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मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

गुजरात के प्रसिद्ध साहित्‍यकार रघुवीर चौधरी को 2015 का ज्ञानपीठ पुरस्‍कार


भारतीय ज्ञानपीठ ने 2015 का ज्ञानपीठ पुरस्‍कार गुजरात के प्रसिद्ध साहित्‍यकार रघुवीर चौधरी को देने की घोषणा की है। यह निर्णय मंगलवार को ज्ञानपीठ चयन  बोर्ड की बैठक में लिया गया। 1938 में जन्‍में रघुवीर चौधरी गुजराती साहित्‍य में एक विशेष स्‍थान रखते हैं और उपन्यासकार होने के साथ ही कवि, क्रिटिक भी हैं।

गुजराती साहित्‍य के जानेमाने नाम रघुवीर चौधरी द्वारा लिखी हुई रूद्र महालय गुजराती ऐतिहासिक उपन्यास लेखन में मील  पत्थर  की तरह जाना जाता है। वर्ष 1977 में उनकी रचना उप्रवास कथात्रई के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने अब तक 80 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं जिनमें अमृता, सहवास, अन्तर्वास, पूर्वरंग, वेणु वात्सल, तमाशा और वृक्ष पतनमा प्रमुख हैं।

भारतीय ज्ञानपीठ की ओर से वार्षिक आधार पर दिया जाने वाला यह पुरस्कार संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्णित 22 भारतीय भाषाओं में लेखन कार्य करने वाले साहित्यकार को उसके जीवनभर के साहित्यिक योगदान को देखते हुए दिया जाता है।

चौधरी से पहले गुजराती में यह पुरस्कार 1967 में उमा शंकर जोशी, 1985 में पन्नालाल पटेल और वर्ष 2001 में राजेंद्र शाह को दिया गया था। वर्ष 2014 का ज्ञानपीठ पुरस्कार मराठी साहित्यकार भालचंद्र नेमाड़े को प्रदान किया गया था। पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार मलयाली साहित्यकार जी. शंकर कुरूप को वर्ष 1965 में दिया गया था। इसके तहत साहित्यकारों को नकद पुरस्कार, एक प्रशस्ति पत्र और सरस्वती की प्रतिमा प्रदान की जाती है।

शनिवार, 28 नवंबर 2015

पति-पत्नी का रिश्ता




पति-पत्नी,
एक बनाया गया रिश्ता,
पहले कभी एक दूसरे को देखा भी नहीं था,
अब सारी जिंदगी एक दूसरे के साथ,
पहले अपरिचित,
फिर धीरे-धीरे होता परिचय,
धीरे-धीरे होने वाला स्पर्श,
फिर
नोकझोंक, झगड़े, बोलचाल बंद,
कभी जिद, कभी अहम का भाव,
फिर धीरे-धीरे बनती जाती प्रेम पुष्पों की माला।
फिर
एकजीवता...तृप्तता,
वैवाहिक जीवन को परिपक्व होने में समय लगता है,
धीरे धीरे जीवन में स्वाद और मिठास आती है,
ठीक वैसे ही जैसे, 
अचार जैसे-जैसे पुराना होता जाता है,
उसका स्वाद बढ़ता जाता है।
पति-पत्नी एक दूसरे  को अच्छी प्रकार
जानने-समझने लगते हैं,
वृक्ष बढ़ता जाता है, बेलाएँ फूटती जातीं हैं,
फूल आते हैं, फल आते हैं,
रिश्ता और मजबूत होता जाता है।
धीरे-धीरे बिना एक दूसरे के अच्छा ही नहीं लगता।
उम्र बढ़ती जाती है, दोनों एक दूसरे  पर
अधिक आश्रित होते जाते हैं,
एक दूसरे के बगैर खालीपन महसूस होने लगता है।
फिर धीरे-धीरे मन में एक भय का निर्माण होने लगता है,
" ये चली गईं तो, मैं कैसे जिऊँगा ? "
" ये चले गए तो, मैं कैसे जिऊंगी  ? "
अपने मन में घुमड़ते इन सवालों के बीच जैसे,
खुद का स्वतंत्र अस्तित्व दोनों भूल जाते हैं।
कैसा अनोखा रिश्ता,
कौन कहाँ का,
एक बनाया गया खूबसूरत रिश्ता
पति-पत्नी का, सात जन्मों के बंधन का रिश्ता !!







यूँ ही हँसते, मुस्कुराते और जीवन में प्रीतिकर रंग भरते एक-दूसरे के साथ 11 साल बीत गए। 
आज हमारी शादी की सालगि‍रह है और आप सभी की शुभकामनाओं और स्नेह के आकांक्षी हैं।

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

राजस्थानी भाषा में कविताएँ


अब हमारी कविताएँ राजस्थानी भाषा में भी। राजस्थानी पत्रिका ''माणक'' (नवंबर 2015) में प्रकाशित हमारी कुछेक कविताएँ, जिनका हिंदी से राजस्थानी में अनुवाद जुगल परिहार ने किया है।  आभार !!


संपर्क -
माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) :  संपादक - पदम मेहता
माणक प्रकाशन, जालोरी गेट, जोधपुर (राजस्थान) -342003  


सोमवार, 23 नवंबर 2015

क्या एकमात्र डिग्री ही योग्यता का पैमाना है ??

राजनेताओं की शिक्षा हमारे यहाँ सदैव से चर्चा और विवादों का विषय बनती है। यद्यपि संविधान इस सम्बन्ध में मौन है, पर किसी के प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, या मंत्री बनते ही लोग उनकी योग्यता को उनकी शिक्षा और डिग्री से आंकने लगते हैं। 

पर हम अपने इर्द गिर्द ध्यान से देखें तो तमाम ऐसे उदाहरण मिलेंगे जहाँ उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति अपने से निम्न शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों के अधीन कार्य कर रहे हैं। तो क्या यह उनकी योग्यता पर प्रश्नचिन्ह है ? भारत की सबसे बड़ी सरकारी सेवा आईएस और एलाइड सेवाओं में न्यूनतम योग्यता स्नातक मात्र है और वे अपने विभागों में सर्वोच्च पदों पर बैठते हैं, जबकि कई बार उनके अधीन कार्य करने वाले बड़े-बड़े डिग्रीधारी होते हैं। सामान्यज्ञ बनाम विशेषज्ञ की लड़ाई लम्बे समय से व्यवस्था में चल रही है। 

तमाम व्यवसायी ऐसे मिलेंगे, जो बमुश्किल ही कोई बड़ी डिग्री लिए हों, पर एमबीए की डिग्री वाले उनके अधीन कार्य करते हैं। 

जिन क्रिकेटर्स और फिल्म स्टार्स की एक झलक पाने के लिए लोग लालायित रहते हैं और उनका एक अदद ऑटोग्राफ लेने के लिए ताक लगाये बैठते हैं, उनमें से कई हाईस्कूल फेल हैं। 

यदि डिग्री ही योग्यता का पैमाना होती तो चपरासी,एमटीएस या पोस्टमैन बनने के लिए MBA, BTech, MTech,  व PHD अभ्यर्थी लाइन में न लगे रहते। हमारे एक उच्चाधिकारी का अर्दली बीटेक है। 

मात्र डिग्री ही योग्यता का पैमाना होती तो सचिन तेंदुलकर न कभी क्रिकेट के भगवान बन पाते और न  नरेंद्र मोदी जी सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री होते !!

-कृष्ण कुमार यादव @ शब्द-सृजन की ओर 
Krishna Kumar Yadav @ www.kkyadav.blogspot.com

रविवार, 15 नवंबर 2015

फिर से गुलजार हो पेरिस

दुनिया के सबसे सुन्दर नगरों में से एक और दुनिया की फ़ैशन और ग्लैमर राजधानी माने जाने वाले पेरिस में हुए आतंकी हमले ने तो एक बात फिर से सिद्ध कर दी है कि दुनिया के अधिकतर देश आतंकवाद से ग्रस्त हैं। आतंकी हमले में 127 लोगों की मौत और 180 से ज्यादा घायल लोगों की दर्दनाक दास्ताँ के बीच फ्रांस की हुकूमत ने जिस तरह से इन हमलों को युद्ध मानते हुए और वहाँ के मीडिया से लेकर पक्ष-विपक्ष की राजनीति करने वालों ने जिस तरह से एकता दिखाई है, वह क़ाबिले-तारीफ है। मीडिया ने न खून से सने फोटो छापे और न दहशत फ़ैलाने वाली ख़बरें दिखाईं। बताते हैं कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद फ़्रांस पर यह सबसे बड़ा हमला है और 1944 के बाद वहाँ पहली बार कर्फ्यू लगा है।  इस वर्ष फ़्रांस में हुआ यह छठा आतंकी हमला है और इस बार हुए हमले के बाद पेरिस को सामान्य होने में भी बमुश्किल 6 घंटे लगे। जनवरी 2015 में शार्ली एब्दो पर हुआ हमला अभिव्यक्ति  स्वतंत्रता पर हमला था तो इस बार हुआ हमला फ़्रांस द्वारा सीरिया व इराक में आईएस के खिलाफ छेड़े हुए अभियान के विरूद्ध बताया जा रहा है।  

अभी जुलाई 2015 में हम लोग पेरिस गए थे।  पहली ही नजर में इस नगर की खूबसूरती और वहाँ के लोगों की जीवन शैली प्रभावित करती है। भारत से भी तमाम लोग वहाँ बसे हुए हैं या पर्यटन के लिए जाते हैं। भारत भी आतंकवाद की इस समस्या से ग्रस्त है। वस्तुत: आज आतंकवाद से वैश्विक स्तर पर एकजुटता से लड़ने की जरूरत है, क्योंकि यह रक्तबीज की तरह सर्वत्र फ़ैल रहा है।  एक जगह कुचला जाता है तो दूसरी जगह सर उठाने लगता है।   


…… पेरिस में हुए आतंकी हमले में मारे गए सभी लोगों के प्रति हार्दिक संवेदना और श्रद्धांजलि। जिन लोगों ने अपनों को खोया है, उन सभी के प्रति सहानुभूति रखते हुए यही आशा करते हैं कि पेरिस जल्द ही फिर से गुलजार हो।  क्योंकि आतंक तात्कालिक रूप से लोगों को दहशत में तो दाल सकता है. पर लम्बे समय तक मानवता से खिलवाड़ नहीं कर सकता !!

- कृष्ण कुमार यादव @ शब्द-सृजन की ओर 
Krishna Kumar Yadav @ www.kkyadav.blogspot.com/

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

हम दीपावली का त्यौहार क्यूँ मनाते हैं

हम दीपावली का त्यौहार क्यूँ मनाते है?

इसका अधिकतर उत्तर मिलता है राम जी के वनवास से लौटने की ख़ुशी में।

सच है पर अधूरा।  अगर ऐसा ही है तो फिर हम सब दीपावली पर भगवन राम की पूजा क्यों नहीं करते? लक्ष्मी जी और गणेश भगवन की क्यों करते है?

सोच में पड़ गए न आप भी।
तो चलिए, आज दीपावली की पूर्व संध्या पर देखते हैं कि इस पर्व को मनाने के पीछे क्या रहस्य छुपा है।

1. देवी लक्ष्मी जी का प्राकट्य:

देवी लक्ष्मी जी कार्तिक मॉस की अमावस्या के दिन समुन्दर मंथन में से अवतार लेकर प्रकट हुई थी।

2. भगवन विष्णु द्वारा लक्ष्मी जी को बचाना:

भगवन विष्णु ने आज ही के दिन अपने पांचवे अवतार वामन अवतार में देवी लक्ष्मी को राजा बालि से मुक्त करवाया था।

3. नरकासुर वध कृष्ण द्वारा: 

इस दिन भगवन कृष्ण ने राक्षसों के राजा नरकासुर का वध कर उसके चंगुल से 16000 औरतों को मुक्त करवाया था। इसी ख़ुशी में दीपावली का त्यौहार दो दिन तक मनाया गया। इसे विजय पर्व के नाम से भी जाना जाता है।

4. पांडवो की वापसी: 

महाभारत में लिखे अनुसार कार्तिक अमावस्या को पांडव अपना 12 साल का वनवास काट कर वापिस आये थे जो की उन्हें चौसर में कौरवो द्वारा हरये जाने के परिणाम स्वरूप मिला था। इस प्रकार उनके लौटने की खुशी में दीपावली मनाई गई।

5. राम जी की विजय पर : 

रामायण के अनुसार ये चंद्रमा के कार्तिक मास की अमावस्या के नए दिन की शुरुआत थी जब भगवन राम माता सीता और लक्ष्मण जी अयोध्या वापिस लौटे थे रावण और उसकी लंका का दहन करके। अयोध्या के नागरिकों ने पुरे राज्य को इस प्रकार दीपमाला से प्रकाशित किया था जैसा आजतक कभी भी नहीं हुआ था।

6. विक्रमादित्य का राजतिलक:

आज ही के दिन भारत के महान राजा विक्रमदित्य का राज्याभिषेक हुआ था। इसी कारन दीपावली अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना भी है।

7. आर्य समाज के लिए प्रमुख दिन: 

आज ही के दिन कार्तिक अमावस्या को एक महान व्यक्ति स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने हिंदुत्व का अस्तित्व बनाये रखने के लिए आर्य समाज की स्थापना की थी।

8. जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण दिन:

महावीर तीर्थंकर जी ने कार्तिक मास की अमावस्या के दिन ही मोक्ष प्राप्त किया था।

9. सिक्खों के लिए महत्त्व:

तीसरे सिक्ख गुरु गुरु अमरदास जी ने लाल पत्र दिवस के रूप में मनाया था जिसमे सभी श्रद्धालु गुरु से आशीर्वाद लेने पहुंचे थे और 1577 में अमृतसर में हरिमंदिर साहिब का शिलान्यास किया गया था।
1619 में सिक्ख गुरु हरगोबिन्द जी को ग्वालियर के किले में 52 राजाओ के साथ मुक्त किया गया था जिन्हें मुगल बादशाह जहांगीर ने नजरबन्द किया हुआ था। इसे सिक्ख समाज बंदी छोड़ दिवस के रूप में भी जानते हैं।
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भगवान् गणेश सभी देवो में प्रथम पूजनीय है इसी कारण उनकी देवी लक्ष्मी जी के साथ दीपावली पर पूजा होती है और बाकी सभी कारणों के लिए हम दीपमाला लगाकर दीपावली का त्यौहार मनाते हैं।

अब आपसे एक विनम्र निवेदन की इस जानकारी को अपने परिवार अपने बच्चों से जरूर साँझा करे । ताकि उन्हें दीपावली के महत्त्व की पूरी जानकारी प्राप्त हो सके!
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प्रकाश का पर्व दीपावली आप सभी के जीवन में ढेर सारी खुशियाँ लाये। अँधेरे से अँधेरे माहौल में भी दिल में आशा की एक लौ जलती रहे। दीपोत्सव पर्व की सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएं !!

बुधवार, 4 नवंबर 2015

राजस्थान साहित्य परिषद ने कृष्ण कुमार यादव को किया सम्मानित


प्रशासन के साथ-साथ हिंदी साहित्य और ब्लॉगिंग के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय सेवाओं के लिए राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएँ एवं साहित्यकार व लेखक श्री कृष्ण कुमार यादव को राजस्थान साहित्य परिषद् की ओर से सम्मानित किया गया। श्री यादव को यह सम्मान उनके हनुमानगढ़ प्रवास के दौरान राजस्थान साहित्य परिषद, हनुमानगढ़ की तरफ से इसके संस्थापक एवं अध्यक्ष श्री दीनदयाल शर्मा, वरिष्ठ बाल साहित्यकार और सचिव श्री राजेंद्र ढाल ने  शाल ओढ़ाकर, नारियल फल देकर  एवं प्रशस्ति पत्र देकर अभिनन्दन और सम्मानित किया।


         श्री शर्मा ने कहा कि श्री कृष्ण कुमार यादव का हनुमानगढ़ में आगमन सिर्फ एक अधिकारी के रूप में ही नहीं बल्कि साहित्यकार, लेखक और ब्लॉगर के रूप में भी हुआ है और उनके कृतित्व से हम सभी अभिभूत हैं। इस दौरान दून महाविद्यालय, हनुमानगढ़  के प्राचार्य श्री लक्ष्मीनारायण कस्वां, श्रीगंगानगर मंडल के डाक अधीक्षक श्री भारत लाल मीणा सहित तमाम अधिकारीगण और साहित्यकार उपस्थित रहे। 

(प्रस्तुति : राजेंद्र ढाल, सचिव- राजस्थान साहित्य परिषद, हनुमानगढ़ (राजस्थान)

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2015

ससुराल में भी होगा रावण का दहन

जोधपुर से रावण का बड़ा अभिन्न नाता है। लोक मान्यता है कि रावण का विवाह मारवाड़ की प्राचीन राजधानी मंडोर निवासी मंदोदरी के साथ हुअा था। इस कारण मारवाड़ को रावण का ससुराल माना जाता है। मंडोर की पहाड़ी पर स्थित प्राचीन किले के निकट एक स्थान को रावण का विवाह स्थल के रूप में माना जाता है। रावण के साथ विवाह समारोह में भाग लेने उसके कुछ वंशज जोधपुर में ही रह गए। ये लोग बाकायदा रावण की पूजा-अर्चना करते है। इसके लिए उन्होंने रावण का मंदिर तक बनाया हुआ है। जोधपुर में दवे गोधा समाज के लोग अपने आप को रावण का वंशज मानते हैं, इसलिए ये लोग रावण दहन को नहीं देखते। 

एक तरफ रावण की ससुराल में उसकी पूजा होती है, वहीँ दूसरी तरफ उसे बुराई का प्रतीक मानकर दहन भी किया जाता है।  यहाँ जोधपुर में रामलीला  होती हो, पर संभवत: जोधपुर ही ऐसा शहर है, जहाँ दशहरे पर रावण, मेघनाद, कुम्भकर्ण के साथ ही सूर्पनखा और ताड़का के पुतलों  दहन किया जाता है। जोधपुर में रावण दहन के मुख्य स्थल रावण का चबूतरा मैदान में दशहरा पर दहन करने को तैयार किए गए रावण व उसके परिजनों के  पुतलों को खड़ा किया जाता है। 

विजयदशमी बुराई पर अच्छाई की जीत प्रतीक है। यह दर्शाता है कि बुराई के भले कितने भी सिर क्यों न हो, अच्छाई के आगे सब झुक भी जाते हैं और कट भी जाते हैं। विजय दशमी के इस पर्व पर आइए हम दसों बुराईयों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अन्याय, स्वार्थ, अहंकार और क्रूरता) पर यथासम्भव विजय प्राप्त करने को संकल्पित हों ! आप सभी विजय के पथ पर अग्रसर हों और आपका जीवन उन्नति और प्रगति के पथ पर सदैव बढ़ता रहे !! 

- कृष्ण कुमार यादव @ शब्द-सृजन की ओर
Krishna Kumar Yadav @ www.kkyadav.blogspot.com/

बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

तुममें से कोई राम है क्या

हर साल रावण को जलाया जाता है और अगले साल ही रावण पुन: सज-धज के पिछली बार से भी विकराल रूप में खड़ा होकर हमारे सामने अट्ठाहस करता है। ...और सामने खड़ी भीड़ से पूछता है, "तुममें से कोई राम है क्या?'' … और हम सब नि:शब्द रह जाते हैं।  

धू-धू कर जलता रावण अट्ठहास कर बोलता है, ''अगली साल मैं फिर आऊँगा।  तुम ही मुझे नया आकार दोगे, मुझे सजाओगे और अपनी आने वाली पीढ़ियों को मेरे बारे में बताओगे।" 

… मुझे भी उस राम का इंतज़ार है जो हमेशा के लिए मेरा वजूद ख़त्म कर दे, पर उस रावण का क्या करोगे जो तुम्हारे अंदर कहीं छिपा बैठा है। जब तक तुम्हारे अंदर का रावण जिन्दा है, मेरे पुतले को जलाकर मुझे नहीं ख़त्म कर पाओगे..!! 


कृष्ण कुमार यादव की लघुकथा @ शब्द-सृजन की ओर 
Short Story by Krishna Kumar Yadav.

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2015

साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल...


गाँधी जी जब भी स्मृतियों में आते हैं, कविवर प्रदीप द्वारा रचा गया गीत "साबरमती के संत" स्वत: जुबाँ पर आ जाता है।  स्कूली दिनों  गीत को हम बड़ी तन्मयता से गांधी जयंती पर गाया करते थे।  एक बार फिर से उन स्मृतियों को आजसे जोड़ते हुए वही गीत - 


दे दी हमें आज़ादी बिना खड्‌ग बिना ढाल

साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

आँधी में भी जलती रही गाँधी तेरी मशाल

साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

दे दी ...

धरती पे लड़ी तूने अजब ढंग की लड़ाई

दागी न कहीं तोप न बंदूक चलाई

दुश्मन के किले पर भी न की तूने चढ़ाई

वाह रे फ़कीर खूब करामात दिखाई

चुटकी में दुश्मनों को दिया देश से निकाल

साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

दे दी ...

रघुपति राघव राजा राम

शतरंज बिछा कर यहाँ बैठा था ज़माना

लगता था मुश्किल है फ़िरंगी को हराना

टक्कर थी बड़े ज़ोर की दुश्मन भी था ताना

पर तू भी था बापू बड़ा उस्ताद पुराना

मारा वो कस के दांव के उलटी सभी की चाल

साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

दे दी ...

रघुपति राघव राजा राम

जब जब तेरा बिगुल बजा जवान चल पड़े

मज़दूर चल पड़े थे और किसान चल पड़े

हिंदू और मुसलमान, सिख पठान चल पड़े

कदमों में तेरी कोटि कोटि प्राण चल पड़े

फूलों की सेज छोड़ के दौड़े जवाहरलाल

साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

दे दी ...

रघुपति राघव राजा राम

मन में थी अहिंसा की लगन तन पे लंगोटी

लाखों में घूमता था लिये सत्य की सोंटी

वैसे तो देखने में थी हस्ती तेरी छोटी

लेकिन तुझे झुकती थी हिमालय की भी चोटी

दुनिया में भी बापू तू था इन्सान बेमिसाल

साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

दे दी ...

रघुपति राघव राजा राम

जग में जिया है कोई तो बापू तू ही जिया

तूने वतन की राह में सब कुछ लुटा दिया

माँगा न कोई तख्त न कोई ताज भी लिया

अमृत दिया तो ठीक मगर खुद ज़हर पिया

जिस दिन तेरी चिता जली, रोया था महाकाल

साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल

साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल

रघुपति राघव राजा राम !!



!! गाँधी जयंती पर शत-शत नमन !!

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

डिजिटल क्रान्ति के दौर में इन्टरनेट की दुनिया में तेजी से पाँव पसार रही है हिन्दी


डिजिटल क्रान्ति के इस युग में  इन्टरनेट की दुनिया में भी हिन्दी तेजी से पाँव पसार रही है। आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया और ब्लाॅगिंग के माध्यम से हिन्दी को नये रूप में स्वीकार रही है। आज परिवर्तन और विकास की भाषा के रूप में हिन्दी के महत्व को नये सिरे से रेखांकित किया जा रहा है। उक्त उद्गार राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएं एवं साहित्यकार श्री कृष्ण कुमार यादव ने जोधपुर प्रधान डाकघर में हिंदी पखवाड़ा के समापन अवसर पर व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि हिन्दी में विश्व भाषा बनने की क्षमता है। आज हिन्दी सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम देशों में बोली जाती है। विश्व के लगभग 150 विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है। दुनिया में चीनी भाषा के बाद हिन्दी बोलने वालों की संख्या सर्वाधिक है। आज जहाँ कम्प्यूटर एवं इंटरनेट पर हिन्दी की लोकप्रियता चरम पर है, वहीं विदेशों से लोग भारत में हिन्दी सीखने के लिए आ रहे है। श्री यादव ने हिन्दी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि  सृजन एवं अभिव्यक्ति की दृष्टि से हिंदी दुनिया की अग्रणी भाषाओं में से एक है। हिंदी हमारे रोजमर्रा की भाषा है और इसे सिर्फ पखवाड़ा से जोड़कर देखने की जरूरत नहीं है। जरूरत इस बात की है कि हम इसके प्रचार-प्रसार और विकास के क्रम में आयोजनों से परे अपनी दैनिक दिनचर्या से भी जोड़ें । डाक निदेशक श्री यादव ने जोर देकर कहा कि ऐसे में हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिये सरकारी कार्यक्रमों से परे अगर हर हिन्दी भाषी ठान ले कि उसे हिन्दी में ही कार्य करना है तो हिन्दी को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। 

 प्रवर डाक अधीक्षक, जोधपुर मंडल श्री पी आर करेला ने कहा कि हिंदी हमारी मातृभाषा के साथ-साथ राजभाषा भी है और लोगों तक पहुँच स्थापित करने के लिए टेक्नॅालाजी स्तर पर इसका व्यापक प्रयोग करने की जरूरत है। सीनियर पोस्टमास्टर श्री हेमराज राठौड ने कहा कि हिंदी पूरे देश को जोड़ने वाली भाषा है और सरकारी कामकाज में भी इसे बहुतायत में अपनाया जाना चाहिये।

हिंदी पखवाड़ा के दौरान प्रधान डाकघर में आयोजित कार्यक्रम के विजेताओं को इस अवसर पर निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने सम्मानित भी किया। निबंध प्रतियोगिता में दुर्ग सिंह भाटी, नीतू प्रजापत, सुनील जोशी और कमल खन्ना एवं डाकिया संवर्ग में सत्य प्रकाश, वाद-विवाद प्रतियोगिता में रूपाराम, रमेश सोठवाल, नरेंद्र सोनी और प्रवीण कुमार वैष्णव एवं काव्य पाठ प्रतियोगिता में नीतू प्रजापत को पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 

 कार्यक्रम के आरंभ में मुख्य अतिथि राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव का सीनियर पोस्टमास्टर श्री हेमराज राठौड ने स्वागत किया और हिंदी पखवाड़ा के दौरान आयोजित कार्यक्रमों की रूपरेखा पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन सुनील जोशी ने किया और आभार ज्ञापन सहायक डाक अधीक्षक (मुख्यालय) श्री विनय कुमार खत्री द्वारा किया गया। 



गुरुवार, 24 सितंबर 2015

जीवन मूल्यों का प्रतिबिम्ब होती है कविता - कृष्ण कुमार यादव

कविता हमारे जीवन मूल्यों का प्रतिबिम्ब है। कविता आत्मा का मौलिक व विशिष्ट संगीत है, जो मानव में संस्कार रोपती हैै।  एक ऐसा संस्कार जो सभी को प्रदत्त है पर जरूरत है उसके खोजे जाने, महसूस करने और गढ़ने की। यही कारण है कि सम्वेदनाओं  का प्रस्फुटन होते ही कविता स्वतः फूट पड़ती है। उक्त उद्गार हिंदी पखवाड़ा के तहत डाक विभाग द्वारा 23 सितंबर, 2015  को पोस्टमास्टर जनरल कार्यालय के सभा कक्ष में आयोजित कविता प्रतियोगिता कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव ने व्यक्त किये। हिंदी साहित्यकार एवं कवि  के रूप में भी चर्चित श्री यादव ने कहा कि काव्य-सृजन निरा कला कर्म या बौद्विक कवायद भर नहीं है बल्कि यह अपने भीतर एक और बड़ी लेकिन समानांतर दुनिया को समाए हुए है। कविता स्वयं की व्याख्या भी करती है एवं बहुत कुछ अनकहा भी छोड़ देती है। इस अनकहे को ढूँढ़ने की अभिलाषा ही एक कवि-मन को अन्य से अलग करती है।  

कार्यक्रम के दौरान डाक विभाग के तमाम प्रतिभागियों ने अपनी रचनाएं पेश कीं। इनमें सहायक डाक अधीक्षक पुखराज राठौड़, अनिल कौशिक, डाक निरीक्षक राजेंद्र भाटी, विनोद कुमार पुरोहित, रमेश चन्द्र गुर्जर, नरेंद्र कुमार वर्मा इत्यादि ने हिंदी में कवितायेँ सुनाकर वाहवाही बटोरी। राजेंद्र भाटी ने कारगिल का शहीद कविता सुनाकर लोगों को भाव विभोर किया तो विनोद कुमार पुरोहित ने अध्यात्म पर याचना कविता सुनाई।  अनिल कौशिक ने पिता की भूमिका पर कविता सुनाकर भाव विह्वल किया तो पुखराज राठौड़ ने महाराणा प्रताप की गाथा को जीवंत किया। इस दौरान डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने अपनी एक कविता के माध्यम से कविता की भूमिका को भी रेखांकित किया -कविता है वेदना की अभिव्यक्ति/कविता है एक विचार/कविता है प्रकृति की सहचरीे/कविता है क्रान्ति की नजीर/कविता है शोषितों की आवाज/कविता है रसिकों का साज/कविता है सृष्टि और प्रलय का निर्माण/कविता है मोक्ष और निर्वाण/कभी यथार्थ, तो कभी कल्पना के आगोश में/कविता इस ब्रह्माण्ड से भी आगे है/शायद इसीलिए कहा गया है/जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि।

इस दौरान सहायक निदेशक (राजभाषा) कान सिंह राजपुरोहित ने कहा कि साहित्य में सबसे लोकप्रिय विधा कविता को ही माना जाता है क्योंकि कविता मनुष्य के कण्ठ में सहज ही समा जाती है। हमारे वेद, पुराण इत्यादि सभी काव्यमय रूप में ही लिखे गए हैं और अपनी गेयता के चलते स्वत: लोगों की जुबान पर चढ़ जाते हैं।

कार्यक्रम का संचालन डाक निरीक्षक सुदर्शन सामरिया और आभार-ज्ञापन राजेंद्र भाटी ने किया।  इस दौरान डाक विभाग के तमाम अधिकारी और कर्मचारीगण उपस्थित रहे।  

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

बचपन की कुछ यादें...


चलिए आज बचपन की कुछ यादें ताजा कर लेते हैं। शायद इसी बहाने फिर से वो बचपन लौट आये। याद है, बचपन में 1 रु. की पतंग के पीछे 2 किलोमीटर तक भागते थे। न जाने कितनी बार चोटें खाईं, पर फिर भी हमेशा वही जज्बा। आज पता चलता है, दरअसल वो पतंग नहीं थी; एक चैलेंज थी। वैसे भी खुशियाँ बैठे-बैठे नहीं मिलतीं। खुशियों को हांसिल करने के लिए दौड़ना पड़ता है। वो दुकानो पर नहीं मिलती...शायद यही जिंदगी की दौड़ है !!

जरा गौर करियेगा -

जब बचपन था, तो जवानी एक ड्रीम थी।
जब जवान हुए, तो बचपन एक ज़माना था!!

जब घर में रहते थे, आज़ादी अच्छी लगती थी। 
आज आज़ादी है, फिर भी घर जाने की जल्दी रहती है!!

कभी होटल में जाना पिज़्ज़ा, बर्गर खाना पसंद था। 
आज घर पर आना और माँ के हाथ का खाना पसंद है!!!

स्कूल में जिनके साथ झगड़ते थे। 
आज उनको ही फेसबुक पर तलाशते है!!

ख़ुशी किसमें  होती है, ये पता अब चला है।  
बचपन क्या था, इसका एहसास अब हुआ है !! 

काश बदल सकते हम ज़िंदगी के कुछ साल। 
काश जी सकते हम, ज़िंदगी फिर एक बार !!



याद करिये वो दिन-

जब हम अपने शर्ट में हाथ छुपाते थे 
और लोगों से कहते फिरते थे देखो मैंने
अपने हाथ जादू से हाथ गायब कर दिए। 

जब हमारे पास चार रंगों से लिखने वाली
एक पेन हुआ करती थी और हम
सभी के बटन को एक साथ दबाने
की कोशिश किया करते थे। 

जब हम दरवाज़े के पीछे छुपते थे
ताकि अगर कोई आये तो उसे डरा सकें । 

जब आँख बंद कर सोने का नाटक करते थे 
ताकि कोई हमें गोद में उठाके बिस्तर तक पहुँचा  दे |

सोचा करते थे की ये चाँद 
हमारी साइकिल के पीछे-पीछे क्यों चल रहा है। 

ऑन-ऑफ़ वाले स्विच को बीच में
अटकाने की कोशिश किया करते थे। 

फल के बीज को इस डर से नहीं खाते थे 
की कहीं हमारे पेट में पेड़ न उग जाए। 

बर्थडे सिर्फ इसलिए मनाते थे
ताकि ढेर सारे गिफ्ट मिले। 

फ्रिज को धीरे से बंद करके ये जानने की 
कोशिश करते थे की इसकी लाइट कब बंद होती हैं। 

सच, बचपन में सोचते हम बड़े क्यों नहीं हो रहे
और अब सोचते हैं कि हम बड़े क्यों हो गए ?




एक गीतकार की पंक्तियाँ याद आती हैं -

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो 
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन
वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी !!

- कृष्ण कुमार यादव @ शब्द-सृजन की ओर 

रविवार, 13 सितंबर 2015

हिन्दी से सम्बन्धित प्रथम


हिन्दी का माह आ गया है।  अपने देश भारत में सितंबर माह आते ही हिंदी का गुणगान दुगुने उत्साह से आरम्भ हो जाता है। हिंदी दिवस से लेकर हिंदी सप्ताह, पखवाड़ा और माह तक मनाया जाता है। चलिए, इस बार हिंदी के कुछ प्रथमों के बारे में जानते हैं। 


1. हिन्दी में प्रथम डी. लिट् -- डा. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल 
2. हिंदी के प्रथम एमए -- नलिनी मोहन साव्न्याल (वे बांग्लाभाषी थे।) 
3. भारत में पहली बार हिंदी में एमए की पढ़ाई -- कोलकाता विश्वविद्यालय में कुलपति सर आशुतोष मुखर्जी ने 1919 में  शुरू करवाई थी। 
4. विज्ञान में शोधप्रबंध हिंदी में देने वाले प्रथम विद्यार्थी -- मुरली मनोहर जोशी 
5. अन्तरराष्ट्रीय संबन्ध पर अपना शोधप्रबंध लिखने वाले प्रथम व्यक्ति -- वेद प्रताप वैदिक 
6. हिंदी में बी.टेक. का प्रोजेक्ट रिपोर्ट प्रस्तुत करने वाले प्रथम विद्यार्थी - श्याम रुद्र पाठक (सन् १९८५) 
7. डॉक्टर आफ मेडिसिन (एमडी) की शोधप्रबन्ध पहली बार हिन्दी में प्रस्तुत करने वाले -- डॉ० मुनीश्वर गुप्त (सन् १९८७) 
8. हिन्दी माध्यम से एल.एल.एम. उत्तीर्ण करने वाला देश का प्रथम विद्यार्थी -- चन्द्रशेखर उपाध्याय 
9. प्रबंधन क्षेत्र में हिन्दी माध्यम से प्रथम शोध-प्रबंध के लेखक -- भानु प्रताप सिंह (पत्रकार) ; विषय था -- उत्तर प्रदेश प्रशासन में मानव संसाधन की उन्नत प्रवत्तियों का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन- आगरा मंडल के संदर्भ में 
10. हिन्दी का पहला इंजीनियर कवि -- मदन वात्स्यायन 
11. हिन्दी में निर्णय देने वाला पहला न्यायधीश -- न्यायमूर्ति श्री प्रेम शंकर गुप्त 
12. सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में हिन्दी के प्रथम वक्ता -- नारायण प्रसाद सिंह (सारण-दरभंगा ; 1926) 
13. लोकसभा में सबसे पहले हिन्दी में सम्बोधन : सीकर से रामराज्य परिषद के सांसद एन एल शर्मा पहले सदस्य थे जिन्होने पहली लोकसभा की बैठक के प्रथम सत्र के दूसरे दिन 15 मई 1952 को हिन्दी में संबोधन किया था। 
14. हिन्दी में संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषण देने वाला प्रथम राजनयिक -- अटल बिहारी वाजपेयी 
15. हिन्दी का प्रथम महाकवि -- चन्दबरदाई 
16. हिंदी का प्रथम महाकाव्य -- पृथ्वीराजरासो 
17. हिंदी का प्रथम ग्रंथ -- पुमउ चरउ (स्वयंभू द्वारा रचित) 
18. हिन्दी का पहला समाचार पत्र -- उदन्त मार्तण्ड (पं जुगलकिशोर शुक्ल) 
19. हिन्दी की प्रथम फ़िल्मी पत्रिका -रंगभूमि
20. सबसे पहला हिन्दी-आन्दोलन : हिंदीभाषी प्रदेशों में सबसे पहले बिहार प्रदेश में सन् 1835 में हिंदी आंदोलन शुरू हुआ था। इस अनवरत प्रयास के फलस्वरूप सन् 1875 में बिहार में कचहरियों और स्कूलों में हिंदी प्रतिष्ठित हुई।
21. समीक्षामूलक हिन्दी का प्रथम मासिक -- साहित्य संदेश (आगरा, सन् 1936 से 1942 तक) 
22. हिन्दी का प्रथम आत्मचरित -- अर्धकथानक (कृतिकार हैं -- जैन कवि बनारसीदास (कवि) (वि.सं. १६४३-१७००)) 
23. हिन्दी का प्रथम व्याकरण -- 'उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण' (दामोदर पंडित) 
24. हिन्दी व्याकरण के पाणिनी -- किशोरीदास वाजपेयी 
25. हिन्दी का प्रथम मानक शब्दकोश -- हिंदी शब्दसागर 
26. हिन्दी का प्रथम विश्वकोश -- हिन्दी विश्वकोश 
27. हिन्दी का प्रथम कवि -- राहुल सांकृत्यायन की हिन्दी काव्यधारा के अनुसार हिन्दी के सबसे पहले मुसलमान कवि अमीर खुसरो नहीं, बल्कि अब्दुर्हमान हुए हैं। ये मुलतान के निवासी और जाति के जुलाहे थे। इनका समय १०१० ई० है। इनकी कविताएँ अपभ्रंश में हैं। -(संस्कृति के चार अध्याय, रामधारी सिंह दिनकर, पृष्ठ ४३१) 
28. हिन्दी की प्रथम आधुनिक कविता -- 'स्वप्न' (महेश नारायण द्वारा रचित) 
29. मुक्त छन्द का पहला हिन्दी कवि -- महेश नारायण
30. हिन्दी की प्रथम कहानी -- हिंदी की सर्वप्रथम कहानी कौनसी है, इस विषय में विद्वानों में जो मतभेद शुरू हुआ था वह आज भी जैसे का तैसा बना हुआ है. हिंदी की सर्वप्रथम कहानी समझी जाने वाली कड़ी के अर्न्तगत सैयद इंशाअल्लाह खाँ की 'रानी केतकी की कहानी' (सन् 1803 या सन् 1808), राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद की 'राजा भोज का सपना' (19 वीं सदी का उत्तरार्द्ध), किशोरी लाल गोस्वामी की 'इन्दुमती' (सन् 1900), माधवराव सप्रे की 'एक टोकरी भर मिट्टी' (सन् 1901), आचार्य रामचंद्र शुक्ल की 'ग्यारह वर्ष का समय' (सन् 1903) और बंग महिला की 'दुलाई वाली' (सन् 1907) नामक कहानियाँ आती हैं | परन्तु किशोरी लाल गोस्वामी द्वारा कृत 'इन्दुमती' को मुख्यतः हिंदी की प्रथम कहानी का दर्जा प्रदान किया जाता है| 
31. हिन्दी का प्रथम लघुकथाकार-माधवराव सप्रे
32. हिन्दी का प्रथम उपन्यास -- 'देवरानी जेठानी की कहानी' (लेखक -- पंडित गौरीदत्त ; सन् १८७०)। श्रद्धाराम फिल्लौरी की भाग्यवती और लाला श्रीनिवास दास की परीक्षा गुरू को भी हिन्दी के प्रथम उपन्यस होने का श्रेय दिया जाता है। 
33. हिंदी का प्रथम विज्ञान गल्प -- ‘आश्चर्यवृत्तांत’ (अंबिका दत्त व्यास ; 1884-1888) 
34. हिंदी का प्रथम नाटक -- नहुष (गोपालचंद्र, १८४१) 
35. हिंदी का प्रथम काव्य-नाटक -- ‘एक घूँट’ (जयशंकर प्रसाद ; 1915 ई.)
36. हिन्दी का प्रथम ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता -- सुमित्रानंदन पंत (१९६८) 
37. हिन्दी साहित्य का प्रथम इतिहास -- भक्तमाल / इस्त्वार द ल लितरेत्यूर ऐन्दूई ऐन्दूस्तानी (अर्थात "हिन्दुई और हिन्दुस्तानी साहित्य का इतिहास", लेखक गार्सा-द-तासी) 
38. हिन्दी कविता के प्रथम इतिहासग्रन्थ के रचयिता -- शिवसिंह सेंगर ; रचना -- शिवसिंह सरोज 
39. हिन्दी साहित्य का प्रथम व्यवस्थित इतिहासकार -- आचार्य रामचंद्र शुक्ल 
40. हिन्दी का प्रथम चलचित्र (मूवी) -- सत्य हरिश्चन्द्र 
41. हिन्दी की पहली बोलती फिल्म (टाकी) -- आलम आरा 
42. हिन्दी का अध्यापन आरम्भ करने वाला प्रथम विश्वविद्यालय -- कोलकाता विश्वविद्यालय (फोर्ट विलियम् कॉलेज) 
43. देवनागरी के प्रथम प्रचारक -- गौरीदत्त 
44. हिन्दी का प्रथम चिट्ठा (ब्लॉग) -- "हिन्दी" चिट्ठे 2002 अकटूबर में विनय और आलोक ने हिन्दी (इस में अंग्रेज़ी लेख भी लिखे जाते हैं) लेख लिखने शुरू करे, 21 अप्रैल 2003 में सिर्फ हिन्दी का प्रथम चिट्ठा बना "नौ दो ग्यारह", जो अब यहाँ है (संगणकों के हिन्दीकरण से सम्बन्धित बंगलोर निवासी आलोक का चिट्ठा) 
45. हिन्दी का प्रथम चिट्ठा-संकलक -- चिट्ठाविश्व (सन् २००४ के आरम्भ में बनाया गया था) 
46. अन्तरजाल पर हिन्दी का प्रथम समाचारपत्र -- हिन्दी मिलाप / वेबदुनिया 
47. हिन्दी का पहला समान्तर कोश बनाने का श्रेय -- अरविन्द कुमार व उनकी पत्नी कुसुम 
48. हिन्दी साहित्य का प्रथम राष्ट्रगीत के रचयिता -- पं. गिरिधर शर्मा ’नवरत्न‘ 
49. हिंदी का प्रथम अर्थशास्त्रीय ग्रंथ -- "संपत्तिशास्त्र" (महावीर प्रसाद द्विवेदी) 
50. हिन्दी के प्रथम बालसाहित्यकार -- श्रीधर पाठक (1860 - 1928)
51. हिन्दी की प्रथम वैज्ञानिक पत्रिका -- सन् १९१३ से प्रकाशित विज्ञान (विज्ञान परिषद् प्रयाग द्वारा प्रकाशित) 
52. सबसे पहली टाइप-आधारित देवनागरी प्रिंटिंग -- 1796 में गिलक्रिस्त (John Borthwick Gilchrist) की Grammar of the Hindoostanee Language, Calcutta ; Dick Plukker 
53. खड़ीबोली के गद्य की प्रथम पुस्तक -- लल्लू लाल जी की प्रेम सागर (हिन्दी में भागवत का दशम् स्कन्ध) ; हिन्दी गद्य साहित्य का सूत्रपात करनेवाले चार महानुभाव कहे जाते हैं- मुंशी सदासुख लाल, इंशा अल्ला खाँ, लल्लू लाल और सदल मिश्र। ये चारों सं. 1860 के आसपास वर्तमान थे। 
54. हिंदी की वैज्ञानिक शब्दावली -- १८१० ई. में लल्लू लाल जी द्वारा संग्रहीत ३५०० शब्दों की सूची जिसमें हिंदी की वैज्ञानिक शब्दावली को फ़ारसी और अंग्रेज़ी प्रतिरूपों के साथ प्रस्तुत किया गया है। 
55. हिन्दी की प्रथम विज्ञान-विषयक पुस्तक -- १८४७ में स्कूल बुक्स सोसाइटी, आगरा ने 'रसायन प्रकाश प्रश्नोत्तर' का प्रकाशन किया। 
56. एशिया का जागरण विषय पर हिन्दी कविता -- सन् 1901 में राधाकृष्ण मित्र ने हिन्दी में एशिया के जागरण पर एक कविता लिखी थी। शायद वह किसी भी भाषा में 'एशिया के जागरण' की कल्पना पर पहली कविता है। 
57. हिन्दी का प्रथम संगीत-ग्रन्थ -- मानकुतूहल (ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर द्वारा रचित, 15वीं शती) 
58. हिंदी भाषा का सबसे बड़ा और प्रामाणिक व्याकरण -- कामताप्रसाद गुरु द्वारा रचित "हिंदी व्याकरण" का प्रकाशन सर्वप्रथम नागरीप्रचारिणी सभा, काशी में अपनी लेखमाला में सं. १९७४ से सं. १९७६ वि. के बीच किया और जो सं. १९७७ (१९२० ई.) में पहली बार सभा से पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित वव
हुआ। 
59. हिन्दी की प्रथम डोमेन -- www.हरहरमहादेव.com

(उपरोक्त जानकारी में यदि कोई त्रुटि या तथ्यात्मक गलती हो तो अवश्य बताइयेगा)।

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

डिजिटल वर्ल्ड से हिंदी में आएगा बदलाव

दुनिया के विभिन्न देशों में हिंदी के प्रति लोगों का झुकाव बढ़ रहा है, इसलिए जरूरी है कि हिंदी को और समृद्ध व सशक्त बनाने की दिशा में प्रयास किए जाएं। इसके साथ हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं से जोड़ते हुए उसका डिजिटल दुनिया में उपयोग बढ़ाना होगा। उक्त उद्गार मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 10 सितंबर को को तीन दिवसीय 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्त किये। विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन स्थल लाल परेड मैदान में बसे माखनलाल चतुर्वेदी नगर में रामधारी सिंह दिनकर सभागार में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने विदेशी प्रवासों का जिक्र करते हुए कहा कि इन प्रवासों के दौरान उन्हें पता चला है कि दुनिया के अन्य देशों में हिंदी के क्षेत्र में कितना काम हो रहा है और वे हिंदी को कितना पसंद करते हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आने वाले दिनों में हिंदी का महत्व और बढ़ने वाला है, क्योंकि भाषा शास्त्रियों का मत है कि जिस तरह से दुनिया बदल रही है उसके चलते 21वीं शताब्दी के खत्म होने तक छह हजार भाषाओं में से 90 प्रतिशत भाषाएं विलुप्त हो जाने की संभावना दिखाई दे रही है। इस चेतावनी को अगर हम न समझे और हमने अपनी भाषा का संरक्षण नहीं किया तो वह पुरातत्व का विषय बन जाएगा, हमारा दायित्व बनता है कि भाषा को समृद्ध  कैसे बनाएं, और चीजों को जोड़ें। जब भाषा के दरवाजे बंद किए गए तब भाषा का नुकसान हुआ है।

उन्होंने कहा कि अगर हम हिंदी और रामचरित मानस को भूल जाते हैं तो हमारी स्थिति ठीक वैसी ही होगी, जैसे बगैर पैर के खड़े हैं। फणीश्वरनाथ रेणु, जयशंकर प्रसाद, मुंशी प्रेमचंद जो हमें दे गए हैं, उसे नहीं पढ़ा तो हम बिहार की गरीबी और ग्रामीण जीवन को नहीं जान पाएंगे। इसलिए भाषा को समृद्ध बनाना होगा। अगर भाषा ही नहीं बची तो इतना बड़ा साहित्य का भंडार और अनुभव कहां बचेगा।

हिंदी, अंग्रेजी, चीनी भाषा का होगा दबदबा :

उन्होंने कहा कि डिजिटल वर्ल्ड से दुनिया में बड़ा बदलाव आने वाला है। बाप-बेटा और पति-पत्नी तक वॉट्सएप का इस्तेमाल करने लगे हैं। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि इस क्षेत्र में आने वाले दिनों में तीन भाषाएं अंग्रेजी, चायनीज और हिंदी का दबदबा रहेगा। जो तकनीक से जुड़े हुए हैं उनका दायित्व बनता है कि वे तकनीक को इस तरह से परिवर्तित करें कि वह भारतीय भाषा और हिंदी के लिए हो।

प्रधानमंत्री ने कहा कि हर पीढ़ी का दायित्व है कि उसके पास जो विरासत है उसे सुरक्षित रखें और आने वाली पीढ़ी को सौंपे। भाषा जड़ नहीं होती उसमें जीवन की तरह चेतना होती है। इस चेतना की अनुभूति भाषा के विकास और समृद्धि से होती है। भाषा में ताकत होती है जहां से भी गुजरती है वहां की परिस्थिति को अपने में समाहित करती है। हिन्दुस्तान की सभी भाषाओं की उत्तम चीजों को हिन्दी भाषा की समृद्घि का हिस्सा बनाना चाहिए। मातृभाषा के रूप में हर राज्य के पास भाषा का खजाना है, इसे जोड़ने में सूत्रधार का काम करें।

मोदी ने कहा कि डिजिटल दुनिया ने हमारे जीवन में गहरे तक प्रवेश कर लिया है। हमें हिंदी और भारतीय भाषाओं को तकनीकी के लिए परिवर्तित करना होगा। बदले हुए तकनीकी परिदृश्य में भाषा का बड़ा बाजार बनने वाला है। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। भाषा हर किसी को जोड़ने वाली होनी चाहिए। हर भारतीय भाषा अमूल्य है। भाषा की ताकत का अंदाजा उसके लुप्त होने के बाद होता है।

अहिंदीभाषियों ने चलाया हिंदी भाषा आंदोलन :

हिन्दी भाषा का आंदोलन देश में ऐसे महापुरुषों ने चलाया जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं थी, यह प्रेरणा देता है। भाषा और लिपि की ताकत अलग-अलग होती है। देश की सारी भाषाएं नागरी लिपि में लिखने का आंदोलन यदि प्रभावी हुआ होता तो लिपि राष्ट्रीय एकता की ताकत के रूप में उभर कर आती। भारतीय फिल्मों ने भी दुनिया में हिन्दी को पहुंचाने का कार्य किया है। उन्होंने कहा कि विश्व हिन्दी सम्मेलन के माध्यम से हिन्दी को समृद्घ बनाने की पहल होगी और निश्चित परिणाम निकलेंगे।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने सम्मेलन को मध्यप्रदेश और भोपाल में आयोजित करने का कारण बताते हुए कहा कि मध्यप्रदेश हिन्दी के लिए समर्पित राज्य है और भोपाल सफल आयोजन करने के लिये विख्यात है। उन्होंने विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजनों की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 32 वर्षों बाद यह भारत में आयोजित हो रहा है। पहला सम्मेलन 1975 में नागपुर में हुआ था। तब से भोपाल के दसवें सम्मेलन तक आयोजन का स्वरूप बदला है। पहले के सम्मेलन साहित्य केन्द्रित थे लेकिन दसवां सम्मेलन भाषा की उन्नति पर केन्द्रित है।

सम्मेलन का शुभारंभ हिन्दी के स्तुति गान के साथ हुआ। अतिथियों को अंग वस्त्र भेंट कर स्वागत किया गया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रधानमंत्री और अतिथियों का स्वागत किया। विदेश राज्य मंत्री जनरल वी़ क़े सिंह ने आभार व्यक्त किया।

इस अवसर पर राज्यपाल रामनरेश यादव, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी, राज्यपाल गोवा मृदुला सिन्हा, केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद, झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डा. हर्षवर्धन, गृह राज्य मंत्री ड़ किरण रिजिजू, मॉरीशस की मानव संसाधन एवं विज्ञान मंत्री लीलादेवी दुक्कन, विदेश सचिव अनिल वाधवा, आयोजन समिति के उपाध्यक्ष सांसद अनिल माधव दवे सहित विभिन्न देश से आये हिंदी विद्वान और राज्य मंत्रिमंडल के सदस्य उपस्थित थे।