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मंगलवार, 25 जनवरी 2011

नेता बिकते हैं मूल्यों में..

आज राष्ट्रीय मतदाता दिवस है. आज ही के दिन निर्वाचन योग का गठन हुआ था. चूँकि देश में पहली बार यह दिवस मनाया जा रहा है, तो शोशेबजियाँ भी हैं. बहुत पहले जब इलाहाबाद विश्विद्यालय से स्नातक कर रहा था, तो चार पंक्तियाँ लिखी थीं, जो दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हुई थी, आज इस राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर फिर वहीँ चार पंक्तियाँ याद आ रही हैं-

जनता नेताओं को चुनती है
अमूल्य मतों से
और नेता बिकते हैं
मूल्यों में !!

शनिवार, 4 सितंबर 2010

हिन्दी पखवाड़ा


सरकारी विभागों में सितम्बर माह के प्रथम दिवस से ही हिन्दी पखवाड़ा मनाना आरम्भ हो जाता है और हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) आते-आते बहुत कुछ होता जाता है। ऐसी ही कुछ भावनाओं को इस कविता में व्यक्त किया गया है-

एक बार फिर से
हिन्दी पखवाड़ा का आगमन
पुराने बैनर और नेम प्लेटें
धो-पोंछकर चमकाये जाने लगे
बस साल बदल जाना था

फिर तलाश आरम्भ हुई
एक अदद अतिथि की
एक हिन्दी के विद्वान
एक बाबू के
पड़ोस में रहते थे
सो आसानी से तैयार हो गये
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बनने हेतु

आते ही
फूलों का गुलदस्ता
और बंद पैक में भेंट
उन्होंने स्वीकारी
हिन्दी के राजभाषा बनने से लेकर
अपने योगदान तक की चर्चाकर डाली

मंच पर आसीन अधिकारियों ने
पिछले साल के
अपने भाषण में
कुछ काट-छाँट कर
फिर से
हिन्दी को बढ़ावा देने की शपथ ली
अगले दिन तमाम अखबारों में
समारोह की फोटो भी छपी

सरकारी बाबू ने कुल खर्च की फाइल
धीरे-धीरे अधिकारी तक बढ़ायी
अधिकारी महोदय ने ज्यों ही
अंग्रेजी में अनुमोदन लिखा
बाबू ने धीमे से टोका
अधिकारी महोदय ने नजरें उठायीं
और झल्लाकर बोले
तुम्हें यह भी बताना पड़ेगा
कि हिन्दी पखवाड़ा बीत चुका है !!

-- कृष्ण कुमार यादव

सोमवार, 24 मई 2010

लाल गुलाबों का सत्याग्रह-डे

सल्लू मियाँ हमारे लिए सिर्फ दर्जी ही नहीं वरन् अच्छे मित्र भी हैं। उम्र कोई पचपन साल पर बातें ऐसी चुटीली कि जवान भी शर्मा जायें। सल्लू मियाँ की सबसे बड़ी खासियत ‘गाँधी टोपियों‘ को सिलने की है। वे बेसब्री से चुनावी रैलियों और गाँधी जयन्ती का इन्तजार करते कि कब उनको गाँधी टोपियों का आर्डर मिले और वे अपने सिर पर से लोगों के कर्ज का बोझ उतार सकें। पर ईधर नई पीढ़ी में गाँधी टोपी के प्रति बढ़ती उदासीनता ने उनके माथे पर सलवटें ला दी थीं। इस उम्र में नौकरी भी नहीं मिल सकती थी और न ही इतना पैसा था कि कोई नया व्यवसाय शुरू किया जा सके।
इसी बीच मुझे ट्रेनिंग के लिए एक महीने बाहर जाना पड़ा। ट्रेनिंग से लौटकर जब बाजार घूमने गया तो सल्लू मियाँ की टेलरिंग की दुकान गायब थी और उसकी जगह गुलाब के फूलों की एक चमचमाती दुकान खड़ी थी। तभी अचानक उस दुकान के अन्दर से सल्लू मियाँ निकले तो मैं अवाक्् उनको देखते रह गया। लकालक सफेद कुर्ता - पायजामा और गाँधी टोपी पहने सल्लू मियाँ पहचान में ही नहीं आ रहे थे। मेरी तरफ नजर पड़ते ही वे दोनों बाँहें फैलाए दौड़े और मुझे खींचते हुए अन्दर ले गए। अभी मैं दुकान का पूरा जायजा भी नहीं ले पाया था कि सल्लू मियाँ की तरह ही कपड़े पहने उनके छोटे पुत्र ने मेरे हाथ में गुलाब का एक फूल थमाते हुए कहा- वेलकम अंकल जी! हमारी नई दुकान में आपका स्वागत है। इससे पहले कि मैं कुछ बोलता, सल्लू मियाँ ने मुझे कुर्सी खींचते हुए बैठाया और अपने बेटे को दो बोतल कोल्ड ड्रिंक लाने को कहा। सल्लू मियाँ! ये सब मैं क्या देख रहा हूँ...... और आपकी वो दर्जी वाली दुकान। कुछ नहीं भाई साहब, सब वक्त का फेर है। हुआ यूँ कि पिछले दिनों मैं थिएटर में ‘‘लगे रहो मुन्ना भाई’’ फिल्म देखने गया और उसमें संजय दत्त की जो गाँधीगिरी देखी तो लगा कि अब गाँधी टोपी की बजाय लाल गुलाब का ही जमाना है। फिर क्या था, अपने घर के पीछे धूल-धूसरित हो रही बागवानी के शौक को फिर से जिन्दा किया और चारों तरफ गुलाबों की बगिया ही लगा दी एवं इस बीच बाजार से कुछ गुलाब के फूल खरीद कर ये दुकान सजा ली। अब तो लोग मुन्ना भाई स्टाइल में सत्याग्रह करते हैं और लोगों को गुलाब के फूल बाँटते हैं, गाँधी टोपी तो कोई पहनता ही नहीं। मेरा काम बस इतना है कि जब भी किसी धरने या विरोध की खबर पाता हूँ तो वहाँ पहुँच जाता हूँ और उन्हें समझाता हूँ कि अब धरना, पोस्टरबाजी व नारेबाजी पुरानी चीजें हो गई हैं। अब तो अपने विरोधी को या जन समस्याओं की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट करने हेतु गुलाब का फूल देकर प्रदर्शन किया जाता है, जिसको मीडिया भी बढा़-चढ़ाकर कवरेज देता है। बस उनके दिमाग में यह बात घुसते ही मेरा धंधा शुरू हो जाता है। अगर सौ गुलाब के फूल भी एक धरना या विरोध प्रदर्शन के दौरान बिके, तो कम से कम पाँच सौ रुपये का मुनाफा तो पक्का है। पर यह धंधा यहीं नहीं खत्म होता, प्रदर्शनकारियों के अलावा उसको भी पकड़ना होता है, जिसके विरुद्ध प्रदर्शन किया जा रहा हो। उसे समझाना पड़ता है कि ये फूल आखिर उसके किस काम के! आखिर वह उन्हें अगले दिन तो फेंक ही देगा। उस पर से सफाई का झंझट अलग से। बस फिर क्या है- ईधर प्रदर्शनकारियों ने उस अधिकारी को विरोधस्वरूप गुलाब के फूल दिये और कैमरे के फ्लैशों के बीच मीडिया ने उनकी फोटो उतारी, उसके कुछ देर बाद ही सारा तमाशा खत्म और फिर मैं उन फूलों को वहाँ से उठवा लेता हूँ। ये गुलाब फिर से मेरे दुकान की शोभा बढ़ाते हैं और शाम तक फिर कोई प्रदर्शनकारियों का झुंड इन्हें खरीदकर सत्याग्रह की राह पर विरोध करने निकल पड़ता है। यानी आम के आम और गुठलियों के दाम।
सल्लू मियाँ का सत्याग्रही लाल गुलाबों का व्यवसाय दिनों-ब-दिन बढता जा़ रहा है। अपने एक बेरोजगार बेटे को उन्होंने प्रदर्शनकारियों को सत्याग्रही गुलाबों के फूलों की आपूर्ति हेतु तो दूसरे बेरोजगार बेटे को प्रदर्शन पश्चात् अधिकारियों के यहाँ से सत्याग्रही गुलाबों के फूलों के इकट्ठा करने का कार्य सौंप दिया है और स्वयं अखबारों में रोज ‘‘आज के कार्यक्रम’’ पढ़कर देखते हैं कि किस संगठन द्वारा, किस अधिकारी के विरुद्ध व कहाँ पर प्रदर्शन होना है। अभी तक वेलेण्टाइन डे पर लाल गुलाब के फूलों की बिक्री सिर्फ एक दिन होती थी और कभी-कभी किसी उत्सव या पर्व पर। पर सल्लू मियाँ के लिए लाल गुलाब के फूलों के सत्याग्रह-डे ने चीजें काफी आसान कर दिया है। दोनों बेटों के स्वरोजगार ने उनके माथे की सलवटों व रोज की उधारी की मारा-मारी से मुक्त कर दिया है। कभी-कभी अखबारों व टी0वी0 पर भी उनका चेहरा दिख जाता है, यह बताते हुए कि शहर में कई सत्याग्रहों के चलते आज गुलाब के फूलों की दुगनी-चैगुनी बिक्री रही। अब वे गुलाब के फूलों की भारी खरीद पर गाँधीवादी साहित्य को प्रचारित करती किताबें फ्री में देने की योजना बना रहे हैं ताकि ये तथाकथित लाल गुलाब वाले सत्याग्रही घर जाकर गाँधी जी की अन्य विचारधाराओं को भी जान सकें।

(इसे वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में भी पढ़ सकते हैं)

गुरुवार, 20 मई 2010

सात जन्मों तक इनकमिंग फ्री

मोहन बाबू हमारे पड़ोसी ही नहीं अभिन्न मित्र भी हैं। कहने को तो वे सरकारी विभाग में क्लर्क हैं पर सामान्यता क्लर्क की जो इमेज होती है, उससे काफी अलग हैं.... एकदम ईमानदार टाइप के। कभी-कभी तो महीना खत्म होने से पहले ही उधारी की नौबत आ जाती। उनकी बीबी रोज ताना देती- श्क्या ईमानदारी का अचार डालोगे? अपनेे साथ के लोगों को देखो। हर किसी ने निजी मकान बनवा लिया है, गाड़ी खरीद ली है, बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ने जाते हैं और तो और उनकी बीबियाँ कितने शानो-शौकत से रहती हंै और एक तुम हो जो साड़ियाँ खरीदने के नाम पर ही तुनक जाते हो। मुझे तो याद भी नहीं कि अन्तिम बार तुमने मुझे कब साड़ी खरीद कर दी थी। वो तो मैं अगर तुम्हारी जेब से रोज कुछ न कुछ गायब न करूँ तो रिश्तेदारी में भी जाना मुश्किल हो जाय. इधर मोहन बाबू की बीबी ने एक नई रट लगा रखी थी- मोबाइल फोन खरीदने की।

हुआ यूँ कि पिछले दिनों मोहन बाबू की बीबी अपने मायके गयीं और वहाँ अपनी भाभी के हाथ में मोबाइल फोन देखा। जब तक उनके भैया के पास मोबाइल फोन था, तब तक तो ठीक था पर अब भाभी ही नहीं उनके बच्चों के पास भी मोबाइल फोन है। ऐसा नहीं कि उनके भैया किसी बहुत बड़े पद पर हैं, वरन् पी0 डब्ल्यू0 डी0 मंे एक मामूली क्लर्क हैं। भाभी के मुँह से भैया के रूतबे के किस्से उन्होंने खूब सुन रखे हैं कि कैसे अच्छे-अच्छे ठेकेदार और नेता उनके सामने पानी भरते हंै। जिस समय मोहन बाबू से उनकी शादी हुयी, उस समय तक भैया को नौकरी नहीं मिली थी, पर नौकरी मिलने के दस साल के अन्दर ही उनके ठाठ-बाट साहबों वाले हो गए। मोहल्ले में अपना रूतबा झाड़ने के लिए उन्होंने एक सेकेण्ड हैण्ड मारूति कार खरीद ली और गेट पर एक झबरे बालों वाला कुत्ता बाँध लिया, जो भाभी की नजर में साहब लोगों की विशिष्ट पहचान होती है। एक बार भाभी के मुँह से कुत्ते के लिए कुत्ता शब्द निकल गया तो भैया झल्ला उठे थे- श्जिन्दगी भर गँवार ही रह जाओगी। अरे! कुत्ता उसे कहते हैं जो सड़कों पर आवारा फिरते हैं। इसे तो टाॅमी कहते हैं।श् फिर क्या था, तब से झबरे बालों वाला कुत्ता टाॅमी हो गया। टाॅमी जितनी बार पड़ोसियों को देखकर भौंकता, भाभी उतनी बार अपने पति की साहबी पर गुमान करतीं।

मोहन बाबू भी दिल से चाहते हैं कि एक मोबाइल फोन उनके पास हो जाय तो काफी सुविधा होगी। लैण्डलाइन फोन में वैसे भी कई समस्यायें आती हैं, मसलन- महीने में दस दिन तो डेड ही पड़ा रहता, उस पर से फोन का बिल इतना आता कि मानो आस-पड़ोस के लोगांे का भी बिल उसमें जोड़ दिया गया हो। फिर फोन का बिल सही करवाने के लिए टेलीफोन-विभाग का चक्कर काटो। एक तो बिना रिश्वत दिए वे बिल ठीक नहीं करते और उस पर से उस दिन के लिए दफ्तर से छुट्टी लेनी पड़ती है।
जब मोहन बाबू ने अपनी बीबी से मोबाइल फोन लेने की चर्चा की तो मानो उनको मुँहमाँगी मुराद मिल गयी हो। एक लम्बे अर्से बाद उस दिन मोहन बाबू की बीबी ने खूब मन से खाना बनाया और प्यार भरे हाथों से उन्हें खिलाया। मोहन बाबू की बीबी उस रात को सपने में देख रही थीं कि उनके घर में भी मोबाइल फोन आ गया है और जैसे ही मोबाइल फोन की घण्टी बजी, उन्होंने पहले से तैयार आरती की थाली को उस पर घुमाया और फिर मोबाइल फोन को स्टाइल में कानों के पास लगाकर बोलीं-हलो! ऊधर से आवाज आयी-कौन बोल रही हैं?.... मैं मिसेज मोहन बोल रही हूँ, किससे बात करनी है आपको? जी, मुझे शर्मिला से बात करनी है.... कौन शर्मिला..... अच्छा तो आवाज बदलकर पूछ रही हो, कौन शर्मिला! मेरी प्यारी बीबी शर्मिला, आई लव यू ..... दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा, दूसरों की बीबी को आई लव यू बोलते हो। अभी पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराती हूँ....... साॅरी मैडम! लगता है रांग नम्बर लग गया। सपने के साथ ही मोहन बाबू की बीबी की नींद भी खुल गयी। वे प्रसन्न थीं कि सपने में मोबाइल फोन आया अर्थात घर में मोबाइल फोन आ जाएगा। रांग नम्बर तो आते रहते हैं, उनकी क्या चिन्ता करना।

सुबह होते ही मोहन बाबू को उनकी बीबी ने याद दिलाया कि आज मोबाइल फोन लाना है। आज नहीं, कल लाना है....... पर ऐसा क्यों.... अरे! आज तो मुझे टेलीफोन विभाग के दफ्तर जाकर इस लैण्डलाइन फोन को डिसकनेक्ट करवाने के लिए आवदेन देना होगा। पर मोबाइल का इस लैण्डलाइन फोन से क्या मतलब.... अरे तुम नहीं समझोगी? जब बिल भरना पड़ता तो पता चलता। मेरी अनुपस्थिति में घण्टों बैठकर तुम अपने मायके वालों के साथ गप्पें मारती हो, क्या मुझे नहीं पता है? अब ये लैण्डलाइन फोन कटवा कर मोबाइल फोन खरीदूँगा और उसे हमेशा अपने पास रखूँगा। ..... तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया है। लैण्डलाइन फोन कटवाकर मोबाइल फोन खरीदोगे तो लोग सोचेंगे कि मोबाइल फोन खरीदने की औकात नहीं है सो उसे कटवाकर मोबाइल फोन खरीदा है। और फिर मोबाइल फोन अगर तुम अपने पास रखोगे तो मैं अपने मायके वालों से बातें कैसे करूँगी!.... तो फिर अपने मायके वालों को ही बोल दो न कि तुम्हें एक मोबाइल फोन खरीदकर दे दें। हाँ... हाँ... जरूर बोल दूँगी। मेरे मायके में तो सभी के पास मोबाइल फोन हंै, यहाँ तक कि बच्चों के पास भी। पर तुम किस मर्ज की दवा हो...... इतना दहेज देकर मेरे पापा ने इसलिए तुमसे शादी नहीं की, कि शादी के बाद भी मंै उनके सामने हाथ फैलाऊँ। वो तो मेरी गलती थी जो फोटो में तुम्हारे घुँघराले बाल और मासूम चेहरा देखकर रीझ गयी, नहीं तो आज मैं किसी घर में रानी की तरह रह रही होती।

मोहन बाबू की बीबी जब गुस्सा होतीं तो वे शान्तिपूर्वक वहाँ से खिसक लेने में ही भलाई समझते और मुझसे अच्छा उनका मित्र कौन हो सकता है। सुबह-सुबह अपने दरवाजे पर मोहन बाबू को देखकर मैं पूछ उठा- श्अरे मोहन बाबू!सब ठीक तो है। कोई प्राॅब्लम तो नहीं है।श् प्राॅब्लम है, तभी तो आया हूँ आपके पास। अच्छा-अच्छा! पहले आप आराम से बैठकर गर्मा-गर्म चाय और पकौडो़ं का मजा लीजिए और उसके बाद मैं आपकी प्राॅब्लम हल करता हूँ। फिर मोहन बाबू ने चाय व पकौड़ों के साथ टेपरिकार्डर की तरह अपनी सारी प्राॅब्लम मेरे सामने रख दी। चूँंकि मैं मोहन बाबू की ईमानदारी से परिचित हूँ सो उनकी प्राॅब्लम अच्छी तरह समझता हूँ पर उनकी बीबी भी जमाने के हिसाब से गलत नहीं हैं।.... अचानक मेरी निगाह अखबार मे छपे एक विज्ञापन पर पड़ी- श्हमारे मोबाइल फोन खरीदिए और एक साल तक इनकमिंग फ्री पाईये।श् मैंने मोहन बाबू को विज्ञापन दिखाया तो वे काफी खुश हुए और हँसते हुए बोले- श्लगता है इन मोबाइल फोन वालों को मेरे जैसों का भी ख्याल है।श् मैंने उन्हें सलाह देते हुए कहा- श्मोहन बाबू मोबाइल फोन खरीदने के लिए कुछ दिन तक इन्तजार कर लीजिए तो कम्पटीशन में अन्य मोबाइल कम्पनियाँ सम्भवतः और भी आकर्षक प्लान के साथ आयें।श् खैर मोहन बाबू को मेरी बात जँची और अखबार का विज्ञापन वाला पेज उठाते हुए बोले- श्अगर बुरा न मानें तो, ये मैं अपने साथ लेते जाऊँ। आपकी भाभी को दिखाऊँगा तो शायद उसका गुस्सा कुछ ठण्डा हो जाय।

मोहन बाबू उस दिन के बाद से रोज सुबह ही सुबह मेरे दरवाजे पर आ टपकते हंै। चाय और पकौडों के साथ अखबार देखते हैं और ऐसे खुश होते हैं मानो भगवान ने उनकी सुन ली हो। पहले एक साल, दो साल, तीन साल, पाँच साल, और फिर आजीवन इनकमिंग फ्री वाले मोबाइल कम्पनियों के विज्ञापन आये पर मोहन बाबू मोबाइल खरीदने के लिए उस दिन का इन्तजार कर रहे हैं जब कोई कम्पनी अपना विज्ञापन देगी कि- श्हमारा मोबाइल फोन खरीदिए ओर अगली पीढ़ी तक इनकमिंग फ्री पाइये।श् पर अब मंै मोहन बाबू से परेशान हो गया हूँ क्योंकि वे हर सुबह मेरे घर आकर चाय व पकौडों का मजा लेते हैं और फिर विज्ञापन के बहाने पूरा का पूरा अखबार लेकर चले जाते हैं। मुझे तो डर लगता है कि कहीं अगली पीढ़ी तक इनकमिंग फ्री वाला विज्ञापन किसी मोबाइल कम्पनी ने दे भी दिया तो मोहन बाबू यह न कह उठें कि अब मैं मोबाइल फोन उसी दिन खरीदूँगा जब कोई कम्पनी अपना विज्ञापन देगी कि- श्हमारा मोबाइल फोन खरीदिए और अगले जन्म ही नहीं वरन् सात जन्मों तक इनकमिंग फ्री पाइये।
(इसे वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में भी पढ़ सकते हैं)

मंगलवार, 18 मई 2010

मेरी कहानी

कल ही एक मित्र का फोन आया
सुना था दिल्ली की कई साहित्यिक पत्रिकाओं में
उसकी घुसपैठ है
सो आदतन बोल बैठा
यार मेरी भी एक कहानी कहीं लगवा दे
वह हँस कर बोला
यह तो मेरे बायें हाथ का खेल है
मेरा दिल गदगद हुआ
ऐसे दोस्त को पाकर मैं धन्य हुआ
अगले ही दिन
अपनी एक नई कहानी
मित्र के पते पर भिजवा दी
और इंतजार करने लगा
उसके छपने का
दो-तीन माह बाद
सुबह ही सुबह
मित्र का फोन आया
पाँच सौ रूपये का मनीआर्डर
मुझे भेजा जा रहा है
और अगले अंक में
मेरी रचना
छप कर आ रही है
रोज आॅफिस से आते ही
पहले पड़ोस की
पुस्तकों की दुकान पर जाता
और पत्रिका को न पाकर
झल्लाकर वापस चला आता
आखिर
वो शुभ दिन आ ही गया
पत्रिका के पृष्ठ संख्या पैंतीस पर
मेरी कहानी का शीर्षक जगमगा रहा था
तुरन्त उसकी दो प्रतियाँ खरिद
बगल में स्थित मिष्ठान-भंडार से
ताजा मोतीचूर का लड्डू
पैक कराया और
जल्दी से घर आकर
पत्नी को गले लगाया
प्रिये! ये देखो
तुम्हारे पति की कहानी छपी है
पत्नी ने उत्सुकतावश
पत्रिका के पन्ने फड़फड़ाये और
पृष्ठ संख्या पैंतीस पर ज्यों ही हाथ रखा
मैने उसके मुँह में लड्डू डाला
कि वह बोल उठी
पहले आपका नाम तो देख लूँ
कहीं दूसरे की कहानी को तो
अपनी नहीं बता रहे
हाँ.....हाँ.....क्यों नहीं प्रिये
पर यहाँ तो दांव ही उल्टा पड़ गया
कहानी तो मेरी थी
पर छपी किसी दूसरे के नाम से थी
अब अपने दोस्त की
घुसपैठ का माजरा
कुछ-कुछ समझ में आ रहा था
सामने पड़ा पाँच सौ रुपये का मनीआॅर्डर
और मोतीचूर का लड्डू
मुझे मुँह चिढ़ा रहा था !!

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

हिन्दी पखवाड़ा



सरकारी विभागों में सितम्बर माह के प्रथम दिवस से ही हिन्दी पखवाड़ा मनाना आरम्भ हो जाता है और हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) आते-आते बहुत कुछ होता जाता है। ऐसी ही कुछ भावनाओं को इस कविता में व्यक्त किया गया है-

एक बार फिर से
हिन्दी पखवाड़ा का आगमन
पुराने बैनर और नेम प्लेटें
धो-पोंछकर चमकाये जाने लगे
बस साल बदल जाना था

फिर तलाश आरम्भ हुई
एक अदद अतिथि की
एक हिन्दी के विद्वान
एक बाबू के
पड़ोस में रहते थे
सो आसानी से तैयार हो गये
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बनने हेतु

आते ही
फूलों का गुलदस्ता
और बंद पैक में भेंट
उन्होंने स्वीकारी
हिन्दी के राजभाषा बनने से लेकर
अपने योगदान तक की चर्चाकर डाली

मंच पर आसीन अधिकारियों ने
पिछले साल के
अपने भाषण में
कुछ काट-छाँट कर
फिर से
हिन्दी को बढ़ावा देने की शपथ ली
अगले दिन तमाम अखबारों में
समारोह की फोटो भी छपी

सरकारी बाबू ने कुल खर्च की फाइल
धीरे-धीरे अधिकारी तक बढ़ायी
अधिकारी महोदय ने ज्यों ही
अंग्रेजी में अनुमोदन लिखा
बाबू ने धीमे से टोका
अधिकारी महोदय ने नजरें उठायीं
और झल्लाकर बोले
तुम्हें यह भी बताना पड़ेगा
कि हिन्दी पखवाड़ा बीत चुका है !!