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मंगलवार, 1 नवंबर 2016

हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में बढ़ती साहित्यिक और लेखकीय चोरी

साहित्यिक/लेखकीय चोरी दिनों-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। इधर कई पत्र-पत्रिकाओं में अपनी रचनाएँ दूसरों के नाम से प्रकाशित देखीं। जरूरत, हम सभी को सतर्क रहने की है। फिर चाहे वह लेखक हो या संपादक।  इंटरनेट के इस दौर में सतही लोग धड़ल्ले से लोगों की रचनाएँ कॉपी-पेस्ट करके अपने नामों से प्रकाशित करा रहे हैं।

फ़िलहाल, कोलकाता से प्रकाशित हिन्दी पत्रिका 'द वेक' (संपादक - श्रीमती शकुन त्रिवेदी) के सितंबर-2016 अंक में मेरे लेख "अंडमान-निकोबार में समृद्ध होती हिन्दी" को किसी कुहेली भट्टाचार्जी के नाम से प्रकाशित किया गया है।
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जब हमने इसे 3 अक्टूबर, 2016  को फेसबुक पर शेयर किया तो पाठकों की प्रतिक्रिया गौरतलब थी -

बेहद शर्मनाक ! कभी बंगाल या कोलकाता अपनी बौद्धिकता के लिए जाना जाता था। यहाँ के लोग साहित्य में भी अग्रदूत थे। और अब यहाँ की पत्रिकाएं और लेखक इस स्तर पर उतर आये हैं।

सर ! आपका लेख चोरी किया जा सकता है, पर आपका कृतित्व नहीं।

आपके पास मौलिक रचना है। ऐसे झूठे लोगो को आइना दिखाया जा सकता है। आप के पास अपनी मूल रचना का copyright law के तहत एकाधिकार होने की सूरत में ही कानूनी कार्यवाही के लिए आगे बढ़ा जा सकता है।

हाहाहा आप के लेख की भी चोरी ,जानती नहीं होंगी डाक विभाग हमेशा सचेत रहता है।

साहित्य और लेखन में ऐसी घृणित चोरी निंदनीय है। आप पत्रिका के संपादक को भी इस बारे में बताइये।

Chori unhi Cheezon ki hoti hai Jo churayi ja sakti hain...sub kuch to chura loge e zamane walon magar WO "Attitude" kahan se laoge Jo Ek gift hai by birth...Have a great day Sir

कॉपी राईट एक्ट और मजबूत होना चाहिए

यह एक गलत प्रचलन है। इसके लिए कुछ आवश्यक कदम उठाये जा सकते हैँ।

पत्रिका के नाम कानूनी कार्रवाई करने का लेटर भेजिए...होश ठिकाने आ जाएंगे...

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