगों में कम होती जा रही है. पुस्तकों से लोग दूर भाग रहे हैं. हर कुछ नेट पर ही खंगालना चाहते हैं. शोध बताते हैं कि इसके चलते लोगों की जिज्ञासु प्रवृत्ति और याद करने की क्षमता भी ख़त्म होती जा रही है. बच्चों के लिए तो यह विशेष समस्या है. पुस्तकें बच्चों में अध्ययन की प्रवृत्ति, जिज्ञासु प्रवृत्ति, सहेजकर रखने की प्रवृत्ति और संस्कार रोपित करती हैं. पुस्तकें न सिर्फ ज्ञान देती हैं, बल्कि कला-संस्कृति, लोकजीवन, सभ्यता के बारे में भी बताती हैं. नेट पर लगातार बैठने से लोगों की आँखों और मस्तिष्क पर भी बुरा असर पड़ रहा है. ऐसे में पुस्तकों के प्रति लोगों में आकर्षण पैदा करना जरुरी हो गया है. इसके अलावा तमाम बच्चे गरीबी के चलते भी पुस्तकें नहीं पढ़ पाते, इस ओर भी ध्यान देने की जरुरत है. 'सभी के लिए शिक्षा कानून' को इसी दिशा में देखा जा रहा है.


आज विश्व पुस्तक दिवस है. यूनेसको ने 1995 में इस दिन को मनाने का निर्णय लिया, कालांतर में यह हर देश में व्यापक होता गया. लोगों में पुस्तक प्रेम को जागृत करने के लिए मनाये जाने वाले इस दिवस पर जहाँ स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई की आदत डालने के लिए सस्ते दामों पर पुस्तकें बाँटने जैसे अभियान चलाये जा रहे हैं, वहीँ स्कूलों या फिर सार्वजनिक स्थलों पर प्रदर्शनियां लगाकर पुस्तक पढ़ने के प्रति लोगों को जागरूक किया जा रहा है. स्कूली बच्चों के अलावा उन लोगों को भी पढ़ाई के लिए जागरूक किया जाना जरुरी है जो किसी कारणवश अपनी पढ़ाई छोड़ चुके हैं। बच्चों के लिए विभिन्न जानकारियों व मनोरंजन से भरपूर पुस्तकों की प्रदर्शनी जैसे अभियान से उनमें पढ़ाई की संस्कृति विकसित की जा सकती है. पुस्तकालय इस सम्बन्ध में अहम् भूमिका निभा सकते हैं, बशर्ते उनका रख-रखाव सही ढंग से हो और स्तरीय पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं वहाँ उपलब्ध कराई जाएँ। वाकई आज पुस्तकों के प्रति ख़त्म हो रहे आकर्षण के प्रति गंभीर होकर सोचने और इस दिशा में सार्थक कदम उठाने की जरुरत है. विश्व पुस्तक दिवस पर अपना एक बाल-गीत भी प्रस्तुत कर रहा हूँ-




प्यारी पुस्तक, न्यारी पुस्तक

ज्ञानदायिनी प्यारी पुस्तक

कला-संस्कृति, लोकजीवन की

कहती है कहानी पुस्तक।


अच्छी-अच्छी बात बताती

संस्कारों का पाठ पढ़ाती

मान और सम्मान बड़ों का

सुन्दर सीख सिखाती पुस्तक।



सीधी-सच्ची राह दिखाती

ज्ञान पथ पर है ले जाती

कर्म और कर्तव्य हमारे

सदगुण हमें सिखाती पुस्तक।

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

धरती से मरूभूमि भगाएं (पृथ्वी दिवस पर प्रस्तुति)



सुन्दर-सुन्दर वृक्ष घनेरे

सबको सदा बुलाते

ले लो फल-फूल सुहाने

सब कुछ सदा लुटाते।


करते हैं जीवन का पोषण

नहीं करो तुम इनका शोषण

धरती पर होगी हरियाली

तो सारे जग की खुशहाली।


वृक्ष कहीं न कटने पाएं

संकल्पों के हाथ उठाएं

ढेर सारे पौधे लगाकर

धरती से मरूभूमि भगाएं।

गुरुवार, 25 मार्च 2010

पाखी को जन्म-दिवस की बधाइयाँ !!

ये देखिये हमारी बिटिया अक्षिता (पाखी) को। पूरे अंडमान (Andaman & Nicobar Islands) के रंग में रंग गई हैं। हर रोज समुद्र का किनारा, पार्क, म्यूजियम, चिड़िया टापू, यहाँ का खूबसूरत परिवेश और जमकर मस्ती। इन्हें बस मौका मिलना चाहिए बीच पर जाने का, फिर क्या। इतना दौड़ेन्गी कि हम इनके पीछे ही दौड़ते रह जाएं. यही बच्चों का बाल-सुलभ संसार है. वे किसी सीमा को नहीं जानते और न ही कोई डर. बस अपनी अलबेली दुनिया में मस्त. हमारी जीवन-संगिनी आकांक्षा जी की एक बाल-कविता "लौट आओ बचपन" की पंक्तियाँ गौरतलब हैं-

बचपन मेरा कितना प्यारा
मम्मी-पापा का राजदुलारा
माँ की ममता, पापा का प्यार
याद आता है लाड़-दुलार।

बचपन मेरा लौट जो आए
जीवन में खुशहाली लाए
पढ़ाई से मिलेगी छुट्टी
बात नहीं कोई होगी झूठी।

अब बचपन मेरे लौट भी आओ
हंसो, खेलो और मौज मनाओ !!
जब भी पाखी को देखता हूँ तो अपना बचपन याद आने लगता है. वाकई बचपन के दिनों के क्या कहने. आज पाखी का जन्म-दिवस है, पूरे चार साल की हो गईं. इनका पिछला जन्म-दिवस कभी नहीं भूलूँगा, जब जबरदस्त बीमारी के बाद उसी दिन हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हुआ था. मानो खुशियाँ दुगुनी हो गई थीं. पाखी और उनकी मम्मी आकांक्षा बहुत खुश थीं उस दिन. खैर ये सब समय का चक्र है, जो अपनी चाल चलता रहता है. मुझे याद है जब पाखी का जन्म हुआ था तो मुझे सीनियर टाइम स्केल वेतनमान में प्रोन्नति मिली थी और इस बार पाखी के जन्म-दिन से लगभग कुछ ही दिनों पहले निदेशक के रूप में प्रोन्नति. लोग कहते हैं कन्या लक्ष्मी-स्वरूपा होती हैं, मेरे मामले में यह अक्षरक्ष: सही है।


आज 25 मार्च को पाखी का जन्म-दिवस है। इस दिन का हम बेसब्री से इंतजार करते हैं, और वो खुशनसीब दिन आज है. पाखी को जन्म-दिवस की ढेर सारी बधाई, आशीष और प्यार. वह यूँ ही हँसती-खिलखिलाती रहे और हमारे दामन में खुशियाँ भरती रहे !!

बुधवार, 27 मई 2009

नेहरु चाचा आओ ना (पुण्य-तिथि पर)


नेहरु चाचा आओ ना
दुनिया को समझाओ ना
बच्चे कितने प्यारे होते
कोई उन्हे सताये ना

नेहरु चाचा आओ ना
मधु मुस्कान दिखाओ ना
तुम गुलाब की खुशबू हो
बचपन को महकाओ ना

नेहरु चाचा आओ ना
उजियारा फैलाओ ना
देशभक्त हों, पढें लिखें
ऐसा पाठ पढाओ ना

नेहरु चाचा आओ ना !!