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मंगलवार, 30 सितंबर 2014

ये भी कुछ कहते हैं



टेम्पो या ट्रक इत्यादि के पीछे लिखे शब्द/वाक्य कई बार गौरतलब होते हैं। यूँ ही उन पर नजर पड़ती है और मुस्कुराकर रह जाते हैं। याद आता है बाबा नागार्जुन की एक रचना में अवतरित वह ट्रक ड्राइवर, जो अपनी बेटी की छोटी-छोटी चूड़ियाँ अपने ट्रक में हमेशा सामने टांगा रहता है, कितनी संवेदना उसमें छुपी हुई है। कई बार इन वाक्यों/शब्दों में हास्य बोध छुपा होता है, प्यार को लेकर कोई अहसास छुपा होता है और कुछेक बार तो इनमें जीवन का कोई सूत्र वाक्य छुपा होता है। कुछेक अपने वजूद का अहसास कराते हैं, कुछ अपने व्यक्तित्व का। जब भी इन्हें पढता या देखता हूँ तो सोचता हूँ कि आखिर यह पेंटर की कारस्तानी होती है या उस वाहन के ड्राइवर की। कॉलेज के दिनों में तो हमारे एक मित्र इन तमाम बातों को अपनी डायरी में लिखने का शौक भी रखते थे, पता नहीं कब और कहाँ सृजन हो जाये !!

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

हिन्दी के क्षेत्र में सम्मान का सैकड़ा


आज के दौर में प्रशासनिक सेवा में रहकर राजभाषा हिंदी के विकास के लिए चिंतन मनन करना अपने आप में एक उपलब्धि है। राजकीय सेवा के दायित्वों का निर्वहन और श्रेष्ठ कृतियों की सर्जना का यह मणिकांचन योग विरले ही मिलता है। समकालीन साहित्यकारों में उभरते चर्चित कवि, लेखक एवं चिंतक तथा जौनपुर जिले के बरसठी विकास खंड के सरावां गांँव निवासी और मौजूदा समय में डाक निदेशक इलाहाबाद परिक्षेत्र कृष्ण कुमार यादव इस विरले योग के ही प्रतीक हैं। श्री यादव को इसके लिए अब तक 102 बार सम्मान व मानद उपाधियाँ प्राप्त हो चुकी हैं। 

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक गणराज्य देश भारत के पास अपनी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। 14 सितंबर, 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला, पर आधुनिक दौर में हर व्यक्ति अंग्रेजी की ओर भाग रहा है। खासकर प्रोफेशनल और सरकारी नौकरियों में अंगे्रजी को महत्वपूर्ण अंग के रूप में लिया जा रहा है। ऐसे में श्री यादव लोगों को बताते हैं कि कक्षा छह से ही हिंदी के सहारे मंजिल पाने का सपना देखना शुरू किया। इस सपने को साकार कराने में उनके पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव का विशेष योगदान रहा है। जिसकी बदौलत उन्हें वर्ष 2001 में सिविल सेवा में सफलता मिली। इसके बाद तमाम पत्र-पत्रिकाओं में लेखन के साथ ही उन्होंने ब्लाॅगिंग के सहारे हिंदी के विकास के लिए कार्य करना शुरू किया। धीरे-धीरे उनकी जीवन संगिनी आंकाक्षा यादव और पुत्री अक्षिता (पाखी) भी लेखन ब्लाॅगिंग में सक्रिय हो गईं। परिणाम रहा कि तीन पीढि़यों संग हिन्दी के विकास में जुटे कृष्ण कुमार यादव को 102 बार हिंदी के विकास हेतु विभिन्न सम्मान व मानद उपाधियांँ प्राप्त हुई। 

दो बार मिला अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लाॅगर पुरस्कार

हिंदी के विकास में जुटे डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव  को उत्कृष्ट कार्य के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी सम्मानित कर चुके हैं।  उन्होंने 'अवध सम्मान’ से श्री यादव को नवाजा था। लखनऊ में आयोजित द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लाॅगर सम्मलेन में ’दशक के श्रेष्ठ हिन्दी ब्लाॅगर दंपती’ का सम्मान श्री यादव को प्रदान किया गया। इसके अलावा काठमांडू में हुए तृतीय अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लाॅगर सम्मेलन में नेपाल के संविधान सभा के अध्यक्ष नरसिंह केसी ने उन्हें  ’परिकल्पना साहित्य सम्मान’ दिया था।

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हिन्दी के क्षेत्र में सम्मान का सैकड़ा
तीन पीढि़यों संग हिन्दी के विकास में जुटे हैं डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव
102 बार मिल चुका है पुरस्कार और मानद उपाधियाँ
(साभार : दैनिक जागरण, जौनपुर-वाराणसी संस्करण, 15 सितंबर, 2014) 

शनिवार, 13 सितंबर 2014

'हिंदी' हमारे रोजमर्रा की भाषा है, सिर्फ 'दिवस' या 'पखवाड़ा' की नहीं


14 सितम्बर को 'हिंदी दिवस' के रूप में मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन संविधान सभा ने 1949 में हिंदी को राजभाषा के रूप में मान्यता दी थी। पूरा सितम्बर माह हिंदी दिवस से लेकर हिंदी सप्ताह, पखवाड़ा और हिंदी माह के रूप में मनाया जाता है। वस्तुत:  हिंदी हमारे रोजमर्रा की भाषा है और इसे सिर्फ दिवस या पखवाड़ा से जोड़कर देखने की जरूरत नहीं है।  संसार की उन्नत भाषाओं में हिंदी सबसे अधिक व्यवस्थित भाषा है और हिंदी लिखने के लिये प्रयुक्त देवनागरी लिपि अत्यंत वैज्ञानिक है। दुनिया में चीनी मंदारिन के बाद सर्वाधिक भाषा  हिंदी ही बोली जाती है।  हिन्दी को संस्कृत शब्द-संपदा एवं नवीन शब्द रचना सामर्थ्य विरासत में मिली है। यह देशी भाषाओं एवं अपनी बोलियों के साथ-साथ अन्य भाषाओं से भी शब्द लेने में संकोच नहीं करती। यही कारण है कि अंग्रेजी के मूल शब्द लगभग 10,000 हैं, जबकि हिन्दी के मूल शब्दों की संख्या ढाई लाख से भी अधिक है। ऐसे में हिंदी का महत्व सर्वविदित है। हिंदी को जितना नुकसान अन्य ने नहीं पहुँचाया है, उससे ज्यादा स्वयं हिंदी वालों ने पहुँचाया है।  जिस दिन हर हिंदी भाषी हिंदी से प्रेम करने लगेगा, उस दिन हिंदी खुद ही सिरमौर हो जाएगी !!

(चित्र : कानपुर में पदस्थ रहने के दौरान 'हिंदी पखवाड़ा' के दौरान सम्मान। साथ में पं. बद्री नारायण तिवारी, बाल-साहित्यकार डा. राष्ट्रबंधु, गीतकार श्री शतदल)

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

मास्टर जी की छड़ी

स्कूल के दिनों में मास्टर जी की छड़ी याद है न। आज का परिवेश भले ही बदल गया हो, पर हमारे दौर में मास्टर जी की छड़ी बड़ी अहमियत रखती थी। कभी इस छड़ी को लेकर एक कविता लिखी थी, जिसे आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूँ। संयोगवश कल 'शिक्षक दिवस' भी है -



बचपन में खींच दी थी
मास्टर जी ने हाथों में लकीर

बाँस की ताजी टहनियों से बनी
उस दुबली-पतली छड़ी का साया
चुप कराने के लिए काफी था
जब कभी पड़ती वो किसी के हाथों पर 
तो बन जाती लकीरें आड़ी-तिरछी

शाम को घर लौटते हुये
ढूँढ़ने की कोशिश करते 
उन लकीरों में अपना भविष्य

कुछ की लकीरें तो
रात भर में ही गायब हो जातीं 
कुछ की लकीरें
दे जातीं जिंदगी का एक अर्थ 
जो कि उस लकीर की कडि़याँ बना
रचते जिंदगी का एक फलसफाँ।

( यह चित्र जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर-आजमगढ़ में कक्षा 6 में पढाई के दौरान का है।  इसमें हम भी हैं, कोशिश करिये, शायद पहचान पाएँ) 

सोमवार, 18 अगस्त 2014

राधा का प्रेम, मुरली की मिठास


राधा का प्रेम, मुरली की मिठास.
माखन का स्वाद, गोपियों का रास.
इनसे मिलकर बनता है, जन्माष्टमी का दिन खास.

कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाइयाँ।

हमारा तो जन्म ही कृष्ण जन्माष्टमी के दिन हुआ था, अत: हमारे लिए तो यह दिन बेहद खास है।



-कृष्ण ही कृष्ण-
( वाट्सएप पर प्राप्त श्रीकृष्ण-काव्य भी आप सभी के साथ साभार शेयर कर रहा हूँ )

कृष्ण उठत कृष्ण चलत कृष्ण शाम भोर है, 
कृष्ण बुद्धि कृष्ण चित्त कृष्ण मन विभोर है।

कृष्ण रात्रि कृष्ण दिवस कृष्ण स्वप्न शयन है, 
कृष्ण काल कृष्ण कला कृष्ण मास अयन है।

कृष्ण शब्द कृष्ण अर्थ कृष्ण ही परमार्थ है, 
कृष्ण कर्म कृष्ण भाग्य कृष्णहि पुरुषार्थ है।

कृष्ण स्नेह कृष्ण राग कृष्णहि अनुराग है, 
कृष्ण कली कृष्ण कुसुम कृष्ण ही पराग है।

कृष्ण भोग कृष्ण त्याग कृष्ण तत्व ज्ञान है, 
कृष्ण भक्ति कृष्ण प्रेम कृष्णहि विज्ञान है।

कृष्ण स्वर्ग कृष्ण मोक्ष कृष्ण परम साध्य है,
कृष्ण जीव कृष्ण ब्रह्म कृष्णहि आराध्य है।

!!......जय श्री कृष्ण....!!

(चित्र में : बेटियों अक्षिता और अपूर्वा के साथ केक काटते कृष्ण कुमार यादव।  साथ में पिताश्री। )

रविवार, 10 अगस्त 2014

जीवन निरंतर चलने का नाम है ....


जन्मदिन सिर्फ सेलिब्रेशन तक नहीं होता।  जन्मदिन के बहाने पिछले एक साल के पन्ने पलटकर देखना भी होता है कि क्या कमियाँ रहीं, क्या उपलब्धियाँ रहीं।  क्या खोया, क्या पाया। इसके साथ ही अगले सालों के लिए दृढ निश्चय होकर फिर आगे बढ़ जाने का नाम भी है जन्मदिन। क्योंकि जीवन निरंतर चलने का नाम है और यह चलना सिर्फ पाँवों पर नहीं होता, बल्कि इसमें बहुत कुछ जुड़ता जाता है !! 
               (चित्र में : हमारे जीवन की पहली फोटो, जो कि बचपन में ली गई थी)





10 अगस्त को हमारा जन्मदिन है और रक्षाबंधन भी। इस शुभ दिन पर हमने खूब सारे पौधे लगाए। जब ये पौधे बड़े होकर लहलहाएंगे, उन पर फूल खिलेंगे, फल उगेंगे तो चिड़ियों की चहचहाहट के बीच प्रकृति भी हमें दिल से आशीष देगी !! 



शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव हुए पदोन्नत

इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव को भारत सरकार ने सेलेक्शन ग्रेड में पदोन्नत किया है। भारतीय डाक सेवा के 2001 बैच के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव वर्तमान में जूनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड में थे और अब उन्हें भारत सरकार ने पे बैंड-4 में नान फंक्शनल सेलेक्शन ग्रेड (वेतनमान-रू 37,400-67,000, ग्रेड पे-8700) में पदोन्नत किया है।  कृष्ण कुमार यादव सहित उनके बैच के सभी 9 अधिकारियों को यह पदोन्नति 1 जनवरी 2014 से दी गयी है। 

कृष्ण कुमार यादव भारतीय डाक सेवा के लोकप्रिय अधिकारियों में गिने जाते हैं। उन्होंने भारतीय डाक सेवाओं को आम जन में और ज्यादा उपयोगी बनाने के लिए सतत् प्रयास किए हैं। उनका विभिन्न विषयों पर साहित्य लेखन बहुत सशक्त है, जिसके लिए उनको कई प्रतिष्ठित सम्मान भी मिले हैं। उन्होंने अपने मूल कार्य क्षेत्र में भी हिंदी के उपयोग और विकास में बेहतर योगदान दिया है। कृष्ण कुमार यादव के पिताश्री श्रीराम शिवमूर्ति यादव भी हिंदी साहित्य के क्षेत्र में एक नाम हैं।  इनकी पत्नी श्रीमती आकांक्षा यादव जहाँ  हिंदी साहित्य, लेखन और ब्लागिंग में बखूबी सक्रिय हैं, वहीँ  इनकी पुत्री अक्षिता (पाखी) भी एक नवोदित ब्लागर है। कृष्ण कुमार यादव की कार्यप्रणाली में उच्चकोटि की रचनात्मकता और व्यवहार कुशलता देखने को मिलती है।

साभार : स्वतंत्र आवाज़ 




Director Postal Services of Allahabad Region Mr. Krishna Kumar Yadav, has been promoted by the Government of India in the Non-functional Selection Grade (NFSG) of the service in the pay band-4, Rs. 37,400-67,000/- with grade pay of  Rs. 8700/-. Mr. Yadav is an officer of Indian Postal Services, 2001 batch and all his 9 batchmates have been awarded this promotion w.e.f. 1st January, 2014. 

गुरुवार, 31 जुलाई 2014

प्रेमचंद की रचनाओं के पात्र आज भी समाज में जिंदा हैं


प्रेमचन्द का साहित्य और सामाजिक विमर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं और उनकी रचनाओं के पात्र आज भी समाज में कहीं-न-कहीं जिंदा हैं। आधुनिक साहित्य के स्थापित मठाधीशों के नारी-विमर्श एवं दलित-विमर्श जैसे तकिया-कलामों के बाद भी अंततः लोग इनके सूत्र किसी न किसी रूप में पे्रमचन्द की रचनाओं में ढूंँढते नजर आते हैं।  प्रेमचन्द जब अपनी रचनाओं में समाज के उपेक्षित व शोषित वर्ग को प्रतिनिधित्व देेते हैं तो निश्चिततः इस माध्यम से वे एक युद्ध लड़ते हैं और गहरी नींद सोये इस वर्ग को जगाने का उपक्रम करते हैं। राष्ट्र आज भी उन्हीं समस्याओं से जूझ रहा है जिन्हें प्रेमचन्द ने काफी पहले रेखांकित कर दिया था। चाहे वह जातिवाद या सांप्रदायिकता का जहर हो, चाहे कर्ज की गिरफ्त में आकर आत्महत्या करता किसान हो, चाहे नारी की पीड़ा हो, चाहे शोषण और समाजिक भेद-भाव हो। इन बुराईयों के आज भी मौजूद होने का एक कारण यह है कि राजनैतिक सत्तालोलुपता के समांतर हर तरह के सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक आन्दोलन की दिशा नेतृत्वकर्ताओं को केंद्र-बिंदु बनाकर लड़ी गयी जिससे मूल भावनाओं के विपरीत आंदोलन गुटों में तब्दील हो गये एवं व्यापक व सक्रिय सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा कुछ लोगों की सत्तालोलुपता की भेंट चढ़ गयी।   

हिन्दी साहित्य के इतिहास में उपन्यास सम्राट के रूप में अपनी पहचान बना चुके प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था. वह एक कुशल लेखक, जिम्मेदार संपादक और संवेदशील रचनाकार थे. प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी से लगभग चार मील दूर लमही नामक ग्राम में हुआ था. इनका संबंध एक गरीब कायस्थ परिवार से था. इनकी माता का नाम आनन्दी देवी था. इनके पिता अजायब राय श्रीवास्तव डाकमुंशी के रूप में कार्य करते थे.ऐसे में प्रेमचंद का डाक-परिवार से अटूट सम्बन्ध था.

जब प्रेमचंद के पिता गोरखपुर में डाकमुंशी के पद पर कार्य कर रहे थे उसी समय गोरखपुर में रहते हुए ही उन्होंने अपनी पहली रचना लिखी. यह रचना एक अविवाहित मामा से सम्बंधित थी जिसका प्रेम एक छोटी जाति की स्त्री से हो गया था. वास्तव में कहानी के मामा कोई और नहीं प्रेमचंद के अपने मामा थे, जो प्रेमचंद को उपन्यासों पर समय बर्बाद करने के लिए निरन्तर डांटते रहते थे. मामा से बदला लेने के लिए ही प्रेमचंद ने उनकी प्रेम-कहानी को रचना में उतारा. हालांकि प्रेमचंद की यह प्रथम रचना उपलब्ध नहीं है, क्योंकि उनके मामा ने क्रुद्ध होकर पांडुलिपि को अग्नि को समर्पित कर दिया था.

प्रेमचंद की एक कहानी, ‘कज़ाकी’, उनकी अपनी बाल-स्मृतियों पर आधारित है। कज़ाकी डाक-विभाग का हरकारा था और बड़ी लम्बी-लम्बी यात्राएँ करता था। वह बालक प्रेमचंद के लिए सदैव अपने साथ कुछ सौगात लाता था। कहानी में वह बच्चे के लिये हिरन का छौना लाता है और डाकघर में देरी से पहुँचने के कारण नौकरी से अलग कर दिया जाता है। हिरन के बच्चे के पीछे दौड़ते-दौड़ते वह अति विलम्ब से डाक घर लौटा था। कज़ाकी का व्यक्तित्व अतिशय मानवीयता में डूबा है। वह शालीनता और आत्मसम्मान का पुतला है, किन्तु मानवीय करुणा से उसका हृदय भरा है।

प्रेमचंद बचपन से ही काफी खुद्दार रहे. 1920 का दौर... गाँधी जी के रूप में इस देश ने एक ऐसा नेतृत्व पा लिया था, जो सत्य के आग्रह पर जोर देकर स्वतन्त्रता हासिल करना चाहता था। ऐसे ही समय में गोरखपुर में एक अंग्रेज स्कूल इंस्पेक्टर जब जीप से गुजर रहा था तो अकस्मात एक घर के सामने आराम कुर्सी पर लेटे, अखबार पढ़ रहे एक अध्यापक को देखकर जीप रूकवा ली और बडे़ रौब से अपने अर्दली से उस अध्यापक को बुलाने को कहा । पास आने पर उसी रौब से उसने पूछा-‘‘तुम बडे़ मगरूर हो। तुम्हारा अफसर तुम्हारे दरवाजे के सामने से निकल जाता है और तुम उसे सलाम भी नहीं करते।’’ उस अध्यापक ने जवाब दिया-‘‘मैं जब स्कूल में रहता हूँ तब मैं नौकर हूँ, बाद में अपने घर का बादशाह हूँ।’’अपने घर का बादशाह यह शख्सियत कोई और नहीं, वरन् उपन्यास सम्राट प्रेमचंद थे, जो उस समय गोरखपुर में गवर्नमेन्ट नार्मल स्कूल में सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत थे।

प्रेमचंद बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे. उनकी रचनाओं में तत्कालीन इतिहास की झलक साफ दिखाई देती है. यद्यपि प्रेमचंद के कालखण्ड में भारत कई प्रकार की प्रथाओं और रिवाजों, जो समाज को छोटे-बड़े और ऊंच-नीच जैसे वर्गों में विभाजित करती है, से परिपूर्ण था इसीलिए उनकी रचनाओं में भी इनकी उपस्थिति प्रमुख रूप से शामिल होती है. प्रेमचंद का बचपन बेहद गरीबी और दयनीय हालातों में बीता. मां का चल बसना और सौतेली मां का बुरा व्यवहार उनके मन में बैठ गए थे. वह भावनाओं और पैसे के महत्व को समझते थे. इसीलिए कहीं ना कहीं उनकी रचनाएं इन्हीं मानवीय भावनाओं को आधार मे रखकर लिखे जाते थे. उन्होंने अपनी रचनाओं में जन साधारण की भावनाओं, परिस्थितियों और उनकी समस्याओं का मार्मिक चित्रण किया था. उनकी कृतियाँ भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियाँ हैं. इसके अलावा प्रेमचंद ने लियो टॉल्सटॉय जैसे प्रसिद्ध रचनाकारों के कृतियों का अनुवाद भी किया जो काफी लोकप्रिय रहा.


प्रेमचंद जी के पिता अजायब राय डाक-कर्मचारी थे. प्रेमचंद की स्मृति में भारतीय डाक विभाग की ओर से 31 जुलाई, 1980 को उनकी जन्मशती के अवसर पर 30 पैसे मूल्य का एक डाक टिकट भी जारी किया गया.


(मुंशी प्रेमचंद को पढ़ते हुए हम  सब बड़े हो  गए।  उनकी रचनाओं से बड़ी  आत्मीयता महसूस होती है।  ऐसा लगता है जैसे इन रचनाओं के  पात्र हमारे आस-पास ही मौजूद हैं। पिछले दिनों बनारस गया तो मुंशी प्रेमचंद की जन्मस्थली लमही भी जाने का सु-अवसर प्राप्त हुआ। मुंशी प्रेमचंद स्मारक लमही, वाराणसी के पुस्तकालय हेतु हमने अपनी पुस्तक '16 आने 16 लोग' भी भेंट की, संयोगवश इसमें एक लेख प्रेमचंद के कृतित्व पर भी शामिल है।)




रविवार, 20 जुलाई 2014

प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं


जीवन में सफलता के बहुत मायने हैं।  कई बार जब हम जीवन में असफल होते हैं तो अपने ऊपर प्रश्नचिन्ह लगाने की बजाय परिस्थितियों को दोष देने लगते हैं। कहते हैं कि अभावों के बीच ही भाव पैदा होते हैं, जरुरत बस दृढ इच्छा शक्ति की है।  प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं . इन उदाहरणों पर गौर करके तो देखिये-

1 - मुझे उचित शिक्षा लेने का अवसर नहीं मिला। 

-उचित शिक्षा का अवसर फोर्ड मोटर्स के मालिक हेनरी फोर्ड को भी नहीं  मिला ।

2- बचपन में  ही मेरे पिता का देहांत हो गया था। 

-प्रख्यात संगीतकार एआर रहमान के पिता का भी देहांत बचपन में हो गया था।

3 - मै अत्यंत गरीब घर से हूँ।

-पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम भी गरीब घर से थे ।

4- बचपन से ही अस्वस्थ था। 

-ऑस्कर  विजेता अभिनेत्री मरली मेटलिन भी बचपन से बहरी व अस्वस्थ थीं ।

5 - मैंने  साइकिल पर घूमकर आधी जिंदगी गुजारी है। 

-निरमा के करसन भाई पटेल ने भी साइकिल पर निरमा बेचकर आधी जिन्दगी गुजारी ।

6- एक दुर्घटना में अपाहिज होने के बाद मेरी हिम्मत चली गयी।

- प्रख्यात नृत्यांगना सुधा चन्द्रन के पैर नकली हैं  ।

7 - मुझे बचपन से मंद बुद्धि कहा जाता है।  

- थामस अल्वा एडीसन को भी बचपन से मंदबुद्धि कहा जाता था।

8 - मैं  इतनी बार हार चुका कि  अब हिम्मत नहीं बची।  

-अब्राहम लिंकन 15 बार चुनाव हारने के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति बने।

9 - मुझे बचपन से ही परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ी। 

- प्रख्यात पार्श्व गायिका लता मंगेशकर को भी बचपन से ही परिवार की जिम्मेदारी उठानी पङी थी।

10 - मेरी लंबाई बहुत कम है।  

- सचिन तेंदुलकर की भी लंबाई कम है।

11 - मैं एक छोटी सी नौकरी करता हूँ, भला  इससे क्या होगा। 

 -धीरु अंबानी भी छोटी नौकरी करते थे।

12 - मेरी कम्पनी एक बार दिवालिया हो चुकी है, अब मुझ पर कौन भरोसा करेगा।

- दुनिया की सबसे बङी शीतल पेय निर्माता पेप्सी कोला भी दो बार दिवालिया हो चुकी है ।

13 - मेरा दो बार नर्वस ब्रेकडाउन हो चुका है, अब क्या कर पाऊँगा। 

-डिज्नीलैंड बनाने के पहले वाल्ट डिज्नी का तीन बार नर्वस ब्रेकडाउन हुआ था।

14 - मेरी उम्र बहुत ज्यादा है। 

- विश्व प्रसिद्ध केंटुकी फ्राइड के मालिक ने 60 साल की उम्र में  पहला रेस्तरा खोला था।

15 - मेरे पास बहुमूल्य आइडिया है पर लोग अस्वीकार कर देते हैं। 

- जेरॉक्स  फोटोकापी मशीन के आइडिये को भी ढेरों कंपनियों  ने अस्वीकार किया था पर आज परिणाम सामने है ।

16 - मेरे पास धन नहीं।

- इन्फोसिस के पूर्व चेयरमैन नारायणमूर्ति के पास भी धन नहीं था, उन्हें अपनी पत्नी के गहने बेचने पङे।

17 - मुझे ढेरों बीमारियाँ हैं।

-वर्जिन एयरलाइंस के प्रमुख भी अनेकों बीमारियों से ग्रस्त थे।  अमेरिका के राष्ट्रपति रुजवेल्ट के दोनों  पैर काम नहीं करते थे।

उपरोक्त के बावजूद :
कुछ लोग कहेंगे  कि यह जरुरी नहीं  कि जो प्रतिभा इन महानायकों  में थी, वह हममें  भी हो।

उनकी इस बात से भी सहमति है, लेकिन यह भी जरुरी नहीं कि जो प्रतिभा आपके अंदर है वह इन महानायकों में भी हो।

सार यह है कि -

"आज आप जहाँ  भी हैं  या कल जहाँ भी होंगे, उसके लिए आप किसी और को जिम्मेदार नहीं  ठहरा सकते। इसलिए आज चुनाव करिये कि आपको  सफलता और सपने चाहिए या खोखले बहाने ....!!"

-कृष्ण कुमार यादव @ शब्द-सृजन की ओर
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शनिवार, 19 जुलाई 2014

जापान से सीखिये, मँहगाई पर काबू पाना


मँहगाई फिर से चरम पर है।  रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल वस्तुयें दिनों ब दिन मँहगी होती जा रही हैं। 

जापान में एक परंपरा है जब किसी वस्तु का मूल्य अप्रत्याशित रूप से बढता है, तो वहां के नागरिक उस वस्तु का कुछ दिन के लिए उपयोग-उपभोग बंद कर देते है जिससे उस वस्तु के मूल्य में गिरावट आ जाती है।

हमको भी कुछ दिन के लिए,ज्यादा नहीं सिर्फ 10 दिन के लिए टमाटर-प्याज़ इत्यादि का सेवन बंद या न्यूनतम कर देना चाहिए। इससे जमाखोरों  के हौसले पस्त होंगे और 8-10 दिन में ही रेट कम हो जाएंगे।

अगर हम 8-10 दिन टमाटर या प्याज़ ना खायें  तो कुछ फर्क नहीं पड़ता है पर महंगाई पर कुछ लगाम लगेगी। वस्तुत : जब आपूर्ति के मुकाबले माँग  कम हो जाएगी तो मूल्य अपने आप ही कम हो जाएंगे !!




(फेसबुक पर हमारी इस पोस्ट को काफी लोगों ने पसंद किया और शेयर किया।  'डेली न्यूज एक्टिविस्ट' अख़बार (19 जुलाई 2014) में 'साइबर संवाद' के अंतर्गत भी प्रकाशित)

गुरुवार, 5 जून 2014

Think as a global citizen on World Environment Day

Five things that We can do as a global citizen on World Environment Day:

1) Spread awareness: Let's start making changes from the household level. As an environment enthusiast, you can spread awareness on a small level by talking to children in your family, or at your office or in your locality. Spread awareness about the environment in general.

2) Build a small farm or garden: We know it's difficult to find space in a metropolitan city, but if you're blessed with one, make and maintain a small farm or garden. Grow fruits, vegetables. Learn about various seeds, plants and manure. Create a part of your garden where you grow edible plants and another where you can grow flowers.

This will help you interact with nature and will also give you an opportunity to do something new. For those who are not blessed with huge spaces, start with a sapling or potato in a bag or a small sprout garden in your windowsill.

3) Travel by public transport: Take public transportation on World Environment Day and vow to take it more often than you do. If you're already a public transport user, take a walk. Introduce the concept of public transport to your family or car-lover friends. Cycle. It's fun and a great way to exercise.

4) Refuse, Reduce, Reuse, Renew, Recycle: If you're not already into this habit, it's a good day of the year to start. These 5R's are magic mantras when it comes to environmental conservation and sustainable usage. The concept is already taught to students at school. The problem is that elders have forgotten about it. Take time on World Environment Day to learn about this concept. There are many things that you can do on a personal level, if you just keep these 5R's in your mind.

5) Publicise: Did something nice to protect the environment? Talk about it! Show off. Share pictures and posts on Facebook, Twitter and Pinterest. Let people know what you plan to do and do it this World Environment Day. You can use Facebook invites to invite your friends to participate. Use Twitter hashtags like ‪#‎StayGreen‬ or ‪#‎WorldEnvDay‬ to spread your message faster.

You can also involve yourself with various conservation, restoration, or local eco-community projects in your area !!

Wish you all A very-very Happy Environment day !!

रविवार, 1 जून 2014

भारत और इंडिया में अंतर


भारत में गॉंव है, गली है, चौबारा है.
इंडिया में सिटी है, मॉल है, पंचतारा है.

भारत में घर है, चबूतरा है, दालान है.
इंडिया में फ्लैट और मकान है.

भारत में काका है, बाबा है, दादा है, दादी है.
इंडिया में अंकल आंटी की आबादी है.

भारत में खजूर है, जामुन है, आम है.
इंडिया में मैगी, पिज्जा, माजा का नकली आम है.

भारत में मटके है, दोने है, पत्तल है.
इंडिया में पोलिथीन, वाटर व वाईन की बोटल है.

भारत में गाय है, गोबर है, कंडे है.
इंडिया में सेहतनाशी चिकन बिरयानी अंडे है.

भारत में दूध है, दही है, लस्सी है.
इंडिया में खतरनाक विस्की, कोक, पेप्सी है.

भारत में रसोई है, आँगन है, तुलसी है.
इंडिया में रूम है, कमोड की कुर्सी है.

भारत में कथडी है, खटिया है, खर्राटे हैं.
इंडिया में बेड है, डनलप है और करवटें है.

भारत में मंदिर है, मंडप है, पंडाल है.
इंडिया में पब है, डिस्को है, हॉल है.

भारत में गीत है, संगीत है, रिदम है.
इंडिया में डान्स है, पॉप है, आईटम है.

भारत में बुआ है, मौसी है, बहन है.
इंडिया में सब के सब कजन है.

भारत में पीपल है, बरगद है, नीम है.
इंडिया में वाल पर पूरे सीन है.

भारत में आदर है, प्रेम है, सत्कार है.
इंडिया में स्वार्थ, नफरत है, दुत्कार है.

भारत में हजारों भाषा हैं, बोली है.
इंडिया में एक अंग्रेजी एक बडबोली है.

भारत सीधा है, सहज है, सरल है.
इंडिया धूर्त है, चालाक है, कुटिल है.

भारत में संतोष है, सुख है, चैन है.
इंडिया बदहवास, दुखी, बेचैन है.

क्योंकि …
भारत को देवों ने, वीरों ने रचाया है.
इंडिया को लालची, अंग्रेजों ने बसाया है !!

(जिस किसी ने भी लिखा है, बेहद दिल्लगी से लिखा है )


शुक्रवार, 30 मई 2014

मासूम सवाल


माँ 6 साल के बच्चे को पीटते हुये बोली,
"नालायक, तूने भँगी के घर
की रोटी खायी, तू भँगी हो गया, तूने
अपना धर्म भ्रष्ट कर लिया. अब
क्या होगा?
.
.
बच्चे का मासूम सवाल : 
माँ, मैने तो एक
बार उनके घर की रोटी खाई,
तो मैं भँगी हो गया, ।
लेकिन वो लोग
तो हमारे घर की रात
की बची रोटी बर्षो से खा रहे हैं,
तो वो ब्राह्राण क्यों नही हो पाये ??


( व्हाट्स ऎप पर प्राप्त एक पोस्ट, जिसे आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूँ। )

रविवार, 18 मई 2014

लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ के पहरुए पत्रकारों की सुरक्षा बेहद जरुरी - कृष्ण कुमार यादव

पत्रकार लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ के पहरुए हैं और उनकी सुरक्षा बेहद जरुरी है। यह एक अजीब संयोग है कि जो पत्रकार लोगों की आवाज़ उठाते हैं, अपने ही मामले में शांत रह जाते हैं।  उक्त उद्गार हिंदुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद में 14 मई, 2014 को  'प्रयाग प्रेस क्लब’ एवं 'उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा)' के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं एवं चर्चित साहित्यकार व् सोशल मीडिया एक्टिविस्ट श्री कृष्ण कुमार यादव ने व्यक्त किया। श्री यादव ने कहा कि प्रयाग प्रेस क्लब ने जिस कार्य के लिए इस संगठन का गठन किया है, वह बहुत ही सराहनीय कार्य है। आज पत्रकारों की सबसे अहम समस्या आवास की है और पत्रकारों को आवास उपलब्ध कराने का जो बीड़ा प्रयाग प्रेस क्लब ने उठाया है, वह काबिलेतारीफ है। इस अवसर पर प्रयाग प्रेस क्लब’ की तरफ से  अध्यक्ष श्री पवन कुमार द्विवेदी ने श्री कृष्ण कुमार यादव का माल्यापर्ण द्वारा एवं शाल ओढ़ाकर सम्मान भी किया। कार्यक्रम के दौरान इलाहाबाद परिक्षे़त्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने  शहर के कई वरिष्ठ पत्रकारों को सम्मानित किया । 

प्रयाग प्रेस क्लब के अध्यक्ष पवन कुमार द्विवेदी और महामंत्री भूपेश सिंह ने कार्यक्रम के मुख्य अतिथि निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव के अलावा  वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार आनन्द नारायण शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार के सी मौर्या, नचिकेता नारायण, संजय कुमार को माल्यार्पण कर एवं शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार शुक्ला ने कहा कि आज पत्रकारों की सुरक्षा बहुत महत्वपूर्ण हो गयी है, प्रयाग प्रेस क्लब की ओर से पत्रकारों का जो दुर्घटना बीमा कराया गया है, वह वास्तव में संगठन का सराहनीय कार्य है। विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार आनन्द नारायण शुक्ला, के सी मौर्या, नचिकेता नारायण ने कहा कि यह ऐसा पहला पत्रकार संगठन है, जिसने पत्रकारों के हित के बारे में सोचा है। प्रयाग प्रेस कलब के अध्यक्ष, महामंत्री समेत सभी पदाधिकारी इसके लिए धन्यवाद के पात्र हैं। प्रयाग प्रेस क्लब के अध्यक्ष पवन कुमार द्विवेदी ने नवगठित प्रयाग प्रेस क्लब के बारे में बताते हुए आगामी योजनाओं की घोषणा की। 

मुख्य अतिथि इलाहाबाद परिक्षे़त्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने  इस मौके पर तमाम पत्रकारों और फोटो जर्नलिस्ट्स को बीमा बांड वितरित किया। मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट अतिथियों के हाथों बीमा बांड ग्रहण करने वालों में वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश मिश्रा, पवन कुमार द्विवेदी, भूपेश सिंह, कुन्दन श्रीवास्तव, संजय कुमार, संदीप कुमार दुबे, सूर्य प्रकाश त्रिपाठी, वरिष्ठ छायाकार विभु गुप्ता, रंजन मिश्रा, नवीन सारस्वत, अनुराग शुक्ला, जितेन्द्र प्रकाश, भीम सिंह यादव, अनूप रावत, सत्यम श्रीवास्तव, दिलीप गुप्ता, विनोद कुमार, पत्रकार नागेन्द्र सिंह, अंजनी श्रीवास्तव, विद्याकांत मिश्रा, मनीष द्विवेदी, अमरदीप चौधरी, संतोष जायसवाल, वीरेन्द्र द्विवेदी, अनुराग तिवारी, गौरव केशरवानी, चन्द्रशेखर सेन, देवेन्द्र त्रिपाठी, संतोष तिवारी, सलीम अहमद, प्रदीप गुप्ता, रोहित शर्मा, अमरजीत सिंह, इरफान खान समेत 151 पत्रकार शामिल हैं। वहीं इस मौके पर अतिथियों को उपजा द्वारा प्रकाशित डायरेक्टरी भी वितरित की गयी। समारोह का संचालन वरिष्ठ पत्रकार मनीष द्विवेदी एवं धन्यवाद ज्ञापन अध्यक्ष पवन कुमार द्विवेदी ने किया। 



















रविवार, 11 मई 2014

माँ का आँचल


मेरा प्यारा सा बच्चा
गोद में भर लेती है बच्चे को
चेहरे पर नजर न लगे
माथे पर काजल का टीका लगाती है
कोई बुरी आत्मा न छू सके
बाँहों में ताबीज बाँध देती है।

बच्चा स्कूल जाने लगा है
सुबह से ही माँ जुट जाती है
चौके-बर्तन में
कहीं बेटा भूखा न चला जाये।
लड़कर आता है पड़ोसियों के बच्चों से
माँ के आँचल में छुप जाता है
अब उसे कुछ नहीं हो सकता।

बच्चा बड़ा होता जाता है
माँ मन्नतें माँगती है
देवी-देवताओं से
बेटे के सुनहरे भविष्य की खातिर
बेटा कामयाबी पाता है
माँ भर लेती है उसे बाँहों में
अब बेटा नजरों से दूर हो जायेगा।

फिर एक दिन आता है
शहनाईयाँ गूँज उठती हैं
माँ के कदम आज जमीं पर नहीं
कभी इधर दौड़ती है, कभी उधर
बहू के कदमों का इंतजार है उसे
आशीर्वाद देती है दोनों को
एक नई जिन्दगी की शुरूआत के लिए।

माँ सिखाती है बहू को
परिवार की परम्परायें व संस्कार
बेटे का हाथ बहू के हाथों में रख
बोलती है
बहुत नाजों से पाला है इसे
अब तुम्हें ही देखना है।

माँ की खुशी भरी आँखों से
आँसू की एक गरम बूँद
गिरती है बहू की हथेली पर।  

- कृष्ण कुमार यादव 
https://www.facebook.com/krishnakumaryadav1977

गुरुवार, 1 मई 2014

वोट उसे जिसका जनसरोकारों से जुड़ाव व साफ सुथरी छवि : कृष्ण कुमार यादव



चुनावी सरगर्मी चरम पर है। सभी दल व प्रत्याशी जनता को लुभाने के लिए बढ़चढ़कर वादे कर रहे हैं। मतदाताओं के सामने अहम चुनौती है कि किसको चुने और किसको नकारे ? हमारा सांसद न केवल संसद में हमारे क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है वरन हमारी रोजमर्रा की दुश्वारियों को दुरूस्त करने व बेहतर कल के निर्माण का जिम्मा भी उसके ही साथ में होता है। ऐसे में बिना समझे-बूझे अपने प्रतिनिधित्व का जिम्मा किसी के भी हाथ में दे देना समझदारी नहीं कहीं जा सकती है। योग्य प्रतिनिधि का चुनाव भी ठोक बजाकर करना चाहिए।

जनता को अपने मताधिकार का प्रयोग करते समय पार्टी, प्रत्याशी और मुद्दों में एक संतुलन बनाना चाहिए। कई बार होता है हम अपने जानने वाले को वोट दे देते हैं। यह अच्छी स्थिति नहीं है। हमें चुनाव में खड़े उम्मीदवारों में यह देखना पड़ेगा कि उसमें से कौन ऐसा है जो हमारी स्थानीय समस्याओं के साथ राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर संसद में आवाज उठा सकता है। सांसद का काम सिर्फ हैंडपंप लगवाने तक सीमित नहीं होता। इसलिए यह देखना चाहिए कि हमारा प्रतिनिधि राष्ट्रीय स्तर पर बनने वाली नीतियों के निर्माण में कितनी भागीदारी कर सकता है? कौन ऐसा प्रत्याशी है जो जनता की बात को समझता हो और जनता के बीच में रहता है। यह अहम नहीं कि हम जिसे वोट दे रहे उससे जुड़ी पार्टी की सरकार बनती है या वह विपक्ष में बैठता है। कोई व्यक्ति विपक्ष में बैठकर भी ज्यादा प्रभावी हो सकता है। इसलिए जिसको भी वोट दिया जाये उसकी छवि साफ-सुथरी हो तथा वह जनसरोकारों से जुड़ा हो।

-कृष्ण कुमार यादव
https://www.facebook.com/krishnakumaryadav1977


( साभार : डेली न्यूज एक्टिविस्ट, 30 अप्रैल 2014)



बुधवार, 30 अप्रैल 2014

लोकतंत्र का यह त्यौहार




वोट आपकी ताकत है, 
वोट देश की चाहत है। 
वोट सबका अधिकार है, 
बनाता यह सरकार है। 

लोकतंत्र का यह त्यौहार,
मनाओ जैसे उत्सव-मेला।
करो न इसमें कोई कोताही, 
पाँच साल में आती यह बेला।

बंद करो अब शोर मचाना, 
मतदान केंद्र, सुबह पहुँच जाना।
अपनी पसन्द का बटन दबाना, 
किसी के भुलावे में नहीं आना। 


                                                                                     ************
कृष्ण कुमार यादव

गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

लोकतंत्र का महापर्व : खुद वोट दें और दूसरों को भी प्रेरित करें


दान भारतीय संस्कृति की पहचान है। इसे जीवन मुक्ति का मार्ग माना जाता है। मान्यता है कि इससे इहलोक और परलोक दोनों सुधर जाता है। लेकिन  जब यही बात लोकतंत्र के महापर्व के लिए ’मत’दान की आती है, तब  लोग अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं करते या मतदान करने ही नहीं जाते । मतदान अधिकार ही नहीं पुनीत कर्तव्य  है। इसके माध्यम से हम अपने जन प्रतिनिधियों को न सिर्फ चुनते और सचेत करते हैं, बल्कि देश के नीति निर्धारण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करते हैं। युवा देश के कर्णधार हैं, उनकी इस चुनाव में अहम भूमिका है। यदि हम घरों, चौपालों में बैठकर या  सोशल मीडिया के माध्यम से व्यवस्था को कोसते रहेंगे तो इससे भला नहीं होगा। इसलिए खुद वोट दें और दूसरों को भी प्रेरित करें !!

कृष्ण कुमार यादव
निदेशक डाक सेवाएं
इलाहाबाद परिक्षेत्र, इलाहाबाद (उ.प्र.)-211001

( साभार : हिन्दुस्तान, 24 अप्रैल 2014)

रविवार, 20 अप्रैल 2014

Solah Aane Solah Log : A selective chronicle of Who’s Who in Indian literature



"Solah Aane Solah Log by Krishna Kumar Yadav is a selective chronicle of Who’s Who in Indian literature (Hindi & regional). Selective because it resorts to a limited list of 16 luminaries in Hindi Sahitya and thus conceiving upon the title – Solah Aane Solah Log (Solah Aana among Hindi dialect means complete, cent percent or unquestionable being). What sets apart this book from others in the category is that ..."

                               

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