सोमवार, 29 अप्रैल 2024

University of Allahabad Alumni Meet : इलाहाबाद विश्वविद्यालय एल्युमिनाई मीट में...

देश के जाने माने यूनिवर्सिटी में से एक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रथम आधिकारिक एल्युमिनाई मीट का आयोजन 27 और 28 अप्रैल, 2024 को किया गया।  देश भर में यह विश्वविद्यालय अपनी अलग पहचान रखता है। इस विश्वविद्यालय से निकलकर देश के लगभग सभी क्षेत्र में छात्र-छात्राएं अपनी पहचान बनाए हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की देश में एक अलग पहचान है। इसने देश को तीन प्रधानमंत्री दिए हैं। आज भी इनके कार्यों की सराहना की जाती है। इनमें विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर और गुलजारीलाल नंदा का नाम शामिल है। 

देश के इन दिग्गजों को एक मंच पर लाने के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय की ओर से 1996 बैच के पहले पुराछात्रों का एक सम्मेलन आयोजित कराया गया। यहां अब कई दिग्गज एक साथ एक मंच साझा करते हुए अपने जीवन में विश्वविद्यालय के योगदान एवं उसकी यादों को साझा किया। समारोह में सुप्रीम कोर्ट एवं हाईकोर्ट के कई वर्तमान और सेवानिवृत्त जज शामिल हुए। सुप्रीम कोर्ट के जज न्यायमूर्ति पंकज मित्थल, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया, सेवानिवृत्त जज न्यायमूर्ति वीएन खरे, न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी, न्यायमूर्ति विनीत सरन इत्यादि सहित इलाहाबाद होईकोर्ट के 40 जज समेत कई अन्य राज्यों के हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति भी समारोह में शामिल हुए।  इनके अलावा देश-प्रदेश में शीर्ष पदों पर काबिज अफसर, फिल्मी हस्तियाें समेत कई प्रमुख लोग समारोह का हिस्सा बने और पुरानी यादों को ताजा करने के साथ अपने अनुभव साझा किये। 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रथम आधिकारिक एल्युमिनाई मीट (27-28 अप्रैल, 2024) में शामिल हुआ, जिसे कि University of Allahabad Alumni Association (UoAAA) के तत्वावधान में आयोजित किया गया। प्रथम दिन कुलाधिपति श्री आशीष कुमार चौहान, कुलपति प्रो. संगीता श्रीवास्तव, UoAAA के अध्यक्ष प्रो. हेराम्ब चतुर्वेदी और सचिव प्रो. कुमार वीरेंद्र द्वारा दीप प्रज्वलन कर सम्मेलन का औपचारिक शुभारंभ किया गया। उद्घाटन समारोह में शामिल होने के बाद आर्ट एक्जिबिशन एवं फूड फेस्टिवल, सांस्कृतिक संध्या का आनंद लिया। 











भारतीय हिन्दी फिल्म उद्योग बॉलीवुड के प्रसिद्ध निर्माता, निर्देशक और अभिनेता तिग्मांशु धूलिया से भी मुलाकात हुई। उन्होंने अपना कैरियर शेखर कपूर निर्देशित फिल्म बैंडिट क्वीन से बतौर अतिथि निर्देशक शुरू किया था। वे भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पुरा छात्र रहे हैं। उन्होंने कहा कि कि मैं भले ही मुंबई में रहता हूं लेकिन मेरे दिल में हमेशा इलाहाबाद बसता है।  हमारे जीवन में प्रोफेसर पीके घोष और प्रोफेसर अमर सिंह का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 




दूसरे दिन शाम को Reminiscences and the Future Ahead : The Open Mike  में अन्य पुरा छात्रों के साथ अपने विचार व्यक्त किये, वहीं देर शाम को मशहूर कवि कुमार विश्वास  सहित संदीप भोला, कविता तिवारी, राजीव राज, प्रियांशु गजेंद्र की कविताओं का आनंद लिया। 





इलाहाबाद विश्वविद्यालय का मेयो बिल्डिंग सबसे प्राचीन बिल्डिंग है. जिसमे पहले मेयो कॉलेज चला करता था. जो कि कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बद्ध रखता था. लेकिन 23 सितंबर 1887 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के स्थापना के बाद से ये विश्विद्यालय के विज्ञान संकाय का विभाग बना. जिसमे आज भी भौतिक विज्ञान से सम्बंधित कई शोध कर कीर्तिमान स्थापित किया . इसी बिल्डिंग में ही मैथमेटिक्स की कक्षाएं संचालित होती हैं.






अपने पुराछात्रों के स्वागत के लिए विश्वविद्यालय का परिसर विशेष तरह से सजाया गया। पूरे विश्वविद्यालय को रोशनी में डूबा दिया गया था।  विज्ञान संकाय एवं कला संकाय की शोभा इस कदर झलक रही थी कि मानो चंद्रमा रात में विश्वविद्यालय में उतर गया हो। इसके साथ हिंदी गजल, भजन एवं नृत्य के साथ पुरानियों का स्वागत किया गया।  इनके खान पान का ख्याल रखते हुए फूड कोर्ट एवं प्रदर्शनी भी लगाई गई।  वही दिन में इन पुरानियों की नौका विहार ऊंट की सवारी की व्यवस्था संगम पर की गई। 

आज भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय अपने अंदर इतिहास के तमाम पन्नों और सफलताओं की गाथाओं को संजोये हुए है। यहाँ से निकले पुरा-विद्यार्थियों ने राजनीति, प्रशासन, विधि एवं न्याय, शिक्षा, साहित्य, कला, पत्रकारिता, बुद्धिजीविता, समाज सेवा इत्यादि तमाम क्षेत्रों में नए आयाम स्थापित किये हैं। 











जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर, आज़मगढ़  से 12वीं के बाद हमने भी यहीं से बी.ए (1994-97, राजनीति शास्त्र, दर्शन शास्त्र, प्राचीन इतिहास) और एम.ए. (1997-99, राजनीति शास्त्र) की उपाधि धारण की। वर्ष 2000 की सिविल सेवा परीक्षा में चयन पश्चात वर्ष 2001 में इलाहाबाद हमने छोड़ दिया, परन्तु आज भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय हमारे अंदर जीवंत है। यह से जुड़ी तमाम खट्टी-मीठी यादें अभी को मन को स्पन्दित करती हैं। फ़िलहाल, इस पुरातन छात्र सम्मेलन के बहाने इलाहाबाद वि.वि. में तमाम पुराने भवन रंगरोगन और लाइटिंग के साथ चमक उठे। आशा की जानी चाहिए कि एक दौर में आई.ए.एस और साहित्यकारों की फैक्ट्री माने जाने वाले 'पूरब का ऑक्सफोर्ड' नाम से विख़्यात इलाहाबाद विश्वविद्यालय अपने उस पुराने वैभव को पाने के लिए भी सजग प्रयास करेगा, जिसके लिए इसकी देश-दुनिया में ख्याति रही है। 





सोमवार, 15 अप्रैल 2024

'उपनिधि' पत्रिका के काशी विशेषांक का पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव, वरिष्ठ लेखिका डॉ. मुक्ता, विद्याश्री न्यास के अध्यक्ष दयानिधि मिश्रा ने किया विमोचन

ज्ञान-अध्यात्म-दर्शन की त्रिवेणी के साथ-साथ काशी में साहित्य-कला-संस्कृति की त्रिवेणी भी सदियों से निरंतर प्रवाहमान है। गंगा नदी के तट पर अवस्थित काशी नगरी अपने कण-कण में पौराणिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक ज्ञान की अमृत धारा लिए हुए है। यही कारण है कि इसे भारत की सांस्कृतिक राजधानी भी कहा जाता है। आधुनिक हिन्दी के विकास में काशी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उक्त उद्गार वाराणसी परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने ज्ञान गरिमा सेवा न्यास के तत्वावधान में 'उपनिधि' पत्रिका के काशी विशेषांक के विमोचन अवसर पर बतौर मुख्य वक्ता व्यक्त किये। 

सरस्वती इण्टरमीडिएट कालेज, सुड़िया, बुला नाला, वाराणसी के प्रांगण में 14 अप्रैल, 2024 को  आयोजित समारोह में 'उपनिधि' पत्रिका के काशी विशेषांक का विमोचन वाराणसी परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव, वरिष्ठ लेखिका डॉ. मुक्ता, विद्याश्री न्यास के अध्यक्ष श्री दयानिधि मिश्रा, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. राम सुधार सिंह, डॉ. जय प्रकाश मिश्र, सम्पादक श्री सुबोध कुमार दुबे 'शारदानंदन' द्वारा किया गया। इस अवसर पर काशी से जुड़े साहित्यकारों और कवियों को सम्मानित भी किया गया, वहीं काव्य-सरिता भी बही। 

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि काशी संत कबीर, संत रैदास, संत तुलसीदास से लेकर भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, मुंशी प्रेमचंद की भूमि रही है। काशी की संस्कृति सबको सहेजते हुए सदियों से लोगों की चेतना को स्पंदित करती रही है। धर्म और अध्यात्म नहीं बल्कि साहित्यिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक गतिविधियों का भी सदियों से केंद्र रहा है। उपनिधि के काशी विशेषांक में संकलित सामग्री काशी के अतीत से लेकर वर्तमान में हुए विकास तक की वृहद गाथा का प्रामाणिक दस्तावेज है। 

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की प्रपौत्री एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. मुक्ता ने बतौर मुख्य अतिथि 'उपनिधि' पत्रिका द्वारा काशी के विभिन्न आयामों को सहेजते हुए विशेषांक निकालने की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य के विकास में लघु पत्रिकाओं का योगदान अतुलनीय है। आज का दौर भले ही सोशल मीडिया का हो लेकिन पत्र-पत्रिकाओं का महत्व अपनी जगह स्थायी है। लघु पत्रिकाओं का प्रसार क्षेत्र भले ही सीमित रहा हो लेकिन उनमें साहित्य सेवा की संभावनाएं सदैव से असीमित रही हैं। उसी क्रम में 'उपनिधि' पत्रिका का काशी विशेषांक भी है। काशी अत्यन्त प्राचीन, धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक धरोहरों से पूर्ण है, ऐसे में यह विशेषांक मील का पत्थर साबित होगा। 

अध्यक्षीय संबोधन में साहित्य भूषण डा. दयानिधि मिश्र ने कहा कि काशी स्वयंभू है और संसार को जब-जब किसी समस्या विशेष के समाधान की आवश्यकता हुई है तब-तब काशी ने आगे बढ़कर मार्गदर्शन किया है। यही काशी की मूल पहचान है। उन्होंने कहा कि कोई भी पत्रिका लघु नहीं होती, क्योंकि वह एक व्यापक स्वरुप को अपने में समेटती है। काशी की धरती से तमाम पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ है और ये सभी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जीवंत दस्तावेज का काम करेंगी।   

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. राम सुधार सिंह ने कहा कि उपनिधि पत्रिका ने काशी पर विशेषांक निकालकर यहाँ की संस्कृति और साहित्यिक विरासत से युवाओं को जोड़ने का कार्य किया है। ज्ञान गरिमा सेवा न्यास अध्यक्ष श्री सुबोध कुमार दुबे ने बताया कि उपनिधि पत्रिका ने अपने 25 वर्षों के सफर में तमाम महत्वपूर्ण विषयों पर अंक प्रकाशित किये। 

कार्यक्रम में काशी के वरिष्ठ एवं युवा साहित्यकारों का सम्मान ज्ञान गरिमा सेवा न्यास की ओर से किया गया। सम्मानित किए जाने वाले रचनाकारों में डा. शशिकला त्रिपाठी, डा. जयप्रकाश मिश्र, नवगीतकार सुरेंद्र वाजपेयी, गजलकार धर्मेंद्र गुप्त साहिल एवं अरविन्द मिश्र हर्ष', सूर्य प्रकाश मिश्र, डा. आनंद पाल राय, गौतम चंद्र अरोड़ा 'सरस' शामिल रहे। कार्यक्रम के अंत में काव्य संगम समारोह का भी आयोजन किया गया। तमाम कवियों ने अपनी रचनाओं से शमां बांधा और श्रोताओं को मन्त्र मुग्ध कर दिया। संचालन श्री राम किशोर तिवारी ने किया।









आधुनिक हिन्दी के विकास में काशी का महत्वपूर्ण योगदान - पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव

ज्ञान-अध्यात्म-दर्शन की त्रिवेणी के साथ-साथ काशी में साहित्य-कला-संस्कृति की त्रिवेणी भी सदियों से प्रवाहमान- पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव

 हिंदी साहित्य के विकास में लघु पत्रिकाओं का योगदान अतुलनीय - डॉ. मुक्ता 

'उपनिधि' पत्रिका के काशी विशेषांक का हुआ विमोचन