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शनिवार, 13 अक्तूबर 2012

'जंगल में क्रिकेट’ : बाल साहित्य सर्जना का स्तुत्य प्रयास

भारतीय डाक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी तथा बहुविधा लेखक कृष्ण कुमार यादव का अद्यतन प्रकाशित बालगीत संग्रह है ’जंगल में क्रिकेट।’ सुमुद्रण, आकर्षक आवरण, चित्रात्मकता से संबंलित एवं बालमनोविज्ञानाधारित काव्याभिव्यक्ति वाली यह कृति उद्योग नगर प्रकाशन, गाजियाबाद की प्रस्तुति है। इसकी तीस छान्दस रचनायें अल्पवयी पाठकों का जितना मनोरंजन करती हैं, उतना ही उन्हें विविध मानवीय मूल्यों से समृद्ध भी करती हैं।
 
इस बाल-कृति की चिडि़या रानी, रिमझिम-रिमझिम, गुलाब, तितली रानी, धूप, मोर, पेड़ घनेरे, चन्दामामा, सयानी बिल्ली, बन्दर गया दुकान व डाल्फिन प्रभृति रचनायें बच्चों में प्रकृति व पर्यावरण के प्रति रुचि जागृत करती हैं। ये बच्चों के लिए संसूचनात्मक भी हैं। उदाहरणार्थ ’गुलाब’ रचना के माध्यम से उन्हें पता चलता है कि काँंटों के बीच खिले होने के बावजूद कई रंग के इस फूल में नायाब खुशबू होने के कारण यह फूलों का राजा माना जाता है। काँटांे पर खिले होने के बावजूद भँवरे और तितलियाँ इसकी खूबसूरती के दीवाने होते हैं।
 
गुंजन करते इस पर भौंरे,
तितली भी इतराए।
कांटों के संग खिला गुलाब,
मंद-मंद मुस्काए। (गुलाब, पृ.सं. 17)
 
’तितली रानी’ रचना पाठकों को संदेश देती है कि किसी को भी अपने उत्तमता पर आत्ममुग्ध न होकर सबके साथ मिलजुलकर रहना चाहिए। देखिये कतिपय पंक्तियाँ-
 
जब हम आते पास तुम्हारे,
दूर भाग क्यों जाती हो ?
नन्हे-नन्हे पाँवों पर तुम,
इतना क्यूँ इतराती हो ?
आओ संग चलें बगिया में,
बनकर के हमजोली।
सभी दोस्तों के संग खेलें,
हम भी आँखमिचोली। (तितली रानी पृ.सं. 17)
 
इन पंक्तियों में सुकवि ने सब प्रकार के प्राणियों में पारस्परिक सौमनस्य तथा आत्मीयता व परिवारीयता की प्रवृत्ति को रेखांकित किया है।
 
’धूप’ के माध्यम से कविवर कृष्ण कुमारजी ने सीख दी है कि धूप सभी प्राणियों के लिए कष्टकारी तो होती है तो भी यह सर्वोपयोगी है, इसलिए उससे महसूस होने वाली तिक्ति तो छायादार पेड़ों के सहारे कम कर सकते हंै।
 
नन्हे-मुन्ने सब बच्चों को,
देखो बहुत सताती धूप।
पेड़ों की जब छाया मिलती,
तब गायब हो जाती धूप। (धूप, पृ.सं. 20)
 
यूँ सुकवि का संकेत है कि हमें वृक्षारोपण के प्रति उदासीन नहीं होना चाहिए। ’पेड़ घनेरे’ की रचना के माध्यम से सुकवि ने मानव जाति के प्रति पेड़ांे की उदारता को उल्लेख करते हुए सुझाव देते हैं कि हम सभी वृक्षों की रक्षा-सुरक्षा एवं उनके संवर्धन का संकल्प भी लें जिससे कि वह सतत् रूप से शस्य-श्यामला बनी रहें। देखिये संदर्भित रचना का समापनांश-
 
पेड़ कहीं न कटने पाएँ,
संकल्पों के हाथ उठाएँ।
भांति-भांति के पेड़ लगाकर,
मरूभूमि को सरस बनाएँ। (’पेड़ घनेरे’ पृ.सं. 25)
 
पृ. 29 की रचना ’जंगल में क्रिकेट’ जिसे कृति संज्ञा भी मिली है, के अंतर्गत जिराफ, भालू, चीता, शेर, घोड़े, हाथी और बंदरिया को ’ट्वेन्टी-ट्वेन्टी’ क्रिकेट के माध्यम से पारस्परित सौमनस्य के सूत्र में पिरोया गया है, सांकेतिक संदेश भी देती है यह कि शक्ति और आकार की दृष्टि से कोई बड़ा नहीं होता, बड़प्पन की कसौटी तो पशु हो या मानव, उनमें पारस्परिक सौमनस्य समता एवं सर्वस्वीकारता के भाव होते हैं, अतः हमें अनिवार्यतः संस्कारों से समृद्ध अपनी पंरपरागत जीवन शैली को आसृष्टिजीवी बनाये रखने के लिए संकल्पित बनना होगा।
 
जंगल में भी शुरू हुआ,
ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट मैच।
दर्शक बने सभी जानवर
देखें, कौन करेगा कैच ? (जंगल में क्रिकेट पृ.सं. 29)

तीस बाल गीतो से सुसज्जित इस कृति में अनेकों भाव है, बच्चों से सीधा संवाद है। आकर्षक आवरण पृष्ठ एवं हर रचना के अनुसार चित्रों का सुन्दर चित्रण इसे बाल मन के और करीब लाता है। मुझे विश्वास है कि यह कृति बच्चों और प्रौढ़ों के द्वारा समान रुचि से पढ़ी जायेगी।
 
 
कृति: जंगल में क्रिकेट

कवि: कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएं, इलाहाबाद परिक्षेत्र, इलाहाबाद (उ0प्र0)-211001

प्रकाशन वर्ष: 2012

मूल्य: रु. 35/-पृष्ठ: 36

प्रकाशक : उद्योग नगर प्रकाशन, 695, न्यू कोट गाँव, जी0टी0रोड, गाजियाबाद (उ0प्र0)
 
समीक्षक: डॉ. कौशलेन्द्र पाण्डेय, 130, मारुतीपुरम्, लखनऊ मो0: 09236227999


( साभार : रचनाकार)
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