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शुक्रवार, 31 मई 2024

Baobab, Parijat and Kalpvriksha Tree : बाओबाब, पारिजात और कल्प वृक्ष...


'पारिजात' और 'कल्प वृक्ष' के नाम से प्रसिद्ध एवं प्रयागराज के झूंसी में पवित्र नदी गंगा के बाएं किनारे पर मिट्टी के एक विशाल टीले पर स्थित अफ्रीका के एडानसोनिया डिजिटाटा प्रजाति के दुर्लभ एवं प्राचीन 'बाओबाब' वृक्ष (Baobab tree of the Adansonia Digitata species) पर प्रयागराज प्रधान डाकघर में आयोजित एक समारोह में 30 मई, 2024 को एक विशेष आवरण व विरूपण का विमोचन किया गया। शेख तकी की मजार के पास मौजूद इस ऐतिहासिक दुर्लभ वृक्ष की आयु  750 से 1350 वर्ष के बीच मानी जाती है और इसके साथ तमाम किवदंतियां और लोगों की आस्था जुड़ी हुई है। इसके तने की मोटाई 17.3 मीटर है और इस वृक्ष का फूल बड़ा तथा फल लंबा और हरे रंग का होता है। कुछ लोग इसे 'विलायती इमली' के नाम से जानते हैं। माघ मास में देश-विदेश  से आने वाले श्रद्धालु इसकी परिक्रमा करके पूजते हैं। यह वृक्ष प्रयागराज की पंचकोसी परिक्रमा के अंतर्गत आता है। ऐसे में इस पर विशेष डाक आवरण और विरूपण के माध्यम से इसकी ऐतिहासिकता, आध्यात्मिकता, वैज्ञानिकता और औषधीय गुणों के बारे में देश-दुनिया में प्रसार होगा और इसे शोध और पर्यटन से भी जोड़ने में सुविधा होगी। 

'द ट्री ऑफ लाइफ' के नाम से प्रसिद्ध 'बाओबाब' वृक्ष मूलतः मैडागास्कर, अफ्रीका और आस्ट्रेलिया में पाए जाते हैं। बाओबाब बेशकीमती वृक्ष है, जिसे अफ्रीका में 'द वर्ल्ड ट्री' की उपाधि दी गई है और वहां के आर्थिक विकास में इन वृक्षों का विशेष महत्व है। साल में नौ महीने तक बिना पत्ते के रहने वाला दुनिया का यह अद्भूत वृक्ष मेडागास्कर का राष्ट्रीय वृक्ष होने का गौरव प्राप्त कर चुका है। इन्हें एशिया और अन्य भागों में संभवतः पुर्तगालियों द्वारा प्रसारित किया गया। 'बाओबाब' वृक्ष का वैज्ञानिक नाम एडानसोनिया डिजिटाटा है, जो फ्रांसीसी प्रकृति विज्ञानी मिशेल एडनसन के नाम पर आधारित है। एडनसन ने ही सर्वप्रथम इस वृक्ष की विशेषताओं का अध्ययन किया था और उनका वर्णन किया था। इसमें वसन्त ऋतु से लेकर छह महीने तक ही पत्तियाँ रहती हैं, शेष छह महीने तक यह ठूँठ रहता है। इसलिए इसे उल्टा वृक्ष भी कहते हैं। ठूँठ अवस्था में इसे देख कर ऐसा लगता है जैसे इसकी जड़ें ऊपर और डालियाँ नीचे की ओर कर दी गई हैं। बाओबाब के मोटे तने में वर्षा जल को संग्रहीत करने का अनूठा गुण होता है। यह विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है। इसकी प्रमुख विशेषता अतिजीविता है। यह वृक्ष अपने जीवन काल में लगभग 1,20,000 लीटर तक का पानी संग्रह कर सकता है। कहते हैं कि यदि इसे क्षति न पहुँचाई जाय तो यह छह हजार साल तक जीवित रह सकता है। संभवतः इसकी अतिजीविता और विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रहने की विशेषता के कारण इसे 'कल्पवृक्ष' या 'पारिजात' कहा गया है। 










रविवार, 8 जनवरी 2017

टॉप ब्लॉग्स में शामिल हुआ आकांक्षा यादव का 'शब्द-शिखर' और कृष्ण कुमार यादव का 'डाकिया डाक लाया'


 देश-विदेश में इंटरनेट पर हिंदी के व्यापक प्रचार-प्रसार और ब्लागिंग के माध्यम से अपनी रचनाधर्मिता को विस्तृत आयाम देने वाले ब्लॉगर दम्पति राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर  के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव और उनकी पत्नी आकांक्षा  यादव के ब्लॉग क्रमश: "डाकिया डाक लाया" (http://dakbabu.blogspot.in/) और "शब्द-शिखर" (http://shabdshikhar.blogspot.in/) को  टॉप हिंदी ब्लॉग्स में शामिल किया गया है। वर्ष 2008 से ब्लॉगिंग में सक्रिय एवम  ''दशक के श्रेष्ठ हिंदी ब्लॉगर दम्पति'' और  सार्क देशों के सर्वोच्च ''परिकल्पना ब्लॉगिंग सार्क शिखर सम्मान'' से सम्मानित  दम्पति के दोनों ब्लॉगों को इंडियन टॉप ब्लॉग्स द्वारा 2015-16 के  लिए हाल ही में जारी हिंदी के सर्वश्रेष्ठ 130 ब्लॉगों की डायरेक्टरी में स्थान दिया गया है। वर्तमान में हिंदी में एक लाख से ज्यादा ब्लॉग संचालित हैं।

 डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव और उनकी पत्नी आकांक्षा यादव  नेपाल, भूटान और श्रीलंका सहित तमाम देशों में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर्स सम्मेलन में सम्मानित हो चुके हैं। जर्मनी के बॉन शहर में होने वाले ग्लोबल मीडिया फोरम (2015) के दौरान 'पीपुल्स चॉइस अवॉर्ड' श्रेणी में  आकांक्षा यादव के ब्लॉग 'शब्द-शिखर'  को हिंदी के सबसे लोकप्रिय ब्लॉग के रूप में भी सम्मानित किया जा चुका है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा वर्ष  2012 में इस दम्पति को  ”न्यू मीडिया एवं ब्लाॅगिंग” में उत्कृष्टता के लिए ''अवध सम्मान'' से भी विभूषित किया जा  चुका  है। सौ से ज्यादा देशों में देखे-पढ़े जाने वाले इनके ब्लॉग 'डाकिया डाक लाया' और 'शब्द-शिखर' पर अब तक 738 और 512 पोस्ट प्रकाशित हैं।

ब्लॉगिंग के साथ-साथ कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव साहित्य और लेखन में भी सक्रिय हैं।  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के साथ-साथ,  अब तक श्री यादव की 7 पुस्तकें और नारी सम्बन्धी मुद्दों पर प्रखरता से लिखने वालीं आकांक्षा यादव की 3 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। देश-दुनिया में शताधिक सम्मानों से विभूषित यादव दम्पति एक लंबे समय से ब्लॉग और सोशल  मीडिया के माध्यम से हिंदी साहित्य एवं विविध विधाओं में अपनी रचनाधर्मिता को प्रस्फुटित करते हुये अपनी व्यापक पहचान बना चुके हैं।
साभार :
टॉप ब्लॉग्स में शामिल हुए यादव दम्पति कृष्ण कुमार और आकांक्षा यादव (साभार : दैनिक नवज्योति)


डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव  और उनकी पत्नी आकांक्षा टॉप ब्लॉग्स में शामिल (साभार : बाजार टाइम्स)

शीर्ष में शामिल हुए यादव दम्पति के ब्लॉग्स (साभार : दैनिक युगपक्ष, बीकानेर)

टॉप ब्लॉग में जिले के ब्लॉगर दम्पति (साभार : दैनिक जागरण)
जौनपुर जिले के दो दम्पति के ब्लॉग शिखर पर (साभार : दैनिक हिंदुस्तान)
'डाकिया डाक लाया' और 'शब्द-शिखर' टॉप हिंदी ब्लॉग्स में शामिल (साभार : राष्ट्रीय सहारा)


      
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रविवार, 14 जुलाई 2013

अब बस यादों में रह जायेगा टेलीग्राम

(जब हम कल सुबह जगेंगे तो एक तकनीक खो चुके होंगे. कल 15 जुलाई से टेलीग्राम सेवा भारत में ख़त्म हो जाएगी। 160 साल पुरानी इस सेवा ने इतिहास के कई बनते-बिगड़ते पहलू देखे हैं और अब खुद इतिहास बनने जा रही है। टेलीग्राम भले ही न रहेगा, पर हमारी स्मृतियों में सदैव जीवंत रहेगा !!)

21वीं सदी में टेक्नालाजी के विकास एवं संचार व सूचना क्रांति ने बहुत सारी बातों को पीछे छोड़ दिया है। एक दौर में जिन तकनीकों को अपरिहार्य माना जाता था, वही अब अतीत की चीज बनकर रह गये हैं । न जाने कितनी चीजें हमारी आँखों के सामने आरम्भ हुईं और हमारे ही सामने उनका दौर भी खत्म हो गया। फ्लापी, पेजर, ब्लैक एंड व्हाइट टीवी, छतों पर दिखता टीवी का एंटीना, रेडियो एंटीना, वाकमैन और भी बहुत कुछ। नयी पीढ़ी इन्हें या तो म्यूजियम में देखती है, या तो इन्टरनेट पर खंगालती है। ऐसी ही एक सेवा टेलीग्राम (तार) अब अतीत की वस्तु बनने वाली है। टेलीग्राम एक जगह से दूसरी जगह संदेश भेजने का यांत्रिक माध्यम है। इसमें किसी चीज का भौतिक विनिमय किए बगैर संदेश भेजा जाता है। इसमें विशेष संकेतों के जरिये कोई सूचना कहीं भेजी जाती है। स्मार्ट फोन, ईमेल और एसएमएस के मौजूदा दौर में अब 160 साल पुरानी टेलीग्राम सेवा को सरकार ने 15 जुलाई से बंद करने का फैसला किया है। लेकिन तार का बंद हो जाना सिर्फ एक अप्रासंगिक हो चुकी सेवा का बंद हो जाना भर नहीं है। आज भी एक नहीं, ऐसी कई-पीढियां मौजूद हैं, जिन्होंने एक समय में तेजी से और आवश्यक संचार के लिए मुख्य स्त्रोत मानी जाने वाली इस सेवा के माध्यम से ही सुख-दुख के न जाने कितने संदेश ग्रहण किए, लेकिन नई तकनीक के आने और संचार के नए साधनों से टेलीग्राम खुद को बेगाना पाने लगा।

आज मोबाइल-इंटरनेट के दौर में नवीनतम तकनीक से संवाद चल रहा है, लेकिन एक जमाने में जल्द संदेश भेजने का एकमात्र जरिया टेलीग्राम या तार ही था। इंटरनेट और मोबाइल फोन के युग में पैदा हुई पीढ़ी यह सुनकर हैरत में पड़ सकती है कि कभी डाकिया द्वारा यह सुनकर कि टेलीग्राम आया है, सुनकर लोगों के दिलों की धड़कन बढ़ जाती थी। लोग मनाने लगते, कोई बुरी खबर न आए। कुछेक मामलों में टेलीग्राम खुशखबरी भी लाता। शहरों में कामकाज के लिए आने वाले लोग अपने घर-परिवार को या फिर उनके परिवार के सदस्य जल्द संदेश के लिए टेलीग्राम ही भेजा करते थे। सीमा पर तैनात फौजियों का उनकी पत्नियों व परिवार से अकस्मात संवाद टेलीग्राम द्वारा ही होता था। दूर देश से अपने परिचितों को जल्दी से जल्दी संदेश भेजने का माध्यम भी तब टेलीग्राम या तार ही हुआ करता था। नौकरियों की सूचना भी टेलीग्राम या तार से आती थी। यह सेवा बहुत सस्ती नहीं थी, इसलिए 'थोड़ा लिखा है ज्यादा समझना’ वाले अंदाज में संदेश भेजे जाते थे। इसके लिए देश के सभी इलाकों में सरकार ने तार-घर खोले हुए थे। 

टेलीग्राम का भी अपना लम्बा इतिहास रहा है। माना जाता है कि टेलीग्राम की अवधारणा को जमीन पर उतारने में कुल 22 लोगों का हाथ है। 1792 से ही यूरोप में संकेतों के जरिये समाचार भेजने के यंत्र सेमाफोर लाइन के रूप में यह विधि मौजूद थी। पर वर्ष 1837 में महान अमेरिकी वैज्ञानिक सैमुअल एफबी मोर्स ने मोर्स कोर्ड टेलीग्राफ की खोज करके दुनिया में संचार क्रांति को नया रूप दिया था। कहा जाता है कि सैमुअल मोर्स मूलतः पेंटर थे। वर्ष 1825 में न्यूयार्क में जब वे अपनी पेटिंग पर काम कर रहे थे, उन्हें पत्नी की बीमारी के बारे में एक घुड़सवार ने पत्र लाकर दिया। पर दुर्भागयवश जब तक वे घर पहुँचते, पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। मोर्स इस घटना से इतने आहत हुए कि उन्होंने एक ऐसा यन्त्र इजाद करने की सोची, जिससे किसी आकस्मिक स्थिति में तुरन्त सन्देश भेजा  जा सके। फिर क्या थे वे इस मिशन पर जुट गए। अन्ततः सैमुअल मोर्स ने सन 1844 में अमेरिका में वॉशिंगटन और बॉल्टिमोर के बीच पहला टेलीग्राम भेजकर इसका इजाद किया।

19वीं सदी में जब टेलीफोन की खोज नहीं हुई थी उस समय संकेत के द्वारा संदेश एक जगह से दूसरी जगह तक भेजे जाते थे। सैमुएल मोर्स ने इसका निर्माण वैद्युत टेलीग्राफ के माध्यम से संदेश भेजने के लिए किया था। 1840 के दशक में संदेश भेजने की इस नई पद्धति का नाम ‘डैश-डाट‘ प्रणाली था, जिसे मोर्स कोड के नाम से जाना जाता है। मोर्स कोड में वस्तुतः एक लघु संकेत तथा दूसरा दीर्घ संकेत प्रयोग किया जाता है। मोर्स कोड में कुछ भी लिखने के लिए लघु संकेत के रूप में डाट का प्रयोग तथा दीर्घ संकेत के लिए डैश का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा मोर्स कोड के लघु और दीर्घ संकेतों के लिए अन्य चिन्ह भी प्रयुक्त हो सकते हैं जैसे- ध्वनि, पल्स या प्रकाश आदि। मोर्स कोड दुनिया भर में मान्य हुआ और यह टेलीग्राफी की प्राथमिक भाषा बन गया। मोर्स के ईजाद किए गए टेलीग्राफ को स्मिथसोनियन संस्थान में (जहाँ अमेरिकी इतिहास का राष्टीय संग्रहालय है) रखा गया है। मोर्स का जमाना औद्योगिक क्रांति का था। यह वह दौर था, जब यूरोप और अमेरिका में बड़े पैमाने पर आविष्कार हो रहे थे। इस तरह तार ने औद्योगिक क्रांति में बड़ी भूमिका निभाई। इससे विशेष संकेतों के जरिये सूचनाएं कभी भी और कहीं भी तुरंत भेजी जा सकती थीं। उसके बाद लंबी दूरी की सूचनाओं को प्रेषित करने और प्राप्त करने के यंत्र को टेलीग्राफ और उन संदेशों को टेलीग्राम कहा जाने लगा। 

    टेलीग्राफ यूनानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है दूर से लिखना। इसमें विभिन्न संदेशों को कोड में बदलकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजा जाता है। संदेश के मिलने पर कोड को डीकोड करके एक बार फिर संदेश के रूप मे लेकर प्राप्त करने वाले तक भेजा जाता है। संदेश की कोडिंग और डी-कोडिंग का काम टेलीग्राफिस्ट की ओर से किया जाता है। इसका प्रचालन समय के साथ भले ही कम होता गया, पर अभी भी मोर्स कोड पद्धति का इस्तेमाल कई जगह पर गुप्त संदेश भेजने के लिए किया जाता है। पानी के जहाज पर अभी भी इसके जरिए संदेश भेजे जाते हैं। आसानी से पकड़े नहीं जाने के कारण गुप्तचर भी इस पद्धति का प्रयोग करते हैं। सेना के सिग्नल रेजिमेंट में इसका बहुत काम है। मोर्स कोड का इस्तेमाल प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में जमकर किया गया। मोर्स कोड के जरिए संदेश को कोड के रूप में बदलकर टेलीग्राफ लाइन और समुद्र के नीचे बिछी केबलों के द्वारा एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाता था। संदेश पहुंँचने के बाद इसे डीकोड करके लोगों तक भेजा जाता था। 
   भारत में ब्रिटिश काल के दौरान पहली इलेक्ट्रिकल टेलीग्राफ लाइन डायमंड हार्बर और कोलकाता के बीच 5 नवम्बर 1850 को प्रायोगिक तौर पर शुरू की गई थी, जब शिबचंद्र नंदी का डायमंड हार्बर से भेजा गया संदेश गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी की मौजूदगी में पढ़ा गया था। यह पहली प्रायोगिक तार लाइन 21 मील की थी। इसे बनाने में  डॉ. विलियम ओ’ शौघ्नेस्सी का बहुत बड़ा योगदान रहा, जिन्हें भारत में तार का जनक भी कहा जाता है। भारत में टेलीग्राफ और टेलीफोन का बीड़ा उठाने वाले डॉ. विलियम ओ’ शौघ्नेस्सी लोक निर्माण विभाग में काम करते थे। 1851 में, इसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए खोला गया था। डाक और टेलीग्राफ विभाग उस समय लोक निर्माण विभाग के एक छोटे से कोने में अवस्थित हुआ करता था। नवंबर 1853 में, उत्तर में कोलकाता (कलकत्ता) और पेशावर को आगरा सहित और मुंबई (बॉम्बे) को सिंदवा घाट्स के जरिए दक्षिण में चेन्नई, यहां तक कि ऊटकमंड और बंगलोर के साथ जोड़ने वाली 4000 मील (6400 किमी) की टेलीग्राफ लाइनों का निर्माण शुरू किया गया। कालांतर में ब्रिटिश सरकार द्वारा दस्तावेजों के मंगाने-भेजने के अलावा समुद्र में सबमरीन केबिल डालकर विदेशों से भी टेलीग्राम मंगाए जाने लगे। डाॅट और डैश जैसे दो संकेतकों के जरिये संदेश भेजने वाली इस सेवा के लिए अक्टूबर 1854 में ब्रिटेन सरकार ने भारत के लिए पहला टेलीग्राफी एक्ट पास किया। उसी साल व्यवस्थित तरीके से देश में डाक विभाग की स्थापना हुई। उसके अधीन देश भर के 700 पोस्ट आॅफिस थे। टेलीग्राफ विभाग को भी डाक विभाग के साथ संबद्ध कर दिया गया और उसका नाम पोस्ट और टेलीग्राफ विभाग हो गया। आज भी अधिकतर लोग डाक विभाग को डाक-तार विभाग के नाम से ही जानते हंै। 11 फरवरी 1855 को भारत में सार्वजनिक टेलीग्राम सेवाएं शुरू र्हुइं। तब एक रुपए में 16 शब्दों का तार 400 मील की दूरी तक भेजा जा सकता था। शाम छह से लेकर सुबह छह बजे तक टेलीग्राम के लिए दोगुना चार्ज लिया जाता था। 1885-86 में डाक और तार विभाग के दफ्तर एक कर दिए गए। इसके बाद 1 जनवरी 1882 से अंतरदेशीय प्रेस टेलीग्राम शुरू हुए जिनका फायदा अखबारों ने उठाया। इनसे छोटे-बड़े सभी अखबारों को काफी मदद मिली। संवाददाता मुफ्त में अपनी खबरें तार के जरिए भेज सकते थे। तार विभाग में प्रेस के लिए कमरे बनाए गए। इसने खबरों को लोगों तक जल्द से जल्द पहुंँचाने में योगदान दिया। 
         आजादी के बाद 1 जनवरी 1949 को नौ तारघरों आगरा, इलाहाबाद, जबलपुर, कानपुर, पटना और वाराणसी आदि में हिंदी में तार सेवा की शुरुआत हुई। आजादी मिलने के बाद भारत ने पहली पंचवर्षीय योजना में ही सिक्किम के खांबजांग इलाके में दुनिया की सबसे ऊंची तार लाइन पहँुंचा दी। तेज गति से तार बांटने का काम करने के लिए 1949-50 में मोटरसाइकिलों का इस्तेमाल शुरू कर दिया गया। आँकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 1957-58 में एक साल में तीन करोड़ दस लाख तार भेजे गए, और इनमें से 80 हजार तार हिंदी में थे। इसमें दिनों-ब-दिन इजाफा होता गया और वर्ष 1981-82 तक देश में 31 हजार 457 तारघर थे और देशी तारों की बुकिंग 7 करोड़ 14 लाख तक पहुँच  चुकी थी। नब्बे के दशक की शुरुआत से तार का आकर्षण कम होना शुरू हुआ और नब्बे का दशक बीतने के बाद मोबाइल-इंटरनेट की तेज गति ने इसे हाशिये पर डाल दिया। 1984 मंे पोस्ट और टेलीग्राफ विभाग दो भागों में विभाजित होकर डाक विभाग और दूरसंचार विभाग कहलाया। 1980 का दशक वो सुनहरा युग था जब अकेले दिल्ली मेन आफिस के जरिये एक दिन में एक लाख टेलीग्राम भेजे व प्राप्त किये जाते थे, जबकि आज देश भर में महज एक लाख टेलीग्राम भेजे व प्राप्त किये जाते हैं। यही नहीं, 2006-07 के दौरान रोजाना 21-22 हजार का टेलीग्राम टैªफिक था जो कि 2011-12 के दौरान घटकर 5 हजार पर आ गया। सबसे ज्यादा टेलीग्राम सरकारी कार्यालयों या अदालती सम्मनों इत्यादि से जुड़े होते थे। मई 2013 के दौरान दिल्ली में 7031 टेलीग्राम बुक किये गए जिनमें पब्लिक टेलीग्राम की संख्या मात्र 2802 थी। कभी सबसे ज्यादा टेलीग्राम बुक कराने वालों में ’पे्रस’ श्रेणी होती थी। दरअसल इस सेवा को बनाए रखने पर बीएसएनएल को सालाना करीब 400 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा था। गिरते राजस्व से परेशान सरकार ने मई, 2010 में अंतर्देशीय सेवाओं के लिए टेलीग्राम दरों में पिछले 60 वर्षों में पहली बार बढ़ोत्तरी की थी। इनको साढ़े तीन और साढ़े चार रूपये से बढ़ाकर साढ़े 27 रूपये किया गया। यहां तक कि दो महीने पहले विदेश के लिए टेलीग्राम सेवाओं को बंद कर दिया गया। अन्ततः टेलीग्राम सेवा से लगातार गिरते राजस्व के बाद सरकार ने बीएसएनएल बोर्ड को फैसला लेने का अधिकार दिया और उसने डाक विभाग से सलाह-मशविरे के बाद टेलीग्राम सेवा को 15 जुलाई से बंद करने का फैसला किया। 
एक जमाने में तेज और संचार का मुख्य स्त्रोत मानी जाने वाली यह सेवा स्वाधीनता आंदोलन सहित न जाने कितनी ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रही है। यह नहीं भूलना चाहिए कि तार ने लोगों के एकीकरण में प्रमुख भूमिका निभाई है। भारत में रेलों के विस्तार से पहले ही तार का आगमन हो चुका था। इतिहासकार बताते हैं कि 1857 के परिणामों में एक भूमिका तार की भी थी। ब्रिटिश हुकूमत के लिए तार ऐसा सहारा था जिसके जरिए वो सेना की मौजूदगी, विद्रोह की खबरें, रसद की सूचनाएं और अपनी व्यूहरचना सैकड़ों मील दूर बैठे अपने कमांडरों के साथ साझा कर सकते थे। यही कारण था कि विद्रोह का बिगुल बजने वाले भारतीय क्रांतिकारियों ने तार को सबसे पहला निशाना बनाया। विद्रोह के प्रमुख केंद्र रहे दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, इंदौर जैसी जगहों पर उन्होंने तार लाइनें ध्वस्त कर दीं और वहां काम कर रहे अंग्रेज कर्मचारियों को मार डाला। मेरठ समेत कई जगहों पर बागियों ने तार के खंभों को जलावन की तरह इस्तेमाल किया। कुछेक जगहों पर तो क्रांतिकारियों ने इन तार से गोलियां तक बनाई। लोहारों ने तार के खंभों का इस्तेमाल तोप बनाने तक में किया। इस दौरान 918 मील लंबी तार की लाइनें तोड़ दी गईं, पर अंततरू इसी तार की बदौलत अपने सूचना तंत्र के जरिये अंग्रेज इस विद्रोह को समाप्त करने में सफल रहे। 1857-58 में तार की वजह से मिली कामयाबी के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने पूरे हिंदुस्तान को तार के लिए जरिए जोड़ने का फैसला किया और सैकड़ों मील की नई लाइनें बिछाई गईं।
    
 टेलीग्राम सेवा भले ही खत्म कर दी जाय, पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह सिर्फ संदेश ही नहीं देता था, बल्कि कई मौकों पर अदालत में बतौर प्रमाण भी इसका इस्तेमाल किया जाता रहा है। सीमा पर तैनात जवानों व ग्रामीण अंचलों के लिए तो यह दूत का काम करता था। नौकरी की नियुक्ति पत्र हो या शोक संदेश या फिर स्थानांतरण की सूचना, टेलीग्राम वक्त पर यह सूचना संबंधित को देता था। इसकी लोकप्रियता इस कदर थी कि कई हिंदी फिल्मों में इसे केंद्र में रख कर कहानी लिखी गयी। टेलीग्राम की कुछ बानगी विकिलीक्स के अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर के दौर के डिप्लोमैटिक केबल के खुलासों में भी सामने आई थीं, जिसमें यहाँ से भेजे जाने वाले तारों में भारतीय राजनीति में मची उथल-पुथल की जानकारियां थीं।
     
इतिहास ने तमाम ऐतिहासिक टेलीग्रामों को सुरक्षित रखा हुआ है। इसी क्रम में 23 जून, 1870 को पोर्थकुर्नो (इंग्लैंड) से बांबे भेजे गए पहले टेलीग्राम को कांप्लिमेंटरी टेलीग्राम नाम दिया गया था। यह टेलीग्राम लंदन में बैठे प्रबंध निदेशक ने बांबे (अब मुंबई) के प्रबंधक को भेजा था। इसका जवाब पांँच मिनट में प्राप्त हो गया था। इसके बाद बांबे के गवर्नर को भी संदेश भेजे गए थे। एक संदेश शिमला स्थित वाइसराय को उनकी पत्नी ने भेजा था। यह उस जमाने में तकनीक का बेजोड़ काम था। खासकर तब जब दो देशों के बीच संदेश पहुंँचाने में महीनों लग जाते थे। पहला संदेश प्रबंध निदेशक एंडरसन ने प्रबंधक स्टेसी को भेजा था - हाउ आर यू ऑल ? इसका जवाब मिला- आल वेल। लंदन से 506 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में अटलांटिक तट पर स्थित कॉर्नवाल में यह पोर्थकुर्नो घाटी है। इसी जगह से टेलीग्राम क्रांति की शुरुआत भी मानी जाती है। यहां से ब्रिटेन और इसके पूर्व उपनिवेश आपस में बातचीत करते थे। इतिहास में 15 अप्रैल 1912 को टाइटेनिक जहाज से आया टेलीग्राम भी दर्ज है, जिसमें लिखा था कि, हम तेजी से डूब रहे हैं। यात्रियों को नावों में बैठाया जा रहा है।
   ऐसा नहीं है कि टेलीग्राम का वजूद पूरी दुनिया से ही समाप्त हो चुका है। बहरीन, बेल्जियम, कनाडा, जापान, मैक्सिको, नीदरलैड, न्यूजीलैण्ड, रूस, स्वीडन, स्विटरजलैंड जैसे देशों में अब भी तार-सेवा है। अमेरिका में वेस्टर्न यूनियन ने वर्ष 2006 में तार-सेवा बंद कर दी थी, लेकिन एक कंपनी आईटेलीग्राम ने इसे खरीद लिया। ब्रिटेन में इसे आनलाइन नाम कंपनी संभालती है। जर्मनी में डोएचे पोस्ट टेलीग्राम की डिलीवरी करता है, पर वर्ष 2000 में इसे बंद कर दिया गया, लेकिन निजी कंपनी टेलीग्राम डायरेक्ट ने जर्मनी में इस सेवा को अभी भी जारी रखा है।
वस्तुतः टेलीग्राम की तकनीक मोर्स कोड ने बेतार संचार के क्षेत्र में एक ऐसा रास्ता खोला जो आगे चलकर संचार क्रांति में बदल गया। तकनीक की खूबी या खामी यही है कि वह अपने को लगातार नया करती है और पुराने को अनुपयोगी साबित करती है। टेलीग्राम से ही आगे चलकर टेलीफोन और मोबाइल क्रांति का सूत्रपात हुआ। एक तरह से यह वायरलेस तकनीक की शुरूआत थी और इसी के आधार पर आगे चलकर टेलीफोन, मोबाइल और सेटेलाइट फोन का आगमन हुआ। यह तकनीक पुरानी हो जाने के बावजूद अभी भी काफी प्रासंगिक है और सेना, नौसेना और हैम रेडियो में इसका इस्तेमाल किया जाता है। कई बार सरकारी कार्यालयों में भी आपात स्थिति हेतु इसका उपयोग किया जाता रहा है। 
परिवर्तन, प्रकृति का शाश्वत नियम है। पेड़ पर नई कोंपलों को फूटने के लिए पुराने पत्तों को झड़ना ही होता है। वक्त के साथ बहुत सारी चीजें बदल जाती हैं। डाक-तार विभाग की कई सेवायें मसलन- अंडर पोस्टल सर्टिफिकेट (यूपीसी), क्विक मेल सर्विस, सेटेलाइट मनीआर्डर, हाईब्रिड मेल सर्विस, प्रतियोगिता पोस्टकार्ड इत्यादि अतीत का हिस्सा बन गयीं। अभी बहुत दिन नहीं बीते, जब सरकार ने चवन्नी को बंद करने का फैसला लिया था। तब भी उसकी अहमियत के तमाम किस्से एकाएक सामने आने लगे थे। ऐसे ही तार के साथ भी हुआ। अब तार नहीं आएगा तो क्या, संदेश तो आते ही रहेंगे। कभी घोड़े पर सवार हरकारे संदेश लाया करते थे, फिर तार आया, फिर मोबाइल। बदलते वक्त के साथ कोई ऐसा उपकरण भी आ सकता है, जो संदेश पहुँचाने के लिहाज से इन सबसे से ज्यादा प्रभावी होगा। कहना आसान है कि बेतार पर सवार तकनीक के इस युग में तार का भला क्या काम, पर यह तो मानना ही पड़ेगा कि तमाम सेवाओं के सापेक्ष तार की यात्रा काफी लंबी रही। टेलीग्राम और तार-घर अब भले ही इतिहास बन जाएंगे लेकिन उनका अतीत हमेशा जिंदा रहेगा। तभी तो तार के बंद होने की सूचना मिलते ही लोग तारघर की तरफ दौड़ पड़े, एक अदद अंतिम तार अपने किसी इष्टजन को भेजने और उसकी यादों को हमेशा के लिए सहेजकर रख लेने के लिए।