
विज्ञापनों ने ढँक दिया है
सभी बुराईयों को
हर रोज चढ़ जाती हैं उन पर
कुछ नामी-गिरामी चेहरों की परतें
फिर क्या फर्क पड़ता है
उसमें कीडे़ हों या कीटनाशक
या चिल्लाये कोई सुनीता नारायण
पर इन नन्हें बच्चों को कौन समझाये
विज्ञापनों के पीछे छुपे पैसे का सच
बच्चे तो सिर्फ टी0वी0 और बड़े परदे
पर देखे उस अंकल को ही पहचानते हैं
जिद करते हैं
उस सामान को घर लाने की
बच्चे की जिद के आगे
माँ-बाप भी मजबूर हैं
ऐसे ही चलता है
विज्ञापनों का गोरखधंधा।
- कृष्ण कुमार यादव
सच में यह विज्ञापनों को गोरखधंधा है।
जवाब देंहटाएंमाँ-बाप को अपने बच्चों को समझाना चाहिए ,इतनी कुव्वत तो उनमे बड़प्पन की होनी ही चाहिए।
जवाब देंहटाएंफिर भी लोग इस पर भरोसा भी खूब करते हैं !
जवाब देंहटाएंहार्दिक शुभकामनायें आपको !
सत्य वचन ...
जवाब देंहटाएंअच्छी सोच के साथ लिखी कविता |दीपावली की अग्रिम शुभकामनायें |
जवाब देंहटाएंअच्छी सोच के साथ लिखी कविता |दीपावली की अग्रिम शुभकामनायें |
जवाब देंहटाएंसुन्दर प्रस्तुति |
जवाब देंहटाएंत्योहारों की यह श्रृंखला मुबारक ||
बहुत बहुत बधाई ||
बहुत अच्छी और सार्थक रचना,बधाई!
जवाब देंहटाएंआपको एवं आपके परिवार के सभी सदस्य को दिवाली की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनायें !
जवाब देंहटाएंमेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/