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शनिवार, 7 अगस्त 2010

पचमढ़ी की याद में : एक कविता

पचमढ़ी मेरी पसंदीदा जगहों में से है. वहां की कई बार सैर भी कर चूका हूँ. पहली बार तब जाना हुआ था, जब मैं भोपाल में ट्रेनिंग कर रहा था. उस समय पचमढ़ी के सौंदर्य पर मोहित होकर एक कविता लिखी थी-

पचमढ़ी
यानी पांडवों की पाँच मढ़ी
यहीं पांडवों ने अज्ञातवास किया
फिर छोड़ दिया इसे
सभ्यताओं की खोज तक दरकने हेतु।

पचमढ़ी
यहीं रची गई शंकर-भस्मासुर की कहानी
जिसमें विष्णु ने अंततः
नारी का रूप धरकर
स्वयं भस्मासुर को ही भस्म कर दिया
आज भी जीती - जागती सी
लगती हैं कंदरायें
जहाँ पर यह शिव - लीला चली।

पचमढ़ी
सतपुड़ा के घने जंगलों के बीच
मखमली घासों को चितवन से निहारते
बड़े - बड़े पहाड़ हाथ फैलाकर
मानो धरा को अपने आप में
समेट लेना चाहते हों।
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