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रविवार, 13 मार्च 2011

भगोरिया की मस्ती और आदिवासी समाज

भारतीय संस्कृति प्रेम की उपासक रही है। कभी यह राधा-कृष्ण के आध्यात्मिक प्रेम के रुप में उद्दीपत होता है तो कभी लौकिक प्रेम के रुप में। सभ्य समाज में भले ही खाप पंचायतें प्रेम के आड़े आ रही हों पर आदिवासी समाज तो अभी भी बकायदा प्रेम का उत्सव मनाता है। इसके लिए उन्हें किसी वेलेंटाइन-डे की जरुरत नहीं पड़ती। पश्चिमी मध्य प्रदेश के आदिवासी युवाओं के पारंपरिक प्रणय पर्व, ‘भगोरिया‘ की मस्ती तो देखते ही बनती है। इस साल प्रमुख भगोरिया हाटों की शुरुआत 13 मार्च से हो रही है और यह सिलसिला हफ्ते भर तक चलेगा।

प्रेम का यह परंपरागत पर्व म०प्र० के झाबुआ, धार, खरगोन और बड़वानी जैसे आदिवासी बहुल जिलों में मनाया जाता है। सदियों से मनाए जा रहे भगोरिया उत्सव के जरिए आदिवासी युवा अनूठे ढंग से अपना जीवन साथी चुनते आ रहे हैं। हर साल टेसू (पलाश) के पेड़ों पर खिलने वाले सिंदूरी फूल पश्चिमी मध्यप्रदेश के आदिवासियों को फागुन आने की खबर दे देते हैं और वे ‘भगोरिया‘ मनाने के लिए तैयार हो जाते हैं। आदिवासी टोलियाँ ढोल और मांदल (एक तरह का बाजा) की थाप और बांसुरी की स्वर लहरियों पर भगोरिया हाट में सुध-बुध बिसराकर झूमती हैं। भगोरिया हाट को आदिवासी युवक-युवतियों का ‘मिलन समारोह‘ भी कहा जा सकता है। परंपरा के मुताबिक भगोरिया हाट में आदिवासी युवक, युवती को पान का बीड़ा पेश करके अपने प्रेम का मौन इजहार करता है। युवती का बीड़ा लेने का मतलब है कि वह भी युवक को पसंद करती है। उसके बाद वह युवक भगोरिया हाट से ‘भाग‘ जाता है और तब तक घर नहीं लौटता, जब तक दोनों के परिवार उनकी शादी के लिए रजामंद नहीं हो जाते।

प्रेम की इस सदियों पुरानी जनजातीय परंपरा पर भी आधुनिकता का रंग अब गहरा रहा है। जनजातीय संस्कृति के जानकार बताते हैं कि भगोरिया हाट अब मेलों में तब्दील हो गए है। जनजाति के परंपरागत सुरों में डीजे साउंड भी खूब घुल-मिल गया है। इनमें परंपरागत तरीके से जीवन साथी चुनने के दृश्य उतनी प्रमुखता से नहीं दिखते। पर तमाम बदलावों के बावजूद भगोरिया का उल्लास लोगों में जस का तस बना हुआ है। यही कारण है कि भगोरिया की विश्व प्रसिद्ध मस्ती को आंखों में कैद करने के लिए पश्चिमी मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल जिलों में बड़ी संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक भी उमड़ते और आदि-प्रेम का बखूबी लुत्फ़ उठाते हैं।
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