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रविवार, 13 अप्रैल 2025

Navodaya Foundation Day (13 April) : नवोदय स्थापना दिवस - हम नव युग की नई भारती, नई आरती...


 हम नव युग की नई भारती, नई आरती

हम स्वराज्य की ऋचा नवल, भारत की नवलय हों

नव सूर्योदय, नव चंद्रोदय, हमी नवोदय हों। 

भारत में 13 अप्रैल, 1986 को दो नवोदय विद्यालयों से आरंभ हुआ यह सफर आज 661 तक पहुँच चुका है। नवोदय विद्यालय एक सरकारी संस्थान होने के बावजूद उत्कृष्ट शिक्षा व बेहतर परीक्षा परिणामों की वजह से आज शीर्ष पर है। 'वसुधैव कुटुंबकम्' एवं 'शिक्षार्थ आइए, सेवार्थ जाइए' की भावना से प्रेरित नवोदय में जाति, संप्रदाय, क्षेत्र से परे सिर्फ राष्ट्रवाद की भावना है। देश भर में नवोदय विद्यालय के 16 लाख से अधिक पुरा विद्यार्थियों का नेटवर्क समाज को नई दिशा देने के लिए तत्पर है। राजनीति, प्रशासन, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, सैन्य सेवाओं से लेकर विभिन्न प्रोफेशनल सेवाओं, बिजनेस और सामाजिक सेवाओं में नवोदयन्स पूरे भारत ही नहीं वरन पूरी दुनिया में पहचान बना रहे हैं। 'हमीं नवोदय हों' की भावना के साथ आज नवोदय एक ब्रांड बन चुका है। 

नवोदय सिर्फ एक विद्यालय नहीं, वह एक सपना है — उन लाखों बच्चों का सपना, जिनकी आँखों में उम्मीदें थीं, पर साधन नहीं। शिक्षा ही वह रोशनी है, जिससे एक नया, सक्षम और समृद्ध भारत गढ़ा जा सकता है। नवोदय ने ग्रामीण भारत के होनहार बच्चों को न केवल उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा दी, बल्कि आत्मविश्वास, संस्कार और देशसेवा की भावना भी दी। यह वह संस्था है जहाँ एक किसान का बेटा वैज्ञानिक बनता है, एक मजदूर की बेटी डॉक्टर बनती है, और जहाँ से निकलकर छात्र न केवल अपनी, बल्कि पूरे परिवार और समाज की तक़दीर बदलते हैं। नवोदय ने हमें सिखाया कि सपने सिर्फ देखे नहीं जाते, उन्हें जिया भी जाता है — संघर्ष, अनुशासन और समर्पण के साथ। मुझे गर्व है कि मैं नवोदय का हिस्सा रहा हूँ और मुझे पूरा विश्वास है कि आज नवोदय के पूर्व छात्र देश-विदेश में अपने-अपने क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं।

नवोदय विद्यालय की स्थापना का श्रेय तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी जी को जाता है। 1984 में राजीव गांधी जी प्रधानमंत्री बने और 1985 में उन्होंने इस देश के ग्रामीण क्षेत्र के प्रतिभाशाली बच्चों को एक उच्च कोटि की शिक्षा मिल सके इस इरादे से नवोदय विद्यालय की नींव रखी। वे हमेशा एक ऐसे विजनरी प्रधानमंत्री के रूप में याद किये जायेंगे, जिन्होंने इस देश को समर्पित शिक्षा का उत्कृष्ट मॉडल नवोदय विद्यालय दिया। ग्रामीण क्षेत्रों की तमाम प्रतिभाओं को इन नवोदय विद्यालय में न सिर्फ निःशुल्क शिक्षा दी गई, बल्कि हॉस्टल से लेकर रोजमर्रा तक की चीजें निःशुल्क थीं। बस एक ध्येय था कि नवोदय में पढ़े ये बच्चे एक दिन अपनी प्रतिभा से समाज और राष्ट्र को ऊँचाइयों पर ले जाएँगे और समाज ने उन पर जो खर्च किया है, उसका अवदान देंगे। आज भी नवोदय विद्यालय अपनी उसी गरिमा के साथ संचालित हैं। देश-दुनिया में नवोदय से पढ़कर निकले लाखों विद्यार्थी आज समाज व राष्ट्र को नया मुकाम दे रहे हैं। अधिकतर ग्रामीण पृष्ठभूमि के ये विद्यार्थी आज जिन ऊँचाइयों पर हैं, उसका श्रेय नवोदय की नव उदय की उस भावना को जाता है, जहाँ जात-पात, धर्म, अमीर-गरीब, शहरी-ग्रामीण जैसे तमाम विभेद भूलकर सब सिर्फ एक सकारात्मक सोच के साथ नए पथ पर अग्रसर होते हैं। 

जवाहर नवोदय विद्यालयों की स्थापना-

सरकार की नीति के अनुसार, देश के प्रत्येक जिले में एक जवाहर नवोदय विद्यालय स्थापित किया जाना है। तद्नुसार, वर्ष 2016-17 के दौरान देश के विभिन्न जिलों में 62 नए नवोदय विद्यालय स्वीकृत किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, 10 जवाहर नवोदय विद्यालय अनुसूचित जाति जनसंख्या बहुल एवं 10 जवाहर नवोदय विद्यालय अनुसूचित जनजाति जनसंख्या बहुल क्षेत्रों के लिए स्वीकृत किए गए हैं। इसके अतिरिक्त 03 विशेष जवाहर नवोदय विद्यालय, सेनापति-II (मणिपुर), उखरुल-II (मणिपुर) तथा  रतलाम-II (मध्य प्रदेश) में स्वीकृत किए गए हैं। इस प्रकार कुल स्वीकृत जवाहर नवोदय विद्यालयों की संख्या 661 है। प्रत्येक विद्यालय के लिए कक्षाओं, शयन कक्षों, कर्मचारी आवासों, भोजन-कक्ष तथा अन्य बुनियादी सुविधाओं जैसे खेल के मैदान, कार्यशालाओं, पुस्तकालय एवं प्रयोगशालाओं इत्यादि के लिए पर्याप्त भवनों से युक्त सम्पूर्ण परिसर की व्यवस्था है। नए नवोदय विद्यालयों को खोलने का निर्णय राज्य सरकार के इस प्रस्ताव पर आधारित होता है कि वह विद्यालय के लिए लगभग 30 एकड़ भूमि (प्रत्येक मामले के आधार पर छूट सहित) निःशुल्क उपलब्ध कराने के साथ-साथ, विद्यालय को तब तक चलाने के लिए उपयुक्त अस्थायी भवन का प्रबंध करेगी जब तक कि विद्यालय के स्थायी भवन का निर्माण पूरा नहीं हो जाता।

नवोदय विद्यालय का विजन : मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चों को उनके परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर ध्यान दिए बिना, गुणात्मक आधुनिक शिक्षा प्रदान करना, जिसमें सामाजिक मूल्यों, पर्यावरण के प्रति जागरूकता, साहसिक कार्यकलाप और शारीरिक शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण घटकों का समावेश हो।



Vision of Navodaya Vidyalaya : To provide good quality modern education-including a strong component of culture, inculcation of values, awareness of the environment, adventure activities and physical education- to the talented children predominantly from the rural areas without regard to their family's socio-economic conditions.  

Navodaya Vidyalayas are affiliated to CBSE and offer free education to talented children from Class-VI to XII. (At least 75% of the seats in a district are filled by candidates provisionally selected from rural areas of the district. Minimum One third of the total seats are filled by girls.) Each Navodaya Vidyalaya is a co-educational residential institution providing free boarding and lodging, free school uniforms, text books, stationery, and to and fro rail and bus fare to students. However, a nominal fee @ Rs. 600/- per month is charged from students of Classes- IX to XII as Vidyalaya Vikas Nidhi. The students belonging to SC/ST categories, girls and children of the families Below Poverty Line (BPL) are exempted from payment of this fee. VVN is collected @ Rs. 1500/- per student per month from the students whose parents are Govt. Employees.

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यादों की वो गलियाँ आज भी महकती हैं...

कभी मेस की लाइन में खड़ी हँसी,

कभी हॉस्टल की छत पर साझा किए ख्वाब,

कभी टीचर्स की डाँट में भी छुपा अपनापन —

नवोदय ने हमें सिर्फ पढ़ाया नहीं,

बल्कि जीना सिखाया, रिश्ते निभाना सिखाया...!!


वक़्त भले ही आगे बढ़ गया हो,

पर वो दिन, वो दोस्त, वो पल आज भी दिल के सबसे करीब हैं....


तो आइए, फिर से जी लें वो लम्हे,

फिर से बाँट लें वो मुस्कानें,

और फिर से कहें — "हमीं नवोदय हों !"

नवोदयी भावना एक ऐसा अनमोल रिश्ता है, जो हर नवोदयन के दिल में खास जगह बनाए हुए है। ये सिर्फ एक समूह नहीं, बल्कि एक ऐसा अनूठा परिवार है जिसमें अलग-अलग राज्यों या जिलों के नवोदय विद्यालय भले ही हों, लेकिन जज़्बा, अपनापन और यादों की मिठास सबमें एक जैसी है।










!! नवोदय विद्यालय परिवार के सभी साथियों को ‘नवोदय स्थापना दिवस’ की हार्दिक शुभकामनाएँ !!

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2025

जब चिट्ठियों ने भरी पहली बार हवाई उड़ान : प्रयाग कुंभ मेले के दौरान 18 फरवरी 1911 को शुरू हुई थी दुनिया की पहली हवाई डाक सेवा

कुंभ प्रयाग ही नहीं बल्कि संगम की रेती पर लगने वाला विश्व का सबसे बड़ा स्वतः स्फूर्त आयोजन है। कुंभ सिर्फ मानवीय आयोजन नहीं बल्कि एक दैवीय और आध्यात्मिक महोत्सव है। वाकई, मीलों लंबे चौड़े क्षेत्र में कुंभ पर्व के दौरान जो वातावरण व्याप्त रहता है, वह महीनों और वर्षों में ढले स्वभाव को भी सहज ही बदलने में समर्थ है। इस पर बसने वाली तंबुओं की नगरी में देश और दुनिया से अनेक मत-मतांतर, भाषा-भाषी, रीति-रिवाज, संस्कार प्रथा-परंपरा के श्रद्धालु पुण्य और मोक्ष की कामना से जुटते और संगम में डुबकी लगाते हैं। अलग भाषा, अलग संस्कृति और अलग पहनावे के बावजूद कुंभ के समागम में सिमटती भावनाएं एक सी दिखती हैं। अनेकता में एकता का उदाहरण लिए प्रयाग कुंभ वाकई 'लघु भारत' का एहसास कराता है।  

प्रयागराज ने युगों की करवट देखी है, बदलते हुये इतिहास के उत्थान-पतन को देखा है। यहाँ लगने वाला कुंभ राष्ट्र की सामाजिक व सांस्कृतिक गरिमा का यह गवाह रहा है तो राजनैतिक, ऐतिहासिक एवं साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र भी। जैसे कुम्भ में विभिन्न संस्कृतियों का एकाकार होता है, वैसे ही डाक सेवाओं ने  भी देश-विदेश की तमाम ऐतिहासिक घटनाओं और संस्कृतियों के विस्तार को एक सूत्र में पिरोते हुए एकाकार किया है। डाक सेवाओं के माध्यम से तो आज गंगोत्री और ऋषिकेश का पवित्र  गंगा जल भी देश भर में प्राप्त हो रहा है। पर कम ही लोगों को पता होगा कि दुनिया की पहली हवाई डाक सेवा भी वर्ष 1911 में कुंभ के दौरान प्रयागराज में आरंभ हुई थी। 


डाक सेवाओं ने पूरी दुनिया में एक लम्बा सफर तय किया है। डाक विभाग देश के सबसे पुराने विभागों में से एक है जो कि देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह एक ऐसा संगठन है जो न केवल देश के भीतर बल्कि देश की सीमाओं से बाहर अन्य देशों तक पहुँचने में भी हमारी  मदद करता है। भूमंडलीकरण की अवधारणा सबसे पहले दुनिया भर में भेजे जाने वाले पत्रों के माध्यम से ही साकार हुई। भारत में ही प्रयागराज को यह सौभाग्य प्राप्त है कि दुनिया की पहली हवाई डाक सेवा यहीं से आरम्भ हुई। यह ऐतिहासिक घटना 114 वर्ष पूर्व 18 फरवरी, 1911 को प्रयागराज में हुई थी। संयोगवश उस साल कुंभ का मेला भी लगा था। उस दिन दिन फ्रेंच पायलट मोनसियर हेनरी पिक्वेट (1888-1974)  ने एक नया इतिहास रचा था। वे अपने हंबर बाइप्लेन में प्रयागराज से नैनी के लिए लगभग 6,500 पत्रों और कार्ड से भरे बैग को अपने साथ लेकर उड़े। विमान था हैवीलैंड एयरक्राफ्ट और इसने दुनिया की पहली सरकारी डाक ढोने का एक नया दौर शुरू किया।

प्रयागराज में उस दिन डाक की उड़ान देखने के लिए लगभग एक लाख लोग इकट्ठे हुए थे जब एक विशेष विमान ने शाम को साढ़े पांच बजे यमुना नदी के किनारों से उड़ान भरी और वह नदी को पार करता हुआ 15 किलोमीटर का सफर तय कर नैनी जंक्शन के नजदीक उतरा जो प्रयागराज के बाहरी इलाके में सेंट्रल जेल के नजदीक था। आयोजन स्थल एक कृषि एवं व्यापार मेला था जो नदी के किनारे लगा था और उसका नाम ‘यूपी एक्जीबिशन’ था। इस प्रदर्शनी में दो उड़ान मशीनों का प्रदर्शन किया गया था। विमान का आयात कुछ ब्रिटिश अधिकारियों ने किया था। इसके कलपुर्जे अलग अलग थे जिन्हें आम लोगों की मौजूदगी में प्रदर्शनी स्थल पर जोड़ा गया। प्रयागराज से नैनी जंक्शन तक का हवाई सफ़र आज से 114 साल पहले मात्र  13 मिनट में पूरा हुआ था। हालांकि यह उड़ान महज छह मील की थी, पर इस घटना को लेकर प्रयागराज में ऐतिहासिक उत्सव सा वातावरण था। ब्रिटिश एवं कालोनियल एयरोप्लेन कंपनी ने जनवरी 1911 में प्रदर्शन के लिए अपना एक विमान भारत भेजा था जो संयोग से तब प्रयागराज आया जब कुम्भ का मेला भी चल रहा था। वह ऐसा दौर था जब जहाज देखना तो दूर लोगों ने उसके बारे में ठीक से सुना भी बहुत कम था। ऐसे में इस ऐतिहासिक मौके पर अपार भीड़ होना स्वाभाविक ही था। इस यात्रा में हेनरी ने इतिहास तो रचा ही पहली बार आसमान से दुनिया के सबसे बडे प्रयाग कुंभ का दर्शन भी किया।


वस्तुत: फ्रेंच पायलट मोनसियर हेनरी पेक्वेट इलाहाबाद में संयुक्त प्रांत प्रदर्शनी के लिए प्रदर्शन उड़ानें भरने के लिए भारत में थे। वाल्टर विंडहैम (1868-1942), एक ब्रिटिश विमानन अग्रणी, ने हवाई प्रदर्शनों का आयोजन किया। इस कार्यक्रम ने पहली बार भारत में हवाई जहाज उड़ाए। होली ट्रिनिटी चर्च, इलाहाबाद के पादरी रेव. डब्ल्यूईएस हॉलैंड की अपील ने इस कार्यक्रम को प्रेरित किया। उन्होंने एक नए युवा छात्रावास के लिए धन जुटाने में मदद के लिए विंडहैम से अपील की थी। विंडहैम ने हवाई डाक की कल्पना की और पहली बार हवाई मार्ग से कुछ मेल बैग भेजने के लिए डाक अधिकारियों से संपर्क किया जिस पर उस समय के डाक प्रमुख ने अपनी सहर्ष स्वीकृति दे दी। डाक अधिकारियों ने विंडहैम से रद्दीकरण को डिजाइन करने के लिए कहा। मेल बैग पर ‘पहली हवाई डाक’ और ‘उत्तर प्रदेश प्रदर्शनी, इलाहाबाद’ लिखा था। इस पर एक विमान का भी चित्र प्रकाशित किया गया था। इस पर पारंपरिक काली स्याही की जगह मैजेंटा स्याही का उपयोग किया गया था। आयोजक इसके वजन को लेकर बहुत चिंतित थे, जो आसानी से विमान में ले जाया जा सके। प्रत्येक पत्र के वजन को लेकर भी प्रतिबंध लगाया गया था और सावधानीपूर्वक की गई गणना के बाद सिर्फ 6,500 पत्रों को ले जाने की अनुमति दी गई थी। विमान को अपने गंतव्य तक पहुंचने में 13 मिनट का समय लगा।

 इस पहली हवाई डाक सेवा का विशेष शुल्क छह आना रखा गया था और इससे होने वाली आय को आक्सफोर्ड एंड कैंब्रिज हॉस्टल, इलाहाबाद को दान में दिया गया। इस सेवा के लिए पहले से पत्रों के लिए खास व्यवस्था बनाई गई थी। 18 फरवरी को दोपहर तक इसके लिए पत्रों की बुकिंग की गई। पत्रों की बुकिंग के लिए ऑक्सफोर्ड कैंब्रिज हॉस्टल में ऐसी भीड़ लगी थी कि उसकी हालत मिनी जी.पी.ओ सरीखी हो गई थी। डाक विभाग ने यहाँ तीन-चार कर्मचारी भी तैनात किए थे। चंद रोज में हॉस्टल में हवाई सेवा के लिए 3,000 पत्र पहुँच गए। एक पत्र में तो 25 रूपये का डाक टिकट लगा था। पत्र भेजने वालों में प्रयागराज की कई नामी गिरामी हस्तियाँ तो थी हीं, राजा महाराजे और राजकुमार भी थे।

आज दुनिया भर में संचार के तमाम माध्यम हैं, परंतु पत्रों की जीवंतता का अपना अलग स्थान है। ये पत्र अपने समय का जीवंत दस्तावेज हैं। इन पत्रों में से न जाने कितने तो साहित्य के पन्नों में ढल गए। आज हवाई जहाज के माध्यम से देश-दुनिया में डाक पहुँच रही हैं, परंतु इसका इतिहास कुंभ और प्रयागराज से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। इन पत्रों ने भूमंडलीकरण की अवधारणा को उस दौर में परिभाषित किया, जब विदेश जाना भी एक दु:स्वप्न था। हवाई डाक सेवा ने न सिर्फ पत्रों को पंख लगा दिए, बल्कि लोगों के सपनों को भी उड़ान दी। देश-विदेश के बीच हुए तमाम ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ी बातों और पहलुओं को एक-जगह से दूसरी जगह ले जाने में हवाई डाक सेवा का योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा।

कृष्ण कुमार यादव, पोस्टमास्टर जनरल, उत्तर गुजरात परिक्षेत्र, अहमदाबाद -380004  

ई-मेलः kkyadav.t@gmail.com

 
 
 

रविवार, 23 जून 2024

युवाओं को अपनी संस्कृति, कला और विरासत से जोड़कर बनायें एक श्रेष्ठ नागरिक - पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव

युवा आने वाले कल के भविष्य हैं। इनमें आरम्भ से ही अपनी संस्कृति, कला, विरासत, नैतिक मूल्यों के प्रति आग्रह पैदा कर एक श्रेष्ठ नागरिक बनाया जा सकता है। सोशल मीडिया के इस अनियंत्रित दौर में उनमें अध्ययन, मनन, रचनात्मक लेखन और कलात्मक प्रवृत्तियों की आदत  न सिर्फ उन्हें नकारात्मकता से दूर रखेगी अपितु उनके मनोमस्तिष्क में अच्छे विचारों का निर्माण भी करेगी। उक्त उद्गार वाराणसी परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने नव भारत निर्माण समिति द्वारा 21 जून, 2024 को 'भारतीय संस्कृति एवं योग' विषय पर आयोजित त्रिदिवसीय चित्रकला प्रतियोगिता एवं कार्यशाला में पुरस्कार वितरण करते हुए बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किये। उक्त कार्यक्रम का आयोजन नव भारत निर्माण समिति द्वारा वाराणसी समेत पूर्वांचल के 16 जिलों के 14-22 आयु वर्ग के विद्यार्थियों पर केंद्रित 'इन्हें पंख दें' अभियान के अंतर्गत किया गया था।







ऋषिव वैदिक अनुसंधान, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र, शिवपुर, वाराणसी में आयोजित समारोह में पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने वाराणसी मंडल के मुख्य कोषाधिकारी श्री गोविन्द सिंह, अंतर्राष्ट्रीय चित्रकार श्री एस. प्रणाम सिंह के साथ विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया और उनके उज्जवल भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं। पूजा सिंह चौहान, पालक प्रजापति, पालक कुमारी को क्रमशः प्रथम, द्वितीय, तृतीय पुरस्कार मिला वहीं संतोषी वर्मा, सचिन सेठ, स्नेहा वर्मा, रोशनी वर्मा, मानसी पांडेय, अर्चिता, महिमा को सांत्वना पुरस्कार दिया गया। सभी को मेडल, प्रशस्ति पत्र और नकद राशि सम्मान स्वरूप दी गई।






पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि आज की व्यस्त लाइफ स्टाइल में न सिर्फ शारीरिक बल्कि संवेदना के स्तर पर मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक सशक्तिकरण भी जरूरी है। योग हमारी प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है I 'योग: कर्मसु कौशलम्' के माध्यम से भारतीय संस्कृति की इस अमूल्य और विलक्षण धरोहर को वैश्विक स्तर पर अपनाया गया है। योग मन और शरीर, विचार और क्रिया की एकता का प्रतीक है जो मानव कल्याण के लिए मूल्यवान है।  श्री यादव ने कहा कि नव भारत निर्माण समिति ने 'बनारस लिट फेस्ट : काशी साहित्य, कला उत्सव' के माध्यम से भी लोगों को जोड़ा है, उसी कड़ी में युवाओं हेतु आयोजित  'इन्हें पंख दें' अभियान को भी देखा जाना चाहिए। स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष 2047 तक भारत को सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रूप से विकसित एवं सशक्त राष्ट्र बनाने में युवाओं का अहम योगदान है।  





कार्यक्रम का संचालन बृजेश सिंह, सचिव नव भारत निर्माण समिति ने किया। इस अवसर पर कर्नल संदीप शर्मा, धवल प्रसाद, आर्ट क्यूरेटर राजेश सिंह, डाॅ अपर्णा, डाॅ गीतिका, शालिनी, प्रवक्ता मुकेश सिंह, सतीश वर्मा, धर्मेंद्र कुमार, योग प्रशिक्षक प्रणव पाण्डेय, कमलदीप ,ममता जी आदि उपस्थित थे।

 





 








 युवाओं को अपनी संस्कृति, कला और विरासत से जोड़कर बनायें एक श्रेष्ठ नागरिक -  पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव

नव भारत निर्माण समिति द्वारा 'इन्हें पंख दें' अभियान के विजेताओं को पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव ने किया पुरस्कृत

स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष 2047 तक भारत को  विकसित एवं सशक्त राष्ट्र बनाने में युवाओं का अहम योगदान - पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव