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मंगलवार, 28 जून 2011

अंडमान में ''बदलते दौर में साहित्य के सरोकार'' विषय पर संगोष्ठी और 'सरस्वती सुमन' का विमोचन

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर में सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था ‘चेतना’ के तत्वाधान में स्वर्गीय सरस्वती सिंह की 11 वीं पुण्यतिथि पर 26 जून, 2011 को मेगापोड नेस्ट रिसार्ट में आयोजित एक कार्यक्रम में देहरादून से प्रकाशित 'सरस्वती सुमन' पत्रिका के लघुकथा विशेषांक का विमोचन किया गया. इस अवसर पर ''बदलते दौर में साहित्य के सरोकार'' विषय पर संगोष्ठी का आयोजन भी किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में श्री एस. एस. चौधरी, प्रधान वन सचिव, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, अध्यक्षता देहरादून से पधारे डा. आनंद सुमन 'सिंह', प्रधान संपादक-सरस्वती सुमन एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, डा. आर. एन. रथ, विभागाध्यक्ष, राजनीति शास्त्र, जवाहर लाल नेहरु राजकीय महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर एवं डा. जयदेव सिंह, प्राचार्य टैगोर राजकीय शिक्षा महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर उपस्थित रहे. कार्यक्रम का आरंभ पुण्य तिथि पर स्वर्गीय सरस्वती सिंह के स्मरण और तत्पश्चात उनकी स्मृति में जारी पत्रिका 'सरस्वती सुमन' के लघुकथा विशेषांक के विमोचन से हुआ. इस विशेषांक का अतिथि संपादन चर्चित साहित्यकार और द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवा श्री कृष्ण कुमार यादव द्वारा किया गया है. अपने संबोधन में मुख्य अतिथि एवं द्वीप समूह के प्रधान वन सचिव श्री एस.एस. चौधरी ने कहा कि सामाजिक मूल्यों में लगातार गिरावट के कारण चिंताजनक स्थिति पैदा हो गई है । >ऐसे में साहित्यकारों को अपनी लेखनी के माध्यम से जन जागरण अभियान शुरू करना चाहिए । उन्होंने कहा कि आज के समय में लघु कथाओं का विशेष महत्व है क्योंकि इस विधा में कम से कम शब्दों के माध्यम से एक बड़े घटनाक्रम को समझने में मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि देश-विदेश के 126 लघुकथाकारों की लघुकथाओं और 10 सारगर्भित आलेखों को समेटे सरस्वती सुमन के इस अंक का सुदूर अंडमान से संपादन आपने आप में एक गौरवमयी उपलब्धि मानी जानी चाहिए.

युवा साहित्यकार एवं निदेशक डाक सेवा श्री कृष्ण कुमार यादव ने बदलते दौर में लघुकथाओं के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि भूमण्डलीकरण एवं उपभोक्तावाद के इस दौर में साहित्य को संवेदना के उच्च स्तर को जीवन्त रखते हुए समकालीन समाज के विभिन्न अंतर्विरोधों को अपने आप में समेटकर देखना चाहिए एवं साहित्यकार के सत्य और समाज के सत्य को मानवीय संवेदना की गहराई से भी जोड़ने का प्रयास करना चाहिये। श्री यादव ने समाज के साथ-साथ साहित्य पर भी संकट की चर्चा की और कहा कि संवेदनात्मक सहजता व अनुभवीय आत्मीयता की बजाय साहित्य जटिल उपमानों और रूपकों में उलझा जा रहा है, ऐसे में इस ओर सभी को विचार करने की जरुरत है.

संगोष्ठी को आगे बढ़ाते हुए डा. जयदेव सिंह, प्राचार्य टैगोर राजकीय शिक्षा महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर ने कहा कि साहित्य के क्षेत्र में समग्रता के स्थान पर सीमित सोच के कारण उन विषयों पर लेखन होने लगा है जिनका सामाजिक उत्थान और जन कल्याण से कोई सरोकार नहीं है । केंद्रीय कृषि अनुसन्धान संस्थान के निदेशक डा. आर. सी. श्रीवास्तव ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि आज बड़े पैमाने पर लेखन हो रहा है लेकिन रचनाकारों के सामने प्रकाशन और पुस्तकों के वितरण की समस्या आज भी मौजूद है । उन्होंने समाज में नैतिकता और मूल्यों के संर्वधन में साहित्य के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला । डा. आर. एन. रथ, विभागाध्यक्ष, राजनीति शास्त्र, जवाहर लाल नेहरु राजकीय महाविद्यालय ने अंडमान के सन्दर्भ में भाषाओँ और साहित्य की चर्चा करते हुए कहा कि यहाँ हिंदी का एक दूसरा ही रूप उभर कर सामने आया है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि साहित्य का एक विज्ञान है और यही उसे दृढ़ता भी देता है.अंडमान से प्रकाशित एकमात्र साहित्यिक पत्रिका 'द्वीप लहरी' के संपादक डा. व्यास मणि त्रिपाठी ने ने साहित्य में उभरते दलित विमर्श, नारी विमर्श, विकलांग विमर्श को केन्द्रीय विमर्श से जोड़कर चर्चा की और बदलते दौर में इसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया. उन्होंने साहित्य पर हावी होते बाजारवाद की भी चर्चा की और कहा कि कला व साहित्य को बढ़ावा देने के लिए लोगों को आगे आना होगा। पूर्व प्राचार्य डा. संत प्रसाद राय ने कहा कि कहा कि समाज और साहित्य एक सिक्के के दो पहलू हैं और इनमें से यदि किसी एक पर भी संकट आता है, तो दूसरा उससे अछूता नहीं रह सकता।

कार्यक्रम के अंत में अपने अध्यक्षीय संबोधन में ‘‘सरस्वती सुमन’’ पत्रिका के प्रधान सम्पादक डाॅ0 आनंद सुमन सिंह ने पत्रिका के लघु कथा विशेषांक के सुन्दर संपादन के लिए श्री कृष्ण कुमार यादव को बधाई देते हुए कहा कि कभी 'काला-पानी' कहे जानी वाली यह धरती क्रन्तिकारी साहित्य को अपने में समेटे हुए है, ऐसे में 'सरस्वती सुमन' पत्रिका भविष्य में अंडमान-निकोबार पर एक विशेषांक केन्द्रित कर उसमें एक आहुति देने का प्रयास करेगी. उन्होंने कहा कि सुदूर विगत समय में राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तमाम घटनाएं घटी हैं और साहित्य इनसे अछूता नहीं रह सकता है। अपने देश में जिस तरह से लोगों में पाश्चात्य संस्कृति के प्रति अनुराग बढ़ रहा है, वह चिन्ताजनक है एवं इस स्तर पर साहित्य को प्रभावी भूमिका का निर्वहन करना होगा। उन्होंने रचनाकरों से अपील की कि वे सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को ध्यान में रखकर स्वास्थ्य समाज के निर्माण में अपनी रचनात्मक भूमिका निभाएं। इस अवसर पर डा. सिंह ने द्वीप समूह में साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए और स्व. सरस्वती सिंह की स्मृति में पुस्तकालय खोलने हेतु अपनी ओर से हर संभव सहयोग देने का आश्वासन दिया।

कार्यक्रम के आरंभ में संस्था के संस्थापक महासचिव दुर्ग विजय सिंह दीप ने अतिथियों और उपस्थिति का स्वागत करते हुए आज के दौर में हो रहे सामाजिक अवमूल्यन पर चिंता व्यक्त की । कार्यक्रम का संचालन संस्था के उपाध्यक्ष अशोक कुमार सिंह ने किया और संस्था की निगरानी समिति के सदस्य आई.ए. खान ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर विभिन्न द्वीपों से आये तमाम साहित्यकार, पत्रकार व बुद्धिजीवी उपस्थित थे.

दुर्ग विजय सिंह दीप
संयोजक- 'चेतना' (सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था)
उपनिदेशक- आकाशवाणी (समाचार अनुभाग)
पोर्टब्लेयर -744102

सोमवार, 27 जून 2011

अंडमान में 'सरस्वती सुमन' का लोकार्पण और संगोष्ठी : चित्रमय झलकियाँ

(कृष्ण कुमार यादव के अतिथि संपादन में जारी 'सरस्वती-सुमन' पत्रिका के 'लघु-कथा' विशेषांक (जुलाई-सितम्बर-2011) का पोर्टब्लेयर (अंडमान) में 26 जून को विमोचन करते हुए डा. आनंद सुमन 'सिंह', प्रधान संपादक-सरस्वती सुमन, श्री एस. एस. चौधरी, प्रधान वन सचिव, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, एवं डा. जयदेव सिंह, प्राचार्य टैगोर राजकीय शिक्षा महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर.)

(उपस्थित विद्वान जन, साहित्यकार और श्रोतागण)(लघु-कथा विशेषांक पर प्रकाश डालते अतिथि संपादक- कृष्ण कुमार यादव)
(कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कार्यक्रम के अध्यक्ष- देहरादून से पधारे, डा. आनंद सुमन 'सिंह', प्रधान संपादक-सरस्वती सुमन )
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(कार्यक्रम के दूसरे सत्र में 'वर्तमान दौर में साहित्य के बदलते सरोकार' विषय पर संगोष्ठी हुई. जिसमें विभिन्न वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किये.)
(मुख्य अतिथि श्री एस. एस. चौधरी, प्रधान वन सचिव, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह,का संबोधन)(कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह,का संबोधन) (डा. आर. सी. श्रीवास्तव, निदेशक- केंद्रीय कृषि अनुसन्धान संस्थान का संबोधन)
(डा. व्यास मणि त्रिपाठी, संपादक-द्वीप लहरी एवं एसोसिएट प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग, जवाहर लाल नेहरु राजकीय महाविद्यालय, पोर्टब्लेयर का संबोधन)

(डा. संत प्रसाद राय, शिक्षाविद का संबोधन) (डा. आर. एन. रथ, विभागाध्यक्ष, राजनीति शास्त्र, जवाहर लाल नेहरु राजकीय महाविद्यालय, एवं अध्यक्ष- चेतना, पोर्टब्लेयर का संबोधन)

(श्री दुर्ग विजय सिंह 'दीप', उपनिदेशक-आकाशवाणी, पोर्टब्लेयर का संबोधन)

























125 रचनाकारों की लघुकथाओं और 10 आलेखों सहित 'सरस्वती सुमन' का 'लघु-कथा' अंक जारी


अंतत: 'सरस्वती-सुमन' का लघुकथा विशेषांक (जुलाई-सितम्बर-2011) आ ही गया. चूँकि इस अंक के अतिथि संपादन का दायित्व मेरा था, अत: प्रतीक्षा भी स्वाभाविक थी. इस अंक हेतु मुझे अंतत: सामग्री भेजने तक 4,82 रचनाकारों की और तत्पश्चात 37 रचनाकारों की लघुकथाएं/आलेख प्राप्त हुई. यह दर्शाता है कि लघुकथा ने एक विधा के रूप में काफी तरक्की कर ली है.

फ़िलहाल, 180 पृष्ठ के इस अंक में कुल 125 रचनाकारों की लघुकथाएं और लघुकथाओं पर 10 आलेख शामिल किये गए हैं. इसमें भारत के तमाम प्रान्तों और विदेश से भी लघुकथाकारों को शामिल किया गया है. कुछेक ब्लागर्स की लघुकथाएं भी इसमें शामिल हैं. 125 लघुकथाओं के अतिरिक्त, शेष लघुकथाएं और आलेख हम सरस्वती सुमन को भेज रहे हैं, ताकि वे इनका सामान्य अंक में उपयोग कर सकें.

इस अंक के लिए जिन लोगों ने हमें सामग्री एकत्र करने में मदद की, रचनाएँ भेजीं और अन्य रूप में सहयोग दिया, उन सभी का आभार !!

सरस्वती सुमन (त्रैमासिक) : लघुकथा विशेषांक : जुलाई-सितम्बर-2011
अतिथि संपादक : कृष्ण कुमार यादव
प्रधान संपादक : डा. आनंद सुमन सिंह
पता: 'सारस्वतम', 1-छिब्बर मार्ग, आर्य नगर, देहरादून, उत्तराखण्ड-248001
saraswatisuman@rediffmail.com










गुरुवार, 23 जून 2011

पैरट आइलैंड, अंडमान में एक दिन तोतों के साथ

अंडमान में बहुत सी ऐसी चीजें हैं, जो प्राय: बहुत कम ही लोगों को पता होती हैं. इन्हीं में से एक है-पैरट-आइलैंड. पोर्टब्लेयर से बाराटांग की यात्रा में बहुत कुछ देखने को मिलता है. रास्ते में पाषाण कालीन सभ्यता में रह रहे तीर-धनुष से लैस जारवा आदिवासी, बाराटांग में कीचड़ के ज्वालामुखी, लाइम स्टोन केव. चारों तरफ घने वृक्षों से आच्छादित हरे-भरे जंगल और समुद्र की अठखेलियाँ. समुद्र का सीना चीरते हमारी स्टीमर-बोट शाम को साढ़े चार बजे आगे बढती है, साथ में मेरा परिवार और कुछेक स्टाफ के लोग.



मैन्ग्रोव-क्रीक के बीच से गुजरते हुए शाम की समुद्री हवाएँ ठण्ड का अहसास कराती हैं. जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, आस-पास दसियों छोटे-छोटे द्वीप दिखने लगते हैं. मौसम सुहाना सा हो चला है. गंतव्य नजदीक है. आखिर हम पैरट-आइलैंड के करीब पहुँच ही जाते हैं. बोट को धीमे-धीमे वह किनारे लगाता है. उतरने की कोई जगह नहीं, बोट में बैठकर ही नजारा लेना है.





बिटिया पाखी चारों तरफ टक-टकी सी निगाह लगाए हुए है. बार-बार पूछती है कि तोते कब दिखेंगें. कानपुर में हमारे आवास-प्रांगन में एक विशाल वट वृक्ष था, शाम को उस पर अक्सर ढेर सारे तोते आते थे. तोतों की टें-टें सुनना मनोरंजक लगता था.





...चारों तरफ ठहरी हुई शांति, समुद्र भी मानो थक कर आराम कर रहो हो. एक-दो मछुहारे नाव के साथ मछली पकड़ते दिख जाते हैं. अचानक एक चीख सी पूरे माहौल का सन्नाटा तोड़ती है. हम चौंकते हैं कि क्या हुआ ? नाविक ने बताया कि जंगल में किसी ने हिरण का शिकार कर पकड़ लिया है. यद्यपि यहाँ हिरण को मारना जुर्म है, पर ये तथाकथित शिकारी जंगलों में कुत्तों के साथ जाते हैं और कुत्ते दौड़कर हिरण को पकड़ लेते हैं. अंडमान में अवैध रूप से हिरण के मांस की बिक्री कई बार सुनने को मिलती है. यह भी एक अजीब बात है की यहाँ के आदिवासी हिरणों को पवित्र आत्मा मानते हैं और उनका शिकार नहीं करते, पर बाहर से आकर बसे लोग हिरणों के शिकार में अवैध रूप से लिप्त हैं.





पैरट आईलैंड वास्तव में समुद्र के बीच मैंग्रोव की झाड़ियों पर अवस्थित है. यहाँ कोई जमीन नहीं, इसीलिए चाहकर भी बोट से नहीं उतर सकते. इन मैंग्रोव की झाड़ियों को तोतों ने कुतर-कुतर कर सम बना दिया है, ताकि उन्हें किसी प्रकार की असुविधा न हो. दूर से देखने पर यह हरे रंग का गलीचा लगता है. न तो एक पत्ती ऊपर, न एक पत्ती नीचे. वाकई, प्रकृति का अद्भुत नजारा.


...तभी एक तोते की टें-टें सुनाई दी. वह चारों तरफ एक चक्कर मरता है, फिर आवाज़ देता है-टें-टें. यह इशारा था सभी तोतों को बुलाने का. तभी दूसरी दिशा से आते दो तोते दिखाई दिए..टें-टें. फिर तो देखते ही देखते चारों तरफ से तोतों का झुण्ड दिखने लगा. बमुश्किल 15 मिनट के भीतर हजारों तोते आसमान में दिखने लगे. आसमान में कलाबाजियाँ करते, विभिन्न तरह की आकृति बनाते, एक झुण्ड से दुसरे झुण्ड में मिलते और फिर बड़ा झुण्ड बनाते तोते मानो अपनी एकता और कला का जीवंत प्रदर्शन कर रहे हों.




सबसे बड़ा अजूबा तो यह था कि कोई भी तोता मैंग्रोव पर नहीं बैठता, बस उसके चारों तरफ चक्कर लगाता और फिर आसमान में कलाबाजियाँ, मानो सब एक अनुशासन से बंधे हुए हों...और देखते ही देखते सारे तोते मैंग्रोव की झाड़ियों पर उतर गए. हरे रंग के मैंग्रोव पर हरे -हरे तोते, सब एकाकार से हो गए थे. चूँकि हमने उन्हें वहाँ उतरते देखा था, अत: उनकी उपस्थिति का भान हो रहा था. कोई सोच भी नहीं सकता कि मैंग्रोव की इन झाड़ियों पर हजारों तोते उपस्थित हैं. न जाने कितने द्वीपों से और दूर-दूर से ये तोते आते हैं और पूरी रात एक साथ बिताने के बाद फिर अगली सुबह मोती की तरह बिखरे द्वीपों की सैर पर निकल जाते हैं.

सोमवार, 20 जून 2011

भोपाल से प्रकाशित LN STAR में 'शब्द सृजन की ओर' की प्रविष्टि


भोपाल से प्रकाशित LN STAR साप्ताहिक पत्र के 4-10 जून, 2011 अंक में 'शब्द-सृजन की ओर' ब्लॉग पर 9 मार्च, 2011 को प्रकाशित पोस्ट 'काला पानी के 105 साल' को प्रकाशित किया गया है. इससे पहले 'शब्द सृजन की ओर' ब्लॉग की पोस्टों की चर्चा जनसत्ता, अमर उजाला इत्यादि में हो चुकी है.

मेरे दूसरे ब्लॉग 'डाकिया डाक लाया' ब्लॉग और इसकी प्रविष्टियों की चर्चा दैनिक हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, राजस्थान पत्रिका, उदंती, LN STAR पत्र-पत्रिकाओं में हो चुकी है.

इस प्रोत्साहन के लिए सभी का आभार !!

शुक्रवार, 17 जून 2011

अपनी संस्कृति पर गर्व करना सीखें...

भारत आज भौतिक उन्नति के पथ पे है. ये हर्ष और गौरव की बात है. चाहे हम वैज्ञानिक उपलब्धियों की बात कर ले या आर्थिक मोर्चे पर अपनी स्वर्णिम सफलताओ पे नज़र डाल ले तो हम ये पाएंगे कि भारत अपने तमाम विरोधाभासो के बावजूद एक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है. ये उस देश के लिए गर्व की बात है जिसने एक लम्बे समय तक दासता झेली हो. पर क्या उस देश को सिर्फ इन उपलब्धियों को ही सर्वस्व मान लेना चाहिए जिस देश में ज्ञान के उच्त्तम सोपानो पे विचरण करना नैसर्गिक माना जाता रहा हो. भौतिक उपलब्धियों पे गर्व करना अलग बात है पर उनको सर्वस्व या अंतिम लक्ष्य मान लेना अलग बात है. दुःख की बात है की जिस देश में ज्ञान की महिमा का बखान होता रहा है आज उसी देश में कंचन और काया की प्रधानता है.

ऐसा क्यों हुआ कि पूंजीपति कि इज्ज़त ज्ञानियो से अधिक हो गयी. ज्ञान का पलड़ा पूँजी से हल्का कैसे हो गया? पाश्चात्य संस्कृति से महज अच्छे गुण लेने के बजाय हमने उसको अपना पथ प्रदर्शक क्यों मान लिया? विश्लेषण करने वाले कह सकते है कि भाई ये तो लॉर्ड मैकाले कि शिक्षा पद्वत्ति का कमाल है . उसने चाहा था कि हमारे न रहने पर भी एक ऐसी नस्ल तैयार हो जो कि सिर्फ तन से भारतीय हो. उसने चाहा कि ऐसी प्रजाति का जन्म हो जिसे अपने प्राचीन श्रेष्ठ गुणों को आत्मसात करने में शर्म महसूस हो, एक ग्लानि बोध का भाव उत्पन्न हो.एक ऐसी नस्ल तैयार हो जिसे अपने ही गौरव को धिक्कारनमें रस का अनुभव हो. मुझे कहने में सकोच नहीं कि मैकाले ने जो चाल चली उसमे वो कामयाब रहा. अगर वो आज जिन्दा होता तो अपनी सफलता पर खुश हो रहा होता. आज आप कही भी नज़र डाल के देखिये सब उसी के चेले आपको नज़र आयेंगे.एक ऐसा देश अस्तित्व में आ गया है जिसमे लोग सरस्वती पूजा को तो लोग सांप्रदायिक मानते है पर वैलेंटाइन डे को अंगीकार करने में कोई हायतौबा नहीं मचती.

इस अजीबोगरीब माहौल में आज जरुरत है उन बुद्धिजीवियों, लेखको कि जो हम भारतीयों को प्रचीन मूल्यों को गर्व के साथ अपनाने का मार्ग प्रशस्त कर सके. अगर ऐसा न हुआ तो हम भी उसी गति को प्राप्त होगे जो उन सभ्यताओ का हुआ जिनमे भौतिक मूल्यो पे ज्यादा आस्था प्रकट की गयी.इसी सोच के साथ सलिल ज्ञवाली ने “भारत क्या है” पुस्तक को लिखा है. आज के युग में गरिमामय मूल्यों को पुनर्स्थापित या फिर प्राचीन सनातन संस्कृति के आदर्शो में लोगो का विश्वास फिर से बहाल करना टेढ़ी खीर है. सलिल जी ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए एक दुष्कर शोध और कठिन मेहनत के उपरान्त “भारत क्या है” की रचना की है. यह पुस्तक विश्वव्यापी हो चुकी हैं जिसका प्रकाशन सिघ्र ही अमेरिका से भी होने जा रही हैं।

इस अनुपम पुस्तक में सलिल जी ने पाश्चात्य विचारको, वैज्ञानिको के साथ ही भारतीय विचारको के कथन का हवाला देते हुए इस बात की पुष्टि की है कि जिस सनातन संस्कृति के ज्ञान को हम श्रद्धा के साथ आत्मसात करने में हिचकते है वही ज्ञान पाश्चात्य जगत के महान वैज्ञानिको, लेखको और इतिहासकारों की नज़रो में अमूल्य और अमृत सामान है. वे हमारे ऋषि मुनियों के ज्ञान को बहुत आदर कि दृष्टि से देखते है. कितने आश्चर्य कि बात है कि हम आज इसी ज्ञान को रौंद कर आगे बढ़ रहे है .

सलिल जी की इस अद्भुत कृति में आप आइन्स्टीन, नोबेल से सम्मानित अमेरिकन कवि और दार्शनिक टी एस इलिएट , दार्शनिक एलन वाट्स, अमेरिकन लेखक मार्क ट्वेन, प्रसिद्ध विचारक एमर्सन, फ्रेंच दार्शनिक वोल्टायर, नोबेल से सम्मानित फ्रेंच लेखक रोमा रोला, ऑक्सफोर्ड के प्रोफ़ेसर पाल रोबर्ट्स, भौतिक शास्त्र में नोबेल से सम्मानित ब्रायन डैविड जोसेफसन, अमेरिकन दार्शनिक हेनरी डेविड थोरू, एनी बेसंट, महान मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग के साथ भारतीय विचारको जैसे अब्दुल कलाम के विचारो को आप पढ़ और समझ सकते है. ये विचार आप को अन्यत्र भी पढने को मिल सकते है पर जो इस किताब को औरो से अलग बनाती है वो बात ये है कि आप को स्थापित विचारको से जुड़े कई महत्वपूर्ण विचार एक ही जगह पढने को मिल जाएगा. थोडा सा किताब के कथ्य पर भी गौर करे. इतना तो स्पष्ट है किताब को पढने के बाद कि भले आज अपने प्राचीन ऋषि मुनियों की संस्कृति से दूरी बनाये रखने को ही हम आधुनिकता का परिचायक मान बैठे हो पर इस आधुनिक जगत के महान विचारको ने अपने ऋषि मुनियों के ज्ञान की मुक्त कंठ से सराहना की है. अब आइन्स्टीन को देखे जो यह कह रहे है कि ” हम भारतीयों के ऋणी है जिन्होंने हमको गणना करना सिखाया जिसके अभाव में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजे संभव नहीं थी.” वर्नर हाइजेनबर्ग प्रसिद्ध जर्मन वैज्ञानिक जो क्वांटम सिद्धांत की उत्पत्ति से जुड़े है का यह कहना है कि ”भारतीय दर्शन से जुड़े सिद्धांतो से परिचित होने के बाद मुझे क्वांटम सिद्धांत से जुड़े तमाम पहलु जो पहले एक अबूझ पहेली की तरह थे अब काफी हद तक सुलझे नज़र आ रहे है.” इन सब को पढने के बाद क्या आपको ऐसा नहीं लग रहा कि आज कि शिक्षा पद्वति में कही न कही बहुत बड़ा दोष है जिसके वजह से पढ़े लिखे गधे पैदा हो रहे है जिनको अपने ही देश के ज्ञान को अपनाने में लज्जा महसूस होती है. खैर इस किताब के कुछ और अंश देखे.

ग्रीस की रानी फ्रेडरिका जो कि एडवान्स्ड भौतिक शास्त्र से जुडी रिसर्च स्कालर थी का कहना है कि “एडवान्स्ड भौतिकी से जुड़ने के बाद ही आध्यात्मिक खोज की तरफ मेरा रुझान हुआ. इसका परिणाम ये हुआ की श्री आदि शंकराचार्य के अद्वैतवाद या परमाद्वैत रुपी दर्शन को जीवन और विज्ञान की अभिव्यक्ति मान ली अपने जीवन में “. प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक आर्थर शोपेन हॉवर का यह कहना है कि “ सम्पूर्ण भू-मण्डल पर मूल उपनिषदों के समान इतना अधिक फलोत्पादक और उच्च भावोद्दीपक ग्रन्थ कही नहीं हैं। इन्होंने मुझे जीवन में शान्ति प्रदान की है और मरते समय भी यह मुझे शान्ति प्रदान करेंगे .”

प्रसिद्ध जर्मन लेखक फ्रेडरिक श्लेगल (१७७२-१८२९) ने संस्कृत और भारतीय ज्ञान के बारे में श्रद्धा प्रकट करते हुए ये कहा है कि ” संस्कृत भाषा में निहित भाषाई परिपक्वत्ता और दार्शनिक शुद्धता के कारण ये ग्रीक भाषा से कही बेहतर है. यही नहीं भारत समस्त ज्ञान कि उदयस्थली है. नैतिक , राजनैतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से भारत अन्य सभी से श्रेष्ट है और इसके मुकाबले ग्रीक सभ्यता बहुत फीकी है.” इतना तो यह पढने के बाद समझ में आना चाहिए कि कम से कम हम भारतीय लोग अपनी संस्कृति का उपहास उड़ना बंद कर दे. कम से कम वो लोग तो जो यह मानते है कि पीछे मुड़कर देखने से हम “केव-मेंटालिटी” के शिकार हो जायेगे.

इसके आगे के पन्नो में सलिल जी ने अपने लेखो में इन्ही सब महान पुरुषो के विचारो को अपने तरह से व्याख्या कि है जिसमे आज के नैतिक पतन पे क्षोभ प्रकट किया गया. कुल मिला के हमे सलिल जी के इस पवित्र प्रयास कि सराहना करनी चाहिए कि आज की विषम परिस्थितयो में भी उन्होंने भारतीय संस्कृति के गौरव को पुनर्जीवित करने की कोशिश कि है. उम्मीद है कि ये पुस्तक एक रौशनी की किरण बनेगी और हम सब अब्दुल कलाम की तरह सोचने पे विवश हो जायंगे कि क्यों मीडिया या भारतीय आज नकरात्मक रुख में उलझे हुए है? क्यों हम अपनी उपलब्धियों और मजबूत पहलुओ को नकारने में ही सारी उर्जा खत्म कर देते है. चलिए हम अपनी संस्कृति पे गर्व करना सीखे बिना किसी ग्लानि बोध के. आज से और अभी से!

--अरविन्द पाण्डे,इलाहावाद

सोमवार, 13 जून 2011

ख़त

बहुत दिनों बाद खतों को लेकर संजीदगी से लिखी कोई कविता पढ़ी. मन में उतर सी गई 'दीपिका रानी' की 'आउटलुक' में छपी यह कविता, सो अब आप से भी शेयर कर रहा हूँ-


एक दिन अचानक एक खत मिला
लिफाफे में थी
थोड़ी खुशबू
कुछ ताजी हवा
और पहली बारिश का सौंधापन

माँ के हाथों की बनी
रोटियों की गर्माहट थी उसमें
पिता की थपकियों सा सुकून
और एक शरारती सा बच्चा
झांक रहा था बार-बार

खत में थे दो हाथ
जो उठे थे दुआओं में
दो आँखें जिनमें दर्द था
जो मेरा था.
मुस्कराहट के पीछे
मेरी आँखों की उदासी को
वो आँखें समझती थीं

खत ने वो असर किया
कि मेरा दर्द
मुस्कराहट में बदल दिया
उसमें थी वो संजीवनी
जो मेरी डूबती सांसों में
जिन्दगी भर गई
और मेरे जीने का सामान कर गई

मैने सोचा, लिखूँ जवाबी खत
वही खुशबू वही गर्माहट
वही सुकून ,वही मुस्कराहट
बंद की लिफाफे में
मगर अब तक वो यहीं पड़ा है
क्या फरिश्तों का कोई पता होता है ?

-दीपिका रानी
(साभार : आउटलुक, मई 2011)

बुधवार, 8 जून 2011

जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने ......

आज मुझे याद आ रहा है "पूरब और पश्चिम" नामक एक भारतीय फ़िल्म का एक मशहूर गाना "जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने, दुनियां को तब गिनती आई..."। शायद आम भारतीय इस बात को नही जानता कि विश्व को ज़ीरो और सही मायने में गिनती भारत ने ही दी थी परन्तु विश्व के महान वैज्ञानिक आईन्सटीन इस बात को कभी नही भूलें; उन्होने ईमानदारी से मुक्त कंठ से भारत की प्रसंशा करते हुए कहा था कि " हमे भारतीयों का ॠणी होना चाहिये जिन्होने विश्व को गिनती दी, जिसकी बिना कोई भी अन्य ख़ोज सम्भव ही नही थी"

अभी हाल में ही प्रकाशित एक महान कृति जो कि एक पुस्तक के रूप में समाने आई है जिसे सकंलित किया है उतर-पूर्व भारत के एक महान लेख़क सलिल गेवाली ने । इस कृति का नाम है "What is India" इस पुस्तक में विश्व के सभी महान वैज्ञानिकों, महान कवियों, समाज शास्त्रियों, नेताओं व अन्य महान हस्तियों के द्वारा की गई उदघोषनाएं है; जहां उन्होने भारतीय ग्रन्थ सम्पदा की तहदिल से प्रसंशा की है । विश्व की इन महान आत्माओं ने खुले रूप से यह स्वीकार किया है कि किस प्रकार हिन्दुस्तान के महान ग्रन्थों ने उनकी महान कृतियों के उदय के समय सहायता की ।

“What is India” को पढकर हर भारतीय का सिर गर्व से ऊचां हो जाता है । हर भारतीय को समझ आ जाता है कि हमारे ग्रन्थ इतने महान है कि वो विश्व की महान खोज़ो के भागीदार बने । सचमुच महान है यह पुस्तक । आजतक इस प्रकार का सकंलन किसी भी ने भी इस तरह से प्रस्तुत नही कियां । सलिल गेवाली का यह कार्य वास्तव में तरीफ़ के काबिल है और अपने आप मे एक महान कार्य है ।

यह पुस्तक हर भारतीय को प्रेरित करती है कि वो अपनी ग्रन्थ सम्पदा को फ़िर से देखें और अध्यन करें और उनमें वो सब कुछ खोज़ निकाले जो अब तक नही खोज़ा गया है । क्योकि अभी भी बहुत कुछ ऐसा भी है जो विश्व की महान आत्मायें शायद नही खोज़ पायी । युवा भारतीयों को इस महान कृति से बहुत आत्मिक बल मिला है और उनका आत्मविश्वास बढ़ा है ।

“What is India” से हमें हमारी प्राचीन संस्कृति की महानता का भी पता चलता है । महान अमेरिकन कवि ओर दार्शनिक टी.ऐस. ईलिओट जिन्होने २ साल तक संस्कृत भाषा सीखी और पांतन्जलि योग की तत्वमीमांसा को समझा ओर स्वयं माना कि "यूरोप के दार्शनिक भारतीय दार्शनिकों की कुशाग्र बुद्धि के समक्ष स्कूली बच्चे जैसे है"

यह पुस्तक उस महान भारत की महानता को ताज़ा कर रही है जिसके बारे में आज से कई वर्ष पहले रानी फ़्रेडरिका - ग्रीस के राजा पाल की पत्नि - ने यह कहा "मुझे इस बात से जलन होती है आप भारतीय कितने भाग्यशाली है कि आपके पास इतनी महान विरासत है" । उन्होने तो यहां तक भी कहा "ग्रीस मेरा जन्म स्थान अवश्य है परन्तु मेरी आत्मा भारत मे ही बसती है" ।

“What is India” से हमें मालूम पड़ता है हमारा अतित क्या था । हमारे पूर्वज ॠषि-मुनि कितने उन्न्त विचारों के थे और कितनी महान थी वो कृतियां जो उन्होने हमें हमारे ग्रन्थों के रूप में दी । उनकी इन महान कृतियों का प्रयोग पूरे विश्वभर में हुआ । पूरे विश्व समाज ने इस बात का लाभ उठाया ।

इस पुस्तक में उद्घोषित एक उक्ति में फ़्रांस के एक महान दार्शनिक नें तो यह तक कहा कि " मैं इस बात से पूरी तरह से सहमत हू कि खगोलशास्त्र, ज्योतिष विधा, अध्यात्म आदि यह सब ज्ञान हमारे पास गंगा के किनारों से आया है" इनके कहने का आशय यह कि भारत की महान और पवित्र नदी गंगा के किनारों पर ही भारत वर्ष के महान ऋषियों ने इन महान विधाओं की खोज की है" यह कहना है फ्रांस के महान दार्शनिक फ़्रानकोस एम वोलटेयर का ।

अब यदि हाल में ही चल रही वैज्ञानिक खोज़ो की बात करे तो बात आती है आज के महान वैज्ञानिक स्टीफ़ेन हाकिंस की जो इस समय पर अपनी खोज़ो पर अग्रसर है । स्टीफ़ेन हाकिंस कहते है कि अगर कोई यान प्रकाश की गति के आस पास किसी भारी पिण्ड के चारो ओर चक्कर कटे तो उसमे बैठे हुए लोगो के लिए समय धीरे चलने लगेगा । अगर यह यान 5 साल तक भारी पिण्ड के चारो ओर चक्कर लगता रहता है तो उसके लिए तो 5 साल बितेगे परन्तु बाहरी दुनिया में 20 साल बीत चुके होंगे ।

यानि ऐसा भी संभव है की हमारे आस पास एक ओर दुनिया भी चल रही हो । यही हमारे प्राचीन ग्रन्थ योग वसिष्ठ में बताया गया है यदि आप इस महान ग्रन्थ का अध्यन करे तो इसमें लीला की कहानी है इस कहानी के माध्यम से यह बताया गया है की ब्रहमांड के अन्दर ब्रहमांड चल रहा है । ओर भी बहुत कुछ इस ग्रन्थ में बताया गया है जोकि Stephen Hawkins जैसे महान वैज्ञानिक की बातो से हू बहू है ।
अपने भारत को पहचानने के लिये, अपनी ग्रन्थ सम्पदा की ताकत को समझने के लिये; विश्व के महान लोगों का हमारे भारत को लेकर क्या सोच है इस बात को जानने के लिये “What is India” एक बेजोड़ उपलब्धि हो सकती है !

--- Harish Kumar
Haryana

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Courtesy : E-mail received by Priyanka Sharma,Los Angeles, USA

मंगलवार, 31 मई 2011

देखिये..शायद आपका प्यार मिल जाये !!

क्या आपका मन किसी को पाने के लिए या जीवन साथी बनाने के लिए मचल रहा है? क्या आपके पास सबकुछ होते हुये भी प्यार नहीं है? क्या आपकी शादी नहीं नहीं हो पा रही? तो ये परेशान मत होइए आज हम आपके लिए लाये हैं वो सभी उपाय जिनको करने के बाद आपकी प्रेमिका कहेगी कि मैं जोगन तेरे प्रेम की.........

जब भी किसी को प्रेम करें तो याद रखें कि संयम और प्रतीक्षा सबसे उत्तम उपाय है .
ईश्वर से प्रेम के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, क्योंकि दुआओं में असर होता है .
प्रेम प्राप्ति के लिए आप भगवान् कामदेव और देवी रति के साथ साथ शिव-शक्ति,गणपति,और भगवान विष्णु जी की पूजा कर सकते हैं .
इन्द्र देवता,अग्नि देवता,चन्द्रमा देवता,अप्सराओं व यक्षिणी देवियों की उपासना भी प्रेम प्रदान करती हैं .
देवी दुर्गा जी से मांगी गयी प्रेम व सुख शान्ति सौभाग्य की तत्काल पूर्ती होती है .
यदि प्रेम विवाह करना चाहते हैं तो ब्रत एवं दान बहुत सहायक होते हैं.



प्रेम प्राप्ति के कुछ अति सरल दिव्य मंत्र
कृष्ण जी का मंत्र -ॐ क्लीं कृष्णाय गोपीजन बल्लभाय स्वाहा:
कृष्ण मंदिर में मुरली बांसुरी ले जा कर अर्पित करें
पान अर्पण से प्रेम प्राप्ति होती है
यदि प्रेम में फूट पड़ गयी हो तो उसे पुनह पाने के लिए भैरव जी की पूजा अचूक उपाय है
भैरव देवता को मीठी रोटी का प्रसाद बना कर अर्पित करें
मानसिक तौर से उत्तरनाथ भैरव का मंत्र जपें
भैरव जी का मंत्र-ॐ ज्लौम रहौं क्रोम उत्तरनाथ भैरवाय स्वाहा:
यदि आप किसी को अपना बनाना चाहते हैं तो माँ शक्ति की पूजा करे
माता को लाल रंग का झंडा अर्थात ध्वजा चढ़ाएं व मनोकामना मांगें
माँ शक्ति का मंत्र-ॐ नमो मोहिनी महामोहिनी अमृत वासिनी स्वाहा:
देवराज इन्द्र की पत्नी इंद्रायणी की स्तुति को अमोघ माना जाता हैं कई ऋषि पुत्रियों ने उनकी स्तुति कर वर पाया है
इंद्रायणी देवी की पूजा उन्हें करनी चाहिए जो नहीं जानते की उनके जीवन में कौन आने वाला है
तब देवी प्रसन्न हो कर अत्यंत स्रेष्ठ प्रेमिका व पति या पत्नी प्रदान करती है
इंद्रायणी देवी का मंत्र-ॐ देवेंद्राणी विवाहं भाग्यमारोग्यम देहि मे
बीस के अंक को विवाह का अंक माना जाता है विवाह में समस्या पर चार खाने बना कर केवल बीस बीस लिखना चाहिय
बीस के इस यन्त्र को धारण करने से या पास रखने से विवाह हो जाता है

यन्त्र- 20 20 20 20
20 20 20 20
20 20 20 20
20 20 20 20

गोमेद नामक रत्न को गलें में पहनने से विवाह लाभ होगा
चांदी में मोती की अंगूठी पहनने से प्रेम बढेगा
हीरे अथवा जरकन के आभूषण प्रेम में बृद्धि करेंगे
नीलम की अंगूठी प्रतिष्ठित कर पहनने से और संकल्पित करने से प्रेम में सफलता मिलती है
शहद के रुद्राभिषेक से मनचाहा प्रेम मिलेगा
सोलह सोमवार के ब्रत से योग्य सुन्दर सुशील पति मिलेगा
अन्न दान करने से प्रेम विवाह संपन्न होता है
गौरी देवी को चुनरी श्रृंगार चढाने व मौली बांधने से मनमीत मिलता है
मधुर व्यबहार मीठी बाणी जीवन में स्थाई प्रेम प्रदान करने में समर्थ हैं
धीरज और संतोष के साथ साथ सकारात्मक आत्मविश्वास भी होना चाहिए
योग मेडिटेशन और संगीत सहित शाकाहार को अपनाएँ
नशों से दूर रहना चाहिए

साभार : कौलान्तक पीठाधीश्वर/महायोगी सत्येन्द्र नाथ

सोमवार, 30 मई 2011

मानवीय सभ्यता को लीलता तम्बाकू

कल 31 मई को विश्व तम्बाकू निषेध दिवस है। मई माह की भी अपनी महिमा है. मजदूर दिवस से आरंभ होकर यह तम्बाकू निषेध दिवस पर ख़त्म हो जाता है. यह दिवस तो सरकारें हर साल मनाती हैं, यहाँ तक कि दुनिया के 170 राष्ट्रों ने व्यापक तम्बाकू नियंत्रण संधि पर हस्ताक्षर भी किये हैं पर वास्तव में इस सम्बन्ध में कोई ठोस पहल नहीं की जाती है. इसके पीछे राजस्व नुकसान से लेकर कार्पोरेट जगत के निहित तत्व तक शामिल हैं, जिनकी सरकारों में जबरदस्त घुसपैठ होती है. ऐसे में तम्बाकू के धुँए का यह जहर धीरे-धीरे सुरसा के मुँह की तरह पूरी दुनिया को निगलने पर आमदा है. गौरतलब है कि 450 ग्राम तम्बाकू में निकोटीन की मात्रा लगभग 22.8 ग्राम होती है। इसकी 6 ग्राम मात्रा से एक कुत्ता 3 मिनट में मर जाता है। तम्बाकू के प्रयोग से अनेक दंत रोग, मंदाग्नि रोग हो जाता है। आंखों की ज्योति कम हो सकती है तो दुष्प्रभाव रूप में व्यक्ति बहरा व अन्धा तक हो जाता है। तम्बाकू के निकोटीन से ब्लड प्रेशर बढ़ता है, रक्त संचार मंद पड़ जाता है।फेफड़ों की टीबी तो इसका सीधा प्रभाव देखा जा सकता है. यही नहीं तम्बाकू के सेवन से व्यक्ति नपुंसक भी हो सकता है। कहना गलत न होगा कि तम्बाकू का नियमित सेवन धीरे-धीरे व्यक्ति को मृत्यु के करीब ला देता है और वह असमय ही काल-कवलित हो जाता है.

अकेले भारत में हर साल लगभद आठ लाख मौतें तम्बाकू से होने वाली बीमारियों के कारण होती हैं।आज बच्चे-बूढ़े-जवान से लेकर पुरुष-नारी तक सभी वर्गों में तम्बाकू की लत देखी जा सकती है. कभी फैशन में तो,कभी नशे के चस्के में और कई बार थकान मिटाने या गम भुलाने की आड़ में भी इसे लिया जा रहा है. घर में बड़ों द्वारा लिए जा रहा तम्बाकू कब छोटों के पास पहुँच जाता है, पता ही नहीं चलता. दुर्भाग्यवश भारत में धर्म की आड में भी तम्बाकू का स्वाद लेने वालों की कमी नहीं है. गौरतलब है कि आयुर्वेद के चरक तथा सुश्रुत जैसे हजारों वर्ष पूर्व रचे गए ग्रन्थों में धूम्रपान का विधान है। वैसे, वहाँ पर उसका वर्णन औषधि के रूप में हुआ है, जैसे कहा गया है कि आम के सूखे पत्ते को चिलम जैसी किसी उपकरण में रखकर धुआं खींचने से गले के रोगों में आराम होता है। दमा तथा श्वास संबंधी रोगों में वासा (अडूसा) के सूखे पत्तों को चिलम में रखकर पीना एक प्रभावशाली उपाय माना गया है। आज भी ऐसे लोग मिल जायेंगे जो तम्बाकू को दवा बताते हैं. पवित्र तीर्थस्थलों पर धूनी पर बैठकर सुलफा, गांजा अथवा तम्बाकू के दम लगाने वालों तथाकथित बाबाओं की तो पूरी फ़ौज ही भरी पड़ी है. सरकारी दफ्तरों में तम्बाकू या धूम्रपान का सेवन करते पकड़े गए तमाम लोगों ने इसे अपने पक्ष में उपयोग किया है. पर ऐसे लोग उस पक्ष को भूल जाते हैं, जहाँ स्कन्दपुराण में कहा गया है कि-"स्वधर्म का आचरण करके जो पुण्य प्राप्त किया जाता है, वह धूम्रपान से नष्ट हो जाता है। इस कारण समस्त ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि को इसका सेवन कदापि नहीं करना चाहिए।''

इधर हाल के वर्षों में जिस तरह से इसने तेजी से महिलाओं को चंगुल में लेना आरंभ किया है, वह पूरी दुनिया के लिए चिंताजनक बन चुका है. अधिकतर महिलाओं का यह नशा उनकी अगली पीढ़ी में भी जा रहा है क्योंकि मातृत्व की स्थिति में इसका बुरा असर बच्चों पर पड़ना तय है. अब तो महिलाओं के लिए बाकायदा अलग से तम्बाकू उत्पाद भी बनने लगे हैं. स्कूल जाते लड़के-लड़कियां कम उम्र में ही इनका लुत्फ़ उठाने लगे हैं. उस पर से विज्ञापनों की चकाचौंध भी उन्हें इसका स्वाद लेने की तरफ अग्रसर करती है. फिल्मों-धारावाहिकों में जिस धड़ल्ले से नायक-नायिकाएं तम्बाकू वाले सिगरेट या सिगार को स्टाइल में पीते नजर आते हैं, वह नवयुवकों-नवयुवतियों पर गहरा असर डालता है. ऐसे में यह पता होते हुए भी कि यह स्वस्थ्य के अनुकूल नहीं है, यह स्टेट्स सिम्बल या फैशन का प्रतीक बन जाता है. प्रथम विश्व युद्ध के बाद घाटे की भरपाई और बदलते मूल्यों के चक्कर में पहली बार व्यावसायिक कंपनियों ने तम्बाकू उत्पादों की बिक्री के लिए महिलाओं का इस्तेमाल करना आरंभ किया. लारीवार्ड कंपनी ने पहल करते हुए पहली बार तम्बाकू उत्पादों के विज्ञापन हेतु सर्वप्रथम 1919 में महिलाओं के चित्रों का उपयोग किया। इसके अगले साल ही सिगरेट को नारी- स्वतंत्रता के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया गया। 1927 के दौर में तो बाकायदा मार्लबोरो ब्रांड में सिगरेट को फैशन व दुबलेपन से जोड़ कर पेश किया गया. इसी के साथ ही कई नामी-गिरामी कंपनियों ने तमाम अभिनेत्रियों को तम्बाकू उत्पादों के कैम्पेन से जोड़ना आरंभ किया। बाद के वर्षों में जैसे -जैसे नारी-स्वातंत्र्य के नारे बुलंद होते गए, स्लिम होने को फैशन-स्टेटमेंट माना जाने लगा, इन कंपनियों ने भी इसे भुनाना आरंभ कर दिया. फिलिप मौरिस कंपनी ने 60 के दशक में बाकायदा वर्जिनिया स्लिम्स नाम से मार्केटिंग अभियान आरंभ किया,जिसकी पंच लाइन थी -'यू हैव कम ए लांग वे बेबी.' इसके बाद तो लगभग हर कंपनी ही तम्बाकू उत्पादों के प्रचार के लिए नारी माडलों व फ़िल्मी नायिकाओं का इस्तेमाल कर रही है. ऐसे में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा पूरा पिछला वर्ष तम्बाकू निषेध दिवस पर महिलाओं पर फोकस किया जाना महत्वपूर्ण व प्रासंगिक भी है. गौरतलब है कि भारत की कुल जितनी आबादी है, लगभग उतने ही लोग दुनिया में धूम्रपान करने वाले भी हैं, अर्थात 1 अरब से ज्यादा. इस 1 अरब में धूम्रपान करने वाली करीब 20 फीसदी महिलाएं भी शामिल हैं. आज महिलाओं में धूम्रपान का यह शौक भारत में भी बखूबी देखने को मिलता है. यह अक्सर या तो हाई सोसाईटी में या समाज के निचले तबके में बखूबी देखने को मिलता है. आंकड़े गवाह हैं कि भारत में करीब 1.4 फीसदी महिलायें धूम्रपान और करीब 8.4 फीसदी महिलायें खाने योग्य तम्बाकू का सेवन करती है। ऐसे में तम्बाकू सेवन से उनमें तमाम रोग व विकार उत्पन्न होते हैं. इनमें श्वांस सम्बन्धी बीमारी, फेफड़े का कैंसर, दिल का दौरा, निमोनिया, माहवारी सम्बंधित समस्याएं एवं प्रजनन विकार जैसी बीमारियाँ शामिल हैं. यही नहीं तम्बाकू का नियमित सेवन करने वाली महिलाओं में अक्सर पूर्व-प्रसव भी देखा गया हाई तथा पैदा होने वाले बच्चे औसत वजन से लगभग 400-500 ग्राम कम के पैदा होते हैं. इसके साथ ही तम्बाकू सेवन करने वाली महिलाओं में गर्भपात की दर भी सामान्य महिलाओं की तुलना में 95 फीसदी ज्यादा होती है।वाकई आज जरुरत है कि इस ओर गंभीर पहल की जाय. इन्हीं सबके चलते विश्व स्वास्थ्य संगठन अब तम्बाकू-उत्पादों का भ्रामक बाजारीकरण, जिसमें परोक्ष-अपरोक्ष रूप में तम्बाकू कंपनियों द्वारा प्रायोजित किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम पर प्रतिबन्ध लगाना भी शामिल है, के बारे में भी सोच रहा है. जानकर आश्चर्य होगा कि तम्बाकू कंपनियाँ हर साल विज्ञापन पर करीब दस अरब रूपये खर्च करतीं हैं. पर बेहतर होगा कि सरकारों और संगठनों की बजाय इस सम्बन्ध में अपने घर और उससे पहले खुद से शुरुआत की जाय ताकि तम्बाकू की यह विषबेल समय से पहले ही सभ्यताओं को न लील ले. क्योंकि Active रूप में जहाँ यह खुद के लिए घातक है, वही Passive रूप में हमारे परिवेश, परिवार, समाज और अंतत: पूरी सभ्यता को लीलने के लिए तैयार बैठी है !!

बुधवार, 18 मई 2011

मई माह की याद में, जब 1857 की जंग का आगाज हुआ

मई माह का भारतीय सन्दर्भ में बहुत महत्त्व है. इसी माह की 10 तारीख को 1857 में भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम आरंभ हुआ था और फिर तो इससे लोग जुड़ते ही गए. 1857 वह वर्ष है, जब भारतीय वीरों ने अपने शौर्य की कलम को रक्त में डुबो कर काल की शिला पर अंकित किया था और ब्रिटिश साम्राज्य को कड़ी चुनौती देकर उसकी जड़ें हिला दी थीं। 1857 का वर्ष वैसे भी उथल-पुथल वाला रहा है। इसी वर्ष कैलिफोर्निया के तेजोन नामक स्थान पर 7.9 स्केल का भूकम्प आया था तो टोकियो में आये भूकम्प में लगभग एक लाख लोग और इटली के नेपल्स में आये 6.9 स्केल के भूकम्प में लगभग 11,000 लोग मारे गये थे। 1857 की क्रान्ति इसलिये और भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि ठीक सौ साल पहले सन् 1757 में प्लासी के युद्ध में विजय प्राप्त कर राबर्ट क्लाइव ने अंग्रेजी राज की भारत में नींव डाली थी। विभिन्न इतिहासकारों और विचारकों ने इसकी अपने-अपने दृष्टिकोण से व्याख्यायें की हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और महान चिन्तक पं0 जवाहरलाल नेहरू ने लिखा कि- ‘‘यह केवल एक विद्रोह नहीं था, यद्यपि इसका विस्फोट सैनिक विद्रोह के रूप में हुआ था, क्योंकि यह विद्रोह शीघ्र ही जन विद्रोह के रूप में परिणित हो गया था।’’ बेंजमिन डिजरायली ने ब्रिटिश संसद में इसे ‘‘राष्ट्रीय विद्रोह’’ बताया। प्रखर विचारक बी0डी0सावरकर व पट्टाभि सीतारमैया ने इसे ”भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम”, ज़ोन विलियम ने ”सिपाहियों का वेतन सुविधा वाला मामूली संघर्ष“ व ज़ोन ब्रूस नोर्टन ने ‘‘जन-विद्रोह’’ कहा। माक्र्सवादी विचारक डा0 राम विलास शर्मा ने इसे संसार की प्रथम साम्राज्य विरोधी व सामन्त विरोधी क्रान्ति बताते हुए 20वीं सदी की जनवादी क्रान्तियों की लम्बी श्रृंखला की प्रथम महत्वपूर्ण कड़ी बताया। प्रख्यात अन्तर्राष्ट्रीय राजनैतिक विचारक मैजिनी तो भारत के इस प्रथम स्वाधीनता संग्राम को अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखते थे और उनके अनुसार इसका असर तत्कालीन इटली, हंगरी व पोलैंड की सत्ताओं पर भी पड़ेगा और वहाँ की नीतियाँ भी बदलेंगी।



1857 की क्रान्ति को लेकर तमाम विश्लेषण किये गये हैं। इसके पीछे राजनैतिक-सामाजिक-धार्मिक-आर्थिक सभी तत्व कार्य कर रहे थे, पर इसका सबसे सशक्त पक्ष यह रहा कि राजा-प्रजा, हिन्दू-मुसलमान, जमींदार-किसान, पुरूष-महिला सभी एकजुट होकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े। 1857 की क्रान्ति को मात्र सैनिक विद्रोह मानने वाले इस तथ्य की अवहेलना करते हैं कि कई ऐसे भी स्थान थे, जहाँ सैनिक छावनियाँ न होने पर भी ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध क्रान्ति हुयी। इसी प्रकार वे यह भूल जाते है कि वास्तव में ये सिपाही सैनिक वर्दी में किसान थे और किसी भी व्यक्ति के अधिकारों के हनन का सीधा तात्पर्य था कि किसी-न-किसी सैनिक के अधिकारों का हनन, क्योंकि हर सैनिक या तो किसी का पिता, बेटा, भाई या अन्य रिश्तेदार है। यह एक तथ्य है कि अंगे्रजी हुकूमत द्वारा लागू नये भू-राजस्व कानून के खिलाफ अकेले सैनिकों की ओर से 15,000 अर्जियाँ दायर की गयी थीं। डाॅ0 लक्ष्मीमल्ल सिंघवी के शब्दों में- ‘‘सन् 1857 की क्रान्ति को चाहे सामन्ती सैलाब या सैनिक गदर कहकर खारिज करने का प्रयास किया गया हो, पर वास्तव में वह जनमत का राजनीतिक-सांस्कृतिक विद्रोह था। भारत का जनमानस उसमें जुड़ा था, लोक साहित्य और लोक चेतना उस क्रान्ति के आवेग से अछूती नहीं थी। स्वाभाविक है कि क्रान्ति सफल न हो तो इसे ‘विप्लव’ या ‘विद्रोह’ ही कहा जाता है।’’ यह क्रान्ति कोई यकायक घटित घटना नहीं थी, वरन् इसके मूल में विगत कई सालों की घटनायें थीं, जो कम्पनी के शासनकाल में घटित होती रहीं। एक ओर भारत की परम्परा, रीतिरिवाज और संस्कृति के विपरीत अंग्रेजी सत्ता एवं संस्कृति सुदृढ हो रही थी तो दूसरी ओर भारतीय राजाओं के साथ अन्यायपूर्ण कार्रवाई, अंग्रेजों की हड़पनीति, भारतीय जनमानस की भावनाओं का दमन एवं विभेदपूर्ण व उपेक्षापूर्ण व्यवहार से राजाओं, सैनिकों व जनमानस में विद्रोह के अंकुर फूट रहे थे।



इसमें कोई शक नहीं कि 1757 से 1856 के मध्य देश के विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न वर्गों द्वारा कई विद्रोह किये गये। यद्यपि अंग्रेजी सेना बार-बार इन विद्रोहों को कुचलती रही पर उसके बावजूद इन विद्रोहों का पुनः सर उठाकर खड़ा हो जाना भारतीय जनमानस की जीवटता का ही परिचायक कहा जायेगा। 1857 के विद्रोह को इसी पृष्ठभूमि में देखे जाने की जरूरत है। अंग्रेज इतिहासकार फॅारेस्ट ने एक जगह सचेत भी किया है कि- ‘‘1857 की क्रान्ति हमें इस बात की याद दिलाती है कि हमारा साम्राज्य एक ऐसे पतले छिलके के ऊपर कायम है, जिसके किसी भी समय सामाजिक परिवर्तनों और धार्मिक क्रान्तियों की प्रचण्ड ज्वालाओं द्वारा टुकडे़-टुकडे़ हो जाने की सम्भावना है।’’ अंग्रेजी हुकूमत को भी 1757 से 1856 तक चले घटनाक्रमों से यह आभास हो गया था कि वे अब अजेय नहीं रहे। तभी तो लार्ड केनिंग ने फरवरी 1856 में गर्वनर जनरल का कार्यभार ग्रहण करने से पूर्व कहा था कि - ‘‘मैं चाहता हूँ कि मेरा कार्यकाल शान्तिपूर्ण हो। मैं नहीं भूल सकता कि भारत के गगन में, जो अभी शान्त है, कभी भी छोटा सा बादल, चाहे वह एक हाथ जितना ही क्यों न हो, निरन्तर विस्तृत होकर फट सकता है, जो हम सबको तबाह कर सकता है।’’ लाॅर्ड केनिंग की इस स्वीकारोक्ति में ही 1857 की क्रान्ति के बीज छुपे हुये थे।



1857 की क्रान्ति की सफलता-असफलता के अपने-अपने तर्क हैं पर यह भारत की आजादी का पहला ऐसा संघर्ष था, जिसे अंग्रेज समर्थक सैनिक विद्रोह अथवा असफल विद्रोह साबित करने पर तुले थे, परन्तु सही मायनों में यह पराधीनता की बेड़ियों से मुक्ति पाने का राष्ट्रीय फलक पर हुआ प्रथम महत्वपूर्ण संघर्ष था। अमरीकी विद्वान प्रो0 जी0 एफ0 हचिन्स के शब्दों में-‘‘1857 की क्रान्ति को अंग्रेजों ने केवल सैनिक विद्रोह ही कहा क्योंकि वे इस घटना के राजद्रोह पक्ष पर ही बल देना चाहते थे और कहना चाहते थे कि यह विद्रोह अंग्रेजी सेना के केवल भारतीय सैनिकों तक ही सीमित था। परन्तु आधुनिक शोध पत्रों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह आरम्भ से सैनिक विद्रोह के ही रूप में हुआ, परन्तु शीघ्र ही इसमें लोकप्रिय विद्रोह का रूप धारण कर लिया।’’ वस्तुतः इस क्रान्ति को भारत में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध पहली प्रत्यक्ष चुनौती के रूप में देखा जा सकता है। यह आन्दोलन भले ही भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति न दिला पाया हो, लेकिन लोगों में आजादी का जज्बा जरूर पैदा कर गया। 1857 की इस क्रान्ति को कुछ इतिहासकारों ने महास्वप्न की शोकान्तिका कहा है, पर इस गर्वीले उपक्रम के फलस्वरूप ही भारत का नायाब मोती ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों से निकल गया और जल्द ही कम्पनी भंग हो गयी। 1857 के संग्राम की विशेषता यह भी है कि इससे उठे शंखनाद के बाद जंगे-आजादी 90 साल तक अनवरत चलती रही और अंतत: 15 अगस्त, 1947 को हम आजाद हुए !!

रविवार, 1 मई 2011

मजदूर करे तो क्या करे..




दुनिया भर के मजदूरों एक हो



जुल्म और शोषण का मिलकर जवाब दो



न जाने कैसे-कैसे नारे और वायदे




पर मजदूर एक हों तो कैसे



जिसे उन्होंने अपना नेता चुना



बैठ गया है वह सत्ता की पांत में



अब तो उनकी भाषा भी नहीं समझता




फिर मजदूर करे तो करे क्या



अब तो उनमें भी वर्ग भेद हो गया है



उनके अगुआ बन बैठे हैं दलाल






फिर बुर्जुआ वर्ग का क्या दोष



वह तो चाहता है उनका हक देना



पर आड़े आते हैं नेता और दलाल



आखिर फिर इन्हें कौन पूछेगा




शायद अब मार्क्स को भी गढ़नी पडे़



शोषितों व बुर्जुआ की एक नयी परिभाषा !!

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

माँ



मेरा प्यारा सा बच्चा
गोद में भर लेती है बच्चे को
चेहरे पर नजर न लगे
माथे पर काजल का टीका लगाती है
कोई बुरी आत्मा न छू सके
बाँहों में ताबीज बाँध देती है।

बच्चा स्कूल जाने लगा है
सुबह से ही माँ जुट जाती है
चैके-बर्तन में
कहीं बेटा भूखा न चला जाये।
लड़कर आता है पड़ोसियों के बच्चों से
माँ के आँचल में छुप जाता है
अब उसे कुछ नहीं हो सकता।

बच्चा बड़ा होता जाता है
माँ मन्नतें माँगती है
देवी-देवताओं से
बेटे के सुनहरे भविष्य की खातिर
बेटा कामयाबी पाता है
माँ भर लेती है उसे बाँहों में
अब बेटा नजरों से दूर हो जायेगा।

फिर एक दिन आता है
शहनाईयाँ गूँज उठती हैं
माँ के कदम आज जमीं पर नहीं
कभी इधर दौड़ती है, कभी उधर
बहू के कदमों का इंतजार है उसे
आशीर्वाद देती है दोनों को
एक नई जिन्दगी की शुरूआत के लिए।

माँ सिखाती है बहू को
परिवार की परम्परायें व संस्कार
बेटे का हाथ बहू के हाथों में रख
बोलती है
बहुत नाजों से पाला है इसे
अब तुम्हें ही देखना है।

माँ की खुशी भरी आँखों से
आँसू की एक गरम बूँद
गिरती है बहू की हथेली पर।

रविवार, 10 अप्रैल 2011

चीयर्स लीडर और मँहगाई

विश्व कप के बाद आई.पी.एल. का जुनून आरंभ हो गया है. एक तरफ मंहगाई और भ्रष्टाचार, दूसरी तरह चीयर्स लीडर के जलवे. हर चौके-छक्के के साथ बढ़ता दबाव और चीयर्स की आवाज़-

चीयर्स लीडर चर्चा में हैं

मँहगाई की तरह

दोनों ही बनते हैं

संसद में चर्चा का विषय

एक का रिश्ता

क्रिकेट के खेल से है

तो दूसरे का

जिन्दगी के खेल से

एक तमाशा भर है

दूसरी जीवन की सच्चाई

एक उछलती है

खुशियों की सौगात लेकर

दूसरी उछलती है

दुखों की बरसात लेकर

एक बड़ों का शगल है

दूसरे से होती मानवता विकल है।

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

नवसंवत्सर व नवरात्रि की शुभकामनाएँ

!!नवसंवत्सर आगमन तथा नवरात्रि के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ !!

रविवार, 3 अप्रैल 2011

क्रिकेट की दुनिया के हम सिकंदर

!! साबित कर ही दिया...क्रिकेट की दुनिया के हम सिकंदर !! ********बहुत-बहुत बधाई*******

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

बिटिया अक्षिता (पाखी) के जन्मदिन पर कानपुर से एक कविता

वक़्त बहुत तेजी से चलता है. पता ही नहीं चला कि देखते ही देखते हमारी बड़ी बिटिया रानी आज पाँच साल की हो गईं.दूसरी बिटिया तन्वी दो दिन बाद पाँच माह की हो जायेंगीं. पाखी का जन्म कानपुर में हुआ, सो कानपुर के लोगों से अभी भी लगाव बना हुआ है. पाखी के लिए कानपुर से डा0 दुर्गाचरण मिश्र जी ने एक प्यारी सी कविता भेजी है. इसे उन्होंने हमारे कानपुर में रहने के दौरान लिखा था, पर अब इसे परिमार्जित करते हुए नए सिरे से भेजा है. आप भी इसका आनंद लें और पाखी को ढेर सारा आशीर्वाद और प्यार दें-

प्यारी-न्यारी पाखी

अक्षिता (पाखी) मेरा नाम है
सब करते मुझको प्यार
मम्मी-पापा की लाडली
मिलता जी भर खूब दुलार।

कानपुर नगर में जन्म लिया
25 मार्च 2007, दिन शनिवार
मम्मी-पापा हुए प्रफुल्लित
पूरा हुआ सपनों का संसार।

दादा-दादी, नाना-नानी
सब देखने को हुए बेकरार
मौसी, बुआ, मामा-मामी,
चाचू लाए खूब उपहार।

नन्हीं सी नटखट गुडि़या
सब रिझायें बार-बार
कितनी प्यारी किलकारी
घर में आये खूब बहार ।

मम्मी-पापा संग आ गई
अब, अण्डमान-निकोबार
यहाँ की दुनिया बड़ी निराली
प्रकृति की छाई है बहार ।

कार्मेल स्कूल में हुआ एडमिशन
प्लेयिंग, डांसिंग, ड्राइंग से प्यार
एल.के.जी. में पढ़ने जाती
मिला नए दोस्तों का संसार ।

समुद्र तट पर खूब घूमती
देखती तट और पहाड़
खूब जमकर मस्ती करती
और जी भरकर धमाल ।

मिल गई इक प्यारी बहना
खुशियों का बढ़ा संसार
तन्वी उसका नाम है
करती उसको मैं खूब प्यार ।

डा0 दुर्गाचरण मिश्र
अर्थ मंत्री- उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मलेन, अध्यक्ष- साहित्य मन्दाकिनी (साहित्यिक संस्था)
248 सी-1 इंदिरानगर, कानपुर-208026
पाखी आज पांचवें साल में प्रवेश कर गईं, अत: यह पाँच कैंडल वाला प्यारा सा केक भी...

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

होली में रामलीला ..है न अजूबा !!

भारत में त्यौहारों का संबंध विभिन्न प्रसंगों से जोड़ा जाता है। हर त्यौहार के पीछे मिथक व मान्यताएं होती हैं, पर कई बार ये त्यौहार आपस में इतने जुड़ जाते हैं कि वे उत्सवी परंपरा के ही अभिन्न अंग लगने लगते हैं। मसलन, फागुन में जब रंगों की फुहारें भगवान श्री कृष्ण के बरसाने के होली उत्सव की याद दिलाती हैं तो रामलीला का आयोजन कुछ अजीब लगता है, लेकिन बरेली शहर में होली के रंगो में भगवान राम के आदर्श भी गूंजते हैं। 150 से भी अधिक साल से यहाँ फागुन में वमनपुरी की रामलीला होती आ रही है। संभवतः देश में यह अकेला ऐसी रामलीला है जो होली के उपलक्ष्य में होती है।

इस रामलीला की अपनी दीर्घ ऐतिहासिक परंपरा है। वमनपुरी की यह रामलीला 1861 में शुरु हुई थी। तब इस क्षेत्र के उत्साही बच्चे टीन-गत्ते आदि के मुकुट और बालों की दाढ़ी-मूँछ लगाकर रामलीला का मंचन करते थे। पात्रों का श्रृंगार राजसी शैली में प्राकृतिक रंगो और सितारों से होता था। ये रामलीलाएं वमनपुरी और उसके आसपास के मोहल्लों की गलियों-चैराहों पर होती थीं। उन्हीं परंपराओं के तहत आज भी रामलीला के कई प्रसंगों का मंचन वमनपुरी व आसपास के मोहल्लों की गलियों में होता है। ‘शबरी लीला’ चटोरी गली में होती है। वमनपुरी में रामलीला का मुख्य मंचन श्री नृसिंह मंदिर में होता है। इस रामलीला को नया स्वरूप मिला 1888-89 में, जब उस समय के प्रतिष्ठित एवं गणमान्य हकीम कन्हैया लाल, गोपेश्वर बाबू, जगन रस्तोगी, पंडित जंगबहादुर, बेनी माधव, लाला बिहारी लाल, पंडित राधेश्याम कथावाचक एवं मिर्जा जी रामलीला का मंचन कराने लगे। पंडित रघुवर दयाल और पंडित रज्जन गुरु भी चैपाइयों का वाचन करते थे। सन् 1935-38 के बीच शहरवासियों ने रामलीला के लिए खुले हाथ से सहयोग देना प्रारंभ कर दिया। 1949 में साहूकारा के शिवचरन लाल ने राम एवं केवट संवाद को सजीव बनाने के लिए लकड़ी की नाव बनवाकर रामलीला सभा को भेंट की थी। तब से ही भगवान राम- केवट संवाद का मंचन इसी नाव के जरिए साहूकारा स्थित भैरो मंदिर में होता है।

यहांँ चैत्र कृष्ण एकादशी पर रामलीला का मंचन शुरु हो जाता है और धुलंडी के दिन तक रोज विभिन्न प्रसंगों का मंचन होता है। रामलीला का समापन नृसिंह भगवान की शोभा यात्रा के साथ होता है। होली के दिन रामलीला से निकलने वाली राम बारात शहर में अनूठे रंग बिखेरती है। इसमें सौहार्द के फूल बरसते हैं। हिन्दू हो या मुस्लिम सभी पुष्पवर्षा कर राम बारात का स्वागत करते हैं। फागुनी फिजाओं में रामलीला का यह उत्सव वाकई अद्भुत है।

गुरुवार, 17 मार्च 2011

बरसाने की लट्ठमार होली के रंग

होली के रंग अभी से फगुनाहट में रंग बिखेरने लगे हैं. होली की रंगत बरसाने की लट्ठमार होली के बिना अधूरी ही कही जायेगी। कृष्ण-लीला भूमि होने के कारण फाल्गुन शुल्क नवमी को ब्रज में बरसाने की लट्ठमार होली का अपना अलग ही महत्व है। ब्रज में तो वसंत पंचमी के दिन ही मंदिरों में डांढ़ा गाड़े जाने के साथ ही होली का शुभारंभ हो जाता है। बरसाना में हर साल फाल्गुन शुक्ल नवमी के दिन होने वाली लट्ठमार होली देखने व राधारानी के दर्शनों की एक झलक पाने के लिए यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु व पर्यटक देश-विदेश से खिंचे चले आते हैं। इस दिन नन्दगाँव के कृष्णसखा ‘हुरिहारे’ बरसाने में होली खेलने आते हैं, जहाँ राधा की सखियाँ लाठियों से उनका स्वागत करती हैं। यहाँ होली खेलने वाले नंदगाँव के हुरियारों के हाथों में लाठियों की मार से बचने के लिए मजबूत ढाल होती है।

परंपरागत वेशभूषा में सजे-धजे हुरियारों की कमर में अबीर-गुलाल की पोटलियाँ बंधी होती हैं तो दूसरी ओर बरसाना की हुरियारिनों के पास मोटे-मोटे तेल पिलाए लट्ठ होते हैं। बरसाना की रंगीली गली में पहुँचते ही हुरियारों पर चारों ओर से टेसू के फूलों से बने रंगों की बौछार होने लगती है। परंपरागत शास्त्रीय गान ‘ढप बाजै रे लाल मतवारे को‘ का गायन होने लगता है। हुरियारे ‘फाग खेलन बरसाने आए हैं नटवर नंद किशोर‘, का गायन करते हैं तो हुरियारिनें ‘होली खेलने आयै श्याम आज जाकूं रंग में बोरै री‘, का गायन करती हैं। भीड़ के एक छोर से गोस्वामी समाज के लोग परंपरागत वाद्यों के साथ महौल को शास्त्रीय रुप देते हैं। ढप, ढोल, मृदंग की ताल पर नाचते-गाते दोनों दलों में हंसी-ठिठोली होती है। हुरियारिनें अपनी पूरी ताकत से हुरियारों पर लाठियों के वार करती हैं तो हुरियार अपनी ढालों पर लाठियों की चोट सहते हैं। हुरियारे मजबूत ढालों से अपने शरीर की रक्षा करते हैं एवं चोट लगने पर वहाँ ब्रजरज लगा लेते हैं।

बरसाना की होली के दूसरे दिन फाल्गुन शुक्ल दशमी को सायंकाल ऐसी ही लट्ठमार होली नन्दगाँव में भी खेली जाती है। अन्तर मात्र इतना है कि इसमें नन्दगाँव की नारियाँ बरसाने के पुरूषों का लाठियों से सत्कार करती हैं। इसमें बरसाना के हुरियार नंदगाँव की हुरियारिनों से होली खेलने नंदगाँव पहुँचते हैं। फाल्गुन की नवमी व दशमी के दिन बरसाना व नंदगाँव के लट्ठमार आयोजनों के पश्चात होली का आकर्षण वृन्दावन के मंदिरों की ओर हो जाता है, जहाँ रंगभरी एकादशी के दिन पूरे वृंदावन में हाथी पर बिठा राधावल्लभ लाल मंदिर से भगवान के स्वरुपों की सवारी निकाली जाती है। बाद में भी ठाकुर के स्वरूप पर गुलाल और केशर के छींटे डाले जाते हैं। ब्रज की होली की एक और विशेषता यह है कि धुलेंडी मना लेने के साथ ही जहाँ देश भर में होली का खूमार टूट जाता है, वहीं ब्रज में इसके चरम पर पहुँचने की शुरुआत होती है।

रविवार, 13 मार्च 2011

भगोरिया की मस्ती और आदिवासी समाज

भारतीय संस्कृति प्रेम की उपासक रही है। कभी यह राधा-कृष्ण के आध्यात्मिक प्रेम के रुप में उद्दीपत होता है तो कभी लौकिक प्रेम के रुप में। सभ्य समाज में भले ही खाप पंचायतें प्रेम के आड़े आ रही हों पर आदिवासी समाज तो अभी भी बकायदा प्रेम का उत्सव मनाता है। इसके लिए उन्हें किसी वेलेंटाइन-डे की जरुरत नहीं पड़ती। पश्चिमी मध्य प्रदेश के आदिवासी युवाओं के पारंपरिक प्रणय पर्व, ‘भगोरिया‘ की मस्ती तो देखते ही बनती है। इस साल प्रमुख भगोरिया हाटों की शुरुआत 13 मार्च से हो रही है और यह सिलसिला हफ्ते भर तक चलेगा।

प्रेम का यह परंपरागत पर्व म०प्र० के झाबुआ, धार, खरगोन और बड़वानी जैसे आदिवासी बहुल जिलों में मनाया जाता है। सदियों से मनाए जा रहे भगोरिया उत्सव के जरिए आदिवासी युवा अनूठे ढंग से अपना जीवन साथी चुनते आ रहे हैं। हर साल टेसू (पलाश) के पेड़ों पर खिलने वाले सिंदूरी फूल पश्चिमी मध्यप्रदेश के आदिवासियों को फागुन आने की खबर दे देते हैं और वे ‘भगोरिया‘ मनाने के लिए तैयार हो जाते हैं। आदिवासी टोलियाँ ढोल और मांदल (एक तरह का बाजा) की थाप और बांसुरी की स्वर लहरियों पर भगोरिया हाट में सुध-बुध बिसराकर झूमती हैं। भगोरिया हाट को आदिवासी युवक-युवतियों का ‘मिलन समारोह‘ भी कहा जा सकता है। परंपरा के मुताबिक भगोरिया हाट में आदिवासी युवक, युवती को पान का बीड़ा पेश करके अपने प्रेम का मौन इजहार करता है। युवती का बीड़ा लेने का मतलब है कि वह भी युवक को पसंद करती है। उसके बाद वह युवक भगोरिया हाट से ‘भाग‘ जाता है और तब तक घर नहीं लौटता, जब तक दोनों के परिवार उनकी शादी के लिए रजामंद नहीं हो जाते।

प्रेम की इस सदियों पुरानी जनजातीय परंपरा पर भी आधुनिकता का रंग अब गहरा रहा है। जनजातीय संस्कृति के जानकार बताते हैं कि भगोरिया हाट अब मेलों में तब्दील हो गए है। जनजाति के परंपरागत सुरों में डीजे साउंड भी खूब घुल-मिल गया है। इनमें परंपरागत तरीके से जीवन साथी चुनने के दृश्य उतनी प्रमुखता से नहीं दिखते। पर तमाम बदलावों के बावजूद भगोरिया का उल्लास लोगों में जस का तस बना हुआ है। यही कारण है कि भगोरिया की विश्व प्रसिद्ध मस्ती को आंखों में कैद करने के लिए पश्चिमी मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल जिलों में बड़ी संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक भी उमड़ते और आदि-प्रेम का बखूबी लुत्फ़ उठाते हैं।

बुधवार, 9 मार्च 2011

काला पानी के 105 साल

सेलुलर जेल की 105 वीं वर्षगाँठ पर : क्रान्तिकारियों के बलिदान का साक्षी- सेल्युलर जेल

यह तीर्थ महातीर्थों का है.
मत कहो इसे काला-पानी.
तुम सुनो, यहाँ की धरती के
कण-कण से गाथा बलिदानी (गणेश दामोदर सावरकर)

भारत का सबसे बड़ा केंद्रशासित प्रदेश अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह सुंदरता का प्रतिमान है और सुंदर दृश्यावली के साथ सभी को आकर्षित करता है। बंगाल की खाड़ी के मध्य प्रकृति के खूबसूरत आगोश में विस्तृत 572 द्वीपों में भले ही मात्र 38 द्वीपों पर जन-जीवन है, पर इसका यही अनछुआपन ही आज इसे प्रकृति के स्वर्ग रूप में परिभाषित करता है। यहीं अंडमान में ही ऐतिहासिक सेलुलर जेल है। सेलुलर जेल का निर्माण कार्य 1896 में आरम्भ हुआ तथा 10 साल बाद 10 मार्च 1906 को पूरा हुआ। सेलुलर जेल के नाम से प्रसिद्ध इस कारागार में 698 बैरक (सेल) तथा 7 खण्ड थे, जो सात दिशाओं में फैल कर पंखुडीदार फूल की आकृति का एहसास कराते थे। इसके मध्य में बुर्जयुक्त मीनार थी, और हर खण्ड में तीन मंजिलें थीं।

1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम ने अंग्रेजी सरकार को चैकन्ना कर दिया। व्यापार के बहाने भारत आये अंग्रेजों को भारतीय जनमानस द्वारा यह पहली कड़ी चुनौती थी जिसमें समाज के लगभग सभी वर्ग शामिल थे। जिस अंग्रेजी साम्राज्य के बारे में ब्रिटेन के मजदूर नेता अर्नेस्ट जोंस का दावा था कि-‘‘अंग्रेजी राज्य में सूरज कभी डूबता नहीं और खून कभी सूखता नहीं‘‘, उस दावे पर ग्रहण लगता नजर आया। अंग्रेजों को आभास हो चुका था कि उन्होंने युद्ध अपनी बहादुरी व रणकौशलता की वजह से नहीं बल्कि षडयंत्रों, जासूसों, गद्दारी और कुछेक भारतीय राजाओं के सहयोग से जीता था। अपनी इन कमजोरियों को छुपाने के लिए जहाँ अंग्रेजी इतिहासकारों ने 1857 के स्वाधीनता संग्राम को सैनिक गदर मात्र कहकर इसके प्रभाव को कम करने की कोशिश की, वहीं इस संग्राम को कुचलने के लिए भारतीयों को असहनीय व अस्मरणीय यातनायें दी गई। एक तरफ लोगों को फांसी दी गयी, पेड़ों पर समूहों में लटका कर मृत्यु दण्ड दिया गया व तोपों से बांधकर दागा गया वहीं जिन जीवित लोगों से अंग्रेजी सरकार को ज्यादा खतरा महसूस हुआ, उन्हें ऐसी जगह भेजा गया, जहाँ से जीवित वापस आने की बात तो दूर किसी अपने-पराये की खबर तक मिलने की कोई उम्मीद भी नहीं रख सकते थे और और यही काला पानी था। एक तरफ हमारे धर्म समुद्र पार यात्रा की मनाही करते थे, वहीँ यहाँ मुख्यभूमि से हजार से भी ज्यादा किलोमीटर दूर लाकर देशभक्तों को प्रताड़ित किया जाता था। अंग्रेजी सरकार को लगा था कि सुदूर निर्वासन व यातनाओं के बाद स्वाधीनता सेनानी स्वतः निष्क्रिय व खत्म हो जायेंगे पर यह निर्वासन व यातना भी सेनानियों की गतिविधियों को नहीं रोक पाया। वे तो पहले से ही जान हथेली पर लेकर निकले थे, फिर भय किस बात का। अंग्रेजी हुकूमत ने काला पानी द्वारा इस आग को बुझाने की जबरदस्त कोशिश की पर वह तो चिंगारी से ज्वाला बनकर भड़क उठी। सेलुलर जेल, अण्डमान में कैद क्रांतिकारियों पर अंग्रेजों ने जमकर जुल्म ढाये पर जुल्म से निकली हर चीख ने भारत माँ की आजादी के इरादों को और बुलंद किया।

क्रान्तिकारियों का मनोबल तोड़ने और उनके उत्पीड़न हेतु सेल्यूलर जेल में तमाम रास्ते अख्तियार किये गये। स्वाधीनता सेनानियों और क्रातिकारियों को राजनैतिक बंदी मानने की बजाय उन्हें एक सामान्य कैदी माना गया। यही कारण था कि क्रांतिकारियों को यहीं सेलुलर जेल की काल-कोठरियों में कैद रखा गया और यातनाएं दी गईं। यातना भरा काम और पूरा न करने पर कठोर दंड दिया जाता था। पशुतुल्य भोजन व्यवस्था, जंग या काई लगे टूटे-फूटे लोहे के बर्तनों में गन्दा भोजन, जिसमें कीड़े-मकोड़े होते, पीने के लिए बस दिन भर दो डिब्बा गन्दा पानी, पेशाब-शौच तक पर बंदिशें कि एक बर्तन से ज्यादा नहीं हो सकती। ऐसे में किन परिस्थितियों में इन देश-भक्त क्रांतिकारियों ने यातनाएं सहकर आजादी की अलख जगाई, वह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सेलुलर जेल में बंदियों को प्रतिदिन कोल्हू (घानी) में बैल की भाँति घूम-घूम कर 20 पौंड नारियल का तेल निकालना पड़ता था। इसके अलावा प्रतिदिन 30 पौंड नारियल की जटा कूटने का भी कार्य करना होता। काम पूरा न होने पर बेंतों की मार पड़ती और टाट का घुटन्ना और बनियान पहनने को दिए जाते, जिससे पूरा बदन रगड़ खाकर और भी चोटिल हो जाता। अंग्रेजों की जबरदस्ती नाराजगी पर नंगे बदन पर कोड़े बरसाए जाते। जब भी किसी को फांसी दी जाती तो क्रांतिकारी बंदियों में दहशत पैदा करने के लिए तीसरी मंजिल पर बने गुम्बद से घंटा बजाया जाता, जिसकी आवाज 8 मील की परिधि तक सुनाई देती थी। भय पैदा करने के लिए क्रांतिकारी बंदियों को फांसी के लिए ले जाते हुए व्यक्ति को और फांसी पर लटकते देखने के लिए विवश किया जाता था। वीर सावरकर को तो जान-बूझकर फांसी-घर के सामने वाले कमरे में ही रखा गया था। गौरतलब है कि सावरकर जी के एक भाई भी काला-पानी की यहाँ सजा काट रहे थे, पर तीन सालों तक उन्हें एक-दूसरे के बारे में पता तक नहीं चला। इससे समझा जा सकता है कि अंग्रेजों ने यहाँ क्रांतिकारियों को कितना एकाकी बनाकर रखा था। फांसी के बाद मृत शरीर को समुद्र में फेंक दिया जाता था। अंग्रेजों के दमन का यह एक काला अध्याय था, जिसके बारे में सोचकर अभी भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

सेल्यूलर जेल आजादी का एक ऐसा पवित्र तीर्थस्थल बन चुका है, जिसके बिना आजादी की हर इबारत अधूरी है। इसके प्रांगन में रोज शाम को लाइट-साउंड प्रोग्राम उन दिनों की यादों को ताजा करता है, जब हमारे वीरों ने काला पानी की सजा काटते हुए भी देश-भक्ति का जज्बा नहीं छोड़ा। गन्दगी और सीलन के बीच समुद्री हवाएं और उस पर से अंग्रेजों के दनादन बरसते कोड़े मानव-शरीर को काट डालती थीं। पर इन सबके बीच से ही हमारी आजादी का जज्बा निकला। पर इस इतिहास को वर्तमान से जोड़ने की जरूरत है। सेलुलर जेल अपने अंदर जुल्मों की निशानी के साथ-साथ वीरता, अदम्य साहस, प्रतिरोध, बलिदान व त्याग की जिस गाथा को समेटे हुए है, उसे आज की युवा पीढ़ी के अंदर भी संचारित करने की आवश्यकता है। सेलुलर जेल की खिड़कियों से अभी भी जुल्म की दास्तां झलकती है। ऐसा लगता है मानो अभी फफक कर इसकी दीवालें रो पड़ेंगी।

वाकई आज देश के हरेक व्यक्ति विशेषकर बच्चों को सेल्युलर जेल के दर्शन करने चाहिए ताकि आजादी की कीमत का अहसास उन्हें भी हो सके। देशभक्ति के जज्बे से भरे देशभक्तों ने सेल्युलर जेल की दीवारों पर अपने शब्द चित्र भी अंकित किये हैं। दूर-दूर से लोग इस पावन स्थल पर आजादी के दीवानों का स्मरण कर अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं व इतिहास के गर्त में झांककर उन पलों को महसूस करते हैं जिनकी बदौलत आज हम आजादी के माहौल में सांस ले रहे हैं। बदलते वक्त के साथ सेल्युलर जेल इतिहास की चीज भले ही बन गया हो पर क्रान्तिकारियों के संघर्ष, बलिदान एवं यातनाओं का साक्षी यह स्थल हमेशा याद दिलाता रहेगा कि स्वतंत्रता यूँ ही नहीं मिली है, बल्कि इसके पीछे क्रान्तिकारियों के संघर्ष, त्याग व बलिदान की गाथा है।

आज सेलुलर जेल की गाथा को लोगों तक पहुँचाने के लिए तमाम श्रव्य-दृश्य साधनों का उपयोग किया जा रहा है, पर इसे लोगों की भावनाओं व जज्बातों से भी जोड़ने की जरूरत है। 10 मार्च 2011 को सेलुलर जेल अपनी स्थापना के 105 वर्ष पूरे कर रहा है और इसी के साथ इसके वैचारिक विस्तार की भी आवश्यकता है ताकि देश के अन्य भागों में भी उस भावना को प्रवाहित किया जा सके, जिस हेतु हमारे सेनानियों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। आजादी का यह तीर्थ किसी मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे-चर्च से कम नहीं। यह हमारी वो विरासत है जो सदियों तक आजादी की उस कीमत का अहसास कराती रहेगी, जिसके लिए बलिदानियों ने अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया।

कल सेलुलर जेल की 105 वीं वर्षगाँठ पर उन सभी नाम-अनाम शहीदों और कैद में रहकर आजादी का बिगुल बजाने वालों को नमन !!

कृष्ण कुमार यादव

मंगलवार, 8 मार्च 2011

नहीं हूँ मैं एक शरीर मात्र : अन्तर्राष्ट्रीय नारी दिवस पर


नहीं हूँ मैं माँस-मज्जा का एक पिंड
जिसे जब तुम चाहो जला दोगे
नहीं हूँ मैं एक शरीर मात्र
जिसे जब तुम चाहो भोग लोगे
नहीं हूँ मैं शादी के नाम पर अर्पित कन्या
जिसे जब तुम चाहो छोड़ दोगे
नहीं हूँ मैं कपड़ों में लिपटी एक चीज
जिसे जब तुम चाहो तमाशा बना दोगे।

मैं एक भाव हूँ, विचार हूँ
मेरा एक स्वतंत्र अस्तित्व है
ठीक वैसे ही, जैसे तुम्हारा
अगर तुम्हारे बिना दुनिया नहीं है
तो मेरे बिना भी यह दुनिया नहीं है।

फिर बताओं
तुम क्यों अबला मानते हो मुझे
क्यों पग-पग पर तिरस्कृत करते हो मुझे
क्या देह का बल ही सब कुछ है
आत्मबल कुछ नहीं
खामोश क्यों हो
जवाब क्यों नहीं देते........?

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

एक पोस्ट जागरूकता के लिए...

कई बार हमारे सामने ऐसी परिस्थियाँ खड़ी हो जाती हैं कि हमारा विवेक काम नहीं करता. हम लोगों की मदद तो करना चाहते हैं, पर आपने को असहाय समझते हैं. ऐसी ही एक मेल को आप लोगों के साथ शेयर कर रहा हूँ, शायद कुछ लोगों को मदद मिल सके-



1. If you see children Begging anywhere in INDIA , please contact:
"RED SOCIETY" at 9940217816. They will help the children for their studies.

2.Where you can search for any BLOOD GROUP, you will get thousand's of donor address.
www.friendstosupport.org

3. Engineering Students can register in
www.campuscouncil.com to attend Off Campus for 40 Companies.

4. Free Education and Free hostel for Handicapped/Physically Challenged children. Contact:- 9842062501 & 9894067506.

5. If anyone met with fire accident or people born with problems in their ear, nose and mouth can get free PLASTIC SURGERY done by Kodaikanal PASAM Hospital . From 23rd March to 4th April by German Doctors.
Everything is free. Contact : 045420-240668,245732
"Helping Hands are Better than Praying Lips"

6. If you find any important documents like Driving license, Ration card, Passport, Bank Pass Book, etc., missed by someone, simply put them into any near by Post Boxes. They will automatically reach the owner and Fine will be collected from them.

7. By the next 10 months, our earth will become 4 degrees hotter than what it is now. Our Himalayan glaciers are melting at rapid rate. So let all of us lend our hands to fight GLOBAL WARMING.
-Plant more Trees.
-Don't waste Water & Electricity.
-Don't use or burn Plastics

8. It costs 38 Trillion dollars to create OXYGEN for 6 months for all Human beings on earth.
"TREES DO IT FOR FREE"
"Respect them and Save them"


9. Special phone number for Eye bank and Eye donation: 04428281919 and 04428271616 (Sankara Nethralaya Eye Bank). For More information about how to donate eyes plz visit these sites. http://ruraleye.org/


10. Heart Surgery free of cost for children (0-10 yr) Sri Valli Baba Institute Banglore. 10.
Contact : 9916737471


11. Medicine for Blood Cancer!!!!
'Imitinef Mercilet' is a medicine which cures blood cancer. Its available free of cost at "Adyar Cancer Institute in Chennai". Create Awareness. It might help someone.
Cancer Institute in Adyar, Chennai
Category: Cancer
Address:
East Canal Bank Road , Gandhi Nagar
Adyar
Chennai -600020
Landmark: Near Michael School
Phone: 044-24910754 044-24910754 , 044-24911526 044-24911526 , 044-22350241 044-22350241

12. Please CHECK WASTAGE OF FOOD
If you have a function/party at your home in India and food gets wasted, don't hesitate to call 1098 (only in India ) - Its not a Joke, This is the number of Child helpline. They will come and collect the Food.



LETS TRY TO HELP INDIA BE A BETTER PLACE TO LIVE IN
Please Save Our Mother Nature for
"OUR FUTURE GENERATIONS"
Let it reach the 110 Crores Indians and the remaining if any।


"Spend at least as much time researching a stock as you would choosing a refrigerator" - Peter Lynch

बुधवार, 2 मार्च 2011

प्यार का सफर


डायरी के पुराने पन्नों को पलटिये तो बहुत कुछ सामने आकर घूमने लगता है. ऐसे ही इलाहाबाद विश्विद्यालय में अध्ययन के दौरान प्यार को लेकर एक कविता लिखी थी. आज आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूँ-

दो अजनबी निगाहों का मिलना
मन ही मन में गुलों का खिलना
हाँ, यही प्यार है............ !!

आँखों ने आपस में ही कुछ इजहार किया
हरेक मोड़ पर एक दूसरे का इंतजार किया
हाँ, यही प्यार है............ !!

आँखों की बातें दिलों में उतरती गई
रातों की करवटें और लम्बी होती गई
हाँ, यही प्यार है............ !!

सूनी आँखों में किसी का चेहरा चमकने लगा
हर पल उनसे मिलने को दिल मचलने लगा
हाँ, यही प्यार है............ !!

चाँद व तारे रात के साथी बन गये
न जाने कब वो मेरी जिन्दगी के बाती बन गये
हाँ, यही प्यार है............ !!

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

विश्वास..



ताले
यानी धातु की बनी एक वस्तु
कितने निश्चिन्त हो जाते हैं
इन्हें घरों में लगाकर
दरवाजों की कुंडियों में
मजबूती से लटकता हुआ
चोर भी एक बार देख
शरमा जाता है इसे
लेकिन
जब कभी वार
करता है इस पर
अंत तक लड़ता है
यह पहरेदार की तरह
मानो, धातु नहीं जीवंत हो
शायद वह जानता है
मालिक का कितना
विश्वास है उस पर।