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शनिवार, 28 जून 2025

Shree Dwarkadhish Temple : द्वारकाधीश श्री कृष्ण की द्वारका नगरी आज भी रहस्यमयी है

वर्तमान उत्तर प्रदेश के मथुरा और वृन्दावन में पले-बढे और रास-लीला रचाते कृष्ण-कन्हैया गुजरात में आकर द्वारकाधीश हो जाते हैं। हम लोग उनकी बाल-लीला, रास-लीला के बारे में देखते-सुनते बड़े हुए हैं, वहीं सौराष्ट्र में गुजरात की प्रथम राजधानी ‘द्वारका’ बसाने वाले रणछोड़दास श्री कृष्ण यहाँ एक राजा के रूप में श्रद्धेय हैं।




श्रीकृष्ण मथुरा में उत्पन्न हुए, पर राज उन्होंने द्वारका में किया। यहीं बैठकर उन्होंने सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। पांड़वों को सहारा दिया। धर्म की जीत कराई और शिशुपाल व दुर्योधन जैसे  तमाम अधर्मी राजाओं को मिटाया। गोमती नदी और अरब सागर के किनारे ओखामंडल प्रायद्वीप के पश्चिमी तट पर बसी द्वारका चारधाम और सप्तपुरी में से भी एक है। ऐसी मान्यता है कि मथुरा छोड़ने के बाद अपने परिजनों एवं यादव वंश की रक्षा हेतु भगवान श्रीकृष्ण ने भाई बलराम तथा यादववंशियों के साथ मिलकर द्वारकापुरी का निर्माण विश्वकर्मा से करवाया था। कहा जाता है कि यह एक किलेबंद शहर के रूप में लगभग 84 किलोमीटर तक फैला हुआ था, जहाँ गोमती नदी और अरब सागर मिलते थे।


इससे बीस मील आगे कच्छ की खाड़ी में एक छोटा सा टापू है। इस पर बेट-द्वारका बसी है। मान्यता है कि यहाँ उनका राज निवास था। पहले यहाँ सिर्फ़ पानी के रास्ते जा सकते थे, परंतु अब ‘सुदर्शन सेतु’ बनने से सड़क के द्वारा जाते हैं।






वर्तमान में द्वारका में लोग द्वारकाधीश मंदिर के दर्शन करते हैं। ऐसा माना जाता है कि द्वारकाधीश मंदिर भगवान कृष्ण के परपोते वज्रनाभ द्वारा 2500 साल पहले स्थापित किया गया था। इस प्राचीन मंदिर का कई बार जीर्णोद्धार किया गया है। इसके प्रांगण में अन्य मंदिर भी हैं।





कहते हैं कि, लगभग 125 वर्षों के जीवनकाल के बाद श्री कृष्ण ने अपनी लीला समाप्त की। उनके अवतार समाप्ति के तुरंत बाद परीक्षित के राज्य का कालखंड आता है। राजा परीक्षित, जो अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र तथा अर्जुन के पौत्र थे, के समय से ही कलियुग का आरंभ माना जाता है।

द्वारका नगरी का धार्मिक महत्व तो है ही, रहस्य भी कम नहीं है। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई, महाभारत युद्ध के लगभग 36 वर्ष पश्चात। आज भी यहां उस नगरी के अवशेष मौजूद हैं।

बताते हैं कि 1963 में सबसे पहले द्वारका नगरी का ऐस्कवेशन डेक्कन कॉलेज पुणे, डिपार्टमेंट ऑफ़ आर्कियोलॉजी और गुजरात सरकार ने मिलकर किया था। इस दौरान करीब 3 हजार साल पुराने बर्तन मिले थे। इसके तकरीबन एक दशक बाद आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया की अंडर वॉटर आर्कियोलॉजी विंग को समुद्र में कुछ ताँबे के सिक्के और ग्रेनाइट स्ट्रक्चर भी मिले। 2005 में द्वारिका के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए पुन: अभियान शुरू किया गया। इस अभियान में भारतीय नौसेना ने भी मदद की।अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-छटे पत्थर मिले और यहां से लगभग 200 अन्य नमूने भी एकत्र किए। आज भी यहां वैज्ञानिक स्कूबा डायविंग के जरिए समंदर की गहराइयों में कैद इस रहस्य को सुलझाने में लगे हैं। हाल ही में देश के प्रधानमंत्री जी भी स्कूबा डायविंग के ज़रिए द्वारका नगरी के अवशेष देखने पहुँचे थे !!

- कृष्ण कुमार यादव 

 !! जय श्री द्वारकाधीश !!

रविवार, 13 अप्रैल 2025

Navodaya Foundation Day (13 April) : नवोदय स्थापना दिवस - हम नव युग की नई भारती, नई आरती...


 हम नव युग की नई भारती, नई आरती

हम स्वराज्य की ऋचा नवल, भारत की नवलय हों

नव सूर्योदय, नव चंद्रोदय, हमी नवोदय हों। 

भारत में 13 अप्रैल, 1986 को दो नवोदय विद्यालयों से आरंभ हुआ यह सफर आज 661 तक पहुँच चुका है। नवोदय विद्यालय एक सरकारी संस्थान होने के बावजूद उत्कृष्ट शिक्षा व बेहतर परीक्षा परिणामों की वजह से आज शीर्ष पर है। 'वसुधैव कुटुंबकम्' एवं 'शिक्षार्थ आइए, सेवार्थ जाइए' की भावना से प्रेरित नवोदय में जाति, संप्रदाय, क्षेत्र से परे सिर्फ राष्ट्रवाद की भावना है। देश भर में नवोदय विद्यालय के 16 लाख से अधिक पुरा विद्यार्थियों का नेटवर्क समाज को नई दिशा देने के लिए तत्पर है। राजनीति, प्रशासन, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, सैन्य सेवाओं से लेकर विभिन्न प्रोफेशनल सेवाओं, बिजनेस और सामाजिक सेवाओं में नवोदयन्स पूरे भारत ही नहीं वरन पूरी दुनिया में पहचान बना रहे हैं। 'हमीं नवोदय हों' की भावना के साथ आज नवोदय एक ब्रांड बन चुका है। 

नवोदय सिर्फ एक विद्यालय नहीं, वह एक सपना है — उन लाखों बच्चों का सपना, जिनकी आँखों में उम्मीदें थीं, पर साधन नहीं। शिक्षा ही वह रोशनी है, जिससे एक नया, सक्षम और समृद्ध भारत गढ़ा जा सकता है। नवोदय ने ग्रामीण भारत के होनहार बच्चों को न केवल उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा दी, बल्कि आत्मविश्वास, संस्कार और देशसेवा की भावना भी दी। यह वह संस्था है जहाँ एक किसान का बेटा वैज्ञानिक बनता है, एक मजदूर की बेटी डॉक्टर बनती है, और जहाँ से निकलकर छात्र न केवल अपनी, बल्कि पूरे परिवार और समाज की तक़दीर बदलते हैं। नवोदय ने हमें सिखाया कि सपने सिर्फ देखे नहीं जाते, उन्हें जिया भी जाता है — संघर्ष, अनुशासन और समर्पण के साथ। मुझे गर्व है कि मैं नवोदय का हिस्सा रहा हूँ और मुझे पूरा विश्वास है कि आज नवोदय के पूर्व छात्र देश-विदेश में अपने-अपने क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं।

नवोदय विद्यालय की स्थापना का श्रेय तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी जी को जाता है। 1984 में राजीव गांधी जी प्रधानमंत्री बने और 1985 में उन्होंने इस देश के ग्रामीण क्षेत्र के प्रतिभाशाली बच्चों को एक उच्च कोटि की शिक्षा मिल सके इस इरादे से नवोदय विद्यालय की नींव रखी। वे हमेशा एक ऐसे विजनरी प्रधानमंत्री के रूप में याद किये जायेंगे, जिन्होंने इस देश को समर्पित शिक्षा का उत्कृष्ट मॉडल नवोदय विद्यालय दिया। ग्रामीण क्षेत्रों की तमाम प्रतिभाओं को इन नवोदय विद्यालय में न सिर्फ निःशुल्क शिक्षा दी गई, बल्कि हॉस्टल से लेकर रोजमर्रा तक की चीजें निःशुल्क थीं। बस एक ध्येय था कि नवोदय में पढ़े ये बच्चे एक दिन अपनी प्रतिभा से समाज और राष्ट्र को ऊँचाइयों पर ले जाएँगे और समाज ने उन पर जो खर्च किया है, उसका अवदान देंगे। आज भी नवोदय विद्यालय अपनी उसी गरिमा के साथ संचालित हैं। देश-दुनिया में नवोदय से पढ़कर निकले लाखों विद्यार्थी आज समाज व राष्ट्र को नया मुकाम दे रहे हैं। अधिकतर ग्रामीण पृष्ठभूमि के ये विद्यार्थी आज जिन ऊँचाइयों पर हैं, उसका श्रेय नवोदय की नव उदय की उस भावना को जाता है, जहाँ जात-पात, धर्म, अमीर-गरीब, शहरी-ग्रामीण जैसे तमाम विभेद भूलकर सब सिर्फ एक सकारात्मक सोच के साथ नए पथ पर अग्रसर होते हैं। 

जवाहर नवोदय विद्यालयों की स्थापना-

सरकार की नीति के अनुसार, देश के प्रत्येक जिले में एक जवाहर नवोदय विद्यालय स्थापित किया जाना है। तद्नुसार, वर्ष 2016-17 के दौरान देश के विभिन्न जिलों में 62 नए नवोदय विद्यालय स्वीकृत किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, 10 जवाहर नवोदय विद्यालय अनुसूचित जाति जनसंख्या बहुल एवं 10 जवाहर नवोदय विद्यालय अनुसूचित जनजाति जनसंख्या बहुल क्षेत्रों के लिए स्वीकृत किए गए हैं। इसके अतिरिक्त 03 विशेष जवाहर नवोदय विद्यालय, सेनापति-II (मणिपुर), उखरुल-II (मणिपुर) तथा  रतलाम-II (मध्य प्रदेश) में स्वीकृत किए गए हैं। इस प्रकार कुल स्वीकृत जवाहर नवोदय विद्यालयों की संख्या 661 है। प्रत्येक विद्यालय के लिए कक्षाओं, शयन कक्षों, कर्मचारी आवासों, भोजन-कक्ष तथा अन्य बुनियादी सुविधाओं जैसे खेल के मैदान, कार्यशालाओं, पुस्तकालय एवं प्रयोगशालाओं इत्यादि के लिए पर्याप्त भवनों से युक्त सम्पूर्ण परिसर की व्यवस्था है। नए नवोदय विद्यालयों को खोलने का निर्णय राज्य सरकार के इस प्रस्ताव पर आधारित होता है कि वह विद्यालय के लिए लगभग 30 एकड़ भूमि (प्रत्येक मामले के आधार पर छूट सहित) निःशुल्क उपलब्ध कराने के साथ-साथ, विद्यालय को तब तक चलाने के लिए उपयुक्त अस्थायी भवन का प्रबंध करेगी जब तक कि विद्यालय के स्थायी भवन का निर्माण पूरा नहीं हो जाता।

नवोदय विद्यालय का विजन : मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चों को उनके परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर ध्यान दिए बिना, गुणात्मक आधुनिक शिक्षा प्रदान करना, जिसमें सामाजिक मूल्यों, पर्यावरण के प्रति जागरूकता, साहसिक कार्यकलाप और शारीरिक शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण घटकों का समावेश हो।



Vision of Navodaya Vidyalaya : To provide good quality modern education-including a strong component of culture, inculcation of values, awareness of the environment, adventure activities and physical education- to the talented children predominantly from the rural areas without regard to their family's socio-economic conditions.  

Navodaya Vidyalayas are affiliated to CBSE and offer free education to talented children from Class-VI to XII. (At least 75% of the seats in a district are filled by candidates provisionally selected from rural areas of the district. Minimum One third of the total seats are filled by girls.) Each Navodaya Vidyalaya is a co-educational residential institution providing free boarding and lodging, free school uniforms, text books, stationery, and to and fro rail and bus fare to students. However, a nominal fee @ Rs. 600/- per month is charged from students of Classes- IX to XII as Vidyalaya Vikas Nidhi. The students belonging to SC/ST categories, girls and children of the families Below Poverty Line (BPL) are exempted from payment of this fee. VVN is collected @ Rs. 1500/- per student per month from the students whose parents are Govt. Employees.

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यादों की वो गलियाँ आज भी महकती हैं...

कभी मेस की लाइन में खड़ी हँसी,

कभी हॉस्टल की छत पर साझा किए ख्वाब,

कभी टीचर्स की डाँट में भी छुपा अपनापन —

नवोदय ने हमें सिर्फ पढ़ाया नहीं,

बल्कि जीना सिखाया, रिश्ते निभाना सिखाया...!!


वक़्त भले ही आगे बढ़ गया हो,

पर वो दिन, वो दोस्त, वो पल आज भी दिल के सबसे करीब हैं....


तो आइए, फिर से जी लें वो लम्हे,

फिर से बाँट लें वो मुस्कानें,

और फिर से कहें — "हमीं नवोदय हों !"

नवोदयी भावना एक ऐसा अनमोल रिश्ता है, जो हर नवोदयन के दिल में खास जगह बनाए हुए है। ये सिर्फ एक समूह नहीं, बल्कि एक ऐसा अनूठा परिवार है जिसमें अलग-अलग राज्यों या जिलों के नवोदय विद्यालय भले ही हों, लेकिन जज़्बा, अपनापन और यादों की मिठास सबमें एक जैसी है।










!! नवोदय विद्यालय परिवार के सभी साथियों को ‘नवोदय स्थापना दिवस’ की हार्दिक शुभकामनाएँ !!

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2025

जब चिट्ठियों ने भरी पहली बार हवाई उड़ान : प्रयाग कुंभ मेले के दौरान 18 फरवरी 1911 को शुरू हुई थी दुनिया की पहली हवाई डाक सेवा

कुंभ प्रयाग ही नहीं बल्कि संगम की रेती पर लगने वाला विश्व का सबसे बड़ा स्वतः स्फूर्त आयोजन है। कुंभ सिर्फ मानवीय आयोजन नहीं बल्कि एक दैवीय और आध्यात्मिक महोत्सव है। वाकई, मीलों लंबे चौड़े क्षेत्र में कुंभ पर्व के दौरान जो वातावरण व्याप्त रहता है, वह महीनों और वर्षों में ढले स्वभाव को भी सहज ही बदलने में समर्थ है। इस पर बसने वाली तंबुओं की नगरी में देश और दुनिया से अनेक मत-मतांतर, भाषा-भाषी, रीति-रिवाज, संस्कार प्रथा-परंपरा के श्रद्धालु पुण्य और मोक्ष की कामना से जुटते और संगम में डुबकी लगाते हैं। अलग भाषा, अलग संस्कृति और अलग पहनावे के बावजूद कुंभ के समागम में सिमटती भावनाएं एक सी दिखती हैं। अनेकता में एकता का उदाहरण लिए प्रयाग कुंभ वाकई 'लघु भारत' का एहसास कराता है।  

प्रयागराज ने युगों की करवट देखी है, बदलते हुये इतिहास के उत्थान-पतन को देखा है। यहाँ लगने वाला कुंभ राष्ट्र की सामाजिक व सांस्कृतिक गरिमा का यह गवाह रहा है तो राजनैतिक, ऐतिहासिक एवं साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र भी। जैसे कुम्भ में विभिन्न संस्कृतियों का एकाकार होता है, वैसे ही डाक सेवाओं ने  भी देश-विदेश की तमाम ऐतिहासिक घटनाओं और संस्कृतियों के विस्तार को एक सूत्र में पिरोते हुए एकाकार किया है। डाक सेवाओं के माध्यम से तो आज गंगोत्री और ऋषिकेश का पवित्र  गंगा जल भी देश भर में प्राप्त हो रहा है। पर कम ही लोगों को पता होगा कि दुनिया की पहली हवाई डाक सेवा भी वर्ष 1911 में कुंभ के दौरान प्रयागराज में आरंभ हुई थी। 


डाक सेवाओं ने पूरी दुनिया में एक लम्बा सफर तय किया है। डाक विभाग देश के सबसे पुराने विभागों में से एक है जो कि देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह एक ऐसा संगठन है जो न केवल देश के भीतर बल्कि देश की सीमाओं से बाहर अन्य देशों तक पहुँचने में भी हमारी  मदद करता है। भूमंडलीकरण की अवधारणा सबसे पहले दुनिया भर में भेजे जाने वाले पत्रों के माध्यम से ही साकार हुई। भारत में ही प्रयागराज को यह सौभाग्य प्राप्त है कि दुनिया की पहली हवाई डाक सेवा यहीं से आरम्भ हुई। यह ऐतिहासिक घटना 114 वर्ष पूर्व 18 फरवरी, 1911 को प्रयागराज में हुई थी। संयोगवश उस साल कुंभ का मेला भी लगा था। उस दिन दिन फ्रेंच पायलट मोनसियर हेनरी पिक्वेट (1888-1974)  ने एक नया इतिहास रचा था। वे अपने हंबर बाइप्लेन में प्रयागराज से नैनी के लिए लगभग 6,500 पत्रों और कार्ड से भरे बैग को अपने साथ लेकर उड़े। विमान था हैवीलैंड एयरक्राफ्ट और इसने दुनिया की पहली सरकारी डाक ढोने का एक नया दौर शुरू किया।

प्रयागराज में उस दिन डाक की उड़ान देखने के लिए लगभग एक लाख लोग इकट्ठे हुए थे जब एक विशेष विमान ने शाम को साढ़े पांच बजे यमुना नदी के किनारों से उड़ान भरी और वह नदी को पार करता हुआ 15 किलोमीटर का सफर तय कर नैनी जंक्शन के नजदीक उतरा जो प्रयागराज के बाहरी इलाके में सेंट्रल जेल के नजदीक था। आयोजन स्थल एक कृषि एवं व्यापार मेला था जो नदी के किनारे लगा था और उसका नाम ‘यूपी एक्जीबिशन’ था। इस प्रदर्शनी में दो उड़ान मशीनों का प्रदर्शन किया गया था। विमान का आयात कुछ ब्रिटिश अधिकारियों ने किया था। इसके कलपुर्जे अलग अलग थे जिन्हें आम लोगों की मौजूदगी में प्रदर्शनी स्थल पर जोड़ा गया। प्रयागराज से नैनी जंक्शन तक का हवाई सफ़र आज से 114 साल पहले मात्र  13 मिनट में पूरा हुआ था। हालांकि यह उड़ान महज छह मील की थी, पर इस घटना को लेकर प्रयागराज में ऐतिहासिक उत्सव सा वातावरण था। ब्रिटिश एवं कालोनियल एयरोप्लेन कंपनी ने जनवरी 1911 में प्रदर्शन के लिए अपना एक विमान भारत भेजा था जो संयोग से तब प्रयागराज आया जब कुम्भ का मेला भी चल रहा था। वह ऐसा दौर था जब जहाज देखना तो दूर लोगों ने उसके बारे में ठीक से सुना भी बहुत कम था। ऐसे में इस ऐतिहासिक मौके पर अपार भीड़ होना स्वाभाविक ही था। इस यात्रा में हेनरी ने इतिहास तो रचा ही पहली बार आसमान से दुनिया के सबसे बडे प्रयाग कुंभ का दर्शन भी किया।


वस्तुत: फ्रेंच पायलट मोनसियर हेनरी पेक्वेट इलाहाबाद में संयुक्त प्रांत प्रदर्शनी के लिए प्रदर्शन उड़ानें भरने के लिए भारत में थे। वाल्टर विंडहैम (1868-1942), एक ब्रिटिश विमानन अग्रणी, ने हवाई प्रदर्शनों का आयोजन किया। इस कार्यक्रम ने पहली बार भारत में हवाई जहाज उड़ाए। होली ट्रिनिटी चर्च, इलाहाबाद के पादरी रेव. डब्ल्यूईएस हॉलैंड की अपील ने इस कार्यक्रम को प्रेरित किया। उन्होंने एक नए युवा छात्रावास के लिए धन जुटाने में मदद के लिए विंडहैम से अपील की थी। विंडहैम ने हवाई डाक की कल्पना की और पहली बार हवाई मार्ग से कुछ मेल बैग भेजने के लिए डाक अधिकारियों से संपर्क किया जिस पर उस समय के डाक प्रमुख ने अपनी सहर्ष स्वीकृति दे दी। डाक अधिकारियों ने विंडहैम से रद्दीकरण को डिजाइन करने के लिए कहा। मेल बैग पर ‘पहली हवाई डाक’ और ‘उत्तर प्रदेश प्रदर्शनी, इलाहाबाद’ लिखा था। इस पर एक विमान का भी चित्र प्रकाशित किया गया था। इस पर पारंपरिक काली स्याही की जगह मैजेंटा स्याही का उपयोग किया गया था। आयोजक इसके वजन को लेकर बहुत चिंतित थे, जो आसानी से विमान में ले जाया जा सके। प्रत्येक पत्र के वजन को लेकर भी प्रतिबंध लगाया गया था और सावधानीपूर्वक की गई गणना के बाद सिर्फ 6,500 पत्रों को ले जाने की अनुमति दी गई थी। विमान को अपने गंतव्य तक पहुंचने में 13 मिनट का समय लगा।

 इस पहली हवाई डाक सेवा का विशेष शुल्क छह आना रखा गया था और इससे होने वाली आय को आक्सफोर्ड एंड कैंब्रिज हॉस्टल, इलाहाबाद को दान में दिया गया। इस सेवा के लिए पहले से पत्रों के लिए खास व्यवस्था बनाई गई थी। 18 फरवरी को दोपहर तक इसके लिए पत्रों की बुकिंग की गई। पत्रों की बुकिंग के लिए ऑक्सफोर्ड कैंब्रिज हॉस्टल में ऐसी भीड़ लगी थी कि उसकी हालत मिनी जी.पी.ओ सरीखी हो गई थी। डाक विभाग ने यहाँ तीन-चार कर्मचारी भी तैनात किए थे। चंद रोज में हॉस्टल में हवाई सेवा के लिए 3,000 पत्र पहुँच गए। एक पत्र में तो 25 रूपये का डाक टिकट लगा था। पत्र भेजने वालों में प्रयागराज की कई नामी गिरामी हस्तियाँ तो थी हीं, राजा महाराजे और राजकुमार भी थे।

आज दुनिया भर में संचार के तमाम माध्यम हैं, परंतु पत्रों की जीवंतता का अपना अलग स्थान है। ये पत्र अपने समय का जीवंत दस्तावेज हैं। इन पत्रों में से न जाने कितने तो साहित्य के पन्नों में ढल गए। आज हवाई जहाज के माध्यम से देश-दुनिया में डाक पहुँच रही हैं, परंतु इसका इतिहास कुंभ और प्रयागराज से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। इन पत्रों ने भूमंडलीकरण की अवधारणा को उस दौर में परिभाषित किया, जब विदेश जाना भी एक दु:स्वप्न था। हवाई डाक सेवा ने न सिर्फ पत्रों को पंख लगा दिए, बल्कि लोगों के सपनों को भी उड़ान दी। देश-विदेश के बीच हुए तमाम ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ी बातों और पहलुओं को एक-जगह से दूसरी जगह ले जाने में हवाई डाक सेवा का योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा।

कृष्ण कुमार यादव, पोस्टमास्टर जनरल, उत्तर गुजरात परिक्षेत्र, अहमदाबाद -380004  

ई-मेलः kkyadav.t@gmail.com

 
 
 

मंगलवार, 21 मई 2024

Tribute to the Founder of JNV's : राजीव गाँधी और नवोदय विद्यालय

आज पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी जी (20 अगस्त 1944 – 21 मई 1991) की पुण्यतिथि है। जवाहर नवोदय विद्यालय बनाने के लिए हम नवोदय के लोग राजीव गाँधी जी के सदैव आभारी रहेंगे। वे हमेशा एक ऐसे विजनरी प्रधानमंत्री के रूप में याद किये जायेंगे, जिन्होंने इस देश को समर्पित शिक्षा का उत्कृष्ट मॉडल जवाहर नवोदय विद्यालय दिया। ग्रामीण क्षेत्रों की तमाम प्रतिभाओं को इन नवोदय विद्यालय में न सिर्फ निःशुल्क शिक्षा दी गई, बल्कि हॉस्टल से लेकर रोजमर्रा तक की चीजें निःशुल्क थीं। बस एक ध्येय था कि नवोदय में पढ़े ये बच्चे एक दिन अपनी प्रतिभा से समाज और राष्ट्र को ऊँचाइयों पर ले जाएँगे और समाज ने उन पर जो खर्च किया है, उसका अवदान देंगे। आज भी नवोदय विद्यालय अपनी उसी गरिमा के साथ संचालित हैं। देश-दुनिया में नवोदय से पढ़कर निकले लाखों विद्यार्थी आज समाज व राष्ट्र को नया मुकाम दे रहे हैं। अधिकतर ग्रामीण पृष्ठभूमि के ये विद्यार्थी आज जिन ऊँचाइयों पर हैं, उसका श्रेय नवोदय की नव उदय की उस भावना को जाता है, जहाँ जात-पात, धर्म, अमीर-गरीब, शहरी-ग्रामीण जैसे तमाम विभेद भूलकर सब सिर्फ एक सकारात्मक सोच के साथ नए पथ पर अग्रसर होते हैं। आज उस सोच को सलाम करते हुए हम तमाम नवोदयन्स की तरफ से राजीव गाँधी जी की पुण्यतिथि पर भावपूर्ण स्मरण और नमन।

राजीव गांधी जी की उम्र 47 साल थी जब उनकी हत्या हुई और वे मात्र 40 साल के थे जब प्रधानमंत्री बने। हम सब नवोदयन्स राजीव गांधी के ऋणी हैं, ऐसे कई लोग हैं जिनके जीवन और कैरियर में नवोदय का बहुत बड़ा योगदान है। अगर नवोदय विद्यालय न होता तो आज वे वो ओहदा, वो रुतबा, वो सफलता हासिल ही न कर पाते जहां वे आज हैं।

1984 में राजीव गांधी जी प्रधानमंत्री बने और 1985 में उन्होंने इस देश के ग्रामीण क्षेत्र के प्रतिभाशाली बच्चों को एक उच्च कोटि की शिक्षा मिल सके इस इरादे से नवोदय विद्यालय की नींव रखी....जरा गौर कीजिएगा कि कितनी बेहतरीन व्यवस्था की थी उन्होंने-

- एक जिले में से 6th standard से 80 बच्चों को प्रवेश परीक्षा से चयनित किया जाएगा और बारहवीं तक मुफ्त शिक्षा प्रदान की जाएगी। 

- उन 80 में से 75 फीसदी सीटें ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के लिए रिजर्व होंगी, ऐसा इसलिए कि अगर ऐसा न होता तो ग्रामीण इलाकों से कम ही लोग Qualify कर पाते।

- इन चयनित बच्चों को राजीव गांधी जिस दून स्कूल में पढ़े थे, ऐसे बोर्डिंग स्कूल में निःशुल्क पढ़ाया जाएगा।

- निःशुल्क माने  सरकार उनको अगले 6 साल के लिए गोद लेगी, भोजन, पढ़ाई, रहना, कपड़ा सब फ्री।

- यहां तक कि टूथ ब्रश, साबुन, हेयर आयल.... सब कुछ फ्री...मानो वे सरकार के बेटे-बेटियाँ हैं।

-पढ़ाई, खेल-कूद, विज्ञान, कला-संस्कृति आदि सब की ट्रेनिंग दी जाती है।

- 9th Standard में Migration होता है जिसके तहत बच्चों को उस राज्य से बाहर किसी और स्कूल में Migrate किया जाता है, ताकि बच्चे अन्य राज्यों की संस्कृति और रहन-सहन को जानें एवं  देश में एकता बढ़े।

- जाति, धर्म, पैसा रसूख के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता, सब को एक नजर से देख जाता है।

- आज देश में 650 से ज्यादा ऐसे स्कूल हैं, सभी लगभग एक जैसे ही। 

- अब तक 15 लाख से ज्यादा लोग इससे पास आउट हैं। 

- हर वर्ष करीब 400 से ऊपर नवोदयन बच्चे  #IIT के लिए Qualify हो रहे हैं। 

एक अच्छा विचार, एक Innocent Politician ने कैसे लागू किया ये नवोदय विद्यालय एक श्रेष्ठ उदाहरण है इस बात का...

राजीव गांधी जी को उनकी पुण्यतिथि पर हर नवोदयन की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि। नमन !!

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जवाहर नवोदय विद्यालयों की स्थापना-

सरकार की नीति के अनुसार, देश के प्रत्येक जिले में एक जवाहर नवोदय विद्यालय स्थापित किया जाना है। तद्नुसार, वर्ष 2016-17 के दौरान देश के विभिन्न जिलों में 62 नए नवोदय विद्यालय स्वीकृत किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, 10 जवाहर नवोदय विद्यालय अनुसूचित जाति जनसंख्या बहुल एवं 10 जवाहर नवोदय विद्यालय अनुसूचित जनजाति जनसंख्या बहुल क्षेत्रों के लिए स्वीकृत किए गए हैं। इसके अतिरिक्त 03 विशेष जवाहर नवोदय विद्यालय, सेनापति-II (मणिपुर), उखरुल-II (मणिपुर) तथा  रतलाम-II (मध्य प्रदेश) में स्वीकृत किए गए हैं। इस प्रकार कुल स्वीकृत जवाहर नवोदय विद्यालयों की संख्या 661 है। प्रत्येक विद्यालय के लिए कक्षाओं, शयन कक्षों, कर्मचारी आवासों, भोजन-कक्ष तथा अन्य बुनियादी सुविधाओं जैसे खेल के मैदान, कार्यशालाओं, पुस्तकालय एवं प्रयोगशालाओं इत्यादि के लिए पर्याप्त भवनों से युक्त सम्पूर्ण परिसर की व्यवस्था है। नए नवोदय विद्यालयों को खोलने का निर्णय राज्य सरकार के इस प्रस्ताव पर आधारित होता है कि वह विद्यालय के लिए लगभग 30 एकड़ भूमि (प्रत्येक मामले के आधार पर छूट सहित) निःशुल्क उपलब्ध कराने के साथ-साथ, विद्यालय को तब तक चलाने के लिए उपयुक्त अस्थायी भवन का प्रबंध करेगी जब तक कि विद्यालय के स्थायी भवन का निर्माण पूरा नहीं हो जाता।

Navodaya Vidyalayas are affiliated to CBSE and offer free education to talented children from Class-VI to XII. (At least 75% of the seats in a district are filled by candidates provisionally selected from rural areas of the district. Minimum One third of the total seats are filled by girls.) Each Navodaya Vidyalaya is a co-educational residential institution providing free boarding and lodging, free school uniforms, text books, stationery, and to and fro rail and bus fare to students. However, a nominal fee @ Rs. 600/- per month is charged from students of Classes- IX to XII as Vidyalaya Vikas Nidhi. The students belonging to SC/ST categories, girls and children of the families Below Poverty Line (BPL) are exempted from payment of this fee. VVN is collected @ Rs. 1500/- per student per month from the students whose parents are Govt. Employees.

नवोदय विद्यालय का विजन : मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चों को उनके परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर ध्यान दिए बिना, गुणात्मक आधुनिक शिक्षा प्रदान करना, जिसमें सामाजिक मूल्यों, पर्यावरण के प्रति जागरूकता, साहसिक कार्यकलाप और शारीरिक शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण घटकों का समावेश हो।

Vision of Navodaya Vidyalaya: To provide good quality modern education-including a strong component of culture, inculcation of values, awareness of the environment, adventure activities and physical education- to the talented children predominantly from the rural areas without regard to their family's socio-economic conditions.  

सोमवार, 29 अप्रैल 2024

University of Allahabad Alumni Meet : इलाहाबाद विश्वविद्यालय एल्युमिनाई मीट में...

देश के जाने माने यूनिवर्सिटी में से एक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रथम आधिकारिक एल्युमिनाई मीट का आयोजन 27 और 28 अप्रैल, 2024 को किया गया।  देश भर में यह विश्वविद्यालय अपनी अलग पहचान रखता है। इस विश्वविद्यालय से निकलकर देश के लगभग सभी क्षेत्र में छात्र-छात्राएं अपनी पहचान बनाए हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की देश में एक अलग पहचान है। इसने देश को तीन प्रधानमंत्री दिए हैं। आज भी इनके कार्यों की सराहना की जाती है। इनमें विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर और गुलजारीलाल नंदा का नाम शामिल है। 

देश के इन दिग्गजों को एक मंच पर लाने के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय की ओर से 1996 बैच के पहले पुराछात्रों का एक सम्मेलन आयोजित कराया गया। यहां अब कई दिग्गज एक साथ एक मंच साझा करते हुए अपने जीवन में विश्वविद्यालय के योगदान एवं उसकी यादों को साझा किया। समारोह में सुप्रीम कोर्ट एवं हाईकोर्ट के कई वर्तमान और सेवानिवृत्त जज शामिल हुए। सुप्रीम कोर्ट के जज न्यायमूर्ति पंकज मित्थल, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया, सेवानिवृत्त जज न्यायमूर्ति वीएन खरे, न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी, न्यायमूर्ति विनीत सरन इत्यादि सहित इलाहाबाद होईकोर्ट के 40 जज समेत कई अन्य राज्यों के हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति भी समारोह में शामिल हुए।  इनके अलावा देश-प्रदेश में शीर्ष पदों पर काबिज अफसर, फिल्मी हस्तियाें समेत कई प्रमुख लोग समारोह का हिस्सा बने और पुरानी यादों को ताजा करने के साथ अपने अनुभव साझा किये। 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रथम आधिकारिक एल्युमिनाई मीट (27-28 अप्रैल, 2024) में शामिल हुआ, जिसे कि University of Allahabad Alumni Association (UoAAA) के तत्वावधान में आयोजित किया गया। प्रथम दिन कुलाधिपति श्री आशीष कुमार चौहान, कुलपति प्रो. संगीता श्रीवास्तव, UoAAA के अध्यक्ष प्रो. हेराम्ब चतुर्वेदी और सचिव प्रो. कुमार वीरेंद्र द्वारा दीप प्रज्वलन कर सम्मेलन का औपचारिक शुभारंभ किया गया। उद्घाटन समारोह में शामिल होने के बाद आर्ट एक्जिबिशन एवं फूड फेस्टिवल, सांस्कृतिक संध्या का आनंद लिया। 











भारतीय हिन्दी फिल्म उद्योग बॉलीवुड के प्रसिद्ध निर्माता, निर्देशक और अभिनेता तिग्मांशु धूलिया से भी मुलाकात हुई। उन्होंने अपना कैरियर शेखर कपूर निर्देशित फिल्म बैंडिट क्वीन से बतौर अतिथि निर्देशक शुरू किया था। वे भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पुरा छात्र रहे हैं। उन्होंने कहा कि कि मैं भले ही मुंबई में रहता हूं लेकिन मेरे दिल में हमेशा इलाहाबाद बसता है।  हमारे जीवन में प्रोफेसर पीके घोष और प्रोफेसर अमर सिंह का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 




दूसरे दिन शाम को Reminiscences and the Future Ahead : The Open Mike  में अन्य पुरा छात्रों के साथ अपने विचार व्यक्त किये, वहीं देर शाम को मशहूर कवि कुमार विश्वास  सहित संदीप भोला, कविता तिवारी, राजीव राज, प्रियांशु गजेंद्र की कविताओं का आनंद लिया। 





इलाहाबाद विश्वविद्यालय का मेयो बिल्डिंग सबसे प्राचीन बिल्डिंग है. जिसमे पहले मेयो कॉलेज चला करता था. जो कि कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बद्ध रखता था. लेकिन 23 सितंबर 1887 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के स्थापना के बाद से ये विश्विद्यालय के विज्ञान संकाय का विभाग बना. जिसमे आज भी भौतिक विज्ञान से सम्बंधित कई शोध कर कीर्तिमान स्थापित किया . इसी बिल्डिंग में ही मैथमेटिक्स की कक्षाएं संचालित होती हैं.






अपने पुराछात्रों के स्वागत के लिए विश्वविद्यालय का परिसर विशेष तरह से सजाया गया। पूरे विश्वविद्यालय को रोशनी में डूबा दिया गया था।  विज्ञान संकाय एवं कला संकाय की शोभा इस कदर झलक रही थी कि मानो चंद्रमा रात में विश्वविद्यालय में उतर गया हो। इसके साथ हिंदी गजल, भजन एवं नृत्य के साथ पुरानियों का स्वागत किया गया।  इनके खान पान का ख्याल रखते हुए फूड कोर्ट एवं प्रदर्शनी भी लगाई गई।  वही दिन में इन पुरानियों की नौका विहार ऊंट की सवारी की व्यवस्था संगम पर की गई। 

आज भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय अपने अंदर इतिहास के तमाम पन्नों और सफलताओं की गाथाओं को संजोये हुए है। यहाँ से निकले पुरा-विद्यार्थियों ने राजनीति, प्रशासन, विधि एवं न्याय, शिक्षा, साहित्य, कला, पत्रकारिता, बुद्धिजीविता, समाज सेवा इत्यादि तमाम क्षेत्रों में नए आयाम स्थापित किये हैं। 











जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर, आज़मगढ़  से 12वीं के बाद हमने भी यहीं से बी.ए (1994-97, राजनीति शास्त्र, दर्शन शास्त्र, प्राचीन इतिहास) और एम.ए. (1997-99, राजनीति शास्त्र) की उपाधि धारण की। वर्ष 2000 की सिविल सेवा परीक्षा में चयन पश्चात वर्ष 2001 में इलाहाबाद हमने छोड़ दिया, परन्तु आज भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय हमारे अंदर जीवंत है। यह से जुड़ी तमाम खट्टी-मीठी यादें अभी को मन को स्पन्दित करती हैं। फ़िलहाल, इस पुरातन छात्र सम्मेलन के बहाने इलाहाबाद वि.वि. में तमाम पुराने भवन रंगरोगन और लाइटिंग के साथ चमक उठे। आशा की जानी चाहिए कि एक दौर में आई.ए.एस और साहित्यकारों की फैक्ट्री माने जाने वाले 'पूरब का ऑक्सफोर्ड' नाम से विख़्यात इलाहाबाद विश्वविद्यालय अपने उस पुराने वैभव को पाने के लिए भी सजग प्रयास करेगा, जिसके लिए इसकी देश-दुनिया में ख्याति रही है।