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सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

तंत्र नहीं लोक के नायक थे जे0पी0 (जन्मतिथि 11 अक्टूबर पर विशेष)

भ्रष्टाचार केवल शासन में ही नहीं है, बल्कि वह लोकजीवन के हरेक क्षेत्र में मौजूद है। ऐसी स्थिति में मात्र सत्ता परिवर्तन से जन समस्याओं का हल नहीं होगा, बल्कि इसके लिए व्यवस्था परिवर्तन करना होगा। इस व्यवस्थागत परिवर्तन के बाद ही समतामूलक समाज की स्थापना हो सकती है........यह उद्गार समाजवाद, सर्वोदय से सम्पूर्ण क्रान्ति तक की यात्रा करने वाले जयप्रकाश नारायण के थे, जिन्होंने अपने जीवन में तमाम अवसरों के बावजूद कोई पद स्वीकार नहीं किया। गीता में वर्णित निष्काम कर्म भावना के अनुसार जयप्रकाश नारायण सदैव सक्रिय रहे और सत्ता की कीमत पर कोई भी समझौता नहीं किया। वे लोकतंत्र की उस अवधारण के कायल थेे जो जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन स्थापित करती है। जनमत की आड़ में लोगों की संवेदनाओं को ठुकराकर सत्तातंत्र से येन-केन प्रकरेण चिपके रहने की उन्होंने सदैव मुखालाफत की। जयप्रकाश नारायण के लिए लोकतंत्र में लोक महत्वपूर्ण था न कि तंत्र। इस तंत्र की आड़ में लोक की भावनाओं का तिरस्कार उन्हें कभी मंजूर नहीं था। यही कारण था कि लोगों ने उन्हें ’लोकनायक’ की उपाधि दी।

11 अक्टूबर 1902 को उत्तर प्रदेश व बिहार की संधिस्थल पर स्थित सिताबदियारा (सारण जनपद) गाँव में जयप्रकाश नारायण का जन्म एक सामान्य किसान परिवार में हुआ। बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के मेधावी छात्र रहे जे0पी0 ने 1919 में हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। 1921 में जब गाँधी जी द्वारा प्रवर्तित असहयोग आंदोलन चरम पर था, तो जे0पी0 भी इससे अछूते नहीं रह सके और इस आन्दोलन में शामिल होने के लिए न सिर्फ इण्टरमीडिएट की परीक्षा छोड़ दी बल्कि अन्य विद्यार्थियों को भी स्कूल-कालेज छोड़ने के लिए प्रेरित किया। इस बीच उनकी शादी प्रभावती से हो गयी, जिन्होंने जे0पी0 के व्यक्तित्व को एक विस्तार दिया। फरवरी 1922 में चैरीचैरा काण्ड के बाद महात्मा गाँधी ने असहयोग आन्दोलन वापस लेने की घोषणा की और इसके कुछेक महीने बाद ही जे0पी0 आगामी अध्ययन के लिए अमेरिका चले गये। अमेरिका में अध्ययन के लिए उन्होंने वहाँ बूट पालिश करने से लेकर होटलों में जूठे प्लेट धोने और बूचड़खाने तक में काम किया। जे0पी0 ने कठिनाईयों से विचलित होने की बजाय सदैव उनका अवसरों के रूप में उपयोग करना सीखा। इसी अदम्य इच्छाशक्ति के चलते उन्होंने ओहियो विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नाकोत्तर की उपाधि धारण की। मई 1922 से सितम्बर 1929 तक अमेरिका में रहने के पश्चात जे0पी0 भारत लौटे और उस समय स्वतंत्रता संग्राम का पर्याय बन चुके कांग्रेस से जुड़कर आनन्द भवन इलाहाबाद में रहने लगे।1934 के दौरान जे0पी0 ने आचार्य नरेन्द्रदेव, डा0 राममनोहर लोहिया, अशोक मेहता, अच्युत पटवर्धन इत्यादि के साथ कांग्रेस के भीतर समाजवादी विचारों से लैस एक गरम दल बना लिया और वे इसके अगुआ रहे। वस्तुतः जे0पी0 ने एक साथ ही गाँधीवादी और क्रान्तिकारी आन्दोलन की उष्णता महसूस की और दोनों का समन्वय स्वीकार किया।

जे0पी0 ने स्वतंत्रता आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर भूमिका निभायी। 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान उनका नाम उभरकर सामने आया। इस आन्दोलन की शुरूआत में ही सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। जे0पी0 को भी गिरफ्तार करके नासिक व हजारीबाग की जेल में रखा गया। पर तूफान को कौन बाँध पाया है, सो हजारीबाग जेल की चहरदीवारी को लांघकर जे0पी0 ’करो या मरो’ भावना से प्रेरित होकर भाग निकले और जेल से बाहर रहकर भारत छोड़ो आन्दोलन को मूर्त रूप दिया। अंग्रेजी हुकूमत के मँुह पर यह एक करारा तमाचा था और इस बात का प्रतीक भी कि अब भारत में अंग्रेजों के दिन गिने-चुने ही रह गये थे। जे0पी0 को पकड़ने के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने इनाम की भी घोषणा की, पर जे0पी0 पकड़ में नहीं आये। भारत छोड़ो आन्दोलन के आह्नान के लगभग एक वर्ष बाद जाकर 18 सितम्बर 1943 को लाहौर के पास ट्रेन में नाटकीय अंदाज में जे0पी0 की गिरफ्तारी हुई। अंग्रेजी हुकूमत ने जे0पी0 को जेल में कठोर यातनायें दीं और उन्हें बर्फ की सिल्लियों पर लिटाया गया, पर देशभक्ति का कोई मोल नहीं होता। जे0पी0 को भारत की आजादी का अहसास होने लगा था। 11 अप्रैल 1946 को जब वे जेल से रिहा हुये तो जनमानस ने उनका ’’अगस्त क्रान्ति के नायक’ रूप में जोरदार स्वागत किया।

15 अगस्त 1947 को देश आजाद हो गया। पूरे राष्ट्र के लिए यह हर्ष का विषय था पर जे0पी0 के मन में देश विभाजन की पीड़ा भी थी। जे0पी0 देश विभाजन के घोर विरोधी थे और भारत-पाकिस्तान मित्रता के जबरदस्त पक्षधर। इस बीच स्वतंत्रता आन्दोलन का पर्याय रही कांग्रेस के चरित्र में भी जे0पी0 ने बदलाव महसूस किया। कांग्रेस के चरित्र में उन्हें समतामूलक समाज की बजाय अवसरवादिता और पदलोलुपता की गंध आने लगी। गाँधी जी की हत्या के बाद तो उनका रहा-सहा धैर्य भी जवाब दे गया। इससे आहत होकर बड़ी तल्खी से उन्होंने गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल से इस्तीफे की माँग कर डाली। जे0पी0 की राजनीति में चरित्र था, चालाकी नहीं। यही कारण था कि पं0 जवाहरलाल नेहरू भी उनकी उपेक्षा नहीं कर पाते थे। गृहमंत्री के इस्तीफे के सवाल पर पं0 नेहरू ने आकाशवाणी पर प्रसारित अपने वक्तव्य में मंत्रिमण्डलीय परम्परानुसार सरदार पटेल का बचाव अवश्य किया पर यह कहने से भी नहीं चूके कि -’’जे0पी0 एक दिन देश की तकदीर गढ़ेंगे।’’

गाँधीजी की मौत पश्चात जे0पी0 ने समाजवाद का नारा बुलन्द किया और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन द्वारा कांग्रेस के समानान्तर समाजवादी संगठन को बल प्रदान किया। सत्ता की चहरदीवारी से दूर जे0पी0 ने अपने को जनमानस के बीच खड़ा पाया। नवम्बर 1951 में पटना में किसान मार्च का नेतृत्व करते हुए उनकी भावनायें स्पष्ट परिलक्षित हुईं। 1954 में बिनोबा भावे के ‘भूदान आन्दोलन‘ से जे0पी0 जुड़े और अपने जीवनदान की घोषणा करते हुए राजनीति से भी सन्यास ले लिया। सर्वोदयी भावना को अपनाते हुए उन्होंने राजनैतिक परिवर्तन से परे बुनियादी परिवर्तन की सम्भावनाओं को भी टटोला। इसी क्रम में बिनोबा भावे के साथ चम्बल के दुर्दान्त डाकुओं के हृृदय परिवर्तन में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। जे0पी0 ने समाज के नवनिर्माण के लिए तमाम रचनात्मक कार्यक्रमों में अवदान दिया और ‘गाँधी विद्या संस्थान‘ (बनारस) जैसी तमाम संस्थायें भी खड़ी कीं। जे0पी0 ने-समाजवाद क्यों, प्रिजन डायरी, सर्वोदय और लोकतंत्र, समाजवाद, फस्र्ट थिंग्स, मेरी विचार-यात्रा, फस्र्ट कांग्रेस सोशलिस्ट, नेशन बिल्डिंग इन इंडिया, संपूर्ण क्रांति के लिए आह्नान, आमने-सामने इत्यादि तमाम चर्चित किताबंे भी लिखीं।

जे0पी0 युवा शक्ति की ताकत को बखूबी महसूूस करते थे। वे जानते थे कि युवा शक्ति के ही कंधों पर भारत का भविष्य टिका हुआ है। दिसम्बर 1973 में पवनार आश्रम से जे0पी0 ने 71 वर्ष की आयु में ’यूथ फार डेमोक्रेसी’ नामक अपील जारी की। यह वह दौर था जब देश में लोकतांत्रिक मूल्यों का गला घोंटने का प्रयास किया जा रहा था। जे0पी0 ने अपील के साथ ही युवाओं के बीच जाकर उनसे सीधा संवाद किया और एक बार फिर राजनैतिक रूप से सक्रिय हुए। नतीजन, युवा शक्ति की तरंगंे देश में हिलोरें मारने लगीं और उद्घोष हुआ- ‘‘सम्पूर्ण क्रान्ति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है।‘‘ गुजरात में युवाओं ने जब आन्दोलन आरम्भ किया तो जे0पी0 उनके बीच पहुँचे और कहा-’’मैं देश के वर्तमान माहौल के बारे में काफी चिन्तित था। मैं अंधेरे में टटोल रहा था और मुझे कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। ऐसे समय में गुजरात के युवाओं ने इस आन्दोलन की मशाल जलायी और इसने मुझे प्रकाश दिखाया है।’’ गुजरात का आन्दोलन तो बहुत दिन तक नहीं चला पर इसकी गूँज अन्य प्रान्तों में भी सुनायी दी। इस बीच 12 सूत्रीय माँगों को लेकर फरवरी 1974 में बिहार के छात्र भी आन्दोलनरत हो गये थे। 18 मार्च को विधानसभा के समक्ष छात्रों के सत्याग्रह के दौरान पुलिस ने जमकर लाठीचार्ज किया और गोलियाँ चलायीं। नतीजन, पटना आन्दोलन की आग में जल उठा। इस आन्दोलन के पीछे जे0पी0 की भूमिका को चिन्हित करते हुये सरकार में बैठे लोगों ने तिलमिलाकर उन्हें विदेशी एजेण्ट की संज्ञा दी और मौन जुलूस तक निकालने की इजाजत नहीं दी। बूढ़े जे0पी0 का जवान मन क्रान्ति के लिए तड़प उठा और उन्होंने युवाओं का आह्नान करते हुए कहा-’’डरो मत, अभी मैं जिंदा हूँ।’’ फिर क्या था, जे0पी0 ने भष्टाचार, कालाबाजारी, मुनाफाखोरी, जमाखोरी इत्यादि व्यवस्थागत विसंगतियों पर जमकर प्रहार किये और सच्चे अर्थों में ’लोक’ का राज स्थापित करने के लिए कमर कस ली। 8 अप्रैल 1974 को पटना में जे0पी0 ने मौन जुलूस निकाला और 9 अप्रैल को पटना की एक ऐतिहासिक जनसभा में उन्होंने शान्तिपूर्ण आन्दोलन आरम्भ करने की घोषणा की। जे0पी0 का जादू चल निकला और छात्रों व युवा शक्ति ने उन्हें हाथांे-हाथ लेते हुए ’लोकनायक’ का खिताब दिया। उस समय पटना विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे लालू प्रसाद यादव जैसे तमाम वर्तमान दिग्गज राजनेता जे0पी0 के साथ खड़े थे। देखते ही देखते पूरा बिहार इस आन्दोलन की जद में आ गया और जे0पी0 के पीछे जनमानस उमड़ पड़ा। लोकसत्ता का यह रूप देखकर राजसत्ता बौखला उठी और जे0पी0 पर लाठियाँ बरसीं। इस बीच 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में इन्दिरा गाँधी के चुनाव को अवैध करार दे दिया। 23 जून को दिल्ली में संयुक्त विपक्ष के कार्यक्रम को जे0पी0 ने मुख्य वक्ता के रूप में सम्बोधित किया और 25 जून को रामलीला मैदान में ऐतिहासिक जनसभा को सम्बोधित करते हुए उन्होंने राजसत्ता की धज्जियांँ उड़ा कर रख दीं।

73 वर्षीय बूढ़े जे0पी0 की गर्जना राजसत्ता को बर्दाश्त नहीं हुई और 25 जून 1975 को प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी ने आन्तरिक सुरक्षा को खतरा बताते हुए आपातकाल की घोषणा कर दी। 26 जून को तड़के 4 बजे ही नई दिल्ली के गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान में ठहरे जे0पी0 को गिरफ्तार कर लिया गया। लगभग ढाई माह पश्चात जे0पी0 को एक महीने के पेरोल पर 12 नवम्बर को जब रिहा किया गया तो उनका स्वास्थ्य काफी हद तक गिर चुका था। उनके दोनांे गुर्दों ने काम करना बन्द कर दिया था। पर जे0पी0 का यह संघर्ष व्यर्थ नहीं गया और जनवरी 1977 में देश में आम चुनाव की घोषणा हुई। ‘लोकनायक‘ की आवाज लोकमानस तक पहुँची और इन्दिरा गाँधी को रायबरेली लोकसभा सीट से पराजय का मँुह देखना पड़ा। केन्द्र में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी के नेतृत्व में पहली गैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। इस पर जे0पी0 ने कहा-‘‘मेरा काम पूरा हो गया। अब मैं मरना चाहता हूँ‘‘। जे0पी0 का स्वास्थ्य दिनों-ब-दिन गिरता गया और अन्ततः 8 अक्टूबर 1978 को उनका निधन हो गया।

आज जबकि चारों तरफ राजनैतिक पदों के लिए होड़ मची हुई है, सत्ता प्राप्ति के लिए राजनैतिक दल किसी भी स्तर पर उतरने को तैयार हैं, सामाजिक जीवन में शुचिता गौण हो गई है.......ऐसे में जे0पी0 की प्रासंगिकता स्वतः सिद्ध हो जाती है। यह जे0पी0 का लोकमानस के प्रति अटूट प्रेम ही कहा जायेगा कि सरकार गठन के पश्चात भी वे किसी पद या मद में नहीं डूबे। उस दौर में जब लोग उगते सूरज को सलाम कर रहे थे, जे0पी0 सारी पुरानी बातों को भूलकर इन्दिरा गाँधी से मिलने उनके निवास पर गये और उन्हें जनता की सेवा के प्रति और उन्मुख होकर कार्य करने की सलाह दी। उनके मन में किसी के प्रति कोई क्षोभ या दुराग्रह नहीं था। इन्दिरा गाँधी से उन्होंने कहा- ‘‘इन्दु, यही लोकतंत्र है। तुम घबराना मत। जनता की सेवा नहीं छोड़ना। यही सबसे बड़ा धर्म है।‘‘ जे0पी0 के इस महान व्यक्तित्व और राजधर्म निभाने की सलाह पर इन्दिरा गाँधी की आँखे भी छलछला गई थीं, शायद उस समय तक राजनेताओं की आँखों का पानी नहीं मरा था। युवा शक्ति में विश्वास कर जे0पी0 ने युवाओं को न सिर्फ रचनात्मक आन्दोलनों से जोड़ा बल्कि उन्हें उनके अधिकारों के प्रति सचेत भी किया। आज की युवा पीढ़ी जिस प्रकार दिग्भ्रमित होकर नेताओं और राजनैतिक दलांे के चक्कर काटती है और अन्ततः मृगतृष्णा के सिवाय उसे कुछ नहीं प्राप्त होता, ऐसे में जे0पी0 की सोच स्वतः प्रासंगिक हो जाती है। पदों को ठुकराते चले जे0पी0 पर छात्र आन्दोलन में छात्रों को गुमराह करने और अपना स्वार्थ साधने से लेकर पलायनवादी तक के आरोप लगे, पर इन सबसे बेपरवाह जे0पी0 अन्त तक एक नायक के रूप में ‘लोक‘ की लड़ाई लड़ते रहे और एक इतिहास रच गये।

श्री राम शिव मूर्ति यादव
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