गुरुवार, 10 नवंबर 2011

मौत


आज मैंने मौत को देखा!
अर्द्धविक्षिप्त अवस्था में हवस की शिकार
वो सड़क के किनारे पड़ी थी!
ठण्डक में ठिठुरते भिखारी के
फटे कपड़ों से वह झांक रही थी!
किसी के प्रेम की परिणति बनी
मासूम के साथ नदी में बह रही थी!
नई-नवेली दुल्हन को दहेज की खातिर
जलाने को तैयार थी!
साम्प्रदायिक दंगों की आग में
वह उन्मादियों का बयान थी!
चंद धातु के सिक्कों की खातिर
बिकाऊ ईमान थी!
आज मैंने मौत को देखा!


- कृष्ण कुमार यादव

9 टिप्‍पणियां:

  1. यथार्थपरक व संवेदनशील कृति !



    अपने विचारों से अवगत कराएँ !
    अच्छा ठीक है -2

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  2. बहुत ही मार्मिक प्रस्तुति....समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

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  3. many congratulations to Pakhi on Winning National award for best child blogging and creativity.My endless wishes and blessings.
    Hari Shanker Rarhi

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. संवेदना भरी मार्मिक प्रस्तुति ...

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  6. साम्प्रदायिक दंगों की आग में
    वह उन्मादियों का बयान थी!
    चंद धातु के सिक्कों की खातिर
    बिकाऊ ईमान थी!
    आज मैंने मौत को देखा!
    ....तीखे शब्दों में सच्ची बात...वाकई बेहद मार्मिक प्रस्तुति !!

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