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सोमवार, 5 जुलाई 2010

भारत बंद की दुहाई


मुट्ठियाँ ताने चंद लोग
हवाओं में नारेबाजी करते
बड़े-बड़े बैनर और दफ्तियाँ संभाले
पल भर में
पूरा भारत बंद कर देते हैं
वे दुहाई देते हैं
जनता के हितों की
आश्वासन देते हैं
एक सुखद भविष्य का
पर नहीं दिखता उन्हें
इस बंद में फंसे लोगों का हित
जिनका आज का भविष्य
शायद यही होगा कि
बच्चों की कक्षायें
छूट गयी होंगी
आॅफिस लेट पहुँचने वालों को
बाॅस की डाँट सुननी होगी
कोई मरीज अस्पताल न पहुँचने पर
दम तोड़ रहा होगा
या कोई बेरोजगार युवा
साक्षात्कार में शामिल न हो पाने पर
अपना सिर पीट रहा होगा !!
(आज भारत-बंद की घोषणा की गई है. पर क्या वाकई इसका कोई अर्थ है. इस कविता के माध्यम से महसूस कीजिये उन लोगों का दर्द जो आज इसके शिकार होने जा रहे हैं )
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