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शनिवार, 15 मई 2010

बारिश, पकौड़े और चाय...

अंडमान में आज खूब जमकर बारिश हुई। सुना तो था कि यहाँ मूसलाधार बारिश होती है, पर इस बार कुछ ऐसा नहीं दिखा. कभी हलकी-फुलकी बारिश हुई तो बस उतनी ही. सुनामी के बाद अंडमान में भी पर्यावरण में काफी परिवर्तन आया है. पर आज तो दोपहर से शाम तक खूब झमाझम बारिश हुई. बारिश के फौव्वारे अन्दर तक आते तो बचपन की यादें ताजा हो जातीं. वो बारिश में भीगना, वो कागज की नाव, वो मस्ती के दिन....पता नहीं क्यों बड़े होने के साथ बचपना भी छूट जाता है. मन तो कहता कि बारिश में भीगो, पर मुझे पता था कि इसी बहाने हमारी बिटिया रानी अक्षिता (पाखी) भी मौके का पूरा फायदा उठायेंगीं और फिर उन्हें मनाना मुश्किल होगा.

खैर शाम को जब बारिश धीमी हुई तो बाहर का मौसम बड़ा सुहाना हो चुका था। गुलमोहर के लाल-लाल फूल अपने शवाब में दिख रहे थे तो पक्षी आसमां में कलाबाजियाँ दिखा रही थीं. बादल अभी भी उमड़-घुमड़ कर रहे थे. ऐसे में बाहर निकलकर हल्का-हल्का भीगना पूरे दिलोदिमाग को एक अजीब सी ख़ुशी प्रदान करता है. लगता है कितने दिनों बाद इस दिन को जी रहा हूँ. मौके की नजाकत, तब तक पकौड़ों और चाय की तलब महसूस हुई. कहते हैं ना बारिश का मजा पकौड़ों और चाय के बिना अधूरा ही होता है. पता नहीं कहाँ से ये परंपरा आरंभ हुई होगी, पर यह बारिश का मजा दुगुना कर देती है और बारिश इनका स्वाद दुगुना कर देते हैं. फ़िलहाल पत्नी आकांक्षा और बिटिया अक्षिता के साथ अंडमान की बारिश का लुत्फ़ भरपूर रूप में उठा रहा हूँ, इधर अख़बारों और न्यूज चैनल्स पर उधर की कड़ी धूप व गर्मी के भी समाचार देख रहा हूँ. दिल में बस यही ख्याल आता है-
सब प्रकृति की माया है !
कहीं धूप और कहीं छाया है !!
(चित्र में बिटिया अक्षिता)
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